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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>चित्र:Shrer-raghu.jpg</title>
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		<updated>2012-02-12T12:06:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>देवानंद</title>
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		<updated>2011-12-04T06:21:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा कलाकार&lt;br /&gt;
|चित्र=dev anand young.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=देव आनंद&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=धर्मदेव आनंद&lt;br /&gt;
|प्रसिद्ध नाम='देवानंद' अथवा 'देव आनंद'&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[26 सितंबर]], [[1923]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= [[पंजाब]] के गुरदासपुर ज़िले (अब पाकिस्तान में)&lt;br /&gt;
|मृत्यु=3 दिसम्बर 2011 (88 वर्ष की उम्र में)&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=लंदन, इंग्लॅन्ड&lt;br /&gt;
|अविभावक= पिशौरीलाल आनंद&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी= कल्पना कार्तिक&lt;br /&gt;
|संतान= सुनील आनंद&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[मुंबई]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=फ़िल्म निर्माता-निर्देशक, [[अभिनेता]] &lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|मुख्य फ़िल्में=काला पानी, गाइड, हम दोनो, काला बाज़ार आदि &lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक&lt;br /&gt;
|विद्यालय=गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार, [[पद्म भूषण]], [[दादा साहब फाल्के पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|19:43, 2 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''देवानन्द''' (धर्मदेव आनंद) भारतीय सिनेमा के शुरूआती दौर के प्रसिद्ध अभिनेता थे जो जीवन भर सक्रिय और चर्चित रहे। वे अभिनेता के साथ-साथ निर्माता-निर्देशक भी थे। वे बॉलीवुड में देव साहब के नाम से एक ज़िन्दादिल और भले इंसान के रूप में प्रसिद्ध थे। भारतीय सिनेमा में दो पीढ़ियों तक लगातार हीरो बने रहने वाले कलाकार के विषय में यदि विचार करें तो केवल एक ही नाम उभरता है और वह है देव आनंद (देवानंद) । कभी अपनी एक फिल्म में उन्होंने एक गीत गुनगुनाया था 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया' और शायद यही गीत उनके जीवन को सबसे अच्छी तरह परिभाषित भी करता है। देव आनंद के नाम हिंदी सिने जगत के आकाश में स्टाइल गुरु बनकर जगमगाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सदाबहार अभिनेता देव आनंद को लोग एवरग्रीन देव साहब कह कर पुकारते हैं। सदाबहार देवानंद का जलवा अब भी बरक़रार है। वक़्त की करवटें उनकी हस्ती पर अपनी सिलवटें नहीं छोड़ पाईं। छह दशक से अधिक समय तक रुपहले परदे पर राज करने वाले देवानंद साहब का 26 सितंबर को जन्मदिन पड़ता है और 88 वर्ष की उम्र हृदयगति रुक जाने से 3 दिसम्बर 2011 को उनका देहावसान हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का जीवन==&lt;br /&gt;
बॉलीवुड-सदाबहार हीरो देव आनंद का पूरा नाम धर्मदेव पिशौरीलाल आनंद है। देव आनंद जो कि भारतीय सिनेमा के महान कलाकार, निर्माता व निर्देशक हैं का जन्म अविभाजित पंजाब के गुरदासपुर ज़िले (अब पाकिस्तान में) में 26 सितंबर, 1923 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में और प्रसिध्द वकील पिशौरीलाल आनंद नामक एक संपन्न अधिवक्ता के घर हुआ था। उनका बचपन का नाम धर्मदेव (देवदत्त) पिशौरीलाल आनंद था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनका बचपन परेशानियों से घिरा रहा। बचपन से ही उनका झुकाव अपने पिता के पेशे वकालत की ओर न होकर अभिनय की ओर था। एक वकील और आजादी के लिए लड़ने वाले पिशौरीलाल के घर पैदा होने वाले देव ने रद्दी की दुकान से जब बाबूराव पटेल द्वारा सम्पादित फिल्म इंडिया के पुराने अंक पढ़े तो उन की आंखों ने फिल्मों में काम करने का सपना देख डाला और वह माया नगरी मुम्बई के सफर पर निकल पङे। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर (कि अब पाकिस्तान में है) के मशहूर गवर्नमेंट कॉलेज से पूरी की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस कॉलेज ने फिल्म और साहित्य जगत को बलराज साहनी, चेतन आनंद, बी. आर. चोपड़ा और खुशवंत सिंह जैसे शख्सियतें दी हैं। इसके बाद वे उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते थे लेकिन पिता के पास इतने पैसे नहीं थे। देव आनंद को अपनी पहली नौकरी मिलिट्री सेन्सर ऑफिस (आर्मी करेस्पांडेंस सेंसर डिपार्टमेंट) में एक लिपिक के तौर पर मिली जहां उन्हें सैनिकों द्वारा लिखी चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगों को पढ़ कर सुनाना पड़ता था। इस काम के लिए देव आनंद को 165 रूपये मासिक वेतन के रूप में मिला करता था जिसमें से 45 रूपये वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज दिया करते थे। लगभग एक वर्ष तक मिलिट्री सेन्सर में नौकरी करने के बाद और परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए वह 30 रूपए जेब में ले कर पिता के मुंबई जाकर काम न करने की सलाह के विपरीत देव अपने भाई चेतन आनंद के साथ फ्रंटियर मेल से 1943 में मुंबई पहुँच गये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चेतन आनंद उस समय भारतीय जन नाटय संघ इप्टा से जुड़े हुए थे। उन्होंने देव आनंद को भी अपने साथ इप्टा में शामिल कर लिया। देव आनंद (और उनके छोटे भाई विजय आनंद) को फिल्मों में लाने का श्रेय उनके बड़े भाई चेतन आनंद को जाता है। देव ने ये सपने में भी न सोचा होगा की कामियाबी इतनी जल्दी उनके कदम चूमेगी मगर ये तीस रुपए रंग लाए और जाएँ तो जाएँ कहाँ का राग अलापने वाले देव आनंद को माया नगरी मुम्बई में आशियाना मिल गया। गायक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे देवानंद अभिनेता बन गए। देवआनंद के भाई, चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक रहे हैं। उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का कॅरियर==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right; width:45%; border:thin solid #aaaaaa; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;98%&amp;quot; class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; style=&amp;quot;float:right&amp;quot;;&lt;br /&gt;
|+देव आनंद का फ़िल्मी सफ़र&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;20%&amp;quot;| वर्ष&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;80%&amp;quot;| फ़िल्म&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 300px; overflow: auto;overflow-x:hidden;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;98%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1952]]&lt;br /&gt;
| जाल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आँधियाँ&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तमाशा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जलजला&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1953]]&lt;br /&gt;
| पतिता&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| राही&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हमसफर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अरमान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1954]]&lt;br /&gt;
| बादबान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| टैक्सी ड्राइवर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फेरी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;5&amp;quot;| [[1955]] &lt;br /&gt;
| फरार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हाउस नंबर 44 &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मुनीमजी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| इंसानियत&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मिलाप&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1956]] &lt;br /&gt;
| फंटूश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सीआईडी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पॉकेट मार &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1957]]  &lt;br /&gt;
| पेइंग गेस्ट &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| दुश्मन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बारिश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नौ दो ग्यारह &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1958]]  &lt;br /&gt;
| सोलहवाँ साल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अमर दीप &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| काला पानी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1959]] &lt;br /&gt;
| लव मैरिज &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;6&amp;quot;| [[1960]]  &lt;br /&gt;
| जाली नोट &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| एक के बाद एक &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मंजिल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सरहद &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बम्बई का बाबू &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| काला बाज़ार &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1961]]&lt;br /&gt;
| जब प्यार किसी से होता है &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हम दोनों &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1962]]&lt;br /&gt;
| बात एक रात की &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| माया &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| रूप की रानी चोरों का राजा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1963]]&lt;br /&gt;
| असली नकली &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरे घर के सामने &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1964]]&lt;br /&gt;
| शराबी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| किनारा किनारे &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1965]]&lt;br /&gt;
| तीन देवियाँ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गाइड&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1966]]&lt;br /&gt;
| प्यार मोहब्बत &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1967]]&lt;br /&gt;
| ज्वेल थीफ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1968]]&lt;br /&gt;
| कहीं और चल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फरेब&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1969]]&lt;br /&gt;
| दुनिया&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| महल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1970]]&lt;br /&gt;
| जॉनी मेरा नाम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रेम पुजारी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1971]]&lt;br /&gt;
| गैम्बलर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरे मेरे सपने &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1972]]&lt;br /&gt;
| अच्छा बुरा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हरे रामा हरे कृष्णा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| यह गुलिस्तां हमारा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1973]]&lt;br /&gt;
| छुपा रुस्तम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| शरीफ बदमाश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जोशीला &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1974]]&lt;br /&gt;
| इश्क इश्क इश्क &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हीरा पन्ना &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रेम शास्त्र &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अमीर गरीब &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1975]]&lt;br /&gt;
| वारंट&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1976]]&lt;br /&gt;
| जानेमन &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1977]]&lt;br /&gt;
| कलाबाज&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| डार्लिंग डार्लिंग &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बुलेट&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1978]]&lt;br /&gt;
| देस परदेस &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1980]]&lt;br /&gt;
| मनपसंद&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| साहेब बहादुर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लूटमार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1982]]&lt;br /&gt;
| स्वामी दादा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1984]]&lt;br /&gt;
| आनंद और आनंद &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1986]]&lt;br /&gt;
| हम नौजवान &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1989]]&lt;br /&gt;
| सच्चे का बोलबाला &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लश्कर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1990]]&lt;br /&gt;
| अव्वल नंबर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1991]]&lt;br /&gt;
| सौ करोड़ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1995]]&lt;br /&gt;
| गैंगस्टर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1996]]&lt;br /&gt;
| रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1998]]&lt;br /&gt;
| मैं सोलह बरस की &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2001]]&lt;br /&gt;
| सेंसर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2003]]&lt;br /&gt;
| लव एट टाइम्स स्क्वेयर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2005]]&lt;br /&gt;
| मि.प्राइम मिनिस्टर &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने के बाद उनका नाम सिमट कर हो गया देवानंद। देव आनंद को अभिनेता के रूप में पहला ब्रेक 1946 में प्रभात स्टूडियो की फिल्म ‘हम एक हैं’ से मिला। लेकिन इस फिल्म के असफल होने से वह दर्शकों के बीच अपनी पहचान नहीं बना सके। इस फिल्म के निर्माण के दौरान प्रभात स्टूडियो में उनकी मुलाकात बाद के मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक गुरूदत्त से हुई जो उन दिनों फिल्मी दुनिया में कोरियोग्राफर के रूप में स्थान बनाने के लिए संघर्षरत थे। वहाँ दोनों की दोस्ती हुई और एक साथ सपने देखते इन दोनों दोस्तों ने आपस में एक वादा किया कि अगर गुरूदत्त फ़िल्म निर्देशक बनेंगे तो वे देव को अभिनेता के रूप में लेंगे और अगर देव निर्माता बनेंगे तो गुरुदत्त को निर्देशक के रूप में लेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म 'जिद्दी' (1948) में अभिऩेत्री कामिनी कौशल के साथ देव आनंद के फिल्मी कॅरियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। जिद्दी ने देव आनंद को नई ऊंचाइयां दिलायी। इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रख दिया। सन् 1949 में उन्होंने 'नवकेतन' बैनर नाम से स्वयं की फिल्म निर्माण संस्था खोल ली और उसके अंतर्गत साल दर साल फिल्में बनाने में सफल हुये। नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी पहली फिल्म अफसर का निर्माण किया जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने बड़े भाई चेतन आनंद को सौंपी। इस फिल्म के लिए उन्होंने उस ज़माने की जानी मानी अभिनेत्री सुरैया का चयन किया जबकि अभिनेता के रूप में देव आनंद खुद ही थे। हालाँकि फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बाद उनका ध्यान गुरूदत्त को किए गए वायदे की तरफ़ गया। और सन् 1951 में उन्होंने अपनी अगली फिल्म 'बाज़ी' के निर्देशन की ज़िम्मेदारी गुरूदत्त को सौंप दी। फिल्म सुपरहिट हुई और दोनों दोस्तों की किस्मत चमक गई। फ़िल्म बाज़ी की कहानी बलराज साहनी ने लिखी थी। बाज़ी फिल्म की सफलता के बाद देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री में एक अच्छे अभिनेता के रूप में शुमार होने लगे। देव यहीं से दिलीप कुमार और राजकुमार की क़तार में जा खड़े हुए और इस त्रिमूर्ति ने लंबे समय तक हिंदी फ़िल्मी दुनिया पर राज किया। जाल, राही, आंधियां, (1952), पतिता (1953), व अन्य फिल्मों के साथ स्‌न 1954 में अभिनेत्री कल्पना कार्तिक के साथ आई फिल्म &amp;quot;टैक्सी ड्रायवर&amp;quot; बड़ी हीट फिल्म थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद की मुनीम जी (1955), दुश्मन, काला बाज़ार, सी.आई.डी. (1956), पेइंग गेस्ट (1957), गैम्बलर, तेरे घर के सामने, काला पानी, लव एट टाइम्स स्क्वैर, हम नौजवान, देश परदेस, तेरे मेरे सपने, हरे रामा हरे कृष्णा, जॉनी मेरा नाम, ज्वैलथीफ़, हम दोनों (1961), बात एक रात की, असली नकली, माया, रूप की रानी चोरों का राजा, बम्बई का बाबू, लव मैरिज, दुश्मन, टैक्सी ड्राइवर, नौ दो ग्यारह, फंटूश, बाज़ी बेमिसाल, पॉकेटमार, जब प्यार किसी से होता है, हीरा पन्ना, बनारसी बाबू, जोशीला छूपा रुस्तम, शरीफ बदमाश, इश्क इश्क, अमीर गरीब, वारंट, साहेब बहादूर, देश-परदेश, लूटमार, तीन देविंया और गाइड इत्यादि प्रसिध्द फिल्में रही हैं। इसके अलावा भी उन्होने अनेंकों फिल्मों में काम किया और अभी भी वे फिल्म बना रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद और गुरुदत्त==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dev-Anand sig.jpg|देव आनंद का हस्ताक्षर|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
इसके बाद देव आनंद ने गुरूदत्त के निर्देशन में वर्ष 1952 में फिल्म जाल में भी अभिनय किया। इस फिल्म के निर्देशन के बाद गुरूदत्त ने यह फैसला किया कि वह केवल अपनी निर्मित फिल्मों का निर्देशन करेंगे। बाद में देव आनंद ने अपनी निर्मित फिल्मों के निर्देशन की जिम्मेदारी अपने छोटे भाई विजय आनंद को सौंप दी। विजय आनंद ने देव आनंद की कई फिल्मों का निर्देशन किया। इन फिल्मों में कालाबाज़ार, तेरे घर के सामने, गाइड, तेरे मेरे सपने, छुपा रूस्तम प्रमुख हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद प्रख्यात उपन्यासकार आर. के. नारायण से काफी प्रभावित रहा करते थे और उनके उपन्यास गाइड पर फिल्म बनाना चाहते थे। आर. के. नारायणन की स्वीकृति के बाद देव आनंद ने हॉलीवुड के सहयोग से इसी नाम से एक फिल्म बनाई जिसका निर्देशन किया था उनके छोटे भाई विजय आनंद (गोल्डी) ने किया था, जो खुद भी एक अभिनेता थे तथा हिरोईन वहीदा रहमान थी। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में फिल्म गाइड का निर्माण किया जो देव आनंद के सिने कॅरियर की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म ने आलोचकों को बहुत प्रभावित किया। गाइड का प्रदर्शन सन् 1965 में होने के बाद उनका नाम ही पड़ गया राजू गाइड जो युवाओं में बहुत लोकप्रिय हुआ। इस फिल्म के लिए देव आनंद को उनके जबर्दस्त अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया। यह फिल्म अभी भी हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ निर्देशित व सम्पादित फिल्मों में से एक मानी जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1970 में फिल्म प्रेम पुजारी के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से नकार दी गई बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद वर्ष 1971 में फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' का भी निर्देशन किया जिसमें 'दम मारो दम' गीत ने धूम मचाई। इस फ़िल्म के कामयाबी के बाद देवानंद को एक बेहतरीन निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया और उन्होंने अपनी कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। इस फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने युवा पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम के लिए पुकारा। इन फिल्मों में हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, सच्चे का बोलबाला, अव्वल नंबर, लव एट टाइम्स स्क्वैर, मैं सोलह बरस की, गैंगस्टर और हम नौजवान जैसी फिल्में शामिल हैं। देव आनंद ने कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी। जिसमें वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म आंधियां के अलावा हरे रामा हरे कृष्णा, हम नौजवान, अव्वल नंबर, प्यार का तराना (1993 में), गैंगेस्टर, मैं सोलह बरस की, सेन्सर आदि फिल्में शामिल हैं। इस के अलावा बतौर निर्माता 1998 में मैं सोलह बरस की और 1993 में प्यार का तराना लेकर सामने आऐ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और नई अभिनेत्रियां==&lt;br /&gt;
देवानंद एक समय बाद नई अभिनेत्रियों को पर्दे पर उतारने के लिए मशहूर हो गए। हरे रामा हरे कृष्णा के ज़रिए उन्होंने ज़ीनत अमान की खोज की और टीना मुनीम, नताशा सिन्हा व एकता जैसी अभिनेत्रियों को मैदान में उतारने का श्रेय भी देव साहब को ही जाता है। बाद में जीनत अमान को राज कपूर का साथ मिल गया और ये बात देवानंद को अच्छी नहीं लगी। फिल्म निर्माण में उतरे देवानंद ने कई नई प्रतिभाओं टीना मुनीम से लेकर तब्बू तक का फिल्मी दुनिया से साक्षात्कार कराया। उन्होंने पांच दशकों में सुरैया, गीताबाली, मधुबाला, मीना कुमारी, नूतन, वैजंतीमाला, मुमताज, हेमा मालिनी, वहीदा रहमान से लेकर मधुबाला और जीनत अमान तक सभी उत्कृष्ट नायिकाओं के साथ अभिनय किया और हर अभिनेत्री के साथ उनकी जोड़ी को खूब सराहा गया। अभिनेत्री हेमा मालिनी के साथ भी कई फिल्में की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाल के सालों में देवानंद अपनी प्रोडक्शन कंपनी 'नवकेतन' के तले कई फिल्में बनाने में व्यस्त थे। वह लगातार अपने बैनर के तले फिल्में बना रहे थे जिसके लीड हीरो वह खुद ही होते थे। नवकेतन बैनर तले उन्होंने हाल के सालों में 'हरे रामा हरे कृष्णा', 'अव्वल नंबर' जैसी सुपरहिट फिल्में दी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ग्रेगरी पॅक से समानता==&lt;br /&gt;
ग्रेगरी पॅक के अभिनय से प्रेरित होकर देवानंद फिल्मों में काम करने के उद्देश्य से अपना नगर छोड़कर फिल्म नगरी में आये थे। देवानंद को कई लोग हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ग्रेगरी पॅक  से भी जोड़ कर देखते हैं। भारतीय दर्शकों को अपने चहेते अभिनेता देवानंद में ग्रेगरी पॅक  की झलक नज़र आई और वे उनके दीवाने हो गए। देवानंद के बालों का स्टाइल, चलने, बोलने का तरीक़ा सब में ग्रेगरी पॅक की झलक मिलती थी।&lt;br /&gt;
==देवानंद और रोमांस==&lt;br /&gt;
देव आनंद अपनी खास स्टाइल के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने किरदारों में नौजवानों की उमंगों, तरंगों और चंचलता को बहुत ही खूबसूरत अंदाज से पेश किया है। देव आनंद आदर्शवाद और व्यवहारवाद में नहीं उलझते और न ही उन का किरदार प्रेम की नाकामियों से दो-चार होता है। अपनी अदाकाराओं के साथ छेड़खानी, शरारत और फ्लर्ट करने वाला आम नौजवान देव का नायक रहा। देव ने अपने किरदारों में जवानी के हर मौसम का लुत्फ लिया। जवानी के तमाम दबे-कुचले अरमानों को पूरे रस के साथ जिया और नौजवानों के चहेते बन गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहते हैं बॉलिवुड में अगर कोई असली रोमांटिक हीरो है तो वह हैं सिर्फ देवानंद। ना सिर्फ पर्दे पर बल्कि असल जिंदगी में भी देवानंद की दिल्लगी का कोई सानी नहीं है। नौजवानों के जज़्बात को परदे पर पेश करने वाले खूबसूरत देव हमेशा ही खूबसूरत लडकियों से घिरे रहे। हज़ारों दिलों की धड़कन रहे देव हसीनाओं का सपना बन चुके थे। अभिनेत्रियों के साथ अपने रोमांस को लेकर भी वे चर्चा में रहे। चाहे सुरैया हो या ज़ीनत अमान दोनों के साथ उनके प्रेम के चर्चे खूब आम हुए। खुद देवानंद भी मानते हैं कि सुरैया उनका पहला प्रेम थीं और ज़ीनत को भी वह पसंद करते थे। यही नहीं सुरैया भी देव की दीवानी थी। 1948 में बनी ‘विद्या’ फिल्म की नायिका सुरैया थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़िल्म अफसर के निर्माण के दौरान देव आनंद का झुकाव फिल्म गायिका-अभिनेत्री सुरैया की ओर हो गया था। इसके सेट पर ही दोनों में प्यार हुआ। एक गाने की शूटिंग के दौरान देव आनंद और सुरैया की नाव पानी में पलट गई जिसमें उन्होंने सुरैया को डूबने से बचाया। इसके बाद सुरैया देव आनंद से बेइंतहा मोहब्बत करने लगीं लेकिन सुरैया की दादी की इजाजत न मिलने पर यह जोड़ी परवान नहीं चढ़ सकी। 1951 तक दोनों ने सात फिल्मों में साथ काम किया। मगर अफसोस दोनों के साथ रहने का ख्वाब पूरा ना हो सका। देव ने अपने टूटे प्यार का इजहार कई बार किया है। बाद के वर्ष 1954 में ‘टैक्सी ड्राइवर’ की हीरोइन मोना याने कल्पना कार्तिक से फिल्म के सेट पर देव आनंद का शादी हो गई। मगर सुरैया ने देव के अलावा किसी और को गवारा ना किया और उनकी याद में आजीवन विवाह नहीं किया। 50 साल बाद देव आनंद ने स्वीकार किया कि उनका दिल हमेशा सुरैया के लिए धड़कता रहता था। वर्ष 2005 में जब सुरैया का निधन हुआ तो देवानंद उन लोगों में से एक थे जो उनके जनाजे के साथ थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवानंद के जानदार और शानदार अभिनय की बदौलत परदे पर जीवंत आकार लेने वाली प्रेम कहानियों ने लाखों युवाओं के दिलों में प्रेम की लहरें पैदा कीं लेकिन खुद देवानंद इस लिहाज से जिंदगी में काफी परेशानियों से गुजरे। उन्हें सदाबहार अभिनेता कह कर पुकारा गया तो वह भी यों ही नहीं था। उन्होंने जिन अभिनेत्रियों के साथ नायक के रूप में काम किया था कुछ वर्षों पहले तक वे उनकी पोतियों के साथ भी उसी भूमिका में देखे गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद का राजनीतिक और सामाजिक रूप==&lt;br /&gt;
देव आनंद फिल्म जगत के उन गिने चुने लोगों में शामिल हैं जो राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी सक्रिय हैं। सन् 1977 के संसदीय चुनावों के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर इंदिरा गांधी का जमकर विरोध किया। उल्लेखनीय है कि उस समय सिने जगत की अधिकांश हस्तियों ने चुप्पी साध रखी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का निजी जीवन==&lt;br /&gt;
देवानंद ने कल्पना कार्तिक के साथ शादी की थी लेकिन उनकी शादी अधिक समय तक सफल नहीं हो सकी। दोनों साथ रहे लेकिन बाद में कल्पना ने एकाकी जीवन को गले लगा लिया। अन्य फिल्मी अभिनेताओं की तरह देवानंद ने भी अपने बेटे सुनील आनंद को फिल्मों में स्थापित करने के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन सफल नहीं हो सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ वर्ष पहले अपने जन्मदिन के अवसर पर ही उन्होंने 'रोमांसिंग विद लाइफ' नाम से अपनी जीवनी बाज़ार में उतारी थी। आमतौर पर मशहूर हस्तियों की जीवनियों के प्रसंग विवादों का विषय बनते हैं लेकिन उनकी जीवनी हर अर्थ में बेदाग रही बिल्कुल उनके जीवन की तरह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद ने एक बार अपनी निरंतर सक्रियता के बारे में कहा था कि वे सपने देखते हैं और फिर उन्हें पर्दे पर उकेरते हैं बिना हिट या फ्लॉप की परवाह किए। इन अर्थों में वे सच्चे कर्मयोगी हैं। देव आनंद शतायु हों और जिंदादिली बिखेरते रहें यही उनके प्रशंसकों की कामना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का स्टाइल==&lt;br /&gt;
देव आनंद को राजेश खन्ना से भी पहले सिनेमा का पहला चॉकलेटी नायक होने का गौरव मिला। देव आनंद की लोकप्रियता का आलम ये था कि उन्होंने जो भी पहना, जो भी किया वो एक स्टाइल में तब्दील हो गया। फिर चाहे वो उनका बालों पर हाथ फेरने का अंदाज हो या काली कमीज की पहनने का या फिर अपनी अनूठी शैली में जल्दी-जल्दी संवाद बोलने का। मुनीम जी (1955), फंटुश, सीआईडी (1956), पेइंगगेस्ट (1957) ने उन्हे सफलतम स्टायलीस स्टार बना दिया। इनकी झूक कर चलने की अदा, एक स्वांस मे लम्बे डायलाँग बोलना और तिरछे होकर सिर हिलाना उनका ट्रेडमार्क बन गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने दौर के सबसे सफल अभिनेता देवानंद अपने काले कोट की वजह से बहुत सुर्खियों में आए थे। बात उस समय की है जब देवानंद अपने अलग अंदाज और बोलने के तरीके के लिए काफी मशहूर थे। उनके सफेद कमीज और काले कोट के फैशन को तो जनता ने जैसे अपना ही बना लिया था और इसी समय एक ऐसा वाकया भी देखने को मिला जब न्यायालय ने उनके काले कोट को पहन कर घूमने पर पाबंदी लगा दी। वजह थी कुछ लडकियों का उनके काले कोट के प्रति आसक्ति के कारण आत्महत्या कर लेना। दीवानगी में दो-चार लडकियों ने जान दे दी। इससे एक बात साफ थी कि देवानंद का किरदार हो या उनका पहनावा हमेशा सदाबहार ही रहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद को मिले पुरस्कार==&lt;br /&gt;
देव आनंद, दिलीप कुमार और राज कपूर के 1950 दशक के बड़े स्टार रहे हैं। देव आनंद को अपने अभिनय के लिए दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। देव आनंद को सबसे पहला फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म काला पानी के लिए दिया गया। इसके बाद वर्ष 1965 में भी देव आनंद फिल्म गाइड के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। सन् 1991 में देव आनंद को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। वर्ष 2001 में देव आनंद को भारत सरकार की ओर से कला क्षेत्र (फिल्म जगत में योगदान) में पद्म भूषण सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 2002 में उनके द्वारा हिन्दी सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अभिनेता}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:अभिनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:फ़िल्म निर्माता]][[Category:फ़िल्म निर्देशक]][[Category: कला कोश]] [[Category:पद्म भूषण]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]] [[Category:चरित कोश]] [[Category:दादा साहब फाल्के पुरस्कार]] &lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>देवानंद</title>
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		<updated>2011-12-04T06:11:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा कलाकार&lt;br /&gt;
|चित्र=dev anand young.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=देव आनंद&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=धर्मदेव आनंद&lt;br /&gt;
|प्रसिद्ध नाम='देवानंद' अथवा 'देव आनंद'&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[26 सितंबर]], [[1923]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= [[पंजाब]] के गुरदासपुर ज़िले (अब पाकिस्तान में)&lt;br /&gt;
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|कर्म भूमि=[[मुंबई]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=फ़िल्म निर्माता-निर्देशक, [[अभिनेता]] &lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|मुख्य फ़िल्में=काला पानी, गाइड, हम दोनो, काला बाज़ार आदि &lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक&lt;br /&gt;
|विद्यालय=गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार, [[पद्म भूषण]], [[दादा साहब फाल्के पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|19:43, 2 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''देवानन्द''' (धर्मदेव आनंद) भारतीय सिनेमा के शुरूआती दौर के प्रसिद्ध अभिनेता थे जो जीवन भर सक्रिय और चर्चित रहे। वे अभिनेता के साथ-साथ निर्माता-निर्देशक भी थे। वे बॉलीवुड में देव साहब के नाम से एक ज़िन्दादिल और भले इंसान के रूप में प्रसिद्ध थे। भारतीय सिनेमा में दो पीढ़ियों तक लगातार हीरो बने रहने वाले कलाकार के विषय में यदि विचार करें तो केवल एक ही नाम उभरता है और वह है देव आनंद (देवानंद) । कभी अपनी एक फिल्म में उन्होंने एक गीत गुनगुनाया था 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया' और शायद यही गीत उनके जीवन को सबसे अच्छी तरह परिभाषित भी करता है। देव आनंद के नाम हिंदी सिने जगत के आकाश में स्टाइल गुरु बनकर जगमगाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सदाबहार अभिनेता देव आनंद को लोग एवरग्रीन देव साहब कह कर पुकारते हैं। सदाबहार देवानंद का जलवा अब भी बरक़रार है। वक़्त की करवटें उनकी हस्ती पर अपनी सिलवटें नहीं छोड़ पाईं। छह दशक से अधिक समय तक रुपहले परदे पर राज करने वाले देवानंद साहब का 26 सितंबर को जन्मदिन पड़ता है और 88 वर्ष की उम्र हृदयगति रुक जाने से 3 दिसम्बर 2011 को उनका देहावसान हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का जीवन==&lt;br /&gt;
बॉलीवुड-सदाबहार हीरो देव आनंद का पूरा नाम धर्मदेव पिशौरीलाल आनंद है। देव आनंद जो कि भारतीय सिनेमा के महान कलाकार, निर्माता व निर्देशक हैं का जन्म अविभाजित पंजाब के गुरदासपुर ज़िले (अब पाकिस्तान में) में 26 सितंबर, 1923 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में और प्रसिध्द वकील पिशौरीलाल आनंद नामक एक संपन्न अधिवक्ता के घर हुआ था। उनका बचपन का नाम धर्मदेव (देवदत्त) पिशौरीलाल आनंद था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनका बचपन परेशानियों से घिरा रहा। बचपन से ही उनका झुकाव अपने पिता के पेशे वकालत की ओर न होकर अभिनय की ओर था। एक वकील और आजादी के लिए लड़ने वाले पिशौरीलाल के घर पैदा होने वाले देव ने रद्दी की दुकान से जब बाबूराव पटेल द्वारा सम्पादित फिल्म इंडिया के पुराने अंक पढ़े तो उन की आंखों ने फिल्मों में काम करने का सपना देख डाला और वह माया नगरी मुम्बई के सफर पर निकल पङे। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर (कि अब पाकिस्तान में है) के मशहूर गवर्नमेंट कॉलेज से पूरी की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस कॉलेज ने फिल्म और साहित्य जगत को बलराज साहनी, चेतन आनंद, बी. आर. चोपड़ा और खुशवंत सिंह जैसे शख्सियतें दी हैं। इसके बाद वे उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते थे लेकिन पिता के पास इतने पैसे नहीं थे। देव आनंद को अपनी पहली नौकरी मिलिट्री सेन्सर ऑफिस (आर्मी करेस्पांडेंस सेंसर डिपार्टमेंट) में एक लिपिक के तौर पर मिली जहां उन्हें सैनिकों द्वारा लिखी चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगों को पढ़ कर सुनाना पड़ता था। इस काम के लिए देव आनंद को 165 रूपये मासिक वेतन के रूप में मिला करता था जिसमें से 45 रूपये वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज दिया करते थे। लगभग एक वर्ष तक मिलिट्री सेन्सर में नौकरी करने के बाद और परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए वह 30 रूपए जेब में ले कर पिता के मुंबई जाकर काम न करने की सलाह के विपरीत देव अपने भाई चेतन आनंद के साथ फ्रंटियर मेल से 1943 में मुंबई पहुँच गये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चेतन आनंद उस समय भारतीय जन नाटय संघ इप्टा से जुड़े हुए थे। उन्होंने देव आनंद को भी अपने साथ इप्टा में शामिल कर लिया। देव आनंद (और उनके छोटे भाई विजय आनंद) को फिल्मों में लाने का श्रेय उनके बड़े भाई चेतन आनंद को जाता है। देव ने ये सपने में भी न सोचा होगा की कामियाबी इतनी जल्दी उनके कदम चूमेगी मगर ये तीस रुपए रंग लाए और जाएँ तो जाएँ कहाँ का राग अलापने वाले देव आनंद को माया नगरी मुम्बई में आशियाना मिल गया। गायक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे देवानंद अभिनेता बन गए। देवआनंद के भाई, चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक रहे हैं। उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का कॅरियर==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right; width:45%; border:thin solid #aaaaaa; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;98%&amp;quot; class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; style=&amp;quot;float:right&amp;quot;;&lt;br /&gt;
|+देव आनंद का फ़िल्मी सफ़र&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;20%&amp;quot;| वर्ष&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;80%&amp;quot;| फ़िल्म&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 300px; overflow: auto;overflow-x:hidden;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;98%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1952]]&lt;br /&gt;
| जाल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आँधियाँ&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तमाशा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जलजला&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1953]]&lt;br /&gt;
| पतिता&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| राही&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हमसफर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अरमान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1954]]&lt;br /&gt;
| बादबान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| टैक्सी ड्राइवर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फेरी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;5&amp;quot;| [[1955]] &lt;br /&gt;
| फरार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हाउस नंबर 44 &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मुनीमजी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| इंसानियत&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मिलाप&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1956]] &lt;br /&gt;
| फंटूश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सीआईडी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पॉकेट मार &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1957]]  &lt;br /&gt;
| पेइंग गेस्ट &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| दुश्मन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बारिश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नौ दो ग्यारह &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1958]]  &lt;br /&gt;
| सोलहवाँ साल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अमर दीप &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| काला पानी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1959]] &lt;br /&gt;
| लव मैरिज &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;6&amp;quot;| [[1960]]  &lt;br /&gt;
| जाली नोट &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| एक के बाद एक &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मंजिल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सरहद &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बम्बई का बाबू &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| काला बाज़ार &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1961]]&lt;br /&gt;
| जब प्यार किसी से होता है &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हम दोनों &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1962]]&lt;br /&gt;
| बात एक रात की &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| माया &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| रूप की रानी चोरों का राजा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1963]]&lt;br /&gt;
| असली नकली &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरे घर के सामने &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1964]]&lt;br /&gt;
| शराबी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| किनारा किनारे &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1965]]&lt;br /&gt;
| तीन देवियाँ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गाइड&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1966]]&lt;br /&gt;
| प्यार मोहब्बत &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1967]]&lt;br /&gt;
| ज्वेल थीफ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1968]]&lt;br /&gt;
| कहीं और चल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फरेब&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1969]]&lt;br /&gt;
| दुनिया&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| महल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1970]]&lt;br /&gt;
| जॉनी मेरा नाम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रेम पुजारी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1971]]&lt;br /&gt;
| गैम्बलर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरे मेरे सपने &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1972]]&lt;br /&gt;
| अच्छा बुरा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हरे रामा हरे कृष्णा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| यह गुलिस्तां हमारा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1973]]&lt;br /&gt;
| छुपा रुस्तम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| शरीफ बदमाश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जोशीला &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1974]]&lt;br /&gt;
| इश्क इश्क इश्क &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हीरा पन्ना &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रेम शास्त्र &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अमीर गरीब &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1975]]&lt;br /&gt;
| वारंट&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1976]]&lt;br /&gt;
| जानेमन &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1977]]&lt;br /&gt;
| कलाबाज&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| डार्लिंग डार्लिंग &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बुलेट&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1978]]&lt;br /&gt;
| देस परदेस &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1980]]&lt;br /&gt;
| मनपसंद&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| साहेब बहादुर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लूटमार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1982]]&lt;br /&gt;
| स्वामी दादा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1984]]&lt;br /&gt;
| आनंद और आनंद &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1986]]&lt;br /&gt;
| हम नौजवान &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1989]]&lt;br /&gt;
| सच्चे का बोलबाला &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लश्कर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1990]]&lt;br /&gt;
| अव्वल नंबर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1991]]&lt;br /&gt;
| सौ करोड़ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1995]]&lt;br /&gt;
| गैंगस्टर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1996]]&lt;br /&gt;
| रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1998]]&lt;br /&gt;
| मैं सोलह बरस की &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2001]]&lt;br /&gt;
| सेंसर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2003]]&lt;br /&gt;
| लव एट टाइम्स स्क्वेयर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2005]]&lt;br /&gt;
| मि.प्राइम मिनिस्टर &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने के बाद उनका नाम सिमट कर हो गया देवानंद। देव आनंद को अभिनेता के रूप में पहला ब्रेक 1946 में प्रभात स्टूडियो की फिल्म ‘हम एक हैं’ से मिला। लेकिन इस फिल्म के असफल होने से वह दर्शकों के बीच अपनी पहचान नहीं बना सके। इस फिल्म के निर्माण के दौरान प्रभात स्टूडियो में उनकी मुलाकात बाद के मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक गुरूदत्त से हुई जो उन दिनों फिल्मी दुनिया में कोरियोग्राफर के रूप में स्थान बनाने के लिए संघर्षरत थे। वहाँ दोनों की दोस्ती हुई और एक साथ सपने देखते इन दोनों दोस्तों ने आपस में एक वादा किया कि अगर गुरूदत्त फ़िल्म निर्देशक बनेंगे तो वे देव को अभिनेता के रूप में लेंगे और अगर देव निर्माता बनेंगे तो गुरुदत्त को निर्देशक के रूप में लेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म 'जिद्दी' (1948) में अभिऩेत्री कामिनी कौशल के साथ देव आनंद के फिल्मी कॅरियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। जिद्दी ने देव आनंद को नई ऊंचाइयां दिलायी। इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रख दिया। सन् 1949 में उन्होंने 'नवकेतन' बैनर नाम से स्वयं की फिल्म निर्माण संस्था खोल ली और उसके अंतर्गत साल दर साल फिल्में बनाने में सफल हुये। नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी पहली फिल्म अफसर का निर्माण किया जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने बड़े भाई चेतन आनंद को सौंपी। इस फिल्म के लिए उन्होंने उस ज़माने की जानी मानी अभिनेत्री सुरैया का चयन किया जबकि अभिनेता के रूप में देव आनंद खुद ही थे। हालाँकि फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बाद उनका ध्यान गुरूदत्त को किए गए वायदे की तरफ़ गया। और सन् 1951 में उन्होंने अपनी अगली फिल्म 'बाज़ी' के निर्देशन की ज़िम्मेदारी गुरूदत्त को सौंप दी। फिल्म सुपरहिट हुई और दोनों दोस्तों की किस्मत चमक गई। फ़िल्म बाज़ी की कहानी बलराज साहनी ने लिखी थी। बाज़ी फिल्म की सफलता के बाद देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री में एक अच्छे अभिनेता के रूप में शुमार होने लगे। देव यहीं से दिलीप कुमार और राजकुमार की क़तार में जा खड़े हुए और इस त्रिमूर्ति ने लंबे समय तक हिंदी फ़िल्मी दुनिया पर राज किया। जाल, राही, आंधियां, (1952), पतिता (1953), व अन्य फिल्मों के साथ स्‌न 1954 में अभिनेत्री कल्पना कार्तिक के साथ आई फिल्म &amp;quot;टैक्सी ड्राईव्हर&amp;quot; बड़ी हीट फिल्म थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद की मुनीम जी (1955), दुश्मन, काला बाज़ार, सी.आई.डी. (1956), पेइंग गेस्ट (1957), गैम्बलर, तेरे घर के सामने, काला पानी, लव एट टाइम्स स्क्वैर, हम नौजवान, देश परदेस, तेरे मेरे सपने, हरे रामा हरे कृष्णा, जॉनी मेरा नाम, ज्वैलथीफ़, हम दोनों (1961), बात एक रात की, असली नकली, माया, रूप की रानी चोरों का राजा, बम्बई का बाबू, लव मैरिज, दुश्मन, टैक्सी ड्राइवर, नौ दो ग्यारह, फंटूश, बाज़ी बेमिसाल, पॉकेटमार, जब प्यार किसी से होता है, हीरा पन्ना, बनारसी बाबू, जोशीला छूपा रुस्तम, शरीफ बदमाश, इश्क इश्क, अमीर गरीब, वारंट, साहेब बहादूर, देश-परदेश, लूटमार, तीन देविंया और गाइड इत्यादि प्रसिध्द फिल्में रही हैं। इसके अलावा भी उन्होने अनेंकों फिल्मों में काम किया और अभी भी वे फिल्म बना रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद और गुरुदत्त==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dev-Anand sig.jpg|देव आनंद का हस्ताक्षर|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
इसके बाद देव आनंद ने गुरूदत्त के निर्देशन में वर्ष 1952 में फिल्म जाल में भी अभिनय किया। इस फिल्म के निर्देशन के बाद गुरूदत्त ने यह फैसला किया कि वह केवल अपनी निर्मित फिल्मों का निर्देशन करेंगे। बाद में देव आनंद ने अपनी निर्मित फिल्मों के निर्देशन की जिम्मेदारी अपने छोटे भाई विजय आनंद को सौंप दी। विजय आनंद ने देव आनंद की कई फिल्मों का निर्देशन किया। इन फिल्मों में कालाबाज़ार, तेरे घर के सामने, गाइड, तेरे मेरे सपने, छुपा रूस्तम प्रमुख हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद प्रख्यात उपन्यासकार आर. के. नारायण से काफी प्रभावित रहा करते थे और उनके उपन्यास गाइड पर फिल्म बनाना चाहते थे। आर. के. नारायणन की स्वीकृति के बाद देव आनंद ने हॉलीवुड के सहयोग से इसी नाम से एक फिल्म बनाई जिसका निर्देशन किया था उनके छोटे भाई विजय आनंद (गोल्डी) ने किया था, जो खुद भी एक अभिनेता थे तथा हिरोईन वहीदा रहमान थी। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में फिल्म गाइड का निर्माण किया जो देव आनंद के सिने कॅरियर की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म ने आलोचकों को बहुत प्रभावित किया। गाइड का प्रदर्शन सन् 1965 में होने के बाद उनका नाम ही पड़ गया राजू गाइड जो युवाओं में बहुत लोकप्रिय हुआ। इस फिल्म के लिए देव आनंद को उनके जबर्दस्त अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया। यह फिल्म अभी भी हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ निर्देशित व सम्पादित फिल्मों में से एक मानी जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1970 में फिल्म प्रेम पुजारी के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से नकार दी गई बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद वर्ष 1971 में फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' का भी निर्देशन किया जिसमें 'दम मारो दम' गीत ने धूम मचाई। इस फ़िल्म के कामयाबी के बाद देवानंद को एक बेहतरीन निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया और उन्होंने अपनी कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। इस फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने युवा पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम के लिए पुकारा। इन फिल्मों में हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, सच्चे का बोलबाला, अव्वल नंबर, लव एट टाइम्स स्क्वैर, मैं सोलह बरस की, गैंगस्टर और हम नौजवान जैसी फिल्में शामिल हैं। देव आनंद ने कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी। जिसमें वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म आंधियां के अलावा हरे रामा हरे कृष्णा, हम नौजवान, अव्वल नंबर, प्यार का तराना (1993 में), गैंगेस्टर, मैं सोलह बरस की, सेन्सर आदि फिल्में शामिल हैं। इस के अलावा बतौर निर्माता 1998 में मैं सोलह बरस की और 1993 में प्यार का तराना लेकर सामने आऐ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और नई अभिनेत्रियां==&lt;br /&gt;
देवानंद एक समय बाद नई अभिनेत्रियों को पर्दे पर उतारने के लिए मशहूर हो गए। हरे रामा हरे कृष्णा के ज़रिए उन्होंने ज़ीनत अमान की खोज की और टीना मुनीम, नताशा सिन्हा व एकता जैसी अभिनेत्रियों को मैदान में उतारने का श्रेय भी देव साहब को ही जाता है। बाद में जीनत अमान को राज कपूर का साथ मिल गया और ये बात देवानंद को अच्छी नहीं लगी। फिल्म निर्माण में उतरे देवानंद ने कई नई प्रतिभाओं टीना मुनीम से लेकर तब्बू तक का फिल्मी दुनिया से साक्षात्कार कराया। उन्होंने पांच दशकों में सुरैया, गीताबाली, मधुबाला, मीना कुमारी, नूतन, वैजंतीमाला, मुमताज, हेमा मालिनी, वहीदा रहमान से लेकर मधुबाला और जीनत अमान तक सभी उत्कृष्ट नायिकाओं के साथ अभिनय किया और हर अभिनेत्री के साथ उनकी जोड़ी को खूब सराहा गया। आज भी वह नई अभिनेत्रियों की तलाश में हैं और फ़िल्म बनाने का उनका शौक़ जारी है। अभिनेत्री हेमा मालिनी के साथ कई फिल्में की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाल के सालों में देवानंद अपनी प्रोडक्शन कंपनी 'नवकेतन' के तले कई फिल्में बनाने में व्यस्त हैं। वह लगातार अपने बैनर के तले फिल्में बना रहे हैं जिसके लीड हीरो वह खुद ही होते हैं। नवकेतन बैनर तले उन्होंने हाल के सालों में 'हरे रामा हरे कृष्णा', 'अव्वल नंबर' जैसी सुपरहिट फिल्में दी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ग्रेगरी पेक से समानता==&lt;br /&gt;
ग्रैगरी पैक के अभिनय से प्रेरित होकर देवानंद फिल्मों में काम करने के उद्देश्य से अपना नगर छोड़कर फिल्म नगरी में आये थे। देवानंद को कई लोग हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ग्रेगरी पेक से भी जोड़ कर देखते हैं। भारतीय दर्शकों को अपने चहेते अभिनेता देवानंद में ग्रेगरी पेक की झलक नज़र आई और वे उनके दीवाने हो गए। देवानंद के बालों का स्टाइल, चलने, बोलने का तरीक़ा सब में ग्रेगरी पेक की झलक मिलती थी। मुंबई फ़िल्म जगत में एक क़िस्सा मशहूर है। अभिनेत्री सुरैया ग्रेगरी पेक की अनन्य प्रशंसक थीं. यहाँ तक कि उनका नाम देवानंद के साथ भी जुड़ने लगा था और लोग कहते थे कि इसकी वजह यही थी कि वह उनमें ग्रेगरी पेक को ढूँढती थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और रोमांस==&lt;br /&gt;
देव आनंद अपनी खास स्टाइल के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने किरदारों में नौजवानों की उमंगों, तरंगों और चंचलता को बहुत ही खूबसूरत अंदाज से पेश किया है। देव आनंद आदर्शवाद और व्यवहारवाद में नहीं उलझते और न ही उन का किरदार प्रेम की नाकामियों से दो-चार होता है। अपनी अदाकाराओं के साथ छेड़खानी, शरारत और फ्लर्ट करने वाला आम नौजवान देव का नायक रहा। देव ने अपने किरदारों में जवानी के हर मौसम का लुत्फ लिया। जवानी के तमाम दबे-कुचले अरमानों को पूरे रस के साथ जिया और नौजवानों के चहेते बन गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहते हैं बॉलिवुड में अगर कोई असली रोमांटिक हीरो है तो वह हैं सिर्फ देवानंद। ना सिर्फ पर्दे पर बल्कि असल जिंदगी में भी देवानंद की दिल्लगी का कोई सानी नहीं है। नौजवानों के जज़्बात को परदे पर पेश करने वाले खूबसूरत देव हमेशा ही खूबसूरत लडकियों से घिरे रहे। हज़ारों दिलों की धड़कन रहे देव हसीनाओं का सपना बन चुके थे। अभिनेत्रियों के साथ अपने रोमांस को लेकर भी वे चर्चा में रहे। चाहे सुरैया हो या जीनत अमान दोनों के साथ उनके प्रेम के चर्चे खूब आम हुए। खुद देवानंद भी मानते हैं कि सुरैया उनका पहला प्रेम थीं और जीनत को भी वह पसंद करते थे। यही नहीं सुरैया भी देव की दीवानी थी। 1948 में बनी ‘विद्या’ फिल्म की नायिका सुरैया थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़िल्म अफसर के निर्माण के दौरान देव आनंद का झुकाव फिल्म गायिका-अभिनेत्री सुरैया की ओर हो गया था। इसके सेट पर ही दोनों में प्यार हुआ। एक गाने की शूटिंग के दौरान देव आनंद और सुरैया की नाव पानी में पलट गई जिसमें उन्होंने सुरैया को डूबने से बचाया। इसके बाद सुरैया देव आनंद से बेइंतहा मोहब्बत करने लगीं लेकिन सुरैया की दादी की इजाजत न मिलने पर यह जोड़ी परवान नहीं चढ़ सकी। 1951 तक दोनों ने सात फिल्मों में साथ काम किया। मगर अफसोस दोनों के साथ रहने का ख्वाब पूरा ना हो सका। देव ने अपने टूटे प्यार का इजहार कई बार किया है। बाद के वर्ष 1954 में ‘टैक्सी ड्राइवर’ की हीरोइन मोना याने कल्पना कार्तिक से फिल्म के सेट पर देव आनंद का शादी हो गई। मगर सुरैया ने देव के अलावा किसी और को गवारा ना किया और उनकी याद में आजीवन विवाह नहीं किया। 50 साल बाद देव आनंद ने स्वीकार किया कि उनका दिल हमेशा सुरैया के लिए धड़कता रहता था। वर्ष 2005 में जब सुरैया का निधन हुआ तो देवानंद उन लोगों में से एक थे जो उनके जनाजे के साथ थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवानंद के जानदार और शानदार अभिनय की बदौलत परदे पर जीवंत आकार लेने वाली प्रेम कहानियों ने लाखों युवाओं के दिलों में प्रेम की लहरें पैदा कीं लेकिन खुद देवानंद इस लिहाज से जिंदगी में काफी परेशानियों से गुजरे। उन्हें सदाबहार अभिनेता कह कर पुकारा गया तो वह भी यों ही नहीं था। उन्होंने जिन अभिनेत्रियों के साथ नायक के रूप में काम किया था कुछ वर्षों पहले तक वे उनकी पोतियों के साथ भी उसी भूमिका में देखे गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद का राजनीतिक और सामाजिक रूप==&lt;br /&gt;
देव आनंद फिल्म जगत के उन गिने चुने लोगों में शामिल हैं जो राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी सक्रिय हैं। सन् 1977 के संसदीय चुनावों के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर इंदिरा गांधी का जमकर विरोध किया। उल्लेखनीय है कि उस समय सिने जगत की अधिकांश हस्तियों ने चुप्पी साध रखी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का निजी जीवन==&lt;br /&gt;
देवानंद ने कल्पना कार्तिक के साथ शादी की थी लेकिन उनकी शादी अधिक समय तक सफल नहीं हो सकी। दोनों साथ रहे लेकिन बाद में कल्पना ने एकाकी जीवन को गले लगा लिया। अन्य फिल्मी अभिनेताओं की तरह देवानंद ने भी अपने बेटे सुनील आनंद को फिल्मों में स्थापित करने के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन सफल नहीं हो सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ वर्ष पहले अपने जन्मदिन के अवसर पर ही उन्होंने 'रोमांसिंग विद लाइफ' नाम से अपनी जीवनी बाज़ार में उतारी थी। आमतौर पर मशहूर हस्तियों की जीवनियों के प्रसंग विवादों का विषय बनते हैं लेकिन उनकी जीवनी हर अर्थ में बेदाग रही बिल्कुल उनके जीवन की तरह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद ने एक बार अपनी निरंतर सक्रियता के बारे में कहा था कि वे सपने देखते हैं और फिर उन्हें पर्दे पर उकेरते हैं बिना हिट या फ्लॉप की परवाह किए। इन अर्थों में वे सच्चे कर्मयोगी हैं। देव आनंद शतायु हों और जिंदादिली बिखेरते रहें यही उनके प्रशंसकों की कामना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का स्टाइल==&lt;br /&gt;
देव आनंद को राजेश खन्ना से भी पहले सिनेमा का पहला चॉकलेटी नायक होने का गौरव मिला। देव आनंद की लोकप्रियता का आलम ये था कि उन्होंने जो भी पहना, जो भी किया वो एक स्टाइल में तब्दील हो गया। फिर चाहे वो उनका बालों पर हाथ फेरने का अंदाज हो या काली कमीज की पहनने का या फिर अपनी अनूठी शैली में जल्दी-जल्दी संवाद बोलने का। मुनीम जी (1955), फंटुश, सीआईडी (1956), पेइंगगेस्ट (1957) ने उन्हे सफलतम स्टायलीस स्टार बना दिया। इनकी झूक कर चलने की अदा, एक स्वांस मे लम्बे डायलाँग बोलना और तिरछे होकर सिर हिलाना उनका ट्रेडमार्क बन गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने दौर के सबसे सफल अभिनेता देवानंद अपने काले कोट की वजह से बहुत सुर्खियों में आए थे। बात उस समय की है जब देवानंद अपने अलग अंदाज और बोलने के तरीके के लिए काफी मशहूर थे। उनके सफेद कमीज और काले कोट के फैशन को तो जनता ने जैसे अपना ही बना लिया था और इसी समय एक ऐसा वाकया भी देखने को मिला जब न्यायालय ने उनके काले कोट को पहन कर घूमने पर पाबंदी लगा दी। वजह थी कुछ लडकियों का उनके काले कोट के प्रति आसक्ति के कारण आत्महत्या कर लेना। दीवानगी में दो-चार लडकियों ने जान दे दी। इससे एक बात साफ थी कि देवानंद का किरदार हो या उनका पहनावा हमेशा सदाबहार ही रहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद को मिले पुरस्कार==&lt;br /&gt;
देव आनंद, दिलीप कुमार और राज कपूर के 1950 दशक के बड़े स्टार रहे हैं। देव आनंद को अपने अभिनय के लिए दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। देव आनंद को सबसे पहला फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म काला पानी के लिए दिया गया। इसके बाद वर्ष 1965 में भी देव आनंद फिल्म गाइड के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। सन् 1991 में देव आनंद को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। वर्ष 2001 में देव आनंद को भारत सरकार की ओर से कला क्षेत्र (फिल्म जगत में योगदान) में पद्म भूषण सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 2002 में उनके द्वारा हिन्दी सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अभिनेता}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:अभिनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:फ़िल्म निर्माता]][[Category:फ़िल्म निर्देशक]][[Category: कला कोश]] [[Category:पद्म भूषण]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]] [[Category:चरित कोश]] [[Category:दादा साहब फाल्के पुरस्कार]] &lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>देवानंद</title>
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		<updated>2011-12-04T06:02:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा कलाकार&lt;br /&gt;
|चित्र=dev anand young.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=देव आनंद&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=धर्मदेव आनंद&lt;br /&gt;
|प्रसिद्ध नाम='देवानंद' अथवा 'देव आनंद'&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[26 सितंबर]], [[1923]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= [[पंजाब]] के गुरदासपुर ज़िले (अब पाकिस्तान में)&lt;br /&gt;
|मृत्यु=3 दिसम्बर 2011 (88 वर्ष की उम्र में)&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=लंदन, इंग्लॅन्ड&lt;br /&gt;
|अविभावक= पिशौरीलाल आनंद&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी= कल्पना कार्तिक&lt;br /&gt;
|संतान= सुनील आनंद&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[मुंबई]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=फ़िल्म निर्माता-निर्देशक, [[अभिनेता]] &lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|मुख्य फ़िल्में=काला पानी, गाइड, हम दोनो, काला बाज़ार आदि &lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक&lt;br /&gt;
|विद्यालय=गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार, [[पद्म भूषण]], [[दादा साहब फाल्के पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|19:43, 2 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''देवानन्द''' (धर्मदेव आनंद) भारतीय सिनेमा के शुरूआती दौर के प्रसिद्ध अभिनेता थे जो जीवन भर सक्रिय और चर्चित रहे। वे अभिनेता के साथ-साथ निर्माता-निर्देशक भी थे। वे बॉलीवुड में देव साहब के नाम से एक ज़िन्दादिल और भले इंसान के रूप में प्रसिद्ध थे। भारतीय सिनेमा में दो पीढ़ियों तक लगातार हीरो बने रहने वाले कलाकार के विषय में यदि विचार करें तो केवल एक ही नाम उभरता है और वह है देव आनंद (देवानंद) । कभी अपनी एक फिल्म में उन्होंने एक गीत गुनगुनाया था 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया' और शायद यही गीत उनके जीवन को सबसे अच्छी तरह परिभाषित भी करता है। देव आनंद के नाम हिंदी सिने जगत के आकाश में स्टाइल गुरु बनकर जगमगाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सदाबहार अभिनेता देव आनंद को लोग एवरग्रीन देव साहब कह कर पुकारते हैं। सदाबहार देवानंद का जलवा अब भी बरक़रार है। वक़्त की करवटें उनकी हस्ती पर अपनी सिलवटें नहीं छोड़ पाईं। छह दशक से अधिक समय तक रुपहले परदे पर राज करने वाले देवानंद साहब का 26 सितंबर को जन्मदिन पड़ता है और 88 वर्ष की उम्र हृदयगति रुक जाने से 3 दिसम्बर 2011 को उनका देहावसान हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का जीवन==&lt;br /&gt;
बॉलीवुड-सदाबहार हीरो देव आनंद का पूरा नाम धर्मदेव पिशौरीमल आनंद है। देव आनंद जो कि भारतीय सिनेमा के महान कलाकार, निर्माता व निर्देशक हैं का जन्म अविभाजित पंजाब के गुरदासपुर ज़िले (जो अब नारोवाल जिला, पिकस्तान में है) में 26 सितंबर, 1923 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में और प्रसिध्द वकील किशोरीमल आनंद नामक एक संपन्न अधिवक्ता के घर हुआ था। उनका बचपन का नाम धर्मदेव (देवदत्त) पिशौरीमल आनंद था। उनका बचपन परेशानियों से घिरा रहा। बचपन से ही उनका झुकाव अपने पिता के पेशे वकालत की ओर न होकर अभिनय की ओर था। एक वकील और आजादी के लिए लड़ने वाले पिशोरीमल के घर पैदा होने वाले देव ने रद्दी की दुकान से जब बाबूराव पटेल द्वारा सम्पादित फिल्म इंडिया के पुराने अंक पढ़े तो उन की आंखों ने फिल्मों में काम करने का सपना देख डाला और वह माया नगरी मुम्बई के सफर पर निकल पङे। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर (कि अब पाकिस्तान में है) के मशहूर गवर्नमेंट कॉलेज से पूरी की। इस कॉलेज ने फिल्म और साहित्य जगत को बलराज साहनी, चेतन आनंद, बी. आर. चोपड़ा और खुशवंत सिंह जैसे शख्सियतें दी हैं। इसके बाद वे उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते थे लेकिन पिता के पास इतने पैसे नहीं थे। देव आनंद को अपनी पहली नौकरी मिलिट्री सेन्सर ऑफिस (आर्मी करेस्पांडेंस सेंसर डिपार्टमेंट) में एक लिपिक के तौर पर मिली जहां उन्हें सैनिकों द्वारा लिखी चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगों को पढ़ कर सुनाना पड़ता था। इस काम के लिए देव आनंद को 165 रूपये मासिक वेतन के रूप में मिला करता था जिसमें से 45 रूपये वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज दिया करते थे। लगभग एक वर्ष तक मिलिट्री सेन्सर में नौकरी करने के बाद और परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए वह 30 रूपए जेब में ले कर पिता के मुंबई जाकर काम न करने की सलाह के विपरीत देव अपने भाई चेतन आनंद के साथ फ्रंटियर मेल से 1943 में मुंबई पहुँच गये। चेतन आनंद उस समय भारतीय जन नाटय संघ इप्टा से जुड़े हुए थे। उन्होंने देव आनंद को भी अपने साथ इप्टा में शामिल कर लिया। देव आनंद (और उनके छोटे भाई विजय आनंद) को फिल्मों में लाने का श्रेय उनके बड़े भाई चेतन आनंद को जाता है। देव ने ये सपने में भी न सोचा होगा की कामियाबी इतनी जल्दी उनके कदम चूमेगी मगर ये तीस रुपए रंग लाए और जाएँ तो जाएँ कहाँ का राग अलापने वाले देव आनंद को माया नगरी मुम्बई में आशियाना मिल गया। गायक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे देवानंद अभिनेता बन गए। देवआनंद के भाई, चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक रहे हैं। उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का कॅरियर==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right; width:45%; border:thin solid #aaaaaa; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;98%&amp;quot; class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; style=&amp;quot;float:right&amp;quot;;&lt;br /&gt;
