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	<title>Bharatkosh - सदस्य द्वारा योगदान [hi]</title>
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		<title>मथुरा प्रसाद मिश्र वैद्य स्मृति सम्मान</title>
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		<updated>2017-03-16T14:20:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Award.jpg|right|thumb|पुरस्कार-प्रतीक]] &lt;br /&gt;
'''पं. मथुरा प्रसाद मिश्र वैद्य स्मृति सम्मान''' [[2005]] वर्ष में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी [[मथुरा प्रसाद मिश्र वैद्य]] की स्मृति में स्थापित मंच द्वारा प्रदान किया जाता है जिसमें 11000 हजार रुपये नगद तथा अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया जाता है। &lt;br /&gt;
*[[2013]] -में [[गाँधी भवन, हरदोई]] की प्रार्थना सभा को अधिकतम समय सर्मपण हेतु [[2014]] की प्रथम जनवरी को यह सम्मान [[सर्वोदय आश्रम टडियांवा|सर्वोदय आश्रम टडियांवा आवासीय विद्यालय]] के संगीत अध्यापक श्री विनय कुमार शर्मा जी को दिया गया है। &lt;br /&gt;
*[[2014]]-[[हरदोई]] की सामाजिक गतिविधियों में सर्वाधिक समय सर्मपण हेतु [[2015]] की प्रथम जनवरी को यह सम्मान [[रमेश भाई एक स्तम्भ -आलोक श्रीवास्तव| श्री आलोक श्रीवास्तव जी]] को दिया गया है।  &lt;br /&gt;
*[[2015]]- में यह सम्मान  जनपद [[हरदोई]] की प्रथम महिला अधिवक्ता को प्रदान किया गया है।   &lt;br /&gt;
*[[2016]]- का  सम्मान 13 मई 2017 को [[मथुरा प्रसाद मिश्र वैद्य]]  के ग्राम में दिया जाना प्रस्तावित है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:सम्मान एवं पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
[[Category:समाज कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>ग़ौस मोहम्मद ख़ान</title>
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		<updated>2016-02-08T16:52:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: 'मोहम्मद गौस सोलहवीं शताब्दी के महान मुस्लिम संत थे...' के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;मोहम्मद गौस सोलहवीं शताब्दी के महान मुस्लिम संत थे &lt;br /&gt;
[[चित्र:mohammadgaus.jpg|thumb|250px|lright|मुस्लिम संत [[मोहम्मद गौस]] का मक़बरा, ग्वालियर]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[चित्र:Tansen-Tomb.jpg|thumb|250px|left|मुस्लिम संत [[मोहम्मद गौस]] का मक़बरा, ग्वालियर]]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<updated>2016-02-08T16:52:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: मुस्लिम संत मोहम्मद गौस का मक़बरा, ग्वालियर&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;मुस्लिम संत [[मोहम्मद गौस]] का मक़बरा, ग्वालियर&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>ग्वालियर</title>
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		<updated>2016-02-08T16:46:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: /* ग्वालियर का दुर्ग */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा पर्यटन&lt;br /&gt;
|चित्र=Gwalior-Fort-Gwalior.jpg&lt;br /&gt;
|विवरण=ग्वालियर [[भारत]] के [[मध्य प्रदेश]] प्रान्त का एक प्रमुख शहर है। ये शहर और इसका क़िला उत्तर भारत के प्राचीन शहरों का केन्द्र रहे हैं। &lt;br /&gt;
|राज्य=[[मध्यप्रदेश]] &lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[ग्वालियर ज़िला]]&lt;br /&gt;
|निर्माता=&lt;br /&gt;
|स्वामित्व=&lt;br /&gt;
|प्रबंधक=&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|भौगोलिक स्थिति=उत्तर- 26.14°, पूर्व- 78.10°&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=[[दिल्ली]] से राष्ट्रीय राजमार्ग 2 से [[पलवल]], [[कोसीकलाँ]], [[होडल]] और [[मथुरा]] होते हुए [[आगरा]] पहुँचा जा सकता है जहाँ राष्ट्रीय राजमार्ग 3 ग्वालियर से जुड़ा हुआ है। &lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|कब जाएँ=[[अक्टूबर]] से [[मार्च]] &lt;br /&gt;
|यातायात=ताँगा, ऑटो रिक्शा, टैम्पो, बस, मिनी बस&lt;br /&gt;
|हवाई अड्डा=ग्वालियर हवाई अड्डा &lt;br /&gt;
|रेलवे स्टेशन=ग्वालियर रेलवे स्टेशन&lt;br /&gt;
|बस अड्डा=ग्वालियर बस अड्डा&lt;br /&gt;
|कैसे पहुँचें=बस, रेल, टैक्सी, &lt;br /&gt;
|क्या देखें=ग्वालियर पर्यटन&lt;br /&gt;
|कहाँ ठहरें=होटल, धर्मशाला, अतिथि ग्रह&lt;br /&gt;
|क्या खायें=पोहा, गजक, नमकीन, दिल्ली वाले का परांठा, शेरे पंजाब भोजनालय का खाना &lt;br /&gt;
|क्या ख़रीदें=साबूदाना, साड़ियाँ, कपड़े, प्लास्टिक, ग्रासरी और टेक्सटाइल का सामान, ज्वेलरी, हस्तशिल्प &lt;br /&gt;
|एस.टी.डी. कोड=0751&lt;br /&gt;
|ए.टी.एम=&lt;br /&gt;
|सावधानी=&lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=[http://maps.google.co.in/maps?f=q&amp;amp;source=s_q&amp;amp;hl=en&amp;amp;geocode=&amp;amp;q=Gwalior,+Madhya+Pradesh&amp;amp;aq=0&amp;amp;sll=21.125498,81.914063&amp;amp;sspn=34.855829,79.013672&amp;amp;ie=UTF8&amp;amp;hq=&amp;amp;hnear=Gwalior,+Madhya+Pradesh&amp;amp;ll=26.224447,78.178711&amp;amp;spn=0.132741,0.308647&amp;amp;z=12 गूगल मानचित्र], [http://maps.google.co.in/maps?f=d&amp;amp;source=s_d&amp;amp;saddr=Gwalior+junction&amp;amp;daddr=NH+92&amp;amp;geocode=FSUHkAEd5vaoBCl5BlwHocZ2OTFD9327st0MWg%3BFcxAkQEdt-6pBA&amp;amp;hl=en&amp;amp;mra=ls&amp;amp;sll=26.260476,78.20961&amp;amp;sspn=179.377295,184.21875&amp;amp;ie=UTF8&amp;amp;z=12 ग्वालियर हवाई अड्डा]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|15:59, 15 नवंबर 2010 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
ग्वालियर [[भारत]] के [[मध्य प्रदेश]] प्रान्त का एक प्रमुख शहर है। ये शहर और इसका क़िला उत्तर भारत के प्राचीन शहरों का केन्द्र रहे हैं। ग्वालियर अपने पुरातन ऎतिहासिक संबंधों, दर्शनीय स्थलों और एक बड़े सांस्कृतिक, औद्योगिक और राजनीतिक केंद्र के रूप में जाना जाता है। इस शहर को उसका नाम उस ऐतिहासिक पत्थरों से बने क़िले के कारण दिया जाता है, जो एक अलग-थलग, सपाट शिखर वाली 3 किलोमीटर लंबी तथा 90 मीटर ऊँची पहाड़ी पर बना है। इस नगर का उल्लेख गोप पर्वत, गोपाचल दुर्ग, गोपगिरी, गोपदिरी के रूप में हुआ है। इन सभी नामों का मतलब 'ग्वालों की पहाड़ी' होता है। [[चित्र:Gwalior-City.jpg|thumb|250px|left|ग्वालियर का एक दृश्य]] प्राचीन नाम गोपाद्रि या गोपगिरि है। जनश्रुति है कि राजपूत नरेश सूरजसेन ने ग्वालियर नाम के साधु के कहने से यह नगर बसाया था। ग्वालियर शहर के इस नाम के पीछे भी एक इतिहास छिपा है; आठवीं शताब्दी में एक राजा हुए सूरजसेन, एक बार वे एक अज्ञात बीमारी से ग्रस्त हो मृत्युशैया पर थे, तब 'ग्वालिपा' नामक संत ने उन्हें ठीक कर जीवनदान दिया। उन्हीं के सम्मान में इस शहर की नींव पडी और इसे नाम दिया ग्वालियर। आने वाली शताब्दियों के साथ यह शहर बड़े-बड़े राजवंशो की राजस्थली बना। &lt;br /&gt;
*[[महाभारत]]&amp;lt;ref&amp;gt;महाभारत सभापर्व 30,3&amp;lt;/ref&amp;gt; में गोपालकक्ष नामक स्थान पर [[भीम (पांडव)|भीम]] की विजय का उल्लेख है। संभवतः यह गोपाद्रि ही है। &lt;br /&gt;
==इतिहास और भूगोल==&lt;br /&gt;
यह शहर सदियों से राजपूतों की प्राचीन राजधानी रहा है, चाहे वे प्रतिहार रहे हों या [[कछवाहा वंश|कछवाहा]] या [[तोमर]]। इस शहर में इनके द्वारा छोडे ग़ये प्राचीन चिह्न स्मारकों, क़िलों, महलों के रूप में मिल जाएंगे। सहेज कर रखे गए अतीत के भव्य स्मृति चिह्नों ने इस शहर को पर्यटन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बनाता है। यह नगर सामंती रियासत ग्वालियर का केंद्र था। जिस पर 18वीं [[सदी]] के उत्तरार्द्ध में मराठों के सिंधिया वंश का शासन था। रणोजी सिंधिया द्वारा 1745 में इस वंश की बुनियाद रखी गई और महादजी (1761-94) के शासनकाल में यह अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनके अधीन क्षेत्र में सामान्य हिंदुस्तान के मुख्य हिस्से तथा मध्य [[भारत]] के कई हिस्से शामिल थे और उनके अधिकारी [[जोधपुर]] तथा [[जयपुर]] सहित अनेक स्वतंत्र राजपूत शासकों से भी नज़राना वसूल करते थे। दौलतराव के शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई और 1840 के दशक में इस क्षेत्र में पूरा प्रभाव क़ायम किया। 1857 के विद्रोह के दौरान ग्वालियर के सिंधिया शासक अंग्रेज़ों के प्रति वफ़ादार बने रहे, किंतु उनकी सेना ने विद्रोहियों का साथ दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पठारी इलाके में स्थित यह क्षेत्र सांक (शंख) नदी द्वारा कई जगहों पर प्रतिच्छेद है और घने जंगल से आच्छादित है। नगर तीन भिन्न बस्तियों से बना है। पुराना ग्वालियर, जो पर्वतीय क़िले के उत्तर में है और जहां मध्ययुगीन शौर्य के कई जीवंत स्मारक मौजूद हैं। क़िले के दक्षिण में स्थित लश्कर 1810 में दौलतराव सिंधिया की फ़ौजी छावनी बना था।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Jai-Vilas-Palace.jpg|जय विलास पेलेस, ग्वालियर|thumb|250px|left]]&lt;br /&gt;