|+देव आनंद का फ़िल्मी सफ़र&lt;br /&gt;
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| नौ दो ग्यारह &lt;br /&gt;
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| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1958]]  &lt;br /&gt;
| सोलहवाँ साल &lt;br /&gt;
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| अमर दीप &lt;br /&gt;
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| काला पानी &lt;br /&gt;
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| rowspan=&amp;quot;6&amp;quot;| [[1960]]  &lt;br /&gt;
| जाली नोट &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| एक के बाद एक &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मंजिल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सरहद &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बम्बई का बाबू &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| काला बाज़ार &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1961]]&lt;br /&gt;
| जब प्यार किसी से होता है &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हम दोनों &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1962]]&lt;br /&gt;
| बात एक रात की &lt;br /&gt;
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| माया &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| रूप की रानी चोरों का राजा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1963]]&lt;br /&gt;
| असली नकली &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरे घर के सामने &lt;br /&gt;
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| शराबी&lt;br /&gt;
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| तीन देवियाँ &lt;br /&gt;
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| गाइड&lt;br /&gt;
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| [[1966]]&lt;br /&gt;
| प्यार मोहब्बत &lt;br /&gt;
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| ज्वेल थीफ &lt;br /&gt;
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| कहीं और चल &lt;br /&gt;
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| जॉनी मेरा नाम &lt;br /&gt;
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| प्रेम पुजारी &lt;br /&gt;
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| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1971]]&lt;br /&gt;
| गैम्बलर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरे मेरे सपने &lt;br /&gt;
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| अच्छा बुरा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हरे रामा हरे कृष्णा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| यह गुलिस्तां हमारा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1973]]&lt;br /&gt;
| छुपा रुस्तम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| शरीफ बदमाश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जोशीला &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1974]]&lt;br /&gt;
| इश्क इश्क इश्क &lt;br /&gt;
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| हीरा पन्ना &lt;br /&gt;
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| प्रेम शास्त्र &lt;br /&gt;
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| अमीर गरीब &lt;br /&gt;
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| जानेमन &lt;br /&gt;
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| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1977]]&lt;br /&gt;
| कलाबाज&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| डार्लिंग डार्लिंग &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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| देस परदेस &lt;br /&gt;
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| मनपसंद&lt;br /&gt;
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| साहेब बहादुर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लूटमार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1982]]&lt;br /&gt;
| स्वामी दादा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1984]]&lt;br /&gt;
| आनंद और आनंद &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1986]]&lt;br /&gt;
| हम नौजवान &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1989]]&lt;br /&gt;
| सच्चे का बोलबाला &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लश्कर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1990]]&lt;br /&gt;
| अव्वल नंबर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1991]]&lt;br /&gt;
| सौ करोड़ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1995]]&lt;br /&gt;
| गैंगस्टर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1996]]&lt;br /&gt;
| रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1998]]&lt;br /&gt;
| मैं सोलह बरस की &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2001]]&lt;br /&gt;
| सेंसर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2003]]&lt;br /&gt;
| लव एट टाइम्स स्क्वेयर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2005]]&lt;br /&gt;
| मि.प्राइम मिनिस्टर &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने के बाद उनका नाम सिमट कर हो गया देवानंद। देव आनंद को अभिनेता के रूप में पहला ब्रेक 1946 में प्रभात स्टूडियो की फिल्म ‘हम एक हैं’ से मिला। लेकिन इस फिल्म के असफल होने से वह दर्शकों के बीच अपनी पहचान नहीं बना सके। इस फिल्म के निर्माण के दौरान प्रभात स्टूडियो में उनकी मुलाकात बाद के मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक गुरूदत्त से हुई जो उन दिनों फिल्मी दुनिया में कोरियोग्राफर के रूप में स्थान बनाने के लिए संघर्षरत थे। वहाँ दोनों की दोस्ती हुई और एक साथ सपने देखते इन दोनों दोस्तों ने आपस में एक वादा किया कि अगर गुरूदत्त फ़िल्म निर्देशक बनेंगे तो वे देव को अभिनेता के रूप में लेंगे और अगर देव निर्माता बनेंगे तो गुरुदत्त को निर्देशक के रूप में लेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म 'जिद्दी' (1948) में अभिऩेत्री कामिनी कौशल के साथ देव आनंद के फिल्मी कॅरियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। जिद्दी ने देव आनंद को नई ऊंचाइयां दिलायी। इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रख दिया। सन् 1949 में उन्होंने 'नवकेतन' बैनर नाम से स्वयं की फिल्म निर्माण संस्था खोल ली और उसके अंतर्गत साल दर साल फिल्में बनाने में सफल हुये। नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी पहली फिल्म अफसर का निर्माण किया जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने बड़े भाई चेतन आनंद को सौंपी। इस फिल्म के लिए उन्होंने उस जमाने की जानी मानी अभिनेत्री सुरैया का चयन किया जबकि अभिनेता के रूप में देव आनंद खुद ही थे। हालाँकि फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई। इसके बाद उनका ध्यान गुरूदत्त को किए गए वायदे की तरफ गया। और सन् 1951 में उन्होंने अपनी अगली फिल्म 'बाजी' के निर्देशन की जिम्मेदारी गुरूदत्त को सौंप दी। फिल्म सुपरहिट हुई और दोनों दोस्तों की किस्मत चमक गई। फ़िल्म बाज़ी की कहानी बलराज साहनी ने लिखी थी। बाजी फिल्म की सफलता के बाद देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री में एक अच्छे अभिनेता के रूप में शुमार होने लगे। देव यहीं से दिलीप कुमार और राजकुमार की क़तार में जा खड़े हुए और इस त्रिमूर्ति ने लंबे समय तक हिंदी फ़िल्मी दुनिया पर राज किया। जाल, राही, आंधियां, (1952), पतिता (1953), व अन्य फिल्मों के साथ स्‌न 1954 में अभिनेत्री कल्पना कार्तिक के साथ आई फिल्म &amp;quot;टैक्सी ड्राईव्हर&amp;quot; बड़ी हीट फिल्म थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद की मुनीम जी (1955), दुश्मन, काला बाज़ार, सी.आई.डी. (1956), पेइंग गेस्ट (1957), गैम्बलर, तेरे घर के सामने, काला पानी, लव एट टाइम्स स्क्वैर, हम नौजवान, देश परदेस, तेरे मेरे सपने, हरे रामा हरे कृष्णा, जॉनी मेरा नाम, ज्वैलथीफ़, हम दोनों (1961), बात एक रात की, असली नकली, माया, रूप की रानी चोरों का राजा, बम्बई का बाबू, लव मैरिज, दुश्मन, टैक्सी ड्राइवर, नौ दो ग्यारह, फंटूश, बाज़ी बेमिसाल, पॉकेटमार, जब प्यार किसी से होता है, हीरा पन्ना, बनारसी बाबू, जोशीला छूपा रुस्तम, शरीफ बदमाश, इश्क इश्क, अमीर गरीब, वारंट, साहेब बहादूर, देश-परदेश, लूटमार, तीन देविंया और गाइड इत्यादि प्रसिध्द फिल्में रही हैं। इसके अलावा भी उन्होने अनेंकों फिल्मों में काम किया और अभी भी वे फिल्म बना रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद और गुरुदत्त==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dev-Anand sig.jpg|देव आनंद का हस्ताक्षर|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
इसके बाद देव आनंद ने गुरूदत्त के निर्देशन में वर्ष 1952 में फिल्म जाल में भी अभिनय किया। इस फिल्म के निर्देशन के बाद गुरूदत्त ने यह फैसला किया कि वह केवल अपनी निर्मित फिल्मों का निर्देशन करेंगे। बाद में देव आनंद ने अपनी निर्मित फिल्मों के निर्देशन की जिम्मेदारी अपने छोटे भाई विजय आनंद को सौंप दी। विजय आनंद ने देव आनंद की कई फिल्मों का निर्देशन किया। इन फिल्मों में कालाबाज़ार, तेरे घर के सामने, गाइड, तेरे मेरे सपने, छुपा रूस्तम प्रमुख हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद प्रख्यात उपन्यासकार आर. के. नारायण से काफी प्रभावित रहा करते थे और उनके उपन्यास गाइड पर फिल्म बनाना चाहते थे। आर. के. नारायणन की स्वीकृति के बाद देव आनंद ने हॉलीवुड के सहयोग से इसी नाम से एक फिल्म बनाई जिसका निर्देशन किया था उनके छोटे भाई विजय आनंद (गोल्डी) ने किया था, जो खुद भी एक अभिनेता थे तथा हिरोईन वहीदा रहमान थी। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में फिल्म गाइड का निर्माण किया जो देव आनंद के सिने कॅरियर की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म ने आलोचकों को बहुत प्रभावित किया। गाइड का प्रदर्शन सन् 1965 में होने के बाद उनका नाम ही पड़ गया राजू गाइड जो युवाओं में बहुत लोकप्रिय हुआ। इस फिल्म के लिए देव आनंद को उनके जबर्दस्त अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया। यह फिल्म अभी भी हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ निर्देशित व सम्पादित फिल्मों में से एक मानी जाती है। वर्ष 1970 में फिल्म प्रेम पुजारी के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से नकार दी गई बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद वर्ष 1971 में फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' का भी निर्देशन किया जिसमें 'दम मारो दम' गीत ने धूम मचाई। इस फ़िल्म के कामयाबी के बाद देवानंद को एक बेहतरीन निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया और उन्होंने अपनी कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। इस फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने युवा पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम के लिए पुकारा। इन फिल्मों में हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, सच्चे का बोलबाला, अव्वल नंबर, लव एट टाइम्स स्क्वैर, मैं सोलह बरस की, गैंगस्टर और हम नौजवान जैसी फिल्में शामिल हैं। देव आनंद ने कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी। जिसमें वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म आंधियां के अलावा हरे रामा हरे कृष्णा, हम नौजवान, अव्वल नंबर, प्यार का तराना (1993 में), गैंगेस्टर, मैं सोलह बरस की, सेन्सर आदि फिल्में शामिल हैं। इस के अलावा बतौर निर्माता 1998 में मैं सोलह बरस की और 1993 में प्यार का तराना लेकर सामने आऐ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और नई अभिनेत्रियां==&lt;br /&gt;
देवानंद एक समय बाद नई अभिनेत्रियों को पर्दे पर उतारने के लिए मशहूर हो गए। हरे रामा हरे कृष्णा के ज़रिए उन्होंने ज़ीनत अमान की खोज की और टीना मुनीम, नताशा सिन्हा व एकता जैसी अभिनेत्रियों को मैदान में उतारने का श्रेय भी देव साहब को ही जाता है। बाद में जीनत अमान को राज कपूर का साथ मिल गया और ये बात देवानंद को अच्छी नहीं लगी। फिल्म निर्माण में उतरे देवानंद ने कई नई प्रतिभाओं टीना मुनीम से लेकर तब्बू तक का फिल्मी दुनिया से साक्षात्कार कराया। उन्होंने पांच दशकों में सुरैया, गीताबाली, मधुबाला, मीना कुमारी, नूतन, वैजंतीमाला, मुमताज, हेमा मालिनी, वहीदा रहमान से लेकर मधुबाला और जीनत अमान तक सभी उत्कृष्ट नायिकाओं के साथ अभिनय किया और हर अभिनेत्री के साथ उनकी जोड़ी को खूब सराहा गया। आज भी वह नई अभिनेत्रियों की तलाश में हैं और फ़िल्म बनाने का उनका शौक़ जारी है। अभिनेत्री हेमा मालिनी के साथ कई फिल्में की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाल के सालों में देवानंद अपनी प्रोडक्शन कंपनी 'नवकेतन' के तले कई फिल्में बनाने में व्यस्त हैं। वह लगातार अपने बैनर के तले फिल्में बना रहे हैं जिसके लीड हीरो वह खुद ही होते हैं। नवकेतन बैनर तले उन्होंने हाल के सालों में 'हरे रामा हरे कृष्णा', 'अव्वल नंबर' जैसी सुपरहिट फिल्में दी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ग्रेगरी पेक से समानता==&lt;br /&gt;
ग्रैगरी पैक के अभिनय से प्रेरित होकर देवानंद फिल्मों में काम करने के उद्देश्य से अपना नगर छोड़कर फिल्म नगरी में आये थे। देवानंद को कई लोग हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ग्रेगरी पेक से भी जोड़ कर देखते हैं। भारतीय दर्शकों को अपने चहेते अभिनेता देवानंद में ग्रेगरी पेक की झलक नज़र आई और वे उनके दीवाने हो गए। देवानंद के बालों का स्टाइल, चलने, बोलने का तरीक़ा सब में ग्रेगरी पेक की झलक मिलती थी। मुंबई फ़िल्म जगत में एक क़िस्सा मशहूर है। अभिनेत्री सुरैया ग्रेगरी पेक की अनन्य प्रशंसक थीं. यहाँ तक कि उनका नाम देवानंद के साथ भी जुड़ने लगा था और लोग कहते थे कि इसकी वजह यही थी कि वह उनमें ग्रेगरी पेक को ढूँढती थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और रोमांस==&lt;br /&gt;
देव आनंद अपनी खास स्टाइल के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने किरदारों में नौजवानों की उमंगों, तरंगों और चंचलता को बहुत ही खूबसूरत अंदाज से पेश किया है। देव आनंद आदर्शवाद और व्यवहारवाद में नहीं उलझते और न ही उन का किरदार प्रेम की नाकामियों से दो-चार होता है। अपनी अदाकाराओं के साथ छेड़खानी, शरारत और फ्लर्ट करने वाला आम नौजवान देव का नायक रहा। देव ने अपने किरदारों में जवानी के हर मौसम का लुत्फ लिया। जवानी के तमाम दबे-कुचले अरमानों को पूरे रस के साथ जिया और नौजवानों के चहेते बन गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहते हैं बॉलिवुड में अगर कोई असली रोमांटिक हीरो है तो वह हैं सिर्फ देवानंद। ना सिर्फ पर्दे पर बल्कि असल जिंदगी में भी देवानंद की दिल्लगी का कोई सानी नहीं है। नौजवानों के जज़्बात को परदे पर पेश करने वाले खूबसूरत देव हमेशा ही खूबसूरत लडकियों से घिरे रहे। हज़ारों दिलों की धड़कन रहे देव हसीनाओं का सपना बन चुके थे। अभिनेत्रियों के साथ अपने रोमांस को लेकर भी वे चर्चा में रहे। चाहे सुरैया हो या जीनत अमान दोनों के साथ उनके प्रेम के चर्चे खूब आम हुए। खुद देवानंद भी मानते हैं कि सुरैया उनका पहला प्रेम थीं और जीनत को भी वह पसंद करते थे। यही नहीं सुरैया भी देव की दीवानी थी। 1948 में बनी ‘विद्या’ फिल्म की नायिका सुरैया थी। फिल्म अफसर के निर्माण के दौरान देव आनंद का झुकाव फिल्म गायिका-अभिनेत्री सुरैया की ओर हो गया था। इसके सेट पर ही दोनों में प्यार हुआ। एक गाने की शूटिंग के दौरान देव आनंद और सुरैया की नाव पानी में पलट गई जिसमें उन्होंने सुरैया को डूबने से बचाया। इसके बाद सुरैया देव आनंद से बेइंतहा मोहब्बत करने लगीं लेकिन सुरैया की दादी की इजाजत न मिलने पर यह जोड़ी परवान नहीं चढ़ सकी। 1951 तक दोनों ने सात फिल्मों में साथ काम किया। मगर अफसोस दोनों के साथ रहने का ख्वाब पूरा ना हो सका। देव ने अपने टूटे प्यार का इजहार कई बार किया है। बाद के वर्ष 1954 में ‘टैक्सी ड्राइवर’ की हीरोइन मोना याने कल्पना कार्तिक से फिल्म के सेट पर देव आनंद का शादी हो गई। मगर सुरैया ने देव के अलावा किसी और को गवारा ना किया और उनकी याद में आजीवन विवाह नहीं किया। 50 साल बाद देव आनंद ने स्वीकार किया कि उनका दिल हमेशा सुरैया के लिए धड़कता रहता था। वर्ष 2005 में जब सुरैया का निधन हुआ तो देवानंद उन लोगों में से एक थे जो उनके जनाजे के साथ थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवानंद के जानदार और शानदार अभिनय की बदौलत परदे पर जीवंत आकार लेने वाली प्रेम कहानियों ने लाखों युवाओं के दिलों में प्रेम की लहरें पैदा कीं लेकिन खुद देवानंद इस लिहाज से जिंदगी में काफी परेशानियों से गुजरे। उन्हें सदाबहार अभिनेता कह कर पुकारा गया तो वह भी यों ही नहीं था। उन्होंने जिन अभिनेत्रियों के साथ नायक के रूप में काम किया था कुछ वर्षों पहले तक वे उनकी पोतियों के साथ भी उसी भूमिका में देखे गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद का राजनीतिक और सामाजिक रूप==&lt;br /&gt;
देव आनंद फिल्म जगत के उन गिने चुने लोगों में शामिल हैं जो राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी सक्रिय हैं। सन् 1977 के संसदीय चुनावों के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर इंदिरा गांधी का जमकर विरोध किया। उल्लेखनीय है कि उस समय सिने जगत की अधिकांश हस्तियों ने चुप्पी साध रखी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का निजी जीवन==&lt;br /&gt;
देवानंद ने कल्पना कार्तिक के साथ शादी की थी लेकिन उनकी शादी अधिक समय तक सफल नहीं हो सकी। दोनों साथ रहे लेकिन बाद में कल्पना ने एकाकी जीवन को गले लगा लिया। अन्य फिल्मी अभिनेताओं की तरह देवानंद ने भी अपने बेटे सुनील आनंद को फिल्मों में स्थापित करने के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन सफल नहीं हो सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ वर्ष पहले अपने जन्मदिन के अवसर पर ही उन्होंने 'रोमांसिंग विद लाइफ' नाम से अपनी जीवनी बाज़ार में उतारी थी। आमतौर पर मशहूर हस्तियों की जीवनियों के प्रसंग विवादों का विषय बनते हैं लेकिन उनकी जीवनी हर अर्थ में बेदाग रही बिल्कुल उनके जीवन की तरह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद ने एक बार अपनी निरंतर सक्रियता के बारे में कहा था कि वे सपने देखते हैं और फिर उन्हें पर्दे पर उकेरते हैं बिना हिट या फ्लॉप की परवाह किए। इन अर्थों में वे सच्चे कर्मयोगी हैं। देव आनंद शतायु हों और जिंदादिली बिखेरते रहें यही उनके प्रशंसकों की कामना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का स्टाइल==&lt;br /&gt;
देव आनंद को राजेश खन्ना से भी पहले सिनेमा का पहला चॉकलेटी नायक होने का गौरव मिला। देव आनंद की लोकप्रियता का आलम ये था कि उन्होंने जो भी पहना, जो भी किया वो एक स्टाइल में तब्दील हो गया। फिर चाहे वो उनका बालों पर हाथ फेरने का अंदाज हो या काली कमीज की पहनने का या फिर अपनी अनूठी शैली में जल्दी-जल्दी संवाद बोलने का। मुनीम जी (1955), फंटुश, सीआईडी (1956), पेइंगगेस्ट (1957) ने उन्हे सफलतम स्टायलीस स्टार बना दिया। इनकी झूक कर चलने की अदा, एक स्वांस मे लम्बे डायलाँग बोलना और तिरछे होकर सिर हिलाना उनका ट्रेडमार्क बन गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने दौर के सबसे सफल अभिनेता देवानंद अपने काले कोट की वजह से बहुत सुर्खियों में आए थे। बात उस समय की है जब देवानंद अपने अलग अंदाज और बोलने के तरीके के लिए काफी मशहूर थे। उनके सफेद कमीज और काले कोट के फैशन को तो जनता ने जैसे अपना ही बना लिया था और इसी समय एक ऐसा वाकया भी देखने को मिला जब न्यायालय ने उनके काले कोट को पहन कर घूमने पर पाबंदी लगा दी। वजह थी कुछ लडकियों का उनके काले कोट के प्रति आसक्ति के कारण आत्महत्या कर लेना। दीवानगी में दो-चार लडकियों ने जान दे दी। इससे एक बात साफ थी कि देवानंद का किरदार हो या उनका पहनावा हमेशा सदाबहार ही रहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद को मिले पुरस्कार==&lt;br /&gt;
देव आनंद, दिलीप कुमार और राज कपूर के 1950 दशक के बड़े स्टार रहे हैं। देव आनंद को अपने अभिनय के लिए दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। देव आनंद को सबसे पहला फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म काला पानी के लिए दिया गया। इसके बाद वर्ष 1965 में भी देव आनंद फिल्म गाइड के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। सन् 1991 में देव आनंद को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। वर्ष 2001 में देव आनंद को भारत सरकार की ओर से कला क्षेत्र (फिल्म जगत में योगदान) में पद्म भूषण सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 2002 में उनके द्वारा हिन्दी सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अभिनेता}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:अभिनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:फ़िल्म निर्माता]][[Category:फ़िल्म निर्देशक]][[Category: कला कोश]] [[Category:पद्म भूषण]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]] [[Category:चरित कोश]] [[Category:दादा साहब फाल्के पुरस्कार]] &lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6&amp;diff=238465</id>
		<title>देवानंद</title>
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		<updated>2011-12-04T05:58:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा कलाकार&lt;br /&gt;
|चित्र=dev anand young.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=देव आनंद&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=धर्मदेव पिशौरीमल आनंद&lt;br /&gt;
|प्रसिद्ध नाम=देव आनंद&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[26 सितंबर]], [[1923]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= [[पंजाब]] के गुरदासपुर ज़िले (जो अब पाकिस्तान में है)&lt;br /&gt;
|मृत्यु=3 दिसम्बर 2011 (88 वर्ष की उम्र में)&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=लंदन, इंग्लॅन्ड&lt;br /&gt;
|अविभावक= किशोरीमल आनंद&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी= कल्पना कार्तिक&lt;br /&gt;
|संतान= सुनील आनंद&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[मुंबई]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=फ़िल्म निर्माता-निर्देशक, [[अभिनेता]] &lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|मुख्य फ़िल्में=काला पानी, गाइड, हम दोनो, काला बाज़ार आदि &lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक&lt;br /&gt;
|विद्यालय=गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार, [[पद्म भूषण]], [[दादा साहब फाल्के पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|19:43, 2 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''देवानन्द''' (धर्मदेव आनंद) भारतीय सिनेमा के शुरूआती दौर के प्रसिद्ध अभिनेता थे जो जीवन भर सक्रिय और चर्चित रहे। वे अभिनेता के साथ-साथ निर्माता-निर्देशक भी थे। वे बॉलीवुड में देव साहब के नाम से एक ज़िन्दादिल और भले इंसान के रूप में प्रसिद्ध थे। भारतीय सिनेमा में दो पीढ़ियों तक लगातार हीरो बने रहने वाले कलाकार के विषय में यदि विचार करें तो केवल एक ही नाम उभरता है और वह है देव आनंद (देवानंद) । कभी अपनी एक फिल्म में उन्होंने एक गीत गुनगुनाया था 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया' और शायद यही गीत उनके जीवन को सबसे अच्छी तरह परिभाषित भी करता है। देव आनंद के नाम हिंदी सिने जगत के आकाश में स्टाइल गुरु बनकर जगमगाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सदाबहार अभिनेता देव आनंद को लोग एवरग्रीन देव साहब कह कर पुकारते हैं। सदाबहार देवानंद का जलवा अब भी बरक़रार है। वक़्त की करवटें उनकी हस्ती पर अपनी सिलवटें नहीं छोड़ पाईं। छह दशक से अधिक समय तक रुपहले परदे पर राज करने वाले देवानंद साहब का 26 सितंबर को जन्मदिन पड़ता है और 88 वर्ष की उम्र हृदयगति रुक जाने से 3 दिसम्बर 2011 को उनका देहावसान हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का जीवन==&lt;br /&gt;
बॉलीवुड-सदाबहार हीरो देव आनंद का पूरा नाम धर्मदेव पिशौरीमल आनंद है। देव आनंद जो कि भारतीय सिनेमा के महान कलाकार, निर्माता व निर्देशक हैं का जन्म अविभाजित पंजाब के गुरदासपुर ज़िले (जो अब नारोवाल जिला, पिकस्तान में है) में 26 सितंबर, 1923 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में और प्रसिध्द वकील किशोरीमल आनंद नामक एक संपन्न अधिवक्ता के घर हुआ था। उनका बचपन का नाम धर्मदेव (देवदत्त) पिशौरीमल आनंद था। उनका बचपन परेशानियों से घिरा रहा। बचपन से ही उनका झुकाव अपने पिता के पेशे वकालत की ओर न होकर अभिनय की ओर था। एक वकील और आजादी के लिए लड़ने वाले पिशोरीमल के घर पैदा होने वाले देव ने रद्दी की दुकान से जब बाबूराव पटेल द्वारा सम्पादित फिल्म इंडिया के पुराने अंक पढ़े तो उन की आंखों ने फिल्मों में काम करने का सपना देख डाला और वह माया नगरी मुम्बई के सफर पर निकल पङे। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर (कि अब पाकिस्तान में है) के मशहूर गवर्नमेंट कॉलेज से पूरी की। इस कॉलेज ने फिल्म और साहित्य जगत को बलराज साहनी, चेतन आनंद, बी. आर. चोपड़ा और खुशवंत सिंह जैसे शख्सियतें दी हैं। इसके बाद वे उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते थे लेकिन पिता के पास इतने पैसे नहीं थे। देव आनंद को अपनी पहली नौकरी मिलिट्री सेन्सर ऑफिस (आर्मी करेस्पांडेंस सेंसर डिपार्टमेंट) में एक लिपिक के तौर पर मिली जहां उन्हें सैनिकों द्वारा लिखी चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगों को पढ़ कर सुनाना पड़ता था। इस काम के लिए देव आनंद को 165 रूपये मासिक वेतन के रूप में मिला करता था जिसमें से 45 रूपये वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज दिया करते थे। लगभग एक वर्ष तक मिलिट्री सेन्सर में नौकरी करने के बाद और परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए वह 30 रूपए जेब में ले कर पिता के मुंबई जाकर काम न करने की सलाह के विपरीत देव अपने भाई चेतन आनंद के साथ फ्रंटियर मेल से 1943 में मुंबई पहुँच गये। चेतन आनंद उस समय भारतीय जन नाटय संघ इप्टा से जुड़े हुए थे। उन्होंने देव आनंद को भी अपने साथ इप्टा में शामिल कर लिया। देव आनंद (और उनके छोटे भाई विजय आनंद) को फिल्मों में लाने का श्रेय उनके बड़े भाई चेतन आनंद को जाता है। देव ने ये सपने में भी न सोचा होगा की कामियाबी इतनी जल्दी उनके कदम चूमेगी मगर ये तीस रुपए रंग लाए और जाएँ तो जाएँ कहाँ का राग अलापने वाले देव आनंद को माया नगरी मुम्बई में आशियाना मिल गया। गायक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे देवानंद अभिनेता बन गए। देवआनंद के भाई, चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक रहे हैं। उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का कॅरियर==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right; width:45%; border:thin solid #aaaaaa; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;98%&amp;quot; class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; style=&amp;quot;float:right&amp;quot;;&lt;br /&gt;
|+देव आनंद का फ़िल्मी सफ़र&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;20%&amp;quot;| वर्ष&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;80%&amp;quot;| फ़िल्म&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 300px; overflow: auto;overflow-x:hidden;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;98%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1952]]&lt;br /&gt;
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| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1953]]&lt;br /&gt;
| पतिता&lt;br /&gt;
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| राही&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हमसफर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अरमान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1954]]&lt;br /&gt;
| बादबान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| टैक्सी ड्राइवर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फेरी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;5&amp;quot;| [[1955]] &lt;br /&gt;
| फरार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हाउस नंबर 44 &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मुनीमजी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| इंसानियत&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मिलाप&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1956]] &lt;br /&gt;
| फंटूश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सीआईडी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पॉकेट मार &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1957]]  &lt;br /&gt;
| पेइंग गेस्ट &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| दुश्मन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बारिश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नौ दो ग्यारह &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1958]]  &lt;br /&gt;
| सोलहवाँ साल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अमर दीप &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;6&amp;quot;| [[1960]]  &lt;br /&gt;
| जाली नोट &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| एक के बाद एक &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मंजिल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सरहद &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बम्बई का बाबू &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| काला बाज़ार &lt;br /&gt;
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| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1961]]&lt;br /&gt;
| जब प्यार किसी से होता है &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हम दोनों &lt;br /&gt;
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| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1962]]&lt;br /&gt;
| बात एक रात की &lt;br /&gt;
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| माया &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| रूप की रानी चोरों का राजा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1963]]&lt;br /&gt;
| असली नकली &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरे घर के सामने &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1964]]&lt;br /&gt;
| शराबी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| किनारा किनारे &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1965]]&lt;br /&gt;
| तीन देवियाँ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गाइड&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1966]]&lt;br /&gt;
| प्यार मोहब्बत &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1967]]&lt;br /&gt;
| ज्वेल थीफ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1968]]&lt;br /&gt;
| कहीं और चल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फरेब&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1969]]&lt;br /&gt;
| दुनिया&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| महल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1970]]&lt;br /&gt;
| जॉनी मेरा नाम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रेम पुजारी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1971]]&lt;br /&gt;
| गैम्बलर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरे मेरे सपने &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1972]]&lt;br /&gt;
| अच्छा बुरा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हरे रामा हरे कृष्णा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| यह गुलिस्तां हमारा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1973]]&lt;br /&gt;
| छुपा रुस्तम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| शरीफ बदमाश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जोशीला &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1974]]&lt;br /&gt;
| इश्क इश्क इश्क &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हीरा पन्ना &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रेम शास्त्र &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अमीर गरीब &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1975]]&lt;br /&gt;
| वारंट&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1976]]&lt;br /&gt;
| जानेमन &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1977]]&lt;br /&gt;
| कलाबाज&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| डार्लिंग डार्लिंग &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बुलेट&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1978]]&lt;br /&gt;
| देस परदेस &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1980]]&lt;br /&gt;
| मनपसंद&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| साहेब बहादुर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लूटमार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1982]]&lt;br /&gt;
| स्वामी दादा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1984]]&lt;br /&gt;
| आनंद और आनंद &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1986]]&lt;br /&gt;
| हम नौजवान &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1989]]&lt;br /&gt;
| सच्चे का बोलबाला &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लश्कर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1990]]&lt;br /&gt;
| अव्वल नंबर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1991]]&lt;br /&gt;
| सौ करोड़ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1995]]&lt;br /&gt;
| गैंगस्टर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1996]]&lt;br /&gt;
| रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1998]]&lt;br /&gt;
| मैं सोलह बरस की &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2001]]&lt;br /&gt;
| सेंसर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2003]]&lt;br /&gt;
| लव एट टाइम्स स्क्वेयर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2005]]&lt;br /&gt;
| मि.प्राइम मिनिस्टर &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने के बाद उनका नाम सिमट कर हो गया देवानंद। देव आनंद को अभिनेता के रूप में पहला ब्रेक 1946 में प्रभात स्टूडियो की फिल्म ‘हम एक हैं’ से मिला। लेकिन इस फिल्म के असफल होने से वह दर्शकों के बीच अपनी पहचान नहीं बना सके। इस फिल्म के निर्माण के दौरान प्रभात स्टूडियो में उनकी मुलाकात बाद के मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक गुरूदत्त से हुई जो उन दिनों फिल्मी दुनिया में कोरियोग्राफर के रूप में स्थान बनाने के लिए संघर्षरत थे। वहाँ दोनों की दोस्ती हुई और एक साथ सपने देखते इन दोनों दोस्तों ने आपस में एक वादा किया कि अगर गुरूदत्त फ़िल्म निर्देशक बनेंगे तो वे देव को अभिनेता के रूप में लेंगे और अगर देव निर्माता बनेंगे तो गुरुदत्त को निर्देशक के रूप में लेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म 'जिद्दी' (1948) में अभिऩेत्री कामिनी कौशल के साथ देव आनंद के फिल्मी कॅरियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। जिद्दी ने देव आनंद को नई ऊंचाइयां दिलायी। इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रख दिया। सन् 1949 में उन्होंने 'नवकेतन' बैनर नाम से स्वयं की फिल्म निर्माण संस्था खोल ली और उसके अंतर्गत साल दर साल फिल्में बनाने में सफल हुये। नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी पहली फिल्म अफसर का निर्माण किया जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने बड़े भाई चेतन आनंद को सौंपी। इस फिल्म के लिए उन्होंने उस जमाने की जानी मानी अभिनेत्री सुरैया का चयन किया जबकि अभिनेता के रूप में देव आनंद खुद ही थे। हालाँकि फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई। इसके बाद उनका ध्यान गुरूदत्त को किए गए वायदे की तरफ गया। और सन् 1951 में उन्होंने अपनी अगली फिल्म 'बाजी' के निर्देशन की जिम्मेदारी गुरूदत्त को सौंप दी। फिल्म सुपरहिट हुई और दोनों दोस्तों की किस्मत चमक गई। फ़िल्म बाज़ी की कहानी बलराज साहनी ने लिखी थी। बाजी फिल्म की सफलता के बाद देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री में एक अच्छे अभिनेता के रूप में शुमार होने लगे। देव यहीं से दिलीप कुमार और राजकुमार की क़तार में जा खड़े हुए और इस त्रिमूर्ति ने लंबे समय तक हिंदी फ़िल्मी दुनिया पर राज किया। जाल, राही, आंधियां, (1952), पतिता (1953), व अन्य फिल्मों के साथ स्‌न 1954 में अभिनेत्री कल्पना कार्तिक के साथ आई फिल्म &amp;quot;टैक्सी ड्राईव्हर&amp;quot; बड़ी हीट फिल्म थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद की मुनीम जी (1955), दुश्मन, काला बाज़ार, सी.आई.डी. (1956), पेइंग गेस्ट (1957), गैम्बलर, तेरे घर के सामने, काला पानी, लव एट टाइम्स स्क्वैर, हम नौजवान, देश परदेस, तेरे मेरे सपने, हरे रामा हरे कृष्णा, जॉनी मेरा नाम, ज्वैलथीफ़, हम दोनों (1961), बात एक रात की, असली नकली, माया, रूप की रानी चोरों का राजा, बम्बई का बाबू, लव मैरिज, दुश्मन, टैक्सी ड्राइवर, नौ दो ग्यारह, फंटूश, बाज़ी बेमिसाल, पॉकेटमार, जब प्यार किसी से होता है, हीरा पन्ना, बनारसी बाबू, जोशीला छूपा रुस्तम, शरीफ बदमाश, इश्क इश्क, अमीर गरीब, वारंट, साहेब बहादूर, देश-परदेश, लूटमार, तीन देविंया और गाइड इत्यादि प्रसिध्द फिल्में रही हैं। इसके अलावा भी उन्होने अनेंकों फिल्मों में काम किया और अभी भी वे फिल्म बना रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद और गुरुदत्त==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dev-Anand sig.jpg|देव आनंद का हस्ताक्षर|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
इसके बाद देव आनंद ने गुरूदत्त के निर्देशन में वर्ष 1952 में फिल्म जाल में भी अभिनय किया। इस फिल्म के निर्देशन के बाद गुरूदत्त ने यह फैसला किया कि वह केवल अपनी निर्मित फिल्मों का निर्देशन करेंगे। बाद में देव आनंद ने अपनी निर्मित फिल्मों के निर्देशन की जिम्मेदारी अपने छोटे भाई विजय आनंद को सौंप दी। विजय आनंद ने देव आनंद की कई फिल्मों का निर्देशन किया। इन फिल्मों में कालाबाज़ार, तेरे घर के सामने, गाइड, तेरे मेरे सपने, छुपा रूस्तम प्रमुख हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद प्रख्यात उपन्यासकार आर. के. नारायण से काफी प्रभावित रहा करते थे और उनके उपन्यास गाइड पर फिल्म बनाना चाहते थे। आर. के. नारायणन की स्वीकृति के बाद देव आनंद ने हॉलीवुड के सहयोग से इसी नाम से एक फिल्म बनाई जिसका निर्देशन किया था उनके छोटे भाई विजय आनंद (गोल्डी) ने किया था, जो खुद भी एक अभिनेता थे तथा हिरोईन वहीदा रहमान थी। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में फिल्म गाइड का निर्माण किया जो देव आनंद के सिने कॅरियर की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म ने आलोचकों को बहुत प्रभावित किया। गाइड का प्रदर्शन सन् 1965 में होने के बाद उनका नाम ही पड़ गया राजू गाइड जो युवाओं में बहुत लोकप्रिय हुआ। इस फिल्म के लिए देव आनंद को उनके जबर्दस्त अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया। यह फिल्म अभी भी हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ निर्देशित व सम्पादित फिल्मों में से एक मानी जाती है। वर्ष 1970 में फिल्म प्रेम पुजारी के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से नकार दी गई बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद वर्ष 1971 में फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' का भी निर्देशन किया जिसमें 'दम मारो दम' गीत ने धूम मचाई। इस फ़िल्म के कामयाबी के बाद देवानंद को एक बेहतरीन निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया और उन्होंने अपनी कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। इस फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने युवा पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम के लिए पुकारा। इन फिल्मों में हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, सच्चे का बोलबाला, अव्वल नंबर, लव एट टाइम्स स्क्वैर, मैं सोलह बरस की, गैंगस्टर और हम नौजवान जैसी फिल्में शामिल हैं। देव आनंद ने कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी। जिसमें वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म आंधियां के अलावा हरे रामा हरे कृष्णा, हम नौजवान, अव्वल नंबर, प्यार का तराना (1993 में), गैंगेस्टर, मैं सोलह बरस की, सेन्सर आदि फिल्में शामिल हैं। इस के अलावा बतौर निर्माता 1998 में मैं सोलह बरस की और 1993 में प्यार का तराना लेकर सामने आऐ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और नई अभिनेत्रियां==&lt;br /&gt;
देवानंद एक समय बाद नई अभिनेत्रियों को पर्दे पर उतारने के लिए मशहूर हो गए। हरे रामा हरे कृष्णा के ज़रिए उन्होंने ज़ीनत अमान की खोज की और टीना मुनीम, नताशा सिन्हा व एकता जैसी अभिनेत्रियों को मैदान में उतारने का श्रेय भी देव साहब को ही जाता है। बाद में जीनत अमान को राज कपूर का साथ मिल गया और ये बात देवानंद को अच्छी नहीं लगी। फिल्म निर्माण में उतरे देवानंद ने कई नई प्रतिभाओं टीना मुनीम से लेकर तब्बू तक का फिल्मी दुनिया से साक्षात्कार कराया। उन्होंने पांच दशकों में सुरैया, गीताबाली, मधुबाला, मीना कुमारी, नूतन, वैजंतीमाला, मुमताज, हेमा मालिनी, वहीदा रहमान से लेकर मधुबाला और जीनत अमान तक सभी उत्कृष्ट नायिकाओं के साथ अभिनय किया और हर अभिनेत्री के साथ उनकी जोड़ी को खूब सराहा गया। आज भी वह नई अभिनेत्रियों की तलाश में हैं और फ़िल्म बनाने का उनका शौक़ जारी है। अभिनेत्री हेमा मालिनी के साथ कई फिल्में की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाल के सालों में देवानंद अपनी प्रोडक्शन कंपनी 'नवकेतन' के तले कई फिल्में बनाने में व्यस्त हैं। वह लगातार अपने बैनर के तले फिल्में बना रहे हैं जिसके लीड हीरो वह खुद ही होते हैं। नवकेतन बैनर तले उन्होंने हाल के सालों में 'हरे रामा हरे कृष्णा', 'अव्वल नंबर' जैसी सुपरहिट फिल्में दी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ग्रेगरी पेक से समानता==&lt;br /&gt;
ग्रैगरी पैक के अभिनय से प्रेरित होकर देवानंद फिल्मों में काम करने के उद्देश्य से अपना नगर छोड़कर फिल्म नगरी में आये थे। देवानंद को कई लोग हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ग्रेगरी पेक से भी जोड़ कर देखते हैं। भारतीय दर्शकों को अपने चहेते अभिनेता देवानंद में ग्रेगरी पेक की झलक नज़र आई और वे उनके दीवाने हो गए। देवानंद के बालों का स्टाइल, चलने, बोलने का तरीक़ा सब में ग्रेगरी पेक की झलक मिलती थी। मुंबई फ़िल्म जगत में एक क़िस्सा मशहूर है। अभिनेत्री सुरैया ग्रेगरी पेक की अनन्य प्रशंसक थीं. यहाँ तक कि उनका नाम देवानंद के साथ भी जुड़ने लगा था और लोग कहते थे कि इसकी वजह यही थी कि वह उनमें ग्रेगरी पेक को ढूँढती थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और रोमांस==&lt;br /&gt;
देव आनंद अपनी खास स्टाइल के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने किरदारों में नौजवानों की उमंगों, तरंगों और चंचलता को बहुत ही खूबसूरत अंदाज से पेश किया है। देव आनंद आदर्शवाद और व्यवहारवाद में नहीं उलझते और न ही उन का किरदार प्रेम की नाकामियों से दो-चार होता है। अपनी अदाकाराओं के साथ छेड़खानी, शरारत और फ्लर्ट करने वाला आम नौजवान देव का नायक रहा। देव ने अपने किरदारों में जवानी के हर मौसम का लुत्फ लिया। जवानी के तमाम दबे-कुचले अरमानों को पूरे रस के साथ जिया और नौजवानों के चहेते बन गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहते हैं बॉलिवुड में अगर कोई असली रोमांटिक हीरो है तो वह हैं सिर्फ देवानंद। ना सिर्फ पर्दे पर बल्कि असल जिंदगी में भी देवानंद की दिल्लगी का कोई सानी नहीं है। नौजवानों के जज़्बात को परदे पर पेश करने वाले खूबसूरत देव हमेशा ही खूबसूरत लडकियों से घिरे रहे। हज़ारों दिलों की धड़कन रहे देव हसीनाओं का सपना बन चुके थे। अभिनेत्रियों के साथ अपने रोमांस को लेकर भी वे चर्चा में रहे। चाहे सुरैया हो या जीनत अमान दोनों के साथ उनके प्रेम के चर्चे खूब आम हुए। खुद देवानंद भी मानते हैं कि सुरैया उनका पहला प्रेम थीं और जीनत को भी वह पसंद करते थे। यही नहीं सुरैया भी देव की दीवानी थी। 1948 में बनी ‘विद्या’ फिल्म की नायिका सुरैया थी। फिल्म अफसर के निर्माण के दौरान देव आनंद का झुकाव फिल्म गायिका-अभिनेत्री सुरैया की ओर हो गया था। इसके सेट पर ही दोनों में प्यार हुआ। एक गाने की शूटिंग के दौरान देव आनंद और सुरैया की नाव पानी में पलट गई जिसमें उन्होंने सुरैया को डूबने से बचाया। इसके बाद सुरैया देव आनंद से बेइंतहा मोहब्बत करने लगीं लेकिन सुरैया की दादी की इजाजत न मिलने पर यह जोड़ी परवान नहीं चढ़ सकी। 1951 तक दोनों ने सात फिल्मों में साथ काम किया। मगर अफसोस दोनों के साथ रहने का ख्वाब पूरा ना हो सका। देव ने अपने टूटे प्यार का इजहार कई बार किया है। बाद के वर्ष 1954 में ‘टैक्सी ड्राइवर’ की हीरोइन मोना याने कल्पना कार्तिक से फिल्म के सेट पर देव आनंद का शादी हो गई। मगर सुरैया ने देव के अलावा किसी और को गवारा ना किया और उनकी याद में आजीवन विवाह नहीं किया। 50 साल बाद देव आनंद ने स्वीकार किया कि उनका दिल हमेशा सुरैया के लिए धड़कता रहता था। वर्ष 2005 में जब सुरैया का निधन हुआ तो देवानंद उन लोगों में से एक थे जो उनके जनाजे के साथ थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवानंद के जानदार और शानदार अभिनय की बदौलत परदे पर जीवंत आकार लेने वाली प्रेम कहानियों ने लाखों युवाओं के दिलों में प्रेम की लहरें पैदा कीं लेकिन खुद देवानंद इस लिहाज से जिंदगी में काफी परेशानियों से गुजरे। उन्हें सदाबहार अभिनेता कह कर पुकारा गया तो वह भी यों ही नहीं था। उन्होंने जिन अभिनेत्रियों के साथ नायक के रूप में काम किया था कुछ वर्षों पहले तक वे उनकी पोतियों के साथ भी उसी भूमिका में देखे गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद का राजनीतिक और सामाजिक रूप==&lt;br /&gt;
देव आनंद फिल्म जगत के उन गिने चुने लोगों में शामिल हैं जो राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी सक्रिय हैं। सन् 1977 के संसदीय चुनावों के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर इंदिरा गांधी का जमकर विरोध किया। उल्लेखनीय है कि उस समय सिने जगत की अधिकांश हस्तियों ने चुप्पी साध रखी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का निजी जीवन==&lt;br /&gt;
देवानंद ने कल्पना कार्तिक के साथ शादी की थी लेकिन उनकी शादी अधिक समय तक सफल नहीं हो सकी। दोनों साथ रहे लेकिन बाद में कल्पना ने एकाकी जीवन को गले लगा लिया। अन्य फिल्मी अभिनेताओं की तरह देवानंद ने भी अपने बेटे सुनील आनंद को फिल्मों में स्थापित करने के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन सफल नहीं हो सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ वर्ष पहले अपने जन्मदिन के अवसर पर ही उन्होंने 'रोमांसिंग विद लाइफ' नाम से अपनी जीवनी बाज़ार में उतारी थी। आमतौर पर मशहूर हस्तियों की जीवनियों के प्रसंग विवादों का विषय बनते हैं लेकिन उनकी जीवनी हर अर्थ में बेदाग रही बिल्कुल उनके जीवन की तरह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद ने एक बार अपनी निरंतर सक्रियता के बारे में कहा था कि वे सपने देखते हैं और फिर उन्हें पर्दे पर उकेरते हैं बिना हिट या फ्लॉप की परवाह किए। इन अर्थों में वे सच्चे कर्मयोगी हैं। देव आनंद शतायु हों और जिंदादिली बिखेरते रहें यही उनके प्रशंसकों की कामना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का स्टाइल==&lt;br /&gt;
देव आनंद को राजेश खन्ना से भी पहले सिनेमा का पहला चॉकलेटी नायक होने का गौरव मिला। देव आनंद की लोकप्रियता का आलम ये था कि उन्होंने जो भी पहना, जो भी किया वो एक स्टाइल में तब्दील हो गया। फिर चाहे वो उनका बालों पर हाथ फेरने का अंदाज हो या काली कमीज की पहनने का या फिर अपनी अनूठी शैली में जल्दी-जल्दी संवाद बोलने का। मुनीम जी (1955), फंटुश, सीआईडी (1956), पेइंगगेस्ट (1957) ने उन्हे सफलतम स्टायलीस स्टार बना दिया। इनकी झूक कर चलने की अदा, एक स्वांस मे लम्बे डायलाँग बोलना और तिरछे होकर सिर हिलाना उनका ट्रेडमार्क बन गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने दौर के सबसे सफल अभिनेता देवानंद अपने काले कोट की वजह से बहुत सुर्खियों में आए थे। बात उस समय की है जब देवानंद अपने अलग अंदाज और बोलने के तरीके के लिए काफी मशहूर थे। उनके सफेद कमीज और काले कोट के फैशन को तो जनता ने जैसे अपना ही बना लिया था और इसी समय एक ऐसा वाकया भी देखने को मिला जब न्यायालय ने उनके काले कोट को पहन कर घूमने पर पाबंदी लगा दी। वजह थी कुछ लडकियों का उनके काले कोट के प्रति आसक्ति के कारण आत्महत्या कर लेना। दीवानगी में दो-चार लडकियों ने जान दे दी। इससे एक बात साफ थी कि देवानंद का किरदार हो या उनका पहनावा हमेशा सदाबहार ही रहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद को मिले पुरस्कार==&lt;br /&gt;
देव आनंद, दिलीप कुमार और राज कपूर के 1950 दशक के बड़े स्टार रहे हैं। देव आनंद को अपने अभिनय के लिए दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। देव आनंद को सबसे पहला फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म काला पानी के लिए दिया गया। इसके बाद वर्ष 1965 में भी देव आनंद फिल्म गाइड के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। सन् 1991 में देव आनंद को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। वर्ष 2001 में देव आनंद को भारत सरकार की ओर से कला क्षेत्र (फिल्म जगत में योगदान) में पद्म भूषण सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 2002 में उनके द्वारा हिन्दी सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अभिनेता}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:अभिनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:फ़िल्म निर्माता]][[Category:फ़िल्म निर्देशक]][[Category: कला कोश]] [[Category:पद्म भूषण]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]] [[Category:चरित कोश]] [[Category:दादा साहब फाल्के पुरस्कार]] &lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6&amp;diff=238464</id>
		<title>देवानंद</title>
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		<updated>2011-12-04T05:52:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा कलाकार&lt;br /&gt;
|चित्र=dev anand young.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=देव आनंद&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=धर्मदेव पिशौरीमल आनंद&lt;br /&gt;
|प्रसिद्ध नाम=देव आनंद&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[26 सितंबर]], [[1923]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= [[पंजाब]] के गुरदासपुर ज़िले (जो अब पाकिस्तान में है)&lt;br /&gt;
|मृत्यु=3 दिसम्बर (88 वर्ष की उम्र में)&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=लंदन, इंग्लॅन्ड&lt;br /&gt;
|अविभावक= किशोरीमल आनंद&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी= कल्पना कार्तिक&lt;br /&gt;
|संतान= सुनील आनंद&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[मुंबई]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=फ़िल्म निर्माता-निर्देशक, [[अभिनेता]] &lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|मुख्य फ़िल्में=काला पानी, गाइड, हम दोनो, काला बाज़ार आदि &lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक&lt;br /&gt;
|विद्यालय=गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार, [[पद्म भूषण]], [[दादा साहब फाल्के पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|19:43, 2 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''देवानन्द''' (धर्मदेव आनंद) भारतीय सिनेमा के शुरूआती दौर के प्रसिद्ध अभिनेता थे जो जीवन भर सक्रिय और चर्चित रहे। वे अभिनेता के साथ-साथ निर्माता-निर्देशक भी थे। वे बॉलीवुड में देव साहब के नाम से एक ज़िन्दादिल और भले इंसान के रूप में प्रसिद्ध थे। भारतीय सिनेमा में दो पीढ़ियों तक लगातार हीरो बने रहने वाले कलाकार के विषय में यदि विचार करें तो केवल एक ही नाम उभरता है और वह है देव आनंद (देवानंद) । कभी अपनी एक फिल्म में उन्होंने एक गीत गुनगुनाया था 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया' और शायद यही गीत उनके जीवन को सबसे अच्छी तरह परिभाषित भी करता है। देव आनंद के नाम हिंदी सिने जगत के आकाश में स्टाइल गुरु बनकर जगमगाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का जीवन==&lt;br /&gt;
बॉलीवुड-सदाबहार हीरो देव आनंद का पूरा नाम धर्मदेव पिशौरीमल आनंद है। देव आनंद जो कि भारतीय सिनेमा के महान कलाकार, निर्माता व निर्देशक हैं का जन्म अविभाजित पंजाब के गुरदासपुर ज़िले (जो अब नारोवाल जिला, पिकस्तान में है) में 26 सितंबर, 1923 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में और प्रसिध्द वकील किशोरीमल आनंद नामक एक संपन्न अधिवक्ता के घर हुआ था। उनका बचपन का नाम धर्मदेव (देवदत्त) पिशौरीमल आनंद था। उनका बचपन परेशानियों से घिरा रहा। बचपन से ही उनका झुकाव अपने पिता के पेशे वकालत की ओर न होकर अभिनय की ओर था। एक वकील और आजादी के लिए लड़ने वाले पिशोरीमल के घर पैदा होने वाले देव ने रद्दी की दुकान से जब बाबूराव पटेल द्वारा सम्पादित फिल्म इंडिया के पुराने अंक पढ़े तो उन की आंखों ने फिल्मों में काम करने का सपना देख डाला और वह माया नगरी मुम्बई के सफर पर निकल पङे। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर (कि अब पाकिस्तान में है) के मशहूर गवर्नमेंट कॉलेज से पूरी की। इस कॉलेज ने फिल्म और साहित्य जगत को बलराज साहनी, चेतन आनंद, बी. आर. चोपड़ा और खुशवंत सिंह जैसे शख्सियतें दी हैं। इसके बाद वे उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते थे लेकिन पिता के पास इतने पैसे नहीं थे। देव आनंद को अपनी पहली नौकरी मिलिट्री सेन्सर ऑफिस (आर्मी करेस्पांडेंस सेंसर डिपार्टमेंट) में एक लिपिक के तौर पर मिली जहां उन्हें सैनिकों द्वारा लिखी चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगों को पढ़ कर सुनाना पड़ता था। इस काम के लिए देव आनंद को 165 रूपये मासिक वेतन के रूप में मिला करता था जिसमें से 45 रूपये वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज दिया करते थे। लगभग एक वर्ष तक मिलिट्री सेन्सर में नौकरी करने के बाद और परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए वह 30 रूपए जेब में ले कर पिता के मुंबई जाकर काम न करने की सलाह के विपरीत देव अपने भाई चेतन आनंद के साथ फ्रंटियर मेल से 1943 में मुंबई पहुँच गये। चेतन आनंद उस समय भारतीय जन नाटय संघ इप्टा से जुड़े हुए थे। उन्होंने देव आनंद को भी अपने साथ इप्टा में शामिल कर लिया। देव आनंद (और उनके छोटे भाई विजय आनंद) को फिल्मों में लाने का श्रेय उनके बड़े भाई चेतन आनंद को जाता है। देव ने ये सपने में भी न सोचा होगा की कामियाबी इतनी जल्दी उनके कदम चूमेगी मगर ये तीस रुपए रंग लाए और जाएँ तो जाएँ कहाँ का राग अलापने वाले देव आनंद को माया नगरी मुम्बई में आशियाना मिल गया। गायक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे देवानंद अभिनेता बन गए। देवआनंद के भाई, चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक रहे हैं। उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का कॅरियर==&lt;br /&gt;
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| मैं सोलह बरस की &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2001]]&lt;br /&gt;
| सेंसर&lt;br /&gt;
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| [[2003]]&lt;br /&gt;
| लव एट टाइम्स स्क्वेयर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2005]]&lt;br /&gt;
| मि.प्राइम मिनिस्टर &lt;br /&gt;
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&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने के बाद उनका नाम सिमट कर हो गया देवानंद। देव आनंद को अभिनेता के रूप में पहला ब्रेक 1946 में प्रभात स्टूडियो की फिल्म ‘हम एक हैं’ से मिला। लेकिन इस फिल्म के असफल होने से वह दर्शकों के बीच अपनी पहचान नहीं बना सके। इस फिल्म के निर्माण के दौरान प्रभात स्टूडियो में उनकी मुलाकात बाद के मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक गुरूदत्त से हुई जो उन दिनों फिल्मी दुनिया में कोरियोग्राफर के रूप में स्थान बनाने के लिए संघर्षरत थे। वहाँ दोनों की दोस्ती हुई और एक साथ सपने देखते इन दोनों दोस्तों ने आपस में एक वादा किया कि अगर गुरूदत्त फ़िल्म निर्देशक बनेंगे तो वे देव को अभिनेता के रूप में लेंगे और अगर देव निर्माता बनेंगे तो गुरुदत्त को निर्देशक के रूप में लेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म 'जिद्दी' (1948) में अभिऩेत्री कामिनी कौशल के साथ देव आनंद के फिल्मी कॅरियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। जिद्दी ने देव आनंद को नई ऊंचाइयां दिलायी। इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रख दिया। सन् 1949 में उन्होंने 'नवकेतन' बैनर नाम से स्वयं की फिल्म निर्माण संस्था खोल ली और उसके अंतर्गत साल दर साल फिल्में बनाने में सफल हुये। नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी पहली फिल्म अफसर का निर्माण किया जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने बड़े भाई चेतन आनंद को सौंपी। इस फिल्म के लिए उन्होंने उस जमाने की जानी मानी अभिनेत्री सुरैया का चयन किया जबकि अभिनेता के रूप में देव आनंद खुद ही थे। हालाँकि फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई। इसके बाद उनका ध्यान गुरूदत्त को किए गए वायदे की तरफ गया। और सन् 1951 में उन्होंने अपनी अगली फिल्म 'बाजी' के निर्देशन की जिम्मेदारी गुरूदत्त को सौंप दी। फिल्म सुपरहिट हुई और दोनों दोस्तों की किस्मत चमक गई। फ़िल्म बाज़ी की कहानी बलराज साहनी ने लिखी थी। बाजी फिल्म की सफलता के बाद देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री में एक अच्छे अभिनेता के रूप में शुमार होने लगे। देव यहीं से दिलीप कुमार और राजकुमार की क़तार में जा खड़े हुए और इस त्रिमूर्ति ने लंबे समय तक हिंदी फ़िल्मी दुनिया पर राज किया। जाल, राही, आंधियां, (1952), पतिता (1953), व अन्य फिल्मों के साथ स्‌न 1954 में अभिनेत्री कल्पना कार्तिक के साथ आई फिल्म &amp;quot;टैक्सी ड्राईव्हर&amp;quot; बड़ी हीट फिल्म थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद की मुनीम जी (1955), दुश्मन, काला बाज़ार, सी.आई.डी. (1956), पेइंग गेस्ट (1957), गैम्बलर, तेरे घर के सामने, काला पानी, लव एट टाइम्स स्क्वैर, हम नौजवान, देश परदेस, तेरे मेरे सपने, हरे रामा हरे कृष्णा, जॉनी मेरा नाम, ज्वैलथीफ़, हम दोनों (1961), बात एक रात की, असली नकली, माया, रूप की रानी चोरों का राजा, बम्बई का बाबू, लव मैरिज, दुश्मन, टैक्सी ड्राइवर, नौ दो ग्यारह, फंटूश, बाज़ी बेमिसाल, पॉकेटमार, जब प्यार किसी से होता है, हीरा पन्ना, बनारसी बाबू, जोशीला छूपा रुस्तम, शरीफ बदमाश, इश्क इश्क, अमीर गरीब, वारंट, साहेब बहादूर, देश-परदेश, लूटमार, तीन देविंया और गाइड इत्यादि प्रसिध्द फिल्में रही हैं। इसके अलावा भी उन्होने अनेंकों फिल्मों में काम किया और अभी भी वे फिल्म बना रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद और गुरुदत्त==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dev-Anand sig.jpg|देव आनंद का हस्ताक्षर|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
इसके बाद देव आनंद ने गुरूदत्त के निर्देशन में वर्ष 1952 में फिल्म जाल में भी अभिनय किया। इस फिल्म के निर्देशन के बाद गुरूदत्त ने यह फैसला किया कि वह केवल अपनी निर्मित फिल्मों का निर्देशन करेंगे। बाद में देव आनंद ने अपनी निर्मित फिल्मों के निर्देशन की जिम्मेदारी अपने छोटे भाई विजय आनंद को सौंप दी। विजय आनंद ने देव आनंद की कई फिल्मों का निर्देशन किया। इन फिल्मों में कालाबाज़ार, तेरे घर के सामने, गाइड, तेरे मेरे सपने, छुपा रूस्तम प्रमुख हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद प्रख्यात उपन्यासकार आर. के. नारायण से काफी प्रभावित रहा करते थे और उनके उपन्यास गाइड पर फिल्म बनाना चाहते थे। आर. के. नारायणन की स्वीकृति के बाद देव आनंद ने हॉलीवुड के सहयोग से इसी नाम से एक फिल्म बनाई जिसका निर्देशन किया था उनके छोटे भाई विजय आनंद (गोल्डी) ने किया था, जो खुद भी एक अभिनेता थे तथा हिरोईन वहीदा रहमान थी। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में फिल्म गाइड का निर्माण किया जो देव आनंद के सिने कॅरियर की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म ने आलोचकों को बहुत प्रभावित किया। गाइड का प्रदर्शन सन् 1965 में होने के बाद उनका नाम ही पड़ गया राजू गाइड जो युवाओं में बहुत लोकप्रिय हुआ। इस फिल्म के लिए देव आनंद को उनके जबर्दस्त अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया। यह फिल्म अभी भी हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ निर्देशित व सम्पादित फिल्मों में से एक मानी जाती है। वर्ष 1970 में फिल्म प्रेम पुजारी के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से नकार दी गई बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद वर्ष 1971 में फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' का भी निर्देशन किया जिसमें 'दम मारो दम' गीत ने धूम मचाई। इस फ़िल्म के कामयाबी के बाद देवानंद को एक बेहतरीन निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया और उन्होंने अपनी कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। इस फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने युवा पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम के लिए पुकारा। इन फिल्मों में हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, सच्चे का बोलबाला, अव्वल नंबर, लव एट टाइम्स स्क्वैर, मैं सोलह बरस की, गैंगस्टर और हम नौजवान जैसी फिल्में शामिल हैं। देव आनंद ने कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी। जिसमें वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म आंधियां के अलावा हरे रामा हरे कृष्णा, हम नौजवान, अव्वल नंबर, प्यार का तराना (1993 में), गैंगेस्टर, मैं सोलह बरस की, सेन्सर आदि फिल्में शामिल हैं। इस के अलावा बतौर निर्माता 1998 में मैं सोलह बरस की और 1993 में प्यार का तराना लेकर सामने आऐ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और नई अभिनेत्रियां==&lt;br /&gt;
देवानंद एक समय बाद नई अभिनेत्रियों को पर्दे पर उतारने के लिए मशहूर हो गए। हरे रामा हरे कृष्णा के ज़रिए उन्होंने ज़ीनत अमान की खोज की और टीना मुनीम, नताशा सिन्हा व एकता जैसी अभिनेत्रियों को मैदान में उतारने का श्रेय भी देव साहब को ही जाता है। बाद में जीनत अमान को राज कपूर का साथ मिल गया और ये बात देवानंद को अच्छी नहीं लगी। फिल्म निर्माण में उतरे देवानंद ने कई नई प्रतिभाओं टीना मुनीम से लेकर तब्बू तक का फिल्मी दुनिया से साक्षात्कार कराया। उन्होंने पांच दशकों में सुरैया, गीताबाली, मधुबाला, मीना कुमारी, नूतन, वैजंतीमाला, मुमताज, हेमा मालिनी, वहीदा रहमान से लेकर मधुबाला और जीनत अमान तक सभी उत्कृष्ट नायिकाओं के साथ अभिनय किया और हर अभिनेत्री के साथ उनकी जोड़ी को खूब सराहा गया। आज भी वह नई अभिनेत्रियों की तलाश में हैं और फ़िल्म बनाने का उनका शौक़ जारी है। अभिनेत्री हेमा मालिनी के साथ कई फिल्में की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाल के सालों में देवानंद अपनी प्रोडक्शन कंपनी 'नवकेतन' के तले कई फिल्में बनाने में व्यस्त हैं। वह लगातार अपने बैनर के तले फिल्में बना रहे हैं जिसके लीड हीरो वह खुद ही होते हैं। नवकेतन बैनर तले उन्होंने हाल के सालों में 'हरे रामा हरे कृष्णा', 'अव्वल नंबर' जैसी सुपरहिट फिल्में दी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ग्रेगरी पेक से समानता==&lt;br /&gt;
ग्रैगरी पैक के अभिनय से प्रेरित होकर देवानंद फिल्मों में काम करने के उद्देश्य से अपना नगर छोड़कर फिल्म नगरी में आये थे। देवानंद को कई लोग हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ग्रेगरी पेक से भी जोड़ कर देखते हैं। भारतीय दर्शकों को अपने चहेते अभिनेता देवानंद में ग्रेगरी पेक की झलक नज़र आई और वे उनके दीवाने हो गए। देवानंद के बालों का स्टाइल, चलने, बोलने का तरीक़ा सब में ग्रेगरी पेक की झलक मिलती थी। मुंबई फ़िल्म जगत में एक क़िस्सा मशहूर है। अभिनेत्री सुरैया ग्रेगरी पेक की अनन्य प्रशंसक थीं. यहाँ तक कि उनका नाम देवानंद के साथ भी जुड़ने लगा था और लोग कहते थे कि इसकी वजह यही थी कि वह उनमें ग्रेगरी पेक को ढूँढती थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और रोमांस==&lt;br /&gt;
देव आनंद अपनी खास स्टाइल के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने किरदारों में नौजवानों की उमंगों, तरंगों और चंचलता को बहुत ही खूबसूरत अंदाज से पेश किया है। देव आनंद आदर्शवाद और व्यवहारवाद में नहीं उलझते और न ही उन का किरदार प्रेम की नाकामियों से दो-चार होता है। अपनी अदाकाराओं के साथ छेड़खानी, शरारत और फ्लर्ट करने वाला आम नौजवान देव का नायक रहा। देव ने अपने किरदारों में जवानी के हर मौसम का लुत्फ लिया। जवानी के तमाम दबे-कुचले अरमानों को पूरे रस के साथ जिया और नौजवानों के चहेते बन गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहते हैं बॉलिवुड में अगर कोई असली रोमांटिक हीरो है तो वह हैं सिर्फ देवानंद। ना सिर्फ पर्दे पर बल्कि असल जिंदगी में भी देवानंद की दिल्लगी का कोई सानी नहीं है। नौजवानों के जज़्बात को परदे पर पेश करने वाले खूबसूरत देव हमेशा ही खूबसूरत लडकियों से घिरे रहे। हज़ारों दिलों की धड़कन रहे देव हसीनाओं का सपना बन चुके थे। अभिनेत्रियों के साथ अपने रोमांस को लेकर भी वे चर्चा में रहे। चाहे सुरैया हो या जीनत अमान दोनों के साथ उनके प्रेम के चर्चे खूब आम हुए। खुद देवानंद भी मानते हैं कि सुरैया उनका पहला प्रेम थीं और जीनत को भी वह पसंद करते थे। यही नहीं सुरैया भी देव की दीवानी थी। 1948 में बनी ‘विद्या’ फिल्म की नायिका सुरैया थी। फिल्म अफसर के निर्माण के दौरान देव आनंद का झुकाव फिल्म गायिका-अभिनेत्री सुरैया की ओर हो गया था। इसके सेट पर ही दोनों में प्यार हुआ। एक गाने की शूटिंग के दौरान देव आनंद और सुरैया की नाव पानी में पलट गई जिसमें उन्होंने सुरैया को डूबने से बचाया। इसके बाद सुरैया देव आनंद से बेइंतहा मोहब्बत करने लगीं लेकिन सुरैया की दादी की इजाजत न मिलने पर यह जोड़ी परवान नहीं चढ़ सकी। 1951 तक दोनों ने सात फिल्मों में साथ काम किया। मगर अफसोस दोनों के साथ रहने का ख्वाब पूरा ना हो सका। देव ने अपने टूटे प्यार का इजहार कई बार किया है। बाद के वर्ष 1954 में ‘टैक्सी ड्राइवर’ की हीरोइन मोना याने कल्पना कार्तिक से फिल्म के सेट पर देव आनंद का शादी हो गई। मगर सुरैया ने देव के अलावा किसी और को गवारा ना किया और उनकी याद में आजीवन विवाह नहीं किया। 50 साल बाद देव आनंद ने स्वीकार किया कि उनका दिल हमेशा सुरैया के लिए धड़कता रहता था। वर्ष 2005 में जब सुरैया का निधन हुआ तो देवानंद उन लोगों में से एक थे जो उनके जनाजे के साथ थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवानंद के जानदार और शानदार अभिनय की बदौलत परदे पर जीवंत आकार लेने वाली प्रेम कहानियों ने लाखों युवाओं के दिलों में प्रेम की लहरें पैदा कीं लेकिन खुद देवानंद इस लिहाज से जिंदगी में काफी परेशानियों से गुजरे। उन्हें सदाबहार अभिनेता कह कर पुकारा गया तो वह भी यों ही नहीं था। उन्होंने जिन अभिनेत्रियों के साथ नायक के रूप में काम किया था कुछ वर्षों पहले तक वे उनकी पोतियों के साथ भी उसी भूमिका में देखे गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद का राजनीतिक और सामाजिक रूप==&lt;br /&gt;
देव आनंद फिल्म जगत के उन गिने चुने लोगों में शामिल हैं जो राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी सक्रिय हैं। सन् 1977 के संसदीय चुनावों के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर इंदिरा गांधी का जमकर विरोध किया। उल्लेखनीय है कि उस समय सिने जगत की अधिकांश हस्तियों ने चुप्पी साध रखी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का निजी जीवन==&lt;br /&gt;
देवानंद ने कल्पना कार्तिक के साथ शादी की थी लेकिन उनकी शादी अधिक समय तक सफल नहीं हो सकी। दोनों साथ रहे लेकिन बाद में कल्पना ने एकाकी जीवन को गले लगा लिया। अन्य फिल्मी अभिनेताओं की तरह देवानंद ने भी अपने बेटे सुनील आनंद को फिल्मों में स्थापित करने के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन सफल नहीं हो सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ वर्ष पहले अपने जन्मदिन के अवसर पर ही उन्होंने 'रोमांसिंग विद लाइफ' नाम से अपनी जीवनी बाज़ार में उतारी थी। आमतौर पर मशहूर हस्तियों की जीवनियों के प्रसंग विवादों का विषय बनते हैं लेकिन उनकी जीवनी हर अर्थ में बेदाग रही बिल्कुल उनके जीवन की तरह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद ने एक बार अपनी निरंतर सक्रियता के बारे में कहा था कि वे सपने देखते हैं और फिर उन्हें पर्दे पर उकेरते हैं बिना हिट या फ्लॉप की परवाह किए। इन अर्थों में वे सच्चे कर्मयोगी हैं। देव आनंद शतायु हों और जिंदादिली बिखेरते रहें यही उनके प्रशंसकों की कामना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का स्टाइल==&lt;br /&gt;
देव आनंद को राजेश खन्ना से भी पहले सिनेमा का पहला चॉकलेटी नायक होने का गौरव मिला। देव आनंद की लोकप्रियता का आलम ये था कि उन्होंने जो भी पहना, जो भी किया वो एक स्टाइल में तब्दील हो गया। फिर चाहे वो उनका बालों पर हाथ फेरने का अंदाज हो या काली कमीज की पहनने का या फिर अपनी अनूठी शैली में जल्दी-जल्दी संवाद बोलने का। मुनीम जी (1955), फंटुश, सीआईडी (1956), पेइंगगेस्ट (1957) ने उन्हे सफलतम स्टायलीस स्टार बना दिया। इनकी झूक कर चलने की अदा, एक स्वांस मे लम्बे डायलाँग बोलना और तिरछे होकर सिर हिलाना उनका ट्रेडमार्क बन गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने दौर के सबसे सफल अभिनेता देवानंद अपने काले कोट की वजह से बहुत सुर्खियों में आए थे। बात उस समय की है जब देवानंद अपने अलग अंदाज और बोलने के तरीके के लिए काफी मशहूर थे। उनके सफेद कमीज और काले कोट के फैशन को तो जनता ने जैसे अपना ही बना लिया था और इसी समय एक ऐसा वाकया भी देखने को मिला जब न्यायालय ने उनके काले कोट को पहन कर घूमने पर पाबंदी लगा दी। वजह थी कुछ लडकियों का उनके काले कोट के प्रति आसक्ति के कारण आत्महत्या कर लेना। दीवानगी में दो-चार लडकियों ने जान दे दी। इससे एक बात साफ थी कि देवानंद का किरदार हो या उनका पहनावा हमेशा सदाबहार ही रहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद को मिले पुरस्कार==&lt;br /&gt;
देव आनंद, दिलीप कुमार और राज कपूर के 1950 दशक के बड़े स्टार रहे हैं। देव आनंद को अपने अभिनय के लिए दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। देव आनंद को सबसे पहला फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म काला पानी के लिए दिया गया। इसके बाद वर्ष 1965 में भी देव आनंद फिल्म गाइड के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। सन् 1991 में देव आनंद को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। वर्ष 2001 में देव आनंद को भारत सरकार की ओर से कला क्षेत्र (फिल्म जगत में योगदान) में पद्म भूषण सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 2002 में उनके द्वारा हिन्दी सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अभिनेता}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:अभिनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:फ़िल्म निर्माता]][[Category:फ़िल्म निर्देशक]][[Category: कला कोश]] [[Category:पद्म भूषण]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]] [[Category:चरित कोश]] [[Category:दादा साहब फाल्के पुरस्कार]] &lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6&amp;diff=238463</id>
		<title>देवानंद</title>
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		<updated>2011-12-04T05:41:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा कलाकार&lt;br /&gt;
|चित्र=dev anand young.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=देव आनंद&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=धर्मदेव पिशौरीमल आनंद&lt;br /&gt;
|प्रसिद्ध नाम=देव आनंद&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[26 सितंबर]], [[1923]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= [[पंजाब]] के गुरदासपुर ज़िले (जो अब पाकिस्तान में है)&lt;br /&gt;
|मृत्यु=3 दिसम्बर (88 वर्ष की उम्र में)&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=लंदन, इंग्लॅन्ड&lt;br /&gt;
|अविभावक= किशोरीमल आनंद&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी= कल्पना कार्तिक&lt;br /&gt;
|संतान= सुनील आनंद&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[मुंबई]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=फ़िल्म निर्माता-निर्देशक, [[अभिनेता]] &lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|मुख्य फ़िल्में=काला पानी, गाइड, हम दोनो, काला बाज़ार आदि &lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक&lt;br /&gt;
|विद्यालय=गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार, [[पद्म भूषण]], [[दादा साहब फाल्के पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|19:43, 2 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बॉलीवुड में कितने ही नायकों का दौर आया और गया। दिलीप कुमार हों या राजेश खन्ना सबका एक दौर था। यहां तक कि अब अमिताभ बच्चन का दौर भी लोगों को ढलता नजर आता है लेकिन बॉलिवुड की दुनिया में एक ऐसा अभिनेता भी है जिसने खुद को कभी उम्र के बंधन में बंधने नहीं दिया और वह है सदाबहार अभिनेता देव आनंद (देव आनन्द / देवानंद)। लोग उन्हें एवरग्रीन देव साहब कह कर पुकारते हैं। सदाबहार देवानंद का जलवा अब भी बरकरार है। वक्त की करवटें उनकी हस्ती पर अपनी सिलवटें नहीं छोड़ पाईं। छह दशक से अधिक समय तक रुपहले परदे पर राज करने वाले देवानंद साहब का 26 सितंबर को जन्मदिन पङता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय सिनेमा में दो पीढ़ियों तक लगातार हीरो बने रहने वाले कलाकार के विषय में यदि विचार करें तो केवल एक ही नामे उभरता है और वह है देव आनंद। कभी अपनी एक फिल्म में उन्होंने एक गीत गुनगुनाया था 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया' और शायद यही गीत उनके जीवन को सबसे अच्छी तरह परिभाषित भी करता है। देव आनंद के नाम हिंदी सिने जगत के आकाश में स्टाइल गुरु बनकर जगमगाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का जीवन==&lt;br /&gt;
बॉलीवुड-सदाबहार हीरो देव आनंद का पूरा नाम धर्मदेव पिशौरीमल आनंद है। देव आनंद जो कि भारतीय सिनेमा के महान कलाकार, निर्माता व निर्देशक हैं का जन्म अविभाजित पंजाब के गुरदासपुर ज़िले (जो अब नारोवाल जिला, पिकस्तान में है) में 26 सितंबर, 1923 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में और प्रसिध्द वकील किशोरीमल आनंद नामक एक संपन्न अधिवक्ता के घर हुआ था। उनका बचपन का नाम धर्मदेव (देवदत्त) पिशौरीमल आनंद था। उनका बचपन परेशानियों से घिरा रहा। बचपन से ही उनका झुकाव अपने पिता के पेशे वकालत की ओर न होकर अभिनय की ओर था। एक वकील और आजादी के लिए लड़ने वाले पिशोरीमल के घर पैदा होने वाले देव ने रद्दी की दुकान से जब बाबूराव पटेल द्वारा सम्पादित फिल्म इंडिया के पुराने अंक पढ़े तो उन की आंखों ने फिल्मों में काम करने का सपना देख डाला और वह माया नगरी मुम्बई के सफर पर निकल पङे। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर (कि अब पाकिस्तान में है) के मशहूर गवर्नमेंट कॉलेज से पूरी की। इस कॉलेज ने फिल्म और साहित्य जगत को बलराज साहनी, चेतन आनंद, बी. आर. चोपड़ा और खुशवंत सिंह जैसे शख्सियतें दी हैं। इसके बाद वे उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते थे लेकिन पिता के पास इतने पैसे नहीं थे। देव आनंद को अपनी पहली नौकरी मिलिट्री सेन्सर ऑफिस (आर्मी करेस्पांडेंस सेंसर डिपार्टमेंट) में एक लिपिक के तौर पर मिली जहां उन्हें सैनिकों द्वारा लिखी चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगों को पढ़ कर सुनाना पड़ता था। इस काम के लिए देव आनंद को 165 रूपये मासिक वेतन के रूप में मिला करता था जिसमें से 45 रूपये वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज दिया करते थे। लगभग एक वर्ष तक मिलिट्री सेन्सर में नौकरी करने के बाद और परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए वह 30 रूपए जेब में ले कर पिता के मुंबई जाकर काम न करने की सलाह के विपरीत देव अपने भाई चेतन आनंद के साथ फ्रंटियर मेल से 1943 में मुंबई पहुँच गये। चेतन आनंद उस समय भारतीय जन नाटय संघ इप्टा से जुड़े हुए थे। उन्होंने देव आनंद को भी अपने साथ इप्टा में शामिल कर लिया। देव आनंद (और उनके छोटे भाई विजय आनंद) को फिल्मों में लाने का श्रेय उनके बड़े भाई चेतन आनंद को जाता है। देव ने ये सपने में भी न सोचा होगा की कामियाबी इतनी जल्दी उनके कदम चूमेगी मगर ये तीस रुपए रंग लाए और जाएँ तो जाएँ कहाँ का राग अलापने वाले देव आनंद को माया नगरी मुम्बई में आशियाना मिल गया। गायक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे देवानंद अभिनेता बन गए। देवआनंद के भाई, चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक रहे हैं। उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का कॅरियर==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right; width:45%; border:thin solid #aaaaaa; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;98%&amp;quot; class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; style=&amp;quot;float:right&amp;quot;;&lt;br /&gt;
|+देव आनंद का फ़िल्मी सफ़र&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;20%&amp;quot;| वर्ष&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;80%&amp;quot;| फ़िल्म&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 300px; overflow: auto;overflow-x:hidden;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;98%&amp;quot;&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1954]]&lt;br /&gt;
| बादबान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| टैक्सी ड्राइवर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फेरी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;5&amp;quot;| [[1955]] &lt;br /&gt;
| फरार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हाउस नंबर 44 &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मुनीमजी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| इंसानियत&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मिलाप&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1956]] &lt;br /&gt;
| फंटूश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सीआईडी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पॉकेट मार &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1957]]  &lt;br /&gt;
| पेइंग गेस्ट &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| दुश्मन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बारिश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नौ दो ग्यारह &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1958]]  &lt;br /&gt;
| सोलहवाँ साल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अमर दीप &lt;br /&gt;
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| काला पानी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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| लव मैरिज &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;6&amp;quot;| [[1960]]  &lt;br /&gt;
| जाली नोट &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| एक के बाद एक &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मंजिल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सरहद &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बम्बई का बाबू &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| काला बाज़ार &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1961]]&lt;br /&gt;
| जब प्यार किसी से होता है &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हम दोनों &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1962]]&lt;br /&gt;
| बात एक रात की &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| माया &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| रूप की रानी चोरों का राजा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1963]]&lt;br /&gt;
| असली नकली &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरे घर के सामने &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1964]]&lt;br /&gt;
| शराबी&lt;br /&gt;
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| किनारा किनारे &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1965]]&lt;br /&gt;
| तीन देवियाँ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गाइड&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1966]]&lt;br /&gt;
| प्यार मोहब्बत &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1967]]&lt;br /&gt;
| ज्वेल थीफ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1968]]&lt;br /&gt;
| कहीं और चल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फरेब&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1969]]&lt;br /&gt;
| दुनिया&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| महल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1970]]&lt;br /&gt;
| जॉनी मेरा नाम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रेम पुजारी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1971]]&lt;br /&gt;
| गैम्बलर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरे मेरे सपने &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1972]]&lt;br /&gt;
| अच्छा बुरा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हरे रामा हरे कृष्णा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| यह गुलिस्तां हमारा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1973]]&lt;br /&gt;
| छुपा रुस्तम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| शरीफ बदमाश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जोशीला &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1974]]&lt;br /&gt;
| इश्क इश्क इश्क &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हीरा पन्ना &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रेम शास्त्र &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अमीर गरीब &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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| वारंट&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1976]]&lt;br /&gt;
| जानेमन &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1977]]&lt;br /&gt;
| कलाबाज&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
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|-&lt;br /&gt;
| [[1978]]&lt;br /&gt;
| देस परदेस &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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| मनपसंद&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| साहेब बहादुर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लूटमार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1982]]&lt;br /&gt;
| स्वामी दादा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1984]]&lt;br /&gt;
| आनंद और आनंद &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1986]]&lt;br /&gt;
| हम नौजवान &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1989]]&lt;br /&gt;
| सच्चे का बोलबाला &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लश्कर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1990]]&lt;br /&gt;
| अव्वल नंबर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1991]]&lt;br /&gt;
| सौ करोड़ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1995]]&lt;br /&gt;
| गैंगस्टर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1996]]&lt;br /&gt;
| रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1998]]&lt;br /&gt;
| मैं सोलह बरस की &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2001]]&lt;br /&gt;
| सेंसर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2003]]&lt;br /&gt;
| लव एट टाइम्स स्क्वेयर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2005]]&lt;br /&gt;
| मि.प्राइम मिनिस्टर &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने के बाद उनका नाम सिमट कर हो गया देवानंद। देव आनंद को अभिनेता के रूप में पहला ब्रेक 1946 में प्रभात स्टूडियो की फिल्म ‘हम एक हैं’ से मिला। लेकिन इस फिल्म के असफल होने से वह दर्शकों के बीच अपनी पहचान नहीं बना सके। इस फिल्म के निर्माण के दौरान प्रभात स्टूडियो में उनकी मुलाकात बाद के मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक गुरूदत्त से हुई जो उन दिनों फिल्मी दुनिया में कोरियोग्राफर के रूप में स्थान बनाने के लिए संघर्षरत थे। वहाँ दोनों की दोस्ती हुई और एक साथ सपने देखते इन दोनों दोस्तों ने आपस में एक वादा किया कि अगर गुरूदत्त फ़िल्म निर्देशक बनेंगे तो वे देव को अभिनेता के रूप में लेंगे और अगर देव निर्माता बनेंगे तो गुरुदत्त को निर्देशक के रूप में लेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म 'जिद्दी' (1948) में अभिऩेत्री कामिनी कौशल के साथ देव आनंद के फिल्मी कॅरियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। जिद्दी ने देव आनंद को नई ऊंचाइयां दिलायी। इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रख दिया। सन् 1949 में उन्होंने 'नवकेतन' बैनर नाम से स्वयं की फिल्म निर्माण संस्था खोल ली और उसके अंतर्गत साल दर साल फिल्में बनाने में सफल हुये। नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी पहली फिल्म अफसर का निर्माण किया जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने बड़े भाई चेतन आनंद को सौंपी। इस फिल्म के लिए उन्होंने उस जमाने की जानी मानी अभिनेत्री सुरैया का चयन किया जबकि अभिनेता के रूप में देव आनंद खुद ही थे। हालाँकि फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई। इसके बाद उनका ध्यान गुरूदत्त को किए गए वायदे की तरफ गया। और सन् 1951 में उन्होंने अपनी अगली फिल्म 'बाजी' के निर्देशन की जिम्मेदारी गुरूदत्त को सौंप दी। फिल्म सुपरहिट हुई और दोनों दोस्तों की किस्मत चमक गई। फ़िल्म बाज़ी की कहानी बलराज साहनी ने लिखी थी। बाजी फिल्म की सफलता के बाद देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री में एक अच्छे अभिनेता के रूप में शुमार होने लगे। देव यहीं से दिलीप कुमार और राजकुमार की क़तार में जा खड़े हुए और इस त्रिमूर्ति ने लंबे समय तक हिंदी फ़िल्मी दुनिया पर राज किया। जाल, राही, आंधियां, (1952), पतिता (1953), व अन्य फिल्मों के साथ स्‌न 1954 में अभिनेत्री कल्पना कार्तिक के साथ आई फिल्म &amp;quot;टैक्सी ड्राईव्हर&amp;quot; बड़ी हीट फिल्म थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद की मुनीम जी (1955), दुश्मन, काला बाज़ार, सी.आई.डी. (1956), पेइंग गेस्ट (1957), गैम्बलर, तेरे घर के सामने, काला पानी, लव एट टाइम्स स्क्वैर, हम नौजवान, देश परदेस, तेरे मेरे सपने, हरे रामा हरे कृष्णा, जॉनी मेरा नाम, ज्वैलथीफ़, हम दोनों (1961), बात एक रात की, असली नकली, माया, रूप की रानी चोरों का राजा, बम्बई का बाबू, लव मैरिज, दुश्मन, टैक्सी ड्राइवर, नौ दो ग्यारह, फंटूश, बाज़ी बेमिसाल, पॉकेटमार, जब प्यार किसी से होता है, हीरा पन्ना, बनारसी बाबू, जोशीला छूपा रुस्तम, शरीफ बदमाश, इश्क इश्क, अमीर गरीब, वारंट, साहेब बहादूर, देश-परदेश, लूटमार, तीन देविंया और गाइड इत्यादि प्रसिध्द फिल्में रही हैं। इसके अलावा भी उन्होने अनेंकों फिल्मों में काम किया और अभी भी वे फिल्म बना रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद और गुरुदत्त==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dev-Anand sig.jpg|देव आनंद का हस्ताक्षर|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
इसके बाद देव आनंद ने गुरूदत्त के निर्देशन में वर्ष 1952 में फिल्म जाल में भी अभिनय किया। इस फिल्म के निर्देशन के बाद गुरूदत्त ने यह फैसला किया कि वह केवल अपनी निर्मित फिल्मों का निर्देशन करेंगे। बाद में देव आनंद ने अपनी निर्मित फिल्मों के निर्देशन की जिम्मेदारी अपने छोटे भाई विजय आनंद को सौंप दी। विजय आनंद ने देव आनंद की कई फिल्मों का निर्देशन किया। इन फिल्मों में कालाबाज़ार, तेरे घर के सामने, गाइड, तेरे मेरे सपने, छुपा रूस्तम प्रमुख हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद प्रख्यात उपन्यासकार आर. के. नारायण से काफी प्रभावित रहा करते थे और उनके उपन्यास गाइड पर फिल्म बनाना चाहते थे। आर. के. नारायणन की स्वीकृति के बाद देव आनंद ने हॉलीवुड के सहयोग से इसी नाम से एक फिल्म बनाई जिसका निर्देशन किया था उनके छोटे भाई विजय आनंद (गोल्डी) ने किया था, जो खुद भी एक अभिनेता थे तथा हिरोईन वहीदा रहमान थी। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में फिल्म गाइड का निर्माण किया जो देव आनंद के सिने कॅरियर की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म ने आलोचकों को बहुत प्रभावित किया। गाइड का प्रदर्शन सन् 1965 में होने के बाद उनका नाम ही पड़ गया राजू गाइड जो युवाओं में बहुत लोकप्रिय हुआ। इस फिल्म के लिए देव आनंद को उनके जबर्दस्त अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया। यह फिल्म अभी भी हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ निर्देशित व सम्पादित फिल्मों में से एक मानी जाती है। वर्ष 1970 में फिल्म प्रेम पुजारी के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से नकार दी गई बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद वर्ष 1971 में फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' का भी निर्देशन किया जिसमें 'दम मारो दम' गीत ने धूम मचाई। इस फ़िल्म के कामयाबी के बाद देवानंद को एक बेहतरीन निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया और उन्होंने अपनी कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। इस फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने युवा पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम के लिए पुकारा। इन फिल्मों में हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, सच्चे का बोलबाला, अव्वल नंबर, लव एट टाइम्स स्क्वैर, मैं सोलह बरस की, गैंगस्टर और हम नौजवान जैसी फिल्में शामिल हैं। देव आनंद ने कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी। जिसमें वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म आंधियां के अलावा हरे रामा हरे कृष्णा, हम नौजवान, अव्वल नंबर, प्यार का तराना (1993 में), गैंगेस्टर, मैं सोलह बरस की, सेन्सर आदि फिल्में शामिल हैं। इस के अलावा बतौर निर्माता 1998 में मैं सोलह बरस की और 1993 में प्यार का तराना लेकर सामने आऐ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और नई अभिनेत्रियां==&lt;br /&gt;
देवानंद एक समय बाद नई अभिनेत्रियों को पर्दे पर उतारने के लिए मशहूर हो गए। हरे रामा हरे कृष्णा के ज़रिए उन्होंने ज़ीनत अमान की खोज की और टीना मुनीम, नताशा सिन्हा व एकता जैसी अभिनेत्रियों को मैदान में उतारने का श्रेय भी देव साहब को ही जाता है। बाद में जीनत अमान को राज कपूर का साथ मिल गया और ये बात देवानंद को अच्छी नहीं लगी। फिल्म निर्माण में उतरे देवानंद ने कई नई प्रतिभाओं टीना मुनीम से लेकर तब्बू तक का फिल्मी दुनिया से साक्षात्कार कराया। उन्होंने पांच दशकों में सुरैया, गीताबाली, मधुबाला, मीना कुमारी, नूतन, वैजंतीमाला, मुमताज, हेमा मालिनी, वहीदा रहमान से लेकर मधुबाला और जीनत अमान तक सभी उत्कृष्ट नायिकाओं के साथ अभिनय किया और हर अभिनेत्री के साथ उनकी जोड़ी को खूब सराहा गया। आज भी वह नई अभिनेत्रियों की तलाश में हैं और फ़िल्म बनाने का उनका शौक़ जारी है। अभिनेत्री हेमा मालिनी के साथ कई फिल्में की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाल के सालों में देवानंद अपनी प्रोडक्शन कंपनी 'नवकेतन' के तले कई फिल्में बनाने में व्यस्त हैं। वह लगातार अपने बैनर के तले फिल्में बना रहे हैं जिसके लीड हीरो वह खुद ही होते हैं। नवकेतन बैनर तले उन्होंने हाल के सालों में 'हरे रामा हरे कृष्णा', 'अव्वल नंबर' जैसी सुपरहिट फिल्में दी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ग्रेगरी पेक से समानता==&lt;br /&gt;
ग्रैगरी पैक के अभिनय से प्रेरित होकर देवानंद फिल्मों में काम करने के उद्देश्य से अपना नगर छोड़कर फिल्म नगरी में आये थे। देवानंद को कई लोग हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ग्रेगरी पेक से भी जोड़ कर देखते हैं। भारतीय दर्शकों को अपने चहेते अभिनेता देवानंद में ग्रेगरी पेक की झलक नज़र आई और वे उनके दीवाने हो गए। देवानंद के बालों का स्टाइल, चलने, बोलने का तरीक़ा सब में ग्रेगरी पेक की झलक मिलती थी। मुंबई फ़िल्म जगत में एक क़िस्सा मशहूर है। अभिनेत्री सुरैया ग्रेगरी पेक की अनन्य प्रशंसक थीं. यहाँ तक कि उनका नाम देवानंद के साथ भी जुड़ने लगा था और लोग कहते थे कि इसकी वजह यही थी कि वह उनमें ग्रेगरी पेक को ढूँढती थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और रोमांस==&lt;br /&gt;
देव आनंद अपनी खास स्टाइल के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने किरदारों में नौजवानों की उमंगों, तरंगों और चंचलता को बहुत ही खूबसूरत अंदाज से पेश किया है। देव आनंद आदर्शवाद और व्यवहारवाद में नहीं उलझते और न ही उन का किरदार प्रेम की नाकामियों से दो-चार होता है। अपनी अदाकाराओं के साथ छेड़खानी, शरारत और फ्लर्ट करने वाला आम नौजवान देव का नायक रहा। देव ने अपने किरदारों में जवानी के हर मौसम का लुत्फ लिया। जवानी के तमाम दबे-कुचले अरमानों को पूरे रस के साथ जिया और नौजवानों के चहेते बन गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहते हैं बॉलिवुड में अगर कोई असली रोमांटिक हीरो है तो वह हैं सिर्फ देवानंद। ना सिर्फ पर्दे पर बल्कि असल जिंदगी में भी देवानंद की दिल्लगी का कोई सानी नहीं है। नौजवानों के जज़्बात को परदे पर पेश करने वाले खूबसूरत देव हमेशा ही खूबसूरत लडकियों से घिरे रहे। हज़ारों दिलों की धड़कन रहे देव हसीनाओं का सपना बन चुके थे। अभिनेत्रियों के साथ अपने रोमांस को लेकर भी वे चर्चा में रहे। चाहे सुरैया हो या जीनत अमान दोनों के साथ उनके प्रेम के चर्चे खूब आम हुए। खुद देवानंद भी मानते हैं कि सुरैया उनका पहला प्रेम थीं और जीनत को भी वह पसंद करते थे। यही नहीं सुरैया भी देव की दीवानी थी। 1948 में बनी ‘विद्या’ फिल्म की नायिका सुरैया थी। फिल्म अफसर के निर्माण के दौरान देव आनंद का झुकाव फिल्म गायिका-अभिनेत्री सुरैया की ओर हो गया था। इसके सेट पर ही दोनों में प्यार हुआ। एक गाने की शूटिंग के दौरान देव आनंद और सुरैया की नाव पानी में पलट गई जिसमें उन्होंने सुरैया को डूबने से बचाया। इसके बाद सुरैया देव आनंद से बेइंतहा मोहब्बत करने लगीं लेकिन सुरैया की दादी की इजाजत न मिलने पर यह जोड़ी परवान नहीं चढ़ सकी। 1951 तक दोनों ने सात फिल्मों में साथ काम किया। मगर अफसोस दोनों के साथ रहने का ख्वाब पूरा ना हो सका। देव ने अपने टूटे प्यार का इजहार कई बार किया है। बाद के वर्ष 1954 में ‘टैक्सी ड्राइवर’ की हीरोइन मोना याने कल्पना कार्तिक से फिल्म के सेट पर देव आनंद का शादी हो गई। मगर सुरैया ने देव के अलावा किसी और को गवारा ना किया और उनकी याद में आजीवन विवाह नहीं किया। 50 साल बाद देव आनंद ने स्वीकार किया कि उनका दिल हमेशा सुरैया के लिए धड़कता रहता था। वर्ष 2005 में जब सुरैया का निधन हुआ तो देवानंद उन लोगों में से एक थे जो उनके जनाजे के साथ थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवानंद के जानदार और शानदार अभिनय की बदौलत परदे पर जीवंत आकार लेने वाली प्रेम कहानियों ने लाखों युवाओं के दिलों में प्रेम की लहरें पैदा कीं लेकिन खुद देवानंद इस लिहाज से जिंदगी में काफी परेशानियों से गुजरे। उन्हें सदाबहार अभिनेता कह कर पुकारा गया तो वह भी यों ही नहीं था। उन्होंने जिन अभिनेत्रियों के साथ नायक के रूप में काम किया था कुछ वर्षों पहले तक वे उनकी पोतियों के साथ भी उसी भूमिका में देखे गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद का राजनीतिक और सामाजिक रूप==&lt;br /&gt;
देव आनंद फिल्म जगत के उन गिने चुने लोगों में शामिल हैं जो राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी सक्रिय हैं। सन् 1977 के संसदीय चुनावों के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर इंदिरा गांधी का जमकर विरोध किया। उल्लेखनीय है कि उस समय सिने जगत की अधिकांश हस्तियों ने चुप्पी साध रखी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का निजी जीवन==&lt;br /&gt;
देवानंद ने कल्पना कार्तिक के साथ शादी की थी लेकिन उनकी शादी अधिक समय तक सफल नहीं हो सकी। दोनों साथ रहे लेकिन बाद में कल्पना ने एकाकी जीवन को गले लगा लिया। अन्य फिल्मी अभिनेताओं की तरह देवानंद ने भी अपने बेटे सुनील आनंद को फिल्मों में स्थापित करने के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन सफल नहीं हो सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ वर्ष पहले अपने जन्मदिन के अवसर पर ही उन्होंने 'रोमांसिंग विद लाइफ' नाम से अपनी जीवनी बाज़ार में उतारी थी। आमतौर पर मशहूर हस्तियों की जीवनियों के प्रसंग विवादों का विषय बनते हैं लेकिन उनकी जीवनी हर अर्थ में बेदाग रही बिल्कुल उनके जीवन की तरह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद ने एक बार अपनी निरंतर सक्रियता के बारे में कहा था कि वे सपने देखते हैं और फिर उन्हें पर्दे पर उकेरते हैं बिना हिट या फ्लॉप की परवाह किए। इन अर्थों में वे सच्चे कर्मयोगी हैं। देव आनंद शतायु हों और जिंदादिली बिखेरते रहें यही उनके प्रशंसकों की कामना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का स्टाइल==&lt;br /&gt;
देव आनंद को राजेश खन्ना से भी पहले सिनेमा का पहला चॉकलेटी नायक होने का गौरव मिला। देव आनंद की लोकप्रियता का आलम ये था कि उन्होंने जो भी पहना, जो भी किया वो एक स्टाइल में तब्दील हो गया। फिर चाहे वो उनका बालों पर हाथ फेरने का अंदाज हो या काली कमीज की पहनने का या फिर अपनी अनूठी शैली में जल्दी-जल्दी संवाद बोलने का। मुनीम जी (1955), फंटुश, सीआईडी (1956), पेइंगगेस्ट (1957) ने उन्हे सफलतम स्टायलीस स्टार बना दिया। इनकी झूक कर चलने की अदा, एक स्वांस मे लम्बे डायलाँग बोलना और तिरछे होकर सिर हिलाना उनका ट्रेडमार्क बन गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने दौर के सबसे सफल अभिनेता देवानंद अपने काले कोट की वजह से बहुत सुर्खियों में आए थे। बात उस समय की है जब देवानंद अपने अलग अंदाज और बोलने के तरीके के लिए काफी मशहूर थे। उनके सफेद कमीज और काले कोट के फैशन को तो जनता ने जैसे अपना ही बना लिया था और इसी समय एक ऐसा वाकया भी देखने को मिला जब न्यायालय ने उनके काले कोट को पहन कर घूमने पर पाबंदी लगा दी। वजह थी कुछ लडकियों का उनके काले कोट के प्रति आसक्ति के कारण आत्महत्या कर लेना। दीवानगी में दो-चार लडकियों ने जान दे दी। इससे एक बात साफ थी कि देवानंद का किरदार हो या उनका पहनावा हमेशा सदाबहार ही रहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद को मिले पुरस्कार==&lt;br /&gt;
देव आनंद, दिलीप कुमार और राज कपूर के 1950 दशक के बड़े स्टार रहे हैं। देव आनंद को अपने अभिनय के लिए दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। देव आनंद को सबसे पहला फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म काला पानी के लिए दिया गया। इसके बाद वर्ष 1965 में भी देव आनंद फिल्म गाइड के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। सन् 1991 में देव आनंद को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। वर्ष 2001 में देव आनंद को भारत सरकार की ओर से कला क्षेत्र (फिल्म जगत में योगदान) में पद्म भूषण सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 2002 में उनके द्वारा हिन्दी सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अभिनेता}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:अभिनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:फ़िल्म निर्माता]][[Category:फ़िल्म निर्देशक]][[Category: कला कोश]] [[Category:पद्म भूषण]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]] [[Category:चरित कोश]] [[Category:दादा साहब फाल्के पुरस्कार]] &lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>देवानन्द</title>
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		<title>वार्ता:देव आनंद</title>
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		<updated>2011-12-04T05:38:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: वार्ता:देव आनंद का नाम बदलकर वार्ता:देवानंद कर दिया गया है&lt;/p&gt;
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		<title>वार्ता:देवानंद</title>
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		<updated>2011-12-04T05:38:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: वार्ता:देव आनंद का नाम बदलकर वार्ता:देवानंद कर दिया गया है&lt;/p&gt;
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[[Category:सुझाव-सितम्बर 2011]]&lt;br /&gt;
}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>देव आनंद</title>
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		<updated>2011-12-04T05:38:02Z</updated>

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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[देवानंद]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>देवानंद</title>
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		<updated>2011-12-04T05:38:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: देव आनंद का नाम बदलकर देवानंद कर दिया गया है&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा कलाकार&lt;br /&gt;
|चित्र=dev anand young.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=देव आनंद&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=धर्मदेव पिशौरीमल आनंद&lt;br /&gt;
|प्रसिद्ध नाम=देव आनंद&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[26 सितंबर]], [[1923]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= [[पंजाब]] के गुरदासपुर ज़िले (जो अब पाकिस्तान में है)&lt;br /&gt;
|मृत्यु=&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=&lt;br /&gt;
|अविभावक= किशोरीमल आनंद&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी= कल्पना कार्तिक&lt;br /&gt;
|संतान= सुनील आनंद&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[मुंबई]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=फ़िल्म निर्माता-निर्देशक, [[अभिनेता]] &lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|मुख्य फ़िल्में=काला पानी, गाइड, हम दोनो, काला बाज़ार आदि &lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातक&lt;br /&gt;
|विद्यालय=गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार, [[पद्म भूषण]], [[दादा साहब फाल्के पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|19:43, 2 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बॉलीवुड में कितने ही नायकों का दौर आया और गया। दिलीप कुमार हों या राजेश खन्ना सबका एक दौर था। यहां तक कि अब अमिताभ बच्चन का दौर भी लोगों को ढलता नजर आता है लेकिन बॉलिवुड की दुनिया में एक ऐसा अभिनेता भी है जिसने खुद को कभी उम्र के बंधन में बंधने नहीं दिया और वह है सदाबहार अभिनेता देव आनंद (देव आनन्द / देवानंद)। लोग उन्हें एवरग्रीन देव साहब कह कर पुकारते हैं। सदाबहार देवानंद का जलवा अब भी बरकरार है। वक्त की करवटें उनकी हस्ती पर अपनी सिलवटें नहीं छोड़ पाईं। छह दशक से अधिक समय तक रुपहले परदे पर राज करने वाले देवानंद साहब का 26 सितंबर को जन्मदिन पङता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय सिनेमा में दो पीढ़ियों तक लगातार हीरो बने रहने वाले कलाकार के विषय में यदि विचार करें तो केवल एक ही नामे उभरता है और वह है देव आनंद। कभी अपनी एक फिल्म में उन्होंने एक गीत गुनगुनाया था 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुंए में उड़ाता चला गया' और शायद यही गीत उनके जीवन को सबसे अच्छी तरह परिभाषित भी करता है। देव आनंद के नाम हिंदी सिने जगत के आकाश में स्टाइल गुरु बनकर जगमगाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का जीवन==&lt;br /&gt;
बॉलीवुड-सदाबहार हीरो देव आनंद का पूरा नाम धर्मदेव पिशौरीमल आनंद है। देव आनंद जो कि भारतीय सिनेमा के महान कलाकार, निर्माता व निर्देशक हैं का जन्म अविभाजित पंजाब के गुरदासपुर ज़िले (जो अब नारोवाल जिला, पिकस्तान में है) में 26 सितंबर, 1923 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में और प्रसिध्द वकील किशोरीमल आनंद नामक एक संपन्न अधिवक्ता के घर हुआ था। उनका बचपन का नाम धर्मदेव (देवदत्त) पिशौरीमल आनंद था। उनका बचपन परेशानियों से घिरा रहा। बचपन से ही उनका झुकाव अपने पिता के पेशे वकालत की ओर न होकर अभिनय की ओर था। एक वकील और आजादी के लिए लड़ने वाले पिशोरीमल के घर पैदा होने वाले देव ने रद्दी की दुकान से जब बाबूराव पटेल द्वारा सम्पादित फिल्म इंडिया के पुराने अंक पढ़े तो उन की आंखों ने फिल्मों में काम करने का सपना देख डाला और वह माया नगरी मुम्बई के सफर पर निकल पङे। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर (कि अब पाकिस्तान में है) के मशहूर गवर्नमेंट कॉलेज से पूरी की। इस कॉलेज ने फिल्म और साहित्य जगत को बलराज साहनी, चेतन आनंद, बी. आर. चोपड़ा और खुशवंत सिंह जैसे शख्सियतें दी हैं। इसके बाद वे उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते थे लेकिन पिता के पास इतने पैसे नहीं थे। देव आनंद को अपनी पहली नौकरी मिलिट्री सेन्सर ऑफिस (आर्मी करेस्पांडेंस सेंसर डिपार्टमेंट) में एक लिपिक के तौर पर मिली जहां उन्हें सैनिकों द्वारा लिखी चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगों को पढ़ कर सुनाना पड़ता था। इस काम के लिए देव आनंद को 165 रूपये मासिक वेतन के रूप में मिला करता था जिसमें से 45 रूपये वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज दिया करते थे। लगभग एक वर्ष तक मिलिट्री सेन्सर में नौकरी करने के बाद और परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति को देखते हुए वह 30 रूपए जेब में ले कर पिता के मुंबई जाकर काम न करने की सलाह के विपरीत देव अपने भाई चेतन आनंद के साथ फ्रंटियर मेल से 1943 में मुंबई पहुँच गये। चेतन आनंद उस समय भारतीय जन नाटय संघ इप्टा से जुड़े हुए थे। उन्होंने देव आनंद को भी अपने साथ इप्टा में शामिल कर लिया। देव आनंद (और उनके छोटे भाई विजय आनंद) को फिल्मों में लाने का श्रेय उनके बड़े भाई चेतन आनंद को जाता है। देव ने ये सपने में भी न सोचा होगा की कामियाबी इतनी जल्दी उनके कदम चूमेगी मगर ये तीस रुपए रंग लाए और जाएँ तो जाएँ कहाँ का राग अलापने वाले देव आनंद को माया नगरी मुम्बई में आशियाना मिल गया। गायक बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे देवानंद अभिनेता बन गए। देवआनंद के भाई, चेतन आनंद और विजय आनंद भी भारतीय सिनेमा में सफल निर्देशक रहे हैं। उनकी बहन शील कांता कपूर प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का कॅरियर==&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right; width:45%; border:thin solid #aaaaaa; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;98%&amp;quot; class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; style=&amp;quot;float:right&amp;quot;;&lt;br /&gt;
|+देव आनंद का फ़िल्मी सफ़र&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;20%&amp;quot;| वर्ष&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;80%&amp;quot;| फ़िल्म&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 300px; overflow: auto;overflow-x:hidden;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;98%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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| जाल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| आँधियाँ&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तमाशा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जलजला&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1953]]&lt;br /&gt;
| पतिता&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| राही&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हमसफर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अरमान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1954]]&lt;br /&gt;
| बादबान&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| टैक्सी ड्राइवर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फेरी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;5&amp;quot;| [[1955]] &lt;br /&gt;
| फरार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हाउस नंबर 44 &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मुनीमजी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| इंसानियत&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मिलाप&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1956]] &lt;br /&gt;
| फंटूश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सीआईडी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| पॉकेट मार &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1957]]  &lt;br /&gt;
| पेइंग गेस्ट &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| दुश्मन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बारिश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नौ दो ग्यारह &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1958]]  &lt;br /&gt;
| सोलहवाँ साल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अमर दीप &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| काला पानी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1959]] &lt;br /&gt;
| लव मैरिज &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;6&amp;quot;| [[1960]]  &lt;br /&gt;
| जाली नोट &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| एक के बाद एक &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| मंजिल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सरहद &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बम्बई का बाबू &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| काला बाज़ार &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1961]]&lt;br /&gt;
| जब प्यार किसी से होता है &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हम दोनों &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1962]]&lt;br /&gt;
| बात एक रात की &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| माया &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| रूप की रानी चोरों का राजा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1963]]&lt;br /&gt;
| असली नकली &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरे घर के सामने &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1964]]&lt;br /&gt;
| शराबी&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| किनारा किनारे &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1965]]&lt;br /&gt;
| तीन देवियाँ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गाइड&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1966]]&lt;br /&gt;
| प्यार मोहब्बत &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1967]]&lt;br /&gt;
| ज्वेल थीफ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1968]]&lt;br /&gt;
| कहीं और चल &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| फरेब&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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| महल&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1970]]&lt;br /&gt;
| जॉनी मेरा नाम &lt;br /&gt;
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| प्रेम पुजारी &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1971]]&lt;br /&gt;
| गैम्बलर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| तेरे मेरे सपने &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1972]]&lt;br /&gt;
| अच्छा बुरा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हरे रामा हरे कृष्णा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| यह गुलिस्तां हमारा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1973]]&lt;br /&gt;
| छुपा रुस्तम &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| शरीफ बदमाश &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जोशीला &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot;| [[1974]]&lt;br /&gt;
| इश्क इश्क इश्क &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हीरा पन्ना &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| प्रेम शास्त्र &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अमीर गरीब &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1975]]&lt;br /&gt;
| वारंट&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1976]]&lt;br /&gt;
| जानेमन &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1977]]&lt;br /&gt;
| कलाबाज&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| डार्लिंग डार्लिंग &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बुलेट&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1978]]&lt;br /&gt;
| देस परदेस &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot;| [[1980]]&lt;br /&gt;
| मनपसंद&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| साहेब बहादुर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लूटमार&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1982]]&lt;br /&gt;
| स्वामी दादा &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1984]]&lt;br /&gt;
| आनंद और आनंद &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1986]]&lt;br /&gt;
| हम नौजवान &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot;| [[1989]]&lt;br /&gt;
| सच्चे का बोलबाला &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| लश्कर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1990]]&lt;br /&gt;
| अव्वल नंबर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1991]]&lt;br /&gt;
| सौ करोड़ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1995]]&lt;br /&gt;
| गैंगस्टर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1996]]&lt;br /&gt;
| रिटर्न ऑफ ज्वेल थीफ &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[1998]]&lt;br /&gt;
| मैं सोलह बरस की &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2001]]&lt;br /&gt;
| सेंसर&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2003]]&lt;br /&gt;
| लव एट टाइम्स स्क्वेयर &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[2005]]&lt;br /&gt;
| मि.प्राइम मिनिस्टर &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने के बाद उनका नाम सिमट कर हो गया देवानंद। देव आनंद को अभिनेता के रूप में पहला ब्रेक 1946 में प्रभात स्टूडियो की फिल्म ‘हम एक हैं’ से मिला। लेकिन इस फिल्म के असफल होने से वह दर्शकों के बीच अपनी पहचान नहीं बना सके। इस फिल्म के निर्माण के दौरान प्रभात स्टूडियो में उनकी मुलाकात बाद के मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक गुरूदत्त से हुई जो उन दिनों फिल्मी दुनिया में कोरियोग्राफर के रूप में स्थान बनाने के लिए संघर्षरत थे। वहाँ दोनों की दोस्ती हुई और एक साथ सपने देखते इन दोनों दोस्तों ने आपस में एक वादा किया कि अगर गुरूदत्त फ़िल्म निर्देशक बनेंगे तो वे देव को अभिनेता के रूप में लेंगे और अगर देव निर्माता बनेंगे तो गुरुदत्त को निर्देशक के रूप में लेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म 'जिद्दी' (1948) में अभिऩेत्री कामिनी कौशल के साथ देव आनंद के फिल्मी कॅरियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। जिद्दी ने देव आनंद को नई ऊंचाइयां दिलायी। इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रख दिया। सन् 1949 में उन्होंने 'नवकेतन' बैनर नाम से स्वयं की फिल्म निर्माण संस्था खोल ली और उसके अंतर्गत साल दर साल फिल्में बनाने में सफल हुये। नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी पहली फिल्म अफसर का निर्माण किया जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने बड़े भाई चेतन आनंद को सौंपी। इस फिल्म के लिए उन्होंने उस जमाने की जानी मानी अभिनेत्री सुरैया का चयन किया जबकि अभिनेता के रूप में देव आनंद खुद ही थे। हालाँकि फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई। इसके बाद उनका ध्यान गुरूदत्त को किए गए वायदे की तरफ गया। और सन् 1951 में उन्होंने अपनी अगली फिल्म 'बाजी' के निर्देशन की जिम्मेदारी गुरूदत्त को सौंप दी। फिल्म सुपरहिट हुई और दोनों दोस्तों की किस्मत चमक गई। फ़िल्म बाज़ी की कहानी बलराज साहनी ने लिखी थी। बाजी फिल्म की सफलता के बाद देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री में एक अच्छे अभिनेता के रूप में शुमार होने लगे। देव यहीं से दिलीप कुमार और राजकुमार की क़तार में जा खड़े हुए और इस त्रिमूर्ति ने लंबे समय तक हिंदी फ़िल्मी दुनिया पर राज किया। जाल, राही, आंधियां, (1952), पतिता (1953), व अन्य फिल्मों के साथ स्‌न 1954 में अभिनेत्री कल्पना कार्तिक के साथ आई फिल्म &amp;quot;टैक्सी ड्राईव्हर&amp;quot; बड़ी हीट फिल्म थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद की मुनीम जी (1955), दुश्मन, काला बाज़ार, सी.आई.डी. (1956), पेइंग गेस्ट (1957), गैम्बलर, तेरे घर के सामने, काला पानी, लव एट टाइम्स स्क्वैर, हम नौजवान, देश परदेस, तेरे मेरे सपने, हरे रामा हरे कृष्णा, जॉनी मेरा नाम, ज्वैलथीफ़, हम दोनों (1961), बात एक रात की, असली नकली, माया, रूप की रानी चोरों का राजा, बम्बई का बाबू, लव मैरिज, दुश्मन, टैक्सी ड्राइवर, नौ दो ग्यारह, फंटूश, बाज़ी बेमिसाल, पॉकेटमार, जब प्यार किसी से होता है, हीरा पन्ना, बनारसी बाबू, जोशीला छूपा रुस्तम, शरीफ बदमाश, इश्क इश्क, अमीर गरीब, वारंट, साहेब बहादूर, देश-परदेश, लूटमार, तीन देविंया और गाइड इत्यादि प्रसिध्द फिल्में रही हैं। इसके अलावा भी उन्होने अनेंकों फिल्मों में काम किया और अभी भी वे फिल्म बना रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद और गुरुदत्त==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dev-Anand sig.jpg|देव आनंद का हस्ताक्षर|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
इसके बाद देव आनंद ने गुरूदत्त के निर्देशन में वर्ष 1952 में फिल्म जाल में भी अभिनय किया। इस फिल्म के निर्देशन के बाद गुरूदत्त ने यह फैसला किया कि वह केवल अपनी निर्मित फिल्मों का निर्देशन करेंगे। बाद में देव आनंद ने अपनी निर्मित फिल्मों के निर्देशन की जिम्मेदारी अपने छोटे भाई विजय आनंद को सौंप दी। विजय आनंद ने देव आनंद की कई फिल्मों का निर्देशन किया। इन फिल्मों में कालाबाज़ार, तेरे घर के सामने, गाइड, तेरे मेरे सपने, छुपा रूस्तम प्रमुख हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद प्रख्यात उपन्यासकार आर. के. नारायण से काफी प्रभावित रहा करते थे और उनके उपन्यास गाइड पर फिल्म बनाना चाहते थे। आर. के. नारायणन की स्वीकृति के बाद देव आनंद ने हॉलीवुड के सहयोग से इसी नाम से एक फिल्म बनाई जिसका निर्देशन किया था उनके छोटे भाई विजय आनंद (गोल्डी) ने किया था, जो खुद भी एक अभिनेता थे तथा हिरोईन वहीदा रहमान थी। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में फिल्म गाइड का निर्माण किया जो देव आनंद के सिने कॅरियर की पहली रंगीन फिल्म थी। इस फिल्म ने आलोचकों को बहुत प्रभावित किया। गाइड का प्रदर्शन सन् 1965 में होने के बाद उनका नाम ही पड़ गया राजू गाइड जो युवाओं में बहुत लोकप्रिय हुआ। इस फिल्म के लिए देव आनंद को उनके जबर्दस्त अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया। यह फिल्म अभी भी हिन्दी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ निर्देशित व सम्पादित फिल्मों में से एक मानी जाती है। वर्ष 1970 में फिल्म प्रेम पुजारी के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से नकार दी गई बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद वर्ष 1971 में फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' का भी निर्देशन किया जिसमें 'दम मारो दम' गीत ने धूम मचाई। इस फ़िल्म के कामयाबी के बाद देवानंद को एक बेहतरीन निर्देशक के रूप में स्थापित कर दिया और उन्होंने अपनी कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। इस फ़िल्म के ज़रिए उन्होंने युवा पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम के लिए पुकारा। इन फिल्मों में हीरा पन्ना, देश परदेस, लूटमार, स्वामी दादा, सच्चे का बोलबाला, अव्वल नंबर, लव एट टाइम्स स्क्वैर, मैं सोलह बरस की, गैंगस्टर और हम नौजवान जैसी फिल्में शामिल हैं। देव आनंद ने कई फिल्मों की पटकथा भी लिखी। जिसमें वर्ष 1952 में प्रदर्शित फिल्म आंधियां के अलावा हरे रामा हरे कृष्णा, हम नौजवान, अव्वल नंबर, प्यार का तराना (1993 में), गैंगेस्टर, मैं सोलह बरस की, सेन्सर आदि फिल्में शामिल हैं। इस के अलावा बतौर निर्माता 1998 में मैं सोलह बरस की और 1993 में प्यार का तराना लेकर सामने आऐ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और नई अभिनेत्रियां==&lt;br /&gt;
देवानंद एक समय बाद नई अभिनेत्रियों को पर्दे पर उतारने के लिए मशहूर हो गए। हरे रामा हरे कृष्णा के ज़रिए उन्होंने ज़ीनत अमान की खोज की और टीना मुनीम, नताशा सिन्हा व एकता जैसी अभिनेत्रियों को मैदान में उतारने का श्रेय भी देव साहब को ही जाता है। बाद में जीनत अमान को राज कपूर का साथ मिल गया और ये बात देवानंद को अच्छी नहीं लगी। फिल्म निर्माण में उतरे देवानंद ने कई नई प्रतिभाओं टीना मुनीम से लेकर तब्बू तक का फिल्मी दुनिया से साक्षात्कार कराया। उन्होंने पांच दशकों में सुरैया, गीताबाली, मधुबाला, मीना कुमारी, नूतन, वैजंतीमाला, मुमताज, हेमा मालिनी, वहीदा रहमान से लेकर मधुबाला और जीनत अमान तक सभी उत्कृष्ट नायिकाओं के साथ अभिनय किया और हर अभिनेत्री के साथ उनकी जोड़ी को खूब सराहा गया। आज भी वह नई अभिनेत्रियों की तलाश में हैं और फ़िल्म बनाने का उनका शौक़ जारी है। अभिनेत्री हेमा मालिनी के साथ कई फिल्में की। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाल के सालों में देवानंद अपनी प्रोडक्शन कंपनी 'नवकेतन' के तले कई फिल्में बनाने में व्यस्त हैं। वह लगातार अपने बैनर के तले फिल्में बना रहे हैं जिसके लीड हीरो वह खुद ही होते हैं। नवकेतन बैनर तले उन्होंने हाल के सालों में 'हरे रामा हरे कृष्णा', 'अव्वल नंबर' जैसी सुपरहिट फिल्में दी हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ग्रेगरी पेक से समानता==&lt;br /&gt;
ग्रैगरी पैक के अभिनय से प्रेरित होकर देवानंद फिल्मों में काम करने के उद्देश्य से अपना नगर छोड़कर फिल्म नगरी में आये थे। देवानंद को कई लोग हॉलीवुड के मशहूर अभिनेता ग्रेगरी पेक से भी जोड़ कर देखते हैं। भारतीय दर्शकों को अपने चहेते अभिनेता देवानंद में ग्रेगरी पेक की झलक नज़र आई और वे उनके दीवाने हो गए। देवानंद के बालों का स्टाइल, चलने, बोलने का तरीक़ा सब में ग्रेगरी पेक की झलक मिलती थी। मुंबई फ़िल्म जगत में एक क़िस्सा मशहूर है। अभिनेत्री सुरैया ग्रेगरी पेक की अनन्य प्रशंसक थीं. यहाँ तक कि उनका नाम देवानंद के साथ भी जुड़ने लगा था और लोग कहते थे कि इसकी वजह यही थी कि वह उनमें ग्रेगरी पेक को ढूँढती थीं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद और रोमांस==&lt;br /&gt;
देव आनंद अपनी खास स्टाइल के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने किरदारों में नौजवानों की उमंगों, तरंगों और चंचलता को बहुत ही खूबसूरत अंदाज से पेश किया है। देव आनंद आदर्शवाद और व्यवहारवाद में नहीं उलझते और न ही उन का किरदार प्रेम की नाकामियों से दो-चार होता है। अपनी अदाकाराओं के साथ छेड़खानी, शरारत और फ्लर्ट करने वाला आम नौजवान देव का नायक रहा। देव ने अपने किरदारों में जवानी के हर मौसम का लुत्फ लिया। जवानी के तमाम दबे-कुचले अरमानों को पूरे रस के साथ जिया और नौजवानों के चहेते बन गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कहते हैं बॉलिवुड में अगर कोई असली रोमांटिक हीरो है तो वह हैं सिर्फ देवानंद। ना सिर्फ पर्दे पर बल्कि असल जिंदगी में भी देवानंद की दिल्लगी का कोई सानी नहीं है। नौजवानों के जज़्बात को परदे पर पेश करने वाले खूबसूरत देव हमेशा ही खूबसूरत लडकियों से घिरे रहे। हज़ारों दिलों की धड़कन रहे देव हसीनाओं का सपना बन चुके थे। अभिनेत्रियों के साथ अपने रोमांस को लेकर भी वे चर्चा में रहे। चाहे सुरैया हो या जीनत अमान दोनों के साथ उनके प्रेम के चर्चे खूब आम हुए। खुद देवानंद भी मानते हैं कि सुरैया उनका पहला प्रेम थीं और जीनत को भी वह पसंद करते थे। यही नहीं सुरैया भी देव की दीवानी थी। 1948 में बनी ‘विद्या’ फिल्म की नायिका सुरैया थी। फिल्म अफसर के निर्माण के दौरान देव आनंद का झुकाव फिल्म गायिका-अभिनेत्री सुरैया की ओर हो गया था। इसके सेट पर ही दोनों में प्यार हुआ। एक गाने की शूटिंग के दौरान देव आनंद और सुरैया की नाव पानी में पलट गई जिसमें उन्होंने सुरैया को डूबने से बचाया। इसके बाद सुरैया देव आनंद से बेइंतहा मोहब्बत करने लगीं लेकिन सुरैया की दादी की इजाजत न मिलने पर यह जोड़ी परवान नहीं चढ़ सकी। 1951 तक दोनों ने सात फिल्मों में साथ काम किया। मगर अफसोस दोनों के साथ रहने का ख्वाब पूरा ना हो सका। देव ने अपने टूटे प्यार का इजहार कई बार किया है। बाद के वर्ष 1954 में ‘टैक्सी ड्राइवर’ की हीरोइन मोना याने कल्पना कार्तिक से फिल्म के सेट पर देव आनंद का शादी हो गई। मगर सुरैया ने देव के अलावा किसी और को गवारा ना किया और उनकी याद में आजीवन विवाह नहीं किया। 50 साल बाद देव आनंद ने स्वीकार किया कि उनका दिल हमेशा सुरैया के लिए धड़कता रहता था। वर्ष 2005 में जब सुरैया का निधन हुआ तो देवानंद उन लोगों में से एक थे जो उनके जनाजे के साथ थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देवानंद के जानदार और शानदार अभिनय की बदौलत परदे पर जीवंत आकार लेने वाली प्रेम कहानियों ने लाखों युवाओं के दिलों में प्रेम की लहरें पैदा कीं लेकिन खुद देवानंद इस लिहाज से जिंदगी में काफी परेशानियों से गुजरे। उन्हें सदाबहार अभिनेता कह कर पुकारा गया तो वह भी यों ही नहीं था। उन्होंने जिन अभिनेत्रियों के साथ नायक के रूप में काम किया था कुछ वर्षों पहले तक वे उनकी पोतियों के साथ भी उसी भूमिका में देखे गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद का राजनीतिक और सामाजिक रूप==&lt;br /&gt;
देव आनंद फिल्म जगत के उन गिने चुने लोगों में शामिल हैं जो राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी सक्रिय हैं। सन् 1977 के संसदीय चुनावों के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर इंदिरा गांधी का जमकर विरोध किया। उल्लेखनीय है कि उस समय सिने जगत की अधिकांश हस्तियों ने चुप्पी साध रखी थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का निजी जीवन==&lt;br /&gt;