हर [[सदी]] के साथ इस शहर के इतिहास को नये आयाम मिले। महान योद्धाओं, राजाओं, कवियों संगीतकारों तथा सन्तों ने इस राजधानी को देशव्यापी पहचान देने में अपना-अपना योगदान दिया। आज ग्वालियर एक आधुनिक शहर है और एक जाना-माना औद्योगिक केन्द्र है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==खनिज संपदा==&lt;br /&gt;
पूर्व में मुरार, जो अंग्रेज़ों की छावनी था, समूचा इलाका उस ग्वालियर प्रस्तर-प्रणाली से बना है, जिसमें निचले पार से उत्तरमुखी ढलान अभ्रकयुक्त चूना-पत्थर, स्फटिक, बलुआ तथा स्लेटी पत्थर तथा ऊपरी मुरार शृंखला में स्लेट, चूने, चिकने फीतेदार सूर्यकांत (जैस्पर) तथा शोण (हार्नस्टोन) पत्थर की पट्टियों से बनी है। शहर के आसपास मिलने वाले [[खनिज|खनिजों]] में [[मैंगनीज]], [[लौह अयस्क]], कांच रेत (ग्लास सैंड), चिकनी मिट्टी तथा शोरा हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कृषि== &lt;br /&gt;
आसपास का क्षेत्र शुष्क पर्णपाती वरस्पतियों से आच्छादित है तथा खेती नदी घाटी में होती है। जहाँ मिट्टी गहराई तक पाई जाती है। ग्वालियर के आसपास के जंगलों में विभिन्न किस्मों के जानवर और पक्षी पाए जाते हैं। जिनमें [[चीतल]], हिरन, भूरे तीतर, चाहा तथा काला हिरन शामिल है। ग्वालियर की जलवायु मानसूनी है और वहां कटिबंधीय अतिरेक लिए सूखापन रहता है। वर्षाकाल साल दर साल बदलता रहता है और बारिश केवल वर्षा ऋतु में ही होती है। वर्षा की अनिश्चितता तथा पानी की किल्लत के कारण यहाँ तालाबों और बांधों में पानी संचय करना ज़रूरी हो जाता है। ग्वालियर शहर में कोई 12 तालाब हैं और उनके अलावा अनेक चट्टानों को काटकर बनाए गए जलाशय और कुंए हैं। जिनसे शहर को निरंतर पानी की आपूर्ति होती रहती है। [[भारत]] में पहाड़ी क़िलों का पतन अक्सर पानी की कमी के कारण ही हुआ। इस तथ्य की रोशनी में ग्वालियर के क़िले की यह विशेषता अनोखी है, इसी पक्ष ने इस क़िले को अजेय बना दिया था। &lt;br /&gt;
==व्यापारिक और औद्योगिक केंद्र==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Saas-Bahu-Temple-Gwalior.jpg|thumb|250px|सास बहू का मंदिर, ग्वालियर]]&lt;br /&gt;
ग्वालियर एक ऎसा महत्त्वपूर्ण व्यापारिक और औद्योगिक केंद्र है, जहाँ से [[कृषि]] उत्पाद, वस्त्र, इमारती पत्थर तथा लौह अयस्क बाहर भेजे जाते हैं। लगभग एक-चौथाई आबादी कामगार है। जिसमें से 91 प्रतिशत पुरुष तथा 9 प्रतिशत स्त्रियाँ हैं। इनमें से दो-तिहाई लोग नौकरी और प्रशासनिक क्षेत्र में तथा एक-चौथाई गैर घरेलू निर्माण, व्यापार, वाणिज्य, निर्माण, परिवहन तथा संचार में लगे हुए हैं। नगर के प्रमुख उद्योगों में जूट, सिगरेट, कपास तथा रॅयान के वस्त्र, प्लास्टिक, कांच, माचिस, आटा-मैदा, चीनी के अलावा पत्थर तराशना, मिट्टी के बर्तन बनाना, चमड़ा पकाना तथा उसके खिलौने बनाना शामिल है। ग्वालियर इंजीनियरिंग वर्क संयत्र में रेल-इंजनों तथा डिब्बों की मरम्मत के अलावा अस्पताल-उपकरण, बांधों के लिए इस्पात के द्वार सहित कई विविध उपकरण बनाए जाते हैं। ग्वालियर में ग़लीचे, दरी, हॉजरी, बिस्कुट, अनाज और तेल की मिलों, आरा मिलों तथा लोहा ढालने जैसे छोटे पैमाने के भी कई उद्योग हैं।&lt;br /&gt;
==आधुनिक ग्वालियर==&lt;br /&gt;
ग्वालियर विरासत का इलाका आज़ादी के बाद [[1948]] में स्वतंत्र [[भारत]] के मध्य [[भारत]] राज्य में शामिल कर लिया गया। यह नगर [[1956]] में नए मध्य प्रदेश राज्य में शामिल होने तक मध्य [[भारत]] की शीतकालीन राजधानी रहा। प्रशासनिक दृष्टि से यह अब भी एक महत्त्वपूर्ण केंद्र है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==परिवहन==&lt;br /&gt;
*सड़क तथा रेल मार्गों से भलीभांति जुड़े हुए इस शहर से महत्त्वपूर्ण राज्य तथा राष्ट्रीय राजमार्ग गुजरते हैं। यहाँ सिंधियाकालीन छोटी लाइन (नैरो गेज) रेलमार्ग का मुख्यालय है और यह मध्य रेलवे के [[दिल्ली]]-[[मुंबई]] प्रमुख मार्ग पर स्थित है। &lt;br /&gt;
*मध्य [[भारत]] का महत्त्वपूर्ण नगर ग्वालियर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। ग्वालियर में एक रेलवे जंक्शन है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Sun-Temple-Gwalior.jpg|thumb|250px|left|सूर्य मंदिर, ग्वालियर]]&lt;br /&gt;
==विश्वविद्यालय और संगीत==&lt;br /&gt;
*ग्वालियर में जीवाजी विश्वविद्यालय ([[1964]]) और इससे संबंद्ध [[कला]], [[विज्ञान]], वाणिज्य, चिकित्सा तथा कृषि महाविद्यालय हैं और नगर में साक्षरता की दर काफ़ी ऊंची है। ग्वालियर में [[संगीत]] की यशस्वी परंपरा रही है और उसकी अपनी ख़ास शैली रही है। जो ग्वालियर 'घराना' नाम से प्रसिद्ध है। &lt;br /&gt;
==दर्शनीय स्थल==&lt;br /&gt;
नगर के भीतर और आसपास के दर्शनीय स्थलों में ग्वालियर का क़िला, आठ तालाब, छह महल, छह मंदिर, एक मस्जिद तथा अन्य इमारतें हैं। तेली का मंदिर (11वीं सदी), गुजरी महल (लगभग 1500 ई.), सास-बहू का मंदिर (1093) [[हिन्दू]] स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। क़िले की दीवार के नीचे चट्टान से तराशी हुई 18 मीटर ऊंची प्रतिमाएं (15वीं सदी), महल तथा लश्कर के स्मारक, अबुल फजल अल्लामी का मक़बरा, फूल बाग़ तथा जयविलास महल समृद्ध कला एवं [[संस्कृति]] के अन्य ऐतिहासिक उदाहरण हैं। &lt;br /&gt;
==ग्वालियर का दुर्ग==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Gwalior-Fort.jpg|thumb|250px|ग्वालियर का क़िला]]&lt;br /&gt;
*ग्वालियर का दुर्ग बहुत प्राचीन है और इसका प्रारंभिक इतिहास तिमिराच्छन्न है। हूण महाराजाधिराज [[तोरमाण]] के पुत्र मिहिरकुल के शासनकाल के 15 वें वर्ष (525 ई.) का एक शिलालेख ग्वालियर दुर्ग से प्राप्त हुआ था जिसमें मातृचेत नामक व्यक्ति द्वारा गोपाद्रि या गोप नाम की पहाड़ी (जिस पर दुर्ग स्थित है) पर एक सूर्य-मंदिर बनवाए जाने का उल्लेख है। इससे स्पष्ट है कि इस पहाड़ी का प्राचीन नाम गोपाद्रि (रूपांतर गोपाचल, गोपगिरी) है तथा इस पर किसी न किसी प्रकार की बस्ती गुप्तकाल में भी थी। &lt;br /&gt;
*इतिहास से सूचित होता है कि ग्वालियर में 875 ई. में [[कन्नौज]] के गुर्जर प्रतिहारों का राज्य था। मुसलमानों के आक्रमण के समय भी यहाँ [[कछवाहा वंश|कछवाहा]], प्रतिहार आदि राजपूत वंश राज्य करते थे। &lt;br /&gt;
*1232 ई. में दिल्ली के [[ग़ुलाम वंश]] के सुल्तान [[इल्तुतमिश]] ने ग्वालियर के क़िले को हस्तगत किया और राजपूत रानियों ने जौहर की प्रथा के अनुसार अग्नि में कूदकर प्राण त्याग दिए। &lt;br /&gt;
*1399 से 1516 ई. तक यह क़िला तोमर-नरेशों के अधीन रहा। जिनमें प्रमुख मानसिंह था। इसकी रानी गूजरी या मृगनैनी के विषय में अनेक किवदंतियां प्रचलित हैं। क़िले का गूजरी महल मृगनयनी का ही अमिट स्मारक है। &lt;br /&gt;
*1528 ई. में [[बाबर]] ने यह क़िला जीता। [[मुग़ल|मुग़लों]] ने इसका उपयोग एक सुदृढ़ कारागार के रूप में किया। इसमें राजनीतिक बंदी रखे जाते थे। &lt;br /&gt;
*[[औरंगज़ेब]] ने अपने भाई और गद्दी के हकदार मुराद और तत्पश्चात दारा के पुत्र सुलेमानशिकोह को कैद करके इसी क़िले में बंद रखा। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Gwalior-Fort-1.jpg|thumb|250px|left|ग्वालियर का क़िला]]&lt;br /&gt;
*मुग़लों के अपकर्ष के समय जब महाराष्ट्र के प्रमुख सरदार सिंधिया का [[दिल्ली]]-[[आगरा]] के प्रदेशों में आधिपत्य स्थापित हुआ तो उसी समय ग्वालियर भी उसके हाथों में आ गया। &lt;br /&gt;
*इस प्रकार वर्तमान काल तक सिंधिया के राज्य की राजधानी ग्वालियर में रही। दुर्ग के स्मारकों में ग्वालियर का लंबा इतिहास प्रतिबिंबित होता है। &lt;br /&gt;
*यहाँ का सर्व प्राचीन स्मारक मातृचेत का बनवाया हुआ सूर्य मंदिर ही था। जिसका कोई चिह्न अब नहीं है। किंतु जिसकी स्थिति सूरज तालाब के निकट रही होगी। &lt;br /&gt;
*दूसरा स्मारक चतुर्भुज [[विष्णु]] मंदिर है जो पहाड़ी के पास से काटा गया है। इसमें एक चौकोर देवालय के ऊपर एक शिखर है और मध्यकालीन शैली में बना हुआ सभामंडल। इस मंदिर को 875 ई. में अल्ल नामक व्यक्ति ने गुर्जर प्रतिहार नरेश रामदेव के समय में बनवाया था। &lt;br /&gt;
*इसके पश्चात 1093 ई. में बना हुआ सास-बहू का मंदिर ग्वालियर दुर्ग का एक विशेष ऎतिहासिक स्मारक है। इसे [[कछवाहा वंश|कछवाहा]] नरेश महीपाल ने निर्मित किया था। यह भी विष्णु का मंदिर है। कहा जाता है कि पहले इसका शिखर सौ फुट ऊँचा था। इब इसका गर्भगृह तथा शिखर दोनों ही संरचनाएँ विनष्ट हो गई हैं, किंतु इसकी कला का वैभव, सभामंडल की छत की अदभुत नक़्क़ाशी और मंदिर के बाहरी और भीतरी भागों पर निर्मित विशद मूर्तिकारी से प्रकट होता है। इसी प्रकार मंदिर के द्वारों के सिरदलों की सूक्ष्म तथा प्रभावोत्पादक मूर्तिकारी भी परम प्रशंसनीय है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Teli-Ka-Mandir-Gwalior.jpg|thumb|तेली का मंदिर, ग्वालियर]]&lt;br /&gt;
*द्वार की पत्थर की चौखटों पर [[गंगा नदी|गंगा]]-[[यमुना नदी|यमुना]] की मूर्तियाँ और पुष्पालंकरण खचित हैं। जो गुप्तकालीन परंपरा है। सभामंडल की छत पर भी कीर्तिमुखों के सहित पुष्पालंकरणों का अंकन बड़ी विदग्धता और सुंदरता के साथ किया गया है। सास-बहू मंदिर से कुछ दूर पर दुर्ग का सर्वोच्च स्मारक ''तेली का मंदिर'' स्थित है। इसकी ऊंचाई सौ फुट से भी अधिक है। इसके शिखर की विशेषता इसकी द्रविड़ शैली है। इसका निर्माण काल 8वीं शती लेकर 10वीं शती ई. तक माना जाता है। इस मंदिर के ऊपर की नक़्क़ाशी सास-बहू के मंदिर की नक़्क़ाशी की अपेक्षा सादी किंतु अधिक प्रभावशाली है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Tansen.jpg|thumb|250px|left|[[तानसेन]] का मक़बरा, ग्वालियर]]&lt;br /&gt;