देवानंद ने कल्पना कार्तिक के साथ शादी की थी लेकिन उनकी शादी अधिक समय तक सफल नहीं हो सकी। दोनों साथ रहे लेकिन बाद में कल्पना ने एकाकी जीवन को गले लगा लिया। अन्य फिल्मी अभिनेताओं की तरह देवानंद ने भी अपने बेटे सुनील आनंद को फिल्मों में स्थापित करने के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन सफल नहीं हो सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुछ वर्ष पहले अपने जन्मदिन के अवसर पर ही उन्होंने 'रोमांसिंग विद लाइफ' नाम से अपनी जीवनी बाज़ार में उतारी थी। आमतौर पर मशहूर हस्तियों की जीवनियों के प्रसंग विवादों का विषय बनते हैं लेकिन उनकी जीवनी हर अर्थ में बेदाग रही बिल्कुल उनके जीवन की तरह।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देव आनंद ने एक बार अपनी निरंतर सक्रियता के बारे में कहा था कि वे सपने देखते हैं और फिर उन्हें पर्दे पर उकेरते हैं बिना हिट या फ्लॉप की परवाह किए। इन अर्थों में वे सच्चे कर्मयोगी हैं। देव आनंद शतायु हों और जिंदादिली बिखेरते रहें यही उनके प्रशंसकों की कामना है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देवानंद का स्टाइल==&lt;br /&gt;
देव आनंद को राजेश खन्ना से भी पहले सिनेमा का पहला चॉकलेटी नायक होने का गौरव मिला। देव आनंद की लोकप्रियता का आलम ये था कि उन्होंने जो भी पहना, जो भी किया वो एक स्टाइल में तब्दील हो गया। फिर चाहे वो उनका बालों पर हाथ फेरने का अंदाज हो या काली कमीज की पहनने का या फिर अपनी अनूठी शैली में जल्दी-जल्दी संवाद बोलने का। मुनीम जी (1955), फंटुश, सीआईडी (1956), पेइंगगेस्ट (1957) ने उन्हे सफलतम स्टायलीस स्टार बना दिया। इनकी झूक कर चलने की अदा, एक स्वांस मे लम्बे डायलाँग बोलना और तिरछे होकर सिर हिलाना उनका ट्रेडमार्क बन गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने दौर के सबसे सफल अभिनेता देवानंद अपने काले कोट की वजह से बहुत सुर्खियों में आए थे। बात उस समय की है जब देवानंद अपने अलग अंदाज और बोलने के तरीके के लिए काफी मशहूर थे। उनके सफेद कमीज और काले कोट के फैशन को तो जनता ने जैसे अपना ही बना लिया था और इसी समय एक ऐसा वाकया भी देखने को मिला जब न्यायालय ने उनके काले कोट को पहन कर घूमने पर पाबंदी लगा दी। वजह थी कुछ लडकियों का उनके काले कोट के प्रति आसक्ति के कारण आत्महत्या कर लेना। दीवानगी में दो-चार लडकियों ने जान दे दी। इससे एक बात साफ थी कि देवानंद का किरदार हो या उनका पहनावा हमेशा सदाबहार ही रहा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==देव आनंद को मिले पुरस्कार==&lt;br /&gt;
देव आनंद, दिलीप कुमार और राज कपूर के 1950 दशक के बड़े स्टार रहे हैं। देव आनंद को अपने अभिनय के लिए दो बार फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। देव आनंद को सबसे पहला फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार वर्ष 1958 में प्रदर्शित फिल्म काला पानी के लिए दिया गया। इसके बाद वर्ष 1965 में भी देव आनंद फिल्म गाइड के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। सन् 1991 में देव आनंद को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। वर्ष 2001 में देव आनंद को भारत सरकार की ओर से कला क्षेत्र (फिल्म जगत में योगदान) में पद्म भूषण सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 2002 में उनके द्वारा हिन्दी सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अभिनेता}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:अभिनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:फ़िल्म निर्माता]][[Category:फ़िल्म निर्देशक]][[Category: कला कोश]] [[Category:पद्म भूषण]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]] [[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]] [[Category:चरित कोश]] [[Category:दादा साहब फाल्के पुरस्कार]] &lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B9&amp;diff=232465</id>
		<title>मिलिन्दपन्ह</title>
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		<updated>2011-11-05T14:38:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*[[बौद्ध धर्म]] के मिलिन्दपन्ह ग्रंथ से ईसा की प्रथम दो शताब्दियों के भारतीय जन-जीवन के विषय में जानकारी मिलती है। &lt;br /&gt;
*इस ग्रंथ में यूनानी नरेश [[मिलिंद (मिनांडर)|मिनेण्डर (मिलिन्द)]] एवं [[बौद्ध]] भिक्षु [[नागसेन]] के बीच बौद्ध मत पर वार्तालाप का वर्णन है।&lt;br /&gt;
==नागसेन==&lt;br /&gt;
{{main|नागसेन}}&lt;br /&gt;
नागसेन के जीवन के बारे में &amp;quot;मिलिन्द प्रश्न&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;'मिलिन्द प्रश्न, अनुवादक भिक्षु जगदीश काश्यप, 1637 ई.&amp;lt;/ref&amp;gt; में जो कुछ मिलता है, उससे इतना ही मालूम होता है, कि हिमालय-पर्वत के पास (पंजाब) में कजंगल गाँव में सोनुत्तर ब्राह्मण के घर में उनका जन्म हुआ था। पिता के घर में ही रहते उन्होंने ब्राह्मणों की विद्या वेद, व्याकरण आदि को पढ़ लिया था। उसके उनका परिचय उस वक्त वत्तनीय (वर्त्तनीय) स्थान में रहते एक विद्वान भिक्षु रोहण से हुआ, जिससे नागसेन बौद्ध-विचारों की ओर झुके। रोहण के शिष्य बन वह उनके साथ विजम्भवस्तु&amp;lt;ref&amp;gt;वर्त्तनीय, कंगजल और शायद विजम्भवस्तु भी स्यालकोट के ज़िले में थे।&amp;lt;/ref&amp;gt; (विजम्भवस्तु) होते हिमालय में रक्षिततल नामक स्थान में गये। वहीं गुरु ने उन्हें उस समय की रीति के अनुसार कंठस्थ किये सारे बौद्ध वाड्मय को पढाया।&lt;br /&gt;
==मिलिन्द (मिनाण्डर)==&lt;br /&gt;
{{main|मिलिन्द}}&lt;br /&gt;
उत्तर-पश्चिम [[भारत]] का 'हिन्दी-यूनानी' राजा 'मनेन्दर' 165-130 ई. पू. लगभग ( भारतीय उल्लेखों के अनुसार 'मिलिन्द') था। वह प्रथम पश्चिमी राजा था जिसने [[बौद्ध धर्म]] अपनाया और बैक्ट्रिया, [[पंजाब]], [[हिमाचल प्रदेश|हिमाचल]], [[जम्मू]] से [[मथुरा]] तक शासन किया । मिनान्डर नामक यवन राजा के भी अनेक सिक्के उत्तर - पश्चिमी भारत में उपलब्ध हुए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिनान्डर की राजधानी शाकल (सियालकोट) थी। भारत में राज्य करते हुए वह [[बौद्ध]] श्रमणों के सम्पर्क में आया और आचार्य [[नागसेन]] से उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। बौद्ध ग्रंथों में उसका नाम 'मिलिन्द' आया है। 'मिलिन्द पञ्हो' नाम के पालि ग्रंथ में उसके [[बौद्ध धर्म]] को स्वीकृत करने का विवरण दिया गया है। मिनान्दर को शास्त्र चर्चा और बहस की बड़ी आदत थी, और साधारण पंडित उसके सामने नहीं टिक सकते थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मिलिन्दपन्ह के दार्शनिक विचार==&lt;br /&gt;
भिक्षुओं ने कहा- &amp;quot;नगसेन! राजा मिलिन्द वाद विवाद में प्रश्न पूछ कर भिक्षु-संघ को तंग करता और नीचा दिखाता है; जाओ तुम उस राजा का दमन करो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नागसेन, संध के आदेश को स्वीकार कर सागल नगर के असंखेय्य नामक परिवेण (=माठ) में पहुँचे। कुछ ही समय पहले वहाँ के बड़े पंडित आयु पाल को मिनान्दर ने चुप कर दिया था। नागसेन के आने की खबर शहर में फैल गई। मिनान्दर ने अपने एक अमात्य देवमंत्री (=जो शायद यूनानी दिमित्री है) से नागसेन से मिलने की इच्छा प्रकट की। स्वीकृति मिलने पर एक दिन &amp;quot;पाँच सौ यवनों के साथ अच्छे रथ पर सवार हो असंखेय्य परिवेण में गया। राजा ने नमस्कार और अभिनंदन के बाद प्रश्न शुरु किये।&amp;quot; इन्ही प्रश्नों के कारण इस ग्रंथ का नाम &amp;quot;मिलिन्द-प्रश्न&amp;quot; पड़ा। यद्यपि उपलभ्य पाली &amp;quot;मिलिन्द पंझ&amp;quot; में छ: परिच्छेद' हैं, किंतु उनमें से पहले के तीन ही पुराने मालूम होते हैं; चीनी भाषा में भी इन्हीं तीन परिच्छेदों का अनुवाद मिलता है। मिनान्द ने पहले दिन मठ में जाकर नागसेन से प्रश्न किये; दूसरे दिन उसने महल में निमंत्रण कर प्रश्न पूछे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने उत्तर में नागसेन ने बुद्ध के दर्शन के अनात्मवाद, कर्म या पुनर्जन्म, नाम-रूप (=मन और भौतिक तत्त्व), निर्वाण आदि को ज्यादा विशद करने का प्रयत्न किया है।&lt;br /&gt;
==अनात्मवाद==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मिनान्दर से पहले बौद्धों के अनात्मवाद की ही परीक्षा करनी चाही। उसने पूछा &amp;lt;ref&amp;gt;मिलिन्द-प्रश्न, 2।9 (अनुवाद, पृष्ठ 30-34)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
===प्रथम संवाद===&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते (स्वामिन)! आप किस नाम से जाने जाते है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नागसेन... नाम से (मुझे) पुकारते हैं? ...किंतु यह केवल व्यवहार के लिए संज्ञा भर है, क्योंकि यथार्थ में ऐसा कोई एक पुरुष (आत्मा) नहीं है।&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! यदि एक पुरुष नहीं है तो कौन आपको वस्त्र... भोजन देता है? कौन उसको भोग करता है? कौन शील (सदाचार) की रक्षा करता है? कौन ध्यान... का अभ्यास करता है? कौन आर्यमार्ग के फल निर्वाण का साक्षात्कार करता है? ...यदि ऐसी बात है तो न पाप है और न पुण्य, न पाप और पुण्य का कोई करने वाला है...  न करने वाला है।... न पाप और पुण्य... के ...फल होते हैं? यदि आपको कोई मार डाले तो किसी का मारना नहीं हुआ।... (फिर) नागसेन क्या है? ...क्या ये केश नागसेन हैं?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं महाराज!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;ये रोयें नागसेन हैं?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं महाराज!&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ये नख, दाँत, चमड़ा, माँस, स्नायु, हड्डी, मज्जा, बुक्क, हृदय, यकृत, क्लोमिक, प्लीहा, फुफ्फुस, आँत, पतली, आँत, पेट, पाखाना, पित्त, कफ, पीव, लोहू, पसीना, मेद, आँसू, चर्बी, राल, नासामल, कर्णमल, मस्तिष्क नागसेन हैं?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं महाराज&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तब क्या आपका रूप (भौतिक तत्त्व) ...वेदना ...संज्ञा... संस्कार या विज्ञान नागसेन हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं महाराज!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;...तो क्या.... रूप... विज्ञान (=पाँचों स्कंध) सभी एक साथ नागसेन हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं महाराज!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;...तो क्या... रूप आदि से भिन्न कोई नागसेन है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं महाराज!&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! मैं आपसे पूछते-पूछते थक गया किंतु नागसेन क्या है। इसका पता नहीं लग सका। तो क्या नागसेन केवल शब्दमात्र है? आखिर नागसेन है कौन?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! ...क्या आप पैदल चल कर यहाँ आये या किसी सवारी पर ?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! ... मैं रथ पर आया।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज!... तो मुझे बतावें कि आपका रथ कहाँ है? क्या हरिस (ईषा) रथ है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या अक्ष रथ है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या चक्के रथ हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते!''&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या रथ का पंजर... रस्सियाँ... लगाम.... चाबुक.... रथ है? &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते!''&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! क्या हरिस आदि सभी एक साथ रथ हैं? &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते!'' &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! क्या हरिस आदि के परे कहीं रथ है?&amp;quot;  &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! मैं आपसे पूछते-पूछते थक गया, किंतु यह पता नहीं लगा कि रथ कहाँ है? क्या रथ केवल एक मात्र है। आखिर यह रथ है क्या? आप झूठ बोलते हैं कि रथ नहीं है! महाराज! सारे जम्बूद्वीप (भारत) के आप सबसे बड़े राजा हैं; भला किससे डरकर आप झूठ बोलते हैं? &lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते नागसेन! मैं झूठ नहीं बोलता। हरिस आदि रथ के अवयवों के आधार पर केवल व्यवहार के लिए 'रथ' ऐसा एक नाम बोला जाता है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! बहुत ठीक, आपने जान लिया कि रथ क्या है। इसी तरह मेरे केश आदि के आधार पर केवल व्यवहार के लिए 'नागसेन' ऐसा एक नाम बोला जाता है। परंतु, परमार्थ में नागसेन कोई एक पुरुष विद्यमान नहीं है। भिक्षुणी वज्रा ने भगवान् के सामने इसीलिए कहा था- &lt;br /&gt;
'जैसे अवयवों के आधार पर 'रथ' संज्ञा होती है, उसी तरह (रूप आदि) स्कंधों के होने से एक सत्त्व (जीव) समझा जाता है।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;संयुत्तनिकाय, 5।10।6 &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
===द्वितीय संवाद===&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! 'जान लेना' विज्ञान की पहिचान है, 'ठीक से समझ लेना' प्रज्ञा की पहिचान है; और 'जीव' ऐसी कोई चीज नहीं है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भंते! यदि जीव कोई चीज ही नहीं है, तो हम लोगों में वह क्या है जो आँख से रूपों को देखता है, कान से शब्दों को सुनता है, नाक से गंधों को सूँघता है, जीभ से स्वादों को चखता है, शरीर से स्पर्श करता है और मन से धर्मों को जानता है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'महाराज! यदि शरीर से भिन्न कोई जीव है जो हम लोगों के भीतर रह आँख से रूप को देखता है, तो आँख निकाल लेने पर बड़े छेद से उसे और भी अच्छी तरह देखना चाहिए। कान काट देने पर बड़े छेद से उसे और भी अच्छी तहर सुनना चाहिए। नाक काट देने पर उसे और भी अच्छी तरह सूँघना चाहिए। जीभ काट देने पर उसे और भी अच्छी तरह स्वाद लेना चाहिए और शरीर को काट देने पर उसे और भी अच्छी तरह स्पर्श करना चाहिए।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते! ऐसी बात नहीं है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! तो हम लोगों के भीतर कोई जीव भी नहीं है।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;वही, 3।4।44 (अनुवाद, पृष्ठ 110)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कर्म या पुनर्जन्म== &lt;br /&gt;
आत्मा के न मानने पर किये गये भले बुरे कर्मों की जिम्मेवारी तथा उसके अनुसार परलोक में दु:ख-सुख भोगना कैसे होगा, मिनान्दर ने इसकी चर्चा चलाते हुए कहा। &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! कौन जन्म ग्रहण करता है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! नाम&amp;lt;ref&amp;gt;Mind.&amp;lt;/ref&amp;gt; (=विज्ञान) और रूप&amp;lt;ref&amp;gt;Matter&amp;lt;/ref&amp;gt;…..|&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या यही नाम-रूप जन्म ग्रहण करता है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! यही नाम और रूप जन्म नहीं ग्रहण करता। मनुष्य इस नाम और रूप से पाप या पुण्य़ करता है, उस कर्म के करने से दूसरा नाम रूप जन्म ग्रहण करता है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
भंते! तब तो पहला नाम और रूप अपने कर्मों से मुक्त हो जाता है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! यदि फिर भी जन्म नहीं ग्रहण करे, तो मुक्त हो गया; किंतु चूँकि वह फिर भी जन्म ग्रहण करता है, इसलिए (मुक्त) नहीं हुआ।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;...उपमा देकर समझावें।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(1) &amp;quot;आम की चोरी&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;वही, 2।2।14 (अनुवाद, पृष्ठ 57-60)&amp;lt;/ref&amp;gt;- कोई आदमी किसी का आम चुरा ले। उसे आम का मालिक पकड़ कर राजा के पास ले जाये- राजन्! इसने मेरा आम चुराया है'। इस पर वह (चोर) ऐसा कहे- 'नहीं', मैंने इसके आमों को नहीं चुराया है। इसने (जो आम लगाया था) वह दूसरा था, और मैंने जो आम लिये वे दूसरे हैं।.... महाराज! अब बतावें कि उसे सजा मिलनी चाहिए या नहीं&amp;quot;, &lt;br /&gt;
&amp;quot;....... सजा मिलनी चाहिए।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;सो क्यों?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! वह ऐसा भले ही कहे, किंतु पहले आम को छोड़ दूसरे ही को चुराने के लिए उसे ज़रूर सजा मिलनी चाहिए।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! इसी तरह इस नाम और रूप से पाप या पुण्य.... करता है। &lt;br /&gt;
उन कर्मों से दूसरा नाम और रूप जन्मता है। इसीलिए वह अपने कर्मों से मुक्त नहीं हुआ।...... &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(2) &amp;quot;आग का प्रवास- महाराज! ...कोई आदमी जाड़े में आग जलाकर तापे और उसे बिना बुझाये छोड़कर चला जाये। वह आग किसी दूसरे आदमी के खेत को जला दे... (पकड़कर राजा के पास ले जाने पर वह आदमी बोले-) 'मैंने इस खेत को नहीं जलाया।.... वह दूसरी ही आग थी, जिसे मैंने जलाया था, और वह दूसरी है जिससे.... खेत जला। मुझे सजा नहीं मिलनी चाहिए।' ......महाराज! उसे सजा मिलनी चाहिए या नहीं!'' &lt;br /&gt;
&amp;quot;... मिलनी चाहिए।.... उसी की जलाई हुई आग ने बढ़ते-बढ़ते खेत को भी जला दिया।.... &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(3) &amp;quot;दीपक से आग लगना- महाराज! कोई आदमी दीया लेकर अपने घर के उपरले छत पर जाये और भोजन करे। वह दीया जलता हुआ कुछ तिनकों में लग जाये। वे तिनके घर को (आग) लगा दें, और वह घर सारे गाँव को लगा दे। गाँव वाले उस आदमी को पकड़कर कहें- 'तुमने गाँव में क्यों आग लगाई?' इस पर वह कहे- मैंने गाँव में आग नहीं लगाई। उस दीये की आग दूसरी ही थी, जिसकी रोशनी में मैंने भोजन किया था, और वह आग दूसरी ही थी, जिसने गाँव जलाया।' इस तरह आपस में झगड़ा करते (यदि) वे आपके पास आवें तो आप किधर फैसला देंगे?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! गाँव वालों की ओर....।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! इसी तरह यद्यपि मृत्यु के साथ एक नाम और रूप का लय होता है और जन्म के साथ दूसरा नाम और रूप उठ खड़ा होता है, किंतु यह भी उसी से होता है। इसलिए वह अपने कर्मों से मुक्त नहीं हुआ।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(ग)- विवाहित कन्या- महाराज! कोई आदमी..... रुपया दे एक छोटी सी लड़की से विवाह कर, कहीं दूर चला जाये। कुछ दिनों के बाद वह बढ़कर जवान हो जाये। तब कोई दूसरा आदमी रुपया देकर उससे विवाह कर ले। इसके बाद पहला आदमी आकर कहे- 'तुमने मेरी स्त्री को क्यों निकाल लिया? इस पर वह ऐसा जवाब दे- मैंने तुम्हारी स्त्री को क्यों निकाला। वह छोटी लड़की दूसरी ही थी, जिसके साथ तुमने विवाह किया था और जिसके लिए रुपये दिये थे। यह सयानी, जवान औरत दूसरी ही है जिसके साथ मैंने विवाह किया है और जिसके लिए रुपये दिये हैं। अब यदि दोनों इस तरह झगड़ते हुए आपके पास आवें तो आप किधर फैसला देंगे? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;.... पहले आदमी की ओर।......(क्योंकि) वही लड़की तो बढ़कर सयानी हुई।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(घ)&amp;lt;ref&amp;gt;वही, 2।2।9 (अनुवाद, पृ.49)&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;quot;भंते! जो उत्पन्न है, वह वही व्यक्ति है या दूसरा?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;न वही और न दूसरा ही।.... (1) जब आप बच्चे थे और खाट पर चित्त ही लेट सकते थे, क्या आप अब इतने बड़े होकर भी वही हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते! अब मैं दूसरा हो गया हूँ।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! यदि आप वही बच्चा नहीं हैं, तो अब आपकी कोई माँ भी नहीं है, कोई पिता भी नहीं है, कोई गुरु भी नहीं।.... क्योंकि तब तो गर्भ की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं की भी भिन्न-भिन्न माताएँ होयेंगे। बड़े होने पर माता भी भिन्न हो जायेगी। शिल्प सीखने वाला (विद्यार्थी) दूसरा और सीखकर तैयार (हो जाने पर)....दूसरा होगा। अपराध करने वाला दूसरा होगा और (उसके लिए) हाथ-पैर किसी दूसरे का काटा जायेगा।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते!.... आप इससे क्या दिखाना चाहते हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! मैं बचपन में दूसरा था और इस समय बड़ा होकर दूसरा हो गया हूँ; किंतु वह सभी भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ इस शरीर पर ही घटने से एक ही में ले ली जाती&lt;br /&gt;
हैं।....... &lt;br /&gt;
(2) यदि कोई आदमी दीया जलावे, तो वह रात भर जलता रहेगा न ?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;.......रात भर जलता रहेगा।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! रात के पहले पहर में जो दीये की टेम थी। क्या वही दूसरे या तीसरे पहर में भी बनी रहती है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं, भंते!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! तो क्या वह दीया पहले पहर में दूसरा, दूसरे और तीसरे पहर में और हो जाता है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते! वही दीया सारी रात जलता रहता है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! ठीक इसी तरह किसी वस्तु के अस्तित्व के सिलसिले में एक अवस्था उत्पन्न होती है, एक लय होती है- और इस तरह प्रवाह जारी रहता है। एक प्रवाह की दो अवस्थाओं में एक क्षण का भी अंतर नहीं होता; क्योंकि एक के लय होते ही दूसरी उत्पन्न हो जाती है। इसी कारण न (वह) वही जीव है और न दूसरा ही हो जाता है। एक जन्म के अंतिम विज्ञान (=चेतना) के लय होते ही दूसरे जन्म का प्रथम विज्ञान उठ खड़ा होता है। &lt;br /&gt;
(ड)&amp;lt;ref&amp;gt;वही&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;quot;भंते! जब एक नाम-रूप से अच्छे या बुरे कर्म किये जाते हैं, तो वे कर्म कहाँ ठहरते हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! कभी भी पीछा नहीं छोड़ने वाली छाया की भाँति वे कर्म उसका पीछा करते हैं।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! क्या वे कर्म दिखाये जा सकते हैं, (कि) वह यहाँ ठहरे हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! वे इस तरह नहीं दिखाये जा सकते।..... क्या कोई वृक्ष के उन फलों को दिखा सकता है जो अभी लगे ही नहीं....? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(3) नाम और रूप- बुद्ध ने विश्व के मूल तत्त्व को विज्ञान (=नाम) और भौतिक तत्त्व (=रूप) में बाँटा है, इनके बारे में मिनान्दर ने पूछा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! ....नाम क्या चीज है और रूप क्या चीज?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! जितनी स्थूल चीजें हैं, सभी रूप हैं, और जितने सूक्ष्म मानसिक धर्म हैं, सभी नाम हैं।..... दोनों एक दूसरे के आश्रित हैं, एक दूसरे के बिना ठहर नहीं सकते। दोनों सदा साथ ही होते हैं। .......यदि मुर्गी के पेट में (बीज रूप में) बच्चा नहीं हो तो अंडा भी नहीं हो सकता; क्योंकि बच्चा और अंडा दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं। दोनों एक ही साथ होते हैं। यह (सदा से).... होता चला आया है।......&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(4) निर्वाण- मिनान्दर ने निर्वाण के बारे में पूछते हुए कहा&amp;lt;ref&amp;gt;वही, 3।1।6(अनुवाद, पृ. 85)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! क्या निरोध हो जाना ही निर्वाण है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;हाँ, महाराज! निरोध (=बन्द) हो जाना ही निर्वाण है।.... सभी....अज्ञानी.... विषयों के उपभोग में लगे रहते हैं, उसी में आनन्द लेते हैं, उसी में डूबे रहते हैं। वे उसी की धारा में पड़े रहते हैं, बार-बार जन्म लेते, बूढ़े होते, मरते, शोक करते, रोते-पीटते, दुःख, बेचैनी और परेशानी से नहीं छूटते। (वह) दुःख ही दुःख में पड़े रहते हैं। महाराज! किंतु ज्ञानी....विषयों के भोग (=उपादान) में नहीं लगे रहते। इससे उनकी तृष्णा का निरोध हो जाता है। उपादान के निरोध से भव (=आवागमन) का निरोध हो जाता है। भव के निरोध से जन्मना बन्द हो जाता है।.... (फिर) बूढ़ा होना, मरना...सभी दुःख बन्द (=निरुद्ध) हो जाते हैं। महाराज! इस तरह निरोध हो जाना ही निर्वाण है।.... &lt;br /&gt;
&amp;lt;ref&amp;gt;वही, 3।2।18 (अनुवाद, पृ. 91)&amp;lt;/ref&amp;gt; .....(बुद्ध) कहाँ हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! भगवान् परम निर्वाण को प्राप्त हो गये हैं, जिसके बाद उनके व्यक्तित्व को बनाये रखने के लिए कुछ भी नहीं रह जाता......।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! उपमा देकर समझावें।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! क्या होकर-बुझ-गई जलती आग की लपट दिखाई जा सकती है.......? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते! वह लपट तो बुझ गई।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नागसेन ने अपने प्रश्नोत्तरों से बुद्ध के दर्शन में कोई बात नहीं जोड़ी, किंतु उन्होंने उसे कितना साफ किया यह ऊपर के उद्धरणों से स्पष्ट है। यहाँ हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए, कि नागसेन का अपना जन्म हिन्दी यूनानी साम्राज्य और सभ्यता के केन्द्र स्यालकोट (=सागल) के पास हुआ था, और भारतीय ज्ञान के साथ-साथ यूनानी ज्ञान का भी परिचय रखने के कारण ही वह मिनान्दर जैसे तार्किक का समाधान कर सके थे। मिनान्दर और नागसेन का यह संवाद इतिहास की उस विस्तृत घटना का एक नमूना है, जिसमें कि हिन्दी और यूनानी प्रतिभाएँ मिलकर भारत में नई विचार-धाराओं का आरम्भ कर रही थीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{बौद्ध साहित्य}}&lt;br /&gt;
{{बौद्ध धर्म}}&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध_धर्म]][[Category:साहित्य_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध साहित्य]]&lt;br /&gt;
[[Category:बौद्ध धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6&amp;diff=232456</id>
		<title>मिलिन्द</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6&amp;diff=232456"/>
		<updated>2011-11-05T14:06:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{fast}}&lt;br /&gt;
'''मिलिन्द या मनेन्दर'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Menander-Coin.jpg|thumb|250px|मिलिंद (मिनांडर) का सिक्का]]&lt;br /&gt;
*उत्तर-पश्चिम [[भारत]] का 'हिन्दी-यूनानी' राजा 'मनेन्दर' 165-130 ई. पू. लगभग (भारतीय उल्लेखों के अनुसार 'मिलिन्द') था। &lt;br /&gt;
*प्रथम पश्चिमी राजा जिसने [[बौद्ध धर्म]] अपनाया और [[मथुरा]] पर शासन किया। &lt;br /&gt;
*राज्य की सीमा- बैक्ट्रिया, [[पंजाब]], [[हिमाचल प्रदेश|हिमाचल]], [[जम्मू]] से [[मथुरा]]।&lt;br /&gt;
*[[डेमेट्रियस]] के समान मिनान्डर नामक यवन राजा के भी अनेक सिक्के उत्तर - पश्चिमी भारत में उपलब्ध हुए हैं। &lt;br /&gt;
*मिनान्डर की राजधानी शाकल (सियालकोट) थी। &lt;br /&gt;
*भारत में राज्य करते हुए वह [[बौद्ध]] श्रमणों के सम्पर्क में आया और आचार्य [[नागसेन]] से उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। &lt;br /&gt;
*मिनान्दर (=मिलिन्द) का राज्य यमुना से आमू (वक्षु) दरिया तक फैला हुआ था। यद्यपि उसकी एक राजधानी बलख (वाहलीक) भी थी, किंतु हमारी इस परंपरा के अनुसार मालूम होता है, मुख्य राजधानी सागल (=स्यालकोट) नगरी थी। प्लूतार्क ने लिखा है कि- मिनान्दर बड़ा न्यायी, विद्वान और जनप्रिय राजा था। उसकी मृत्यु के बाद उसकी हड्डियों पर बड़े-बड़े स्तूप बनवाये। मिनान्दर को शास्त्र चर्चा और बहस की बड़ी आदत थी, और साधारण पंडित उसके सामने नहीं टिक सकते थे।&lt;br /&gt;
*बौद्ध ग्रंथों में उसका नाम 'मिलिन्द' आया है। &lt;br /&gt;
*'मिलिन्द पञ्हो' नाम के पालि ग्रंथ में उसके [[बौद्ध धर्म]] को स्वीकृत करने का विवरण दिया गया है। &lt;br /&gt;
*मिनान्डर के अनेक सिक्कों पर बौद्ध धर्म के 'धर्मचक्र' प्रवर्तन का चिह्न 'धर्मचक्र' बना हुआ है, और उसने अपने नाम के साथ 'ध्रमिक' (धार्मिक) विशेषण दिया है। &lt;br /&gt;
*यूनानी लेखक स्ट्रैबो के लेखों से सूचित होता है, कि डेमेट्रियस के भारत आक्रमण में मिनान्डर उसका सहयोगी था। &lt;br /&gt;
*स्ट्रैबो के अनुसार इन विजयों का लाभ कुछ मिनान्डर ने और कुछ युथिडिमास के पुत्र डेमेट्रियस ने प्राप्त किया। इससे अनेक इतिहासकारों ने यह परिणाम निकाला है, कि मिनान्डर और डेमेट्रियस ने एक ही समय में सम्मिलित रूप से भारत पर आक्रमण किया था, और मिनान्डर डेमेट्रियस का ही सेनापति था। &lt;br /&gt;
*श्री टार्न इस मत के प्रमुख प्रतिपादकों में हैं। बाद में मिनान्डर ने भी अपना पृथक व स्वतंत्र राज्य स्थापित किया।&lt;br /&gt;
*इण्डो-यूनानी शासकों में [[डेमेट्रियस]] कुल मेनांडर निःसंदेह सबसे योग्य शासक था। बौद्ध साहित्य 'मिलिन्दपन्हो' में इसे मिलिन्द के नाम से जाना जाता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Menandros-Coin.jpg|thumb|250px|मिलिंद (मिनांडर) का सिक्का]]&lt;br /&gt;
*मिलन्दपन्हो में मेनांडर एवं बौद्ध भिक्षु [[नागसेन]] के मध्य सम्पन्न वाद-विवाद, एवं जिसके परिणामस्वरूप मेनाडर एवं बौद्ध भिक्षु स्वीकार, किया, की कथा का वर्णन है। &lt;br /&gt;
*मेनांडर ने भारत में अपनी सीमाओं के विस्तार के साथ प्रशासन को स्थायित्व प्रदान किया। सम्भवतः मेनांडर का अधिकार स्कात घाटी, हज़ारज़िला एवं [[पंजाब]] में [[रावी नदी]] तक था। *स्ट्रैबो के वर्णन के अनुसार यूनानियों ने गंगाघाटी तथा [[पाटिलिपुत्र]] तक आक्रमण किया। &lt;br /&gt;
*महाभाष्य के वर्णन के आधार पर माना जा सकता है कि यूनानियों ने [[अवध]] के [[साकेत]], [[राजस्थान]] में [[चित्तौड़]] के समीप स्थित 'माध्यमिका' पर अधिकार करने का प्रयत्न किया। &lt;br /&gt;
*मेनांडर के सिक्के हमें उत्तर में [[काबुल]] तक एवं [[दिल्ली]] से [[मथुरा]] तक मिले हैं। &lt;br /&gt;
*पेरीप्लस के अनुसार मेनांडर के सिक्के भड़ौच के बाज़ारों में खूब प्रचलित थे। उसकी कतिपय कांस्य मुद्राओं पर धर्म चक्र प्रतीक 'महरजत' धमिकस प्रचलित थे। मैनण्डरस विरुद मिलता है।&lt;br /&gt;
*'मिलिन्दपन्हों' के उल्लेख के अनुसार साकेत मिनांडर की राजधानी थी। &lt;br /&gt;
*साकल तत्कालीन शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र था, साथ ही सम्पन्नता में यह पाटिलपुत्र के समकक्ष था। &lt;br /&gt;
*मिनेण्डर की कांस्यमुद्राओं पर धर्मचक्र का चिन्ह मिलता है। &lt;br /&gt;
*पेरीप्लस के अनुसार मेनाण्डर के सिक्के भड़ौच में चलते थे। [[मथुरा]] से उसके तथा उसके पुत्र स्टेटो के सिक्के मिले हैं।&lt;br /&gt;
*कालान्तर में मध्य एशिया के खानाबदोश कबीलों ने, जिनमें 'सीथियन' लोग भी थे, [[बैक्ट्रिया]] पर धावा बोल दिया। &lt;br /&gt;
*चीनी सम्राट शी-हुआंग-ती द्वारा तीसरी शताब्दी ई.पू. [[चीन]] की विशाल दीवार बना देने के कारण कबीलों को पश्चिम में बढ़ने के लिए बाध्य होना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप सीथियनों को विस्थापित होकर [[भारत]] के इण्डो-ग्रीक भागों पर आक्रमण करना पड़ा। &lt;br /&gt;
*सीथियनों को ही भारतीय ग्रंथों में [[शक]] नाम से जाना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{यवन शासक}}&lt;br /&gt;
{{प्राचीन विदेशी शासक}}&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:शक एवं कुषाण काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:विदेशी आक्रमणकारी]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>मिलिन्दपन्ह</title>
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		<updated>2011-11-05T13:48:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*[[बौद्ध धर्म]] के मिलिन्दपन्ह ग्रंथ से ईसा की प्रथम दो शताब्दियों के भारतीय जन-जीवन के विषय में जानकारी मिलती है। &lt;br /&gt;
*इस ग्रंथ में यूनानी नरेश [[मिलिंद (मिनांडर)|मिनेण्डर (मिलिन्द)]] एवं [[बौद्ध]] भिक्षु नागसेन के बीच बौद्ध मत पर वार्तालाप का वर्णन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नागसेन के जीवन के बारे में &amp;quot;मिलिन्द प्रश्न&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;'मिलिन्द प्रश्न, अनुवादक भिक्षु जगदीश काश्यप, 1637 ई.&amp;lt;/ref&amp;gt; में जो कुछ मिलता है, उससे इतना ही मालूम होता है, कि हिमालय-पर्वत के पास (पंजाब) में कजंगल गाँव में सोनुत्तर ब्राह्मण के घर में उनका जन्म हुआ था। पिता के घर में ही रहते उन्होंने ब्राह्मणों की विद्या वेद, व्याकरण आदि को पढ़ लिया था। उसके उनका परिचय उस वक्त वत्तनीय (=वर्त्तनीय) स्थान में रहते एक विद्वान भिक्षु रोहण से हुआ, जिससे नागसेन बौद्ध-विचारों की ओर झुके। रोहण के शिष्य बन वह उनके साथ विजम्भवस्तु &amp;lt;ref&amp;gt;वर्त्तनीय, कंगजल और शायद विजम्भवस्तु भी स्यालकोट के ज़िले में थे।&amp;lt;/ref&amp;gt; (=विजम्भवस्तु) होते हिमालय में रक्षिततल नामक स्थान में गये। वहीं गुरु ने उन्हें उस समय की रीति के अनुसार कंठस्थ किये सारे बौद्ध वाड्मय को पढाया। और पढ़ने की इच्छा से गुरु की आज्ञा के अनुसारवह एक बार फिर पैदल चलते वर्त्तनीय में एक प्रख्यात विद्वान अश्वगुप्त के पास पहुँचे। अश्वगुप्त अभी इस नये विद्यार्थी की विद्या-बुद्धि की परख कर ही रहे थे, कि एक दिन किसी गृहस्थ के घर भोजन के उपरांत कायदे के अनुसार दिया जाने वाला धर्मोपदेश नागसेन के जिम्मे पड़ा। नागसेन की प्रतिभा उससे खुल गई और अश्वगुप्त ने इस प्रतिभाशाली तरुण को और योग्य हाथों में सौंपनें के लिए पटना (=पाटलिपुत्र) के अशोका राम बिहार में वास वाले आचार्य धर्मरक्षित के पास भेज दिया। सौ योजन पर अवस्थित पटना पैदल जाना आसान काम न था, किंतु अब भिक्षु बराबर आते-आते रहते थे, व्यापारियों का सार्थ (=कारवाँ) भी एक-न-एक चलता ही रहता था। नागसेन को एक ऐसा ही कारवाँ मिल गया जिसके स्वामी ने बड़ी खुशी से इस तरुण विद्वान को खिलाते-पिलाते साथ ले चलना स्वीकार किया।&lt;br /&gt;
अशोका राम में आचार्य धर्मरक्षित के पास रहकर उन्होंने बौद्ध तत्त्व-ज्ञान और पिटक का पूर्णतया अध्ययन किया। इसी बीच उन्हें पंजाब से बुलौवा आया और वह एक बार फिर रक्षिततल पर पहुँचे।&lt;br /&gt;
मिनान्दर (=मिलिन्द) का राज्य यमुना से आमू (वक्षु) दरिया तक फैला हुआ था। यद्यपि उसकी एक राजधानी बलख (वाहलीक) भी थी, किंतु हमारी इस परंपरा के अनुसार मालूम होता है, मुख्य राजधानी सागल (=स्यालकोट) नगरी थी। प्लूतार्क ने लिखा है कि- मिनान्दर बड़ा न्यायी, विद्वान और जनप्रिय राजा था। उसकी मृत्यु के बाद उसकी हड्डियों पर बड़े-बड़े स्तूप बनवाये। मिनान्दर को शास्त्र चर्चा और बहस की बड़ी आदत थी, और साधारण पंडित उसके सामने नहीं टिक सकते थे। भिक्षुओं ने कहा- 'नगसेन! राजा मिलिन्द वाद विवाद में प्रश्न पूछ कर भिक्षु-संघ को तंग करता और नीचा दिखाता है; जाओ तुम उस राजा का दमन करो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
नागसेन, संध के आदेश को स्वीकार कर सागल नगर के असंखेय्य नामक परिवेण (=माठ) में पहुँचे। कुछ ही समय पहले वहाँ के बड़े पंडित आयु पाल को मिनान्दर ने चुप कर दिया था। नागसेन के आने की खबर शहर में फैल गई। मिनान्दर ने अपने एक अमात्य देवमंत्री (=जो शायद यूनानी दिमित्री है) से नागसेन से मिलने की इच्छा प्रकट की। स्वीकृति मिलने पर एक दिन &amp;quot;पाँच सौ यवनों के साथ अच्छे रथ पर सवार हो असंखेय्य परिवेण में गया। राजा ने नमस्कार और अभिनंदन के बाद प्रश्न शुरु किये।&amp;quot; इन्ही प्रश्नों के कारण इस ग्रंथ का नाम &amp;quot;मिलिन्द-प्रश्न&amp;quot; पड़ा। यद्यपि उपलभ्य पाली &amp;quot;मिलिन्द पंझ&amp;quot; में छ: परिच्छेद' हैं, किंतु उनमें से पहले के तीन ही पुराने मालूम होते हैं; चीनी भाषा में भी इन्हीं तीन परिच्छेदों का अनुवाद मिलता है। मिनान्द ने पहले दिन मठ में जाकर नागसेन से प्रश्न किये; दूसरे दिन उसने महल में निमंत्रण कर प्रश्न पूछे।&lt;br /&gt;
==दार्शनिक विचार==&lt;br /&gt;
अपने उत्तर में नागसेन ने बुद्ध के दर्शन के अनात्मवाद, कर्म या पुनर्जन्म, नाम-रूप (=मन और भौतिक तत्त्व), निर्वाण आदि को ज्यादा विशद करने का प्रयत्न किया है।&lt;br /&gt;
(1). अनात्मवाद- मिनान्द से पहले बौद्धों के अनात्मवाद की ही परीक्षा करनी चाही। उसने पूछा &amp;lt;ref&amp;gt;मिलिन्द-प्रश्न, 2।9 (अनुवाद, पृष्ठ 30-34)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
(क) &amp;quot;भंते (स्वामिन)! आप किस नाम से जाने जाते है?&amp;quot; &amp;quot;नागसेन..... नाम से (मुझे) पुकारते हैं? .....किंतु यह केवल व्यवहार के लिए संज्ञा भर है, क्योंकि यरथार्थ में ऐसा कोई एक पुरुष (=आत्मा) नहीं है।&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! यदि एक पुरुष नहीं है तो कौन आपको वस्त्र..... भोजन देता है? कौन उसको भोग करता है? कौन शील (=सदाचार) की रक्षा करता है? कौन ध्यान........ का अभ्यास करता है? कौन आर्यमार्ग के फल निर्वाण का साक्षात्कार करता है? ......यदि ऐसी बात है तो न पाप है और न पुण्य, न पाप और पुण्य का कोई करने वाला है..  न करने वाला है।... न पाप और पुण्य.... के ...फल होते हैं? यदि आपको कोई मार डाले तो किसी का मारना नहीं हुआ।.... (फिर) नागसेन क्या है? ......क्या ये केश नागसेन हैं?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं महाराज!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;ये रोयें नागसेन हैं?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं महाराज!&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;ये नख, दाँत, चमड़ा, माँस, स्नायु, हड्डी, मज्जा, बुक्क, हृदय, यकृत, क्लोमिक, प्लीहा, फुफ्फुस, आँत, पतली, आँत, पेट, पाखाना, पित्त, कफ, पीव, लोहू, पसीना, मेद, आँसू, चर्बी, राल, नासामल, कर्णमल, मस्तिष्क नागसेन हैं?&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं महाराज&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;तब क्या आपका रूप (=भौतिक तत्त्व) ....वेदना ...संज्ञा... संस्कार या विज्ञान नागसेन हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं महाराज!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;...तो क्या.... रूप... विज्ञान (=पाँचों स्कंध) सभी एक साथ नागसेन हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं महाराज!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;....तो क्या.... रूप आदि से भिन्न कोई नागसेन है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं महाराज!&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! मैं आपसे पूछते-पूछते थक गया किंतु नागसेन क्या है। इसका पता नहीं लग सका। तो क्या नागसेन केवल शब्दमात्र है? आखिर नागसेन है कौन?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! ...क्या आप पैदल चल कर यहाँ आये या किसी सवारी पर ?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! .... मैं रथ पर आया।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज!.... तो मुझे बतावें कि आपका रथ कहाँ है? क्या हरिस (=ईषा) रथ है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या अक्ष रथ है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या चक्के रथ हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते!''&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या रथ का पंजर... रस्सियाँ... लगाम.... चाबुक.... रथ है? &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते!''&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! क्या हरीस आदि सभी एक साथ रथ हैं? &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते!'' &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! क्या हरीस आदि के परे कहीं रथ है?&amp;quot;  &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! मैं आपसे पूछते-पूछते थक गया, किंतु यह पता नहीं लगा कि रथ कहाँ है? क्या रथ केवल एक मात्र है। आखिर यह रथ है क्या? आप झूठ बोलते हैं कि रथ नहीं है! महाराज! सारे जम्बूद्वीप (=भारत) के आप सबसे बड़े राजा हैं; भला किससे डरकर आप झूठ बोलते हैं? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते नागसेन! मैं झूठ नहीं बोलता। हरीस आदि रथ के अवयवों के आधार पर केवल व्यवहार के लिए 'रथ' ऐसा एक नाम बोला जाता है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! बहुत ठीक, आपने जान लिया कि रथ क्या है। इसी तरह मेरे केश आदि के आधार पर केवल व्यवहार के लिए 'नागसेन' ऐसा एक नाम बोला जाता है। परंतु, परमार्थ में नागसेन कोई एक पुरुष विद्यमान नहीं है। भिक्षुणी वज्रा ने भगवान् के सामने इसीलिए कहा था- &lt;br /&gt;
'जैसे अवयवों के आधार पर 'रथ' संज्ञा होती है, उसी तरह (रूप आदि) स्कंधों के होने से एक सत्त्व (=जीव) समझा जाता है।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;संयुत्तनिकाय, 5।10।6 &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(ख) &amp;quot;महाराज! 'जान लेना' विज्ञान की पहिचान है, 'ठीक से समझ लेना' प्रज्ञा की पहिचान है; और 'जीव' ऐसी कोई चीज नहीं है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
भंते! यदि जीव कोई चीज ही नहीं है, तो हम लोगों में वह क्या है जो आँख से रूपों को देखता है, कान से शब्दों को सुनता है, नाक से गंधों को सूँघता है, जीभ से स्वादों को चखता है, शरीर से स्पर्श करता है और मन से धर्मों को जानता है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'महाराज! यदि शरीर से भिन्न कोई जीव है जो हम लोगों के भीतर रह आँख से रूप को देखता है, तो आँख निकाल लेने पर बड़े छेद से उसे और भी अच्छी तरह देखना चाहिए। कान काट देने पर बड़े छेद से उसे और भी अच्छी तहर सुनना चाहिए। नाक काट देने पर उसे और भी अच्छी तरह सूँघना चाहिए। जीभ काट देने पर उसे और भी अच्छी तरह स्वाद लेना चाहिए और शरीर को काट देने पर उसे और भी अच्छी तरह स्पर्श करना चाहिए।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते! ऐसी बात नहीं है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! तो हम लोगों के भीतर कोई जीव भी नहीं है।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;वही, 3।4।44 (अनुवाद, पृष्ठ 110)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(2) कर्म या पुनर्जन्म- आत्मा के न मानने पर किये गये भले बुरे कर्मों की जिम्मेवारी तथा उसके अनुसार परलोक में दु:ख-सुख भोगना कैसे होगा, मिनान्दर ने इसकी चर्चा चलाते हुए कहा। &lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! कौन जन्म ग्रहण करता है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! नाम&amp;lt;ref&amp;gt;Mind.&amp;lt;/ref&amp;gt; (=विज्ञान) और रूप&amp;lt;ref&amp;gt;Matter&amp;lt;/ref&amp;gt;…..|&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या यही नाम-रूप जन्म ग्रहण करता है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! यही नाम और रूप जन्म नहीं ग्रहण करता। मनुष्य इस नाम और रूप से पाप या पुण्य़ करता है, उस कर्म के करने से दूसरा नाम रूप जन्म ग्रहण करता है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
भंते! तब तो पहला नाम और रूप अपने कर्मों से मुक्त हो जाता है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! यदि फिर भी जन्म नहीं ग्रहण करे, तो मुक्त हो गया; किंतु चूँकि वह फिर भी जन्म ग्रहण करता है, इसलिए (मुक्त) नहीं हुआ।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;....उपमा देकर समझावें।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(1) &amp;quot;आम की चोरी&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;वही, 2।2।14 (अनुवाद, पृष्ठ 57-60)&amp;lt;/ref&amp;gt;- कोई आदमी किसी का आम चुरा ले। उसे आम का मालिक पकड़ कर राजा के पास ले जाये- राजन्! इसने मेरा आम चुराया है'। इस पर वह (चोर) ऐसा कहे- 'नहीं', मैंने इसके आमों को नहीं चुराया है। इसने (जो आम लगाया था) वह दूसरा था, और मैंने जो आम लिये वे दूसरे हैं।.... महाराज! अब बतावें कि उसे सजा मिलनी चाहिए या नहीं&amp;quot;, &lt;br /&gt;
&amp;quot;....... सजा मिलनी चाहिए।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;सो क्यों?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! वह ऐसा भले ही कहे, किंतु पहले आम को छोड़ दूसरे ही को चुराने के लिए उसे ज़रूर सजा मिलनी चाहिए।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! इसी तरह इस नाम और रूप से पाप या पुण्य.... करता है। &lt;br /&gt;
उन कर्मों से दूसरा नाम और रूप जन्मता है। इसीलिए वह अपने कर्मों से मुक्त नहीं हुआ।...... &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(2) &amp;quot;आग का प्रवास- महाराज! ...कोई आदमी जाड़े में आग जलाकर तापे और उसे बिना बुझाये छोड़कर चला जाये। वह आग किसी दूसरे आदमी के खेत को जला दे... (पकड़कर राजा के पास ले जाने पर वह आदमी बोले-) 'मैंने इस खेत को नहीं जलाया।.... वह दूसरी ही आग थी, जिसे मैंने जलाया था, और वह दूसरी है जिससे.... खेत जला। मुझे सजा नहीं मिलनी चाहिए।' ......महाराज! उसे सजा मिलनी चाहिए या नहीं!'' &lt;br /&gt;
&amp;quot;... मिलनी चाहिए।.... उसी की जलाई हुई आग ने बढ़ते-बढ़ते खेत को भी जला दिया।.... &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(3) &amp;quot;दीपक से आग लगना- महाराज! कोई आदमी दीया लेकर अपने घर के उपरले छत पर जाये और भोजन करे। वह दीया जलता हुआ कुछ तिनकों में लग जाये। वे तिनके घर को (आग) लगा दें, और वह घर सारे गाँव को लगा दे। गाँव वाले उस आदमी को पकड़कर कहें- 'तुमने गाँव में क्यों आग लगाई?' इस पर वह कहे- मैंने गाँव में आग नहीं लगाई। उस दीये की आग दूसरी ही थी, जिसकी रोशनी में मैंने भोजन किया था, और वह आग दूसरी ही थी, जिसने गाँव जलाया।' इस तरह आपस में झगड़ा करते (यदि) वे आपके पास आवें तो आप किधर फैसला देंगे?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! गाँव वालों की ओर....।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! इसी तरह यद्यपि मृत्यु के साथ एक नाम और रूप का लय होता है और जन्म के साथ दूसरा नाम और रूप उठ खड़ा होता है, किंतु यह भी उसी से होता है। इसलिए वह अपने कर्मों से मुक्त नहीं हुआ।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(ग)- विवाहित कन्या- महाराज! कोई आदमी..... रुपया दे एक छोटी सी लड़की से विवाह कर, कहीं दूर चला जाये। कुछ दिनों के बाद वह बढ़कर जवान हो जाये। तब कोई दूसरा आदमी रुपया देकर उससे विवाह कर ले। इसके बाद पहला आदमी आकर कहे- 'तुमने मेरी स्त्री को क्यों निकाल लिया? इस पर वह ऐसा जवाब दे- मैंने तुम्हारी स्त्री को क्यों निकाला। वह छोटी लड़की दूसरी ही थी, जिसके साथ तुमने विवाह किया था और जिसके लिए रुपये दिये थे। यह सयानी, जवान औरत दूसरी ही है जिसके साथ मैंने विवाह किया है और जिसके लिए रुपये दिये हैं। अब यदि दोनों इस तरह झगड़ते हुए आपके पास आवें तो आप किधर फैसला देंगे? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;.... पहले आदमी की ओर।......(क्योंकि) वही लड़की तो बढ़कर सयानी हुई।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(घ)&amp;lt;ref&amp;gt;वही, 2।2।9 (अनुवाद, पृ.49)&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;quot;भंते! जो उत्पन्न है, वह वही व्यक्ति है या दूसरा?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;न वही और न दूसरा ही।.... (1) जब आप बच्चे थे और खाट पर चित्त ही लेट सकते थे, क्या आप अब इतने बड़े होकर भी वही हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते! अब मैं दूसरा हो गया हूँ।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! यदि आप वही बच्चा नहीं हैं, तो अब आपकी कोई माँ भी नहीं है, कोई पिता भी नहीं है, कोई गुरु भी नहीं।.... क्योंकि तब तो गर्भ की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं की भी भिन्न-भिन्न माताएँ होयेंगे। बड़े होने पर माता भी भिन्न हो जायेगी। शिल्प सीखने वाला (विद्यार्थी) दूसरा और सीखकर तैयार (हो जाने पर)....दूसरा होगा। अपराध करने वाला दूसरा होगा और (उसके लिए) हाथ-पैर किसी दूसरे का काटा जायेगा।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते!.... आप इससे क्या दिखाना चाहते हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! मैं बचपन में दूसरा था और इस समय बड़ा होकर दूसरा हो गया हूँ; किंतु वह सभी भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ इस शरीर पर ही घटने से एक ही में ले ली जाती&lt;br /&gt;
हैं।....... &lt;br /&gt;
(2) यदि कोई आदमी दीया जलावे, तो वह रात भर जलता रहेगा न ?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;.......रात भर जलता रहेगा।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! रात के पहले पहर में जो दीये की टेम थी। क्या वही दूसरे या तीसरे पहर में भी बनी रहती है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं, भंते!&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! तो क्या वह दीया पहले पहर में दूसरा, दूसरे और तीसरे पहर में और हो जाता है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते! वही दीया सारी रात जलता रहता है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! ठीक इसी तरह किसी वस्तु के अस्तित्व के सिलसिले में एक अवस्था उत्पन्न होती है, एक लय होती है- और इस तरह प्रवाह जारी रहता है। एक प्रवाह की दो अवस्थाओं में एक क्षण का भी अंतर नहीं होता; क्योंकि एक के लय होते ही दूसरी उत्पन्न हो जाती है। इसी कारण न (वह) वही जीव है और न दूसरा ही हो जाता है। एक जन्म के अंतिम विज्ञान (=चेतना) के लय होते ही दूसरे जन्म का प्रथम विज्ञान उठ खड़ा होता है। &lt;br /&gt;
(ड)&amp;lt;ref&amp;gt;वही&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;quot;भंते! जब एक नाम-रूप से अच्छे या बुरे कर्म किये जाते हैं, तो वे कर्म कहाँ ठहरते हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! कभी भी पीछा नहीं छोड़ने वाली छाया की भाँति वे कर्म उसका पीछा करते हैं।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! क्या वे कर्म दिखाये जा सकते हैं, (कि) वह यहाँ ठहरे हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! वे इस तरह नहीं दिखाये जा सकते।..... क्या कोई वृक्ष के उन फलों को दिखा सकता है जो अभी लगे ही नहीं....? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(3) नाम और रूप- बुद्ध ने विश्व के मूल तत्त्व को विज्ञान (=नाम) और भौतिक तत्त्व (=रूप) में बाँटा है, इनके बारे में मिनान्दर ने पूछा- &lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! ....नाम क्या चीज है और रूप क्या चीज?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! जितनी स्थूल चीजें हैं, सभी रूप हैं, और जितने सूक्ष्म मानसिक धर्म हैं, सभी नाम हैं।..... दोनों एक दूसरे के आश्रित हैं, एक दूसरे के बिना ठहर नहीं सकते। दोनों सदा साथ ही होते हैं। .......यदि मुर्गी के पेट में (बीज रूप में) बच्चा नहीं हो तो अंडा भी नहीं हो सकता; क्योंकि बच्चा और अंडा दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं। दोनों एक ही साथ होते हैं। यह (सदा से).... होता चला आया है।......&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(4) निर्वाण- मिनान्दर ने निर्वाण के बारे में पूछते हुए कहा&amp;lt;ref&amp;gt;वही, 3।1।6(अनुवाद, पृ. 85)&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! क्या निरोध हो जाना ही निर्वाण है?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;हाँ, महाराज! निरोध (=बन्द) हो जाना ही निर्वाण है।.... सभी....अज्ञानी.... विषयों के उपभोग में लगे रहते हैं, उसी में आनन्द लेते हैं, उसी में डूबे रहते हैं। वे उसी की धारा में पड़े रहते हैं, बार-बार जन्म लेते, बूढ़े होते, मरते, शोक करते, रोते-पीटते, दुःख, बेचैनी और परेशानी से नहीं छूटते। (वह) दुःख ही दुःख में पड़े रहते हैं। महाराज! किंतु ज्ञानी....विषयों के भोग (=उपादान) में नहीं लगे रहते। इससे उनकी तृष्णा का निरोध हो जाता है। उपादान के निरोध से भव (=आवागमन) का निरोध हो जाता है। भव के निरोध से जन्मना बन्द हो जाता है।.... (फिर) बूढ़ा होना, मरना...सभी दुःख बन्द (=निरुद्ध) हो जाते हैं। महाराज! इस तरह निरोध हो जाना ही निर्वाण है।.... &lt;br /&gt;
&amp;lt;ref&amp;gt;वही, 3।2।18 (अनुवाद, पृ. 91)&amp;lt;/ref&amp;gt; .....(बुद्ध) कहाँ हैं?&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! भगवान् परम निर्वाण को प्राप्त हो गये हैं, जिसके बाद उनके व्यक्तित्व को बनाये रखने के लिए कुछ भी नहीं रह जाता......।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;भंते! उपमा देकर समझावें।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&amp;quot;महाराज! क्या होकर-बुझ-गई जलती आग की लपट दिखाई जा सकती है.......? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;नहीं भंते! वह लपट तो बुझ गई।&amp;quot; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नागसेन ने अपने प्रश्नोत्तरों से बुद्ध के दर्शन में कोई बात नहीं जोड़ी, किंतु उन्होंने उसे कितना साफ किया यह ऊपर के उद्धरणों से स्पष्ट है। यहाँ हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए, कि नागसेन का अपना जन्म हिन्दी यूनानी साम्राज्य और सभ्यता के केन्द्र स्यालकोट (=सागल) के पास हुआ था, और भारतीय ज्ञान के साथ-साथ यूनानी ज्ञान का भी परिचय रखने के कारण ही वह मिनान्दर जैसे तार्किक का समाधान कर सके थे। मिनान्दर और नागसेन का यह संवाद इतिहास की उस विस्तृत घटना का एक नमूना है, जिसमें कि हिन्दी और यूनानी प्रतिभाएँ मिलकर भारत में नई विचार-धाराओं का आरम्भ कर रही थीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;ref&amp;gt;&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
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		<title>नागसेन</title>
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		<updated>2011-11-05T13:48:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: '{{पुनरीक्षण}} नागसेन के जीवन के बारे में &amp;quot;मिलिन्द प्रश...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
नागसेन के जीवन के बारे में &amp;quot;मिलिन्द प्रश्न&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;'मिलिन्द प्रश्न, अनुवादक भिक्षु जगदीश काश्यप, 1637 ई.&amp;lt;/ref&amp;gt; में जो कुछ मिलता है, उससे इतना ही मालूम होता है, कि हिमालय-पर्वत के पास (पंजाब) में कजंगल गाँव में सोनुत्तर ब्राह्मण के घर में उनका जन्म हुआ था। पिता के घर में ही रहते उन्होंने ब्राह्मणों की विद्या वेद, व्याकरण आदि को पढ़ लिया था। उसके उनका परिचय उस वक्त वत्तनीय (=वर्त्तनीय) स्थान में रहते एक विद्वान भिक्षु रोहण से हुआ, जिससे नागसेन बौद्ध-विचारों की ओर झुके। रोहण के शिष्य बन वह उनके साथ विजम्भवस्तु &amp;lt;ref&amp;gt;वर्त्तनीय, कंगजल और शायद विजम्भवस्तु भी स्यालकोट के ज़िले में थे।&amp;lt;/ref&amp;gt; (=विजम्भवस्तु) होते हिमालय में रक्षिततल नामक स्थान में गये। वहीं गुरु ने उन्हें उस समय की रीति के अनुसार कंठस्थ किये सारे बौद्ध वाड्मय को पढाया। और पढ़ने की इच्छा से गुरु की आज्ञा के अनुसारवह एक बार फिर पैदल चलते वर्त्तनीय में एक प्रख्यात विद्वान अश्वगुप्त के पास पहुँचे। अश्वगुप्त अभी इस नये विद्यार्थी की विद्या-बुद्धि की परख कर ही रहे थे, कि एक दिन किसी गृहस्थ के घर भोजन के उपरांत कायदे के अनुसार दिया जाने वाला धर्मोपदेश नागसेन के जिम्मे पड़ा। नागसेन की प्रतिभा उससे खुल गई और अश्वगुप्त ने इस प्रतिभाशाली तरुण को और योग्य हाथों में सौंपनें के लिए पटना (=पाटलिपुत्र) के अशोका राम बिहार में वास वाले आचार्य धर्मरक्षित के पास भेज दिया। सौ योजन पर अवस्थित पटना पैदल जाना आसान काम न था, किंतु अब भिक्षु बराबर आते-आते रहते थे, व्यापारियों का सार्थ (=कारवाँ) भी एक-न-एक चलता ही रहता था। नागसेन को एक ऐसा ही कारवाँ मिल गया जिसके स्वामी ने बड़ी खुशी से इस तरुण विद्वान को खिलाते-पिलाते साथ ले चलना स्वीकार किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अशोका राम में आचार्य धर्मरक्षित के पास रहकर उन्होंने बौद्ध तत्त्व-ज्ञान और पिटक का पूर्णतया अध्ययन किया। इसी बीच उन्हें पंजाब से बुलौवा आया और वह एक बार फिर रक्षिततल पर पहुँचे।&lt;br /&gt;
मिनान्दर (=मिलिन्द) का राज्य यमुना से आमू (वक्षु) दरिया तक फैला हुआ था। यद्यपि उसकी एक राजधानी बलख (वाहलीक) भी थी, किंतु हमारी इस परंपरा के अनुसार मालूम होता है, मुख्य राजधानी सागल (=स्यालकोट) नगरी थी। प्लूतार्क ने लिखा है कि- मिनान्दर बड़ा न्यायी, विद्वान और जनप्रिय राजा था। उसकी मृत्यु के बाद उसकी हड्डियों पर बड़े-बड़े स्तूप बनवाये। मिनान्दर को शास्त्र चर्चा और बहस की बड़ी आदत थी, और साधारण पंडित उसके सामने नहीं टिक सकते थे। भिक्षुओं ने कहा- 'नगसेन! राजा मिलिन्द वाद विवाद में प्रश्न पूछ कर भिक्षु-संघ को तंग करता और नीचा दिखाता है; जाओ तुम उस राजा का दमन करो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नागसेन, संध के आदेश को स्वीकार कर सागल नगर के असंखेय्य नामक परिवेण (=माठ) में पहुँचे। कुछ ही समय पहले वहाँ के बड़े पंडित आयु पाल को मिनान्दर ने चुप कर दिया था। नागसेन के आने की खबर शहर में फैल गई। मिनान्दर ने अपने एक अमात्य देवमंत्री (=जो शायद यूनानी दिमित्री है) से नागसेन से मिलने की इच्छा प्रकट की। स्वीकृति मिलने पर एक दिन &amp;quot;पाँच सौ यवनों के साथ अच्छे रथ पर सवार हो असंखेय्य परिवेण में गया। राजा ने नमस्कार और अभिनंदन के बाद प्रश्न शुरु किये।&amp;quot; इन्ही प्रश्नों के कारण इस ग्रंथ का नाम &amp;quot;मिलिन्द-प्रश्न&amp;quot; पड़ा। यद्यपि उपलभ्य पाली &amp;quot;मिलिन्द पंझ&amp;quot; में छ: परिच्छेद' हैं, किंतु उनमें से पहले के तीन ही पुराने मालूम होते हैं; चीनी भाषा में भी इन्हीं तीन परिच्छेदों का अनुवाद मिलता है। मिनान्द ने पहले दिन मठ में जाकर नागसेन से प्रश्न किये; दूसरे दिन उसने महल में निमंत्रण कर प्रश्न पूछे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना नवम्बर-2011]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>मिलिंद (मिनांडर)</title>
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		<updated>2011-11-05T13:47:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: मिलिन्द को अनुप्रेषित (रिडायरेक्ट)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;#REDIRECT [[मिलिन्द]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>मिलिन्द</title>
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		<updated>2011-11-05T13:46:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''मिलिन्द या मनेन्दर'''&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Menander-Coin.jpg|thumb|250px|मिलिंद (मिनांडर) का सिक्का]]&lt;br /&gt;
*उत्तर-पश्चिम [[भारत]] का 'हिन्दी-यूनानी' राजा 'मनेन्दर' 165-130 ई. पू. लगभग ( भारतीय उल्लेखों के अनुसार 'मिलिन्द') था। &lt;br /&gt;
*प्रथम पश्चिमी राजा जिसने [[बौद्ध धर्म]] अपनाया और [[मथुरा]] पर शासन किया। &lt;br /&gt;
*राज्य की सीमा- बैक्ट्रिया, [[पंजाब]], [[हिमाचल प्रदेश|हिमाचल]], [[जम्मू]] से [[मथुरा]] ।&lt;br /&gt;
*[[डेमेट्रियस]] के समान मिनान्डर नामक यवन राजा के भी अनेक सिक्के उत्तर - पश्चिमी भारत में उपलब्ध हुए हैं। &lt;br /&gt;
*मिनान्डर की राजधानी शाकल (सियालकोट) थी। &lt;br /&gt;
*भारत में राज्य करते हुए वह [[बौद्ध]] श्रमणों के सम्पर्क में आया और आचार्य नागसेन से उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। &lt;br /&gt;
*बौद्ध ग्रंथों में उसका नाम 'मिलिन्द' आया है। &lt;br /&gt;
*'मिलिन्द पञ्हो' नाम के पालि ग्रंथ में उसके [[बौद्ध धर्म]] को स्वीकृत करने का विवरण दिया गया है। &lt;br /&gt;
*मिनान्डर के अनेक सिक्कों पर बौद्ध धर्म के 'धर्मचक्र' प्रवर्तन का चिह्न 'धर्मचक्र' बना हुआ है, और उसने अपने नाम के साथ 'ध्रमिक' (धार्मिक) विशेषण दिया है। &lt;br /&gt;
*यूनानी लेखक स्ट्रैबो के लेखों से सूचित होता है, कि डेमेट्रियस के भारत आक्रमण में मिनान्डर उसका सहयोगी था। &lt;br /&gt;
*स्ट्रैबो के अनुसार इन विजयों का लाभ कुछ मिनान्डर ने और कुछ युथिडिमास के पुत्र डेमेट्रियस ने प्राप्त किया। इससे अनेक इतिहासकारों ने यह परिणाम निकाला है, कि मिनान्डर और डेमेट्रियस ने एक ही समय में सम्मिलित रूप से भारत पर आक्रमण किया था, और मिनान्डर डेमेट्रियस का ही सेनापति था। &lt;br /&gt;
*श्री टार्न इस मत के प्रमुख प्रतिपादकों में हैं। बाद में मिनान्डर ने भी अपना पृथक व स्वतंत्र राज्य स्थापित किया।&lt;br /&gt;
*इण्डो-यूनानी शासकों में [[डेमेट्रियस]] कुल मेनांडर निःसंदेह सबसे योग्य शासक था। बौद्ध साहित्य 'मिलिन्दपन्हो' में इसे मिलिन्द के नाम से जाना जाता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Menandros-Coin.jpg|thumb|250px|मिलिंद (मिनांडर) का सिक्का]]&lt;br /&gt;
*मिलन्दपन्हो में मेनांडर एवं बौद्ध भिक्षु नागसेन के मध्य सम्पन्न वाद-विवाद, एवं जिसके परिणामस्वरूप मेनाडर एवं बौद्ध भिक्षु स्वीकार, किया, की कथा का वर्णन है। &lt;br /&gt;
*मेनांडर ने भारत में अपनी सीमाओं के विस्तार के साथ प्रशासन को स्थायित्व प्रदान किया। सम्भवतः मेनांडर का अधिकार स्कात घाटी, हज़ारज़िला एवं [[पंजाब]] में [[रावी नदी]] तक था। *स्ट्रैबो के वर्णन के अनुसार यूनानियों ने गंगाघाटी तथा [[पाटिलिपुत्र]] तक आक्रमण किया। &lt;br /&gt;
*महाभाष्य के वर्णन के आधार पर माना जा सकता है कि यूनानियों ने [[अवध]] के [[साकेत]], [[राजस्थान]] में [[चित्तौड़]] के समीप स्थित 'माध्यमिका' पर अधिकार करने का प्रयत्न किया। &lt;br /&gt;
*मेनांडर के सिक्के हमें उत्तर में [[काबुल]] तक एवं [[दिल्ली]] से [[मथुरा]] तक मिले हैं। &lt;br /&gt;
*पेरीप्लस के अनुसार मेनांडर के सिक्के भड़ौच के बाज़ारों में खूब प्रचलित थे। उसकी कतिपय कांस्य मुद्राओं पर धर्म चक्र प्रतीक 'महरजत' धमिकस प्रचलित थे। मैनण्डरस विरुद मिलता है।&lt;br /&gt;
*'मिलिन्दपन्हों' के उल्लेख के अनुसार साकेत मिनांडर की राजधानी थी। &lt;br /&gt;
*साकल तत्कालीन शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण केन्द्र था, साथ ही सम्पन्नता में यह पाटिलपुत्र के समकक्ष था। &lt;br /&gt;
*मिनेण्डर की कांस्यमुद्राओं पर धर्मचक्र का चिन्ह मिलता है। &lt;br /&gt;
*पेरीप्लस के अनुसार मेनाण्डर के सिक्के भड़ौच में चलते थे। [[मथुरा]] से उसके तथा उसके पुत्र स्टेटो के सिक्के मिले हैं।&lt;br /&gt;
*कालान्तर में मध्य एशिया के खानाबदोश कबीलों ने, जिनमें 'सीथियन' लोग भी थे, [[बैक्ट्रिया]] पर धावा बोल दिया। &lt;br /&gt;
*चीनी सम्राट शी-हुआंग-ती द्वारा तीसरी शताब्दी ई.पू. [[चीन]] की विशाल दीवार बना देने के कारण कबीलों को पश्चिम में बढ़ने के लिए बाध्य होना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप सीथियनों को विस्थापित होकर [[भारत]] के इण्डो-ग्रीक भागों पर आक्रमण करना पड़ा। &lt;br /&gt;
*सीथियनों को ही भारतीय ग्रंथों में [[शक]] नाम से जाना जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{यवन शासक}}&lt;br /&gt;
{{प्राचीन विदेशी शासक}}&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:शक एवं कुषाण काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:विदेशी आक्रमणकारी]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=232427</id>
		<title>चंद्रगुप्त मौर्य</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=232427"/>
		<updated>2011-11-05T13:36:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: /* धननंद */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{प्रतीक्षा|तिथि-समय=20:23, 18 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा ऐतिहासिक शासक&lt;br /&gt;
|चित्र=Chandragupt-Maurya-Stamp.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=चक्रवर्ती सम्राट चन्द्र गुप्त मौर्य&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=340 ई. पू.&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= मगध, भारत&lt;br /&gt;
|पिता/माता= &amp;quot;मुरा या मोरा&amp;quot; (माता) &lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान= [[बिन्दुसार]]&lt;br /&gt;
|उपाधि= सम्राट&lt;br /&gt;
|राज्य सीमा=सम्पूर्ण भारत (लगभग)&lt;br /&gt;
|शासन काल=322 से 298 ई. पू.&lt;br /&gt;
|शासन अवधि=24 वर्ष (लगभग)&lt;br /&gt;
|धार्मिक मान्यता=[[वैदिक]] और [[जैन]]&lt;br /&gt;
|राज्याभिषेक=322 ई.पू.&lt;br /&gt;
|युद्ध=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=भारत का प्रथम 'ऐतिहासिक सम्राट'&lt;br /&gt;
|निर्माण=&lt;br /&gt;
|सुधार-परिवर्तन=&lt;br /&gt;
|राजधानी=पाटलिपुत्र &lt;br /&gt;
|पूर्वाधिकारी= [[धनानंद]]&lt;br /&gt;
|राजघराना=&lt;br /&gt;
|वंश=मौर्य वंश&lt;br /&gt;
|मृत्यु तिथि= 298 ई पू (42 वर्ष में)&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान= श्रवानाबेलागोला, [[कर्नाटक]]&lt;br /&gt;
|स्मारक=&lt;br /&gt;
|मक़बरा=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[चाणक्य]] '''.''' [[अशोक]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1='चन्द्रगुप्त' (सॅन्द्रोकिप्तॅश) यूनानी उच्चारण&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[चित्र:Chandragupta-greek-1.ogg|thumb|''सॅन्द्रोकिप्तॅश'']]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''चक्रवर्ती सम्राट चन्द्र गुप्त मौर्य''' (शासनकाल: 322 से 298 ई. पू.तक) की गणना भारत के महानतम शासकों में की जाती है। उसकी महानता की सूचक अनेक उपाधियाँ हैं और उसकी महानता कई बातों में अद्वितीय भी है। वह भारत के प्रथम ‘ऐतिहासिक’ सम्राट के रूप में हमारे सामने आता है, इस अर्थ में कि वह भारतीय इतिहास का '''पहला सम्राट है जिसकी ऐतिहासिकता प्रमाणित कालक्रम के ठोस आधार पर सिद्ध की जा सकती है।'''&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=13 |url=}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आरम्भिक जीवन==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त के प्रारम्भिक जीवन के बारे में जानकारी हमें बौद्ध कथाओं से प्राप्त होती है। इन कथाओं का स्रोत मुख्यत: दो रचनाओं में मिलता है:&lt;br /&gt;
#महावंस टीका, जिसे वंसत्थप्पकासिनी भी कहते हैं (जिसकी रचना लगभग 10वीं शताब्दी ईसवी के मध्य हुई थी) और &lt;br /&gt;
#महाबोधिवंस, जिसके रचयिता उपतिस्स हैं (लगभग 10वीं शताब्दी ईसवी के उत्तरार्द्ध में)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन दोनों ही ग्रन्थों का आधार, सीहलट्ठकथा तथा उत्तरविहारट्ठकथा नामक प्राचीन ग्रन्थ हैं। सीहलट्ठकथा के बारे में कहा जाता है कि उसकी रचना थेर महिंद (अशोक का पुत्र) तथा उनके साथ मगध से आए हुए अन्य भिक्षुओं ने की थी, जिन्हें संघ के प्रधान ने धर्मप्रचार के लिए लंका भेजा था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=30 |url=}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म और वंश===&lt;br /&gt;
====इस संबंध विभिन्न मत हैं:-====&lt;br /&gt;
*चंद्रगुप्त के वंश के सम्बन्ध में ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन परम्पराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह किसी कुलीन घराने से सम्बन्धित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है।चंद्रगुप्त के वंश के समान उसके आरम्भिक जीवन के पुनर्गठन का भी आधार किंवदंतियाँ एवं परम्पराएँ ही अधिक हैं और ठोस प्रमाण कम हैं। इस सम्बन्ध में चाणक्य चंद्रगुप्त कथा का सारांश उल्लेखनीय है। जिसके अनुसार नंद वंश द्वारा अपमानित किए जाने पर चाणक्य ने उसे समूल नष्ट करने का प्रण किया। संयोगवश उसकी भेंट चंद्रगुप्त से हो गई और वह उसे तक्षशिला ले गया।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=प्राचीन भारत का इतिहास |लेखक=द्विजेन्द्र नारायण झा, कृष्ण मोहन श्रीमाली |प्रकाशक=दिल्ली विश्वविद्यालय  |पृष्ठ संख्या=174-175 |}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*धुंढिराज&amp;lt;ref&amp;gt;[[विशाखदत्त]] के प्रसिद्ध नाटक मुद्राराक्षस का टीकाकार&amp;lt;/ref&amp;gt; के मतानुसार चंद्रगुप्त का पिता मौर्य था और सर्वार्थसिद्धि ने अपना सेनापति अपने नंद पुत्रों को न बनाकर मौर्य को बनाया था, इस पर नंद बंधुओं ने छल से मौर्य तथा उसके सब पत्रों को मरवा दिया, केवल चंद्रगुप्त भाग निकला। नंदों का एक दूसरा शत्रु चाणक्य भी था। समान शत्रुता के कारण ये दोनों मित्र बन गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*मौर्यवंश का संस्थापक। उसके माता-पिता के नाम ठीक-ठीक ज्ञात नहीं हैं। पुराणों के अनुसार वह मगध के राजा नन्द का उपपुत्र था, जिसका जन्म मुरा नामक शूद्रा दासी से हुआ था। बौद्ध और जैन सूत्रों से पता चलता है। कि चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म पिप्पलिवन के मोरिय क्षत्रिय कुल में  हुआ था। जो भी हो चन्द्रगुप्त प्रारंभ से ही बहुत साहसी व्यक्ति था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=भारतीय इतिहास कोश |लेखक=सच्चिदानंद भट्टाचार्य |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या=143-144 |url=}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[विशाखदत्त]] के नाटक ''''मुद्राराक्षस' में चंद्रगुप्त को नंदपुत्र न कहकर मौर्यपुत्र कहा गया है।''' फिर भी उसे ‘नंदवंश की सन्तान’ कहा गया है, क्योंकि वह सर्वार्थसिद्धि के पुत्र मौर्य का बेटा था और सर्वार्थसिद्धि नौ नंदों का पिता था और स्वंय नंदवंश की सन्तान था। इस बूढ़े राजा को भी नंद कहा गया है। नाटक में दिखाया गया है कि राक्षस के परामर्श से वह पाटलिपुत्र छोड़कर वन में भाग गया था क्योंकि चंद्रगुप्त तथा चाणक्य ने एक-एक करके उसके सभी पुत्रों (नौ नंदों को) मरवा डाला था। फिर भी चंद्रगुप्त को अपने पिता का हत्यारा नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसे कहीं नंदपुत्र नहीं कहा गया है। वह उन नौ नंदों में से किसी की भी सन्तान नहीं था। उसके लिए जिस दूसरे शब्द ‘मौर्यपुत्र’ का प्रयोग किया गया, उसके कारण वह इस जघन्य अपराध के दोष से मुक्त हो गया है&amp;lt;ref&amp;gt;सी.डी. चटर्जी | इंडियन कल्चर में आब्ज़र्वेशंस ऑन दि बृहत्कथा | खंड 1- पृष्ठ 221&amp;lt;/ref&amp;gt;।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=26}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*वृत्तांतों के अनुसार चंद्रगुप्त का जन्म मोरिय नामक क्षत्रिय जाति में हुआ था जिनका शाक्यों के साथ सम्बन्ध था। अपनी जन्मभूमि छोड़कर चली आने वाली मोरिय जाति का मुखिया चंद्रगुप्त का पिता था। दुर्भाग्यवश वह सीमांत पर एक झगड़े में मारा गया और उसका परिवार अनाथ रह गया। उसकी अबला विधवा अपने भाइयों के साथ भागकर पुष्यपुर (=कुसुमपुर =पाटलिपुत्र) नामक नगर में पहुँची, जहाँ उसने चंद्रगुप्त को जन्म दिया। सुरक्षा के विचार से इस अनाथ बालक को उसके मामाओं ने एक गोशाला में छोड़ दिया, जहाँ एक गड़रिए ने अपने पुत्र की तरह उसका लालन-पालन किया और जब वह बड़ा हुआ तो उसे एक शिकारी के हाथ बेच दिया, जिसने उसे गाय-भैंस चराने के काम पर लगा दिया। कहा जाता है कि एक '''साधारण ग्रामीण बालक चंद्रगुप्त ने राजकीलम नामक एक खेल का आविष्कार करके जन्मजात नेता होने का परिचय दिया।''' इस खेल में वह राजा बनता था और अपने साथियों को अपना अनुचर बनाता था। वह राजसभा भी आयोजित करता था जिसमें बैठकर वह न्याय करता था। गाँव के बच्चों की एक ऐसी ही राजसभा में चाणक्य ने पहली बार चंद्रगुप्त को देखा था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=30 |url=}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कुछ लोग चंद्रगुप्त को मुरा नाम की शूद्र स्त्री के गर्भ से उत्पन्न नंद सम्राट की संतान बताते हैं पर बौद्ध और जैन साहित्य के अनुसार यह मौर्य (मोरिय) कुल में जन्मा था और नंद राजाओं का महत्त्वाकांक्षी सेनापति था। चंद्रगुप्त के वंश और जाति के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों ने [[ब्राह्मण ग्रंथ|ब्राह्मण ग्रंथों]], [[मुद्राराक्षस]], [[विष्णुपुराण]] की मध्यकालीन टीका तथा 10वीं शताब्दी की [[धुण्डिराज]] द्वारा रचित मुद्राराक्षस की टीका के आधार पर चंद्रगुप्त को शूद्र माना है। चंद्रगुप्त के वंश के सम्बन्ध में [[ब्राह्मण]], [[बौद्ध]] एवं [[जैन]] परम्पराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह किसी कुलीन घराने से सम्बन्धित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=प्राचीन भारत का इतिहास |लेखक=द्विजेन्द्र नारायण झा, कृष्ण मोहन श्रीमाली |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=दिल्ली विश्वविद्यालय  |पृष्ठ संख्या=174 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*बौद्ध रचनाओं में कहा गया है कि ‘नंदिन’ के कुल का कोई पता नहीं चलता (अनात कुल) और चंद्रगुप्त को असंदिग्ध रूप से अभिजात कुल का बताया गया है। चंद्रगुप्त के बारे में कहा गया है कि वह मोरिय नामक क्षत्रिय जाति की संतान था; मोरिय जाति शाक्यों की उस उच्च तथा पवित्र जाति की एक शाखा थी, जिसमें महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। कथा के अनुसार, जब अत्याचारी कोसल नरेश विडूडभ ने शाक्यों पर आक्रमण किया तब मोरिय अपनी मूल बिरादरी से अलग हो गए और उन्होंने हिमालय के एक सुरक्षित स्थान में जाकर शरण ली। यह प्रदेश मोरों के लिए प्रसिद्ध था, जिस कारण वहाँ आकर बस जाने वाले ये लोग मोरिय कहलाने लगे, जिनका अर्थ है मोरों के स्थान के निवासी। मोरिय शब्द ‘मोर’ से निकला है, जो संस्कृत के मयूर शब्द का पालि पर्याय है। &amp;lt;br /&amp;gt;एक और कहानी भी है जिसमें मोरिय नगर नामक एक स्थान का उल्लेख मिलता है। इस शहर का नाम मोरिय नगर इसलिए रखा गया था कि वहाँ की इमारतें मोर की गर्दन के रंग की ईंटों की बनी हुई थीं। जिन लोगों ने इस नगर का निर्माण किया था, वे मोरिय कहलाए। महाबोधिवंस &amp;lt;ref&amp;gt;सम्पादक: स्ट्रांग, पृष्ठ 98&amp;lt;/ref&amp;gt; में कहा गया है कि ‘कुमार’ चंद्रगुप्त, जिसका जन्म राजाओं के कुल में हुआ था (नरिंद-कुलसंभव), जो मोरिय नगर का निवासी था, जिसका निर्माण साक्यपुत्तों ने किया था, चाणक्य नामक ब्राह्मण (द्विज) की सहायता से पाटलिपुत्र का राजा बना। &amp;lt;br /&amp;gt;महाबोधिवंस में यह भी कहा गया है कि ‘चंद्रगुप्त का जन्म क्षत्रियों के मोरिय नामक वंश में’ हुआ था (मोरियनं खत्तियनं वंसे जातं)। बौद्धों के दीघ निकाय नामक ग्रन्थ में&amp;lt;ref&amp;gt;दीघ निकाय 2,167&amp;lt;/ref&amp;gt; पिप्पलिवन में रहने वाले मोरिय नामक एक क्षत्रिय वंश का उल्लेख मिलता है। दिव्यावदान&amp;lt;ref&amp;gt;सम्पादक: कावेल, पृष्ठ 370 &amp;lt;/ref&amp;gt;में बिन्दुसार (चंद्रगुप्त के पुत्र) के बारे में कहा गया है कि उसका क्षत्रिय राजा के रूप में विधिवत अभिषेक हुआ था (क्षत्रिय-मूर्धाभिषिक्त) और अशोक (चंद्रगुप्त के पौत्र) को क्षत्रिय कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=28}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*एक मत कथासरित्सागर में उपलब्ध होता है। इसके अनुसार चंद्रगुप्त नन्द राजा का ही पुत्र था, और उसके अन्य कोई सन्तान नहीं थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*चंद्रगुप्त के विषय में महावंश में पाये मतानुसार अनुसार चंद्रगुप्त पिप्पलिवन के मोरिय गण का कुमार था। नन्द के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं था। मोरिय गण वज्जि-महाजनपद के पड़ोस में स्थित था। उत्तरी बिहार के सब गणराज्य कौशल और मगध के साम्राज्यवाद के शिकार हो गए थे, और मोरिय गण भी मगध की अधीनता में आ गया था। इस गण की एक राजमहिषी पाटलिपुत्र में छिपकर जीवन व्यतीत कर रही थी। वहीं पर उसने चंद्रगुप्त को जन्म दिया। चंद्रगुप्त कहीं मगध के राजकर्मचारियों के हाथों में न पड़ जाए, इसलिए उसने अपने नवजात शिशु को ग्वाले के सुपुर्द कर दिया। अपनी आयु के अन्य ग्वाल-बालकों के साथ मोरिय चंद्रगुप्त का भी पालन होने लगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===चंद्रगुप्त और चाणक्य की भेंट===&lt;br /&gt;
चाणक्य ने अपनी दिव्यदृष्टि से तुरन्त इस ग्रामीण अनाथ बालक में राजत्व की प्रतिभा तथा चिह्न देखे और वहीं पर 1,000 कार्षापण देकर उसे उसके पालक-पिता से खरीद लिया। उस समय चंद्रगुप्त आठ या नौ वर्ष का बालक रहा होगा। चाणक्य जिसे तक्षशिला नामक नगर का निवासी (तक्कसिलानगर-वासी) बताया गया है, बालक को लेकर अपने नगर लौटा और 7 या 8 वर्ष तक उस प्रख्यात विद्यापीठ में उसे शिक्षा दिलाई, जहाँ जातककथाओं के अनुसार, उस समय की समस्त ‘विधाएँ तथा कलाएँ’ सिखाई जाती थीं। वहाँ चाणक्य ने उसे अप्राविधिक विषयों और व्यावहारिक तथा प्राविधिक कलाओं की भी सर्वांगीण शिक्षा दिलाई&amp;lt;ref&amp;gt;बहुसच्चाभावंच; उग्गहितसिप्पकंच&amp;lt;/ref&amp;gt;।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=30 |url=}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पालि स्रोतों से प्राप्त चंद्रगुप्त के प्रारम्भिक जीवन के इस विवरण से ''जस्टिन'' के इस कथन की भी पुष्टि होती है कि उसका जन्म एक मामूली घराने में हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=32 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मगध के राजा जाति-नियमों को वैसे ही विशेष महत्त्व नहीं देते थे; मौर्य तो आदिवासी मूल अथवा मिश्रित वंश के थे, यद्यपि उनका आर्यीकरण हो चुका था। मौर्य (पालि: मोरिय) नाम मोर टोटेम का सूचक है, यह वैदिक-आर्य नाम नहीं हो सकता।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता |लेखक=दामोदर धर्मानंद कोसंबी|अनुवादक=गुणाकर मुले |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |संकलन= |संपादन= |पृष्ठ संख्या=174 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो भी हो चन्द्रगुप्त प्रारंभ से ही बहुत साहसी व्यक्ति था। जब वह किशोर ही था, उसने पंजाब में पड़ाव डाले हुए यवन (यूनानी) विजेता सिकंदर से भेंट की। उसने अपनी स्पष्टवादिता से सिकंदर को नाराज़ कर दिया। सिकंदर ने उसे बंदी बना लेने का आदेश दिया, लेकिन वह अपने शौर्य का प्रदर्शन करता हुआ सिकंदर के शिकंजे से भाग निकला और कहा जाता है। कि इसके बाद ही उसकी भेंट तक्षशिला के एक आचार्य चाणक्य या कौटिल्य-से हुई।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=भारतीय इतिहास कोश |लेखक=सच्चिदानंद भट्टाचार्य |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या=143 |url=}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
===चंद्रगुप्त की शिक्षा===&lt;br /&gt;
जातककथाओं से हमें पता चलता है कि उस समय के राजा अपने राजकुमारों को विद्योपार्जन के लिए तक्षशिला भेजा करते थे, जहाँ विश्व-विख्यात अध्यापक थे। इन कथाओं में हम पढ़ते हैं : &amp;quot;सारे भारत से क्षत्रियों तथा ब्राह्मणों के पुत्र इन अध्यापकों से विभिन्न कलाएँ सीखने आते थे।&amp;quot; तक्षशिला प्राथमिक शिक्षा का ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा का केन्द्र भी था। इस बात का उल्लेख मिलता है कि वहाँ बालकों को 16 वर्ष की अवस्था में अर्थात् ‘किशोरावस्था में प्रवेश करने पर’ भरती किया जाता था। इससे बड़ी अवस्था के छात्र अथवा गृहस्थ लोग भी यहाँ शिक्षा प्राप्त करते थे। वे अपने रहने आदि का प्रबंध स्वंय करते थे। '''हमें तक्षशिला के एक ऐसे अध्यापक का भी उल्लेख मिलता है, जिसकी पाठशाला में केवल राजकुमार ही पढ़ते थे, &amp;quot;उस समय भारत में इन राजकुमारों की संख्या 101 थी।&amp;quot;''' वहीं जिन विषयों की शिक्षा दी जाती थी, उनमें तीन वेदों तथा 18 ‘सिप्पों’ अर्थात् शिल्पों का उल्लेख मिलता है, जिनमें धनुर्विद्या (इस्सत्थ-सिप्प), आखेट तथा हाथियों से सम्बन्धित ज्ञान (हत्थिसुत्त) का उल्लेख किया गया है, जिन्हें राजकुमारों के लिए उपयुक्त समझा जाता था। सिद्धान्त तथा व्यवहार दोनों ही की शिक्षा दी जाती थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षशिला अपनी विधिशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान तथा सैन्यविद्या की अलग-अलग पाठशालाओं के लिए प्रख्यात था। तक्षशिला की सैनिक अकादमी का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें 103 राजकुमार शिक्षा पाते थे। एक जगह पर यह विवरण मिलता है कि किस प्रकार एक शिष्य को सैन्यविद्या की शिक्षा समाप्त कर लेने के बाद उसके गुरु ने प्रमाणपत्र के रूप में स्वंय अपनी &amp;quot;तलवार, एक धनुष और बाण, एक कवच तथा एक हीरा&amp;quot; दिया और उससे कहा कि वह उसके स्थान पर सैन्यविद्या की शिक्षा प्राप्त करने वाले 500 शिष्यों की पाठशाला के प्रधान का पद ग्रहण करे, क्योंकि वह वृद्ध हो गया है और अवकाश ग्रहण करना चाहता है&amp;lt;ref&amp;gt;विस्तृत विवरण के लिए राधाकुमुद मुखर्जी की &amp;quot;ऐन्शेंट इंडियन एजुकेशन&amp;quot;, मैकमिलंस, लंदन, नामक रचना का 19वाँ अध्याय देखिए।&amp;lt;/ref&amp;gt;। चाणक्य अपने अल्पवयस्क शिष्य की शिक्षा का इससे अच्छा कोई दूसरा प्रबंध नहीं कर सकता था कि उसे विद्योपार्जन के लिए तक्षशिला में भरती करा दे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धननंद==&lt;br /&gt;
पालि ग्रन्थों में मगध के तत्कालीन शासक का नाम [[धननंद]] बताया गया है। इसका उल्लेख संस्कृत ग्रन्थों में केवल 'नंद' के नाम से किया गया है। इसके अतिरिक्त पालि ग्रन्थों में नौ नंदों के नाम तथा उनके जीवन से सम्बन्धित कुछ बातें भी बताई गई हैं। इन ग्रन्थों से हमें पता चलता है कि नंदवंश के नौ राजा, जो सब भाई थे, बारी-बारी से अपनी आयु के क्रम से गद्दी पर बैठे&amp;lt;ref&amp;gt;वुड्ढपटिपाटिया&amp;lt;/ref&amp;gt;। '''धननंद उनमें सबसे छोटा था। सबसे बड़े भाई का नाम उग्रसेननंद बताया गया है; वही नंदवंश का संस्थापक था।''' चंद्रगुप्त की तरह ही उसका प्रारम्भिक जीवन भी अत्यन्त रोमांचपूर्ण था। वह मूलत: सीमांत प्रदेश का निवासी था (पच्चंत-वासिक); एक बार डाकुओं ने उसे पकड़ लिया और उसे मलय नामक एक सीमांत प्रदेश में ले गए&amp;lt;ref&amp;gt;मुद्राराक्षस में मलय का उल्लेख मिलता है&amp;lt;/ref&amp;gt; और उसे इस मत का समर्थक बना लिया कि लूटमार करना ज़मीन जोतने से अच्छा व्यवसाय है। वह अपने भाइयों तथा सगे-सम्बन्धियों सहित डाकुओं के एक गिरोह में भरती हो गया और शीघ्र ही उनका नेता बन बैठा। वे आसपास के राज्यों पर धावे मारने लगे (रट्ठं विलुमपमानो विचरंतो) और सीमांत के नगरों पर चढ़ाई करके (पच्चंत नगर) यह चुनौती दी : ‘या तो अपना राज्य हमारे हवाले कर दो या युद्ध करो'&amp;lt;ref&amp;gt;रज्जम वा देंतु युद्धं वा&amp;lt;/ref&amp;gt;। धीरे-धीरे वे सार्वभौम सत्ता पर अधिकार करने के स्वप्न देखने लगे&amp;lt;ref&amp;gt;सिंहली भाषा में महावंस टीका का मूलपाठ, जो श्री सी.डी. चटर्जी ने श्री राधाकुमुद मुखर्जी को पढ़कर बताया [भारतकोश टिप्पणी]&amp;lt;/ref&amp;gt;। इस प्रकार एक डाकू राजा राजाओं का राजा बन बैठा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धननंद द्वारा चाणक्य का अपमान==&lt;br /&gt;
सिकंदर के भारत आक्रमण के समय चंद्रगुप्त मौर्य की उससे [[पंजाब]] में भेंट हुई थी। किसी कारणवश रुष्ट होकर सिकंदर ने चंद्रगुप्त को क़ैद कर लेने का आदेश दिया था। पर चंद्रगुप्त उसकी चंगुल से निकल आया। इसी समय इसका संपर्क कौटिल्य या चाणक्य से हुआ। चाणक्य नंद राजाओं से रुष्ट था। उसने नंद राजाओं को पराजित करके अपनी महत्त्वाकांक्षा पूर्ण करने में चंद्रगुप्त मौर्य की पूरी सहायता की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त के वंश के समान उसके आरम्भिक जीवन के पुनर्गठन का भी आधार किंवदंतियाँ एवं परम्पराएँ ही अधिक हैं और ठोस प्रमाण कम हैं। इस सम्बन्ध में [[चाणक्य]] चंद्रगुप्त कथा का सारांश उल्लेखनीय है। जिसके अनुसार [[नंद वंश]] द्वारा अपमानित किए जाने पर चाणक्य ने उसे समूल नष्ट करने का प्रण किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस समय चाणक्य पाटलिपुत्र आया था, उस समय धनानंद वहाँ का राजा था। वह अपने धन के लोभ के लिए बदनाम था। वह ’80 करोड़ (कोटि) की सम्पत्ति’ का मालिक था और &amp;quot;खालों, गोंद, वृक्षों तथा पत्थरों तक पर कर वसूल&amp;quot; करता था। तिरस्कार में उसका नाम धननंद रख दिया गया था, क्योंकि वह ‘धन के भण्डार भरने का आदी’ था&amp;lt;ref&amp;gt;महावंस टीका&amp;lt;/ref&amp;gt;। कथासरित्सागर में नंद की ’99 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं’ का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि उसने गंगा नदी की तली में एक चट्टान खुदवाकर उसमें अपना सारा खजाना गाड़ दिया था&amp;lt;ref&amp;gt;महावंस टीका&amp;lt;/ref&amp;gt;। उसकी धन सम्पदा की ख्याति दक्षिण तक पहुँची। '''तमिल भाषा की एक कविता में उसकी सम्पदा का उल्लेख इस रूप में किया गया है''' कि &amp;quot;पहले वह पाटलि में संचित हुई और फिर गंगा की बाढ़ में छिप गई।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;ऐय्यंगर कृत-बिगिनिंग्स ऑफ़ साउथ इंडियन हिस्ट्री, पृष्ठ 89&amp;lt;/ref&amp;gt;। परन्तु चाणक्य ने उसे बिल्कुल ही दूसरे रूप में देखा। अब वह धन बटोरने के बजाए, उसे दान-पुण्य में व्यय कर रहा था; यह काम दानशाला नामक एक संस्था द्वारा संगठित किया जाता था। जिसकी व्यवस्था का संचालन एक संघ के हाथों में था, जिसका अध्यक्ष कोई ब्राह्मण होता था। '''नियम यह था कि अध्यक्ष एक करोड़ मुद्राओं तक का दान दे सकता था और संघ का सबसे छोटा सदस्य एक लाख मुद्राओं तक का।''' चाणक्य को इस संघ का अध्यक्ष चुना गया। परन्तु, होनी की बात, राजा को उसकी कुरूपता तथा उसका धृष्ट स्वभाव अच्छा न लगा और उसने उसे पदच्युत कर दिया। इस अपमान पर क्रुद्ध होकर चाणक्य ने राजा को शाप दिया, उसके वंश को निर्मूल कर देने की धमकी दी और एक नग्न आजीविक साधु के भेष में उसके चंगुल से बच निकला।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=36 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अलक्षेन्द्र (सिकन्दर) का हमला== &lt;br /&gt;
'''भारत पर सिकन्दर का आक्रमण मई 327 ई.पू. से मई 324 ई.पू. तक रहा।''' चंद्रगुप्त सिकन्दर का समकालीन था और स्वंय सिकन्दर से मिला भी था। यह बात हमें प्लूटार्क की रचनाओं से मालूम होती है जिसने लिखा है- ‘ऐंड्रोकोट्टोस (चन्द्रगुप्त) , जो उस समय नवयुवक ही था, स्वंय सिकन्दर से मिला था।’ सिकन्दर ने सबसे पहले ग्रीक राज्यों को जीता और फिर वह एशिया माइनर (आधुनिक तुर्की) की तरफ बढ़ा। उस क्षेत्र पर उस समय फ़ारस का शासन था। फ़ारसी साम्राज्य मिस्र से लेकर पश्चिमोत्तर भारत तक फैला था। फ़ारस के शाह दारा तृतीय को उसने तीन अलग-अलग युद्धों में पराजित किया हालाँकि उसकी तथाकथित 'विश्व-विजय' फ़ारस विजय से अधिक नहीं थी पर उसे शाह दारा के अलावा अन्य स्थानीय प्रांतपालों से भी युद्ध करना पड़ा था। मिस्र, बॅक्ट्रिया, तथा आधुनिक ताज़िकिस्तान में स्थानीय प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। ऐसी मान्यता है और उल्लेख हैं कि भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के समय चाणक्य तक्षशिला में प्राध्यापक था। तक्षशिला और गान्धार के राजा आम्भि ने सिकन्दर से समझौता कर लिया। चाणक्य ने भारत की संस्कृति को विदेशियों से बचाने के लिए सभी राजाओं से आग्रह किया किन्तु सिकन्दर से लड़ने कोई नहीं आया। पुरु ने सिकन्दर से युद्ध किया किन्तु हार गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिकन्दर के आक्रमण ने पंजाब की इन स्वतंत्र जातियों की रणक्षमता तथा वीरता को प्रकट कर दिया। युवक चंद्रगुप्त ने इन बातों को अवश्य देखा होगा। सिकन्दर के आक्रमणों के विरुद्ध उनके प्रतिरोध की कहानी सिकन्दर की विजय की कहानी से कम प्रेरणाप्रद नहीं है। भारत के विभिन्न स्थानों में सिकन्दर का जो विरोध किया गया, उसका मूल्यांकन स्वंय यूनानियों द्वारा उल्लिखित तथ्यों तथा आंकड़ों के आधार पर किया जा सकता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=40 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसरी शताब्दी ई.पू. में जिन यूरोपीय राजदूतों को यूनानी राजाओं ने भारत भेजा था, उनमें से कुछ ने सिकन्दर के इन साथियों की रचनाओं में पूरक जोड़े हैं।:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#स्त्राबो : इसका जीवनकाल लगभग 64 ई.पू. से 19 ई. तक था। इसने भूगोल की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक के 15वें भाग का प्रथम अध्याय भारत के बारे में है, इसमें सिकन्दर के साथियों तथा मेगास्थनीज़ की रचनाओं से ली गई सामग्री के आधार पर भारत के भूगोल, उसके निवासियों के रहन-सहन तथा रीति-रिवाजों का वर्णन किया गया है। &lt;br /&gt;
#डियोडोरस 36 ई.पू. तक जीवित रहा। इसने मेगास्थनीज़ की रचनाओं के आधार पर भारत का एक वृत्तांत लिखा। &lt;br /&gt;
#प्लिनी ज्येष्ठ, जो नेचरल हिस्ट्री (प्रकृति वृत्त) नामक विशद ज्ञानकोष का रचयिता है। उसकी यह रचना लगभग 75 ई. में प्रकाशित हुई थी। इसमें यूनानी रचनाओं तथा व्यापारियों के नवीनतम विवरणों के आधार पर भारत का विवरण दिया गया था। &lt;br /&gt;
#एर्रियान : इसका जन्म लगभग 130 ई. में हुआ था। यह कम से कम 172 ई. तक जीवित रहा। इसने सिकन्दर के अभियानों का सबसे अच्छा वृत्तांत (ऐनाबेसिस) लिखा और निआर्कस, मेगास्थनीज़ तथा भूगोलवेत्ता एराटोस्थनीज़ (276-195 ई.पू.) की रचनाओं के आधार पर भारत, उसके भूगोल, वहाँ के रहन-सहन तथा रीति-रिवाजों के बारे में एक छोटी-सी पुस्तक लिखी है। &lt;br /&gt;
#प्लूटार्क (लगभग 45-125 ई.), जिसकी लाइव्स (जीवनियाँ) नामक रचना के 57वें से 67वें अध्यायों तक सिकन्दर की जीवनी दी गई है। उन अध्यायों में भारत का भी विवरण मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://penelope.uchicago.edu/Thayer/E/Roman/Texts/Plutarch/Lives/Alexander*/9.html |title=Plutarch: Life of Alexander |accessmonthday=18 अक्टूबर |accessyear=2011 |last= |first= |authorlink= |format=एच टी एम एल |publisher=penelope.uchicago.edu |language=अंग्रेज़ी }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#जस्टिन : यह दूसरी शताब्दी ईसवी में हुआ था। इसने एक एपिटोम (सारसंग्रह) की रचना की थी जिसके 12वें खंड में भारत में सिकन्दर के विजय-अभियानों का विवरण दिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===लेखकों के वृत्तांत===&lt;br /&gt;
मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त को [[नंद वंश]] के उन्मूलन तथा पंजाब-सिंध में विदेशी शासन का अंत करने का ही श्रेय नहीं है वरन उसने [[भारत]] के अधिकांश भाग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। &lt;br /&gt;
*प्लूटार्क ने लिखा है कि चंद्रगुप्त ने 6 लाख सेना लेकर समूचे भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। &lt;br /&gt;
*जस्टिन के अनुसार सारा भारत उसके क़ब्ज़े में था। &lt;br /&gt;
*[[महावंश]] में कहा गया है कि [[कौटिल्य]] ने चंद्रगुप्त को जंबूद्वीप का सम्राट बनाया। &lt;br /&gt;
*प्लिनी ने, जिसका वृत्तान्त [[मैगस्थनीज़]] की इंडिका पर आधारित है, लिखा है कि [[मगध]] की सीमा [[सिंधु नदी]] है। पश्चिम में [[सौराष्ट्र]] चंद्रगुप्त के अधिकार में था। इसकी पुष्टि [[शक]] [[महाक्षत्रप]] [[रुद्रदामन]] के जूनागढ़ अभिलेख से होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चन्द्रगुप्त का मगध पर आक्रमण==&lt;br /&gt;
चाणक्य तथा चंद्रगुप्त ने सबसे पहले सीमांत के देशों पर आक्रमण किया (अंतोजनपदं पविसित्वा) और सार्वभौम सत्ताप्राप्त करने की इच्छा से (रज्जम इच्छंतो) उनके गाँवों को लूटना आरंभ किया। (गामाघाटादिकम्मम्)। चंद्रगुप्त सीमांत से भारत के अंत: प्रदेश की ओर मगध तथा पाटलिपुत्र की ओर बढ़ रहा था, परंतु पहले उसने रणनीति में ग़लतियाँ की। एक कहानी इस प्रकार प्रचलित है:- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:&amp;quot;इनमें से किसी गाँव में एक स्त्री ने (जिसके घर में चंद्रगुप्त के एक गुप्तचर ने शरण ले रखी थी) रोटी पकाकर अपने बच्चे को दी। बच्चे ने रोटी के किनारे छोड़कर केवल बीच का भाग खा लिया और किनारे फेंककर और रोटी माँगने लगा। इस पर वह स्त्री बोली, 'यह लड़का तो बिलकुल वैसी ही बात कर रहा है जैसी चंद्रगुप्त ने राज्य पर आक्रमण करने में की है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
:लड़का बोला, ' क्यों माँ, मैं क्या कर रहा हूँ और चंद्रगुप्त ने क्या किया है? 'वह और बोली, बच्चे, तू रोटी का किनारा-किनारा छोड़कर केवल बीच का भाग खा रहा है। ऐसे ही चंद्रगुप्त ने राजा बनने की महत्त्वाकांक्षा में सीमांत प्रदेशों से आरंभ किए बिना और रास्ते में पड़नेवाले नगरों पर अधिकार किए बिना देश के अंतराल पर आक्रमण कर दिया हैं...... और उसकी सेना को घेरकर नष्ट कर दिया गया है। यह उसकी मूर्खता थी&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;महावंश टीका, पृष्ठ.123, परिशिष्ट1&amp;lt;/ref&amp;gt;। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बाद चंद्रगुप्त ने दूसरी पद्धति अपनाई। उसने सीमांत प्रदेशों से अपना विजय-अभियान आरंभ किया (पच्चंततो पट्ठाय) और रास्ते में पड़नेवाले अनेक राष्ट्रों तथा जनपदों पर विजय प्राप्त की; पर उसने एक गलती यह की कि अपनी विजयों को सुरक्षित रखने के लिए उसने पीछे अपनी सेनाएँ नहीं नियुक्त कीं। परिणाम यह हुआ कि जैसे-जैसे वह आगे बढता गया, वैसे-वैसे जिन जातियों को पराजित करके वह पीछे छोड़ता गया, वे स्वतंत्रतापूर्वक आपस में मिल सकती थीं। और उसकी सेना को घेरकर उसकी योजनाओं को निष्फल बना सकती थीं। तब उसे सही रणनीति सूझी। वह जैसे-जैसे इन राष्ट्रों तथा जनपदों पर विजय प्राप्त करता गया वैसे-वैसे वह वहाँ अपनी सेनाएँ भी नियुक्त करता गया (उग्गहितनया बलम् संविधाय) और फिर उसने अपनी विजयी सेना के साथ मगध की सीमा में प्रवेश करके पाटलिपुत्र पर घेरा डाला और घननंद को मार डाला।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=51 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त तथा नंद के बीच जो लड़ाई हुई उसका विवरण नहीं मिलता। परिशिष्टपर्वन नामक जैनग्रंथ के छंद में&amp;lt;ref&amp;gt;VIII, 253-54&amp;lt;/ref&amp;gt; कहा  गया है कि 'नंद के शासन को समूल नष्ट करने के लिए जमीन के नीचे छिपाकर रखे गए घनकोषों की सहायता से चाणक्य ने चंद्रगुप्त की सेना के लिए सैनिक भरती किए।' &amp;quot;कुछ गोलों ने यह मत भी व्यक्त किया है कि कदाचित नंद के विरुद्ध अपनी लड़ाई में उसने यूनानी वेतन भोगी सैनिकों को भी इस्तेमाल किया होगा&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;कैंब्रिज हिस्ट्री, पृ.435&amp;lt;/ref&amp;gt;।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=53 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसने जो विजय प्राप्त कीं उनके फलस्वरुप यह राज्य और भी बढ़ गया। इसके बाद के चंद्रगुप्त के जीवन का पता हमें प्लूटार्क के निम्नलिखित वक्तव्य से चल सकता है &amp;quot;इसके कुछ ही समय बाद ऐंड्रोकोट्टस&amp;lt;ref&amp;gt;'एंड्रोकोट्टस' और 'सैंड्रोकोट्टस' दोनों चन्द्रगुप्त के ही नाम हैं जो यूनानी ग्रंथों में पाये जाते हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; ने, जो उसी समय राजसिंहासन पर बैठा था, सेल्यूकस को 500 हाथी भेंट किए और 6,00,000 की सेना लेकर सारे भारत को अपने अधीन कर लिया।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;लाइव्स, अध्याय 42&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=54 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अभिलेख==&lt;br /&gt;
*[[मैसूर]] से प्राप्त कुछ शिलालेखों के अनुसार उत्तरी मैसूर में चंद्रगुप्त का शासन था। &lt;br /&gt;
*एक अभिलेख मिला है जिसके अनुसार शिकापुर ताल्लुके के नागरखंड की रक्षा मौर्यों की ज़िम्मेदारी थी। यह उल्लेख 14वीं शताब्दी का है।  &lt;br /&gt;
*[[अशोक]] के शिलालेखों से भी स्पष्ट है कि मैसूर [[मौर्य साम्राज्य]] का महत्त्वपूर्ण अंग था। &lt;br /&gt;
*[[प्लूटार्क]], [[जस्टिन]], तमिल ग्रंथों तथा मैसूर के अभिलेखों के सम्मिलित प्रमाणों से स्पष्ट है कि प्रथम मौर्य सम्राट ने विध्य पार के काफ़ी भारतीय हिस्सों को अपने साम्राज्य में मिला लिया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजनीतिक परिस्थितियाँ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:maurya-empire.jpg|thumb|200px|चंद्रगुप्त मौर्य का सभा गृह&amp;lt;br /&amp;gt;The court of Chandragupta Maurya]]&lt;br /&gt;
जिस समय चंद्रगुप्त मौर्य साम्राज्य के निर्माण में तत्पर था, सिकन्दर का सेनापति [[सेल्यूकस]] अपनी महानता की नींव डाल रहा था। सिकन्दर की मृत्यु के बाद उसके सेनानियों में यूनानी साम्राज्य की सत्ता के लिए संघर्ष हुआ, जिसके परिणामस्वरूप सेल्यूकस, पश्चिम [[एशिया]] में प्रभुत्व के मामले में, [[ऐन्टिगोनस]] का प्रतिद्वन्द्वी बना। ई. पू. 312 में उसने [[बेबिलोन]] पर अपना अधिकार स्थापित किया। इसके बाद उसने [[ईरान]] के विभिन्न राज्यों को जीतकर बैक्ट्रिया पर अधिकार किया। अपने पूर्वी अभियान के दौरान वह भारत की ओर बढ़ा। ई. पू. 305-4 में [[काबुल]] के मार्ग से होते हुए वह [[सिंधु नदी]] की ओर बढ़ा। उसने सिंधु नदी पार की और चंद्रगुप्त की सेना से उसका सामना हुआ। सेल्यूकस पंजाब और सिंधु पर अपना प्रभुत्व पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से आया था। किन्तु इस समय की राजनीतिक स्थिति सिकन्दर के आक्रमण के समय से काफ़ी भिन्न थी। यूनानी लेखक स्त्रावो के अनुसार, चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में [[अग्रोनोमोई]] नामक अधिकारी नदियों की देखभाल, भूमि की नापजोख, जलाशयों का निरीक्षण और नहरों की देखभाल करते थे, ताकि सभी लोगों को पानी ठीक से मिल सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''[[पंजाब]] और सिंधु अब परस्पर युद्ध करने वाले छोटे-छोटे राज्यों में विभिक्त नहीं थे, बल्कि एक साम्राज्य का अंग थे। आश्चर्य की बात है कि यूनानी तथा [[रोमी]] लेखक, सेल्यूकस और चंद्रगुप्त के बीच हुए युद्ध का कोई विस्तृत ब्यौरा नहीं देते।''' &lt;br /&gt;
केवल [[एप्पियानस]] ने लिखा है कि &amp;quot;सेल्यूकस ने सिंधु नदी पार की और भारत के सम्राट चंद्रगुप्त से युद्ध छेड़ा। अंत में उनमें संधि हो गई और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हो गया।&amp;quot; जस्टिन के अनुसार चंद्रगुप्त से संधि करके और अपने पूर्वी राज्य को शान्त करके सेल्यूकस एण्टीगोनस से युद्ध करने चला गया। एप्पियानस के कथन से स्पष्ट है कि सेल्यूकस चंद्रगुप्त के विरुद्ध सफलता प्राप्त नहीं कर सका। अपने पूर्वी राज्य की सुरक्षा के लिए सेल्यूकस ने चंद्रगुप्त से संधि करना ही उचित समझा और उस संधि को उसने वैवाहिक सम्बन्ध से और अधिक पुष्ट कर लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 युद्धोपयोगी हाथी उपहार में देकर इस मैत्री को सुदृढ़ बनाने में अपना योगदान किया। यह उपहार सेल्यूकस के लिए बहुत बहुमूल्य था, क्योंकि उसके संघ के कैसेंडर, लाइसिमैकस तथा तोलेमी नामक राजाओं ने जो उसके मित्र थे, अपने समान शत्रु ऐंटिगोनस के विरुद्ध, उससे सहायता माँगी थी जिसके कारण वह बहुत चिंतित था। चंद्रगुप्त के दिए हुए हाथी ठीक समय पर इप्टस के रणक्षेत्र में पहुँच गए और ऐंटीगोनस का बना-बनाया खेल बिगड़ गया। जब चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को हाथी भेंट किए तो उसके बाद पश्चिमी देशों में लड़े जानेवाले युद्धों के लिए उनकी माँग होने लगी। 281 ई. पू. में पाइर्रहोम इन हाथियों को एपिरोस से इटली ले गया। 251 ई. पू. में हैसड्रबुल ने पैनोरमन में 'भारतीय' महावतों द्वारा चलाए जानेवाले हाथी इस्तेमाल किए। रोम के विरुद्ध द्वितीत प्यूनिक युद्ध में हैनिबाल तथा हैसड्रबुल ने इन्हीं हाथियों को इस्तेमाल किया और '''राफ़िया की लड़ाई में तोलेमी के लीबियाई हाथी ऐंटीओकस के भारतीय हाथियों के सामने जरा देर न टिक सके'''&amp;lt;ref&amp;gt;वारमिंगटन. कामर्स बिटविन रोमन एंपायर ऐंड इंडिया, पृष्ठ 151&amp;lt;/ref&amp;gt;।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=55 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==विवाह==&lt;br /&gt;
*[[स्ट्रैबो]] का कथन है कि सेल्यूकस ने [[ऐरियाना]] के प्रदेश, चंद्रगुप्त को विवाह-सम्बन्ध के फलस्वरूप दिए। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यूनानी राजकुमारी मौर्य सम्राट को ब्याही गई और ये प्रदेश दहेज के रूप में दिए गए। इतिहासकारों का आमतौर पर यह मत है कि सेल्यूकस ने चंद्रगुप्त को चार प्रान्त दहेज में दिए। :-&lt;br /&gt;
#एरिया अर्थात [[काबुल]] &lt;br /&gt;
#अराकोसिया अर्थात [[कंधार]] &lt;br /&gt;
#जेड्रोसिया अर्थात [[मकरान]] &lt;br /&gt;
#परीपेमिसदाई अर्थात [[हेरात]] प्रदेश&lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
*[[अशोक]] के लेखों से सिद्ध होता है कि काबुल की घाटी मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत थी। इन अभिलेखों के अनुसार योन, [[यवन]] [[गांधार]] भी मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत थे। &lt;br /&gt;
*प्लूटार्क के अनुसार चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 [[हाथी]] उपहार में दिए। सम्भवतः इस संधि के परिणामस्वरूप ही हिन्दुकुश मौर्य साम्राज्य और सेल्यूकस के राज्य के बीच की सीमा बन गया। 2,000 से अधिक वर्ष पूर्व भारत के प्रथम सम्राट ने उस प्राकृतिक सीमा को प्राप्त किया जिसके लिए अंग्रेज़ तरसते रहे और जिसे [[मुग़ल]] सम्राट भी पूरी तरह प्राप्त करने में असमर्थ रहे। वैवाहिक सम्बन्ध से मौर्य सम्राटों और सेल्यूकस वंश के राजाओं के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध का सूत्रपात हुआ। सेल्यूकस ने अपने राजदूत [[मेगस्थनीज़]] को चंद्रगुप्त के दरबार में भेजा। ये मैत्री सम्बन्ध दोनों के उत्तराधिकारियों के बीच भी बने रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==योग्य शासक==&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त एक कुशल योद्धा, सेनानायक तथा महान विजेता ही नहीं था, वरन एक योग्य शासक भी था। इतने बड़े साम्राज्य की शासन - व्यवस्था कोई सरल कार्य नहीं था। अतः अपने मुख्यमंत्री [[कौटिल्य]] की सहायता से उसने एक ऐसी शासन - व्यवस्था का निर्माण किया जो उस समय के अनुकूल थी। यह शासन व्यवस्था एक हद तक [[मगध]] के पूर्वगामी शासकों द्वारा विकसित शासनतंत्र पर आधारित थी किन्तु इसका अधिक श्रेय चंद्रगुप्त और कौटिल्य की सृजनात्मक क्षमता को ही दिया जाना चाहिए।  कौटिल्य ने लिखा है कि उस समय शासन तंत्र पर जो भी ग्रंथ उपलब्ध थे और भिन्न-भिन्न राज्यों में शासन - प्रणालियाँ प्रचलित थीं उन सबका भली-भाँति अध्ययन करने के बाद उसने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ &amp;quot;[[अर्थशास्त्र]]&amp;quot; लिखा। विद्वानों का विचार है कि मौर्य शासन व्यवस्था पर तत्कालीन यूनानी तथा आखमीनी शासन प्रणाली का भी कुछ प्रभाव पड़ा। चंद्रगुप्त ने ऐसी शासन व्यवस्था स्थापित की जिसे परवर्ती भारतीय शासकों ने भी अपनाया। &lt;br /&gt;
*इस शासन की मुख्य विशेषताएँ थीं - &lt;br /&gt;
#सत्ता का अत्यधिक केन्द्रीकरण, &lt;br /&gt;
#विकसित आधिकारिक तंत्र, &lt;br /&gt;
#उचित न्याय व्यवस्था, &lt;br /&gt;
#[[नगर-शासन]], [[कृषि]], [[शिल्प उद्योग]], [[संचार]], [[वाणिज्य]] एवं व्यापार की वृद्धि के लिए राज्य के द्वारा अनेक कारगर उपाय।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त के शासन प्रबन्ध का उद्देश्य लोकहित था। जहाँ एक ओर आर्थिक विकास एवं राज्य की समृद्धि के अनेक ठोस क़दम उठाए गए और शिल्पियों एवं व्यापारियों के जान - माल की सुरक्षा की गई, वहीं दूसरी ओर जनता को उनकी अनुचित तथा शोषणात्मक कार्य-विधियों से बचाने के लिए कठोर नियम भी बनाए गए। [[दास|दासों]] और कर्मकारों को मालिकों के अत्याचार से बचाने के लिए विस्तृत नियम थे। अनाथ, दरिद्र, मृत सैनिकों तथा राजकर्मचारियों के परिवारों के भरण - पोषण का भार राज्य के ऊपर था। तत्कालीन मापदंड के अनुसार चंद्रगुप्त का शासन - प्रबन्ध एक कल्याणकारी राज्य की धारणा को चरितार्थ करता है। यह शासन निरकुंश था, दंड व्यवस्था कठोर थी और व्यक्ति की स्वतंत्रता का सर्वथा अभाव था, किन्तु यह सब नवज़ात साम्राज्य की सुरक्षा तथा प्रजा के हितों को ध्यान में रखकर किया गया था। चंद्रगुप्त की शासन व्यवस्था का चरम लक्ष्य [[अर्थशास्त्र]] के निम्न उद्धरण से व्यक्त होता है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;quot;प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा की भलाई में उसकी भलाई। राजा को जो अच्छा लगे वह हितकर नहीं है, वरन हितकर वह है जो प्रजा को अच्छा लगे।&amp;quot;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि कौटिल्य ने राजा के समक्ष प्रजाहितैषी राजा का आदर्श रखा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धार्मिक रुचि==&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त धर्म में भी रुचि रखता था। यूनानी लेखकों के अनुसार जिन चार अवसरों पर राजा महल से बाहर जाता था, उनमें एक था [[यज्ञ]] करना। कौटिल्य उसका पुरोहित तथा मुख्यमंत्री था। [[हेमचंद्र]] ने भी लिखा है कि वह ब्राह्मणों का आदर करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जैनियों का दावा है कि चंद्रगुप्त ने अपने जीवन के अंतिम समय में जैन मत स्वीकार कर लिया था और अपने पुत्र को राज्य देकर संन्यासी हो गया था। एक जैन मुनि और अनेक अन्य साधुओं के साथ वह दक्षिण भारत गया, जहाँ उसने जैन धर्म की परंपरागत रीति से धीरे-धीरे अनाहार द्वारा अपने जीवन का अंत कर लिया।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=भारत का इतिहास  |लेखक=रोमिला थापर  |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |संकलन= |संपादन= |पृष्ठ संख्या=62 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[मेगस्थनीज़]] ने लिखा है कि चंद्रगुप्त वन में रहने वाले तपस्वियों से परामर्श करता था और उन्हें [[देवता|देवताओं]] की पूजा के लिए नियुक्त करता था। वर्ष में एक बार विद्वानों (ब्राह्मणों) की सभा बुलाई जाती थी ताकि वे जनहित के लिए उचित परामर्श दे सकें। दार्शनिकों से सम्पर्क रखना चंद्रगुप्त की जिज्ञासु प्रवृत्ति का सूचक है। [[जैन]] अनुयायियों के अनुसार जीवन के अन्तिम चरण में चंद्रगुप्त ने [[जैन धर्म]] स्वीकार कर लिया। कहा जाता है कि जब मगध में 12 वर्ष का दुर्भिक्ष पड़ा तो चंद्रगुप्त राज्य त्यागकर जैन आचार्य [[भद्रबाहु]] के साथ [[श्रवण बेल्गोला]] (मैसूर के निकट) चला गया और एक सच्चे जैन भिक्षु की भाँति उसने निराहार समाधिस्थ होकर प्राणत्याग किया (अर्थात केवल्य प्राप्त किया)। 900 ई. के बाद के अनेक अभिलेख भद्रबाहु और चंद्रगुप्त का एक साथ उल्लेख करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिकंदर की मृत्यु के बाद उसकी सेनापति [[सेल्यूकस]] यूनानी साम्राज्य का शासक बना और उसने चंद्रगुप्त मौर्य पर आक्रमण कर दिया। पर उसे मुँह की खानी पड़ी। [[काबुल]], [[हेरात]], [[कंधार]], और [[बलूचिस्तान]] के प्रदेश देने के साथ-साथ वह अपनी पुत्री हेलना का विवाह चंद्रगुप्त से करने के लिए बाध्य हुआ। इस पराजय के बाद अगले सौ वर्षो तक यूनानियों को भारत की ओर मुँह करने का साहस नहीं हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त मौर्य का शासन-प्रबंध बड़ा व्यवस्थित था। इसका परिचय यूनानी राजदूत [[मेगस्थनीज़]]  के विवरण और कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' से मिलता है। लगभग-300 ई. पू. में चंद्रगुप्त ने अपने पुत्र [[बिंदुसार]] को गद्दी सौंप दी। &lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति               &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक2&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{refbox}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{मौर्य काल}}&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:मौर्य काल]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=232426</id>
		<title>चंद्रगुप्त मौर्य</title>
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		<updated>2011-11-05T13:35:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{प्रतीक्षा|तिथि-समय=20:23, 18 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा ऐतिहासिक शासक&lt;br /&gt;
|चित्र=Chandragupt-Maurya-Stamp.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=चक्रवर्ती सम्राट चन्द्र गुप्त मौर्य&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=340 ई. पू.&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= मगध, भारत&lt;br /&gt;
|पिता/माता= &amp;quot;मुरा या मोरा&amp;quot; (माता) &lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान= [[बिन्दुसार]]&lt;br /&gt;
|उपाधि= सम्राट&lt;br /&gt;
|राज्य सीमा=सम्पूर्ण भारत (लगभग)&lt;br /&gt;
|शासन काल=322 से 298 ई. पू.&lt;br /&gt;
|शासन अवधि=24 वर्ष (लगभग)&lt;br /&gt;
|धार्मिक मान्यता=[[वैदिक]] और [[जैन]]&lt;br /&gt;
|राज्याभिषेक=322 ई.पू.&lt;br /&gt;
|युद्ध=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=भारत का प्रथम 'ऐतिहासिक सम्राट'&lt;br /&gt;
|निर्माण=&lt;br /&gt;
|सुधार-परिवर्तन=&lt;br /&gt;
|राजधानी=पाटलिपुत्र &lt;br /&gt;
|पूर्वाधिकारी= [[धनानंद]]&lt;br /&gt;
|राजघराना=&lt;br /&gt;
|वंश=मौर्य वंश&lt;br /&gt;
|मृत्यु तिथि= 298 ई पू (42 वर्ष में)&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान= श्रवानाबेलागोला, [[कर्नाटक]]&lt;br /&gt;
|स्मारक=&lt;br /&gt;
|मक़बरा=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[चाणक्य]] '''.''' [[अशोक]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1='चन्द्रगुप्त' (सॅन्द्रोकिप्तॅश) यूनानी उच्चारण&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[चित्र:Chandragupta-greek-1.ogg|thumb|''सॅन्द्रोकिप्तॅश'']]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''चक्रवर्ती सम्राट चन्द्र गुप्त मौर्य''' (शासनकाल: 322 से 298 ई. पू.तक) की गणना भारत के महानतम शासकों में की जाती है। उसकी महानता की सूचक अनेक उपाधियाँ हैं और उसकी महानता कई बातों में अद्वितीय भी है। वह भारत के प्रथम ‘ऐतिहासिक’ सम्राट के रूप में हमारे सामने आता है, इस अर्थ में कि वह भारतीय इतिहास का '''पहला सम्राट है जिसकी ऐतिहासिकता प्रमाणित कालक्रम के ठोस आधार पर सिद्ध की जा सकती है।'''&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=13 |url=}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आरम्भिक जीवन==&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त के प्रारम्भिक जीवन के बारे में जानकारी हमें बौद्ध कथाओं से प्राप्त होती है। इन कथाओं का स्रोत मुख्यत: दो रचनाओं में मिलता है:&lt;br /&gt;
#महावंस टीका, जिसे वंसत्थप्पकासिनी भी कहते हैं (जिसकी रचना लगभग 10वीं शताब्दी ईसवी के मध्य हुई थी) और &lt;br /&gt;
#महाबोधिवंस, जिसके रचयिता उपतिस्स हैं (लगभग 10वीं शताब्दी ईसवी के उत्तरार्द्ध में)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन दोनों ही ग्रन्थों का आधार, सीहलट्ठकथा तथा उत्तरविहारट्ठकथा नामक प्राचीन ग्रन्थ हैं। सीहलट्ठकथा के बारे में कहा जाता है कि उसकी रचना थेर महिंद (अशोक का पुत्र) तथा उनके साथ मगध से आए हुए अन्य भिक्षुओं ने की थी, जिन्हें संघ के प्रधान ने धर्मप्रचार के लिए लंका भेजा था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=30 |url=}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===जन्म और वंश===&lt;br /&gt;
====इस संबंध विभिन्न मत हैं:-====&lt;br /&gt;
*चंद्रगुप्त के वंश के सम्बन्ध में ब्राह्मण, बौद्ध एवं जैन परम्पराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह किसी कुलीन घराने से सम्बन्धित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है।चंद्रगुप्त के वंश के समान उसके आरम्भिक जीवन के पुनर्गठन का भी आधार किंवदंतियाँ एवं परम्पराएँ ही अधिक हैं और ठोस प्रमाण कम हैं। इस सम्बन्ध में चाणक्य चंद्रगुप्त कथा का सारांश उल्लेखनीय है। जिसके अनुसार नंद वंश द्वारा अपमानित किए जाने पर चाणक्य ने उसे समूल नष्ट करने का प्रण किया। संयोगवश उसकी भेंट चंद्रगुप्त से हो गई और वह उसे तक्षशिला ले गया।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=प्राचीन भारत का इतिहास |लेखक=द्विजेन्द्र नारायण झा, कृष्ण मोहन श्रीमाली |प्रकाशक=दिल्ली विश्वविद्यालय  |पृष्ठ संख्या=174-175 |}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*धुंढिराज&amp;lt;ref&amp;gt;[[विशाखदत्त]] के प्रसिद्ध नाटक मुद्राराक्षस का टीकाकार&amp;lt;/ref&amp;gt; के मतानुसार चंद्रगुप्त का पिता मौर्य था और सर्वार्थसिद्धि ने अपना सेनापति अपने नंद पुत्रों को न बनाकर मौर्य को बनाया था, इस पर नंद बंधुओं ने छल से मौर्य तथा उसके सब पत्रों को मरवा दिया, केवल चंद्रगुप्त भाग निकला। नंदों का एक दूसरा शत्रु चाणक्य भी था। समान शत्रुता के कारण ये दोनों मित्र बन गए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*मौर्यवंश का संस्थापक। उसके माता-पिता के नाम ठीक-ठीक ज्ञात नहीं हैं। पुराणों के अनुसार वह मगध के राजा नन्द का उपपुत्र था, जिसका जन्म मुरा नामक शूद्रा दासी से हुआ था। बौद्ध और जैन सूत्रों से पता चलता है। कि चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म पिप्पलिवन के मोरिय क्षत्रिय कुल में  हुआ था। जो भी हो चन्द्रगुप्त प्रारंभ से ही बहुत साहसी व्यक्ति था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=भारतीय इतिहास कोश |लेखक=सच्चिदानंद भट्टाचार्य |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या=143-144 |url=}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[विशाखदत्त]] के नाटक ''''मुद्राराक्षस' में चंद्रगुप्त को नंदपुत्र न कहकर मौर्यपुत्र कहा गया है।''' फिर भी उसे ‘नंदवंश की सन्तान’ कहा गया है, क्योंकि वह सर्वार्थसिद्धि के पुत्र मौर्य का बेटा था और सर्वार्थसिद्धि नौ नंदों का पिता था और स्वंय नंदवंश की सन्तान था। इस बूढ़े राजा को भी नंद कहा गया है। नाटक में दिखाया गया है कि राक्षस के परामर्श से वह पाटलिपुत्र छोड़कर वन में भाग गया था क्योंकि चंद्रगुप्त तथा चाणक्य ने एक-एक करके उसके सभी पुत्रों (नौ नंदों को) मरवा डाला था। फिर भी चंद्रगुप्त को अपने पिता का हत्यारा नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसे कहीं नंदपुत्र नहीं कहा गया है। वह उन नौ नंदों में से किसी की भी सन्तान नहीं था। उसके लिए जिस दूसरे शब्द ‘मौर्यपुत्र’ का प्रयोग किया गया, उसके कारण वह इस जघन्य अपराध के दोष से मुक्त हो गया है&amp;lt;ref&amp;gt;सी.डी. चटर्जी | इंडियन कल्चर में आब्ज़र्वेशंस ऑन दि बृहत्कथा | खंड 1- पृष्ठ 221&amp;lt;/ref&amp;gt;।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=26}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*वृत्तांतों के अनुसार चंद्रगुप्त का जन्म मोरिय नामक क्षत्रिय जाति में हुआ था जिनका शाक्यों के साथ सम्बन्ध था। अपनी जन्मभूमि छोड़कर चली आने वाली मोरिय जाति का मुखिया चंद्रगुप्त का पिता था। दुर्भाग्यवश वह सीमांत पर एक झगड़े में मारा गया और उसका परिवार अनाथ रह गया। उसकी अबला विधवा अपने भाइयों के साथ भागकर पुष्यपुर (=कुसुमपुर =पाटलिपुत्र) नामक नगर में पहुँची, जहाँ उसने चंद्रगुप्त को जन्म दिया। सुरक्षा के विचार से इस अनाथ बालक को उसके मामाओं ने एक गोशाला में छोड़ दिया, जहाँ एक गड़रिए ने अपने पुत्र की तरह उसका लालन-पालन किया और जब वह बड़ा हुआ तो उसे एक शिकारी के हाथ बेच दिया, जिसने उसे गाय-भैंस चराने के काम पर लगा दिया। कहा जाता है कि एक '''साधारण ग्रामीण बालक चंद्रगुप्त ने राजकीलम नामक एक खेल का आविष्कार करके जन्मजात नेता होने का परिचय दिया।''' इस खेल में वह राजा बनता था और अपने साथियों को अपना अनुचर बनाता था। वह राजसभा भी आयोजित करता था जिसमें बैठकर वह न्याय करता था। गाँव के बच्चों की एक ऐसी ही राजसभा में चाणक्य ने पहली बार चंद्रगुप्त को देखा था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=30 |url=}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कुछ लोग चंद्रगुप्त को मुरा नाम की शूद्र स्त्री के गर्भ से उत्पन्न नंद सम्राट की संतान बताते हैं पर बौद्ध और जैन साहित्य के अनुसार यह मौर्य (मोरिय) कुल में जन्मा था और नंद राजाओं का महत्त्वाकांक्षी सेनापति था। चंद्रगुप्त के वंश और जाति के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं हैं। कुछ विद्वानों ने [[ब्राह्मण ग्रंथ|ब्राह्मण ग्रंथों]], [[मुद्राराक्षस]], [[विष्णुपुराण]] की मध्यकालीन टीका तथा 10वीं शताब्दी की [[धुण्डिराज]] द्वारा रचित मुद्राराक्षस की टीका के आधार पर चंद्रगुप्त को शूद्र माना है। चंद्रगुप्त के वंश के सम्बन्ध में [[ब्राह्मण]], [[बौद्ध]] एवं [[जैन]] परम्पराओं व अनुश्रुतियों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वह किसी कुलीन घराने से सम्बन्धित नहीं था। विदेशी वृत्तांतों एवं उल्लेखों से भी स्थिति कुछ अस्पष्ट ही बनी रहती है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=प्राचीन भारत का इतिहास |लेखक=द्विजेन्द्र नारायण झा, कृष्ण मोहन श्रीमाली |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=दिल्ली विश्वविद्यालय  |पृष्ठ संख्या=174 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*बौद्ध रचनाओं में कहा गया है कि ‘नंदिन’ के कुल का कोई पता नहीं चलता (अनात कुल) और चंद्रगुप्त को असंदिग्ध रूप से अभिजात कुल का बताया गया है। चंद्रगुप्त के बारे में कहा गया है कि वह मोरिय नामक क्षत्रिय जाति की संतान था; मोरिय जाति शाक्यों की उस उच्च तथा पवित्र जाति की एक शाखा थी, जिसमें महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। कथा के अनुसार, जब अत्याचारी कोसल नरेश विडूडभ ने शाक्यों पर आक्रमण किया तब मोरिय अपनी मूल बिरादरी से अलग हो गए और उन्होंने हिमालय के एक सुरक्षित स्थान में जाकर शरण ली। यह प्रदेश मोरों के लिए प्रसिद्ध था, जिस कारण वहाँ आकर बस जाने वाले ये लोग मोरिय कहलाने लगे, जिनका अर्थ है मोरों के स्थान के निवासी। मोरिय शब्द ‘मोर’ से निकला है, जो संस्कृत के मयूर शब्द का पालि पर्याय है। &amp;lt;br /&amp;gt;एक और कहानी भी है जिसमें मोरिय नगर नामक एक स्थान का उल्लेख मिलता है। इस शहर का नाम मोरिय नगर इसलिए रखा गया था कि वहाँ की इमारतें मोर की गर्दन के रंग की ईंटों की बनी हुई थीं। जिन लोगों ने इस नगर का निर्माण किया था, वे मोरिय कहलाए। महाबोधिवंस &amp;lt;ref&amp;gt;सम्पादक: स्ट्रांग, पृष्ठ 98&amp;lt;/ref&amp;gt; में कहा गया है कि ‘कुमार’ चंद्रगुप्त, जिसका जन्म राजाओं के कुल में हुआ था (नरिंद-कुलसंभव), जो मोरिय नगर का निवासी था, जिसका निर्माण साक्यपुत्तों ने किया था, चाणक्य नामक ब्राह्मण (द्विज) की सहायता से पाटलिपुत्र का राजा बना। &amp;lt;br /&amp;gt;महाबोधिवंस में यह भी कहा गया है कि ‘चंद्रगुप्त का जन्म क्षत्रियों के मोरिय नामक वंश में’ हुआ था (मोरियनं खत्तियनं वंसे जातं)। बौद्धों के दीघ निकाय नामक ग्रन्थ में&amp;lt;ref&amp;gt;दीघ निकाय 2,167&amp;lt;/ref&amp;gt; पिप्पलिवन में रहने वाले मोरिय नामक एक क्षत्रिय वंश का उल्लेख मिलता है। दिव्यावदान&amp;lt;ref&amp;gt;सम्पादक: कावेल, पृष्ठ 370 &amp;lt;/ref&amp;gt;में बिन्दुसार (चंद्रगुप्त के पुत्र) के बारे में कहा गया है कि उसका क्षत्रिय राजा के रूप में विधिवत अभिषेक हुआ था (क्षत्रिय-मूर्धाभिषिक्त) और अशोक (चंद्रगुप्त के पौत्र) को क्षत्रिय कहा गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=28}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*एक मत कथासरित्सागर में उपलब्ध होता है। इसके अनुसार चंद्रगुप्त नन्द राजा का ही पुत्र था, और उसके अन्य कोई सन्तान नहीं थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*चंद्रगुप्त के विषय में महावंश में पाये मतानुसार अनुसार चंद्रगुप्त पिप्पलिवन के मोरिय गण का कुमार था। नन्द के साथ उसका कोई सम्बन्ध नहीं था। मोरिय गण वज्जि-महाजनपद के पड़ोस में स्थित था। उत्तरी बिहार के सब गणराज्य कौशल और मगध के साम्राज्यवाद के शिकार हो गए थे, और मोरिय गण भी मगध की अधीनता में आ गया था। इस गण की एक राजमहिषी पाटलिपुत्र में छिपकर जीवन व्यतीत कर रही थी। वहीं पर उसने चंद्रगुप्त को जन्म दिया। चंद्रगुप्त कहीं मगध के राजकर्मचारियों के हाथों में न पड़ जाए, इसलिए उसने अपने नवजात शिशु को ग्वाले के सुपुर्द कर दिया। अपनी आयु के अन्य ग्वाल-बालकों के साथ मोरिय चंद्रगुप्त का भी पालन होने लगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===चंद्रगुप्त और चाणक्य की भेंट===&lt;br /&gt;
चाणक्य ने अपनी दिव्यदृष्टि से तुरन्त इस ग्रामीण अनाथ बालक में राजत्व की प्रतिभा तथा चिह्न देखे और वहीं पर 1,000 कार्षापण देकर उसे उसके पालक-पिता से खरीद लिया। उस समय चंद्रगुप्त आठ या नौ वर्ष का बालक रहा होगा। चाणक्य जिसे तक्षशिला नामक नगर का निवासी (तक्कसिलानगर-वासी) बताया गया है, बालक को लेकर अपने नगर लौटा और 7 या 8 वर्ष तक उस प्रख्यात विद्यापीठ में उसे शिक्षा दिलाई, जहाँ जातककथाओं के अनुसार, उस समय की समस्त ‘विधाएँ तथा कलाएँ’ सिखाई जाती थीं। वहाँ चाणक्य ने उसे अप्राविधिक विषयों और व्यावहारिक तथा प्राविधिक कलाओं की भी सर्वांगीण शिक्षा दिलाई&amp;lt;ref&amp;gt;बहुसच्चाभावंच; उग्गहितसिप्पकंच&amp;lt;/ref&amp;gt;।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=30 |url=}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पालि स्रोतों से प्राप्त चंद्रगुप्त के प्रारम्भिक जीवन के इस विवरण से ''जस्टिन'' के इस कथन की भी पुष्टि होती है कि उसका जन्म एक मामूली घराने में हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=32 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मगध के राजा जाति-नियमों को वैसे ही विशेष महत्त्व नहीं देते थे; मौर्य तो आदिवासी मूल अथवा मिश्रित वंश के थे, यद्यपि उनका आर्यीकरण हो चुका था। मौर्य (पालि: मोरिय) नाम मोर टोटेम का सूचक है, यह वैदिक-आर्य नाम नहीं हो सकता।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता |लेखक=दामोदर धर्मानंद कोसंबी|अनुवादक=गुणाकर मुले |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |संकलन= |संपादन= |पृष्ठ संख्या=174 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो भी हो चन्द्रगुप्त प्रारंभ से ही बहुत साहसी व्यक्ति था। जब वह किशोर ही था, उसने पंजाब में पड़ाव डाले हुए यवन (यूनानी) विजेता सिकंदर से भेंट की। उसने अपनी स्पष्टवादिता से सिकंदर को नाराज़ कर दिया। सिकंदर ने उसे बंदी बना लेने का आदेश दिया, लेकिन वह अपने शौर्य का प्रदर्शन करता हुआ सिकंदर के शिकंजे से भाग निकला और कहा जाता है। कि इसके बाद ही उसकी भेंट तक्षशिला के एक आचार्य चाणक्य या कौटिल्य-से हुई।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=भारतीय इतिहास कोश |लेखक=सच्चिदानंद भट्टाचार्य |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान |पृष्ठ संख्या=143 |url=}} &amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
===चंद्रगुप्त की शिक्षा===&lt;br /&gt;
जातककथाओं से हमें पता चलता है कि उस समय के राजा अपने राजकुमारों को विद्योपार्जन के लिए तक्षशिला भेजा करते थे, जहाँ विश्व-विख्यात अध्यापक थे। इन कथाओं में हम पढ़ते हैं : &amp;quot;सारे भारत से क्षत्रियों तथा ब्राह्मणों के पुत्र इन अध्यापकों से विभिन्न कलाएँ सीखने आते थे।&amp;quot; तक्षशिला प्राथमिक शिक्षा का ही नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा का केन्द्र भी था। इस बात का उल्लेख मिलता है कि वहाँ बालकों को 16 वर्ष की अवस्था में अर्थात् ‘किशोरावस्था में प्रवेश करने पर’ भरती किया जाता था। इससे बड़ी अवस्था के छात्र अथवा गृहस्थ लोग भी यहाँ शिक्षा प्राप्त करते थे। वे अपने रहने आदि का प्रबंध स्वंय करते थे। '''हमें तक्षशिला के एक ऐसे अध्यापक का भी उल्लेख मिलता है, जिसकी पाठशाला में केवल राजकुमार ही पढ़ते थे, &amp;quot;उस समय भारत में इन राजकुमारों की संख्या 101 थी।&amp;quot;''' वहीं जिन विषयों की शिक्षा दी जाती थी, उनमें तीन वेदों तथा 18 ‘सिप्पों’ अर्थात् शिल्पों का उल्लेख मिलता है, जिनमें धनुर्विद्या (इस्सत्थ-सिप्प), आखेट तथा हाथियों से सम्बन्धित ज्ञान (हत्थिसुत्त) का उल्लेख किया गया है, जिन्हें राजकुमारों के लिए उपयुक्त समझा जाता था। सिद्धान्त तथा व्यवहार दोनों ही की शिक्षा दी जाती थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तक्षशिला अपनी विधिशास्त्र, चिकित्सा विज्ञान तथा सैन्यविद्या की अलग-अलग पाठशालाओं के लिए प्रख्यात था। तक्षशिला की सैनिक अकादमी का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें 103 राजकुमार शिक्षा पाते थे। एक जगह पर यह विवरण मिलता है कि किस प्रकार एक शिष्य को सैन्यविद्या की शिक्षा समाप्त कर लेने के बाद उसके गुरु ने प्रमाणपत्र के रूप में स्वंय अपनी &amp;quot;तलवार, एक धनुष और बाण, एक कवच तथा एक हीरा&amp;quot; दिया और उससे कहा कि वह उसके स्थान पर सैन्यविद्या की शिक्षा प्राप्त करने वाले 500 शिष्यों की पाठशाला के प्रधान का पद ग्रहण करे, क्योंकि वह वृद्ध हो गया है और अवकाश ग्रहण करना चाहता है&amp;lt;ref&amp;gt;विस्तृत विवरण के लिए राधाकुमुद मुखर्जी की &amp;quot;ऐन्शेंट इंडियन एजुकेशन&amp;quot;, मैकमिलंस, लंदन, नामक रचना का 19वाँ अध्याय देखिए।&amp;lt;/ref&amp;gt;। चाणक्य अपने अल्पवयस्क शिष्य की शिक्षा का इससे अच्छा कोई दूसरा प्रबंध नहीं कर सकता था कि उसे विद्योपार्जन के लिए तक्षशिला में भरती करा दे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धननंद==&lt;br /&gt;
पालि ग्रन्थों में मगध के तत्कालीन शासक का नाम [[धननंद]] बताया गया है। इसका उल्लेख संस्कृत ग्रन्थों में केवल 'नंद' के नाम से किया गया है। इसके अतिरिक्त पालि ग्रन्थों में नौ नंदों के नाम तथा उनके जीवन से सम्बन्धित कुछ बातें भी बताई गई हैं। इन ग्रन्थों से हमें पता चलता है कि नंदवंश के नौ राजा, जो सब भाई थे, बारी-बारी से अपनी आयु के क्रम से गद्दी पर बैठे&amp;lt;ref&amp;gt;वुड्ढपटिपाटिया&amp;lt;/ref&amp;gt;। '''धननंद उनमें सबसे छोटा था। सबसे बड़े भाई का नाम उग्रसेननंद बताया गया है; वही नंदवंश का संस्थापक था।''' चंद्रगुप्त की तरह ही उसका प्रारम्भिक जीवन भी अत्यन्त रोमांचपूर्ण था। वह मूलत: सीमांत प्रदेश का निवासी था (पच्चंत-वासिक); एक बार डाकुओं ने उसे पकड़ लिया और उसे मलय नामक एक सीमांत प्रदेश में ले गए&amp;lt;ref&amp;gt;मुद्राराक्षस में मलय का उल्लेख मिलता है&amp;lt;/ref&amp;gt; और उसे इस मत का समर्थक बना लिया कि लूटमार करना ज़मीन जोतने से अच्छा व्यवसाय है। वह अपने भाइयों तथा सगे-सम्बन्धियों सहित डाकुओं के एक गिरोह में भरती हो गया और शीघ्र ही उनका नेता बन बैठा। वे आसपास के राज्यों पर धावे मारने लगे (रट्ठं विलुमपमानो विचरंतो) और सीमांत के नगरों पर चढ़ाई करके (पच्चंत नगर) यह चुनौती दी : ‘या तो अपना राज्य हमारे हवाले कर दो या युद्ध करो&amp;lt;ref&amp;gt;रज्जम वा देंतु युद्धं वा&amp;lt;/ref&amp;gt;।' धीरे-धीरे वे सार्वभौम सत्ता पर अधिकार करने के स्वप्न देखने लगे&amp;lt;ref&amp;gt;सिंहली भाषा में महावंस टीका का मूलपाठ, जो श्री सी.डी. चटर्जी ने श्री राधाकुमुद मुखर्जी को पढ़कर बताया [भारतकोश टिप्पणी]&amp;lt;/ref&amp;gt;। इस प्रकार एक डाकू राजा राजाओं का राजा बन बैठा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धननंद द्वारा चाणक्य का अपमान==&lt;br /&gt;
सिकंदर के भारत आक्रमण के समय चंद्रगुप्त मौर्य की उससे [[पंजाब]] में भेंट हुई थी। किसी कारणवश रुष्ट होकर सिकंदर ने चंद्रगुप्त को क़ैद कर लेने का आदेश दिया था। पर चंद्रगुप्त उसकी चंगुल से निकल आया। इसी समय इसका संपर्क कौटिल्य या चाणक्य से हुआ। चाणक्य नंद राजाओं से रुष्ट था। उसने नंद राजाओं को पराजित करके अपनी महत्त्वाकांक्षा पूर्ण करने में चंद्रगुप्त मौर्य की पूरी सहायता की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त के वंश के समान उसके आरम्भिक जीवन के पुनर्गठन का भी आधार किंवदंतियाँ एवं परम्पराएँ ही अधिक हैं और ठोस प्रमाण कम हैं। इस सम्बन्ध में [[चाणक्य]] चंद्रगुप्त कथा का सारांश उल्लेखनीय है। जिसके अनुसार [[नंद वंश]] द्वारा अपमानित किए जाने पर चाणक्य ने उसे समूल नष्ट करने का प्रण किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस समय चाणक्य पाटलिपुत्र आया था, उस समय धनानंद वहाँ का राजा था। वह अपने धन के लोभ के लिए बदनाम था। वह ’80 करोड़ (कोटि) की सम्पत्ति’ का मालिक था और &amp;quot;खालों, गोंद, वृक्षों तथा पत्थरों तक पर कर वसूल&amp;quot; करता था। तिरस्कार में उसका नाम धननंद रख दिया गया था, क्योंकि वह ‘धन के भण्डार भरने का आदी’ था&amp;lt;ref&amp;gt;महावंस टीका&amp;lt;/ref&amp;gt;। कथासरित्सागर में नंद की ’99 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं’ का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि उसने गंगा नदी की तली में एक चट्टान खुदवाकर उसमें अपना सारा खजाना गाड़ दिया था&amp;lt;ref&amp;gt;महावंस टीका&amp;lt;/ref&amp;gt;। उसकी धन सम्पदा की ख्याति दक्षिण तक पहुँची। '''तमिल भाषा की एक कविता में उसकी सम्पदा का उल्लेख इस रूप में किया गया है''' कि &amp;quot;पहले वह पाटलि में संचित हुई और फिर गंगा की बाढ़ में छिप गई।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;ऐय्यंगर कृत-बिगिनिंग्स ऑफ़ साउथ इंडियन हिस्ट्री, पृष्ठ 89&amp;lt;/ref&amp;gt;। परन्तु चाणक्य ने उसे बिल्कुल ही दूसरे रूप में देखा। अब वह धन बटोरने के बजाए, उसे दान-पुण्य में व्यय कर रहा था; यह काम दानशाला नामक एक संस्था द्वारा संगठित किया जाता था। जिसकी व्यवस्था का संचालन एक संघ के हाथों में था, जिसका अध्यक्ष कोई ब्राह्मण होता था। '''नियम यह था कि अध्यक्ष एक करोड़ मुद्राओं तक का दान दे सकता था और संघ का सबसे छोटा सदस्य एक लाख मुद्राओं तक का।''' चाणक्य को इस संघ का अध्यक्ष चुना गया। परन्तु, होनी की बात, राजा को उसकी कुरूपता तथा उसका धृष्ट स्वभाव अच्छा न लगा और उसने उसे पदच्युत कर दिया। इस अपमान पर क्रुद्ध होकर चाणक्य ने राजा को शाप दिया, उसके वंश को निर्मूल कर देने की धमकी दी और एक नग्न आजीविक साधु के भेष में उसके चंगुल से बच निकला।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=36 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अलक्षेन्द्र (सिकन्दर) का हमला== &lt;br /&gt;