*कालक्रम में इस मंदिर के पश्चात दुर्ग की पहाड़ी में चारों ओर उत्कीर्ण [[जैन]] [[तीर्थंकर|तीर्थकारों]] की विशाल नग्न-मूर्तियां आती हैं। जिनमें एक तो 57 फुट ऊँची है। ये सब 15वीं शती में बनी थी। 15वीं शती के [[तोमर]] राजाओं के जमाने के अन्य विख्यात स्मारक भी इस दुर्ग में हैं। जिनमें मान मंदिर और गूजरी-महल मुख्य हैं। &lt;br /&gt;
*मानमंदिर की ख्याति का कारण इसकी शुद्ध भारतीय या हिन्दू वास्तुशैली है। यह 300 फुट ऊंची पहाड़ी की चोटी पर बना हुआ है। इस विस्तृत भवन पर छः बर्तुल छतरियां बनी हैं। 1528 ई. में जब [[बाबर]] ने ग्वालियर का क़िला देखा था तब इन छतरियों पर सुनहरी काम था। जिससे ये दूर से सूर्य के प्रकाश में चमकती थी। इस भवन के पूर्वाभिमुख भाग से बीहड़ पहाड़ी प्रदेश की मनोरम झांकी मिलती है। इसके अंदर मानसिंह का प्रासाद है। जिसकी वास्तु शैली सर्वथा भारतीय है। इस शैली का प्रभाव [[अकबर]] के [[फ़तेहपुर सीकरी]] के भवनों में देखा जा सकता है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Tansen-Tomb.jpg|thumb|250px|left|मुस्लिम संत [[मोहम्मद गौस]] का मक़बरा, ग्वालियर]]&lt;br /&gt;
*गूजरी-महल दुमंजिला भवन है। जिसका बाहरी भाग सादा प्रकोष्ठों की पंक्ति है। दुर्ग के अन्य भवनों में करन-मंदिर, विक्रम-मंदिर (तोमरीं द्वारा निर्मित) तथा मुग़लों के प्रासाद - जहांगीरी महल, शाहजहांनी - महल आदि हैं। दुर्ग के बाहर औरंगज़ेब के समय की एक मस्जिद और अकबर के गुरु मु. गौस का मक़बरा स्थित है। &lt;br /&gt;
*पास ही अकबर के नवरत्नों में से एक तथा [[भारत]] के प्रसिद्ध संगीतज्ञ [[तानसेन]] की समाधि है। &lt;br /&gt;
*यहाँ से एक मील की दूरी पर [[झांसी की रानी लक्ष्मीबाई|रानी लक्ष्मीबाई]] की प्रसिद्ध समाधि है। जो [[भारत]] के [[भारत का इतिहास#प्रथम स्वतंत्रता संग्राम|प्रथम स्वतंत्रता संग्राम]] में अंग्रेज़ों से वीरतापूर्वक लड़ते हुए मारी गई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जनसंख्या==&lt;br /&gt;
ग्वालियर की जनसंख्या (2001) की जनगणना के अनुसार नगर निगम क्षेत्र की 8,26,919 और ज़िले की कुल 16,29,821 है।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3 &lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[http://gwalior.nic.in/ अधिकारिक वेबसाइट]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{मध्य प्रदेश के नगर}}&lt;br /&gt;
{{ब्रज}}{{ब्रज के दर्शनीय स्थल}}{{मध्य प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
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[[Category:भारत_के_नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
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__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>स्वयं प्रेरक-कस्तूरबा गाँधी</title>
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		<updated>2016-02-08T16:23:04Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: 'कस्तूरबा गाँधी बीमार रहती थीं। एक दिन गाँधी जी ने...' के साथ नया पृष्ठ बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[कस्तूरबा गाँधी]] बीमार रहती थीं। एक दिन गाँधी जी ने उन्हें सलाह दी कि तुम नमक खाना छोड़ दो, तो अच्छी हो जाओगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तूरबा ने कहा- नमक के बिना भोजन कैसे किया जाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाँधी जी बोले- नमक छोड़कर देखो तो सही।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कस्तूरबा ने प्रतिवाद करते हुए कहा - पहले आप ही छोड़कर देखिए न?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाँधी जी ने संकल्प करते हुए कहा- बस अभी से छोड़ दिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसी दिन से गाँधी जी ने नमक का प्रयोग करना छोड़ दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गाँधी जी अपनी बात के स्वयं प्रेरक बन गए।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>कस्तूरबा गाँधी के प्रेरक प्रसंग</title>
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&lt;hr /&gt;
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		<title>कस्तूरबा गाँधी के प्रेरक प्रसंग</title>
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		<updated>2016-02-08T16:19:47Z</updated>

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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;स्वयं प्रेरक-कस्तूरबा गाँधी&lt;/div&gt;</summary>
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		<updated>2016-02-08T16:12:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: ग्वालियर में तानसेन का मकबरा&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[ग्वालियर]] में [[तानसेन]] का मकबरा&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>तानसेन</title>
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		<updated>2016-02-08T16:11:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: /* जीविकोपार्जन */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा कलाकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Akbar-Tansen-Haridas.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=तानसेन&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=रामतनु पाण्डेय&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=तन्ना उर्फ तनसुख उर्फ त्रिलोचन&lt;br /&gt;
|जन्म=1504 से 1509 ई. के बीच&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=ग्राम बेहट, [[ग्वालियर]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=1585 ई.&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=दिल्ली&lt;br /&gt;
|अभिभावक=श्री मकरंद पांडे &lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=संगीतज्ञ&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ='संगीतसार', 'रागमाला' और 'श्रीगणेश स्तोत्र'।&lt;br /&gt;
|मुख्य फ़िल्में=&lt;br /&gt;
|विषय=संगीत&lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''संगीत सम्राट तानसेन''' (जन्म- संवत 1563, बेहट ग्राम; मृत्यु- संवत 1646) की गणना [[भारत]] के महान गायकों, [[मुग़लकालीन संगीत|मुग़ल संगीत]] के संगीतकारों एवं बेहतरीन संगीतज्ञों में की जाती है। तानसेन का नाम [[अकबर]] के प्रमुख संगीतज्ञों की सूची में सर्वोपरि है। तानसेन दरबारी कलाकारों का मुखिया और [[अकबर के नवरत्न|सम्राट के नवरत्नों]] में से एक था। इस पर भी उसका प्रामाणिक जीवन-वृत्तांत अज्ञात है। यद्यपि काव्य-रचना की दृष्टि से तानसेन का योगदान विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता, परंतु [[संगीत]] और काव्य के संयोग की दृष्टि से, जो भक्तिकालीन काव्य की एक बहुत बड़ी विशेषता थी, तानसेन साहित्य के इतिहास में अवश्य उल्लेखनीय है। उसके जीवन की अधिकांश घटनाएँ किंवदंतियों एवं अनुश्रुतियों पर आधारित हैं। प्रसिद्ध कृष्ण-भक्त [[स्वामी हरिदास]] इनके दीक्षा-गुरु कहे जाते हैं। &amp;quot;[[वैष्णवन की वार्ता|चौरासी वैष्णवन की वार्ता]]&amp;quot; में [[सूरदास|सूर]] से इनके भेंट का उल्लेख हुआ है। &amp;quot;[[वैष्णवन की वार्ता|दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता]]&amp;quot; में गोसाई विट्ठलनाथ से भी इनके भेंट करने की चर्चा मिलती है। &lt;br /&gt;
==प्राचीन धरोहरों की रक्षा==&lt;br /&gt;
तानसेन अपनी दिव्य प्रभा फैलाकर भारतीय संगीत के गगनांगन पर उदय हुये और चले गये। हमारे देश में तानसेन भारतीय संगीत के वह सूर्य थे कि जिनके संगीत प्रकाश ने एक अपूर्व आभा फैलाई। [[ध्रुपद|ध्रुवपद]] गायकी हमारे देश की प्राचीन गायकी है और तानसेन इस गायकी के शीर्ष गायक थे। तानसेन और उनके संगीत के संबंध में आज भी गहन शोध की आवश्यकता है। भारतीय संगीत को आज के समय के संगीत, डिस्को, पॉप से बचाकर रखने की आवश्यकता है। हमें अपने प्राचीन संगीत की रक्षा करनी होगी क्योंकि हमारी पहचान हमारी संस्कृति से ही होगी। यह बहुत आवश्यक है कि हम अपनी प्राचीन धरोहरों की रक्षा करें।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://pustak.org/bs/home.php?bookid=5559 |title=तानसेन |accessmonthday=[[3 अप्रैल]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=भारतीय साहित्य संग्रह |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
तानसेन की जीवनी के सम्बन्ध में बहुत कम ऐसा वृत्त ज्ञात है, जिसे पूर्ण प्रामाणिक कहा जा सके। भारतीय संगीत के प्रसिद्ध गायक तानसेन का जन्म मुहम्मद ग़ौस नामक एक सिद्ध [[फ़क़ीर]] के आशीर्वाद से [[ग्वालियर]] से सात मील दूर एक छोटे-से गाँव बेहट में संवत 1563 में वहाँ के एक [[ब्राह्मण]] कुल में हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;तानसेन की जन्म तिथि तथा सन् के बारे में विविध मत पाए जाते हैं। कुछ लेखक इनका जन्म सन् 1506 ई. और 1520 ई. बताते हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; इनके पिता का नाम मकरंद पांडे था। पांडित्य और संगीत-विद्या में लोकप्रिय होने के साथ-साथ मकरंद पांडे को धन-धान्य भी यथेष्ट रूप से प्राप्त था। तानसेन की माता पूर्ण साध्वी व कर्मनिष्ठ थीं। तानसेन का पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार से हुआ। एकमात्र संतान होने के कारण इनके माँ-बाप ने किसी प्रकार का कठोर नियंत्रण भी नहीं रखा। &lt;br /&gt;
====मूल नाम====&lt;br /&gt;
तानसेन का मूल नाम क्या था, यह निश्चय पूर्वक कहना कठिन है, किंवदंतियों के अनुसार उन्हें तन्ना, त्रिलोचन, तनसुख, अथवा रामतनु बतालाया जाता है। तानसेन इनाका नाम नहीं इनकी उपाधि थी, जो तानसेन को [[बांधवगढ़]] के राजा रामचंद्र से प्राप्त हुई थी। वह उपाधि इतनी प्रसिद्ध हुई कि उसने इनके मूल नाम को ही लुप्त कर दिया। इनका जन्म-संवत् भी विवादग्रस्त है। [[हिन्दी]] साहित्य में इनके जन्म की संवत 1588 की प्रसिद्धि है किंतु कुछ विद्वानों ने संवत 1563 माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;दोसौ बावन वैष्णवन की वार्ता (द्वितीय खंड, पृष्ठ 156&amp;lt;/ref&amp;gt; तानसेन के मधुर कंठ और गायन शैली की ख्याति सुनकर 1562 ई. के लगभग अकबर ने उन्हें अपने दरबार में बुला लिया। [[अबुल फ़जल]] ने '[[आइना-ए-अकबरी]]' में लिखा है कि अकबर ने जब पहली बार तानसेन का गाना सुना तो प्रसन्न होकर पुरस्कार में दो लाख टके दिए। तानसेन के कई पुत्र थे, और एक पुत्री थी। पुत्रों में तानतरंग ख़ाँ, सुरतिसेन और विलास ख़ाँ के नाम प्रसिद्ध हैं। उनके पुत्रों एवं शिष्यों के द्वारा &amp;quot;हिन्दुस्तानी संगीत&amp;quot; की बड़ी उन्नति हुई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संगीत शिक्षा==&lt;br /&gt;
तानसेन के आरंभिक काल में ग्वालियर पर कलाप्रिय राजा मानसिंह तोमर का शासन था। उनके प्रोत्साहन से ग्वालियर संगीत [[कला]] का विख्यात केन्द्र था, जहाँ पर [[बैजूबावरा]], कर्ण और महमूद जैसे महान संगीताचार्य और गायक गण एकत्र थे, और इन्हीं के सहयोग से राजा मानसिंह तोमर ने संगीत की [[ध्रुपद]] गायकी का आविष्कार और प्रचार किया था। तानसेन को संगीत की शिक्षा ग्वालियर में वहाँ के कलाविद् राजा मानसिंह तोमर के किसी विख्यात संगीताचार्य से प्राप्त हुई थी। गौस मुहम्मद को उसका संगीत-गुरु बतलाना अप्रमाणित सिद्ध हो गया है। उस सूफी संत के प्रति इनकी श्रद्धा भावना रही हो, यह संभव जान पड़ता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ग्वालियर]] राज्य का पतन हो जाने पर वहाँ के संगीताचार्यों की मंडली बिखरने लगी थी। उस परिस्थिति में तानसेन को ग्वालियर में उच्च शिक्षा प्राप्त करना संभव ज्ञात नहीं हुआ। वह वृंदावन चले गए थे, जहाँ उसने संभवतः स्वामी हरिदास जी से संगीत की उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। [[वल्लभ संप्रदाय|वल्लभ संप्रदायी]] वार्ता के अनुसार तानसेन ने अपने उत्तर जीवन में [[अष्टछाप कवि|अष्टछाप के संगीताचार्या]] [[गोविंदस्वामी]] से भी कीर्तन पद्धति का गायन सीखा था।&amp;lt;ref&amp;gt;[[अकबरनामा]] ([[अंग्रेज़ी]] अनुवाद) जिल्द 2, पृष्ठ 880&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====आश्चर्यजनक प्रतिभा====&lt;br /&gt;
तानसेन दस वर्ष की अवस्था तक पूर्णरूपेण स्वतंत्र, सैलानी व नटखट प्रकृति के हो गए थे। इस बीच इनके अन्दर एक आश्चर्यजनक प्रतिभा देखी गई, वह थी आवाज़ों की हू-ब-हू नक़ल करना। किसी भी पशु-पक्षी की आवाज़ की नक़ल कर लेना इनका खेल था। [[सिंह|शेर]] की बोली बोलकर अपने बाग़ की रखवाली करने में इन्हें बड़ा मज़ा आया करता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन [[वृन्दावन]] के महान संगीतकार सन्न्यासी [[स्वामी हरिदास]] जी अपनी शिष्य-मंडली के साथ उक्त बाग़ में होकर गुज़रे, तो बालक &amp;quot;तन्ना&amp;quot; ने एक पेड़ की आड़ में छुपकर शेर जैसी दहाड़ लगाई। डर के मारे सब लोगों के दम फूल गये स्वामी जी को उस स्थान पर शेर रहने का विश्वास नहीं हुआ और तुरंत खोज की। उन्हें दहाड़ता हुआ बालक मिल गया। बालक के इस क़ौतुक पर स्वामी जी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने जब अन्य पशु-पक्षियों की आवाज़ भी बालक से सुनी, तो मुग्ध हो गए और उसके पिताजी से बालक को संगीत-शिक्षा देने के निमित्त माँग-कर अपने साथ ही वृदावन ले आए। गुरु की कृपा से 10 वर्ष की अवधि में ही बालक तन्ना धुरंधर गायक बन गया और यहीं से इसका नाम &amp;quot;तन्ना&amp;quot; की बजाय &amp;quot;तानसेन&amp;quot; हो गया। गुरुजी का आशीर्वाद पाकर तानसेन ग्वालियर  लौट आए। इसी समय इनके पिताजी की मृत्यु हो गई। मृत्यु से पूर्व पिता ने तानसेन को उपदेश दिया कि तुम्हारा जन्म मुहम्मद ग़ौस नामक फ़क़ीर की कृपा से हुआ है इसलिए तुम्हारे शरीर पर पूर्ण अधिकार उसी फ़क़ीर का है। अपनी ज़िन्दगी में उस फ़क़ीर की आज्ञा की कभी अवहेलना मत करना। पिता का उपदेश मानकर तानसेन फ़क़ीर मुहम्मद ग़ौस के पास आ गए। फ़क़ीर साहब ने तानसेन को अपना उत्तराधिकारी बनाकर अपना अतुल वैभव आदि सब कुछ उन्हें सौंप दिया और अब तानसेन ग्वालियर में ही रहने लगे।&lt;br /&gt;
==विवाह==&lt;br /&gt;
तानसेन का परिचय राजा मानसिंह की विधवा पत्नी रानी मृगनयनी से हुआ। रानी मृगनयनी भी बड़ी मधुर तथा विदुषी गायिका थीं। वे तानसेन का गायन सुन कर बहुत प्रभावित हुईं। उन्होंने अपने संगीत-मंदिर में शिक्षा पाने वाली हुसैनी ब्राह्मणी नामक एक सुमधुर गायिका लड़की के साथ तानसेन का [[विवाह]] कर दिया। हुसैनी का वास्तविक नाम प्रेमकुमारी था। हुसैनी के पिता सारस्वत [[ब्राह्मण]] थे, किंतु बाद में यह अपरिवार मुस्लिम [[धर्म]] में दीक्षित हो गए। प्रेमकुमारी का इस्लामी नाम हुसैनी रखा गया। ब्राह्मणी कन्या होने के कारण सभी उसे हुसैनी ब्राह्मणी कहकर पुकारते थे, इसी से तानसेन का घराना 'हुसैनी घराना' कहा जाने लगा था।&lt;br /&gt;
====संगीत कला के संस्कार====&lt;br /&gt;
विवाह के पश्चात् तानसेन पुनः अपने गुरु जी के आश्रम (वृन्दावन) में शिक्षा प्राप्त करने पहुँचे। इसी समय फ़क़ीर मुहम्मद ग़ौस का अंतिम समय निकट आ गया। फलस्वरूप गुरु जी के आदेश पर तानसेन को तुरंत ग्वालियर वापस आना पड़ा। फ़क़ीर साहब की मृत्यु हो गई और तानसेन एक विशाल संपत्ति के अधिकारी बन गए। वह ग्वालियर में रहकर आनंदपूर्वक गृहस्थ-जीवन व्यतीत करने लगे। तानसेन के चार पुत्र और एक पुत्री का जन्म हुआ। पुत्रों का नाम- सुरतसेन, तरंगसेन, शरतसेन, और विलास ख़ाँ तथा लड़की का नाम सरस्वती रखा गया। तानसेन की सभी संतानें संगीत-कला के संस्कार लेकर पैदा हुईं। सभी बच्चे उत्कृष्ट कलाकार हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संगीत-साधना पूर्ण होने के बाद सर्वप्रथम तानसेन को रीवा-नरेश रामचन्द्र (राजाराम) अपने दरबार में ले गए। इन्हीं दिनों तानसेन का सौभाग्य-सूर्य चमक उठा। महाराजा ने तानसेन जैसे दुर्लभ रत्न को बादशाह अकबर को भेंट कर कर दिया। सन् 1556 ई. में तानसेन अकबर के दरबार में [[दिल्ली]] गए। बादशाह ऐसे अमूल्य रत्न को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुआ और तानसेन को उसने अपने नवरत्नों में सम्मिलित कर लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीविकोपार्जन==&lt;br /&gt;
संगीत कला में पारंगत होने पर तानसेन को जीविकोपार्जन की चिंता हुई। ऐसा ज्ञात होता है, वह सर्वप्रथम सुलतान इस्लामशाह सूर के स्नेह-पात्र दौलतखां के आश्रय रहा था। उसी समय वह [[मुहम्मद आदिलशाह]] (अदली) सूर के संपर्क में आया था, जिसकी संगीतज्ञता के कारण उसे वह गुरुवत् मानता था। सूरी सल्तनत की समाप्ति होने पर वह बांधवगढ़ के राजा रामचंद्र की संगीत-प्रियता और गुण-ग्राहकता की ख्याति सुन कर उसके दरबार में चला गया था। बांधव-नरेश ने उन्हें बड़े आदर पूर्वक रखा। वहाँ पर उन्हें विपुल धन-वैभव तथा आदर-सम्मान प्राप्त हुआ, और उनकी व्यापक प्रसिद्धि हुई। संवत 1620 में उसे सम्राट अकबर ने अपने दरबार में बुला लिया था। उस समय उसकी आयु 50 वर्ष से कुछ अधिक थी। फिर वह अपने देहावसान काल तक अकबर के आश्रय में ही रहा था।[[चित्र:tansen.jpg|thumb|right|[[ग्वालियर]] में  [[तानसेन]]  का मकबरा]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मुसलमान होने की किंवदंती==&lt;br /&gt;
[[हिन्दू]] कुल में जन्म लेने पर भी बाद में तानसेन के मुसलमान होने की किंवदंती प्रचलित है। किंतु इसका समर्थन किसी भी समकालीन इतिहासकार के ग्रंथ से नहीं होता है। ऐसा जान पड़ता है, इनका मुसलमानों के साथ अधिक संपर्क और सहवास तथा उनके खान-पान की स्वच्छता के कारण उस समय रूढ़िवादी हिन्दुओं ने उनका वहिष्कार कर उन्हें मुसलमान घोषित कर दिया था। वह कभी मुसलमान हुए हो, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है। तानसेन की मृत्यु होने पर उसकी शवयात्रा का जैसा वर्णन [[अबुल फ़जल]] ने किया है, उससे सिद्ध होता है कि वह अपने अंतिम काल तक भी हिन्दू रहे थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तानसेन के वंशजों ने अवश्य मुसलमानी मज़हब स्वीकार कर लिया था। उनकी वंश-परंपरा में कुछ नाम हिन्दुओं के से मिलते हैं और उनमें हिन्दुओं की सी कई रीतिरिवाजें प्रचलित हैं। इनसे समझा जा सकता है कि मुसलमान हो जाने पर भी वे अपने पूर्वजों की हिन्दू परंपरा का पूर्णतया परित्याग नहीं कर सके थे। &lt;br /&gt;
==अकबरनामा के अनुसार== &lt;br /&gt;