'''भारत पर सिकन्दर का आक्रमण मई 327 ई.पू. से मई 324 ई.पू. तक रहा।''' चंद्रगुप्त सिकन्दर का समकालीन था और स्वंय सिकन्दर से मिला भी था। यह बात हमें प्लूटार्क की रचनाओं से मालूम होती है जिसने लिखा है- ‘ऐंड्रोकोट्टोस (चन्द्रगुप्त) , जो उस समय नवयुवक ही था, स्वंय सिकन्दर से मिला था।’ सिकन्दर ने सबसे पहले ग्रीक राज्यों को जीता और फिर वह एशिया माइनर (आधुनिक तुर्की) की तरफ बढ़ा। उस क्षेत्र पर उस समय फ़ारस का शासन था। फ़ारसी साम्राज्य मिस्र से लेकर पश्चिमोत्तर भारत तक फैला था। फ़ारस के शाह दारा तृतीय को उसने तीन अलग-अलग युद्धों में पराजित किया हालाँकि उसकी तथाकथित 'विश्व-विजय' फ़ारस विजय से अधिक नहीं थी पर उसे शाह दारा के अलावा अन्य स्थानीय प्रांतपालों से भी युद्ध करना पड़ा था। मिस्र, बॅक्ट्रिया, तथा आधुनिक ताज़िकिस्तान में स्थानीय प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था। ऐसी मान्यता है और उल्लेख हैं कि भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के समय चाणक्य तक्षशिला में प्राध्यापक था। तक्षशिला और गान्धार के राजा आम्भि ने सिकन्दर से समझौता कर लिया। चाणक्य ने भारत की संस्कृति को विदेशियों से बचाने के लिए सभी राजाओं से आग्रह किया किन्तु सिकन्दर से लड़ने कोई नहीं आया। पुरु ने सिकन्दर से युद्ध किया किन्तु हार गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिकन्दर के आक्रमण ने पंजाब की इन स्वतंत्र जातियों की रणक्षमता तथा वीरता को प्रकट कर दिया। युवक चंद्रगुप्त ने इन बातों को अवश्य देखा होगा। सिकन्दर के आक्रमणों के विरुद्ध उनके प्रतिरोध की कहानी सिकन्दर की विजय की कहानी से कम प्रेरणाप्रद नहीं है। भारत के विभिन्न स्थानों में सिकन्दर का जो विरोध किया गया, उसका मूल्यांकन स्वंय यूनानियों द्वारा उल्लिखित तथ्यों तथा आंकड़ों के आधार पर किया जा सकता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=40 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसरी शताब्दी ई.पू. में जिन यूरोपीय राजदूतों को यूनानी राजाओं ने भारत भेजा था, उनमें से कुछ ने सिकन्दर के इन साथियों की रचनाओं में पूरक जोड़े हैं।:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#स्त्राबो : इसका जीवनकाल लगभग 64 ई.पू. से 19 ई. तक था। इसने भूगोल की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है। इस पुस्तक के 15वें भाग का प्रथम अध्याय भारत के बारे में है, इसमें सिकन्दर के साथियों तथा मेगास्थनीज़ की रचनाओं से ली गई सामग्री के आधार पर भारत के भूगोल, उसके निवासियों के रहन-सहन तथा रीति-रिवाजों का वर्णन किया गया है। &lt;br /&gt;
#डियोडोरस 36 ई.पू. तक जीवित रहा। इसने मेगास्थनीज़ की रचनाओं के आधार पर भारत का एक वृत्तांत लिखा। &lt;br /&gt;
#प्लिनी ज्येष्ठ, जो नेचरल हिस्ट्री (प्रकृति वृत्त) नामक विशद ज्ञानकोष का रचयिता है। उसकी यह रचना लगभग 75 ई. में प्रकाशित हुई थी। इसमें यूनानी रचनाओं तथा व्यापारियों के नवीनतम विवरणों के आधार पर भारत का विवरण दिया गया था। &lt;br /&gt;
#एर्रियान : इसका जन्म लगभग 130 ई. में हुआ था। यह कम से कम 172 ई. तक जीवित रहा। इसने सिकन्दर के अभियानों का सबसे अच्छा वृत्तांत (ऐनाबेसिस) लिखा और निआर्कस, मेगास्थनीज़ तथा भूगोलवेत्ता एराटोस्थनीज़ (276-195 ई.पू.) की रचनाओं के आधार पर भारत, उसके भूगोल, वहाँ के रहन-सहन तथा रीति-रिवाजों के बारे में एक छोटी-सी पुस्तक लिखी है। &lt;br /&gt;
#प्लूटार्क (लगभग 45-125 ई.), जिसकी लाइव्स (जीवनियाँ) नामक रचना के 57वें से 67वें अध्यायों तक सिकन्दर की जीवनी दी गई है। उन अध्यायों में भारत का भी विवरण मिलता है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://penelope.uchicago.edu/Thayer/E/Roman/Texts/Plutarch/Lives/Alexander*/9.html |title=Plutarch: Life of Alexander |accessmonthday=18 अक्टूबर |accessyear=2011 |last= |first= |authorlink= |format=एच टी एम एल |publisher=penelope.uchicago.edu |language=अंग्रेज़ी }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#जस्टिन : यह दूसरी शताब्दी ईसवी में हुआ था। इसने एक एपिटोम (सारसंग्रह) की रचना की थी जिसके 12वें खंड में भारत में सिकन्दर के विजय-अभियानों का विवरण दिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
===लेखकों के वृत्तांत===&lt;br /&gt;
मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त को [[नंद वंश]] के उन्मूलन तथा पंजाब-सिंध में विदेशी शासन का अंत करने का ही श्रेय नहीं है वरन उसने [[भारत]] के अधिकांश भाग पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। &lt;br /&gt;
*प्लूटार्क ने लिखा है कि चंद्रगुप्त ने 6 लाख सेना लेकर समूचे भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। &lt;br /&gt;
*जस्टिन के अनुसार सारा भारत उसके क़ब्ज़े में था। &lt;br /&gt;
*[[महावंश]] में कहा गया है कि [[कौटिल्य]] ने चंद्रगुप्त को जंबूद्वीप का सम्राट बनाया। &lt;br /&gt;
*प्लिनी ने, जिसका वृत्तान्त [[मैगस्थनीज़]] की इंडिका पर आधारित है, लिखा है कि [[मगध]] की सीमा [[सिंधु नदी]] है। पश्चिम में [[सौराष्ट्र]] चंद्रगुप्त के अधिकार में था। इसकी पुष्टि [[शक]] [[महाक्षत्रप]] [[रुद्रदामन]] के जूनागढ़ अभिलेख से होती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==चन्द्रगुप्त का मगध पर आक्रमण==&lt;br /&gt;
चाणक्य तथा चंद्रगुप्त ने सबसे पहले सीमांत के देशों पर आक्रमण किया (अंतोजनपदं पविसित्वा) और सार्वभौम सत्ताप्राप्त करने की इच्छा से (रज्जम इच्छंतो) उनके गाँवों को लूटना आरंभ किया। (गामाघाटादिकम्मम्)। चंद्रगुप्त सीमांत से भारत के अंत: प्रदेश की ओर मगध तथा पाटलिपुत्र की ओर बढ़ रहा था, परंतु पहले उसने रणनीति में ग़लतियाँ की। एक कहानी इस प्रकार प्रचलित है:- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:&amp;quot;इनमें से किसी गाँव में एक स्त्री ने (जिसके घर में चंद्रगुप्त के एक गुप्तचर ने शरण ले रखी थी) रोटी पकाकर अपने बच्चे को दी। बच्चे ने रोटी के किनारे छोड़कर केवल बीच का भाग खा लिया और किनारे फेंककर और रोटी माँगने लगा। इस पर वह स्त्री बोली, 'यह लड़का तो बिलकुल वैसी ही बात कर रहा है जैसी चंद्रगुप्त ने राज्य पर आक्रमण करने में की है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
:लड़का बोला, ' क्यों माँ, मैं क्या कर रहा हूँ और चंद्रगुप्त ने क्या किया है? 'वह और बोली, बच्चे, तू रोटी का किनारा-किनारा छोड़कर केवल बीच का भाग खा रहा है। ऐसे ही चंद्रगुप्त ने राजा बनने की महत्त्वाकांक्षा में सीमांत प्रदेशों से आरंभ किए बिना और रास्ते में पड़नेवाले नगरों पर अधिकार किए बिना देश के अंतराल पर आक्रमण कर दिया हैं...... और उसकी सेना को घेरकर नष्ट कर दिया गया है। यह उसकी मूर्खता थी&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;महावंश टीका, पृष्ठ.123, परिशिष्ट1&amp;lt;/ref&amp;gt;। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बाद चंद्रगुप्त ने दूसरी पद्धति अपनाई। उसने सीमांत प्रदेशों से अपना विजय-अभियान आरंभ किया (पच्चंततो पट्ठाय) और रास्ते में पड़नेवाले अनेक राष्ट्रों तथा जनपदों पर विजय प्राप्त की; पर उसने एक गलती यह की कि अपनी विजयों को सुरक्षित रखने के लिए उसने पीछे अपनी सेनाएँ नहीं नियुक्त कीं। परिणाम यह हुआ कि जैसे-जैसे वह आगे बढता गया, वैसे-वैसे जिन जातियों को पराजित करके वह पीछे छोड़ता गया, वे स्वतंत्रतापूर्वक आपस में मिल सकती थीं। और उसकी सेना को घेरकर उसकी योजनाओं को निष्फल बना सकती थीं। तब उसे सही रणनीति सूझी। वह जैसे-जैसे इन राष्ट्रों तथा जनपदों पर विजय प्राप्त करता गया वैसे-वैसे वह वहाँ अपनी सेनाएँ भी नियुक्त करता गया (उग्गहितनया बलम् संविधाय) और फिर उसने अपनी विजयी सेना के साथ मगध की सीमा में प्रवेश करके पाटलिपुत्र पर घेरा डाला और घननंद को मार डाला।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=51 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त तथा नंद के बीच जो लड़ाई हुई उसका विवरण नहीं मिलता। परिशिष्टपर्वन नामक जैनग्रंथ के छंद में&amp;lt;ref&amp;gt;VIII, 253-54&amp;lt;/ref&amp;gt; कहा  गया है कि 'नंद के शासन को समूल नष्ट करने के लिए जमीन के नीचे छिपाकर रखे गए घनकोषों की सहायता से चाणक्य ने चंद्रगुप्त की सेना के लिए सैनिक भरती किए।' &amp;quot;कुछ गोलों ने यह मत भी व्यक्त किया है कि कदाचित नंद के विरुद्ध अपनी लड़ाई में उसने यूनानी वेतन भोगी सैनिकों को भी इस्तेमाल किया होगा&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;कैंब्रिज हिस्ट्री, पृ.435&amp;lt;/ref&amp;gt;।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=53 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसने जो विजय प्राप्त कीं उनके फलस्वरुप यह राज्य और भी बढ़ गया। इसके बाद के चंद्रगुप्त के जीवन का पता हमें प्लूटार्क के निम्नलिखित वक्तव्य से चल सकता है &amp;quot;इसके कुछ ही समय बाद ऐंड्रोकोट्टस&amp;lt;ref&amp;gt;'एंड्रोकोट्टस' और 'सैंड्रोकोट्टस' दोनों चन्द्रगुप्त के ही नाम हैं जो यूनानी ग्रंथों में पाये जाते हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; ने, जो उसी समय राजसिंहासन पर बैठा था, सेल्यूकस को 500 हाथी भेंट किए और 6,00,000 की सेना लेकर सारे भारत को अपने अधीन कर लिया।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;लाइव्स, अध्याय 42&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=54 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अभिलेख==&lt;br /&gt;
*[[मैसूर]] से प्राप्त कुछ शिलालेखों के अनुसार उत्तरी मैसूर में चंद्रगुप्त का शासन था। &lt;br /&gt;
*एक अभिलेख मिला है जिसके अनुसार शिकापुर ताल्लुके के नागरखंड की रक्षा मौर्यों की ज़िम्मेदारी थी। यह उल्लेख 14वीं शताब्दी का है।  &lt;br /&gt;
*[[अशोक]] के शिलालेखों से भी स्पष्ट है कि मैसूर [[मौर्य साम्राज्य]] का महत्त्वपूर्ण अंग था। &lt;br /&gt;
*[[प्लूटार्क]], [[जस्टिन]], तमिल ग्रंथों तथा मैसूर के अभिलेखों के सम्मिलित प्रमाणों से स्पष्ट है कि प्रथम मौर्य सम्राट ने विध्य पार के काफ़ी भारतीय हिस्सों को अपने साम्राज्य में मिला लिया था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राजनीतिक परिस्थितियाँ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:maurya-empire.jpg|thumb|200px|चंद्रगुप्त मौर्य का सभा गृह&amp;lt;br /&amp;gt;The court of Chandragupta Maurya]]&lt;br /&gt;
जिस समय चंद्रगुप्त मौर्य साम्राज्य के निर्माण में तत्पर था, सिकन्दर का सेनापति [[सेल्यूकस]] अपनी महानता की नींव डाल रहा था। सिकन्दर की मृत्यु के बाद उसके सेनानियों में यूनानी साम्राज्य की सत्ता के लिए संघर्ष हुआ, जिसके परिणामस्वरूप सेल्यूकस, पश्चिम [[एशिया]] में प्रभुत्व के मामले में, [[ऐन्टिगोनस]] का प्रतिद्वन्द्वी बना। ई. पू. 312 में उसने [[बेबिलोन]] पर अपना अधिकार स्थापित किया। इसके बाद उसने [[ईरान]] के विभिन्न राज्यों को जीतकर बैक्ट्रिया पर अधिकार किया। अपने पूर्वी अभियान के दौरान वह भारत की ओर बढ़ा। ई. पू. 305-4 में [[काबुल]] के मार्ग से होते हुए वह [[सिंधु नदी]] की ओर बढ़ा। उसने सिंधु नदी पार की और चंद्रगुप्त की सेना से उसका सामना हुआ। सेल्यूकस पंजाब और सिंधु पर अपना प्रभुत्व पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से आया था। किन्तु इस समय की राजनीतिक स्थिति सिकन्दर के आक्रमण के समय से काफ़ी भिन्न थी। यूनानी लेखक स्त्रावो के अनुसार, चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में [[अग्रोनोमोई]] नामक अधिकारी नदियों की देखभाल, भूमि की नापजोख, जलाशयों का निरीक्षण और नहरों की देखभाल करते थे, ताकि सभी लोगों को पानी ठीक से मिल सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''[[पंजाब]] और सिंधु अब परस्पर युद्ध करने वाले छोटे-छोटे राज्यों में विभिक्त नहीं थे, बल्कि एक साम्राज्य का अंग थे। आश्चर्य की बात है कि यूनानी तथा [[रोमी]] लेखक, सेल्यूकस और चंद्रगुप्त के बीच हुए युद्ध का कोई विस्तृत ब्यौरा नहीं देते।''' &lt;br /&gt;
केवल [[एप्पियानस]] ने लिखा है कि &amp;quot;सेल्यूकस ने सिंधु नदी पार की और भारत के सम्राट चंद्रगुप्त से युद्ध छेड़ा। अंत में उनमें संधि हो गई और वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित हो गया।&amp;quot; जस्टिन के अनुसार चंद्रगुप्त से संधि करके और अपने पूर्वी राज्य को शान्त करके सेल्यूकस एण्टीगोनस से युद्ध करने चला गया। एप्पियानस के कथन से स्पष्ट है कि सेल्यूकस चंद्रगुप्त के विरुद्ध सफलता प्राप्त नहीं कर सका। अपने पूर्वी राज्य की सुरक्षा के लिए सेल्यूकस ने चंद्रगुप्त से संधि करना ही उचित समझा और उस संधि को उसने वैवाहिक सम्बन्ध से और अधिक पुष्ट कर लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 युद्धोपयोगी हाथी उपहार में देकर इस मैत्री को सुदृढ़ बनाने में अपना योगदान किया। यह उपहार सेल्यूकस के लिए बहुत बहुमूल्य था, क्योंकि उसके संघ के कैसेंडर, लाइसिमैकस तथा तोलेमी नामक राजाओं ने जो उसके मित्र थे, अपने समान शत्रु ऐंटिगोनस के विरुद्ध, उससे सहायता माँगी थी जिसके कारण वह बहुत चिंतित था। चंद्रगुप्त के दिए हुए हाथी ठीक समय पर इप्टस के रणक्षेत्र में पहुँच गए और ऐंटीगोनस का बना-बनाया खेल बिगड़ गया। जब चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को हाथी भेंट किए तो उसके बाद पश्चिमी देशों में लड़े जानेवाले युद्धों के लिए उनकी माँग होने लगी। 281 ई. पू. में पाइर्रहोम इन हाथियों को एपिरोस से इटली ले गया। 251 ई. पू. में हैसड्रबुल ने पैनोरमन में 'भारतीय' महावतों द्वारा चलाए जानेवाले हाथी इस्तेमाल किए। रोम के विरुद्ध द्वितीत प्यूनिक युद्ध में हैनिबाल तथा हैसड्रबुल ने इन्हीं हाथियों को इस्तेमाल किया और '''राफ़िया की लड़ाई में तोलेमी के लीबियाई हाथी ऐंटीओकस के भारतीय हाथियों के सामने जरा देर न टिक सके'''&amp;lt;ref&amp;gt;वारमिंगटन. कामर्स बिटविन रोमन एंपायर ऐंड इंडिया, पृष्ठ 151&amp;lt;/ref&amp;gt;।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=55 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==विवाह==&lt;br /&gt;
*[[स्ट्रैबो]] का कथन है कि सेल्यूकस ने [[ऐरियाना]] के प्रदेश, चंद्रगुप्त को विवाह-सम्बन्ध के फलस्वरूप दिए। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यूनानी राजकुमारी मौर्य सम्राट को ब्याही गई और ये प्रदेश दहेज के रूप में दिए गए। इतिहासकारों का आमतौर पर यह मत है कि सेल्यूकस ने चंद्रगुप्त को चार प्रान्त दहेज में दिए। :-&lt;br /&gt;
#एरिया अर्थात [[काबुल]] &lt;br /&gt;
#अराकोसिया अर्थात [[कंधार]] &lt;br /&gt;
#जेड्रोसिया अर्थात [[मकरान]] &lt;br /&gt;
#परीपेमिसदाई अर्थात [[हेरात]] प्रदेश&lt;br /&gt;
  &lt;br /&gt;
*[[अशोक]] के लेखों से सिद्ध होता है कि काबुल की घाटी मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत थी। इन अभिलेखों के अनुसार योन, [[यवन]] [[गांधार]] भी मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत थे। &lt;br /&gt;
*प्लूटार्क के अनुसार चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 [[हाथी]] उपहार में दिए। सम्भवतः इस संधि के परिणामस्वरूप ही हिन्दुकुश मौर्य साम्राज्य और सेल्यूकस के राज्य के बीच की सीमा बन गया। 2,000 से अधिक वर्ष पूर्व भारत के प्रथम सम्राट ने उस प्राकृतिक सीमा को प्राप्त किया जिसके लिए अंग्रेज़ तरसते रहे और जिसे [[मुग़ल]] सम्राट भी पूरी तरह प्राप्त करने में असमर्थ रहे। वैवाहिक सम्बन्ध से मौर्य सम्राटों और सेल्यूकस वंश के राजाओं के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध का सूत्रपात हुआ। सेल्यूकस ने अपने राजदूत [[मेगस्थनीज़]] को चंद्रगुप्त के दरबार में भेजा। ये मैत्री सम्बन्ध दोनों के उत्तराधिकारियों के बीच भी बने रहे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==योग्य शासक==&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त एक कुशल योद्धा, सेनानायक तथा महान विजेता ही नहीं था, वरन एक योग्य शासक भी था। इतने बड़े साम्राज्य की शासन - व्यवस्था कोई सरल कार्य नहीं था। अतः अपने मुख्यमंत्री [[कौटिल्य]] की सहायता से उसने एक ऐसी शासन - व्यवस्था का निर्माण किया जो उस समय के अनुकूल थी। यह शासन व्यवस्था एक हद तक [[मगध]] के पूर्वगामी शासकों द्वारा विकसित शासनतंत्र पर आधारित थी किन्तु इसका अधिक श्रेय चंद्रगुप्त और कौटिल्य की सृजनात्मक क्षमता को ही दिया जाना चाहिए।  कौटिल्य ने लिखा है कि उस समय शासन तंत्र पर जो भी ग्रंथ उपलब्ध थे और भिन्न-भिन्न राज्यों में शासन - प्रणालियाँ प्रचलित थीं उन सबका भली-भाँति अध्ययन करने के बाद उसने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ &amp;quot;[[अर्थशास्त्र]]&amp;quot; लिखा। विद्वानों का विचार है कि मौर्य शासन व्यवस्था पर तत्कालीन यूनानी तथा आखमीनी शासन प्रणाली का भी कुछ प्रभाव पड़ा। चंद्रगुप्त ने ऐसी शासन व्यवस्था स्थापित की जिसे परवर्ती भारतीय शासकों ने भी अपनाया। &lt;br /&gt;
*इस शासन की मुख्य विशेषताएँ थीं - &lt;br /&gt;
#सत्ता का अत्यधिक केन्द्रीकरण, &lt;br /&gt;
#विकसित आधिकारिक तंत्र, &lt;br /&gt;
#उचित न्याय व्यवस्था, &lt;br /&gt;
#[[नगर-शासन]], [[कृषि]], [[शिल्प उद्योग]], [[संचार]], [[वाणिज्य]] एवं व्यापार की वृद्धि के लिए राज्य के द्वारा अनेक कारगर उपाय।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त के शासन प्रबन्ध का उद्देश्य लोकहित था। जहाँ एक ओर आर्थिक विकास एवं राज्य की समृद्धि के अनेक ठोस क़दम उठाए गए और शिल्पियों एवं व्यापारियों के जान - माल की सुरक्षा की गई, वहीं दूसरी ओर जनता को उनकी अनुचित तथा शोषणात्मक कार्य-विधियों से बचाने के लिए कठोर नियम भी बनाए गए। [[दास|दासों]] और कर्मकारों को मालिकों के अत्याचार से बचाने के लिए विस्तृत नियम थे। अनाथ, दरिद्र, मृत सैनिकों तथा राजकर्मचारियों के परिवारों के भरण - पोषण का भार राज्य के ऊपर था। तत्कालीन मापदंड के अनुसार चंद्रगुप्त का शासन - प्रबन्ध एक कल्याणकारी राज्य की धारणा को चरितार्थ करता है। यह शासन निरकुंश था, दंड व्यवस्था कठोर थी और व्यक्ति की स्वतंत्रता का सर्वथा अभाव था, किन्तु यह सब नवज़ात साम्राज्य की सुरक्षा तथा प्रजा के हितों को ध्यान में रखकर किया गया था। चंद्रगुप्त की शासन व्यवस्था का चरम लक्ष्य [[अर्थशास्त्र]] के निम्न उद्धरण से व्यक्त होता है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;quot;प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा की भलाई में उसकी भलाई। राजा को जो अच्छा लगे वह हितकर नहीं है, वरन हितकर वह है जो प्रजा को अच्छा लगे।&amp;quot;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि कौटिल्य ने राजा के समक्ष प्रजाहितैषी राजा का आदर्श रखा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==धार्मिक रुचि==&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त धर्म में भी रुचि रखता था। यूनानी लेखकों के अनुसार जिन चार अवसरों पर राजा महल से बाहर जाता था, उनमें एक था [[यज्ञ]] करना। कौटिल्य उसका पुरोहित तथा मुख्यमंत्री था। [[हेमचंद्र]] ने भी लिखा है कि वह ब्राह्मणों का आदर करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जैनियों का दावा है कि चंद्रगुप्त ने अपने जीवन के अंतिम समय में जैन मत स्वीकार कर लिया था और अपने पुत्र को राज्य देकर संन्यासी हो गया था। एक जैन मुनि और अनेक अन्य साधुओं के साथ वह दक्षिण भारत गया, जहाँ उसने जैन धर्म की परंपरागत रीति से धीरे-धीरे अनाहार द्वारा अपने जीवन का अंत कर लिया।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=भारत का इतिहास  |लेखक=रोमिला थापर  |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |संकलन= |संपादन= |पृष्ठ संख्या=62 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[मेगस्थनीज़]] ने लिखा है कि चंद्रगुप्त वन में रहने वाले तपस्वियों से परामर्श करता था और उन्हें [[देवता|देवताओं]] की पूजा के लिए नियुक्त करता था। वर्ष में एक बार विद्वानों (ब्राह्मणों) की सभा बुलाई जाती थी ताकि वे जनहित के लिए उचित परामर्श दे सकें। दार्शनिकों से सम्पर्क रखना चंद्रगुप्त की जिज्ञासु प्रवृत्ति का सूचक है। [[जैन]] अनुयायियों के अनुसार जीवन के अन्तिम चरण में चंद्रगुप्त ने [[जैन धर्म]] स्वीकार कर लिया। कहा जाता है कि जब मगध में 12 वर्ष का दुर्भिक्ष पड़ा तो चंद्रगुप्त राज्य त्यागकर जैन आचार्य [[भद्रबाहु]] के साथ [[श्रवण बेल्गोला]] (मैसूर के निकट) चला गया और एक सच्चे जैन भिक्षु की भाँति उसने निराहार समाधिस्थ होकर प्राणत्याग किया (अर्थात केवल्य प्राप्त किया)। 900 ई. के बाद के अनेक अभिलेख भद्रबाहु और चंद्रगुप्त का एक साथ उल्लेख करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सिकंदर की मृत्यु के बाद उसकी सेनापति [[सेल्यूकस]] यूनानी साम्राज्य का शासक बना और उसने चंद्रगुप्त मौर्य पर आक्रमण कर दिया। पर उसे मुँह की खानी पड़ी। [[काबुल]], [[हेरात]], [[कंधार]], और [[बलूचिस्तान]] के प्रदेश देने के साथ-साथ वह अपनी पुत्री हेलना का विवाह चंद्रगुप्त से करने के लिए बाध्य हुआ। इस पराजय के बाद अगले सौ वर्षो तक यूनानियों को भारत की ओर मुँह करने का साहस नहीं हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त मौर्य का शासन-प्रबंध बड़ा व्यवस्थित था। इसका परिचय यूनानी राजदूत [[मेगस्थनीज़]]  के विवरण और कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' से मिलता है। लगभग-300 ई. पू. में चंद्रगुप्त ने अपने पुत्र [[बिंदुसार]] को गद्दी सौंप दी। &lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति               &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{refbox}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{मौर्य काल}}&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
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[[Category:मौर्य काल]]&lt;br /&gt;
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		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
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| मूल्यांकन कर्ता = [[सदस्य:यात्री|यात्री]] 19:02, 5 नवम्बर 2011 (IST)&lt;br /&gt;
[[Category:सुझाव-नवम्बर 2011]]&lt;br /&gt;
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		<title>बिन्दुसार</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
'''बिन्दुसार''' मौर्य सम्राट था जो 297 ई.पू. के आसपास गद्दी पर बैठा था। &lt;br /&gt;
*यूनानी सूत्रों में उनका उल्लेख ‘अमिट्रोचेट्स’ नाम से हुआ है, जो संभवत: [[संस्कृत]] शब्द 'अमित्रघट' से लिया गया है, जिसका अर्थ है, 'शत्रुनाशक'। &lt;br /&gt;
*यह उपाधि दक्षिण में उनके सफल सैनिक अभियानों के लिये दी गई होगी, क्योंकि उत्तर [[भारत]] पर तो उनके पिता [[चंद्रगुप्त मौर्य]] ने पहले ही विजय प्राप्त कर ली थी। &lt;br /&gt;
*बिंदुसार का विजय अभियान [[कर्नाटक]] के आसपास जाकर रूका और वह भी संभवत: इसलिये कि दक्षिण के चोल, पांड्य व चेर सरदारों और राजाओं के मौर्यो से अच्छे संबंध थे। &lt;br /&gt;
*इसका पुत्र [[अशोक|अशोक महान]] था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चंद्रगुप्त की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र बिन्दुसार सम्राट बना। यूनानी लेखों के अनुसार उसका नाम [[अमित्रकेटे]] था। विद्वानों के अनुसार अमित्रकेटे का संस्कृत रूप है अमित्रघात या अमित्रखाद (शत्रुओं का नाश करने वाला)। सम्भवतः यह बिन्दुसार का विरुद रहा होगा। तिब्बती [[लामा तारनाथ]] तथा जैन अनुश्रुति के अनुसार चाणक्य बिन्दुसार का भी मंत्री रहा। चाणक्य ने 16 राज्य के राजाओं और सामंतों का नाश किया और बिन्दुसार को पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र पर्यन्त भू-भाग का अधीश बनाया। हो सकता है कि चंद्रगुप्त की मृत्यु के पश्चात कुछ राज्यों ने मौर्य सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किया हो। चाणक्य ने सफलतापूर्वक उनका दमन किया। [[दिव्यावदान]] में [[उत्तरापथ]] की राजधानी [[तक्षशिला]] में ऐसे ही विद्रोह का उल्लेख है। इस विद्रोह को शान्त करने के लिए बिन्दुसार ने अपने पुत्र [[अशोक]] को भेजा था। इसके पश्चात अशोक स्वस देश गया। 'स्वस' सम्भवतः [[नेपाल]] के आस-पास के प्रदेश के खस रहे होंगे। तारनाथ के अनुसार खस्या और नेपाल के लोगों ने विद्रोह किया और अशोक ने इन प्रदेशों को जीता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विदेशों के साथ अशोक ने शान्ति और मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखा। सेल्यूकस वंश के राजाओं तथा अन्य यूनानी शासकों के साथ चंद्रगुप्त के समय के सम्बन्ध बने रहे। स्टैवो के अनुसार सेल्यूकस के उत्तराधिकारी [[एण्टियोकस प्रथम]] ने अपना राजदूत [[डायमेकस]] बिन्दुसार के दरबार में भेजा। प्लिनी के अनुसार टोलमी द्वितीय फिलेडेल्फस ने डायोनियस को बिन्दुसार के दरबार में नियुक्त किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने पिता की भाँति बिन्दुसार भी जिज्ञासु था और विद्वानों तथा दार्शनिकों का आदर करता था। [[ऐथेनियस]] के अनुसार बिन्दुसार ने एण्टियोकस (सीरिया का शासक) को एक यूनानी दार्शनिक भेजने के लिए लिखा था। दिव्यावदान की एक कथा के अनुसार [[आजीवक]] परिव्राजक बिन्दुसार की सभा को सुशोभित करते थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके साथ ही हमें कुछ ऐसे प्रमाण भी मिलते हैं जिनसे एक विजेता के रूप में बिंदुसार की क्षमता पर से विश्वास कुछ उठ-सा जाता है, क्योंकि उसके शासनकाल में उसके साम्राज्य के उत्तर-पश्चिमी प्रांत तक्षशिला में विद्रोह उठ खड़ा हुआ था और इस विद्रोह का दमन करने के लिए उसे अपने सुयोग्य पुत्र अशोक को नियुक्त करना पड़ा था। यह बात मानी जा सकती है जो विस्तृत सामाज्य उसे अपने पिता से उत्तराधिकार में मिला था, उसे सँभालना ही उस-जैसे ऐश्वर्यप्रिय व्यक्ति के लिए बहुत बड़ा काम था जिसके लिए जीवन का सबसे बड़ा सुख &amp;quot;अंजीरों और अंगूर की शराब&amp;quot; में था, जो उसने अपने मित्र यूनान के राजा ऐंटिओकस से मँगवाई थीं। उसे इस बात का श्रेय देना कठिन है कि उसने स्वयं कोई विजय प्राप्त करके अपने राज्य में कोई वृद्धि की होगी।&amp;lt;ref&amp;gt;{{पुस्तक संदर्भ |पुस्तक का नाम=चंद्रगुप्त मौर्य और उसका काल |लेखक=राधाकुमुद मुखर्जी |अनुवादक= |आलोचक= |प्रकाशक=राजकमल प्रकाशन |पृष्ठ संख्या=57 |url=}}&amp;lt;/ref&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[पुराण|पुराणों]] के अनुसार बिन्दुसार ने 24 वर्ष तक, किन्तु [[महावंश]] के अनुसार 27 वर्ष तक राज्य किया। [[डॉ. राधा कुमुद मुकर्जी]] ने बिन्दुसार की मृत्यु तिथि ईसा पूर्व 272 निर्धारित की है। कुछ अन्य विद्वान यह मानते हैं कि बिन्दुसार की मृत्यु ईसा पूर्व 270 में हुई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार= &lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
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|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{मौर्य काल}}&lt;br /&gt;
[[Category:मौर्य काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:इतिहास_कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>सदस्य:गोविन्द राम/sandbox</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__ {{सूचना बक्सा वाराणसी}}&lt;br /&gt;
वाराणसी, [[बनारस]] या [[काशी]] भी कहलाता है। वाराणसी दक्षिण-पूर्वी [[उत्तर प्रदेश]] राज्य, उत्तरी-मध्य [[भारत]] में [[गंगा नदी]] के बाएँ तट पर स्थित है और [[हिन्दू|हिन्दुओं]] के सात पवित्र नगरों में से एक है। इसे '''मन्दिरों एवं घाटों का नगर''' भी कहा जाता है। वाराणसी का पुराना नाम काशी है। वाराणसी विश्व का प्राचीनतम बसा हुआ शहर है। यह गंगा नदी के किनारे बसा है और हज़ारों साल से उत्तर [[भारत]] का धार्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। '''दो नदियों [[वरुणा नदी|वरुणा]] और [[असी नदी|असि]] के मध्य बसा होने के कारण इसका नाम वाराणसी पड़ा।''' बनारस या वाराणसी का नाम [[पुराण|पुराणों]], [[रामायण]], [[महाभारत]] जैसे अनेकानेक ग्रन्थों में मिलता है। [[वेद|वेदों]] में भी काशी का उल्लेख है। [[संस्कृत]] पढ़ने प्राचीन काल से ही लोग वाराणसी आया करते थे। वाराणसी के घरानों की हिन्दुस्तानी [[संगीत]] में अपनी ही शैली है। &lt;br /&gt;
==स्थिति==&lt;br /&gt;
वाराणसी भारतवर्ष की सांस्कृतिक एवं धार्मिक नगरी के रूप में विख्यात है। इसकी प्राचीनता की तुलना विश्व के अन्य प्राचीनतम नगरों जेरुसलेम, एथेंस तथा पेइकिंग (बीजिंग) से की जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;डायना एल इक, बनारस सिटी ऑफ़ लाइट (न्यूयार्क, [[1982]]), प्रथम संस्करण, पृष्ठ 4&amp;lt;/ref&amp;gt; वाराणसी गंगा के बाएँ तट पर अर्द्धचंद्राकार में 250 18’ उत्तरी अक्षांश एवं 830 1’ पूर्वी देशांतर पर स्थित है। प्राचीन वाराणसी की मूल स्थिति विद्वानों के मध्य विवाद का विषय रही है। &lt;br /&gt;
====विद्वानों के मतानुसार====&lt;br /&gt;
शेरिंग,&amp;lt;ref&amp;gt;एम. ए. शेरिंग, दि सेक्रेड सिटीज ऑफ़ दि हिन्दूज, (लंदन, [[1968]]) पृष्ठ 19-34&amp;lt;/ref&amp;gt; मरडाक,&amp;lt;ref&amp;gt;जे. मरडाक, काशी और बनारस ([[1894]]) पृष्ठ 5&amp;lt;/ref&amp;gt; ग्रीब्ज,&amp;lt;ref&amp;gt;ई. ग्रीब्ज, काशी, [[इलाहाबाद]], [[1909]], पृष्ठ 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt; और पारकर&amp;lt;ref&amp;gt;ए. पारकर, ए हैंडबुक ऑफ़ बनारस, पृष्ठ 2&amp;lt;/ref&amp;gt; जैसे विद्वानों के मतानुसार प्राचीन वाराणसी वर्तमान नगर के उत्तर में [[सारनाथ]] के समीप स्थित थी। किसी समय वाराणसी की स्थिति दक्षिण भाग में भी रही होगी। लेकिन वर्तमान नगर की स्थिति वाराणसी से पूर्णतया भिन्न है, जिससे यह प्राय: निश्चित है कि वाराणसी नगर की प्रकृति यथासमय एक स्थान से दूसरे स्थान पर विस्थापित होने की रही है। यह विस्थापन मुख्यतया दक्षिण की ओर हुआ है। पर किसी पुष्ट प्रमाण के अभाव में विद्वानों का उक्त मत समीचीन नहीं प्रतीत होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा नदी के तट पर बसे इस शहर को ही भगवान [[शिव]] ने [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] पर अपना स्‍थायी निवास बनाया था। यह भी माना जाता है कि वाराणसी का निर्माण सृष्टि रचना के प्रारम्भिक चरण में ही हुआ था। यह शहर प्रथम ज्‍योर्तिलिंग का भी शहर है। [[पुराण|पुराणों]] में वाराणसी को ब्रह्मांड का केंद्र बताया गया है तथा यह भी कहा गया है यहाँ के कण-कण में शिव निवास करते हैं। वाराणसी के लोगों के अनुसार, '''काशी के कण-कण में शिवशंकर हैं।''' इनके कहने का अर्थ यह है कि यहाँ के प्रत्‍येक पत्‍थर में शिव का निवास है। कहते हैं कि काशी शंकर भगवान के [[त्रिशूल]] पर टिकी है। &lt;br /&gt;
====हेवेल की दृष्टि में====&lt;br /&gt;
हेवेल की दृष्टि में वाराणसी नगर की स्थिति विस्थापन प्रधान थी, अपितु प्राचीन काल में भी वाराणसी का वर्तमान स्वरूप सुरक्षित था।&amp;lt;ref&amp;gt;ई.वी. हैवेल, बनारस दि सेक्रेड सिटी पृष्ठ 41-50&amp;lt;/ref&amp;gt;''' हेवेल के मतानुसार [[बुद्ध]] पूर्व युग में आधुनिक सारनाथ एक घना जंगल था और यह विभिन्न धर्मावलंबियों का आश्रय स्थल भी था।''' &lt;br /&gt;
भौगोलिक दशाओं के परिप्रेक्ष्य में हेवेल का मत युक्तिसंगत प्रतीत होता है। वास्तव में वाराणसी नगर का अस्तित्व [[बुद्ध]] से भी प्राचीन है तथा उनके आविर्भाव के सदियों पूर्व से ही यह एक धार्मिक नगरी के रूप में ख्याति प्राप्त था। सारनाथ का उद्भव महात्मा बुद्ध के प्रथम धर्मचक्र प्रवर्तन के उपरांत हुआ। रामलोचन सिंह ने भी कुछ संशोधनों के साथ हेवेल के मत का समर्थन किया है। उनके अनुसार नगर की मूल स्थिति प्राय: उत्तरी भाग में स्वीकार करनी चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;रामलोचन सिंह, बनारस, एक सिटी इन अर्बन ज्योग्राफी, पृष्ठ 31&amp;lt;/ref&amp;gt; हाल के अकथा [[उत्खनन]] से इस बात की पुष्टि होती है कि वाराणसी की प्राचीन स्थिति उत्तर में थी जहाँ से 1300 ईसा पूर्व के अवशेष प्रकाश में आये हैं।&lt;br /&gt;
==नामकरण==&lt;br /&gt;
‘वाराणसी’ शब्द ‘वरुणा’ और ‘असी’ दो नदीवाचक शब्दों के योग से बना है। पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार '''वरुणा''' और '''असि''' नाम की नदियों के बीच में बसने के कारण ही इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा। &lt;br /&gt;
*'[[पद्मपुराण]]' के एक उल्लेख के अनुसार दक्षिणोत्तर में ‘वरना’ और पूर्व में ‘असि’ की सीमा से घिरे होने के कारण इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा।&amp;lt;ref&amp;gt;वाराणसीति यत् ख्यातं तम्मानं निगदामिव।&lt;br /&gt;
दक्षिणातरयौ नयौ परणासिश्चपूर्णत:॥- [[पद्मपुराण]], काशी माहात्म्य 5/58&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'[[अथर्ववेद]]'&amp;lt;ref&amp;gt;[[अथर्ववेद]], 4/7/1&amp;lt;/ref&amp;gt; में वरणावती नदी का उल्लेख है। संभवत: यह आधुनिक वरुणा का ही समानार्थक है। &lt;br /&gt;
*'[[अग्निपुराण]]' में नासी नदी का उल्लेख मिलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी का इतिहास}}&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक आलेखों से प्रमाणित होता है कि ईसा पूर्व की छठी शताब्दी में वाराणसी भारतवर्ष का बड़ा ही समृद्धशाली और महत्त्वपूर्ण राज्य था। मध्य युग में यह [[कन्नौज]] राज्य का अंग था और बाद में [[बंगाल]] के पाल नरेशों का इस पर अधिकार हो गया था। सन 1194 में [[मुहम्मद ग़ोरी|शहाबुद्दीन ग़ोरी]] ने इस नगर को लूटा और क्षति पहुँचायी। [[मुग़ल काल]] में इसका नाम बदल कर मुहम्मदाबाद रखा गया। बाद में इसे अवध दरबार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा गया। बलवंत सिंह ने बक्सर की लड़ाई में अंग्रेज़ों का साथ दिया और इसके उपलक्ष्य में वाराणसी को अवध दरबार से स्वतंत्र कराया। सन [[1911]] में अंग्रेज़ों ने महाराज प्रभुनारायण सिंह को वाराणसी का राजा बना दिया। सन [[1950]] में यह राज्य स्वेच्छा से भारतीय गणराज्य में शामिल हो गया।&lt;br /&gt;
वाराणसी विभिन्न मत-मतान्तरों की संगम स्थली रही है। विद्या के इस पुरातन और शाश्वत नगर ने सदियों से धार्मिक गुरुओं, सुधारकों और प्रचारकों को अपनी ओर आकृष्ट किया है। '''भगवान [[बुद्ध]] और [[शंकराचार्य]] के अलावा [[रामानुज]], [[वल्लभाचार्य]], संत [[कबीर]], गुरु [[नानक]], [[तुलसीदास]], [[चैतन्य महाप्रभु]], [[रैदास]] आदि अनेक संत इस नगरी में आये।'''&lt;br /&gt;
==भौगोलिक स्थिति==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी का भूगोल}}&lt;br /&gt;
वाराणसी नगर की रचना गंगा के किनारे है, जिसका विस्तार लगभग 5 मील में है। ऊँचाई पर बसे होने के कारण अधिकतर वाराणसी बाढ़ की विभीषिका से सुरक्षित रहता है, परंतु वाराणसी के मध्य तथा दक्षिणी भाग के निचने इलाके प्रभावित होते हैं। &lt;br /&gt;
====नगर का आकार====&lt;br /&gt;
नगर के आकार की धार्मिक मान्यताओं के आधार पर व्याख्या करने के अनेक प्रयास किए गये हैं। इन मान्यताओं की भौगोलिक व्याख्या को कमोवेश स्वीकारा गया है। ऐसे सामान्यत: प्रचलित विश्वासों की सूची इस प्रकार बनाई है-&lt;br /&gt;
;कृत त्रिशूल&lt;br /&gt;
इस त्रिशूल के तीन शूल हैं- उत्तर में ओंकारेश्वर, मध्य में विश्वेश्वर तथा दक्षिण में केदारेश्वर। यह तीनों गंगा तट पर स्थित हैं। मांन्यता है कि यह नगरी भगवान [[शिव]] को समर्पित है और उनके त्रिशूल पर स्थित है।&lt;br /&gt;
;त्रेतायुग चक्र&lt;br /&gt;
चौरासी कोस यात्रा के तदनुरूप है और मध्यमेश्वर इसका केन्द्र है जो गंगा के निकट अवस्थित है।&lt;br /&gt;
;द्वापर रथ&lt;br /&gt;
सात प्रकार के शिव मंदिर, रथ का समरूप बनाते हैं। ये हैं- गोकर्णेश्वर, सुलतानकेश्वर, मणिकर्णेश्वर, भारभूतेश्वर, विश्वेश्वर, मध्यमेश्वर तथा ओंकारेश्वर। इस आकार में भी [[गंगा नदी]] की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। &lt;br /&gt;
;शंखाकार&lt;br /&gt;
यहाँ भी मंदिरों की स्थिति के समरूप आकार माना गया है और गंगा नदी यह आकार निर्धारित करती है। इस आकार को बनाने वाले मंदिर हैं- उत्तर पश्चिम में विध्नराज और विनायक, उत्तर में शैलेश्वर, दक्षिण पूर्व में केदारेश्वर और दक्षिण में लोलार्क। &lt;br /&gt;
==वाराणसी की नदियाँ==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
वाराणसी का विस्तार गंगा नदी के दो संगमों वरुणा और असी नदी से संगम के बीच बताया जाता है। इन संगमों के बीच की दूरी लगभग 2.5 मील है। इस दूरी की परिक्रमा [[हिन्दू धर्म|हिन्दुओं]] में पंचकोसी यात्रा या पंचकोसी परिक्रमा कहलाती है। वाराणसी ज़िले की नदियों के विस्तार से अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि वाराणसी में तो प्रस्रावक नदियाँ है लेकिन चंदौली में नहीं है जिससे उस ज़िले में झीलें और दलदल हैं, अधिक बरसात होने पर गाँव पानी से भर जाते हैं तथा फ़सल को काफ़ी नुक़सान पहुँचता है। &lt;br /&gt;
====गंगा====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{मुख्य|गंगा नदी}}&lt;br /&gt;
गंगा का वाराणसी की प्राकृतिक रचना में मुख्य स्थान है। गंगा वाराणसी में गंगापुर के बेतवर गाँव से पहले घुसती है। यहाँ पर इससे सुबहा नाला आ मिला है। वाराणसी को वहाँ से प्राय: सात मील तक गंगा मिर्ज़ापुर ज़िले से अलग करती है और इसके बाद वाराणसी ज़िले में वाराणसी और चन्दौली को विभाजित करती है। गंगा की धारा अर्ध-वृत्ताकार रूप में वर्ष भर बहती है। इसके बाहरी भाग के ऊपर करारे पड़ते हैं और भीतरी भाग में बालू अथवा बाढ़ की मिट्टी मिलती है। गंगा का रुख़ पहले उत्तर की तरफ़ होता हुआ रामनगर के कुछ आगे तक देहात अमानत को राल्हूपुर से अलग करता है। यहाँ पर किनारा कंकरीला है और नदी उसके ठीक नीचे बहती है। यहाँ तूफ़ान में नावों को काफ़ी ख़तरा रहता है। देहात अमानत में गंगा का बांया किनारा मुंडादेव तक चला गया है। इसके नीचे की ओर वह रेत में परिणत हो जाता है और बाढ़ में पानी से भर जाता है। रामनगर छोड़ने के बाद गंगा की उत्तर-पूर्व की ओर झुकती दूसरी केहुनी (कमान, तरफ़) शुरू होती है। धारा यहाँ बायें किनारे से लगकर बहती है। &lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था==&lt;br /&gt;
====उद्योग और व्यापार====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी का व्यापार}}&lt;br /&gt;
वाराणसी कला, हस्तशिल्प, संगीत और नृत्य का भी केन्द्र है। यह शहर रेशम, सोने व चाँदी के तारों वाले ज़री के काम, लकड़ी के खिलौनों, काँच की चूड़ियों, हाथी दाँत और पीतल के काम के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख उद्योगों में रेल इंजन निर्माण इकाई शामिल है।{{बाँयाबक्सा|पाठ=[[काशी]] को 'महाश्‍मशान' के नाम से भी जाना जाता है। इसे पृथ्वी की सबसे बड़ी शमशान भूमि माना जाता था। यहाँ के मणिकर्णिका घाट तथा हरिश्‍चंद्र घाट को सबसे पवित्र घाट माना जाता है।|विचारक=}}वाराणसी के कारीगरों के कला- कौशल की ख्याति सुदूर प्रदेशों तक में रही है। वाराणसी आने वाला कोई भी यात्री यहाँ के रेशमी [[किमखाब]] तथा ज़री के वस्त्रों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। यहाँ के बुनकरों की परंपरागत कुशलता और कलात्मकता ने इन वस्तुओं को संसार भर में प्रसिद्धि और मान्यता दिलायी है । विदेश व्यापार में इसकी विशिष्ट भूमिका है । इसके उत्पादन में बढ़ोत्तरी और विशिष्टता से विदेशी मुद्रा अर्जित करने में बड़ी सफलता मिली है । रेशम तथा ज़री के उद्योग के अतिरिक्त, यहाँ पीतल के बर्तन तथा उन पर मनोहारी काम और संजरात (झांझ मझीरा) उद्योग भी अपनी कला और सौंदर्य के लिए विख्यात हैं । इसके अलावा यहाँ के लकड़ी के खिलौने भी दूर- दूर तक प्रसिद्ध हैं, जिन्हें कुटीर उद्योगों में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं ।&lt;br /&gt;
====वाणिज्य और व्यापार का प्रमुख केंद्र====&lt;br /&gt;
वाराणसी नगर वाणिज्य और व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। स्थल तथा जल मार्गों द्वारा यह नगर भारत के अन्य नगरों से जुड़ा हुआ था। काशी से एक मार्ग [[राजगृह]] को जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;विनयपिटक, जिल्द 1, पृष्ठ 262&amp;lt;/ref&amp;gt;  काशी से [[वेरंजा]] जाने के लिए दो रास्ते थे- &lt;br /&gt;
#[[सोरेय्य]] होकर&lt;br /&gt;
#[[प्रयाग]] में [[गंगा]] पार करके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा मार्ग बनारस से [[वैशाली]] को चला जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;मोतीचंद्र, काशी का इतिहास, पृष्ठ 49&amp;lt;/ref&amp;gt; वाराणसी का एक सार्थवाह पाँच सौ गाड़ियों के साथ प्रत्यंत देश गया था और वहाँ से [[चंदन]] लाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;सुत्तनिपात, अध्याय 2, पृष्ठ 523&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==कला और संस्कृति==&lt;br /&gt;
{{Main|वाराणसी की संस्कृति}} &lt;br /&gt;
वाराणसी की [[कला]] और [[संस्कृति]] अद्वितीय है। यह वाराणसी की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा है कि यह [[भारत]] की सांस्कृतिक राजधानी बनाता है। [[पुरातत्त्व]], पौराणिक कथाओं, [[भूगोल]], कला और [[इतिहास]] का एक संयोजन वाराणसी [[भारतीय संस्कृति]] की एक महान केंद्र बनाता है। हालांकि वाराणसी मुख्य रूप से [[हिंदू धर्म]] और [[बौद्ध धर्म]] के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन एक और वाराणसी में पूजा और धार्मिक संस्थाओं के कई धार्मिक विश्वासों की झलक पा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाराणसी, भारतीय कला और संस्कृति का पूरा एक संग्रहालय प्रस्तुत करता है। वाराणसी में एक इतिहास के पाठ्यक्रम में बदलते पैटर्न और आंदोलनों को महसूस कर सकते हैं। सदियों से वाराणसी ने मास्टर कारीगरों का उत्पादन किया है और और अपनी सुंदर साड़ी, हस्तशिल्प, वस्त्र, खिलौने, गहने, धातु का काम, मिट्टी और लकड़ी और अन्य शिल्प के लिए नाम और प्रसिद्धि अर्जित की है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाराणसी ने कई प्रसिद्ध विद्वानों और बुद्धिजीवियों, जो गतिविधि के संबंधित क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ गये है, को जन्म दिया है। वाराणसी, एक अद्वितीय सामाजिक और सांस्कृतिक कपड़े प्रस्तुत करता है। [[संगीत]], नाटक, और मनोरंजन के सभी वाराणसी के साथ पर्याय रहे है। बनारस लंबे समय से अपने संगीत, मुखर और वाद्य दोनों के लिए प्रसिद्ध रहा है और अपने खुद के नृत्य परंपराओं. इस पर जोड़ें, वाराणसी लोक संगीत और नाटक, मेलों और त्योहार और अखाड़े, खेल, और खेल की समृद्ध परंपरा की एक बहुत ही पुराना केन्द्र है।&lt;br /&gt;
====संगीत====&lt;br /&gt;
{{Main|वाराणसी का संगीत}}&lt;br /&gt;
*वाराणसी गायन एवं वाद्य दोनों ही विद्याओं का केंद्र रहा है। &lt;br /&gt;
*सुमधुर ठुमरी भारतीय कंठ संगीत को वाराणसी की विशेष देन है। &lt;br /&gt;
*इसमें धीरेंद्र बाबू, बड़ी मोती, छोती मोती, सिद्धेश्वर देवी, रसूलन बाई, काशी बाई, अनवरी बेगम, शांता देवी तथा इस समय गिरिजा देवी आदि का नाम समस्त [[भारत]] में बड़े गौरव एवं सम्मान के साथ लिया जाता है।&lt;br /&gt;
====बनारसी साड़ी====&lt;br /&gt;
{{Main|बनारसी साड़ी}}&lt;br /&gt;
*बनारसी साड़ियों दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। [[लाल रंग|लाल]], [[लाल रंग|हरी]] और अन्य गहरे [[रंग|रंगों]] की ये साड़ियां [[हिंदू]] परिवारों में किसी भी शुभ अवसर के लिए आवश्यक मानी जाती हैं। &lt;br /&gt;
*उत्तर भारत में अधिकांश बेटियाँ बनारसी साड़ी में ही विदा की जाती हैं। &lt;br /&gt;
*बनारसी साड़ियों की कारीगरी सदियों पुरानी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षण संस्थान==&lt;br /&gt;
{{Main|वाराणसी/शिक्षा}}&lt;br /&gt;
वाराणसी पूर्व से ही विद्या और शिक्षा के क्षेत्र में एक अहम प्रचारक और केन्द्रीय संस्था के रूप में स्थापित था। मध्यकाल के दौरान [[उत्तर प्रदेश]] में उदार परम्परा का संचालन था। वाराणसी 'हिन्दू शिक्षा केन्द्र' के रूप में विश्वव्यापक हुआ। वाराणसी के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय 'इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ़ सैकेंडरी एजुकेशन' &amp;lt;ref&amp;gt;आई.सी.एस.ई&amp;lt;/ref&amp;gt;, 'केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड' &amp;lt;ref&amp;gt;सी.बी.एस.ई&amp;lt;/ref&amp;gt; या 'उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद' &amp;lt;ref&amp;gt;यू.पी.बोर्ड&amp;lt;/ref&amp;gt; से सहबद्ध हैं। प्राचीन काल से ही लोग यहाँ [[दर्शन शास्त्र]], [[संस्कृत]], खगोल शास्त्र, सामाजिक ज्ञान एवं धार्मिक शिक्षा आदि के ज्ञान के लिये आते रहे हैं। '''भारतीय परंपरा में प्रायः वाराणसी को सर्वविद्या की राजधानी कहा गया है।''' वाराणसी में एक जामिया सलाफ़िया भी है, जो सलाफ़ी इस्लामी शिक्षा का केन्द्र है।&lt;br /&gt;
====काशी हिन्दू विश्वविद्यालय====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|काशी हिन्दू विश्वविद्यालय}}&lt;br /&gt;
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय या बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में स्थित एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना &amp;lt;ref&amp;gt;बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय एक्ट, एक्ट क्रमांक 16, सन 1915&amp;lt;/ref&amp;gt; के अंतर्गत हुई थी। [[मदनमोहन मालवीय|पण्डित मदनमोहन मालवीय]] ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रारम्भ [[1904]] ई. में किया, जब काशी नरेश 'महाराज प्रभुनारायण सिंह' की अध्यक्षता में संस्थापकों की प्रथम बैठक हुई। [[1905]] ई. में विश्वविद्यालय का प्रथम पाठ्यक्रम प्रकाशित हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====साहित्य====&lt;br /&gt;
वाराणसी संस्कृत साहित्य का केंद्र तो रही ही है, लेकिन इसके साथ ही इस नगर ने हिन्दी तथा [[उर्दू भाषा|उर्दू]] में अनेक साहित्यकारों को भी जन्म दिया है, जिन्होंने साहित्य सेवा की तथा देश में गौरव पूर्ण स्थान प्राप्त किया। इनमें [[भारतेंदु हरिश्चंद्र]], [[अयोध्यासिंह उपाध्याय|अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध']], [[जयशंकर प्रसाद]], [[प्रेमचंद]], [[श्यामसुन्दर दास]], [[राय कृष्णदास]], [[आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]], रामचंद्र वर्मा, बेचन शर्मा &amp;quot;उग्र&amp;quot;, विनोदशंकर व्यास, कृष्णदेव प्रसाद गौड़ तथा डॉ. संपूर्णानंद उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त [[उर्दू]] साहित्य में भी यहाँ अनेक जाने- माने लेखक एवं शायर हुए हैं। जिनमें मुख्यतः श्री विश्वनाथ प्रसाद शाद, मौलवी महेश प्रसाद, महाराज [[चेतसिंह]], शेखअली हाजी, [[आग़ा हश्र कश्मीरी]], हुकुम चंद्र नैयर, प्रो. हफीज बनारसी, श्री हक़ बनारसी तथा नज़ीर बनारसी का नाम आता है।&lt;br /&gt;
====उत्सवप्रियता====&lt;br /&gt;
वाराणसी के निवासियों की उत्सवप्रियता का उल्लेख जातकों में सविस्तार मिलता है। '''महाजनपद युग में [[दीपावली]] का उल्लेख मुख्य त्योहारों में हुआ है।''' एक जातक में उल्लेखित है कि काशी की दीपमालिका [[कार्तिक मास]] में मनायी जाती थी। इस अवसर पर स्थियाँ केशरिया रंग के वस्त्र पहनकर निकलती थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 2, पृष्ठ 145 (संख्या 147) मोतीचंद्र, काशी का इतिहास, पृष्ठ 45&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====हस्तिमंगलोत्सव====&lt;br /&gt;
'''हस्तिमंगलोत्सव भी वाराणसी का एक प्रमुख उत्सव था''',&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 2, संख्या 163, पृष्ठ 215&amp;lt;/ref&amp;gt; जिसका उल्लेख जातकों एवं बौद्ध साहित्य में मिलता है। इसके अतिरिक्त '''मंदिरोत्सव भी मनाया जाता था, जिसमें सुरापान किया जाता था।'''&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 2, संख्या 163, पृष्ठ 132&amp;lt;/ref&amp;gt; एक जातक में उल्लेख आया है कि '''काशीराज ने एक बार इस अवसर पर तपस्वियों को खूब सुरापान कराया था।'''&amp;lt;ref&amp;gt;139- जातक, भाग 1, पृष्ठ 208&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==वाराणसी के मन्दिर==&lt;br /&gt;
वाराणसी में कई प्रमुख मंदिर स्थित हैं। वाराणसी कई प्रमुख मंदिरों का नगर है। वाराणसी में लगभग हर एक चौराहे पर एक मंदिर स्थित है। दैनिक स्थानीय अर्चना के लिये ऐसे छोटे मंदिर  सहायक होते हैं। इन छोटे मंदिरों के साथ ही वाराणसी में ढेरों बड़े मंदिर भी हैं, जो समय-समय पर वाराणसी के इतिहास में बनवाये गये थे। वाराणसी में स्थित इन मंदिरों में काशी विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, ढुंढिराज गणेश, काल भैरव, दुर्गा जी का मंदिर, संकटमोचन, तुलसी मानस मंदिर, नया विश्वनाथ मंदिर, भारतमाता मंदिर, संकठा देवी मंदिर व विशालाक्षी मंदिर प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;
====काशी विश्‍वनाथ मंदिर==== &lt;br /&gt;
{{मुख्य|विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग}}&lt;br /&gt;
मूल काशी विश्‍वनाथ मंदिर बहुत छोटा था। 18वीं शताब्‍दी में इंदौर की [[अहिल्याबाई होल्कर|रानी अहिल्‍याबाई होल्‍कर]] ने इसे भव्‍य रूप प्रदान किया। [[पंजाब]] के शासक [[रणजीत सिंह|राजा रंजीत सिंह]] ने 1835 ई. में इस मंदिर के शिखर को सोने से मढ़वाया था। इस कारण इस मंदिर का एक अन्‍य नाम गोल्‍डेन टेम्‍पल भी पड़ा।&lt;br /&gt;
'''यह मंदिर कई बार ध्‍वस्‍त किया गया।''' वर्तमान में जो मंदिर है उसका निर्माण चौथी बार में हुआ है। [[क़ुतुबुद्दीन ऐबक]] ने सर्वप्रथम इसे 1194 ई. में ध्‍वस्‍त किया था। [[रज़िया सुल्तान]] (1236-1240) ने इसके ध्‍वंसावशेष पर रज़िया मस्जिद का निर्माण करवाया था। इसके बाद इस मंदिर का निर्माण अभिमुक्‍तेश्‍वर मंदिर के नज़दीक बनवाया गया। बाद में इस मंदिर को जौनपुर के शर्की राजाओं ने तुड़वा दिया। 1490 ई. में इस मंदिर को [[सिकन्दर लोदी]] ने ध्‍वंस करवाया था। 1585 ई. में बनारस के एक प्रसिद्ध व्‍यापारी टोडरमल ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। 1669 ई. में इस मंदिर को [[औरंगज़ेब]] ने पुन: तुड़वा दिया। औरंगज़ेब ने भी इस मंदिर के ध्‍वंसावशेष पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया था।&lt;br /&gt;
==वाराणसी के घाट==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी के घाट}}&lt;br /&gt;
वाराणसी (काशी) में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। वाराणसी के घाट गंगा नदी के धनुष की आकृति होने के कारण मनोहारी लगते हैं। सभी घाटों के पूर्वार्भिमुख होने से सूर्योदय के समय घाटों पर पहली किरण दस्तक देती है। उत्तर दिशा में राजघाट से प्रारम्भ होकर दक्षिण में अस्सी घाट तक सौ से अधिक घाट हैं। वाराणसी में अस्‍सीघाट से लेकर वरुणा घाट तक सभी की क्रमवार सूची निम्न है:- &lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
{{main|वाराणसी पर्यटन}}&lt;br /&gt;
वाराणसी, पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। यहाँ अनेक धार्मिक, ऐतिहासिक एवं सुंदर दर्शनीय स्थल हैं, जिन्हें देखने के लिए देश के ही नहीं, संसार भर से पर्यटक आते हैं और इस नगरी तथा यहाँ की [[संस्कृति]] की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। कला, संस्कृति, साहित्य और राजनीति के विविध क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाये रखने के कारण वाराणसी अन्य नगरों की अपेक्षा अपना विशिष्ट स्थान रखती है । देश की राष्ट्रभाषा [[हिन्दी]] की जननी [[संस्कृत]] की उद्भव स्थली काशी सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
[[2001]] की जनगणना के अनुसार नगर निगम क्षेत्र की जनसंख्या 11,22,748 है, छावनी क्षेत्र की जनसंख्या 17,246 और ज़िले की जनसंख्या 31,3867 है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://varanasi.nic.in/glance/dglance.html |title=वाराणसी |accessmonthday=23 फ़रवरी |accessyear=2011 |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher=वाराणसी की आधिकारिक वेबसाइट |language=[[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Refbox}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{Toc}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE/sandbox6&amp;diff=230202</id>
		<title>सदस्य:गोविन्द राम/sandbox6</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF:%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE/sandbox6&amp;diff=230202"/>
		<updated>2011-10-28T10:57:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__ {{सूचना बक्सा वाराणसी}}&lt;br /&gt;
वाराणसी, [[बनारस]] या [[काशी]] भी कहलाता है। वाराणसी दक्षिण-पूर्वी [[उत्तर प्रदेश]] राज्य, उत्तरी-मध्य [[भारत]] में [[गंगा नदी]] के बाएँ तट पर स्थित है और [[हिन्दू|हिन्दुओं]] के सात पवित्र नगरों में से एक है। इसे '''मन्दिरों एवं घाटों का नगर''' भी कहा जाता है। वाराणसी का पुराना नाम काशी है। वाराणसी विश्व का प्राचीनतम बसा हुआ शहर है। यह गंगा नदी के किनारे बसा है और हज़ारों साल से उत्तर [[भारत]] का धार्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। '''दो नदियों [[वरुणा नदी|वरुणा]] और [[असी नदी|असि]] के मध्य बसा होने के कारण इसका नाम वाराणसी पड़ा।''' बनारस या वाराणसी का नाम [[पुराण|पुराणों]], [[रामायण]], [[महाभारत]] जैसे अनेकानेक ग्रन्थों में मिलता है। [[वेद|वेदों]] में भी काशी का उल्लेख है। [[संस्कृत]] पढ़ने प्राचीन काल से ही लोग वाराणसी आया करते थे। वाराणसी के घरानों की हिन्दुस्तानी [[संगीत]] में अपनी ही शैली है। &lt;br /&gt;
==स्थिति==&lt;br /&gt;
वाराणसी भारतवर्ष की सांस्कृतिक एवं धार्मिक नगरी के रूप में विख्यात है। इसकी प्राचीनता की तुलना विश्व के अन्य प्राचीनतम नगरों जेरुसलेम, एथेंस तथा पेइकिंग (बीजिंग) से की जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;डायना एल इक, बनारस सिटी ऑफ़ लाइट (न्यूयार्क, [[1982]]), प्रथम संस्करण, पृष्ठ 4&amp;lt;/ref&amp;gt; वाराणसी गंगा के बाएँ तट पर अर्द्धचंद्राकार में 250 18’ उत्तरी अक्षांश एवं 830 1’ पूर्वी देशांतर पर स्थित है। प्राचीन वाराणसी की मूल स्थिति विद्वानों के मध्य विवाद का विषय रही है। &lt;br /&gt;
====विद्वानों के मतानुसार====&lt;br /&gt;
शेरिंग,&amp;lt;ref&amp;gt;एम. ए. शेरिंग, दि सेक्रेड सिटीज ऑफ़ दि हिन्दूज, (लंदन, [[1968]]) पृष्ठ 19-34&amp;lt;/ref&amp;gt; मरडाक,&amp;lt;ref&amp;gt;जे. मरडाक, काशी और बनारस ([[1894]]) पृष्ठ 5&amp;lt;/ref&amp;gt; ग्रीब्ज,&amp;lt;ref&amp;gt;ई. ग्रीब्ज, काशी, [[इलाहाबाद]], [[1909]], पृष्ठ 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt; और पारकर&amp;lt;ref&amp;gt;ए. पारकर, ए हैंडबुक ऑफ़ बनारस, पृष्ठ 2&amp;lt;/ref&amp;gt; जैसे विद्वानों के मतानुसार प्राचीन वाराणसी वर्तमान नगर के उत्तर में [[सारनाथ]] के समीप स्थित थी। किसी समय वाराणसी की स्थिति दक्षिण भाग में भी रही होगी। लेकिन वर्तमान नगर की स्थिति वाराणसी से पूर्णतया भिन्न है, जिससे यह प्राय: निश्चित है कि वाराणसी नगर की प्रकृति यथासमय एक स्थान से दूसरे स्थान पर विस्थापित होने की रही है। यह विस्थापन मुख्यतया दक्षिण की ओर हुआ है। पर किसी पुष्ट प्रमाण के अभाव में विद्वानों का उक्त मत समीचीन नहीं प्रतीत होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा नदी के तट पर बसे इस शहर को ही भगवान [[शिव]] ने [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] पर अपना स्‍थायी निवास बनाया था। यह भी माना जाता है कि वाराणसी का निर्माण सृष्टि रचना के प्रारम्भिक चरण में ही हुआ था। यह शहर प्रथम ज्‍योर्तिलिंग का भी शहर है। [[पुराण|पुराणों]] में वाराणसी को ब्रह्मांड का केंद्र बताया गया है तथा यह भी कहा गया है यहाँ के कण-कण में शिव निवास करते हैं। वाराणसी के लोगों के अनुसार, '''काशी के कण-कण में शिवशंकर हैं।''' इनके कहने का अर्थ यह है कि यहाँ के प्रत्‍येक पत्‍थर में शिव का निवास है। कहते हैं कि काशी शंकर भगवान के [[त्रिशूल]] पर टिकी है। &lt;br /&gt;
====हेवेल की दृष्टि में====&lt;br /&gt;
हेवेल की दृष्टि में वाराणसी नगर की स्थिति विस्थापन प्रधान थी, अपितु प्राचीन काल में भी वाराणसी का वर्तमान स्वरूप सुरक्षित था।&amp;lt;ref&amp;gt;ई.वी. हैवेल, बनारस दि सेक्रेड सिटी पृष्ठ 41-50&amp;lt;/ref&amp;gt;''' हेवेल के मतानुसार [[बुद्ध]] पूर्व युग में आधुनिक सारनाथ एक घना जंगल था और यह विभिन्न धर्मावलंबियों का आश्रय स्थल भी था।''' &lt;br /&gt;
भौगोलिक दशाओं के परिप्रेक्ष्य में हेवेल का मत युक्तिसंगत प्रतीत होता है। वास्तव में वाराणसी नगर का अस्तित्व [[बुद्ध]] से भी प्राचीन है तथा उनके आविर्भाव के सदियों पूर्व से ही यह एक धार्मिक नगरी के रूप में ख्याति प्राप्त था। सारनाथ का उद्भव महात्मा बुद्ध के प्रथम धर्मचक्र प्रवर्तन के उपरांत हुआ। रामलोचन सिंह ने भी कुछ संशोधनों के साथ हेवेल के मत का समर्थन किया है। उनके अनुसार नगर की मूल स्थिति प्राय: उत्तरी भाग में स्वीकार करनी चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;रामलोचन सिंह, बनारस, एक सिटी इन अर्बन ज्योग्राफी, पृष्ठ 31&amp;lt;/ref&amp;gt; हाल के अकथा [[उत्खनन]] से इस बात की पुष्टि होती है कि वाराणसी की प्राचीन स्थिति उत्तर में थी जहाँ से 1300 ईसा पूर्व के अवशेष प्रकाश में आये हैं।&lt;br /&gt;
==नामकरण==&lt;br /&gt;
‘वाराणसी’ शब्द ‘वरुणा’ और ‘असी’ दो नदीवाचक शब्दों के योग से बना है। पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार '''वरुणा''' और '''असि''' नाम की नदियों के बीच में बसने के कारण ही इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा। &lt;br /&gt;
*'[[पद्मपुराण]]' के एक उल्लेख के अनुसार दक्षिणोत्तर में ‘वरना’ और पूर्व में ‘असि’ की सीमा से घिरे होने के कारण इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा।&amp;lt;ref&amp;gt;वाराणसीति यत् ख्यातं तम्मानं निगदामिव।&lt;br /&gt;
दक्षिणातरयौ नयौ परणासिश्चपूर्णत:॥- [[पद्मपुराण]], काशी माहात्म्य 5/58&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'[[अथर्ववेद]]'&amp;lt;ref&amp;gt;[[अथर्ववेद]], 4/7/1&amp;lt;/ref&amp;gt; में वरणावती नदी का उल्लेख है। संभवत: यह आधुनिक वरुणा का ही समानार्थक है। &lt;br /&gt;
*'[[अग्निपुराण]]' में नासी नदी का उल्लेख मिलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी का इतिहास}}&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक आलेखों से प्रमाणित होता है कि ईसा पूर्व की छठी शताब्दी में वाराणसी भारतवर्ष का बड़ा ही समृद्धशाली और महत्त्वपूर्ण राज्य था। मध्य युग में यह [[कन्नौज]] राज्य का अंग था और बाद में [[बंगाल]] के पाल नरेशों का इस पर अधिकार हो गया था। सन 1194 में [[मुहम्मद ग़ोरी|शहाबुद्दीन ग़ोरी]] ने इस नगर को लूटा और क्षति पहुँचायी। [[मुग़ल काल]] में इसका नाम बदल कर मुहम्मदाबाद रखा गया। बाद में इसे अवध दरबार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा गया। बलवंत सिंह ने बक्सर की लड़ाई में अंग्रेज़ों का साथ दिया और इसके उपलक्ष्य में वाराणसी को अवध दरबार से स्वतंत्र कराया। सन [[1911]] में अंग्रेज़ों ने महाराज प्रभुनारायण सिंह को वाराणसी का राजा बना दिया। सन [[1950]] में यह राज्य स्वेच्छा से भारतीय गणराज्य में शामिल हो गया।&lt;br /&gt;
वाराणसी विभिन्न मत-मतान्तरों की संगम स्थली रही है। विद्या के इस पुरातन और शाश्वत नगर ने सदियों से धार्मिक गुरुओं, सुधारकों और प्रचारकों को अपनी ओर आकृष्ट किया है। '''भगवान [[बुद्ध]] और [[शंकराचार्य]] के अलावा [[रामानुज]], [[वल्लभाचार्य]], संत [[कबीर]], गुरु [[नानक]], [[तुलसीदास]], [[चैतन्य महाप्रभु]], [[रैदास]] आदि अनेक संत इस नगरी में आये।'''&lt;br /&gt;
==भौगोलिक स्थिति==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी का भूगोल}}&lt;br /&gt;
वाराणसी नगर की रचना गंगा के किनारे है, जिसका विस्तार लगभग 5 मील में है। ऊँचाई पर बसे होने के कारण अधिकतर वाराणसी बाढ़ की विभीषिका से सुरक्षित रहता है, परंतु वाराणसी के मध्य तथा दक्षिणी भाग के निचने इलाके प्रभावित होते हैं। &lt;br /&gt;
====नगर का आकार====&lt;br /&gt;
नगर के आकार की धार्मिक मान्यताओं के आधार पर व्याख्या करने के अनेक प्रयास किए गये हैं। इन मान्यताओं की भौगोलिक व्याख्या को कमोवेश स्वीकारा गया है। ऐसे सामान्यत: प्रचलित विश्वासों की सूची इस प्रकार बनाई है-&lt;br /&gt;
;कृत त्रिशूल&lt;br /&gt;
इस त्रिशूल के तीन शूल हैं- उत्तर में ओंकारेश्वर, मध्य में विश्वेश्वर तथा दक्षिण में केदारेश्वर। यह तीनों गंगा तट पर स्थित हैं। मांन्यता है कि यह नगरी भगवान [[शिव]] को समर्पित है और उनके त्रिशूल पर स्थित है।&lt;br /&gt;
;त्रेतायुग चक्र&lt;br /&gt;
चौरासी कोस यात्रा के तदनुरूप है और मध्यमेश्वर इसका केन्द्र है जो गंगा के निकट अवस्थित है।&lt;br /&gt;
;द्वापर रथ&lt;br /&gt;
सात प्रकार के शिव मंदिर, रथ का समरूप बनाते हैं। ये हैं- गोकर्णेश्वर, सुलतानकेश्वर, मणिकर्णेश्वर, भारभूतेश्वर, विश्वेश्वर, मध्यमेश्वर तथा ओंकारेश्वर। इस आकार में भी [[गंगा नदी]] की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। &lt;br /&gt;
;शंखाकार&lt;br /&gt;
यहाँ भी मंदिरों की स्थिति के समरूप आकार माना गया है और गंगा नदी यह आकार निर्धारित करती है। इस आकार को बनाने वाले मंदिर हैं- उत्तर पश्चिम में विध्नराज और विनायक, उत्तर में शैलेश्वर, दक्षिण पूर्व में केदारेश्वर और दक्षिण में लोलार्क। &lt;br /&gt;
==वाराणसी की नदियाँ==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
वाराणसी का विस्तार गंगा नदी के दो संगमों वरुणा और असी नदी से संगम के बीच बताया जाता है। इन संगमों के बीच की दूरी लगभग 2.5 मील है। इस दूरी की परिक्रमा [[हिन्दू धर्म|हिन्दुओं]] में पंचकोसी यात्रा या पंचकोसी परिक्रमा कहलाती है। वाराणसी ज़िले की नदियों के विस्तार से अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि वाराणसी में तो प्रस्रावक नदियाँ है लेकिन चंदौली में नहीं है जिससे उस ज़िले में झीलें और दलदल हैं, अधिक बरसात होने पर गाँव पानी से भर जाते हैं तथा फ़सल को काफ़ी नुक़सान पहुँचता है। &lt;br /&gt;
====गंगा====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{मुख्य|गंगा नदी}}&lt;br /&gt;
गंगा का वाराणसी की प्राकृतिक रचना में मुख्य स्थान है। गंगा वाराणसी में गंगापुर के बेतवर गाँव से पहले घुसती है। यहाँ पर इससे सुबहा नाला आ मिला है। वाराणसी को वहाँ से प्राय: सात मील तक गंगा मिर्ज़ापुर ज़िले से अलग करती है और इसके बाद वाराणसी ज़िले में वाराणसी और चन्दौली को विभाजित करती है। गंगा की धारा अर्ध-वृत्ताकार रूप में वर्ष भर बहती है। इसके बाहरी भाग के ऊपर करारे पड़ते हैं और भीतरी भाग में बालू अथवा बाढ़ की मिट्टी मिलती है। गंगा का रुख़ पहले उत्तर की तरफ़ होता हुआ रामनगर के कुछ आगे तक देहात अमानत को राल्हूपुर से अलग करता है। यहाँ पर किनारा कंकरीला है और नदी उसके ठीक नीचे बहती है। यहाँ तूफ़ान में नावों को काफ़ी ख़तरा रहता है। देहात अमानत में गंगा का बांया किनारा मुंडादेव तक चला गया है। इसके नीचे की ओर वह रेत में परिणत हो जाता है और बाढ़ में पानी से भर जाता है। रामनगर छोड़ने के बाद गंगा की उत्तर-पूर्व की ओर झुकती दूसरी केहुनी (कमान, तरफ़) शुरू होती है। धारा यहाँ बायें किनारे से लगकर बहती है। &lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था==&lt;br /&gt;
====उद्योग और व्यापार====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी का व्यापार}}&lt;br /&gt;
वाराणसी कला, हस्तशिल्प, संगीत और नृत्य का भी केन्द्र है। यह शहर रेशम, सोने व चाँदी के तारों वाले ज़री के काम, लकड़ी के खिलौनों, काँच की चूड़ियों, हाथी दाँत और पीतल के काम के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख उद्योगों में रेल इंजन निर्माण इकाई शामिल है।{{बाँयाबक्सा|पाठ=[[काशी]] को 'महाश्‍मशान' के नाम से भी जाना जाता है। इसे पृथ्वी की सबसे बड़ी शमशान भूमि माना जाता था। यहाँ के मणिकर्णिका घाट तथा हरिश्‍चंद्र घाट को सबसे पवित्र घाट माना जाता है।|विचारक=}}वाराणसी के कारीगरों के कला- कौशल की ख्याति सुदूर प्रदेशों तक में रही है। वाराणसी आने वाला कोई भी यात्री यहाँ के रेशमी [[किमखाब]] तथा ज़री के वस्त्रों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। यहाँ के बुनकरों की परंपरागत कुशलता और कलात्मकता ने इन वस्तुओं को संसार भर में प्रसिद्धि और मान्यता दिलायी है । विदेश व्यापार में इसकी विशिष्ट भूमिका है । इसके उत्पादन में बढ़ोत्तरी और विशिष्टता से विदेशी मुद्रा अर्जित करने में बड़ी सफलता मिली है । रेशम तथा ज़री के उद्योग के अतिरिक्त, यहाँ पीतल के बर्तन तथा उन पर मनोहारी काम और संजरात (झांझ मझीरा) उद्योग भी अपनी कला और सौंदर्य के लिए विख्यात हैं । इसके अलावा यहाँ के लकड़ी के खिलौने भी दूर- दूर तक प्रसिद्ध हैं, जिन्हें कुटीर उद्योगों में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं ।&lt;br /&gt;
====वाणिज्य और व्यापार का प्रमुख केंद्र====&lt;br /&gt;
वाराणसी नगर वाणिज्य और व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। स्थल तथा जल मार्गों द्वारा यह नगर भारत के अन्य नगरों से जुड़ा हुआ था। काशी से एक मार्ग [[राजगृह]] को जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;विनयपिटक, जिल्द 1, पृष्ठ 262&amp;lt;/ref&amp;gt;  काशी से [[वेरंजा]] जाने के लिए दो रास्ते थे- &lt;br /&gt;
#[[सोरेय्य]] होकर&lt;br /&gt;
#[[प्रयाग]] में [[गंगा]] पार करके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा मार्ग बनारस से [[वैशाली]] को चला जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;मोतीचंद्र, काशी का इतिहास, पृष्ठ 49&amp;lt;/ref&amp;gt; वाराणसी का एक सार्थवाह पाँच सौ गाड़ियों के साथ प्रत्यंत देश गया था और वहाँ से [[चंदन]] लाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;सुत्तनिपात, अध्याय 2, पृष्ठ 523&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==कला और संस्कृति==&lt;br /&gt;
{{Main|वाराणसी की संस्कृति}} &lt;br /&gt;