'[[अकबरनामा]]' के अनुसार तानसेन की मृत्यु अकबरी शासन में 34वें वर्ष अर्थात संवत 1646 में [[आगरा]] में हुई थी। उनका संस्कार भी संभवतः वहीं पर [[यमुना]] तट पर किया गया होगा। कालांतर में उनके जन्मस्थान [[ग्वालियर]] में स्मारक स्वरूप उनकी समाधि उनके श्रद्धा-भाजन गौस मुहम्मद के मक़बरे के समीप बनाई गई, जो अब भी विद्यमान है। तानसेन की आयु उसकी मृत्यु के समय 83 वर्ष के लगभग थी। और वह प्रायः 26 वर्ष तक अकबरी दरबार में संबद्ध रहा था। उसके कई पुत्र थे, एक पुत्री थी और अनेक शिष्य थे। पुत्रों में तानतरंग ख़ाँ, सुरतसंन और विलास ख़ाँ, के नाम से प्रसिद्ध हैं। पुत्रों में तानतरंग ख़ाँ, और शिष्यों में मियाँ चाँद के नाम [[अकबर]] के प्रमुख दरबारी संगीतज्ञों में मिलते हैं। &lt;br /&gt;
==रचनाएँ==&lt;br /&gt;
====नये रागों का आविष्कार====&lt;br /&gt;
तानसेन ग्वालियर परंपरा की ''मूर्च्छना'' पद्धति के एवं [[ध्रुपद]] शैली के विख्यात गायक और कई रागों के विशेषज्ञ थे। इनको [[ब्रज]] की कीर्तन पद्धति का भी पर्याप्त ज्ञात था। साथ ही वह ईरानी संगीत की ''मुकाम'' पद्धति से भी परिचित थे। उन सब के समंवय से उसने अनेक नये रागों का आविष्कार किया था, जिनमें &amp;quot;मियाँ की मलार&amp;quot; अधिक प्रसिद्ध है। तानसेन के गायन की प्रशंसा में कई चमत्कारपूर्ण किंवदंतियाँ प्रचलित हैं, किंतु उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। &lt;br /&gt;
====ध्रुपदों की रचना====&lt;br /&gt;
तानसेन गायक होने के साथ ही कवि भी थे। उसने अपने गान के लिए स्वयं बहुसंख्यक ध्रुपदों की रचना की थी। उनमें से अनेक ध्रुपद संगीत के विविध ग्रंथों में और कलावंतों के पुराने घरानों में सुरक्षित हैं। तानसेन के नाम से &amp;quot;संगीत-सार'' और &amp;quot;राग-माला&amp;quot; नामक दो ग्रंथ भी मिलते हैं&amp;lt;ref&amp;gt;लेखक कृत [[ब्रज]] की कलाओं का इतिहास, पृष्ठ 448-450&amp;lt;/ref&amp;gt;।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रंथ &amp;quot;संगीत-सम्राट तानसेन&amp;quot; में उसके रचे हुए 288 ध्रुपदों का संकलन है। ये ध्रुपद विविध विषयों से संबंधित हैं। इसके अतिरिक्त उनके ग्रंथ &amp;quot;संगतिदार&amp;quot; और &amp;quot;रागमाला&amp;quot; भी संकलित हैं। यहाँ पर तानसेन कृत &amp;quot;कृष्ण लीला&amp;quot; के कुछ ध्रुपद उदाहरणार्था प्रस्तुत हैं- &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;पलना-झूलन&amp;lt;/u&amp;gt;- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
हमारे लला के सुरंग खिलौना, खेलत, खेलत कृष्ण कन्हैया। &lt;br /&gt;
अगर-चंदन कौ पलना बन्यौ है, हीरा-लाल-जवाहर जड़ैया॥ &lt;br /&gt;
भँवरी-भँवरा, चट्टा-बट्टा, हंस-चकोर, अरू मोर-चिरैया॥&lt;br /&gt;
तानसेन प्रभु जसोमति झुलावै, दोऊ कर लेत बलैया।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;गो-चारन&amp;lt;/u&amp;gt;- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
धौरी-ध्रुमर, पीयरी-काजर कहि-कहि टेंरै। &lt;br /&gt;
मोर मुकट सीस, स्त्रवन कुंडल कटि में पीतांबर पहिरै॥                                                                                                                                                           ग्वाल-बाल सब सखा संग के, लै आवत ब्रज नैरै। &lt;br /&gt;
&amp;quot;तानसेन&amp;quot; प्रभु मुख रज लपटानी जसुमति निरखि मुख है रै।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
आजु हरि लियै अनहिली गैया, एक ही लकुटि सों हाँकी॥ &lt;br /&gt;
ज्यों-ज्यों रोकी मोहन तुम सोई, त्यों-त्यों अनुराग हियं देखत मुखां की। &lt;br /&gt;
हम जो मनावत कहूँ तूम मानत, वे बतियाँ गढ़ि बॉकी॥ &lt;br /&gt;
तृन नहीं चरत, बछरा नहीं चौखत की, &lt;br /&gt;
हम कहा जानै, को है कहाँ की। &lt;br /&gt;
तानसेन प्रभु वेगि दरस दीजै सब मंतर पढ़ि आँकी॥&amp;lt;ref&amp;gt;लेखक कृत &amp;quot;संगीत सम्राट तानसेन&amp;quot; ध्रुपद सं. 253, 255,और 256 &amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रथम उठ भोरही राधे-किशन कहो मन, जासों होवै सब सिद्ध काज। &lt;br /&gt;
इहि लोक परलोक के स्वामी, ध्यान धरौ ब्रजराज॥&lt;br /&gt;
पतित उद्धारन जन प्रतिपालन, दीनदयाल नाम लेत जाय दुख भाज। &lt;br /&gt;
&amp;quot;तानसेन&amp;quot; प्रभु कों सुमरों प्रातहिं, जग में रहै तेरी लाज॥ &lt;br /&gt;
मुरली बजावै, आपन गावै, नैन न्यारे नंचावै, तियन के मन कों रिझावै। &lt;br /&gt;
दूर-दूर आवै पनघट, काहु के धटन दुरावै, रसना प्रेम जनावै॥ &lt;br /&gt;
मोहिनी मूरत, सांवती सूरत, देखत ही मन ललचावै। &lt;br /&gt;
&amp;quot;तानसेन&amp;quot; के प्रभु तुम बहुनायक, सबहिंन के मन भावै॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==असीम संभावनाएँ निहित==&lt;br /&gt;
हर युग एक महान गायक हुआ करता है। तानसेन सिर्फ एक महान गायक ही नहीं बल्कि एक महान संगीतशास्त्री एवं रागों के रचयिता भी थे। जाति एवं रागों की प्राचीन मान्यताओं को तोड़ कर नये प्रयोगों की परंपरा को प्रारम्भ करने में वे अग्रणी थे। भारतीय संगीत में स्वरलिपि की कोई पद्धति नहीं होने के कारण प्राचीन गायकों की स्वररचना को जानने का कोई साधन नहीं है। संगीत के क्षेत्र में आज भी तानसेन का प्रभाव जीवित है। उसका कारण है ‘‘मियाँ की मल्हार’’ ‘‘दरबारी कानडा’’ और ‘‘मियाँ की तोड़ी’’ जैसी मौलिक स्वर रचनाओं का सदाबहार आकर्षण। उस समय के लोकप्रिय राग ध्रुपद की समृद्धता का कारण भी तानसेन की प्रतिभा ही थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तानसेन के दीपक राग से दीप के जल उठने एवं राग मेघ-मल्हार से वर्षा होने की किंवदंतियों के ऐतिहासिक प्रमाण भले ही न हों, किन्तु उनमें इस सत्यता का अंश ज़रूर है कि अगर तानसेन जैसा महान गायक हो तो संगीत में असीम संभावनाएँ निहित हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://pustak.org/bs/home.php?bookid=4974 |title=तानसेन |accessmonthday=[[3 अप्रैल]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=भारतीय साहित्य संग्रह |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अकबर के नवरत्न==&lt;br /&gt;
[[अकबर के नवरत्न|अकबर के नवरत्नों]] तथा [[मुग़ल काल|मुग़लकालीन]] संगीतकारों में तानसेन का नाम परम-प्रसिद्ध है। यद्धपि काव्य-रचना की दृष्टि से तानसेन का योगदान विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता, परन्तु [[संगीत]] और काव्य के संयोग की दृष्टि से, जो भक्तिकालीन काव्य की एक बहुत बड़ी विशेषता थी, तानसेन [[साहित्य]] के इतिहास में अवश्य उल्लेखनीय है। तानसेन [[अकबर]] के नवरत्नों में से एक थे। एक बार अकबर ने उनसे कहा कि वो उनके गुरु का संगीत सुनना चाहते हैं। गुरु हरिदास तो अकबर के दरबार में आ नहीं सकते थे। लिहाज़ा इसी निधि वन में अकबर हरिदास का संगीत सुनने आए। हरिदास ने उन्हें कृष्ण भक्ति के कुछ भजन सुनाए थे। अकबर हरिदास से इतने प्रभावित हुए कि वापस जाकर उन्होंने तानसेन से अकेले में कहा कि आप तो अपने गुरु की तुलना में कहीं आस-पास भी नहीं है। फिर तानसेन ने जवाब दिया कि जहांपनाह हम इस ज़मीन के बादशाह के लिए गाते हैं और हमारे गुरु इस ब्रह्मांड के बादशाह के लिए गाते हैं तो फ़र्क़ तो होगा न। &lt;br /&gt;
==रचनाएँ==&lt;br /&gt;
तानसेन के नाम के संबंध में मतैक्य नहीं है। कुछ का कहना है कि 'तानसेन' उनका नाम नहीं, उनकों मिली उपाधि थी। तानसेन मौलिक कलाकार थे। वे स्वर-ताल में गीतों की रचना भी करते थे। तानसेन के तीन ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है- &lt;br /&gt;
#'संगीतसार', &lt;br /&gt;
#'रागमाला' और &lt;br /&gt;
#'श्रीगणेश स्तोत्र'।&lt;br /&gt;
==दीपक राग==&lt;br /&gt;
यह तानसेन का शौर्यकाल था। बादशाह का अटूट स्नेह और सम्मान पाकर तानसेन की यश-पताका उन्मुक्त होकर लहराने लगी। [[अकबर]] तानसेन के [[संगीत]] का ग़ुलाम बन गया। काला-पारखी अकबर तानसेन की संगीत-माधुरी में डूब गया। बादशाह पर तानसेन का ऐसा पक्का रंग सवार देख कर दूसरे दरबारी गायक जलने लगे और एक दिन उन्होंने तानसेन के विनाश की योजना बना डाली। किंवदंती है कि ये सब लोग बादशाह के पास पहुँचकर कहने लगे- &amp;quot;हुज़ूर, हमें तानसेन से 'दीपक' राग सुनवाया जाए और आप भी सुनें। इसको तानसेन के अलावा और कोई ठीक-ठीक नहीं गा सकता।&amp;quot; बादशाह राज़ी हो गए। तानसेन द्वारा इस राग का अनिष्टकारक परिणाम बताए जाने और लाख मना करने पर भी अकबर का राजहट नहीं टला और उसे दीपक राग गाना ही पड़ा। राग जैसे-ही शुरू हुआ, गर्मी बढ़ी व धीरे-धीरे वायुमंडल अग्निमय हो गया। सुनने वाले अपने-अपने प्राण बचाने को इधर-उधर छिप गए, किंतु तानसेन का शरीर अग्नि की ज्वाला से जल उठा। उसी समय तानसेन अपने घर भागे। वहाँ उनकी लड़की तथा एक गुरुभगिनी ने मेघ राग गाकर उनके जीवन की रक्षा की। इस घटना के कई मास पश्चात् तानसेन का शरीर स्वस्थ हुआ। अकबर भी अपनी ग़लती पर बहुत पछताया। &lt;br /&gt;
==चमत्कारी घटनाएँ==&lt;br /&gt;
यह कहा जाता है कि तानसेन के जीवन में पानी बरसाने, जंगली पशुओं को मंत्र- मुग्ध करने तथा रोगियों को ठीक करने आदि की अनेक संगीत-प्रधान चमत्कारी घटनाएँ हुईं। यह निर्विवाद सत्य है कि गुरु-कृपा से उन्हें बहुत-सी राग-रागनियाँ सिद्ध थीं। और उस समय देश में तानसेन जैसा दूसरा कोई [[संगीतज्ञ]]  नहीं था। तानसेन ने व्यक्तिगत रूप से कई रागों का निर्माण भी किया, जिनमें दरबारी कान्हड़ा, मियाँ की सारंग मियाँमल्लार आदि उल्लेखनीय हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