वाराणसी की [[कला]] और [[संस्कृति]] अद्वितीय है। यह वाराणसी की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा है कि यह [[भारत]] की सांस्कृतिक राजधानी बनाता है। [[पुरातत्त्व]], पौराणिक कथाओं, [[भूगोल]], कला और [[इतिहास]] का एक संयोजन वाराणसी [[भारतीय संस्कृति]] की एक महान केंद्र बनाता है। हालांकि वाराणसी मुख्य रूप से [[हिंदू धर्म]] और [[बौद्ध धर्म]] के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन एक और वाराणसी में पूजा और धार्मिक संस्थाओं के कई धार्मिक विश्वासों की झलक पा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाराणसी, भारतीय कला और संस्कृति का पूरा एक संग्रहालय प्रस्तुत करता है। वाराणसी में एक इतिहास के पाठ्यक्रम में बदलते पैटर्न और आंदोलनों को महसूस कर सकते हैं। सदियों से वाराणसी ने मास्टर कारीगरों का उत्पादन किया है और और अपनी सुंदर साड़ी, हस्तशिल्प, वस्त्र, खिलौने, गहने, धातु का काम, मिट्टी और लकड़ी और अन्य शिल्प के लिए नाम और प्रसिद्धि अर्जित की है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाराणसी ने कई प्रसिद्ध विद्वानों और बुद्धिजीवियों, जो गतिविधि के संबंधित क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ गये है, को जन्म दिया है। वाराणसी, एक अद्वितीय सामाजिक और सांस्कृतिक कपड़े प्रस्तुत करता है। [[संगीत]], नाटक, और मनोरंजन के सभी वाराणसी के साथ पर्याय रहे है। बनारस लंबे समय से अपने संगीत, मुखर और वाद्य दोनों के लिए प्रसिद्ध रहा है और अपने खुद के नृत्य परंपराओं. इस पर जोड़ें, वाराणसी लोक संगीत और नाटक, मेलों और त्योहार और अखाड़े, खेल, और खेल की समृद्ध परंपरा की एक बहुत ही पुराना केन्द्र है।&lt;br /&gt;
====संगीत====&lt;br /&gt;
{{Main|वाराणसी का संगीत}}&lt;br /&gt;
*वाराणसी गायन एवं वाद्य दोनों ही विद्याओं का केंद्र रहा है। &lt;br /&gt;
*सुमधुर ठुमरी भारतीय कंठ संगीत को वाराणसी की विशेष देन है। &lt;br /&gt;
*इसमें धीरेंद्र बाबू, बड़ी मोती, छोती मोती, सिद्धेश्वर देवी, रसूलन बाई, काशी बाई, अनवरी बेगम, शांता देवी तथा इस समय गिरिजा देवी आदि का नाम समस्त [[भारत]] में बड़े गौरव एवं सम्मान के साथ लिया जाता है।&lt;br /&gt;
====बनारसी साड़ी====&lt;br /&gt;
{{Main|बनारसी साड़ी}}&lt;br /&gt;
*बनारसी साड़ियों दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। [[लाल रंग|लाल]], [[लाल रंग|हरी]] और अन्य गहरे [[रंग|रंगों]] की ये साड़ियां [[हिंदू]] परिवारों में किसी भी शुभ अवसर के लिए आवश्यक मानी जाती हैं। &lt;br /&gt;
*उत्तर भारत में अधिकांश बेटियाँ बनारसी साड़ी में ही विदा की जाती हैं। &lt;br /&gt;
*बनारसी साड़ियों की कारीगरी सदियों पुरानी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षण संस्थान==&lt;br /&gt;
{{Main|वाराणसी/शिक्षा}}&lt;br /&gt;
वाराणसी पूर्व से ही विद्या और शिक्षा के क्षेत्र में एक अहम प्रचारक और केन्द्रीय संस्था के रूप में स्थापित था। मध्यकाल के दौरान [[उत्तर प्रदेश]] में उदार परम्परा का संचालन था। वाराणसी 'हिन्दू शिक्षा केन्द्र' के रूप में विश्वव्यापक हुआ। वाराणसी के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय 'इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ़ सैकेंडरी एजुकेशन' &amp;lt;ref&amp;gt;आई.सी.एस.ई&amp;lt;/ref&amp;gt;, 'केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड' &amp;lt;ref&amp;gt;सी.बी.एस.ई&amp;lt;/ref&amp;gt; या 'उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद' &amp;lt;ref&amp;gt;यू.पी.बोर्ड&amp;lt;/ref&amp;gt; से सहबद्ध हैं। प्राचीन काल से ही लोग यहाँ [[दर्शन शास्त्र]], [[संस्कृत]], खगोल शास्त्र, सामाजिक ज्ञान एवं धार्मिक शिक्षा आदि के ज्ञान के लिये आते रहे हैं। '''भारतीय परंपरा में प्रायः वाराणसी को सर्वविद्या की राजधानी कहा गया है।''' वाराणसी में एक जामिया सलाफ़िया भी है, जो सलाफ़ी इस्लामी शिक्षा का केन्द्र है।&lt;br /&gt;
====काशी हिन्दू विश्वविद्यालय====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|काशी हिन्दू विश्वविद्यालय}}&lt;br /&gt;
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय या बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में स्थित एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना &amp;lt;ref&amp;gt;बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय एक्ट, एक्ट क्रमांक 16, सन 1915&amp;lt;/ref&amp;gt; के अंतर्गत हुई थी। [[मदनमोहन मालवीय|पण्डित मदनमोहन मालवीय]] ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रारम्भ [[1904]] ई. में किया, जब काशी नरेश 'महाराज प्रभुनारायण सिंह' की अध्यक्षता में संस्थापकों की प्रथम बैठक हुई। [[1905]] ई. में विश्वविद्यालय का प्रथम पाठ्यक्रम प्रकाशित हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====साहित्य====&lt;br /&gt;
वाराणसी संस्कृत साहित्य का केंद्र तो रही ही है, लेकिन इसके साथ ही इस नगर ने हिन्दी तथा [[उर्दू भाषा|उर्दू]] में अनेक साहित्यकारों को भी जन्म दिया है, जिन्होंने साहित्य सेवा की तथा देश में गौरव पूर्ण स्थान प्राप्त किया। इनमें [[भारतेंदु हरिश्चंद्र]], [[अयोध्यासिंह उपाध्याय|अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध']], [[जयशंकर प्रसाद]], [[प्रेमचंद]], [[श्यामसुन्दर दास]], [[राय कृष्णदास]], [[आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]], रामचंद्र वर्मा, बेचन शर्मा &amp;quot;उग्र&amp;quot;, विनोदशंकर व्यास, कृष्णदेव प्रसाद गौड़ तथा डॉ. संपूर्णानंद उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त [[उर्दू]] साहित्य में भी यहाँ अनेक जाने- माने लेखक एवं शायर हुए हैं। जिनमें मुख्यतः श्री विश्वनाथ प्रसाद शाद, मौलवी महेश प्रसाद, महाराज [[चेतसिंह]], शेखअली हाजी, [[आग़ा हश्र कश्मीरी]], हुकुम चंद्र नैयर, प्रो. हफीज बनारसी, श्री हक़ बनारसी तथा नज़ीर बनारसी का नाम आता है।&lt;br /&gt;
====उत्सवप्रियता====&lt;br /&gt;
वाराणसी के निवासियों की उत्सवप्रियता का उल्लेख जातकों में सविस्तार मिलता है। '''महाजनपद युग में [[दीपावली]] का उल्लेख मुख्य त्योहारों में हुआ है।''' एक जातक में उल्लेखित है कि काशी की दीपमालिका [[कार्तिक मास]] में मनायी जाती थी। इस अवसर पर स्थियाँ केशरिया रंग के वस्त्र पहनकर निकलती थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 2, पृष्ठ 145 (संख्या 147) मोतीचंद्र, काशी का इतिहास, पृष्ठ 45&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====हस्तिमंगलोत्सव====&lt;br /&gt;
'''हस्तिमंगलोत्सव भी वाराणसी का एक प्रमुख उत्सव था''',&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 2, संख्या 163, पृष्ठ 215&amp;lt;/ref&amp;gt; जिसका उल्लेख जातकों एवं बौद्ध साहित्य में मिलता है। इसके अतिरिक्त '''मंदिरोत्सव भी मनाया जाता था, जिसमें सुरापान किया जाता था।'''&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 2, संख्या 163, पृष्ठ 132&amp;lt;/ref&amp;gt; एक जातक में उल्लेख आया है कि '''काशीराज ने एक बार इस अवसर पर तपस्वियों को खूब सुरापान कराया था।'''&amp;lt;ref&amp;gt;139- जातक, भाग 1, पृष्ठ 208&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==वाराणसी के मन्दिर==&lt;br /&gt;
वाराणसी में कई प्रमुख मंदिर स्थित हैं। वाराणसी कई प्रमुख मंदिरों का नगर है। वाराणसी में लगभग हर एक चौराहे पर एक मंदिर स्थित है। दैनिक स्थानीय अर्चना के लिये ऐसे छोटे मंदिर  सहायक होते हैं। इन छोटे मंदिरों के साथ ही वाराणसी में ढेरों बड़े मंदिर भी हैं, जो समय-समय पर वाराणसी के इतिहास में बनवाये गये थे। वाराणसी में स्थित इन मंदिरों में काशी विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, ढुंढिराज गणेश, काल भैरव, दुर्गा जी का मंदिर, संकटमोचन, तुलसी मानस मंदिर, नया विश्वनाथ मंदिर, भारतमाता मंदिर, संकठा देवी मंदिर व विशालाक्षी मंदिर प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;
====काशी विश्‍वनाथ मंदिर==== &lt;br /&gt;
{{मुख्य|विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग}}&lt;br /&gt;
मूल काशी विश्‍वनाथ मंदिर बहुत छोटा था। 18वीं शताब्‍दी में इंदौर की [[अहिल्याबाई होल्कर|रानी अहिल्‍याबाई होल्‍कर]] ने इसे भव्‍य रूप प्रदान किया। [[पंजाब]] के शासक [[रणजीत सिंह|राजा रंजीत सिंह]] ने 1835 ई. में इस मंदिर के शिखर को सोने से मढ़वाया था। इस कारण इस मंदिर का एक अन्‍य नाम गोल्‍डेन टेम्‍पल भी पड़ा।&lt;br /&gt;
'''यह मंदिर कई बार ध्‍वस्‍त किया गया।''' वर्तमान में जो मंदिर है उसका निर्माण चौथी बार में हुआ है। [[क़ुतुबुद्दीन ऐबक]] ने सर्वप्रथम इसे 1194 ई. में ध्‍वस्‍त किया था। [[रज़िया सुल्तान]] (1236-1240) ने इसके ध्‍वंसावशेष पर रज़िया मस्जिद का निर्माण करवाया था। इसके बाद इस मंदिर का निर्माण अभिमुक्‍तेश्‍वर मंदिर के नज़दीक बनवाया गया। बाद में इस मंदिर को जौनपुर के शर्की राजाओं ने तुड़वा दिया। 1490 ई. में इस मंदिर को [[सिकन्दर लोदी]] ने ध्‍वंस करवाया था। 1585 ई. में बनारस के एक प्रसिद्ध व्‍यापारी टोडरमल ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। 1669 ई. में इस मंदिर को [[औरंगज़ेब]] ने पुन: तुड़वा दिया। औरंगज़ेब ने भी इस मंदिर के ध्‍वंसावशेष पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया था।&lt;br /&gt;
==वाराणसी के घाट==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी के घाट}}&lt;br /&gt;
वाराणसी (काशी) में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। वाराणसी के घाट गंगा नदी के धनुष की आकृति होने के कारण मनोहारी लगते हैं। सभी घाटों के पूर्वार्भिमुख होने से सूर्योदय के समय घाटों पर पहली किरण दस्तक देती है। उत्तर दिशा में राजघाट से प्रारम्भ होकर दक्षिण में अस्सी घाट तक सौ से अधिक घाट हैं। वाराणसी में अस्‍सीघाट से लेकर वरुणा घाट तक सभी की क्रमवार सूची निम्न है:- &lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
{{main|वाराणसी पर्यटन}}&lt;br /&gt;
वाराणसी, पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। यहाँ अनेक धार्मिक, ऐतिहासिक एवं सुंदर दर्शनीय स्थल हैं, जिन्हें देखने के लिए देश के ही नहीं, संसार भर से पर्यटक आते हैं और इस नगरी तथा यहाँ की [[संस्कृति]] की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। कला, संस्कृति, साहित्य और राजनीति के विविध क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाये रखने के कारण वाराणसी अन्य नगरों की अपेक्षा अपना विशिष्ट स्थान रखती है । देश की राष्ट्रभाषा [[हिन्दी]] की जननी [[संस्कृत]] की उद्भव स्थली काशी सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
[[2001]] की जनगणना के अनुसार नगर निगम क्षेत्र की जनसंख्या 11,22,748 है, छावनी क्षेत्र की जनसंख्या 17,246 और ज़िले की जनसंख्या 31,3867 है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://varanasi.nic.in/glance/dglance.html |title=वाराणसी |accessmonthday=23 फ़रवरी |accessyear=2011 |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher=वाराणसी की आधिकारिक वेबसाइट |language=[[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Refbox}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{वाराणसी}}{{उत्तर प्रदेश}}{{उत्तर प्रदेश के नगर}}{{उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल}}{{भारत के मुख्य पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
{{Toc}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>साँचा:उत्तर प्रदेश के नगर</title>
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		<updated>2011-10-28T10:54:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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		<updated>2011-10-28T10:46:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__ {{सूचना बक्सा वाराणसी}}&lt;br /&gt;
वाराणसी, [[बनारस]] या [[काशी]] भी कहलाता है। वाराणसी दक्षिण-पूर्वी [[उत्तर प्रदेश]] राज्य, उत्तरी-मध्य [[भारत]] में [[गंगा नदी]] के बाएँ तट पर स्थित है और [[हिन्दू|हिन्दुओं]] के सात पवित्र नगरों में से एक है। इसे '''मन्दिरों एवं घाटों का नगर''' भी कहा जाता है। वाराणसी का पुराना नाम काशी है। वाराणसी विश्व का प्राचीनतम बसा हुआ शहर है। यह गंगा नदी के किनारे बसा है और हज़ारों साल से उत्तर [[भारत]] का धार्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र रहा है। '''दो नदियों [[वरुणा नदी|वरुणा]] और [[असी नदी|असि]] के मध्य बसा होने के कारण इसका नाम वाराणसी पड़ा।''' बनारस या वाराणसी का नाम [[पुराण|पुराणों]], [[रामायण]], [[महाभारत]] जैसे अनेकानेक ग्रन्थों में मिलता है। [[वेद|वेदों]] में भी काशी का उल्लेख है। [[संस्कृत]] पढ़ने प्राचीन काल से ही लोग वाराणसी आया करते थे। वाराणसी के घरानों की हिन्दुस्तानी [[संगीत]] में अपनी ही शैली है। &lt;br /&gt;
==स्थिति==&lt;br /&gt;
वाराणसी भारतवर्ष की सांस्कृतिक एवं धार्मिक नगरी के रूप में विख्यात है। इसकी प्राचीनता की तुलना विश्व के अन्य प्राचीनतम नगरों जेरुसलेम, एथेंस तथा पेइकिंग (बीजिंग) से की जाती है।&amp;lt;ref&amp;gt;डायना एल इक, बनारस सिटी ऑफ़ लाइट (न्यूयार्क, [[1982]]), प्रथम संस्करण, पृष्ठ 4&amp;lt;/ref&amp;gt; वाराणसी गंगा के बाएँ तट पर अर्द्धचंद्राकार में 250 18’ उत्तरी अक्षांश एवं 830 1’ पूर्वी देशांतर पर स्थित है। प्राचीन वाराणसी की मूल स्थिति विद्वानों के मध्य विवाद का विषय रही है। &lt;br /&gt;
====विद्वानों के मतानुसार====&lt;br /&gt;
शेरिंग,&amp;lt;ref&amp;gt;एम. ए. शेरिंग, दि सेक्रेड सिटीज ऑफ़ दि हिन्दूज, (लंदन, [[1968]]) पृष्ठ 19-34&amp;lt;/ref&amp;gt; मरडाक,&amp;lt;ref&amp;gt;जे. मरडाक, काशी और बनारस ([[1894]]) पृष्ठ 5&amp;lt;/ref&amp;gt; ग्रीब्ज,&amp;lt;ref&amp;gt;ई. ग्रीब्ज, काशी, [[इलाहाबाद]], [[1909]], पृष्ठ 3-4&amp;lt;/ref&amp;gt; और पारकर&amp;lt;ref&amp;gt;ए. पारकर, ए हैंडबुक ऑफ़ बनारस, पृष्ठ 2&amp;lt;/ref&amp;gt; जैसे विद्वानों के मतानुसार प्राचीन वाराणसी वर्तमान नगर के उत्तर में [[सारनाथ]] के समीप स्थित थी। किसी समय वाराणसी की स्थिति दक्षिण भाग में भी रही होगी। लेकिन वर्तमान नगर की स्थिति वाराणसी से पूर्णतया भिन्न है, जिससे यह प्राय: निश्चित है कि वाराणसी नगर की प्रकृति यथासमय एक स्थान से दूसरे स्थान पर विस्थापित होने की रही है। यह विस्थापन मुख्यतया दक्षिण की ओर हुआ है। पर किसी पुष्ट प्रमाण के अभाव में विद्वानों का उक्त मत समीचीन नहीं प्रतीत होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गंगा नदी के तट पर बसे इस शहर को ही भगवान [[शिव]] ने [[पृथ्वी देवी|पृथ्वी]] पर अपना स्‍थायी निवास बनाया था। यह भी माना जाता है कि वाराणसी का निर्माण सृष्टि रचना के प्रारम्भिक चरण में ही हुआ था। यह शहर प्रथम ज्‍योर्तिलिंग का भी शहर है। [[पुराण|पुराणों]] में वाराणसी को ब्रह्मांड का केंद्र बताया गया है तथा यह भी कहा गया है यहाँ के कण-कण में शिव निवास करते हैं। वाराणसी के लोगों के अनुसार, '''काशी के कण-कण में शिवशंकर हैं।''' इनके कहने का अर्थ यह है कि यहाँ के प्रत्‍येक पत्‍थर में शिव का निवास है। कहते हैं कि काशी शंकर भगवान के [[त्रिशूल]] पर टिकी है। &lt;br /&gt;
====हेवेल की दृष्टि में====&lt;br /&gt;
हेवेल की दृष्टि में वाराणसी नगर की स्थिति विस्थापन प्रधान थी, अपितु प्राचीन काल में भी वाराणसी का वर्तमान स्वरूप सुरक्षित था।&amp;lt;ref&amp;gt;ई.वी. हैवेल, बनारस दि सेक्रेड सिटी पृष्ठ 41-50&amp;lt;/ref&amp;gt;''' हेवेल के मतानुसार [[बुद्ध]] पूर्व युग में आधुनिक सारनाथ एक घना जंगल था और यह विभिन्न धर्मावलंबियों का आश्रय स्थल भी था।''' &lt;br /&gt;
भौगोलिक दशाओं के परिप्रेक्ष्य में हेवेल का मत युक्तिसंगत प्रतीत होता है। वास्तव में वाराणसी नगर का अस्तित्व [[बुद्ध]] से भी प्राचीन है तथा उनके आविर्भाव के सदियों पूर्व से ही यह एक धार्मिक नगरी के रूप में ख्याति प्राप्त था। सारनाथ का उद्भव महात्मा बुद्ध के प्रथम धर्मचक्र प्रवर्तन के उपरांत हुआ। रामलोचन सिंह ने भी कुछ संशोधनों के साथ हेवेल के मत का समर्थन किया है। उनके अनुसार नगर की मूल स्थिति प्राय: उत्तरी भाग में स्वीकार करनी चाहिए।&amp;lt;ref&amp;gt;रामलोचन सिंह, बनारस, एक सिटी इन अर्बन ज्योग्राफी, पृष्ठ 31&amp;lt;/ref&amp;gt; हाल के अकथा [[उत्खनन]] से इस बात की पुष्टि होती है कि वाराणसी की प्राचीन स्थिति उत्तर में थी जहाँ से 1300 ईसा पूर्व के अवशेष प्रकाश में आये हैं।&lt;br /&gt;
==नामकरण==&lt;br /&gt;
‘वाराणसी’ शब्द ‘वरुणा’ और ‘असी’ दो नदीवाचक शब्दों के योग से बना है। पौराणिक अनुश्रुतियों के अनुसार '''वरुणा''' और '''असि''' नाम की नदियों के बीच में बसने के कारण ही इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा। &lt;br /&gt;
*'[[पद्मपुराण]]' के एक उल्लेख के अनुसार दक्षिणोत्तर में ‘वरना’ और पूर्व में ‘असि’ की सीमा से घिरे होने के कारण इस नगर का नाम वाराणसी पड़ा।&amp;lt;ref&amp;gt;वाराणसीति यत् ख्यातं तम्मानं निगदामिव।&lt;br /&gt;
दक्षिणातरयौ नयौ परणासिश्चपूर्णत:॥- [[पद्मपुराण]], काशी माहात्म्य 5/58&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*'[[अथर्ववेद]]'&amp;lt;ref&amp;gt;[[अथर्ववेद]], 4/7/1&amp;lt;/ref&amp;gt; में वरणावती नदी का उल्लेख है। संभवत: यह आधुनिक वरुणा का ही समानार्थक है। &lt;br /&gt;
*'[[अग्निपुराण]]' में नासी नदी का उल्लेख मिलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इतिहास==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी का इतिहास}}&lt;br /&gt;
ऐतिहासिक आलेखों से प्रमाणित होता है कि ईसा पूर्व की छठी शताब्दी में वाराणसी भारतवर्ष का बड़ा ही समृद्धशाली और महत्त्वपूर्ण राज्य था। मध्य युग में यह [[कन्नौज]] राज्य का अंग था और बाद में [[बंगाल]] के पाल नरेशों का इस पर अधिकार हो गया था। सन 1194 में [[मुहम्मद ग़ोरी|शहाबुद्दीन ग़ोरी]] ने इस नगर को लूटा और क्षति पहुँचायी। [[मुग़ल काल]] में इसका नाम बदल कर मुहम्मदाबाद रखा गया। बाद में इसे अवध दरबार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रखा गया। बलवंत सिंह ने बक्सर की लड़ाई में अंग्रेज़ों का साथ दिया और इसके उपलक्ष्य में वाराणसी को अवध दरबार से स्वतंत्र कराया। सन [[1911]] में अंग्रेज़ों ने महाराज प्रभुनारायण सिंह को वाराणसी का राजा बना दिया। सन [[1950]] में यह राज्य स्वेच्छा से भारतीय गणराज्य में शामिल हो गया।&lt;br /&gt;
वाराणसी विभिन्न मत-मतान्तरों की संगम स्थली रही है। विद्या के इस पुरातन और शाश्वत नगर ने सदियों से धार्मिक गुरुओं, सुधारकों और प्रचारकों को अपनी ओर आकृष्ट किया है। '''भगवान [[बुद्ध]] और [[शंकराचार्य]] के अलावा [[रामानुज]], [[वल्लभाचार्य]], संत [[कबीर]], गुरु [[नानक]], [[तुलसीदास]], [[चैतन्य महाप्रभु]], [[रैदास]] आदि अनेक संत इस नगरी में आये।'''&lt;br /&gt;
==भौगोलिक स्थिति==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी का भूगोल}}&lt;br /&gt;
वाराणसी नगर की रचना गंगा के किनारे है, जिसका विस्तार लगभग 5 मील में है। ऊँचाई पर बसे होने के कारण अधिकतर वाराणसी बाढ़ की विभीषिका से सुरक्षित रहता है, परंतु वाराणसी के मध्य तथा दक्षिणी भाग के निचने इलाके प्रभावित होते हैं। &lt;br /&gt;
====नगर का आकार====&lt;br /&gt;
नगर के आकार की धार्मिक मान्यताओं के आधार पर व्याख्या करने के अनेक प्रयास किए गये हैं। इन मान्यताओं की भौगोलिक व्याख्या को कमोवेश स्वीकारा गया है। ऐसे सामान्यत: प्रचलित विश्वासों की सूची इस प्रकार बनाई है-&lt;br /&gt;
;कृत त्रिशूल&lt;br /&gt;
इस त्रिशूल के तीन शूल हैं- उत्तर में ओंकारेश्वर, मध्य में विश्वेश्वर तथा दक्षिण में केदारेश्वर। यह तीनों गंगा तट पर स्थित हैं। मांन्यता है कि यह नगरी भगवान [[शिव]] को समर्पित है और उनके त्रिशूल पर स्थित है।&lt;br /&gt;
;त्रेतायुग चक्र&lt;br /&gt;
चौरासी कोस यात्रा के तदनुरूप है और मध्यमेश्वर इसका केन्द्र है जो गंगा के निकट अवस्थित है।&lt;br /&gt;
;द्वापर रथ&lt;br /&gt;
सात प्रकार के शिव मंदिर, रथ का समरूप बनाते हैं। ये हैं- गोकर्णेश्वर, सुलतानकेश्वर, मणिकर्णेश्वर, भारभूतेश्वर, विश्वेश्वर, मध्यमेश्वर तथा ओंकारेश्वर। इस आकार में भी [[गंगा नदी]] की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। &lt;br /&gt;
;शंखाकार&lt;br /&gt;
यहाँ भी मंदिरों की स्थिति के समरूप आकार माना गया है और गंगा नदी यह आकार निर्धारित करती है। इस आकार को बनाने वाले मंदिर हैं- उत्तर पश्चिम में विध्नराज और विनायक, उत्तर में शैलेश्वर, दक्षिण पूर्व में केदारेश्वर और दक्षिण में लोलार्क। &lt;br /&gt;
==वाराणसी की नदियाँ==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी की नदियाँ}}&lt;br /&gt;
वाराणसी का विस्तार गंगा नदी के दो संगमों वरुणा और असी नदी से संगम के बीच बताया जाता है। इन संगमों के बीच की दूरी लगभग 2.5 मील है। इस दूरी की परिक्रमा [[हिन्दू धर्म|हिन्दुओं]] में पंचकोसी यात्रा या पंचकोसी परिक्रमा कहलाती है। वाराणसी ज़िले की नदियों के विस्तार से अध्ययन करने पर यह ज्ञात होता है कि वाराणसी में तो प्रस्रावक नदियाँ है लेकिन चंदौली में नहीं है जिससे उस ज़िले में झीलें और दलदल हैं, अधिक बरसात होने पर गाँव पानी से भर जाते हैं तथा फ़सल को काफ़ी नुक़सान पहुँचता है। &lt;br /&gt;
====गंगा====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{मुख्य|गंगा नदी}}&lt;br /&gt;
गंगा का वाराणसी की प्राकृतिक रचना में मुख्य स्थान है। गंगा वाराणसी में गंगापुर के बेतवर गाँव से पहले घुसती है। यहाँ पर इससे सुबहा नाला आ मिला है। वाराणसी को वहाँ से प्राय: सात मील तक गंगा मिर्ज़ापुर ज़िले से अलग करती है और इसके बाद वाराणसी ज़िले में वाराणसी और चन्दौली को विभाजित करती है। गंगा की धारा अर्ध-वृत्ताकार रूप में वर्ष भर बहती है। इसके बाहरी भाग के ऊपर करारे पड़ते हैं और भीतरी भाग में बालू अथवा बाढ़ की मिट्टी मिलती है। गंगा का रुख़ पहले उत्तर की तरफ़ होता हुआ रामनगर के कुछ आगे तक देहात अमानत को राल्हूपुर से अलग करता है। यहाँ पर किनारा कंकरीला है और नदी उसके ठीक नीचे बहती है। यहाँ तूफ़ान में नावों को काफ़ी ख़तरा रहता है। देहात अमानत में गंगा का बांया किनारा मुंडादेव तक चला गया है। इसके नीचे की ओर वह रेत में परिणत हो जाता है और बाढ़ में पानी से भर जाता है। रामनगर छोड़ने के बाद गंगा की उत्तर-पूर्व की ओर झुकती दूसरी केहुनी (कमान, तरफ़) शुरू होती है। धारा यहाँ बायें किनारे से लगकर बहती है। &lt;br /&gt;
==अर्थव्यवस्था==&lt;br /&gt;
====उद्योग और व्यापार====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी का व्यापार}}&lt;br /&gt;
वाराणसी कला, हस्तशिल्प, संगीत और नृत्य का भी केन्द्र है। यह शहर रेशम, सोने व चाँदी के तारों वाले ज़री के काम, लकड़ी के खिलौनों, काँच की चूड़ियों, हाथी दाँत और पीतल के काम के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ के प्रमुख उद्योगों में रेल इंजन निर्माण इकाई शामिल है।{{बाँयाबक्सा|पाठ=[[काशी]] को 'महाश्‍मशान' के नाम से भी जाना जाता है। इसे पृथ्वी की सबसे बड़ी शमशान भूमि माना जाता था। यहाँ के मणिकर्णिका घाट तथा हरिश्‍चंद्र घाट को सबसे पवित्र घाट माना जाता है।|विचारक=}}वाराणसी के कारीगरों के कला- कौशल की ख्याति सुदूर प्रदेशों तक में रही है। वाराणसी आने वाला कोई भी यात्री यहाँ के रेशमी [[किमखाब]] तथा ज़री के वस्त्रों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। यहाँ के बुनकरों की परंपरागत कुशलता और कलात्मकता ने इन वस्तुओं को संसार भर में प्रसिद्धि और मान्यता दिलायी है । विदेश व्यापार में इसकी विशिष्ट भूमिका है । इसके उत्पादन में बढ़ोत्तरी और विशिष्टता से विदेशी मुद्रा अर्जित करने में बड़ी सफलता मिली है । रेशम तथा ज़री के उद्योग के अतिरिक्त, यहाँ पीतल के बर्तन तथा उन पर मनोहारी काम और संजरात (झांझ मझीरा) उद्योग भी अपनी कला और सौंदर्य के लिए विख्यात हैं । इसके अलावा यहाँ के लकड़ी के खिलौने भी दूर- दूर तक प्रसिद्ध हैं, जिन्हें कुटीर उद्योगों में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं ।&lt;br /&gt;
====वाणिज्य और व्यापार का प्रमुख केंद्र====&lt;br /&gt;
वाराणसी नगर वाणिज्य और व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। स्थल तथा जल मार्गों द्वारा यह नगर भारत के अन्य नगरों से जुड़ा हुआ था। काशी से एक मार्ग [[राजगृह]] को जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;विनयपिटक, जिल्द 1, पृष्ठ 262&amp;lt;/ref&amp;gt;  काशी से [[वेरंजा]] जाने के लिए दो रास्ते थे- &lt;br /&gt;
#[[सोरेय्य]] होकर&lt;br /&gt;
#[[प्रयाग]] में [[गंगा]] पार करके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा मार्ग बनारस से [[वैशाली]] को चला जाता था।&amp;lt;ref&amp;gt;मोतीचंद्र, काशी का इतिहास, पृष्ठ 49&amp;lt;/ref&amp;gt; वाराणसी का एक सार्थवाह पाँच सौ गाड़ियों के साथ प्रत्यंत देश गया था और वहाँ से [[चंदन]] लाया था।&amp;lt;ref&amp;gt;सुत्तनिपात, अध्याय 2, पृष्ठ 523&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==कला और संस्कृति==&lt;br /&gt;
{{Main|वाराणसी की संस्कृति}} &lt;br /&gt;
वाराणसी की [[कला]] और [[संस्कृति]] अद्वितीय है। यह वाराणसी की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा है कि यह [[भारत]] की सांस्कृतिक राजधानी बनाता है। [[पुरातत्त्व]], पौराणिक कथाओं, [[भूगोल]], कला और [[इतिहास]] का एक संयोजन वाराणसी [[भारतीय संस्कृति]] की एक महान केंद्र बनाता है। हालांकि वाराणसी मुख्य रूप से [[हिंदू धर्म]] और [[बौद्ध धर्म]] के साथ जुड़ा हुआ है, लेकिन एक और वाराणसी में पूजा और धार्मिक संस्थाओं के कई धार्मिक विश्वासों की झलक पा सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाराणसी, भारतीय कला और संस्कृति का पूरा एक संग्रहालय प्रस्तुत करता है। वाराणसी में एक इतिहास के पाठ्यक्रम में बदलते पैटर्न और आंदोलनों को महसूस कर सकते हैं। सदियों से वाराणसी ने मास्टर कारीगरों का उत्पादन किया है और और अपनी सुंदर साड़ी, हस्तशिल्प, वस्त्र, खिलौने, गहने, धातु का काम, मिट्टी और लकड़ी और अन्य शिल्प के लिए नाम और प्रसिद्धि अर्जित की है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वाराणसी ने कई प्रसिद्ध विद्वानों और बुद्धिजीवियों, जो गतिविधि के संबंधित क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ गये है, को जन्म दिया है। वाराणसी, एक अद्वितीय सामाजिक और सांस्कृतिक कपड़े प्रस्तुत करता है। [[संगीत]], नाटक, और मनोरंजन के सभी वाराणसी के साथ पर्याय रहे है। बनारस लंबे समय से अपने संगीत, मुखर और वाद्य दोनों के लिए प्रसिद्ध रहा है और अपने खुद के नृत्य परंपराओं. इस पर जोड़ें, वाराणसी लोक संगीत और नाटक, मेलों और त्योहार और अखाड़े, खेल, और खेल की समृद्ध परंपरा की एक बहुत ही पुराना केन्द्र है।&lt;br /&gt;
====संगीत====&lt;br /&gt;
{{Main|वाराणसी का संगीत}}&lt;br /&gt;
*वाराणसी गायन एवं वाद्य दोनों ही विद्याओं का केंद्र रहा है। &lt;br /&gt;
*सुमधुर ठुमरी भारतीय कंठ संगीत को वाराणसी की विशेष देन है। &lt;br /&gt;
*इसमें धीरेंद्र बाबू, बड़ी मोती, छोती मोती, सिद्धेश्वर देवी, रसूलन बाई, काशी बाई, अनवरी बेगम, शांता देवी तथा इस समय गिरिजा देवी आदि का नाम समस्त [[भारत]] में बड़े गौरव एवं सम्मान के साथ लिया जाता है।&lt;br /&gt;
====बनारसी साड़ी====&lt;br /&gt;
{{Main|बनारसी साड़ी}}&lt;br /&gt;
*बनारसी साड़ियों दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। [[लाल रंग|लाल]], [[लाल रंग|हरी]] और अन्य गहरे [[रंग|रंगों]] की ये साड़ियां [[हिंदू]] परिवारों में किसी भी शुभ अवसर के लिए आवश्यक मानी जाती हैं। &lt;br /&gt;
*उत्तर भारत में अधिकांश बेटियाँ बनारसी साड़ी में ही विदा की जाती हैं। &lt;br /&gt;
*बनारसी साड़ियों की कारीगरी सदियों पुरानी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिक्षण संस्थान==&lt;br /&gt;
{{Main|वाराणसी/शिक्षा}}&lt;br /&gt;
वाराणसी पूर्व से ही विद्या और शिक्षा के क्षेत्र में एक अहम प्रचारक और केन्द्रीय संस्था के रूप में स्थापित था। मध्यकाल के दौरान [[उत्तर प्रदेश]] में उदार परम्परा का संचालन था। वाराणसी 'हिन्दू शिक्षा केन्द्र' के रूप में विश्वव्यापक हुआ। वाराणसी के उच्चतर माध्यमिक विद्यालय 'इंडियन सर्टिफिकेट ऑफ़ सैकेंडरी एजुकेशन' &amp;lt;ref&amp;gt;आई.सी.एस.ई&amp;lt;/ref&amp;gt;, 'केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड' &amp;lt;ref&amp;gt;सी.बी.एस.ई&amp;lt;/ref&amp;gt; या 'उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद' &amp;lt;ref&amp;gt;यू.पी.बोर्ड&amp;lt;/ref&amp;gt; से सहबद्ध हैं। प्राचीन काल से ही लोग यहाँ [[दर्शन शास्त्र]], [[संस्कृत]], खगोल शास्त्र, सामाजिक ज्ञान एवं धार्मिक शिक्षा आदि के ज्ञान के लिये आते रहे हैं। '''भारतीय परंपरा में प्रायः वाराणसी को सर्वविद्या की राजधानी कहा गया है।''' वाराणसी में एक जामिया सलाफ़िया भी है, जो सलाफ़ी इस्लामी शिक्षा का केन्द्र है।&lt;br /&gt;
====काशी हिन्दू विश्वविद्यालय====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|काशी हिन्दू विश्वविद्यालय}}&lt;br /&gt;
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय या बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी में स्थित एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना &amp;lt;ref&amp;gt;बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय एक्ट, एक्ट क्रमांक 16, सन 1915&amp;lt;/ref&amp;gt; के अंतर्गत हुई थी। [[मदनमोहन मालवीय|पण्डित मदनमोहन मालवीय]] ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रारम्भ [[1904]] ई. में किया, जब काशी नरेश 'महाराज प्रभुनारायण सिंह' की अध्यक्षता में संस्थापकों की प्रथम बैठक हुई। [[1905]] ई. में विश्वविद्यालय का प्रथम पाठ्यक्रम प्रकाशित हुआ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====साहित्य====&lt;br /&gt;
वाराणसी संस्कृत साहित्य का केंद्र तो रही ही है, लेकिन इसके साथ ही इस नगर ने हिन्दी तथा [[उर्दू भाषा|उर्दू]] में अनेक साहित्यकारों को भी जन्म दिया है, जिन्होंने साहित्य सेवा की तथा देश में गौरव पूर्ण स्थान प्राप्त किया। इनमें [[भारतेंदु हरिश्चंद्र]], [[अयोध्यासिंह उपाध्याय|अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध']], [[जयशंकर प्रसाद]], [[प्रेमचंद]], [[श्यामसुन्दर दास]], [[राय कृष्णदास]], [[आचार्य रामचन्द्र शुक्ल]], रामचंद्र वर्मा, बेचन शर्मा &amp;quot;उग्र&amp;quot;, विनोदशंकर व्यास, कृष्णदेव प्रसाद गौड़ तथा डॉ. संपूर्णानंद उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त [[उर्दू]] साहित्य में भी यहाँ अनेक जाने- माने लेखक एवं शायर हुए हैं। जिनमें मुख्यतः श्री विश्वनाथ प्रसाद शाद, मौलवी महेश प्रसाद, महाराज [[चेतसिंह]], शेखअली हाजी, [[आग़ा हश्र कश्मीरी]], हुकुम चंद्र नैयर, प्रो. हफीज बनारसी, श्री हक़ बनारसी तथा नज़ीर बनारसी का नाम आता है।&lt;br /&gt;
====उत्सवप्रियता====&lt;br /&gt;
वाराणसी के निवासियों की उत्सवप्रियता का उल्लेख जातकों में सविस्तार मिलता है। '''महाजनपद युग में [[दीपावली]] का उल्लेख मुख्य त्योहारों में हुआ है।''' एक जातक में उल्लेखित है कि काशी की दीपमालिका [[कार्तिक मास]] में मनायी जाती थी। इस अवसर पर स्थियाँ केशरिया रंग के वस्त्र पहनकर निकलती थीं।&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 2, पृष्ठ 145 (संख्या 147) मोतीचंद्र, काशी का इतिहास, पृष्ठ 45&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====हस्तिमंगलोत्सव====&lt;br /&gt;
'''हस्तिमंगलोत्सव भी वाराणसी का एक प्रमुख उत्सव था''',&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 2, संख्या 163, पृष्ठ 215&amp;lt;/ref&amp;gt; जिसका उल्लेख जातकों एवं बौद्ध साहित्य में मिलता है। इसके अतिरिक्त '''मंदिरोत्सव भी मनाया जाता था, जिसमें सुरापान किया जाता था।'''&amp;lt;ref&amp;gt;जातक, भाग 2, संख्या 163, पृष्ठ 132&amp;lt;/ref&amp;gt; एक जातक में उल्लेख आया है कि '''काशीराज ने एक बार इस अवसर पर तपस्वियों को खूब सुरापान कराया था।'''&amp;lt;ref&amp;gt;139- जातक, भाग 1, पृष्ठ 208&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==वाराणसी के मन्दिर==&lt;br /&gt;
वाराणसी में कई प्रमुख मंदिर स्थित हैं। वाराणसी कई प्रमुख मंदिरों का नगर है। वाराणसी में लगभग हर एक चौराहे पर एक मंदिर स्थित है। दैनिक स्थानीय अर्चना के लिये ऐसे छोटे मंदिर  सहायक होते हैं। इन छोटे मंदिरों के साथ ही वाराणसी में ढेरों बड़े मंदिर भी हैं, जो समय-समय पर वाराणसी के इतिहास में बनवाये गये थे। वाराणसी में स्थित इन मंदिरों में काशी विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, ढुंढिराज गणेश, काल भैरव, दुर्गा जी का मंदिर, संकटमोचन, तुलसी मानस मंदिर, नया विश्वनाथ मंदिर, भारतमाता मंदिर, संकठा देवी मंदिर व विशालाक्षी मंदिर प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;
====काशी विश्‍वनाथ मंदिर==== &lt;br /&gt;
{{मुख्य|विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग}}&lt;br /&gt;
मूल काशी विश्‍वनाथ मंदिर बहुत छोटा था। 18वीं शताब्‍दी में इंदौर की [[अहिल्याबाई होल्कर|रानी अहिल्‍याबाई होल्‍कर]] ने इसे भव्‍य रूप प्रदान किया। [[पंजाब]] के शासक [[रणजीत सिंह|राजा रंजीत सिंह]] ने 1835 ई. में इस मंदिर के शिखर को सोने से मढ़वाया था। इस कारण इस मंदिर का एक अन्‍य नाम गोल्‍डेन टेम्‍पल भी पड़ा।&lt;br /&gt;
'''यह मंदिर कई बार ध्‍वस्‍त किया गया।''' वर्तमान में जो मंदिर है उसका निर्माण चौथी बार में हुआ है। [[क़ुतुबुद्दीन ऐबक]] ने सर्वप्रथम इसे 1194 ई. में ध्‍वस्‍त किया था। [[रज़िया सुल्तान]] (1236-1240) ने इसके ध्‍वंसावशेष पर रज़िया मस्जिद का निर्माण करवाया था। इसके बाद इस मंदिर का निर्माण अभिमुक्‍तेश्‍वर मंदिर के नज़दीक बनवाया गया। बाद में इस मंदिर को जौनपुर के शर्की राजाओं ने तुड़वा दिया। 1490 ई. में इस मंदिर को [[सिकन्दर लोदी]] ने ध्‍वंस करवाया था। 1585 ई. में बनारस के एक प्रसिद्ध व्‍यापारी टोडरमल ने इस मंदिर का निर्माण करवाया। 1669 ई. में इस मंदिर को [[औरंगज़ेब]] ने पुन: तुड़वा दिया। औरंगज़ेब ने भी इस मंदिर के ध्‍वंसावशेष पर एक मस्जिद का निर्माण करवाया था।&lt;br /&gt;
==वाराणसी के घाट==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वाराणसी के घाट}}&lt;br /&gt;
वाराणसी (काशी) में गंगा तट पर अनेक सुंदर घाट बने हैं, ये सभी घाट किसी न किसी पौराणिक या धार्मिक कथा से संबंधित हैं। वाराणसी के घाट गंगा नदी के धनुष की आकृति होने के कारण मनोहारी लगते हैं। सभी घाटों के पूर्वार्भिमुख होने से सूर्योदय के समय घाटों पर पहली किरण दस्तक देती है। उत्तर दिशा में राजघाट से प्रारम्भ होकर दक्षिण में अस्सी घाट तक सौ से अधिक घाट हैं। वाराणसी में अस्‍सीघाट से लेकर वरुणा घाट तक सभी की क्रमवार सूची निम्न है:- &lt;br /&gt;
==पर्यटन==&lt;br /&gt;
{{main|वाराणसी पर्यटन}}&lt;br /&gt;
वाराणसी, पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। यहाँ अनेक धार्मिक, ऐतिहासिक एवं सुंदर दर्शनीय स्थल हैं, जिन्हें देखने के लिए देश के ही नहीं, संसार भर से पर्यटक आते हैं और इस नगरी तथा यहाँ की [[संस्कृति]] की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। कला, संस्कृति, साहित्य और राजनीति के विविध क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बनाये रखने के कारण वाराणसी अन्य नगरों की अपेक्षा अपना विशिष्ट स्थान रखती है । देश की राष्ट्रभाषा [[हिन्दी]] की जननी [[संस्कृत]] की उद्भव स्थली काशी सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है।&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
[[2001]] की जनगणना के अनुसार नगर निगम क्षेत्र की जनसंख्या 11,22,748 है, छावनी क्षेत्र की जनसंख्या 17,246 और ज़िले की जनसंख्या 31,3867 है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://varanasi.nic.in/glance/dglance.html |title=वाराणसी |accessmonthday=23 फ़रवरी |accessyear=2011 |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher=वाराणसी की आधिकारिक वेबसाइट |language=[[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Refbox}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{वाराणसी}}{{उत्तर प्रदेश के नगर}}&lt;br /&gt;
{{Toc}}&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5_%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=229897</id>
		<title>संजीव कुमार</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5_%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0&amp;diff=229897"/>
		<updated>2011-10-26T15:24:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा कलाकार&lt;br /&gt;
|चित्र=sanjeev_kumar.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=संजीव कुमार&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=हरिहर जारिवाल&lt;br /&gt;
|प्रसिद्ध नाम=संजीव कुमार&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=हरि भाई &lt;br /&gt;
|जन्म= 9 जुलाई 1938&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि= [[मुंबई]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=6 नवम्बर 1985&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[मुंबई]]&lt;br /&gt;
|अविभावक= &lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=आजीवन कुंवारे रहे&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[मुंबई]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=अभिनेता&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=&lt;br /&gt;
|मुख्य फ़िल्में=दस्तक (1970), कोशिश (1972), सीता और गीता ([[1972]]), शोले ([[1975]]), आँधी ([[1976]]), अर्जुन पंडित ([[1977]]) आदि&lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ अभिनेता व सहायक अभिनेता के लिए फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
संजीव कुमार (जन्म- 9 जुलाई 1938 [[मुंबई]], मृत्यु- 6 नवम्बर 1985 [[मुंबई]]) हिन्दी फ़िल्मों में एक भारतीय अभिनेता थे। इनका नाम हरिहर जरीवाल था लेकिन फ़िल्मी दुनियाँ में ये अपने दूसरे नाम 'संजीव कुमार' के नाम से प्रसिद्ध हैं। फ़िल्मी दुनियाँ में संजीव कुमार ने नायक, सहनायक, खलनायक और चरित्र कलाकार भूमिकाओं को निभाया। इनके द्वारा अभिनीत प्रसिद्ध फ़िल्मों में कोशिश, शोले, अंगूर, त्रिशूल, पारस, अनामिका, खिलौना, मनचली, शतरंज के खिलाड़ी, सीता और गीता, आंधी, मौसम, विधाता, दस्तक, नया दिन नयी रात आदि हैं। &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
संजीव कुमार का जन्म [[मुंबई]] में 9 जुलाई 1938 को एक मध्यम वर्गीय गुजराती परिवार में हुआ था। वह बचपन से हीं फ़िल्मों में बतौर अभिनेता काम करने का सपना देखा करते थे। इसी सपने को पूरा करने के लिए वह अपने जीवन के शुरुआती दौर मे रंगमंच से जुड़े और बाद में उन्होंने फ़िल्मालय के एक्टिंग स्कूल में दाख़िला लिया। इसी दौरान वर्ष 1960 में उन्हें फ़िल्मालय बैनर की फ़िल्म हम हिन्दुस्तानी में एक छोटी सी भूमिका निभाने का मौक़ा मिला।&amp;lt;ref name=&amp;quot;jagran&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==फ़िल्मी सफ़र==&lt;br /&gt;
वर्ष 1962 में राजश्री प्रोडक्शन की निर्मित फ़िल्म आरती के लिए उन्होंने स्क्रीन टेस्ट दिया जिसमें वह पास नहीं हो सके। सर्वप्रथम मुख्य अभिनेता के रूप में संजीव कुमार को वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म निशान में काम करने का मौक़ा मिला। वर्ष 1960 से वर्ष 1968 तक संजीव कुमार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। फ़िल्म हम हिंदुस्तानी के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने स्मगलर, पति-पत्नी, हुस्न और इश्क, बादल, नौनिहाल और गुनाहगार जैसी कई फ़िल्मों में अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।&amp;lt;ref name=&amp;quot;jagran&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====सहायक अभिनेता====&lt;br /&gt;
वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म शिकार में वह पुलिस ऑफिसर की भूमिका में दिखाई दिए। यह फ़िल्म पूरी तरह अभिनेता [[धर्मेन्द्र]] पर केन्द्रित थी फिर भी संजीव कुमार धर्मेन्द्र जैसे अभिनेता की उपस्थिति में अपने अभिनय की छाप छोड़ने में क़ामयाब रहे। इस फ़िल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें सहायक अभिनेता का फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड भी मिला।&amp;lt;ref name=&amp;quot;jagran&amp;quot;/&amp;gt; &lt;br /&gt;
====अभिनय ====&lt;br /&gt;
वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म संघर्ष में उनके सामने हिन्दी फ़िल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे लेकिन संजीव कुमार अपनी छोटी सी भूमिका के जरिए दर्शकों में प्रसिद्ध रहे। इसके बाद आशीर्वाद, राजा और रंक, सत्याकाम और अनोखी रात जैसी फ़िल्मों में मिली क़ामयाबी के जरिए संजीव कुमार दर्शकों के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुंच गए जहां वह फ़िल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। वर्ष 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म खिलौना की जबर्दस्त क़ामयाबी के बाद संजीव कुमार बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली।&amp;lt;ref name=&amp;quot;jagran&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sholay.jpg|thumb|250px|शोले की सूटिंग के दौरान कैमरे के पीछे चट्टान पर पहली बार जेलर की वर्दी पहने हुए असरानी के अभ्यास पर हँसते हुए [[अमिताभ बच्चन]], [[धर्मेन्द्र]], संजीव कुमार व अमजद ख़ान]]&lt;br /&gt;
वर्ष 1970 में ही प्रदर्शित फ़िल्म दस्तक में उनके लाजवाब अभिनय के लिए वह सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1972 में प्रदर्शित फ़िल्म कोशिश में उनके अभिनय का नया आयाम दर्शकों को देखने को मिला। फ़िल्म कोशिश में संजीव कुमार ने गूंगे की भूमिका निभायी। बगैर संवाद बोले सिर्फ [[आंख|आंखों]] और चेहरे के भाव से दर्शकों को सब कुछ बता देना संजीव कुमार की अभिनय प्रतिभा का ऐसा उदाहरण था जिसे शायद ही कोई अभिनेता दोहरा पाए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फ़िल्म कोशिश में संजीव कुमार अपने लड़के की शादी एक गूंगी लड़की से करना चाहते है और उनका लड़का इस शादी के लिए राजी नहीं होता है। तब वह अपनी मृत पत्नी की दीवार पर लटकी फ़ोटो को उतार लेते हैं। उनकी आंखों में विषाद की गहरी छाया और चेहरे पर क्रोध होता है। इस दृश्य के जरिए उन्होंने बिना बोले ही अपने मन की सारी बात दर्शकों तक बडे़ ही सरल अंदाज में पहुंचा दी थी। इस फ़िल्म में उनके लाजवाब अभिनय के लिए उन्हें दूसरी बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया।&amp;lt;ref name=&amp;quot;jagran&amp;quot;/&amp;gt; &lt;br /&gt;
====फ़िल्मों की क़ामयाबी====&lt;br /&gt;
खिलौना, दस्तक और कोशिश जैसी फ़िल्मों की क़ामयाबी से संजीव कुमार शोहरत की बुंलदियों पर जा बैठे। अपनी फ़िल्मों की क़ामयाबी के बाद भी उन्होंने फ़िल्म परिचय में एक छोटी सी भूमिका स्वीकार की और उससे भी वह दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे। इस बीच सीता और गीता, अनामिका और मनचली जैसी फ़िल्मों में अपने रूमानी अंदाज के जरिए दर्शको के बीच प्रसिद्ध रहे।&amp;lt;ref name=&amp;quot;jagran&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
;फ़िल्म नया दिन नयी रात&lt;br /&gt;
वर्ष 1974 में प्रदर्शित फ़िल्म नया दिन नयी रात में संजीव कुमार के अभिनय और विविधता के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले इस फ़िल्म में उन्होंने नौ अलग-अलग भूमिकाओं में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। फ़िल्म में संजीव कुमार ने लूले-लंगड़े, अंधे, बूढे, बीमार, कोढ़ी, हिजड़े, डाकू, जवान और प्रोफ़ेसर के किरदार को निभाकर जीवन के नौ रसो को रूपहले पर्दे पर साकार किया। यह फ़िल्म उनके हर किरदार की अलग ख़ासियत की वजह से जानी जाती है लेकिन इस फ़िल्म में उनके एक हिजड़े का किरदार आज भी फ़िल्मी दर्शकों के मस्तिष्क पर छा जाता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Shatranj-Ke-Khiladi.jpg|left|thumb|250px|फ़िल्म 'शतरंज के खिलाड़ी' का एक दृश्य]]&lt;br /&gt;
====विभिन्न भूमिका====&lt;br /&gt;
अभिनय मे एकरूपता से बचने और स्वंय को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए संजीव कुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इस क्रम में वर्ष 1975 में प्रदर्शित रमेश सिप्पी की सुपरहिट फ़िल्म शोले में वह फ़िल्म अभिनेत्री जया भादुड़ी के ससुर की भूमिका निभाने से भी नहीं हिचके। हांलाकि संजीव कुमार ने फ़िल्म शोले के पहले जया भादुडी के साथ कोशिश और अनामिका में नायक की भूमिका निभाई थी। वर्ष 1977 में प्रदर्शित फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी में उन्हें महान निर्देशक [[सत्यजीत रे]] के साथ काम करने का मौक़ा मिला। इस फ़िल्म के जरिए भी उन्होंने दर्शकों का मन मोहे रखा। इसके बाद संजीव कुमार ने मुक्ति (1977),त्रिशूल (1978), पति पत्नी और वो (1978), देवता (1978),जानी दुश्मन (1979), गृहप्रवेश (1979), हम पांच (1980), चेहरे पे चेहरा (1981), दासी(1981), विधाता (1982), नमकीन (1982), अंगूर (1982) और हीरो (1983) जैसी कई सुपरहिट फ़िल्मों के जरिए दर्शकों के दिल पर राज किया।&amp;lt;ref name=&amp;quot;jagran&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://in.jagran.yahoo.com/cinemaaza/star/biography/204_211_110015.html |title= संजीव कुमार |accessmonthday=[[2 जुलाई]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= एच.टी.एम.एल|publisher=जागरण याहू |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारतीय सिनेमा जगत में संजीव कुमार को एक ऐसे बहुआयामी कलाकार के तौर पर जाना जाता है जिन्होंने नायक, सहनायक, खलनायक और चरित्र कलाकार भूमिकाओं से दर्शको को अपना दीवाना बनाया। संजीव कुमार के अभिनय में एक विशेषता रही कि वह किसी भी तरह की भूमिका के लिए सदा उपयुक्त रहते थे। बाद मे संजीव कुमार ने गुलज़ार के निर्देशन मे आंधी, मौसम, नमकीन और अंगूर जैसी कई फ़िल्मों मे अपने अभिनय का जौहर दिखाया। वर्ष 1982 मे प्रदर्शित फ़िल्म अंगूर में संजीव कुमार ने दोहरी भूमिका निभाई।&amp;lt;ref name=&amp;quot;प्रेस नोट&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://www.pressnote.in/%E0%A4%AC%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%86%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%A5%E0%A5%87-%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0_37275.html |title=बहुआयामी कलाकार थे संजीव कुमार |accessmonthday=[[2 जुलाई]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher=प्रेस नोट |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
संजीव कुमार दो बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए हैं। वर्ष 1975 में प्रदर्शित फ़िल्म आंधी के लिए सबसे पहले उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार दिया गया। इसके बाद वर्ष 1976 में भी फ़िल्म अर्जुन पंडित में बेमिसाल अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार से नवाजे गए।&amp;lt;ref name=&amp;quot;jagran&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
अपने दमदार अभिनय से दर्शकों के दिल में ख़ास पहचान बनाने वाले अजीम कलाकार 6 नवंबर 1985 को दिल का गंभीर दौरा पड़ने के कारण इस दुनिया को अलविदा कह गए।&amp;lt;ref name=&amp;quot;प्रेस नोट&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
== बाहरी कड़ियाँ ==&lt;br /&gt;
*[http://www.imdb.com/name/nm0474876/ Sanjeev Kumar (I) (1938–1985)]&lt;br /&gt;
*[http://www.chakpak.com/celebrity/sanjeev-kumar/9937 Sanjeev Kumar]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अभिनेता}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
[[Category:अभिनेता]]&lt;br /&gt;
[[Category:कला कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व]]&lt;br /&gt;
[[Category:प्रसिद्ध व्यक्तित्व कोश]][[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:सिनेमा कोश]]&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
	</entry>
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		<title>चित्र:Sadhu-Varanasi.jpg</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चित्र सूचना&lt;br /&gt;
|विवरण=साधु, [[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
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|दिनांक=&lt;br /&gt;
|स्रोत=www.flickr.com&lt;br /&gt;
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|अन्य विवरण=वाराणसी, काशी अथवा बनारस [[भारत]] देश के [[उत्तर प्रदेश]] का एक प्राचीन और धार्मिक महत्ता रखने वाला शहर है। वाराणसी का पुराना नाम काशी है। वाराणसी विश्व का प्राचीनतम बसा हुआ शहर है।&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{CCL&lt;br /&gt;
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|Share Alike=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:वाराणसी]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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&lt;hr /&gt;
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		<title>समुद्री डाकू</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: :श्रेणी:नया पन्ना (को हटा दिया गया हैं।)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Sea-pirate.jpg|thumb|समुद्री डाकू|250px]]&lt;br /&gt;
'''समुद्री डाकू अथवा जल दस्यु''' समुद्री जहाज़ों को और कभी-कभी समुद्र तटीय स्थानों को लूटा करते थे। इनके पास अपने जहाज़ होते थे जिन पर ये समुद्री यात्रा करते थे। 17-18 [[सदी]] में अधिक सक्रिय रहे और आज भी कम संख्या में ही सही लेकिन सक्रिय तो हैं ही। लगभग 1650-1720 से समुद्री डाकुओं के हजारों समूह सक्रिय थे। इन वर्षों को कभी-कभी दस्युओं की 'द गोल्डन एज​​' के रूप में जाना जाता है। समुद्री डाकू समुद्री यात्राओं के प्राचीन काल से ही अस्तित्व में है। वे प्राचीन [[यूनान]] के व्यापार मार्गों की और रोमन जहाजों से अनाज और ज़ैतून का तेल से लदे मालवाहकों को ज़ब्त करते रहते थे और फिरौती वसूल करके छोड़ भी देते थे।&lt;br /&gt;
==पहचान चिह्न==&lt;br /&gt;
जल दस्युओं से जुड़ी अनेक लोक कथाएँ हैं इस विषय पर अनेक फ़िल्में बन चुकी हैं। इनके कुछ विशेष पहचान चिह्न भी होते थे। जिनमें मनुष्य खोपड़ी  के निशान का झंडा और एक आँख को ढँक लेने वाला काले रंग का गोल-तिकोना जैसा एक टुकड़ा होता था। जो चमड़े या कपड़े का होता है और कभी-कभी धातु का भी। इसे पाइराइट पॅच (Pirate patch) या आई पॅच (Eye patch) कहा जाता है&lt;br /&gt;
पाइराइट पॅच पहनने के कई कारण थे जैसे:&lt;br /&gt;
#एक आँख का ख़राब होना और उसे ढँकने के लिए।&lt;br /&gt;
#सिर्फ़ शौक़िया भी जिससे थोड़े डरावने रूप से प्रभावशाली लगें।&lt;br /&gt;
#एक व्यावहारिक कारण यह भी हो सकता है कि दूरबीन (टेलीस्कोप) से देखने के लिए एक आँख बंद करने में सुविधा हो।&lt;br /&gt;
#जो सबसे मुख्य और व्यावहारिक कारण था वह था; '''अचानक से रौशनी से अंधेरे में जाना या अंधेरे से रौशनी में जाना।''' जहाज़ों के निचले हिस्से अक्सर कम रौशनी वाले होते थे जबकि ऊपरी हिस्सा खुला और तेज़ धूप वाला होता था। रौशनी के कारण आँखें चुंधियाई रहती थी और अचानक निचले हिस्से में जाने पर काफ़ी देर तक कुछ दिखता नहीं था। इस समस्या का एक ही इलाज था कि एक आँख को बंद रखा जाय और कम रौशनी वाले हिस्से में उसे खोला जाय जिससे साफ़ दिखाई दे सके। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Pirate-patch.jpg|चमड़े का पाइराइट पॅच&lt;br /&gt;
चित्र:Sanjay-Dutt.jpg|अभिनेता संजय दत्त पाइराइट पॅच पहने हुए, फ़िल्म खलनायक&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.nmm.ac.uk/explore/sea-and-ships/facts/ships-and-seafarers/pirates Pirates]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:सागर]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>समुद्री डाकू</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Sea-pirate.jpg|thumb|समुद्री डाकू|250px]]&lt;br /&gt;
'''समुद्री डाकू अथवा जल दस्यु''' समुद्री जहाज़ों को और कभी-कभी समुद्र तटीय स्थानों को लूटा करते थे। इनके पास अपने जहाज़ होते थे जिन पर ये समुद्री यात्रा करते थे। 17-18 [[सदी]] में अधिक सक्रिय रहे और आज भी कम संख्या में ही सही लेकिन सक्रिय तो हैं ही। लगभग 1650-1720 से समुद्री डाकुओं के हजारों समूह सक्रिय थे। इन वर्षों को कभी-कभी दस्युओं की 'द गोल्डन एज​​' के रूप में जाना जाता है। समुद्री डाकू समुद्री यात्राओं के प्राचीन काल से ही अस्तित्व में है। वे प्राचीन [[यूनान]] के व्यापार मार्गों की और रोमन जहाजों से अनाज और ज़ैतून का तेल से लदे मालवाहकों को ज़ब्त करते रहते थे और फिरौती वसूल करके छोड़ भी देते थे।&lt;br /&gt;
==पहचान चिह्न==&lt;br /&gt;
जल दस्युओं से जुड़ी अनेक लोक कथाएँ हैं इस विषय पर अनेक फ़िल्में बन चुकी हैं। इनके कुछ विशेष पहचान चिह्न भी होते थे। जिनमें मनुष्य खोपड़ी  के निशान का झंडा और एक आँख को ढँक लेने वाला काले रंग का गोल-तिकोना जैसा एक टुकड़ा होता था। जो चमड़े या कपड़े का होता है और कभी-कभी धातु का भी। इसे पाइराइट पॅच (Pirate patch) या आई पॅच (Eye patch) कहा जाता है&lt;br /&gt;
पाइराइट पॅच पहनने के कई कारण थे जैसे:&lt;br /&gt;
#एक आँख का ख़राब होना और उसे ढँकने के लिए।&lt;br /&gt;
#सिर्फ़ शौक़िया भी जिससे थोड़े डरावने रूप से प्रभावशाली लगें।&lt;br /&gt;
#एक व्यावहारिक कारण यह भी हो सकता है कि दूरबीन (टेलीस्कोप) से देखने के लिए एक आँख बंद करने में सुविधा हो।&lt;br /&gt;
#जो सबसे मुख्य और व्यावहारिक कारण था वह था; '''अचानक से रौशनी से अंधेरे में जाना या अंधेरे से रौशनी में जाना।''' जहाज़ों के निचले हिस्से अक्सर कम रौशनी वाले होते थे जबकि ऊपरी हिस्सा खुला और तेज़ धूप वाला होता था। रौशनी के कारण आँखें चुंधियाई रहती थी और अचानक निचले हिस्से में जाने पर काफ़ी देर तक कुछ दिखता नहीं था। इस समस्या का एक ही इलाज था कि एक आँख को बंद रखा जाय और कम रौशनी वाले हिस्से में उसे खोला जाय जिससे साफ़ दिखाई दे सके। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Pirate-patch.jpg|चमड़े का पाइराइट पॅच&lt;br /&gt;
चित्र:Sanjay-Dutt.jpg|अभिनेता संजय दत्त पाइराइट पॅच पहने हुए, फ़िल्म खलनायक&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.nmm.ac.uk/explore/sea-and-ships/facts/ships-and-seafarers/pirates Pirates]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना]]&lt;br /&gt;
[[Category:सागर]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<title>इस्लाम धर्म</title>
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		<updated>2011-10-15T16:04:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;__TOC__&lt;br /&gt;
[[चित्र:Islam-Symbol.jpg|thumb|200px|इस्लाम धर्म का प्रतीक]]&lt;br /&gt;
इस्लाम शब्द का अर्थ है – '[[अल्लाह]] को समर्पण'। इस प्रकार मुसलमान वह है, जिसने अपने आपको अल्लाह को समर्पित कर दिया, अर्थात इस्लाम धर्म के नियमों पर चलने लगा। इस्लाम धर्म का आधारभूत सिद्धांत अल्लाह को सर्वशक्तिमान, एकमात्र ईश्वर और जगत का पालक तथा हज़रत मुहम्मद को उनका संदेशवाहक या पैगम्बर मानना है। यही बात उनके 'कलमे' में दोहराई जाती है - '''ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह''' अर्थात 'अल्लाह एक है, उसके अलावा कोई दूसरा (दूसरी सत्ता) नहीं और मुहम्मद उसके रसूल या पैगम्बर।' कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व मुसलमान यह क़लमा पढ़ते हैं। इस्लाम में अल्लाह को कुछ हद तक साकार माना गया है, जो इस दुनिया से काफ़ी दूर सातवें आसमान पर रहता है। वह अभाव (शून्य) में सिर्फ़ 'कुन' कहकर ही सृष्टि रचता है। उसकी रचनाओं में आग से बने [[फ़रिश्ता|फ़रिश्ते]] और मिट्टी से बने मनुष्य सर्वश्रेष्ठ हैं। गुमराह फ़रिश्तों को '[[शैतान]]' कहा जाता है। इस्लाम के अनुसार मनुष्य सिर्फ़ एक बार दुनिया में जन्म लेता है। मृत्यु के पश्चात पुनः वह ईश्वरीय निर्णय ([[क़यामत]]) के दिन जी उठता है और मनुष्य के रूप में किये गये अपने कर्मों के अनुसार ही '[[जन्नत]]' (स्वर्ग) या 'नरक' पाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'इस्लाम' को शुरूआत ही से सबका विरोध सहना पड़ा। उसने निर्भीकतापूर्वक जब दूसरों के मिथ्याविश्वासों का खण्डन किया, तो सभी ने भरसक इस्लाम को उखाड़ फैंकने का प्रयत्न किया। सचमुच जिस प्रकार का विरोध था, यदि उसी प्रकार की दृढ़ता मुसलमानों और उनके धर्मगुरु ने न दिखाई होती तो कौन कह सकता है कि इस्लाम इस प्रकार संसार के इतिहास को पलट देने में समर्थ होता। &lt;br /&gt;
==भारत में इस्लाम का प्रवेश==&lt;br /&gt;
712 ई. में [[भारत]] में इस्लाम का प्रवेश हो चुका था। [[मुहम्मद-इब्न-क़ासिम]] के नेतृत्व में अरब के [[मुसलमान|मुसलमानों]] ने [[सिंध]] पर हमला कर दिया और वहाँ के [[ब्राह्मण]] राजा [[दाहिर]] को हरा दिया। इस तरह भारत की भूमि पर पहली बार [[इस्लाम]] के पैर जम गये और बाद की शताब्दियों के [[हिन्दू धर्म|हिन्दू]] राजा उसे फिर हटा नहीं सके। परन्तु सिंध पर अरबों का शासन वास्तव में निर्बल था और 1176 ई. में [[शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी]] ने उसे आसानी से उखाड़ दिया। इससे पूर्व सुबुक्तगीन के नेतृत्व में मुसलमानों ने हमला करके [[पंजाब]] छीन लिया था और ग़ज़नी के [[महमूद ग़ज़नवी|सुल्तान महमूद]] ने 997 से 1030 ई. के बीच भारत पर सत्रह बार हमले किये और हिन्दू राजाओं की शक्ति कुचल डाली, फिर भी हिन्दू राजाओं ने मुसलमानी आक्रमण का जिस अनवरत रीति से प्रबल विरोध किया, उसका महत्त्व कम करके नहीं आंकना चाहिए।&lt;br /&gt;
==अरब==&lt;br /&gt;
{{main|अरब}}&lt;br /&gt;
अत्यंत प्राचीन काल में ‘जदीस’, ‘आद’, ‘समूद’ आदि जातियाँ, जिनका अब नाममात्र शेष है, अरब में निवास करती थीं, किन्तु [[भारत]]-सम्राट [[हर्षवर्द्धन]] के सम-सामयिक हज़रत मुहम्मद के समय ‘क़हतान’, ‘इस्माईल’ और ‘यहूदी’ वंश के लोग ही अरब में निवास करते थे। प्राचीन काल में अरब-निवासी सुसभ्य और शिल्प-कला में प्रवीण थे। परन्तु ‘'''नीचैर्गच्छत्युपरि च तथा चक्रनेमिक्रमेण'''’ के अनुसार कालान्तर में उनके वंशज घोर अविद्यान्धकार में निमग्न हो गये और सारी शिल्पकलाओं को भूल कर ऊँट-बकरी चराना मात्र उनकी जीविका का उपाय रह गया। वह इसके लिए एक स्रोत से दूसरे स्रोत, एक स्थान से दूसरे स्थान में हरे चरागाहों को खोजते हुए खेमों में निवास करके कालक्षेप करने लगे। कनखजूरा, गोह, गिरगिट आदि सारे जीव उनके भक्ष्य थे। प्रज्ज्वलित [[आग|अग्नि]] में जीवित मनुष्य को डाल देना उनके समीप कोई असाधु कर्म नहीं समझा जाता था। [[हिन्दू धर्म|हिन्दू]]-पुत्र अम्रु ने अपने भाई के मारे जाने पर एक के बदले सौ के मारने की प्रतिज्ञा की।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हज़रत मुहम्मद==&lt;br /&gt;
{{main|मुहम्मद}}&lt;br /&gt;
इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हज़रत मुहम्मद साहब थे, जिनका जन्म 570 ई. को सउदी अरब के [[मक्का (अरब)|मक्का]] नामक स्थान में कुरैश क़बीले के अब्दुल्ला नामक व्यापारी के घर हुआ था। जन्म के पूर्व ही पिता की और पाँच वर्ष की आयु में माता की मृत्यु हो जाने के फलस्वरूप उनका पालन-पोषण उनके दादा मुतल्लिब और चाचा अबू तालिब ने किया था। 25 वर्ष की आयु में उन्होंने ख़दीजा नामक एक विधवा से विवाह किया। मोहम्मद साहब के जन्म के समय अरबवासी अत्यन्त पिछडी, क़बीलाई और चरवाहों की ज़िन्दगी बिता रहे थे। अतः मुहम्मद साहब ने उन क़बीलों को संगठित करके एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का प्रयास किया। 15 वर्ष तक व्यापार में लगे रहने के पश्चात वे कारोबार छोड़कर चिन्तन-मनन में लीन हो गये। मक्का के समीप हिरा की चोटी पर कई दिन तक चिन्तनशील रहने के उपरान्त उन्हें देवदूत जिबरील का संदेश प्राप्त हुआ कि वे जाकर [[क़ुरान शरीफ़]] के रूप में प्राप्त ईश्वरीय संदेश का प्रचार करें। तत्पश्चात उन्होंने इस्लाम धर्म का प्रचार शुरू किया। उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया, जिससे मक्का का पुरोहित वर्ग भड़क उठा और अन्ततः मुहम्मद साहब ने 16 जुलाई 622 को मक्का छोड़कर वहाँ से 300 किलोमीटर उत्तर की ओर यसरिब (मदीना) की ओर कूच कर दिया। उनकी यह यात्रा इस्लाम में 'हिजरत' कहलाती है। इसी दिन से '[[हिजरी संवत]]' का प्रारम्भ माना जाता है। कालान्तर में 630 ई. में अपने लगभग 10 हज़ार अनुयायियों के साथ मुहम्मद साहब ने मक्का पर चढ़ाई करके उसे जीत लिया और वहाँ इस्लाम को लोकप्रिय बनाया। दो वर्ष पश्चात [[8 जून]], 632 को उनका निधन हो गया। &lt;br /&gt;
====तत्कालीन मूर्तियाँ====&lt;br /&gt;
‘हुब्ल’, ‘लात्’, ‘मनात्’ ‘उज्ज’ आदि भिन्न-भिन्न अनेक देव-प्रतिमाएँ उस समय अरब के प्रत्येक कबील में लोगों की इष्ट थीं। बहुत पुराने समय में वहाँ मूर्तिपूजा न थी। ‘अमरू’ नामक काबा के एक प्रधान पुजारी ने ‘शाम’ देश में सुना कि इसकी आराधना से दुष्काल से रक्षा और शत्रु पर विजय प्राप्त होती है। उसी ने पहले-पहल ‘शाम’ से लाकर कुछ मूर्तियाँ काबा के मन्दिर में स्थापित कीं। देखादेखी इसका प्रचार इतना बढ़ा कि सारा देश मूर्तिपूजा में निमग्न हो गया। अकेले ‘काबा’ मन्दिर में 360 देवमूर्तियाँ थीं, जिनमें हुब्ल-जो छत पर स्थापित था - कुरेश - वंशियों का इष्ट था। ‘जय&amp;lt;ref&amp;gt;‘अलल्-हुब्ल’&amp;lt;/ref&amp;gt; हुब्ल’ उनका जातीय घोष था। लोग मानते थे कि ये मूर्तियाँ ईश्वर को प्राप्त कराती हैं, इसीलिए वे उन्हें पूजते थे। अरबी में ‘इलाह’ शब्द [[देवता]] और उनकी मूर्तियों के लिए प्रयुक्त होते है; किन्तु ‘अलाह’ शब्द ‘इस्लाम’ काल से पहले उस समय भी एक ही ईश्वर के लिए प्रयुक्त होता था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमती ‘[[खदीजा]]’ और उनके भाई ‘नौफ़ल’ मूर्तिपूजा - विरोधी [[यहूदी धर्म]] के अनुयायी थे। उनके और अपनी यात्राओं में अनेक शिष्ट महात्माओं के सत्संग एवं लोगों के पाखण्ड ने उन्हें मूर्तिपूजा से विमुख बना दिया। वह [[ईसाई धर्म|ईसाई]] भिक्षुओं की भाँति बहुधा ‘हिरा’ की गुफा में एकान्त-सेवन और ईश्वर - प्रणिधान के लिए जाया करते थे। ‘इका बि-इस्मि रब्बिक’ (पढ़ अपने प्रभु के नाम के साथ) यह प्रथम क़ुरान वाक्य पहले वहीं पर देवदूत ‘जिब्राइल’ द्वारा महात्मा मुहम्मद के हृदय में उतारा गया। उस समय देवदूत के भयंकर शरीर को देखकर क्षण भर के लिए वह मूर्च्छित हो गये थे। जब उन्होंने इस वृत्तान्त को श्रीमती ‘ख़दीजा’ और ‘नौफ़ल’ को सुनाया तो उन्होंने कहा- '''अवश्य वह देवदूत था जो इस भगवत्वाक्य को लेकर तुम्हारे पास आया था।''' इस समय महात्मा मुहम्मद की आयु 40 वर्ष की थी। यहीं से उनकी पैगम्बरी (भगवतता) का समय प्रास्म्भ होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====इस्लाम का प्रचार और कष्ट====&lt;br /&gt;
{{दाँयाबक्सा|पाठ=यह पुण्य नहीं कि तुम अपने मुँह को पूर्व या पश्चिम की ओर कर लो। पुण्य तो यह है - परमेश्वर, अन्तिम दिन, देवदूतों, पुस्तक और ऋषियों पर श्रृद्धा रखना, धन को प्रेमियों, सम्बन्धियों, अनाथों, दरिद्रों, पथिकों, याचिकों और गर्दन बचाने वालों के लिए देना, उपवास (रोज़ा) रखना, दान देना, जब प्रतिज्ञा कर चुके तो अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करना, विपत्तियों, हानियों और युद्धों में सहिष्णु (होना), (जो ऐसा करते हैं) वही लोग सच्चे और संयमी हैं।|विचारक=}}&lt;br /&gt;
ईश्वर के दिव्य आदेश को प्राप्त कर उन्होंने [[मक्का]] के दाम्भिक और समागत यात्रियों को क़ुरान का उपदेश सुनाना आरम्भ किया। मेला के ख़ास दिनों (‘इह्राम’ के महीनों) में दूर से आयें हुए तीर्थ-यात्रियों के समूह को छल-पाखण्डयुक्त लोकाचार और अनेक देवताओं की अपासना का खण्डन करके, वह एक ईश्वर (अल्लाह) की उपासना और शुद्ध तथा सरल धर्म के अनुष्ठान का उपदेश करते थे। ‘क़ुरैशी’ लोग अपने इष्ट, आचार और आमदनी की इस प्रकार निन्दा और उस पर इस प्रकार का कुठाराघात देखकर भी ‘हाशिम’- परिवार की चिरशत्रुता के भय से उन्हें मारने की हिम्मन न कर सकते थे। किन्तु इस नवीन धर्म-अनुयायी, दास-दासियों को तप्त बालू पर लिटाते, कोड़े मारते तथा बहुत कष्ट देते थे; तो भी धर्म के मतवाले प्राणपण से अपने धर्म को न छोड़ने के लिए तैयार थे। इस अमानुषिक असह्य अत्याचार को दिन पर दिन बढ़ते देख कर अन्त में महात्मा ने अनुयानियों को ‘[[अफ्रीका]]’ खण्ड के ‘हब्स’ नामक राज्य में- जहाँ का राजा बड़ा न्यायपरायण था- चले जाने की अनुमति दे दी। जैसे-जैसे [[मुसलमान|मुसलमानों]] की संख्या बढ़ती जाती थी, ‘क़ुरैशी’ का द्वेष भी वैसे-वैसे बढ़ता जाता था; किन्तु ‘अबूतालिब’ के जीवन-पर्यन्त खुलकर उपद्रव करने की उनकी हिम्मत न होती थी। जब ‘अबूतालिब’ का देहान्त हो गया तो उन्होंने खुले तौर पर विरोध करने पर कमर बाँधी।&lt;br /&gt;
====मदीना-प्रवास====&lt;br /&gt;