इस प्रकार अमर संगीत की सुखद वैखरी बहाता हुआ यह महान [[संगीतज्ञ]]  मृत्यु के निकट भी आ पहुँचा। [[दिल्ली]] में ही तानसेन ज्वर से पीड़ित हुए। तानसेन ने अपना अंतिम समय जानकर [[ग्वालियर]] जाने की इच्छा प्रकट की, परंतु बादशाह के मोह और स्नेह के कारण तानसेन [[फ़रवरी]], सन् 1585 ई. में दिल्ली में ही स्वर्गवासी हो गए। इच्छानुसार तानसेन का शव ग्वालियर पहुँचाया गया और मुहम्मद ग़ौस की क़ब्र के बराबर उनकी समाधि बना दी गई। तानसेन की मृत्यु के पश्चात् उनका कनिष्ठ पुत्र विलास ख़ाँ तानसेन के संगीत को जीवित रखने व उनकी कीर्ति को प्रसारित करने में समर्थ हुआ। भारतीय संगीत के इतिहास में ध्रुपदकार के रूप में तानसेन का नाम सदैव अमर रहेगा। इसके साथ ही [[ब्रजभाषा]] के पद साहित्य का संगीत के साथ जो अटूट सम्बन्ध रहा है, उसके सन्दर्भ में भी तानसेन चिरस्मरणीय रहेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 &lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
(सहायक ग्रन्थ- &lt;br /&gt;
#संगीतसम्राट तानसेन (जीवनी और रचनाएँ): प्रभुदयाल मीतल, साहित्य संस्थान, मथुरा; &lt;br /&gt;
#हिन्दी साहित्य का इतिहास: पं. रामचन्द्र शुक्ल: &lt;br /&gt;
#अकबरी दरबार के हिन्दी कबि: डा. सरयू प्रसाद अग्रवाल।)&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://books.google.co.in/books?id=KAwIUVCKk2wC&amp;amp;pg=PA32&amp;amp;lpg=PA32&amp;amp;dq=%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%88%E0%A4%A8%E0%A5%80+%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A3%E0%A5%80&amp;amp;source=bl&amp;amp;ots=uUArqzrJTi&amp;amp;sig=mSyDMDijmv_k74xjyCkMCO63CH4&amp;amp;hl=en&amp;amp;ei=-luZTfKaLIblrAfBssXsCw&amp;amp;sa=X&amp;amp;oi=book_result&amp;amp;ct=result&amp;amp;resnum=1&amp;amp;ved=0CBcQ6AEwAA#v=onepage&amp;amp;q=%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%88%E0%A4%A8%E0%A5%80%20%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A3%E0%A5%80&amp;amp;f=false हिंदुस्तानी संगीत में तानसेन का स्थान]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अकबर के नवरत्न}}&lt;br /&gt;
{{शास्त्रीय गायक कलाकार}}{{मुग़ल साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:संगीतज्ञ]][[Category:मुग़ल साम्राज्य]][[Category:अकबर के नवरत्न]][[Category:शास्त्रीय गायक कलाकार]][[Category:मध्य काल]]&lt;br /&gt;
[[Category:संगीत कोश]][[Category:चरित कोश]][[Category:कला कोश]][[Category:इतिहास कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>तानसेन</title>
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		<updated>2016-02-08T15:53:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: /* जीविकोपार्जन */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा कलाकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Akbar-Tansen-Haridas.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=तानसेन&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=रामतनु पाण्डेय&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=तन्ना उर्फ तनसुख उर्फ त्रिलोचन&lt;br /&gt;
|जन्म=1504 से 1509 ई. के बीच&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=ग्राम बेहट, [[ग्वालियर]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=1585 ई.&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=दिल्ली&lt;br /&gt;
|अभिभावक=श्री मकरंद पांडे &lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=संगीतज्ञ&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ='संगीतसार', 'रागमाला' और 'श्रीगणेश स्तोत्र'।&lt;br /&gt;
|मुख्य फ़िल्में=&lt;br /&gt;
|विषय=संगीत&lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''संगीत सम्राट तानसेन''' (जन्म- संवत 1563, बेहट ग्राम; मृत्यु- संवत 1646) की गणना [[भारत]] के महान गायकों, [[मुग़लकालीन संगीत|मुग़ल संगीत]] के संगीतकारों एवं बेहतरीन संगीतज्ञों में की जाती है। तानसेन का नाम [[अकबर]] के प्रमुख संगीतज्ञों की सूची में सर्वोपरि है। तानसेन दरबारी कलाकारों का मुखिया और [[अकबर के नवरत्न|सम्राट के नवरत्नों]] में से एक था। इस पर भी उसका प्रामाणिक जीवन-वृत्तांत अज्ञात है। यद्यपि काव्य-रचना की दृष्टि से तानसेन का योगदान विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता, परंतु [[संगीत]] और काव्य के संयोग की दृष्टि से, जो भक्तिकालीन काव्य की एक बहुत बड़ी विशेषता थी, तानसेन साहित्य के इतिहास में अवश्य उल्लेखनीय है। उसके जीवन की अधिकांश घटनाएँ किंवदंतियों एवं अनुश्रुतियों पर आधारित हैं। प्रसिद्ध कृष्ण-भक्त [[स्वामी हरिदास]] इनके दीक्षा-गुरु कहे जाते हैं। &amp;quot;[[वैष्णवन की वार्ता|चौरासी वैष्णवन की वार्ता]]&amp;quot; में [[सूरदास|सूर]] से इनके भेंट का उल्लेख हुआ है। &amp;quot;[[वैष्णवन की वार्ता|दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता]]&amp;quot; में गोसाई विट्ठलनाथ से भी इनके भेंट करने की चर्चा मिलती है। &lt;br /&gt;
==प्राचीन धरोहरों की रक्षा==&lt;br /&gt;
तानसेन अपनी दिव्य प्रभा फैलाकर भारतीय संगीत के गगनांगन पर उदय हुये और चले गये। हमारे देश में तानसेन भारतीय संगीत के वह सूर्य थे कि जिनके संगीत प्रकाश ने एक अपूर्व आभा फैलाई। [[ध्रुपद|ध्रुवपद]] गायकी हमारे देश की प्राचीन गायकी है और तानसेन इस गायकी के शीर्ष गायक थे। तानसेन और उनके संगीत के संबंध में आज भी गहन शोध की आवश्यकता है। भारतीय संगीत को आज के समय के संगीत, डिस्को, पॉप से बचाकर रखने की आवश्यकता है। हमें अपने प्राचीन संगीत की रक्षा करनी होगी क्योंकि हमारी पहचान हमारी संस्कृति से ही होगी। यह बहुत आवश्यक है कि हम अपनी प्राचीन धरोहरों की रक्षा करें।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://pustak.org/bs/home.php?bookid=5559 |title=तानसेन |accessmonthday=[[3 अप्रैल]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=भारतीय साहित्य संग्रह |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
तानसेन की जीवनी के सम्बन्ध में बहुत कम ऐसा वृत्त ज्ञात है, जिसे पूर्ण प्रामाणिक कहा जा सके। भारतीय संगीत के प्रसिद्ध गायक तानसेन का जन्म मुहम्मद ग़ौस नामक एक सिद्ध [[फ़क़ीर]] के आशीर्वाद से [[ग्वालियर]] से सात मील दूर एक छोटे-से गाँव बेहट में संवत 1563 में वहाँ के एक [[ब्राह्मण]] कुल में हुआ था।&amp;lt;ref&amp;gt;तानसेन की जन्म तिथि तथा सन् के बारे में विविध मत पाए जाते हैं। कुछ लेखक इनका जन्म सन् 1506 ई. और 1520 ई. बताते हैं।&amp;lt;/ref&amp;gt; इनके पिता का नाम मकरंद पांडे था। पांडित्य और संगीत-विद्या में लोकप्रिय होने के साथ-साथ मकरंद पांडे को धन-धान्य भी यथेष्ट रूप से प्राप्त था। तानसेन की माता पूर्ण साध्वी व कर्मनिष्ठ थीं। तानसेन का पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार से हुआ। एकमात्र संतान होने के कारण इनके माँ-बाप ने किसी प्रकार का कठोर नियंत्रण भी नहीं रखा। &lt;br /&gt;
====मूल नाम====&lt;br /&gt;
तानसेन का मूल नाम क्या था, यह निश्चय पूर्वक कहना कठिन है, किंवदंतियों के अनुसार उन्हें तन्ना, त्रिलोचन, तनसुख, अथवा रामतनु बतालाया जाता है। तानसेन इनाका नाम नहीं इनकी उपाधि थी, जो तानसेन को [[बांधवगढ़]] के राजा रामचंद्र से प्राप्त हुई थी। वह उपाधि इतनी प्रसिद्ध हुई कि उसने इनके मूल नाम को ही लुप्त कर दिया। इनका जन्म-संवत् भी विवादग्रस्त है। [[हिन्दी]] साहित्य में इनके जन्म की संवत 1588 की प्रसिद्धि है किंतु कुछ विद्वानों ने संवत 1563 माना है।&amp;lt;ref&amp;gt;दोसौ बावन वैष्णवन की वार्ता (द्वितीय खंड, पृष्ठ 156&amp;lt;/ref&amp;gt; तानसेन के मधुर कंठ और गायन शैली की ख्याति सुनकर 1562 ई. के लगभग अकबर ने उन्हें अपने दरबार में बुला लिया। [[अबुल फ़जल]] ने '[[आइना-ए-अकबरी]]' में लिखा है कि अकबर ने जब पहली बार तानसेन का गाना सुना तो प्रसन्न होकर पुरस्कार में दो लाख टके दिए। तानसेन के कई पुत्र थे, और एक पुत्री थी। पुत्रों में तानतरंग ख़ाँ, सुरतिसेन और विलास ख़ाँ के नाम प्रसिद्ध हैं। उनके पुत्रों एवं शिष्यों के द्वारा &amp;quot;हिन्दुस्तानी संगीत&amp;quot; की बड़ी उन्नति हुई थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संगीत शिक्षा==&lt;br /&gt;
तानसेन के आरंभिक काल में ग्वालियर पर कलाप्रिय राजा मानसिंह तोमर का शासन था। उनके प्रोत्साहन से ग्वालियर संगीत [[कला]] का विख्यात केन्द्र था, जहाँ पर [[बैजूबावरा]], कर्ण और महमूद जैसे महान संगीताचार्य और गायक गण एकत्र थे, और इन्हीं के सहयोग से राजा मानसिंह तोमर ने संगीत की [[ध्रुपद]] गायकी का आविष्कार और प्रचार किया था। तानसेन को संगीत की शिक्षा ग्वालियर में वहाँ के कलाविद् राजा मानसिंह तोमर के किसी विख्यात संगीताचार्य से प्राप्त हुई थी। गौस मुहम्मद को उसका संगीत-गुरु बतलाना अप्रमाणित सिद्ध हो गया है। उस सूफी संत के प्रति इनकी श्रद्धा भावना रही हो, यह संभव जान पड़ता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ग्वालियर]] राज्य का पतन हो जाने पर वहाँ के संगीताचार्यों की मंडली बिखरने लगी थी। उस परिस्थिति में तानसेन को ग्वालियर में उच्च शिक्षा प्राप्त करना संभव ज्ञात नहीं हुआ। वह वृंदावन चले गए थे, जहाँ उसने संभवतः स्वामी हरिदास जी से संगीत की उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। [[वल्लभ संप्रदाय|वल्लभ संप्रदायी]] वार्ता के अनुसार तानसेन ने अपने उत्तर जीवन में [[अष्टछाप कवि|अष्टछाप के संगीताचार्या]] [[गोविंदस्वामी]] से भी कीर्तन पद्धति का गायन सीखा था।&amp;lt;ref&amp;gt;[[अकबरनामा]] ([[अंग्रेज़ी]] अनुवाद) जिल्द 2, पृष्ठ 880&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====आश्चर्यजनक प्रतिभा====&lt;br /&gt;
तानसेन दस वर्ष की अवस्था तक पूर्णरूपेण स्वतंत्र, सैलानी व नटखट प्रकृति के हो गए थे। इस बीच इनके अन्दर एक आश्चर्यजनक प्रतिभा देखी गई, वह थी आवाज़ों की हू-ब-हू नक़ल करना। किसी भी पशु-पक्षी की आवाज़ की नक़ल कर लेना इनका खेल था। [[सिंह|शेर]] की बोली बोलकर अपने बाग़ की रखवाली करने में इन्हें बड़ा मज़ा आया करता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन [[वृन्दावन]] के महान संगीतकार सन्न्यासी [[स्वामी हरिदास]] जी अपनी शिष्य-मंडली के साथ उक्त बाग़ में होकर गुज़रे, तो बालक &amp;quot;तन्ना&amp;quot; ने एक पेड़ की आड़ में छुपकर शेर जैसी दहाड़ लगाई। डर के मारे सब लोगों के दम फूल गये स्वामी जी को उस स्थान पर शेर रहने का विश्वास नहीं हुआ और तुरंत खोज की। उन्हें दहाड़ता हुआ बालक मिल गया। बालक के इस क़ौतुक पर स्वामी जी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने जब अन्य पशु-पक्षियों की आवाज़ भी बालक से सुनी, तो मुग्ध हो गए और उसके पिताजी से बालक को संगीत-शिक्षा देने के निमित्त माँग-कर अपने साथ ही वृदावन ले आए। गुरु की कृपा से 10 वर्ष की अवधि में ही बालक तन्ना धुरंधर गायक बन गया और यहीं से इसका नाम &amp;quot;तन्ना&amp;quot; की बजाय &amp;quot;तानसेन&amp;quot; हो गया। गुरुजी का आशीर्वाद पाकर तानसेन ग्वालियर  लौट आए। इसी समय इनके पिताजी की मृत्यु हो गई। मृत्यु से पूर्व पिता ने तानसेन को उपदेश दिया कि तुम्हारा जन्म मुहम्मद ग़ौस नामक फ़क़ीर की कृपा से हुआ है इसलिए तुम्हारे शरीर पर पूर्ण अधिकार उसी फ़क़ीर का है। अपनी ज़िन्दगी में उस फ़क़ीर की आज्ञा की कभी अवहेलना मत करना। पिता का उपदेश मानकर तानसेन फ़क़ीर मुहम्मद ग़ौस के पास आ गए। फ़क़ीर साहब ने तानसेन को अपना उत्तराधिकारी बनाकर अपना अतुल वैभव आदि सब कुछ उन्हें सौंप दिया और अब तानसेन ग्वालियर में ही रहने लगे।&lt;br /&gt;
==विवाह==&lt;br /&gt;
तानसेन का परिचय राजा मानसिंह की विधवा पत्नी रानी मृगनयनी से हुआ। रानी मृगनयनी भी बड़ी मधुर तथा विदुषी गायिका थीं। वे तानसेन का गायन सुन कर बहुत प्रभावित हुईं। उन्होंने अपने संगीत-मंदिर में शिक्षा पाने वाली हुसैनी ब्राह्मणी नामक एक सुमधुर गायिका लड़की के साथ तानसेन का [[विवाह]] कर दिया। हुसैनी का वास्तविक नाम प्रेमकुमारी था। हुसैनी के पिता सारस्वत [[ब्राह्मण]] थे, किंतु बाद में यह अपरिवार मुस्लिम [[धर्म]] में दीक्षित हो गए। प्रेमकुमारी का इस्लामी नाम हुसैनी रखा गया। ब्राह्मणी कन्या होने के कारण सभी उसे हुसैनी ब्राह्मणी कहकर पुकारते थे, इसी से तानसेन का घराना 'हुसैनी घराना' कहा जाने लगा था।&lt;br /&gt;
====संगीत कला के संस्कार====&lt;br /&gt;
विवाह के पश्चात् तानसेन पुनः अपने गुरु जी के आश्रम (वृन्दावन) में शिक्षा प्राप्त करने पहुँचे। इसी समय फ़क़ीर मुहम्मद ग़ौस का अंतिम समय निकट आ गया। फलस्वरूप गुरु जी के आदेश पर तानसेन को तुरंत ग्वालियर वापस आना पड़ा। फ़क़ीर साहब की मृत्यु हो गई और तानसेन एक विशाल संपत्ति के अधिकारी बन गए। वह ग्वालियर में रहकर आनंदपूर्वक गृहस्थ-जीवन व्यतीत करने लगे। तानसेन के चार पुत्र और एक पुत्री का जन्म हुआ। पुत्रों का नाम- सुरतसेन, तरंगसेन, शरतसेन, और विलास ख़ाँ तथा लड़की का नाम सरस्वती रखा गया। तानसेन की सभी संतानें संगीत-कला के संस्कार लेकर पैदा हुईं। सभी बच्चे उत्कृष्ट कलाकार हुए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संगीत-साधना पूर्ण होने के बाद सर्वप्रथम तानसेन को रीवा-नरेश रामचन्द्र (राजाराम) अपने दरबार में ले गए। इन्हीं दिनों तानसेन का सौभाग्य-सूर्य चमक उठा। महाराजा ने तानसेन जैसे दुर्लभ रत्न को बादशाह अकबर को भेंट कर कर दिया। सन् 1556 ई. में तानसेन अकबर के दरबार में [[दिल्ली]] गए। बादशाह ऐसे अमूल्य रत्न को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुआ और तानसेन को उसने अपने नवरत्नों में सम्मिलित कर लिया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीविकोपार्जन==&lt;br /&gt;
संगीत कला में पारंगत होने पर तानसेन को जीविकोपार्जन की चिंता हुई। ऐसा ज्ञात होता है, वह सर्वप्रथम सुलतान इस्लामशाह सूर के स्नेह-पात्र दौलतखां के आश्रय रहा था। उसी समय वह [[मुहम्मद आदिलशाह]] (अदली) सूर के संपर्क में आया था, जिसकी संगीतज्ञता के कारण उसे वह गुरुवत् मानता था। सूरी सल्तनत की समाप्ति होने पर वह बांधवगढ़ के राजा रामचंद्र की संगीत-प्रियता और गुण-ग्राहकता की ख्याति सुन कर उसके दरबार में चला गया था। बांधव-नरेश ने उन्हें बड़े आदर पूर्वक रखा। वहाँ पर उन्हें विपुल धन-वैभव तथा आदर-सम्मान प्राप्त हुआ, और उनकी व्यापक प्रसिद्धि हुई। संवत 1620 में उसे सम्राट अकबर ने अपने दरबार में बुला लिया था। उस समय उसकी आयु 50 वर्ष से कुछ अधिक थी। फिर वह अपने देहावसान काल तक अकबर के आश्रय में ही रहा था।[[चित्र:tansen.gif|thumb|left|[[ग्वालियर]] में  [[तानसेन]]  का मकबरा]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मुसलमान होने की किंवदंती==&lt;br /&gt;
[[हिन्दू]] कुल में जन्म लेने पर भी बाद में तानसेन के मुसलमान होने की किंवदंती प्रचलित है। किंतु इसका समर्थन किसी भी समकालीन इतिहासकार के ग्रंथ से नहीं होता है। ऐसा जान पड़ता है, इनका मुसलमानों के साथ अधिक संपर्क और सहवास तथा उनके खान-पान की स्वच्छता के कारण उस समय रूढ़िवादी हिन्दुओं ने उनका वहिष्कार कर उन्हें मुसलमान घोषित कर दिया था। वह कभी मुसलमान हुए हो, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है। तानसेन की मृत्यु होने पर उसकी शवयात्रा का जैसा वर्णन [[अबुल फ़जल]] ने किया है, उससे सिद्ध होता है कि वह अपने अंतिम काल तक भी हिन्दू रहे थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तानसेन के वंशजों ने अवश्य मुसलमानी मज़हब स्वीकार कर लिया था। उनकी वंश-परंपरा में कुछ नाम हिन्दुओं के से मिलते हैं और उनमें हिन्दुओं की सी कई रीतिरिवाजें प्रचलित हैं। इनसे समझा जा सकता है कि मुसलमान हो जाने पर भी वे अपने पूर्वजों की हिन्दू परंपरा का पूर्णतया परित्याग नहीं कर सके थे। &lt;br /&gt;
==अकबरनामा के अनुसार== &lt;br /&gt;
'[[अकबरनामा]]' के अनुसार तानसेन की मृत्यु अकबरी शासन में 34वें वर्ष अर्थात संवत 1646 में [[आगरा]] में हुई थी। उनका संस्कार भी संभवतः वहीं पर [[यमुना]] तट पर किया गया होगा। कालांतर में उनके जन्मस्थान [[ग्वालियर]] में स्मारक स्वरूप उनकी समाधि उनके श्रद्धा-भाजन गौस मुहम्मद के मक़बरे के समीप बनाई गई, जो अब भी विद्यमान है। तानसेन की आयु उसकी मृत्यु के समय 83 वर्ष के लगभग थी। और वह प्रायः 26 वर्ष तक अकबरी दरबार में संबद्ध रहा था। उसके कई पुत्र थे, एक पुत्री थी और अनेक शिष्य थे। पुत्रों में तानतरंग ख़ाँ, सुरतसंन और विलास ख़ाँ, के नाम से प्रसिद्ध हैं। पुत्रों में तानतरंग ख़ाँ, और शिष्यों में मियाँ चाँद के नाम [[अकबर]] के प्रमुख दरबारी संगीतज्ञों में मिलते हैं। &lt;br /&gt;
==रचनाएँ==&lt;br /&gt;
====नये रागों का आविष्कार====&lt;br /&gt;
तानसेन ग्वालियर परंपरा की ''मूर्च्छना'' पद्धति के एवं [[ध्रुपद]] शैली के विख्यात गायक और कई रागों के विशेषज्ञ थे। इनको [[ब्रज]] की कीर्तन पद्धति का भी पर्याप्त ज्ञात था। साथ ही वह ईरानी संगीत की ''मुकाम'' पद्धति से भी परिचित थे। उन सब के समंवय से उसने अनेक नये रागों का आविष्कार किया था, जिनमें &amp;quot;मियाँ की मलार&amp;quot; अधिक प्रसिद्ध है। तानसेन के गायन की प्रशंसा में कई चमत्कारपूर्ण किंवदंतियाँ प्रचलित हैं, किंतु उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। &lt;br /&gt;
====ध्रुपदों की रचना====&lt;br /&gt;
तानसेन गायक होने के साथ ही कवि भी थे। उसने अपने गान के लिए स्वयं बहुसंख्यक ध्रुपदों की रचना की थी। उनमें से अनेक ध्रुपद संगीत के विविध ग्रंथों में और कलावंतों के पुराने घरानों में सुरक्षित हैं। तानसेन के नाम से &amp;quot;संगीत-सार'' और &amp;quot;राग-माला&amp;quot; नामक दो ग्रंथ भी मिलते हैं&amp;lt;ref&amp;gt;लेखक कृत [[ब्रज]] की कलाओं का इतिहास, पृष्ठ 448-450&amp;lt;/ref&amp;gt;।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रंथ &amp;quot;संगीत-सम्राट तानसेन&amp;quot; में उसके रचे हुए 288 ध्रुपदों का संकलन है। ये ध्रुपद विविध विषयों से संबंधित हैं। इसके अतिरिक्त उनके ग्रंथ &amp;quot;संगतिदार&amp;quot; और &amp;quot;रागमाला&amp;quot; भी संकलित हैं। यहाँ पर तानसेन कृत &amp;quot;कृष्ण लीला&amp;quot; के कुछ ध्रुपद उदाहरणार्था प्रस्तुत हैं- &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;पलना-झूलन&amp;lt;/u&amp;gt;- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