अब महात्मा मुहम्मद की अवस्था 53 वर्ष की थी। उनकी स्त्री श्रीमती ‘खदीजा’ का देहान्त हो चुका था। एक दिन ‘क़ुरैशियों’ ने हत्या के अभिप्राय से उनके घर को चारों ओर से घेर लिया, किन्तु महात्मा को इसका पता पहले से ही मिल चुका था। उन्होंने पूर्व ही वहाँ से ‘यस्रिब’ ([[मदीना]]) नगर को प्रस्थान कर दिया था। वहाँ के शिष्य-वर्ग ने अति श्रद्धा से गुरु सुश्रुषा करने की प्रार्थना की थी। पहुँचने पर उन्होंने महात्मा के भोजन, वासगृह आदि का प्रबन्ध कर दिया। जब से उनका निवास ‘यास्रिब’ में हुआ, तब से नगर का नाम ‘मदीतुन्नबी’ या नबी का नगर प्रख्यात हुआ। उसी को छोटा करके आजकल केवल ‘मदीना’ कहते हैं। ‘क़ुरान’ में तीस खण्ड हैं और वह 114 ‘सूरतों’ (अध्यायों) में भी विभक्त है।&amp;lt;ref&amp;gt; प्रत्येक अध्याय में अनेक ‘रकूअ’ और प्रत्येक ‘रकूअ’ में अनेक ‘आयते’ होती हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; निवास-क्रम से प्रत्येक सूरत ‘मक्की’ या ‘मद्नी’ नाम से पुकारी जाती है, अर्थात मक्का में उतरी ‘सूरतें’ ‘मक्की’ और मदीना में उतरी ‘मद्नी’ कही जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मुहम्मद अन्तिम पैग़म्बर==&lt;br /&gt;
&amp;quot;जो कोई परमेश्वर और उसके प्रेरित की आज्ञा न माने, उसको सर्वदा के लिए नरक की अग्नि है।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;72:2:4&amp;lt;/ref&amp;gt; महात्मा मुहम्मद के आचरण को आदर्श मानकर उसे दूसरों के लिए अनुकरणीय कहा गया है। &amp;quot;तुम्हारे लिए प्रभु–प्रेरित का सुन्दर आचरण अनुकरणीय है।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;33:3:1&amp;lt;/ref&amp;gt; यह कह ही आए हैं कि अरब के लोग उस समय एकदम असभ्य थे। उन्हें छोटे–छोटे से लेकर बड़े–बड़े आचार और सभ्यता–सम्बन्धी व्यवहारों को भी बतलाना पड़ता था। उनको गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र, बड़े-छोटे के सम्बन्ध का भी विशेष विचार नहीं था। महात्मा मुहम्मद को गुरु और प्रेरित स्वीकार करने पर उनका यही मुख्य सम्बन्ध मुसलमानों के साथ है, न कि भाईबन्दी, चचा-भतीजा वाला पहला सम्बन्ध; यथा- &amp;quot;मुहम्मद तुम पुरुषों में से किसी का बाप नहीं, वह प्रभु-प्रेरित और सब प्रेरितों पर मुहर (अन्तिम) है।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;33:5:6&amp;lt;/ref&amp;gt; 'मुसलमानों का उस (मुहम्मद) के साथ प्राण से भी अधिक सम्बन्ध है और उसकी स्त्रियाँ तुम्हारी (मुसलमानों) की माताएँ हैं।'&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==क़ुरान शरीफ़==&lt;br /&gt;
{{main|क़ुरान शरीफ़}}&lt;br /&gt;
इस्लाम धर्म की पवित्र पुस्तक का नाम [[क़ुरान शरीफ़|क़ुरान]] है जिसका [[हिन्दी भाषा|हिन्दी]] में अर्थ 'सस्वर पाठ' है। क़ुरान शरीफ़ 22 साल 5 माह और 14 दिन के अर्से में ज़रूरत के मुताबिक़ किस्तों में नाज़िल हुआ। क़ुरान शरीफ़ में 30 पारे, 114 सूरतें और 540 रुकूअ हैं। क़ुरान शरीफ़ की कुल आयत की तादाद 6666 (छः हज़ार छः सौ छियासठ) है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://hindi.webdunia.com/religion/religion/islam/0809/22/1080922003_1.htm |title=कुरआन नूर की हिदायत |accessmonthday=[[23 सितंबर]] |accessyear=[[2010]] |last= |first= |authorlink= |format=एच टी एम |publisher=वेब दुनिया |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====लौह महफूज में क़ुरान====&lt;br /&gt;
क़ुरान के विषय में उसके अनुयायियों का विश्वास है और स्वयं क़ुरान में भी लिखा है- '''सचमुच पूज्य क़ुरान अदृष्ट पुस्तक में (वर्तमान) है। जब तक शुद्ध न हो, उसे मत छुओ। वह लोक-परलोक के स्वामी के पास उतरा है'''।&amp;lt;ref&amp;gt;56 : 3 : 3-5&amp;lt;/ref&amp;gt; अदृष्ट पुस्तक से यहाँ अभिप्राय उस स्वर्गीय लेख-पटिट्का से है जिसे इस्लामी परिभाषा में ‘लौह-महफूज’ कहते हैं। सृष्टिकर्त्ता ने आदि से उसमें त्रिकालवृत्ति लिख रक्खा है, जैसा कि स्थानान्तर में कहा है-&lt;br /&gt;
“'''हमने अरबी क़ुरान रचा कि तुमको ज्ञान हो। निस्सन्देह वह उत्तम ज्ञान-भण्डार हमारे पास पुस्तकों की माता (लौह महफूज) में लिखा है'''।“ &amp;lt;ref&amp;gt;53 : 1 : 3-5&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जगदीश्वर ने क़ुरान में वर्णित ज्ञान को जगत के हित के लिए अपने प्रेरित मुहम्मद के हृदय में प्रकाशित किया, यही इस सबका भावार्थ है। अपने धर्म की शिक्षा देने वाले ग्रन्थ पर असाधारण श्रद्धा होना मनुष्य का स्वभाव है। यही कारण है कि क़ुरान के माहात्म्य के विषय में अनेक कथाएँ जनसमुदाय में प्रचलित हैं, यद्यपि उन सबका आधार श्रद्धा छोड़ कर क़ुरान में ढूँढ़ना युक्त नहीं है, किन्तु ऐसे वाक्यों का उसमें सर्वथा अभाव है, यह भी नहीं कहा जा सकता। एक स्थल पर कहा है-&lt;br /&gt;
'''यदि हम इस क़ुरान को किसी पर्वत (वा पर्वत-सदृश कठोर हृदय) पर उतारते, तो अवश्य तू उसे परमेश्वर के भय से दबा और फटा देखता। इन दृष्टान्तों को मनुष्यों के लिए हम वर्णित करते है जिससे कि वह सोचें।'''&amp;lt;ref&amp;gt;59 : 3 : 4&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इस्लाम के सिद्धान्त==&lt;br /&gt;
अरबी के 'मज़हब' और 'दीन' शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त हैं, उसे अंग्रेज़ी का रिलीजन शब्द तो अवश्य व्यक्त कर सकता है। किन्तु [[संस्कृत]] या [[हिन्दी भाषा|हिन्दी]] में उनका पर्यायवाची कोई एक शब्द नहीं मिलता। यद्यपि 'पन्थ' शब्द ठीक 'मज़हब' शब्द के ही धात्वर्थ को प्रकाशित करता है। किन्तु जिस प्रकार 'धर्म' शब्द अतिव्याप्त है, उसी प्रकार यह अव्याप्ति–दोषग्रस्त है। इस निबन्ध के वर्णनानुसार जो मार्ग मनुष्य के ऐहिक और आयुष्मिक श्रेय की प्राप्ति के लिए अनुसरण करने के योग्य है, वही इस्लाम पन्थ, धर्म या सम्प्रदाय है। आसानी के लिए हम प्रायः 'पन्थ' शब्द ही को इसके लिए प्रयुक्त करेंगे। हर एक पन्थ में दो प्रकार के मन्तव्य होते हैं। एक विश्वासात्मक, दूसरा क्रियात्मक। नीचे दोनों प्रकार के इस्लामी मन्तव्यों को क़ुरान के शब्दों ही में उदधृत किया जाता है—&lt;br /&gt;
&amp;quot;यह पुण्य नहीं कि तुम अपने मुँह को पूर्व या पश्चिम की ओर कर लो। पुण्य तो यह है—परमेश्वर, अन्तिम दिन, देवदूतों, पुस्तक और ऋषियों पर श्रृद्धा रखना, धन को प्रेमियों, सम्बन्धियों, अनाथों, दरिद्रों, पथिकों, याचिकों और गर्दन बचाने वालों के लिए देना, उपवास (रोज़ा) रखना, दान देना, जब प्रतिज्ञा कर चुके तो अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करना, विपत्तियों, हानियों और युद्धों में सहिष्णु (होना), (जो ऐसा करते हैं) वही लोग सच्चे और संयमी हैं।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;2:22:1&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुरानी कथाएँ==&lt;br /&gt;
&amp;quot;यह (वह) बस्तियाँ हैं, जिनका वृत्तान्त तुझे (हम) सुनाते हैं।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;7:13:3&amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;quot;सो तू (मुहम्मद) कथा वर्णन कर, शायद यह विचार करे।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;7:22:5&amp;lt;/ref&amp;gt; क़ुरान का एक विशेष भाग शिक्षाप्रद इतिवृत्तों और कथाओं से पूर्ण है। उपर्युक्त वाक्य इसके साक्षी हैं। क़ुरान में वर्णित सभी विषयों का सामान्य ज्ञान इस क़ुरानसार की रचना से अभिप्रेत है। अतः यहाँ पर उन कथाओं का थोड़ा–सा वर्णन कर दिया जाता है। इनमें से अनेक कथाएँ कुछ घटा - बढ़ा कर वहीं हैं जो [[बाइबिल]] में आई हैं। इन महात्माओं के बारे में है- &lt;br /&gt;
*[[आदम|महात्मा आदम]]&lt;br /&gt;
*[[नूह|महात्मा नूह]]&lt;br /&gt;
*[[महात्मा इब्राहीम]]&lt;br /&gt;
*[[महात्मा लूत]]&lt;br /&gt;
*[[यूसुफ़|महात्मा यूसुफ़]]&lt;br /&gt;
*[[मूसा|महात्मा मूसा]]&lt;br /&gt;
*[[महात्मा दाऊद]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अल्लाह, फ़रिश्ते, शैतान==&lt;br /&gt;
दुनिया के सारे धर्म प्रायः सारे पदार्थों को दो श्रेणियों में विभक्त करते हैं, अर्थात जड़ और चेतन। चेतन के भी दो भेद हैं - ईश्वर, जीव। जीवों में ही फ़रिश्ते शैतान भी हैं।&lt;br /&gt;
====अल्लाह====&lt;br /&gt;
{{main|अल्लाह}}&lt;br /&gt;
ईश्वर को ‘क़ुरान’ ने सृष्टि का कर्ता, धर्ता, हर्ता माना है, जैसा कि उसके निम्न उद्धरणों से मालूम होगा -&lt;br /&gt;
*“वह (ईश्वर) जिसने भूमि में जो कुछ है (सबको) तुम्हारे लिए बनाया।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 2:4:9&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*“उसने सचमुच भूमि और आकाश बनाया। मनुष्य का क्षुद्र वीर्य – बिन्दु से बनाया। उसने पशु बनाए, जिनसे गर्म वस्त्र पाते तथा और भी अनेक प्रकार के लाभ उठाते हो, एवं उन्हें खाते हो।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 16:1:2-5&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*“वह तुम्हारा ईश्वर चीज़ों का बनाने वाला है। उसके सिवाय कोई भी पूज्य नहीं है।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 4:7:2&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
*“ईश्वर सब चीज़ों का सृष्टा तथा अधिकारी है।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 39:6:10&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*“निस्सन्देह ईश्वर भूमि और आकाश को धारण किए हुए है कि वह नष्ट न हो जाए।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 35:5:4&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*“जो परमेश्वर मारता और जिलाता है।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 53:3:12&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*ईश्वर बड़ा ही दयालु है, वह अपराधों को क्षमा कर देता है -&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;“निस्सन्देह तेरा ईश्वर मनुष्यों के लिए उनके अपराधों का क्षमा करने वाला है।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 13:1:6&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
*आस्तिकों पर ही नहीं, फ़रिश्तों पर भी—&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;“इस बात में (हे मुहम्मद !) तेरा कुछ नहीं, चाह वह (ईश्वर) उन (क़फ़िरों) को क्षमा करे या उन पर विपद डाले, यदि वह अत्याचारी है।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 3:13:8&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
*ईश्वर सत्य है -&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;“परमेश्वर सत्य है।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 31:3:11&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
*ईश्वर का न्यायकारी होना इस प्रकार से कहा गया है -&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;“क़यामत के दिन हम ठीक तौलेंगे, किसी जीव पर कुछ भी अन्याय नहीं किया जाएगा। चाहे वह एक सरसों के बराबर ही क्यों न हो, किन्तु हमारे पास में पूरा हिसाब रहेगा।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 21:4:6&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
*निम्न वाक्य के अनेक ईश्वरीय गुण बतलाए गए हैं -&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;“परमेश्वर जिसके सिवाय कोई भी ईश्वर नहीं है - जीवन और सत् है। उसे नींद या औंघ नहीं आती। जो कुछ भी भूमि और प्रकाश में है, वह उसी के लिए ही है। जो कि उसकी आज्ञा के बिना उसके पास सिफ़ारिश करे? वह जानता है, जो कुछ उनके आगे या पीछ है, वह कोई बात उससे छिपा नहीं सकते, सिवाय इसके कि जिसे वह चाहे विशाल भूमि और प्रकाश की कुर्सी, जिसकी रक्षा उसे नहीं थकाती वह उत्तम और महान है।“&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 2:34:2&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*परमेश्वर माता - पिता - स्त्री - पुत्रादि रहित है -&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;“न वह किसी से पैदा हुआ है, न उससे कोई पैदा है।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 112:1:3&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
*ईश्वर में मार्ग में खर्च करने का वर्णन इस प्रकार है -&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;“कौन है जो कि ईश्वर को अच्छा कर्ज़ दे, वह उसे कई गुना बढ़ाएगा।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 2:32:3) (क़ुरान 57:2:1&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;“निस्सन्देह दाता स्त्री–पुरुषों ने परमेश्वर को अच्छा कर्ज़ दिया है, उनका वह दुगुना होगा, और उनके लिए (इसका) अच्छा बदला है।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 57:2:8&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
====फ़रिश्ता====&lt;br /&gt;
{{main|फ़रिश्ता}}&lt;br /&gt;
जिस प्रकार [[पुराण|पुराणों]] में परमेश्वर के बाद अनेक देवता भिन्न–भिन्न काम करने वाले माने जाते हैं, [[यमराज]] मृत्यु के अध्यक्ष, [[इन्द्र]] वृष्टि के अध्यक्ष इत्यादि, इसी प्रकार ‘इस्लाम’ ने फ़रिश्तों’ को माना है। पहले फ़रिश्तों के सम्बन्ध में क़ुरान में आए कुछ वाक्य देने पर इस पर विचार करना अच्छा होगा, इसलिए यहाँ वे वाक्य उदधृत किए जाते हैं- “जब हमें (परमेश्वर) ने फ़रिश्तों को (आदम के लिए) दण्डवत करने को कहा, तो सबने दण्डवत की, किन्तु इब्लीस ने इन्कार कर दिया, घमण्ड किया और (वह) नास्तिकों में से था।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 2:4:5) (क़ुरान 20:7:1&amp;lt;/ref&amp;gt; “जब हमने फ़रिश्तों को दण्डवत करने का कहा, तो इब्लीस के अतिरिक्त सभी ने किया। (इब्लीस) बोला - क्या मैं उसे दण्डवत करूँ जो मिट्टी से बना है।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 17:7:1&amp;lt;/ref&amp;gt; “जब हमने फ़रिश्तों को कहा - आदम को दण्डवत करो तो (उन्होंने) दण्डवत की, किन्तु इब्लीस, जो कि [[जिन्न|जिन्नों]] में से था - ने न किया।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 20:116&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऊपर के वाक्यों में फ़रिश्तों का वर्णन आया है। भगवान ने आदम (मनुष्य के आदि पिता) को बनाकर उन्हें आदम को दण्डवत करने को कहा। सबने वैसा किया, किन्तु इब्लीस ने न किया। यह इब्लीस उस समय फ़रिश्तों में सबसे ऊपर (देवेन्द्र) था। तृतीय वाक्य में जो उसे ‘जिन्न’ कहा गया है, उससे ज्ञात होता है कि फ़रिश्ते और जिन्न एक ही हैं या जिन्न फ़रिश्तों के अंतर्गत ही कोई जाति है। इब्लीस ने यह कह कर आदम को दण्डवत करने से इन्कार किया कि वह मिट्टी से बना है। अतः मालूम पड़ता है कि उत्पत्ति किसी और अच्छे पदार्थ से हुई है। अन्यत्र इब्लीस के वाक्य ही से मालूम हो जाता है कि उनकी उत्पत्ति अग्नि से हुई है। अपने भक्तों की रक्षा के लिए ईश्वर इन फ़रिश्तों को भेजते हैं।&lt;br /&gt;
====शैतान====&lt;br /&gt;
{{main|शैतान}}&lt;br /&gt;
फ़रिश्तों के अतिरिक्त क़ुरान में एक प्रकार और भी अदृष्ट प्राणी कहे गए हैं, जो सब जगह आने–जाने में फ़रिश्तों के समान ही हैं; किन्तु वह शुभकर्म से हटाने और अशुभ कराने के लिए मनुष्यों को प्रेरणा देते रहते हैं। इन्हें शैतान कहते हैं। उनके लिए पापात्मा शब्द आता है। शैतानों में सबका सरदार वही इब्लीस है। शैतान के विषय में कहा गया है- यह केवल शैतान है, जो तुम्हें अपने दोस्तों से डराता है।&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 3:18:4&amp;lt;/ref&amp;gt; शैतान किस प्रकार मनुष्यों को अशुभ कर्म की ओर प्रेरित करता है, उसको इस वाक्य में कहा गया है- “शैतान उनके कर्मों को सँवार देता है तथा कहता है - अब कोई भी मनुष्य तुम्हें जीत नहीं सकता, मैं तुम्हारा रक्षक हूँ, किन्तु जब दोनों पक्ष आमने–सामने आते हैं, तो वह मुँह मोड़ लेता है और कहता है - मैं तुमसे अलग हूँ, मैं निस्सन्देह देखता हूँ, जिसे तुम नहीं देखते, और परमेश्वर पाप का कठोर नाशक है।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 8:6:4&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भेद==&lt;br /&gt;
इस्लाम धर्म के पाँच भेद किये जाते हैं-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(i) '''नित्य''' वे आधारभूत हैं, जिन्हें हर रोज़ करना चाहिए। इस्लाम में निम्न पाँच कर्तव्यों को हर मुसलमान के लिए अनिवार्य बताया गया है-&lt;br /&gt;
#प्रतिदिन पाँच वक़्त (फ़जर, जुहर, असर, मगरिब, इशा) नमाज़ पढ़ना&lt;br /&gt;
#ज़रूरतमंदों को ज़कात (दान) देना&lt;br /&gt;
#रमज़ान के महीने में सूर्योदय के पहले से लेकर सूर्यास्त तक रोज़ा रखना&lt;br /&gt;
#जीवन में कम से कम एक बार हज अर्थात मक्का स्थित काबा की यात्रा करना तथा&lt;br /&gt;
#इस्लाम की रक्षा के लिए ज़िहाद (धर्मयुद्ध) करना।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(ii) '''नैमित्तिक''' कर्म वे कर्म हैं, जिन्हें करने पर पुण्य होता है, परन्तु न करने से पाप नहीं होता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(iii) '''काम्य''' वे कर्म हैं जो किसी कामना की पूर्ति के लिए किए जाते हैं।  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(iv) '''असम्मत''' वे कर्म हैं जिनकों करने की धर्म सम्मति तो नहीं देता, किन्तु करने पर कर्ता को दण्डनीय भी नहीं ठहराता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(v) '''निषिद्ध''' (हराम) कर्म वे हैं, जिन्हें करने की धर्म मनाही करता है और इसके कर्ता को दण्डनीय ठहराता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==इस्लाम के सम्प्रदाय==&lt;br /&gt;
इस्लाम में दो मुख्य सम्प्रदाय- [[शिया]] और [[सुन्नी]] मिलते हैं। मुहम्मद साहब की पुत्री फ़ातिमा और दामाद अली के बेटों हसन और हुसैन को पैगम्बर का उत्तराधिकारी मानने वाले मुसलमान 'शिया' कहलाते हैं। दूसरी ओर सुन्नी सम्प्रदाय ऐसा मानने से इन्कार करता है। &lt;br /&gt;
==सलाम==&lt;br /&gt;
मिलने जुलने आने जाने में सलाम का रिवाज़ है। सलाम करने वाला &amp;quot;'''अस्स्लामु अलैक़मु'''&amp;quot; कहता है जिसका अर्थ है तुम पर ख़ुदा की तरफ़ से सलामती हो, इसका जवाब है। &amp;quot;'''व अलेकुम अस्सलाम'''&amp;quot; अर्थात तुम पर सलामती हो। &lt;br /&gt;
==यहूदी==&lt;br /&gt;
{{main|यहूदी धर्म}}&lt;br /&gt;
यहूदी धर्म के महात्मा, इब्राहीम इशाक़, दाऊद, सुलेमान के भी माननीय महात्मा और रसूल है। अपने वंश के प्रति बड़े अभिमानी यहूदी लोग महात्मा के मदीना (यस्रिब्) आने पर पहले कुछ समय तक तो मुसलमानों के विरोधी न थे, परन्तु जब उन्होंने देखा कि हमारी प्रधानता अब घट रही है और मुहम्मद का प्रभाव अधिक बढ़ता जा रहा है, तो वह भी द्रोही हो गये। इस्लाम की शिक्षा का बहुत-सा भाग यहूदी और ईसाई धर्मों से लिया गया है। दोनों धर्मों के प्रति आरम्भ ही से महात्मा की बड़ी श्रद्धा थी। यहाँ तक कि ‘नमाज़’ भी पहले मुसलमान लोग उन्हीं पवित्र स्थान ‘योरुशिलम्’ की ओर मुँह करके पढ़ते आ रहे थे। जब यहूदियों ने शत्रुता करनी शुरू की तो महात्मा मुहम्मद ने अपने अनुयायियों को ‘योरुशिलम्’ से मुँह हटाकर ‘काबा’ को अपना ‘किब्ला’ (सम्मुख का स्थान) बनाने की आज्ञा दी। यहूदियों के व्यवहार के विषय में कहा गया है-&lt;br /&gt;
‘यहुदियों में कुछ लोग ईश्वर-वाक्य (क़ुरान) को सुनते हैं। फिर जो कुछ उन्होंने जाना था, उसे बदल देते है और इसे वह जानते हैं।‘&amp;lt;ref&amp;gt;2:9:4&amp;lt;/ref&amp;gt; ‘यहूदी वाक्य को उसके स्थान से बदल देते है’।&amp;lt;ref&amp;gt;4:7:4&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==मुनाफ़िक==&lt;br /&gt;
मदीना आने पर जिन मूर्तिपूजकों ने इस्लाम-धर्म स्वीकार किया, उन्हें ‘अंसार’ कहा जाता है; इनमें बहुत से वंचक मुसलमान भी थे जिन्हें ‘मुनाफ़िक’ का नाम दिया गया है। इन्हीं के विषय में कहा गया है- ‘हम निर्णय-दिन (क़यामत) और भगवान पर विश्वास रखते हैं; ऐसा कहते हुए भी वह विश्वासी (मुसलमान) नहीं हैं। परमेश्वर और मुसलमानों को ठगते हुए वह अपने ही को ठगते हैं।‘&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 2:2:1,2&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्वासियों (मुसलमानों) के पास जब गये, तो कहा हम विश्वास रखते हैं; राक्षसों (नास्तिकों) के पास निकल जाते हैं तो कहते हैं-(मुसलमानों से) हँसी करते हैं, अन्यथा हम तो तुम्हारे साथ हैं।‘&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 2:2:7&amp;lt;/ref&amp;gt; “वह दोनों के बीच लटकते हैं, न इधर हैं, न उधर के।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 3:21:2&amp;lt;/ref&amp;gt; इसीलिए मरने पर-&lt;br /&gt;
“निस्सहाय होकर (वह) नरक की अग्नि के सबसे निचले तल में रहेंगे।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 3:21:4&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==काफ़िर==&lt;br /&gt;
{{main|काफ़िर}}&lt;br /&gt;
उस समय ‘अरब’ में मूर्तिपूजा का बहुत अधिक प्रचार था। क़ुरान में सबसे अधिक ज़ोर से इसी का खण्डन किया गया है। महात्मा मुहम्मद ने जब यह सुना कि ‘काबा’ मन्दिर के निर्माता हमारे पूर्वज महात्मा ‘इब्राहीम’ थे, जो मूर्तिपूजक नहीं थे, तो उन्हें इस अपने काम में और बल-सा प्राप्त हुआ मालूम होने लगा। उनकी यह इच्छा अत्यन्त बलवती हो गई कि कब ‘काबा’ फिर मूर्तिरहित होगा। उन्होंने सच्चे देवता की पूजा का प्रचार और झूठे देवता की पूजा का खण्डन अपने जीवन का मुख्य लक्ष्य रखकर बराबर अपने काम को जारी रखा। ‘अरब’ की काशी ‘मक्का’ में ‘कुरैशी’ पण्डों का बड़ा ज़ोर था। यह लोग अपने अनुयायियों को कहते थे-&lt;br /&gt;
‘वद्द’, ‘सुबाअ’, ‘यगूस’, ‘नस्र’ अपने इष्टों को कभी न छोड़ना चाहिये।&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 71:1:23&amp;lt;/ref&amp;gt; ‘क़ुरान’ के उपदेश को वह लोग कहते थे- '''यह इस मुहम्मद की मन-गढ़न्त है।'''&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 11:3:11&amp;lt;/ref&amp;gt; ‘इसको कोई विदेशी सिखाता है।... हम अच्छी तरह जानते हैं, उस सिखाने वाले की भाषा अरबी से भिन्न है और यह अरबी।‘&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 16:14:3&amp;lt;/ref&amp;gt; वह लोग विश्वास के रसूल होने के बारे में कहते थे- वह लोग विश्वास नहीं करते जब तक वह भूमि से (जल का) सोता न निकाल दे या खजूर, [[अंगूर]] आदि का (ऐसा) बगीचा न उत्पन्न कर दे जिसमें कि नहर बहती हो। अथवा अपने कहे अनुसार आकाश को टुकड़े-टुकड़े करके हमारे ऊपर न गिरा दे। या देवदूतों को प्रतिभू (जामिन) के तौर पर न लावे। या अच्छा महल (इसके लिए) हो जाय। अथवा आकाश पर चढ़ जाय। किन्तु उसके चढ़ने पर भी हम विश्वास नहीं करेंगे जब तक हम लोगों के पढ़ने लायक़ कोई लेख न लाये।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 17:10:7,10&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शरीयत==&lt;br /&gt;
इस्लाम में शरीयत का तात्पर्य धार्मिक विधिशास्त्र से है। वे क़ानून, जो क़ुरान शरीफ़ तथा हदीस के विवरणों पर आधारित होते हैं तथा इस्लाम के आचार-व्यवहार का पालन करते हैं, शरीयत के अन्तर्गत आते हैं। शरीयत के चार प्रमुख स्रोत हैं—&lt;br /&gt;
*क़ुरान मज़ीद,&lt;br /&gt;
*हदीस या सुन्नत,&lt;br /&gt;
*इज्माअ तथा&lt;br /&gt;
*किआस। &lt;br /&gt;
इन चारों को इस्लाम की आधार शिला भी माना जाता है।&lt;br /&gt;
==क़ायनात, कर्मफल, जन्नत, दोज़ख़==&lt;br /&gt;
यहाँ पर मनुष्य के कर्म और उसके परिपाक के साधन सृष्टि, स्वर्ग आदि का वर्णन किया जाता है। सृष्टि तो उसके सिरजनहार का अनुमान होता है, जैसे कार्य से उसके कारण का। व्यवस्था की विचित्रता, रचना की विचित्रता, सौन्दर्य आदि गुणों की अधिकता से जगत किसी असाधारण शिल्प चतुरता से पूर्ण शक्ति का बनाया हुआ है। कोई–कोई दार्शनिक सृष्टि को भ्रमात्मक कहकर परमार्थ में उसकी सत्ता के इन्कारी होते हैं, किन्तु क़ुरान ऐसे जगत के मिथ्या होने को स्वीकार नहीं करता। कहा है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''[[आकाश]], [[पृथ्वी]] और जो कुछ उनके मध्य में है, इन सबको मिथ्या नहीं, एक निर्दिष्ट उद्देश्य से उत्पन्न किया गया है।&amp;lt;ref&amp;gt;46:1:3), (42:2:9), (45:3:1&amp;lt;/ref&amp;gt;'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसार की तुच्छता का वर्णन उसकी अस्थिरता के कारण है। संसार में ही स्वार्गादि स्थान नित्य हैं, इसलिए उनका प्रलोभन सत्कर्मियों को स्थान–स्थान पर दिया गया है। संसार और संसार की वस्तुएँ ईश्वर की अनुग्रह की इच्छा का निदर्शन (नमूना) भूत है। इसीलिए बहुत जगह ईश्वर की कृतज्ञता के भार से नम्र होने का उपदेश किया गया है। &lt;br /&gt;
====क़ायनात====&lt;br /&gt;
{{main|क़ायनात}}&lt;br /&gt;
“क्यों नहीं परमात्मा पर विश्वास करते, तुम मृतक थे, फिर उसने तुम्हें जिलाया, और फिर मारता है, तदनन्तर जिलायेगा, अन्त में उसके पास ही जाओगे। वह जिसने तुम्हें और जो कुछ पृथ्वी में है, सबको उत्पन्न किया, फिर आकाश पर चढ़ा और उसे सात आकाशों में विभक्त किया। वह निस्सन्देह सब वस्तुओं का ज्ञाता है।“&amp;lt;ref&amp;gt;क़ुरान 2:3:8-9&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*पुनश्च -&lt;br /&gt;
“वह जिसने तुम्हारे लिए नक्षत्रों का निर्माण किया कि जिससे जंगल, समुद्र और अन्धकार में रास्ता पावें।....वह जो आकाश से जल गिरता है। फिर उससे सारी उदिभद्यमान वस्तुएँ निकलीं। उससे मैं (प्रभु) ने वनस्पति निकाली, फिर उससे संयुक्त फलों को उत्पन्न करता हूँ, कितने ही खजूर की बाल में लटकते हैं, अनुपम और सोपम अँगूर, अनार और जैतून के उद्यान। जब वह फलते और पकते हैं तो उनके फलों को दखो। इसमें ही विश्वासी जातियों के लिए प्रमाण् हैं।“&amp;lt;ref&amp;gt;6:12:3:5&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*अपरञ्च—&lt;br /&gt;
“क्या तू नहीं देखता, परमेश्वर ही ने [[जल]] उतारा, फिर उससे अनेक प्रकार के [[भारत के फल|फल]] और पर्वतों में श्वेत, रक्त, अति [[कृष्ण]] आदि अनेक वर्ण की उपत्यका उत्पन्न हुई। कीड़े, पशु और मनुष्यों में बहुत प्रकार के वर्ण वाले प्राणी हैं। इस प्रकार के ज्ञान वाले भगवान से डरते हैं। परमेश्वर निस्सन्देह क्षमाशील और बलिष्ठ है।“&amp;lt;ref&amp;gt;35:4:1,2&amp;lt;/ref&amp;gt; ईश्वर की कृपा कटाक्ष द्वारा मनुष्यों का कोटि–कोटि उपकार हो रहा है, इसलिए उससे कृतध्न होना ठीक नहीं।&lt;br /&gt;
*क़ुरान में वर्णित जगत की उत्पत्ति, उसके दो शब्दों के अर्थ से भली प्रकार विदित हो सकती है। वह है—‘क़ुनु फ़–यकुन’ (हो, फिर होता है)। भगवान ने कहा—हो, फिर यह जगत हो जाता है। उपादान आदि कारणों का कोई झगड़ा नहीं है। सर्वशक्तिमान होने से उसने बिना उपादान कारण ही के जगत बना डाला। इस प्रकार असद से सद की उत्पत्ति ही क़ुरान प्रतिपादित सृष्टि है। यहूदी और ईसाई धर्म में भी यही सृष्टि–विषयक सिद्धान्त स्वीकार किया गया है। उनके विचार में, यदि दूसरे प्रकार से माना जाए तो ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं रह सकता। किसी को सन्देह हो कि क्या जाने अभिन्न निमित्तोपादानता (वह निमित्त और वही उपादान कारण है) को स्वीकार करते हों। किन्तु इस बात को इस वाक्य ने ही स्पष्ट कर दिया, जिसमें कहा है—‘न वह उत्पादक है और न वह उत्पन्न हुआ है।‘ यहाँ उपादान कारण से जगत उत्पन्न करने में भगवान की उत्पादकता का निषेध है। न कि बिना उपादान ही असत से। उनका कहना है, यदि स्वयं उपादान कारण है तो निर्विकार नहीं रह सकता, यदि उसे अन्य उपादान कारण की अपेक्षा है तो सर्वशक्तिमान नहीं रहता। जहाँ–तहाँ सृष्टि विषय को यहाँ संक्षेप में उद्धृत किया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====जन्नत====&lt;br /&gt;
{{main|जन्नत}}&lt;br /&gt;
मनुष्य का यह जन्म सर्वप्रथम और अन्तिम है। इस जन्म में फलभोग सम्भव नहीं। मरने पर पुण्यात्मा स्वर्ग को, पापी नर्क को, किसी–किसी के मत में दोनों की समानता वाला ‘एराफ़’ (इअराफ़) को जाता है। जैसे वहाँ नन्दकानन को सौन्दर्य की खान अप्सराएँ अलंकृत करती हैं, वैसे ही यहाँ भी ‘जन्नत’ के उद्यान को शोभा–राशि ‘हूर’ आनन्दमय बनाती है। ‘क़ुरान’ में विश्वासियों (मुसलमानों) को उनके शुभ कर्म के फलस्वरूप स्वर्ग का अत्यधिक वर्णन है। उनमें से थोड़ा–सा यहाँ पर उदधृत किया जाता है—&lt;br /&gt;
*“शुभ कर्म करने वाले विश्वासियों को शुभ–सन्देश सुना—उनके लिए उद्यान (बाग़) हैं, उससे नीचे नहरें बहती हैं, सारे अच्छे फल वहाँ लाए गए हैं। (स्वर्ग वाले) उन लोगों को जैसा कि पहले (कहा गया था), वैसा ही यह उपहार दिया है। उसमें उनके लिए सुन्दर (स्त्रियाँ हैं) और वह (पुण्यात्ला लोग) सर्वदा वहाँ के निवासी होंगे।“&amp;lt;ref&amp;gt;2:3:5&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*“उस दिन स्वर्ग वाले कार्य में आसक्त संलाप करते हैं। वह और उनकी स्त्रियाँ छाया में तकिया लगाए तख्तों पर बैठी होंगी, वहाँ उनके लिए अच्छे फल और जो कुछ वह चाहते हैं (वर्तमान होगा)।“&amp;lt;ref&amp;gt;36:4:5-7&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====दोज़ख़====&lt;br /&gt;
{{main|दोज़ख़}}&lt;br /&gt;
उपर्युक्त वाक्यों से क़ुरान–प्रतिपादित स्वर्ग का अनुमान हो सकता है। किन्हीं–किन्हीं आधुनिक व्याख्याताओं का मत है कि यह सब वाक्य–जार्डन आदि नदियों से सुसिचित ‘यमन’ आदि प्रदेशों पर मुसलमानी विजय के लिए भविष्यवाणी है, किन्तु यह मत न प्राचीन भाष्यकारों द्वारा अनुमोदित है और न यह सारे सामान वहाँ के लिए घटित होते हैं। वह बीसवीं शताब्दी के अनुकूल इसे बनाना चाहते हैं, किन्तु ऐसी भविष्यवाणी ही पर कहाँ बीसवीं शताब्दी विश्वास करती है। अस्तु कुछ थोड़े से नवीन विचार वालों को छोड़कर सारा इस्लामी संसार उपर्युक्त प्रकार का ही स्वर्ग मानता है। स्वर्ग ऐसी अदृष्ट वस्तु वस्तुतः कल्पना की सीमा के बाहर की है, उसमें ईश्वरीय आदेश ही प्रमाणभूत है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कर्मकाण्ड==&lt;br /&gt;
====रोज़ा====&lt;br /&gt;
&amp;quot;हे विश्वासियों (मुसलमानों) ! पूर्वजों के समान तुम पर भी कुछ दिनों के लिए उपवास (रखने का विधान) लिखा गया है, जिससे कि तुम संयमी बनो। फिर जो कोई तुममें से रोगी हो या यात्रा में हो, तो वह बदले में एक ग़रीब को भोजन देवे। जो खुशी से शुभ कर्म करो तो वह लमंग है, और यदि उपवास करो तो तुम्हारे लिए शुभ हैं, यदि तुम जानते हो। &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''[[रमज़ान]] का मास पवित्र है, जिनमें स्पष्ट, मार्गप्रदर्शक, मानवशिक्षक (सत्यासत्य) विभाजक, क़ुरान उतारा गयां इसलिए तुममें से जो कोई रमज़ान महीने को प्राप्त हो, उपवास करे।'''&amp;lt;ref&amp;gt;2:23:1-3&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
====नमाज़====&lt;br /&gt;
{{main|नमाज़}}&lt;br /&gt;
नमाज़ (सलात् प्रार्थना)—प्रत्येक मुसलमान का नित्य कर्म है जिसका न करने वाला पापभोगी होता है। कहा है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''सलात् और मध्य सलात् के लिए सावधान रहो। नम्रतापूर्वक परमेश्वर के लिए खड़े हो। यदि ख़तरे में हो तो पैदल या सवार ही (उसे पूरा कर लो) पुनः जब शान्त हो.....तो प्रभु को स्मरण करो।'''&amp;lt;ref&amp;gt;3:32:3-4&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
'नमाज़ का स्थान इस्लाम में वही है जो [[हिन्दू धर्म]] में संध्या या ब्रह्म–यज्ञ का। यद्यपि क़ुरान में 'पंचगाना' या पाँच वक़्त की नमाज़ का वर्णन कहीं पर भी नहीं आया है। वह एक प्रकार से सर्वमान्य है। पंचगाना नमाज़ है—&lt;br /&gt;
#'सलातुल्फज़' (प्रातः प्रार्थना) यह उषाकाल ही में करना पड़ती है।&lt;br /&gt;
#'सलातु–ज्जोहन' (मध्याह्नोत्तर तृतीय पहरारम्भिक प्रार्थना)—यह दोपहर के बाद तीसरे पहर के प्रारम्भ में होती है। &lt;br /&gt;
#'सलातुल्–अस्र। (मध्याह्नोत्तर चतुर्थ पहरारम्भिक प्रार्थना)—यह चौथे पहर के आरम्भ में होती है।&lt;br /&gt;
#'मलातुल्—मग्रिब' (सान्ध्य प्रार्थना)—यह सूर्यास्त् के बाद तुरन्त होती है। &lt;br /&gt;
#'सलातुल्—इशा' (रात्रि प्रथमयाम प्रार्थना)—रात्रि में पहले पहर के अन्त में होती है। &lt;br /&gt;
====काबा====&lt;br /&gt;
{{main|काबा}}&lt;br /&gt;
जैसे उच्च भाव और ईश्वर के प्रति प्रेम नमाज़ (=नमस्) की उपर्युक्त प्रार्थनाओं में वर्णित है, पाठक उस पर स्वयं विचार कर सकते हैं। सांधिक नमाज़ का इस्लाम में बड़ा मान है। वस्तुतः वह संघशक्ति को बढ़ाने वाला भी है। सहस्रों एशिया, योरप और अफ़्रीका निवासी मुसलमान जिस समय एक ही स्वर, एक ही भाषा और एक भाव से प्रेरित हो ईश्वर के चरणार्विन्द में अपनी भक्ति पुष्पाजंलि अर्पण करने के लिए एकत्र होते हैं, तो कैसा आनन्दमय दृश्य होता है। उस समय की समानता का क्या कहना। एक ही पंक्ति में दरिद्र और बादशाह दोनों खड़े होकर बता देते हैं कि ईश्वर के सामने सब ही बराबर हैं। &lt;br /&gt;
इस्लाम के चार धर्म–स्कन्धों में 'हज्ज़' या 'काबा' यात्रा भी एक है। 'काबा' अरब का प्राचीन मन्दिर है। जो मक्का शहर में है। विक्रम की प्रथम शताब्दी के आरम्भ में रोमक इतिहास लेखक 'द्यौद्रस् सलस्' लिखता है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''यहाँ इस देश में एक मन्दिर है, जो अरबों का अत्यन्त पूजनीय है।'''&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
महात्मा मुहम्मद के जन्म से प्रायः 600 वर्ष पूर्व ही इस मन्दिर की इतनी ख्याति थी कि 'सिरिया, अराक' आदि प्रदेशों से सहस्रों यात्री प्रतिवर्ष दर्शनार्थ वहाँ पर जाया करते थे। पुराणों में भी शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में मक्का के महादेव का नाम आता है। ह. ज्रु ल्–अस्वद् (=कृष्ण पाषाण) इन सब विचारों का केन्द्र प्रतीत होता है। यह काबा दीवार में लगा हुआ है। आज भी उस पर चुम्बा देना प्रत्येक 'हाज़ी' (मक्कायात्री) का कर्तव्य है। यद्यपि क़ुरान में इसका विधान नहीं, किन्तु पुराण के समान माननीय 'हदीस' ग्रन्थों में उसे भूमक नर भगवान का दाहिना हाथ कहा गया है। यही मक्केश्वरनाथ है। जो काबा की सभी मूर्तियों के तोड़े जाने पर भी स्वयं ज्यों का त्यों विद्यमान है। इतना ही नहीं, बल्कि इनका जादू मुसलमानों पर भी चले बिना नहीं रहा और वह पत्थर को बोसा देना अपना धार्मिक कर्तव्य समझते हैं, यद्यपि अन्य स्थानों पर मूर्तिपूजा के घोर विरोधी हैं। इस पवित्र मन्दिर के विषय में क़ुरान में आया है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''निस्सन्देह पहला घर मक्का में स्थापित किया गया, जो कि धन्य है तथा ज्ञानियों के लिए उपदेश है।'''&amp;lt;ref&amp;gt;5:13:4&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'''महाप्रभु ने मनुष्य के लिए पवित्र गृह 'कअबा' बनाया।'''&amp;lt;ref&amp;gt;5:13:4&amp;lt;/ref&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====क़ुर्बानी====&lt;br /&gt;
{{main|क़ुर्बानी}}&lt;br /&gt;
'क़ुरान' के अनुसार काल तथा अन्य पर्वों में 'हज्ज़' विदित है। इस्लाम की क़ुर्बानी कोई नयी चीज़ नहीं है। इष्टों और देवताओं को पशु का बलिदान करना बहुत पुराने समय से चला आता है। विक्रमपर्व अष्टम शताब्दी में, 'तिग्लतपेशर्' और 'शल्मेशर', 'असुर' राजाओं के इष्ट 'सक्कथ–वेनथ' बवेरु (बाबुल) नगर के विशाल मन्दिर में बैठे बलि ग्रहण करते थे। 'नर्गल', 'अशिम', 'निमज', 'तर्तक', 'अद्रम्लेश', 'अम्लेश', 'नाशरश', 'देगन' आदि देव–समुदाय विक्रम से अनेक शताब्दियाँ पूर्व आधुनिक लघु एशिया के पुराने नगरों 'कथ', 'ड्रामा', 'अलित', 'सफर्वेम' में रहते हुए बलि ग्रहण करते थे। मूर्ति पूजक समुदाय तो प्रायः सारा हि इस पशुबलि–क्रिया में अत्यन्त श्रृद्धालु देखा जाता है। किन्तु अमूर्ति पूजक धर्म भी इससे विंचित नहीं रहा। यहूदियों की भव्य वेदियाँ सदा पशु–रक्त से रंजित रहती रही हैं। उनकी शुष्क और दग्ध बलियाँ 'बाइबिल' पढ़ने वालों को अविदित नहीं। इस्लाम ने अधिकांश यहूदी सिद्धान्तों को ज्यों का त्यों या कुछ परिवर्तन के साथ ग्रहण कर लिया। बलि का सिद्धान्त भी उसी प्रकार यहूदी धर्म से लिया गया है। यहाँ पर दोनों की बलि के विषय में समता दिखाने के लिए 'तौरेत' और 'क़ुरान' दोनों से कुछ वाक्य उदधृत किए जाते हैं—&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;span style=&amp;quot;color: #8080e3&amp;quot;&amp;gt;“That will offer his oblation for all his vows or for all his freewill offerings, which they will offer unto the lord for a burnt offering. Ye shall offer at your own will a male without blemish, of the beeves, of the sheep, or of the goats. Blind or broken or maimed, or having a wen, scurvy or scubbed, ye shall not offer these unto the lord, nor make an offering by fire of them upon the altar unto the lord…Ye shall not offer unto the lord, that which is bruised, or crushed, or broken or cut”&amp;lt;ref&amp;gt;Leviticus 22: 20-24&amp;lt;/ref&amp;gt;.&amp;lt;/span&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
&amp;quot;जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि परमेश्वर तुमको आज्ञा देता है कि एक गौ बलि चढ़ाओ...(वह) बोले—अपने ईश्वर से हमारे लिए पूछ कि हमें बतावे—वह कैसी हो। कहा—(ईश्वर) आज्ञा देता है कि वह गौ न वृद्धा और न ही ब्याई हो, दोनों के बीच की हो। सो जिसके लिए आज्ञा दी गई, उसके करो। बोले—अपने ईश्वर से पूछ, उसका [[रंग]] कैसा हो। बोला—वह (ईश्वर) कहता है, पीला चमकीला रंग जो देखने वाले को पसन्द हो। बोले—अपने ईश्वर से पूछ, किस प्रकार की गाय हो। बोला—कहता है, ऐसी गौ नहीं, जो कि परिश्रम करने वाली, खेत जोतती या खेत सींचती है। जो पूरे अंग वाली बेदाग़ हों।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;2:8:6-9&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पर्दा====&lt;br /&gt;
पहले वाक्य में तो चादर ढाँकने का अभिप्राय मुसलमान जानी जाने, तथा न सतायी जाने के लिए कहा गया है। दूसरे वाक्य में भी सौन्दर्य को दिखाने से रोकने का अभिप्राय बोराबन्दी लेना अन्याय है। स्पष्ट अर्थ तो यह है कि जैसे पाश्चात्य स्त्री समाज में सौन्दर्य दिखलाने का रोग यहाँ तक लग गया है कि जाड़े–पाले में भी, आधा वक्षस्थल नंगा ही रखती हैं। कहीं वही बात स्त्रियों में न घुसने लगे। दरअसल इस प्रकार की बीमारी स्त्री–पुरुष दोनों समाजों में भी किसी प्रकार से आना ठीक नहीं है। कहावत है कि 'शैतान भी अपने मतलब को सिद्ध करने के लिए शास्त्र की दुहाई देता है', उसी प्रकार यह मुसलमान पतियों का सरासर अन्याय है, जो कि क़ुरान में लिखे पर्दा ही पर सन्तोष न कर उन्होंने स्त्रियों को सात संगीन पर्दे में बंद रखा है। क़ुरान ने तो विशेष श्रृगार आदि के न दिखाई देने के लिए कुछ विशेष अंगों को ढाँकने के लिए कहा, किन्तु यहाँ लोगों ने सारे बदन को ही ढाँकने पर बस न की, ऊपर से सात तालों के अन्दर भी उन्हें बन्द करना उचित समझा। यह केवल मुसलमान पुरुषों की ही बात नहीं, सच कहते हैं 'गुरु तो गुरु ही रह गए, चेला चीनी हो गया।' हिन्दुओं के पुरुषों ने कभी न सुना होगा कि पर्दा–प्रथा किस चिड़िया का नाम है। आज भी [[महाराष्ट्र]], [[गुजरात]], [[कर्नाटक]], [[आन्ध्र प्रदेश]], मालाबार इत्यादि आधे से अधिक [[भारत|भारतवर्ष]] के हिन्दू पर्दा को नहीं जानते। किन्तु जिस प्रकार आज अंग्रेज़ी राज्य में बहुत से अंग्रेज़ों का खान–पान, रहन–सहन गौरवपूर्ण समझ हिन्दुओं ने मुसलमानों की इस रीति को अपनाकर उसने और तरक्की की। पहले–पहल इन रीतियों को धनिकों और बड़े आदमी कहे जाने वाले लोगों ने लिया, पीछे बड़े आदमी बनने की इच्छा वाले सभी लोगों ने अपनी स्त्रियों पर इस नये दण्ड–विधान का प्रयोग आरम्भ कर दिया। शरीर में कोमलता की वृद्धि के लिए राजदाराओं को 'असूर्यपश्या' तो देखा गया है, किन्तु 'अचन्द्रपश्या' होने का सौभाग्य आज ही प्राप्त हुआ है। &lt;br /&gt;
'इहैवास्तं मा वियौष्ठम्' (दोनों यहाँ ही रहो, मत अलग हो) इस विवाह–सम्बन्धी वेदमंत्र में स्पष्ट विवाहित जोड़े को अलग होने का निषेध किया है। इस प्रकार अर्थ (हिन्दू) धर्म विवाह सम्बन्ध को अखंडनीय मानता है। किन्तु कई धर्म विशेष स्थिति में विवाह सम्बन्ध त्याग या 'तलाक़' की अनुमति देते हैं। क़ुरान कहता है—&lt;br /&gt;
'''जो अपनी स्त्रियों से (तलाक़ की) शपथ खा लेते हैं, उनके लिए चार मास की अवधि है। (इसी बीच में) यदि मेल कर लें तो ईश्वर क्षमाशील और कृपालु है। यदि 'तलाक़' का निश्चय कर लिया, तो भगवान (उसका) सुनने वाला और जानने वाला है। 'तलाक़' दी गई स्त्रियाँ तीन ऋतुकाल तक प्रतीक्षा करें; उनके योग्य नहीं की जो ईश्वर ने उनके उदर में उत्पन्न किया, उसे छिपा रखें....उनके पतियों को भी इतने दिन तक उन्हें फिर से ले लेने का अधिकार है, यदि सुधार चाहें। स्त्रियों को भी न्यायनुसार वैसा अधिकार है, किन्तु पुरुषों का उन पर दर्जा है।'''&amp;lt;ref&amp;gt;2:28:5-7&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्यपि यहाँ पर कुछ शर्तों के साथ तलाक़ की अनुमति दे दी गई है। किन्तु तो भी इसे अच्छा नहीं माना गया है। यह महात्मा मुहम्मद के इस वचन से भी प्रकट होता है&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मूर्तिपूजा खण्डन==&lt;br /&gt;
{{main|मूर्तिपूजा खण्डन}}&lt;br /&gt;
मनुष्य जिसे शुभ कर्म समझता है, करता–कराता है और जिसे अशुभ, उसे न कराने और न करने देने का प्रयत्न करता है। ऊपर शुभ कर्मों का वर्णन किया जा चुका है। अशुभ कर्मों में 'क़ुरान' मूर्ति–पूजा को भी परिगणित करता है। अतः उसके विषय में यहाँ पर कुछ वर्णन कर देना आवश्यक प्रतीत होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विक्रम से कई शताब्दियों पूर्व [[मिस्र]], असुर, अल्दान, फ़िलिस्तीन, मीडिया, यवन, [[रोम]] आदि देशों में अनेक देवी–देवों की मूर्तियों की पूजा की जाती है। अरब में भी ऐसे अनेक देवालय थे जिनमें मक्का का 'काबा' सर्वश्रेष्ठ था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'तदद', 'सुबाअ', 'यगूस', 'यऊक', 'नस्र'&amp;lt;ref&amp;gt;72:2:3&amp;lt;/ref&amp;gt; तथा 'हुब्ल', 'मनात', 'उज्जा' आदि कितनी ही देव–प्रतिमाओं का नाम क़ुरान में भी आया है। 'कल्ब', 'हम्दान', 'मज्हाज', 'मुदर' और 'हमयान' जातियों के क्रमशः नराकृति 'वदद', रत्र्याकृति 'सुबाअ', सिंहाकृति 'यग़ूस', अश्वाकृति 'यऊक' और श्येनाकृति 'नस्र' इष्ट थे। 'काबा' की प्रधान देव–प्रतिमा 'हुब्ल' को (अकाल के समय वर्षा करती है—सुनकर) 'अम्रू' ने सिरिया के 'बल्का' नगर से लाकर काबा में स्थापित किया। इस समय के अरब निवासियों में इन मूर्तियों का बड़ा प्रभाव था। जिस समय मक्का–विजय होने पर मुहम्मद ने मुसलमानों को काबा की मूर्तियों को तोड़ने को कहा, तो किसी की हिम्मत नहीं पड़ी। इस पर स्वयं अली ने इस काम को किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सदाचार==&lt;br /&gt;
*क़ुरान के अनुसार कृपणता भी एक अपराध है। एक जगह कहा है—&lt;br /&gt;
'''जो कृपणता करते हैं और दूसरे को भी वैसा ही करने के लिए सिखाते हैं, जो कुछ भगवान ने अपनी कृपा से दिया, उसे छिपा रखते हैं, ऐसे नास्तिकों के लिए महायातना तैयार की गई है।'''&amp;lt;ref&amp;gt;4:6:4&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
*किन्तु साथ ही अपव्ययता के बारे में भी कहा है—&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'अल्लाहु ला याहिब्बुल्मुस्रिफीन्'&amp;lt;ref&amp;gt;7:3:6&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
(भगवान फ़जुल–ख़र्चों पर खुश नहीं रहता)।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
*विस्तार भय से अधिन न लिखकर दो–तीन क़ुरान के आचार सम्बन्धी उपदेश उदधृत किए जाते हैं—&lt;br /&gt;
#&amp;quot;शुभ कार्य कर और क्षमा माँग ले, अज्ञानियों से उपेक्षा कर।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;7:24:11&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#&amp;quot;जो अपने ऊपर किए गए अन्याय का बदला लेवे, उसके लिए कुछ कहना नहीं। कहना तो उन पर है जा लोगों पर अन्याय करते हैं और दुनिया में व्यर्थ (धर्मात्मा होने) की धूम मचाते हैं। उन्हीं के लिए घोर यातना है। जो क्षमा और सन्तोष करे, तो (उसका) यह (काम) निस्सन्देह अत्यन्त साहस का है।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;52:4:12-14&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#&amp;quot;तुम्हारी सन्तान....हमारे (ईश्वर के) समीप तुम्हें दर्जा नहीं दिला सकती है। हाँ, जो श्रृद्धालु और अच्छा काम करने वाले हैं, उनके लिए फल दूना है।&amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;34:5:1&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Reflist|2}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://islaminhindi.blogspot.com/2010/04/book-prof-rama-krishna-rao.html इस्‍लाम इन हिन्‍दी]&lt;br /&gt;
*[http://www.islamdharma.org/article.aspx?ptype=A&amp;amp;menuid=39 इस्लाम धर्म]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=माध्यमिक1&lt;br /&gt;
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|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{धर्म}}{{इस्लाम धर्म}}&lt;br /&gt;
[[Category:इस्लाम धर्म]]&lt;br /&gt;
[[Category:इस्लाम धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{toc}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>यात्री</name></author>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%A8&amp;diff=225195</id>
		<title>हिन्दी संस्थान</title>
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		<updated>2011-10-10T15:07:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;यात्री: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा संस्थान&lt;br /&gt;
|चित्र=Hindi-sansthan-logo.png&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=केंद्रीय हिन्दी संस्थान प्रतीक चिन्ह&lt;br /&gt;
|प्रकार=विश्व में हिंदी शिक्षा, प्रचार-प्रसार एवं प्रकाशन &lt;br /&gt;
|उद्योग=&lt;br /&gt;
|उत्तराधिकारी=&lt;br /&gt;
|स्थापना=19 मार्च, 1960 ई. को भारत सरकार के तत्कालीन 'शिक्षा एवं समाज कल्याण मंत्रालय' ने एक स्वायत्तशासी संस्था 'केंद्रीय हिन्दी शिक्षण मंडल' का गठन किया और 1 नवम्बर 1960 को इस संस्थान का [[लखनऊ]] में पंजीकरण करवाया गया। &lt;br /&gt;
|संस्थापक=मानव संसाधन विकास मंत्रालय (तत्कालीन शिक्षा एवं समाज कल्याण मंत्रालय), भारत सरकार&lt;br /&gt;
|मुख्यालय=[[आगरा]]&lt;br /&gt;
|शाखाएँ=आगरा मुख्यालय के अतिरिक्त आठ शाखाएँ हैं जो [[दिल्ली]], [[हैदराबाद]], [[गुवाहाटी]], [[शिलांग]], [[मैसूर]], दीमापुर, [[भुवनेश्वर]] और [[अहमदाबाद]] में हैं। &lt;br /&gt;
|प्रमुख लोग=[[कपिल सिब्बल]] (अध्यक्ष), [[अशोक चक्रधर]] (उपाध्यक्ष), प्रो. मोहन (निदेशक), डॉ. चन्द्रकांत त्रिपाठी (कुलसचिव), श्री खेमचंद (उप-कुलसचिव)&lt;br /&gt;
|उत्पादन=&lt;br /&gt;
|आय=&lt;br /&gt;
|कर्मचारी=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|सहायक=&lt;br /&gt;
|वेबसाइट=[http://www.hindisansthan.org/hi/index.htm केन्द्रीय हिन्दी संस्थान]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[हिन्दी संस्थान आगरा]], [[हिन्दी संस्थान दिल्ली]] , [[हिन्दी संस्थान हैदराबाद]] , [[हिन्दी संस्थान गुवाहाटी]] , [[हिन्दी संस्थान शिलांग]], [[हिन्दी संस्थान मैसूर]], [[हिन्दी संस्थान दीमापुर]], [[हिन्दी संस्थान भुवनेश्वर]] , [[हिन्दी संस्थान अहमदाबाद]]। &lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
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|अन्य जानकारी=हिन्दी संस्थान का प्रमुख कार्य [[हिन्दी भाषा]] से संबंधित शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित करना, शोध कार्य कराना और साथ ही हिन्दी के प्रचार व प्रसार में अग्रणी भूमिका निभाना है। &lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|20:21, 10 अक्टूबर 2011 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
==केंद्रीय हिन्दी संस्थान==&lt;br /&gt;
[[भारत]] सरकार के 'मानव संसाधन विकास मंत्रालय'  के अधीन 'केंद्रीय हिन्दी संस्थान'  एक उच्चतर शैक्षिक और शोध संस्थान है। संविधान के अनुच्छेद 351 के दिशा-निर्देशों के अनुसार [[हिन्दी भाषा|हिन्दी]] को समर्थ और सक्रिय बनाने के लिए अनेक शैक्षिक, सांस्कृतिक और व्यवहारिक अनुसंधानों के द्वारा हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण, हिन्दी भाषाविश्लेषण, भाषा का तुलनात्मक अध्ययन तथा शिक्षण सामग्री आदि के  निर्माण को संगठित और परिपक्व रूप देने के लिए सन 1961 में भारत सरकार के तत्कालीन 'शिक्षा एवं समाज कल्याण मंत्रालय' ने 'केंद्रीय हिन्दी संस्थान' की स्थापना [[उत्तर प्रदेश]] के [[आगरा]] नगर में की थी।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kendriya-Hindi-Sansthan-1.jpg|thumb|250px|left|केंद्रीय हिन्दी संस्थान (मुख्यालय) में अफ़ग़ानिस्तान के छात्रों का विशेष पाठ्यक्रम]]&lt;br /&gt;
हिन्दी संस्थान का प्रमुख कार्य [[हिन्दी भाषा]] से संबंधित शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित करना, शोध कार्य कराना और साथ ही हिन्दी के प्रचार व प्रसार में अग्रणी भूमिका निभाना है। प्रारंभ में हिन्दी संस्थान का प्रमुख कार्य 'अहिन्दी भाषी क्षेत्रों' के लिए योग्य, सक्षम और प्रभावकारी हिन्दी अध्यापकों को ट्रेनिंग कॉलेज और स्कूली स्तरों पर शिक्षा देने के लिए प्रशिक्षित करना था, किंतु बाद में हिन्दी के शैक्षिक प्रचार-प्रसार और विकास को ध्यान में रखते हुए संस्थान ने अपने दृष्टिकोण और कार्य क्षेत्र को विस्तार दिया, जिसके अंतर्गत हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण, हिन्दी भाषा-परक शोध, भाषा विज्ञान तथा तुलनात्मक साहित्य आदि विषयों से संबंधित मूलभूत वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यक्रमों को संचालित करना प्रारंभ कर दिया और साथ ही विविध स्तरों के शैक्षिक पाठ्यक्रम, शैक्षिक सामग्री, अध्यापक निर्देशिकाएँ आदि तैयार करने का कार्य भी प्रारंभ किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार के विस्तृत दृष्टिकोण और कार्यक्रमों के आयोजन से हिन्दी संस्थान का कार्यक्षेत्र अत्यधिक विस्तृत और विशाल हो गया। इन सभी कार्यक्रमों के कारण हिन्दी संस्थान ने केवल भारत में ही नहीं वरन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति और मान्यता प्राप्त की।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kendriya-Hindi-Sansthan-6.jpg|thumb|250px|केंद्रीय हिन्दी संस्थान पुस्तकालय]] &lt;br /&gt;
==हिन्दी संस्थान की स्थापना==&lt;br /&gt;
हिन्दी भाषा के अखिल भारतीय स्वरूप को समान स्तर का बनाने के लिए और साथ ही पूरे [[भारत]] में हिन्दी भाषा के शिक्षण को सबल आधार देने के उद्देश्य से 19 मार्च, 1960 ई. को भारत सरकार के तत्कालीन 'शिक्षा एवं समाज कल्याण मंत्रालय' ने एक स्वायत्तशासी संस्था 'केंद्रीय हिन्दी शिक्षण मंडल' का गठन किया और 1 नवम्बर 1960 को इस संस्थान का [[लखनऊ]] में पंजीकरण करवाया गया। &lt;br /&gt;
==केंद्रीय हिन्दी संस्थान की शाखाएँ==&lt;br /&gt;
भारत सरकार द्वारा 'केंद्रीय हिन्दी शिक्षण मंडल' को 'अखिल भारतीय हिन्दी प्रशिक्षण महाविद्यालय' को संचालित करने का  पूर्ण दायित्व सौंपा गया। 1 जनवरी, 1963 को अखिल भारतीय हिन्दी प्रशिक्षण महाविद्यालय का नाम बदल कर 'केंद्रीय हिन्दी शिक्षण महाविद्यालय' कर दिया गया। बाद में  29 अक्टूबर, 1963 को संपन्न परिषद की गोष्ठी में केंद्रीय हिन्दी शिक्षण महाविद्यालय नाम भी बदलकर 'केंद्रीय हिन्दी संस्थान' कर दिया गया।&lt;br /&gt;
केंद्रीय हिन्दी संस्थान का मुख्यालय [[आगरा]] में है। मुख्यालय को मिलाकर इसके नौ केंद्र हैं - &lt;br /&gt;
[[चित्र:Kendriya-Hindi-Sansthan-7.jpg|thumb|250px|हिन्दी सेवी सम्मान समारोह 2007, केंद्रीय हिन्दी संस्थान]]&lt;br /&gt;
#[[हिन्दी संस्थान आगरा]]&lt;br /&gt;
#[[हिन्दी संस्थान दिल्ली]] &lt;br /&gt;
#[[हिन्दी संस्थान हैदराबाद]] &lt;br /&gt;
#[[हिन्दी संस्थान गुवाहाटी]] &lt;br /&gt;
#[[हिन्दी संस्थान शिलांग]]&lt;br /&gt;
#[[हिन्दी संस्थान मैसूर]]&lt;br /&gt;
#[[हिन्दी संस्थान दीमापुर]]&lt;br /&gt;
#[[हिन्दी संस्थान भुवनेश्वर]] &lt;br /&gt;
#[[हिन्दी संस्थान अहमदाबाद]]। &lt;br /&gt;
*भारत सरकार ने 'मंडल' के गठन के समय जो प्रमुख प्रकार्य निर्धारित किए थे उन्हें तब से आज तक सतत कार्यनिष्ठा से संपन्न किया जा रहा है।&lt;br /&gt;
==मंडल के प्रमुख कार्य==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kendriya-Hindi-Sansthan-5.jpg|thumb|250px| केंद्रीय हिन्दी संस्थान, [[हिन्दी संस्थान दीमापुर|दीमापुर केंद्र]]]]&lt;br /&gt;
केंद्रीय हिन्दी शिक्षण मंडल के निर्धारित प्रमुख कार्य हैं-&lt;br /&gt;
#हिन्दी भाषा के शिक्षकों को प्रशिक्षित करना ।&lt;br /&gt;
#हिन्दीतर प्रदेशों के हिन्दी अध्ययन कर्ताओं की समस्याओं को दूर करना।&lt;br /&gt;
#हिन्दी शिक्षण में अनुसंधान के लिए अधिक सुविधाएँ उपलब्ध करवाना।&lt;br /&gt;
#उच्चतर हिन्दी भाषा, साहित्य और अन्य भारतीय भाषाओं के साथ हिन्दी का तुलनात्मक भाषाशास्त्रीय अध्ययन और सुविधाओं को उपलब्ध करवाना।&lt;br /&gt;
#भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 के दिशा-निर्देशों के अनुसार हिन्दी भाषा के अखिल भारतीय स्वरूप का विकास कराना और दिशा-निर्देशों के अनुसार हिन्दी को अखिल भारतीय भाषा के रूप में विकसित करने के लिए कार्य करना।&lt;br /&gt;
==शिक्षण-प्रशिक्षण==&lt;br /&gt;
* हिन्दीतर क्षेत्रों के हिन्दी अध्यापकों के लिए शिक्षण-प्रशिक्षण ।&lt;br /&gt;
* हिन्दीतर क्षेत्रों के हिन्दी अध्यापकों के लिए पत्राचार द्वारा (दूरस्थ) शिक्षण-प्रशिक्षण ।&lt;br /&gt;
* विदेशी छात्रों के लिए द्वितीय एवं विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण । &lt;br /&gt;
* अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी का प्रचार-प्रसार ।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kendriya-Hindi-Sansthan-12.jpg|thumb|left|250px|स्वदेशी विद्यार्थियों द्वारा संचालित सांस्कृतिक कार्यक़म, केंद्रीय हिन्दी संस्थान]]&lt;br /&gt;
* सांध्यकालीन परास्नातकोत्तर अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, जनसंचार एवं हिन्दी पत्रकारिता और अनुवाद विज्ञान पाठ्यक्रम।&lt;br /&gt;
* नवीकरण एवं पुनश्चर्या पाठ्यक्रम ।&lt;br /&gt;
* हिन्दीतर क्षेत्रों में स्थित विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के सेवारत हिन्दी अध्यापकों के लिए नवीकरण, उच्च नवीकरण एवं पुनश्चर्या पाठ्यक्रम ।&lt;br /&gt;
* केंद्र/राज्य सरकार के तथा बैंकों आदि के अधिकारियों/कर्मचारियों के लिए नवीकरण, संवर्धनात्मक, कौशलपरक कार्यक्रम और कार्यालयीन हिन्दी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम।&lt;br /&gt;
* भाषा प्रयोगशाला एवं दृश्य - श्रव्य उपकरणों के माध्यम से हिन्दी के उच्चारण का सुधारात्मक अभ्यास ।&lt;br /&gt;
* कंप्यूटर साधित हिन्दी भाषा शिक्षण ।&lt;br /&gt;
==अन्य कार्य==&lt;br /&gt;
* संगोष्ठी, कार्यगोष्ठी, विशेष व्याख्यान, प्रसार व्याख्यान माला आदि का आयोजन ।&lt;br /&gt;
* संस्थान द्वारा प्रणीत, संपादित एवं संकलित पाठ्य सामग्री, आलेख, पाठ्य  पुस्तकों आदि का प्रकाशन ।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kendriya-Hindi-Sansthan-9.jpg|thumb|250px|मुख्यालय में विदेशी विद्यार्थियों रंगोली की सज्जा, केंद्रीय हिन्दी संस्थान]]&lt;br /&gt;
* हिन्दी भाषा, अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, तुलनात्मक साहित्य आदि से संबंधित शोधपूर्ण पुस्तक, पत्रिका का प्रकाशन ।&lt;br /&gt;
* हिन्दी भाषा तथा साहित्य का अध्ययन - अध्यापन तथा अनुसंधान में सहायतार्थ समृद्ध पुस्तकालय । &lt;br /&gt;
* हिन्दी के प्रोत्साहन के लिए अखिल भारतीय प्रतियोगिताएँ। हिन्दी सेवियों का सम्मान (हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार, शैक्षिक अनुसंधान, जनसंचार, विज्ञान आदि क्षेत्रों में कार्यरत हिन्दी विद्वानों के लिए) ।&lt;br /&gt;
* समय - समय पर भारत सरकार द्वारा सौंपी जाने वाली हिन्दी संबंधी परियोजनाएँ तथा राजभाषा विषयक अन्य कार्य।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kendriya-Hindi-Sansthan-3.jpg|thumb|left|250px|केंद्रीय हिन्दी संस्थान, [[हिन्दी संस्थान भुवनेश्वर|भुवनेश्वर केंद्र]]]]&lt;br /&gt;
==मुख्यालय==&lt;br /&gt;
{{main|हिन्दी संस्थान आगरा}}&lt;br /&gt;
संविधान के अनुच्छेद 351 में निहित दिशा निर्देश के अनुसार हिन्दी को अपनी विविध भूमिकाएं निभाने में समर्थ और सक्रिय बनाने के उद्देश्य से और विविध शैक्षिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक स्तरों पर सुनियोजित अनुसंधान द्वारा शिक्षण-प्रशिक्षण, भाषाविश्लेषण, भाषा का तुलनात्मक अध्ययन तथा शिक्षण सामग्री निर्माण आदि को विकसित करने के लिए शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सन 1961 में 'केंद्रीय हिन्दी संस्थान' की स्थापना [[आगरा]] में की गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दिल्ली केंद्र==&lt;br /&gt;
{{main|हिन्दी संस्थान दिल्ली}}&lt;br /&gt;
दिल्ली केंद्र की स्थापना वर्ष 1970 में हुई। सर्वप्रथम राजभाषा क्रियान्वयन योजना के लिए केंद्रीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों के लिए गहन हिन्दी शिक्षण कार्यक्रम और विदेशों में हिन्दी प्रचार-प्रसार के अंतर्गत विदेशियों के लिए हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए गए। कार्याधिक्य के कारण वर्ष 1993 में विदेशियों के लिए शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यक्रम की छात्रवृत्ति आधारित योजना आगरा मुख्यालय में स्थानांतरित कर दी गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हैदराबाद केंद्र==&lt;br /&gt;
{{main|हिन्दी संस्थान हैदराबाद}}&lt;br /&gt;
हैदराबाद केंद्र की स्थापना वर्ष 1976 में हुई। शिक्षण-प्रशिक्षण  कार्यक्रमों के अंतर्गत यह केंद्र स्कूलों/कॉलेजों एवं स्वैच्छिक हिन्दी संस्थाओं के हिन्दी अध्यापकों के लिए 1 से 4 सप्ताह के लघु अवधीय नवीकरण कार्यक्रमों का आयोजन करता है, जिसमें हिन्दी अध्यापकों को हिन्दी के वर्तमान परिवेश के अंतर्गत भाषाशिक्षण की आधुनिक तकनीकों का व्यावहारिक ज्ञान कराया जाता है। वर्तमान में हैदराबाद केंद्र का कार्यक्षेत्र [[आन्ध्र प्रदेश]], [[तमिलनाडु]], [[गोवा]], [[महाराष्ट्र]] एवं केंद्र शासित प्रदेश [[पुदुचेरी|पांडिचेरी]] एवं [[अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह]] हैं। [[हैदराबाद]] केंद्र पर हिन्दी शिक्षण पारंगत पाठ्यक्रम भी संचालित किया जाता है ।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kendriya-Hindi-Sansthan-10.jpg|thumb|250px|स्वदेशी विद्यार्थियों द्वारा संचालित सांस्कृतिक कार्यक़म, केंद्रीय हिन्दी संस्थान]]&lt;br /&gt;
==गुवाहाटी केंद्र== &lt;br /&gt;
{{main|हिन्दी संस्थान गुवाहाटी}}&lt;br /&gt;
इस केंद्र की स्थापना वर्ष 1978 में हुई। इस केंद्र का उद्देश्य पूर्वांचल में हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण के क्षेत्र में कार्यरत हिन्दी के अध्यापकों एवं प्रचारकों के लिए हिन्दी भाषा शिक्षण की आधुनिक तकनीकों का व्यावहारिक ज्ञान कराने के लिए 1 से 4 सप्ताह के लघु अवधीय नवीकरण पाठ्यक्रमों का संचालन करना है। इस केंद्र का कार्य क्षेत्र [[असम]], [[अरुणाचल प्रदेश]], [[सिक्किम]] एवं [[नागालैंड]] राज्य है । इस केंद्र में इस शैक्षिक वर्ष से  स्नातकोत्तर अनुवाद सिद्धांत एवं व्यवहार डिप्लोमा के  अतिरिक्त 'हिन्दी शिक्षण प्रवीण'  भी प्रारंभ किये गये हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शिलांग केंद्र==&lt;br /&gt;
{{main|हिन्दी संस्थान शिलांग}}&lt;br /&gt;
इस केंद्र की स्थापना 1976 में हुई थी। 1978 में केंद्र गुवाहाटी स्थानांतरित कर दिया गया। पुन: इसकी स्थापना वर्ष 1987 में की गई। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के अंतर्गत शिलांग केंद्र हिन्दी शिक्षकों के लिए नवीकरण (तीन सप्ताह का) पाठ्यक्रम और असम रायफ़ल्स के विद्यालयों के हिन्दी शिक्षकों, केंद्र सरकार के कर्मचारियों एवं अधिकारियों को हिन्दी का कार्य साधक ज्ञान कराने के लिए 2-3 सप्ताह का हिन्दी शिक्षणपरक कार्यक्रम संचालित करता है। इस केंद्र के कार्य क्षेत्र [[मेघालय]], [[त्रिपुरा]] एवं [[मिज़ोरम]] राज्य हैं ।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kendriya-Hindi-Sansthan-2.jpg|thumb|250px|left|केंद्रीय हिन्दी संस्थान (मुख्यालय) में अफ़ग़ानिस्तान के छात्रों का विशेष पाठ्यक्रम]]&lt;br /&gt;
==मैसूर केंद्र==&lt;br /&gt;
{{main|हिन्दी संस्थान मैसूर}}&lt;br /&gt;
[[मैसूर]] केंद्र की स्थापना वर्ष 1988 में हुई। केंद्र का प्रमुख कार्य हिन्दी का शिक्षण-प्रशिक्षण एवं हिन्दी का प्रचार-प्रसार करना है। मैसूर केंद्र हिन्दी के शिक्षण-प्रशिक्षण के अंतर्गत, प्राइमरी, हाईस्कूल, इण्टरमीडिएट के हिन्दी शिक्षकों के लिए हिन्दी शिक्षण की आधुनिक तकनीकों का व्यावहारिक ज्ञान कराने के लिए 3-4 सप्ताह के लघुअवधीय नवीकरण पाठ्यक्रमों का आयोजन तथा विश्वविद्यालय और महाविद्यालय के हिन्दी अध्यापकों के लिए 2 सप्ताह के प्रयोजनमूलक पाठ्यक्रमों का संचालन करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दीमापुर केंद्र==&lt;br /&gt;
{{main|हिन्दी संस्थान दीमापुर}}&lt;br /&gt;
इस केंद्र की स्थापना वर्ष 2003 में हुई। दीमापुर केंद्र को पूर्णसत्रीय पाठ्यक्रम के अंतर्गत हिन्दी शिक्षण प्रवीण व हिन्दी शिक्षण विशेष गहन पाठ्यक्रमों के संचालन एवं [[मणिपुर]] व [[नागालैंड]] राज्य के हिन्दी अध्यापकों के लिए नवीकरण कार्यक्रमों के संचालन का उत्तरदायित्व सौंपा गया है। इस केंद्र का कार्यक्षेत्र नागालैंड एवं मणिपुर राज्य है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kendriya-Hindi-Sansthan-4.jpg|thumb|250px|केंद्रीय हिन्दी संस्थान, [[हिन्दी संस्थान भुवनेश्वर|भुवनेश्वर केंद्र]]]]&lt;br /&gt;
==भुवनेश्वर केंद्र==&lt;br /&gt;
{{main|हिन्दी संस्थान भुवनेश्वर}}&lt;br /&gt;
इस केंद्र की स्थापना नवम्बर, 2003 में हुई। यहाँ नवीकरण पाठ्यक्रम चलाए जाते हैं । गत वर्ष राजभाषा सम्मेलन का भी आयोजन किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अहमदाबाद केंद्र==&lt;br /&gt;
{{main|हिन्दी संस्थान अहमदाबाद}}&lt;br /&gt;
[[अहमदाबाद]] केंद्र की स्थापना वर्ष 2006 में हुई थी। राज्य में सेवारत हिन्दी शिक्षकों के लिए लघुअवधीय नवीकरण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबद्ध प्रशिक्षण महाविद्यालय==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kendriya-Hindi-Sansthan-13.jpg|thumb|250px|left|स्वदेशी विद्यार्थियों द्वारा संचालित सांस्कृतिक कार्यक़म, केंद्रीय हिन्दी संस्थान]]&lt;br /&gt;
हिन्दी शिक्षक-प्रशिक्षण के स्तर को समुन्नत करने और राष्ट्रीय स्तर पर उसमें एकरूपता लाने के प्रयास में भारत सरकार के निर्देश पर देश के कई राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में अपने-अपने क्षेत्रों में हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण महाविद्यालयों, संस्थाओं को स्थापित किया गया है और उन्हें संस्थान से संबद्ध किया है। इन संबद्ध महाविद्यालयों/संस्थाओं में प्रांतीय आवश्यकताओं के अनुरूप संस्थान के पाठ्यक्रम संचालित एवं आयोजित किए जाते हैं और संस्थान ही इन पाठ्यक्रमों की परीक्षाएँ नियंत्रित करता है। कुछ प्रमुख महाविद्यालयों/संस्थाओं के नाम इस प्रकार हैं-&lt;br /&gt;
*राजकीय हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण महाविद्यालय, उत्तर [[गुवाहाटी]] (असम)&lt;br /&gt;
*मिज़ोरम हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान, [[आईजोल]] (मिज़ोरम)&lt;br /&gt;
*राजकीय हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण महाविद्यालय, मैसूर (कर्नाटक)&lt;br /&gt;
*राजकीय हिन्दी शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान, दीमापुर (नागालैंड)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परियोजनाएँ==&lt;br /&gt;
*परियोजना: अंतर्राष्ट्रीय मानक हिन्दी पाठ्यक्रम&lt;br /&gt;
*परियोजना: हिन्दी कॉपोरा&lt;br /&gt;
*परियोजना: भाषा-साहित्य सी. डी. निर्माण&lt;br /&gt;
*परियोजना: हिन्दी लोक शब्द कोश&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kendriya-Hindi-Sansthan-8.jpg|thumb|250px|हिन्दी सेवी सम्मान समारोह 2007, केंद्रीय हिन्दी संस्थान]]&lt;br /&gt;
संस्थान हिन्दी अध्ययन-अध्यापन और अनुसंधान का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र है। संस्थान को उच्च स्तरीय शैक्षिक संस्थान के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता प्राप्त है। हिन्दी भारत की सामासिक संस्कृति की संवाहिका के रूप में अपनी सार्थक भूमिका निभा सके, इस उद्देश्य एवं संकल्प के साथ संस्थान निरंतर कार्यरत है। अखिल भारतीय स्तर पर हिन्दी को संपर्क भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए भी संस्थान अथक प्रयास कर रहा है। संस्थान का मूलभूत उद्देश्य है कि भारतीय भाषाएँ एक दूसरे के निकट आएँ और सामान्य बोधगम्यता की द्रष्टि से हिन्दी इनके बीच सेतु का कार्य करे तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय चेतना, संस्कृति एवं उससे संबद्ध मूल तत्त्व हिन्दी के माध्यम से प्रसारित ही न हों, बल्कि सुग्राह्य भी बनें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति&lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3&lt;br /&gt;
|माध्यमिक=&lt;br /&gt;
|पूर्णता=&lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.hindisansthan.org/hi/index.htm  केंद्रीय हिन्दी संस्थान]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दी संस्थान}}&lt;br /&gt;
{{भारत के संस्थान}}&lt;br /&gt;
{{हिन्दी भाषा}}&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी भाषा]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत सरकार के संस्थान]]  &lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<author><name>यात्री</name></author>
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		<updated>2011-10-10T14:29:48Z</updated>

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