हमारे लला के सुरंग खिलौना, खेलत, खेलत कृष्ण कन्हैया। &lt;br /&gt;
अगर-चंदन कौ पलना बन्यौ है, हीरा-लाल-जवाहर जड़ैया॥ &lt;br /&gt;
भँवरी-भँवरा, चट्टा-बट्टा, हंस-चकोर, अरू मोर-चिरैया॥&lt;br /&gt;
तानसेन प्रभु जसोमति झुलावै, दोऊ कर लेत बलैया।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
;&amp;lt;u&amp;gt;गो-चारन&amp;lt;/u&amp;gt;- &lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
धौरी-ध्रुमर, पीयरी-काजर कहि-कहि टेंरै। &lt;br /&gt;
मोर मुकट सीस, स्त्रवन कुंडल कटि में पीतांबर पहिरै॥                                                                                                                                                           ग्वाल-बाल सब सखा संग के, लै आवत ब्रज नैरै। &lt;br /&gt;
&amp;quot;तानसेन&amp;quot; प्रभु मुख रज लपटानी जसुमति निरखि मुख है रै।&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
आजु हरि लियै अनहिली गैया, एक ही लकुटि सों हाँकी॥ &lt;br /&gt;
ज्यों-ज्यों रोकी मोहन तुम सोई, त्यों-त्यों अनुराग हियं देखत मुखां की। &lt;br /&gt;
हम जो मनावत कहूँ तूम मानत, वे बतियाँ गढ़ि बॉकी॥ &lt;br /&gt;
तृन नहीं चरत, बछरा नहीं चौखत की, &lt;br /&gt;
हम कहा जानै, को है कहाँ की। &lt;br /&gt;
तानसेन प्रभु वेगि दरस दीजै सब मंतर पढ़ि आँकी॥&amp;lt;ref&amp;gt;लेखक कृत &amp;quot;संगीत सम्राट तानसेन&amp;quot; ध्रुपद सं. 253, 255,और 256 &amp;lt;/ref&amp;gt; &amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
प्रथम उठ भोरही राधे-किशन कहो मन, जासों होवै सब सिद्ध काज। &lt;br /&gt;
इहि लोक परलोक के स्वामी, ध्यान धरौ ब्रजराज॥&lt;br /&gt;
पतित उद्धारन जन प्रतिपालन, दीनदयाल नाम लेत जाय दुख भाज। &lt;br /&gt;
&amp;quot;तानसेन&amp;quot; प्रभु कों सुमरों प्रातहिं, जग में रहै तेरी लाज॥ &lt;br /&gt;
मुरली बजावै, आपन गावै, नैन न्यारे नंचावै, तियन के मन कों रिझावै। &lt;br /&gt;
दूर-दूर आवै पनघट, काहु के धटन दुरावै, रसना प्रेम जनावै॥ &lt;br /&gt;
मोहिनी मूरत, सांवती सूरत, देखत ही मन ललचावै। &lt;br /&gt;
&amp;quot;तानसेन&amp;quot; के प्रभु तुम बहुनायक, सबहिंन के मन भावै॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==असीम संभावनाएँ निहित==&lt;br /&gt;
हर युग एक महान गायक हुआ करता है। तानसेन सिर्फ एक महान गायक ही नहीं बल्कि एक महान संगीतशास्त्री एवं रागों के रचयिता भी थे। जाति एवं रागों की प्राचीन मान्यताओं को तोड़ कर नये प्रयोगों की परंपरा को प्रारम्भ करने में वे अग्रणी थे। भारतीय संगीत में स्वरलिपि की कोई पद्धति नहीं होने के कारण प्राचीन गायकों की स्वररचना को जानने का कोई साधन नहीं है। संगीत के क्षेत्र में आज भी तानसेन का प्रभाव जीवित है। उसका कारण है ‘‘मियाँ की मल्हार’’ ‘‘दरबारी कानडा’’ और ‘‘मियाँ की तोड़ी’’ जैसी मौलिक स्वर रचनाओं का सदाबहार आकर्षण। उस समय के लोकप्रिय राग ध्रुपद की समृद्धता का कारण भी तानसेन की प्रतिभा ही थी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तानसेन के दीपक राग से दीप के जल उठने एवं राग मेघ-मल्हार से वर्षा होने की किंवदंतियों के ऐतिहासिक प्रमाण भले ही न हों, किन्तु उनमें इस सत्यता का अंश ज़रूर है कि अगर तानसेन जैसा महान गायक हो तो संगीत में असीम संभावनाएँ निहित हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://pustak.org/bs/home.php?bookid=4974 |title=तानसेन |accessmonthday=[[3 अप्रैल]] |accessyear=[[2011]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=भारतीय साहित्य संग्रह |language=[[हिन्दी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अकबर के नवरत्न==&lt;br /&gt;
[[अकबर के नवरत्न|अकबर के नवरत्नों]] तथा [[मुग़ल काल|मुग़लकालीन]] संगीतकारों में तानसेन का नाम परम-प्रसिद्ध है। यद्धपि काव्य-रचना की दृष्टि से तानसेन का योगदान विशेष महत्त्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता, परन्तु [[संगीत]] और काव्य के संयोग की दृष्टि से, जो भक्तिकालीन काव्य की एक बहुत बड़ी विशेषता थी, तानसेन [[साहित्य]] के इतिहास में अवश्य उल्लेखनीय है। तानसेन [[अकबर]] के नवरत्नों में से एक थे। एक बार अकबर ने उनसे कहा कि वो उनके गुरु का संगीत सुनना चाहते हैं। गुरु हरिदास तो अकबर के दरबार में आ नहीं सकते थे। लिहाज़ा इसी निधि वन में अकबर हरिदास का संगीत सुनने आए। हरिदास ने उन्हें कृष्ण भक्ति के कुछ भजन सुनाए थे। अकबर हरिदास से इतने प्रभावित हुए कि वापस जाकर उन्होंने तानसेन से अकेले में कहा कि आप तो अपने गुरु की तुलना में कहीं आस-पास भी नहीं है। फिर तानसेन ने जवाब दिया कि जहांपनाह हम इस ज़मीन के बादशाह के लिए गाते हैं और हमारे गुरु इस ब्रह्मांड के बादशाह के लिए गाते हैं तो फ़र्क़ तो होगा न। &lt;br /&gt;
==रचनाएँ==&lt;br /&gt;
तानसेन के नाम के संबंध में मतैक्य नहीं है। कुछ का कहना है कि 'तानसेन' उनका नाम नहीं, उनकों मिली उपाधि थी। तानसेन मौलिक कलाकार थे। वे स्वर-ताल में गीतों की रचना भी करते थे। तानसेन के तीन ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है- &lt;br /&gt;
#'संगीतसार', &lt;br /&gt;
#'रागमाला' और &lt;br /&gt;
#'श्रीगणेश स्तोत्र'।&lt;br /&gt;
==दीपक राग==&lt;br /&gt;
यह तानसेन का शौर्यकाल था। बादशाह का अटूट स्नेह और सम्मान पाकर तानसेन की यश-पताका उन्मुक्त होकर लहराने लगी। [[अकबर]] तानसेन के [[संगीत]] का ग़ुलाम बन गया। काला-पारखी अकबर तानसेन की संगीत-माधुरी में डूब गया। बादशाह पर तानसेन का ऐसा पक्का रंग सवार देख कर दूसरे दरबारी गायक जलने लगे और एक दिन उन्होंने तानसेन के विनाश की योजना बना डाली। किंवदंती है कि ये सब लोग बादशाह के पास पहुँचकर कहने लगे- &amp;quot;हुज़ूर, हमें तानसेन से 'दीपक' राग सुनवाया जाए और आप भी सुनें। इसको तानसेन के अलावा और कोई ठीक-ठीक नहीं गा सकता।&amp;quot; बादशाह राज़ी हो गए। तानसेन द्वारा इस राग का अनिष्टकारक परिणाम बताए जाने और लाख मना करने पर भी अकबर का राजहट नहीं टला और उसे दीपक राग गाना ही पड़ा। राग जैसे-ही शुरू हुआ, गर्मी बढ़ी व धीरे-धीरे वायुमंडल अग्निमय हो गया। सुनने वाले अपने-अपने प्राण बचाने को इधर-उधर छिप गए, किंतु तानसेन का शरीर अग्नि की ज्वाला से जल उठा। उसी समय तानसेन अपने घर भागे। वहाँ उनकी लड़की तथा एक गुरुभगिनी ने मेघ राग गाकर उनके जीवन की रक्षा की। इस घटना के कई मास पश्चात् तानसेन का शरीर स्वस्थ हुआ। अकबर भी अपनी ग़लती पर बहुत पछताया। &lt;br /&gt;
==चमत्कारी घटनाएँ==&lt;br /&gt;
यह कहा जाता है कि तानसेन के जीवन में पानी बरसाने, जंगली पशुओं को मंत्र- मुग्ध करने तथा रोगियों को ठीक करने आदि की अनेक संगीत-प्रधान चमत्कारी घटनाएँ हुईं। यह निर्विवाद सत्य है कि गुरु-कृपा से उन्हें बहुत-सी राग-रागनियाँ सिद्ध थीं। और उस समय देश में तानसेन जैसा दूसरा कोई [[संगीतज्ञ]]  नहीं था। तानसेन ने व्यक्तिगत रूप से कई रागों का निर्माण भी किया, जिनमें दरबारी कान्हड़ा, मियाँ की सारंग मियाँमल्लार आदि उल्लेखनीय हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
इस प्रकार अमर संगीत की सुखद वैखरी बहाता हुआ यह महान [[संगीतज्ञ]]  मृत्यु के निकट भी आ पहुँचा। [[दिल्ली]] में ही तानसेन ज्वर से पीड़ित हुए। तानसेन ने अपना अंतिम समय जानकर [[ग्वालियर]] जाने की इच्छा प्रकट की, परंतु बादशाह के मोह और स्नेह के कारण तानसेन [[फ़रवरी]], सन् 1585 ई. में दिल्ली में ही स्वर्गवासी हो गए। इच्छानुसार तानसेन का शव ग्वालियर पहुँचाया गया और मुहम्मद ग़ौस की क़ब्र के बराबर उनकी समाधि बना दी गई। तानसेन की मृत्यु के पश्चात् उनका कनिष्ठ पुत्र विलास ख़ाँ तानसेन के संगीत को जीवित रखने व उनकी कीर्ति को प्रसारित करने में समर्थ हुआ। भारतीय संगीत के इतिहास में ध्रुपदकार के रूप में तानसेन का नाम सदैव अमर रहेगा। इसके साथ ही [[ब्रजभाषा]] के पद साहित्य का संगीत के साथ जो अटूट सम्बन्ध रहा है, उसके सन्दर्भ में भी तानसेन चिरस्मरणीय रहेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति &lt;br /&gt;
|आधार=&lt;br /&gt;
|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 &lt;br /&gt;
|माध्यमिक= &lt;br /&gt;
|पूर्णता= &lt;br /&gt;
|शोध=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{संदर्भ ग्रंथ}}&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
(सहायक ग्रन्थ- &lt;br /&gt;
#संगीतसम्राट तानसेन (जीवनी और रचनाएँ): प्रभुदयाल मीतल, साहित्य संस्थान, मथुरा; &lt;br /&gt;
#हिन्दी साहित्य का इतिहास: पं. रामचन्द्र शुक्ल: &lt;br /&gt;
#अकबरी दरबार के हिन्दी कबि: डा. सरयू प्रसाद अग्रवाल।)&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://books.google.co.in/books?id=KAwIUVCKk2wC&amp;amp;pg=PA32&amp;amp;lpg=PA32&amp;amp;dq=%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%88%E0%A4%A8%E0%A5%80+%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A3%E0%A5%80&amp;amp;source=bl&amp;amp;ots=uUArqzrJTi&amp;amp;sig=mSyDMDijmv_k74xjyCkMCO63CH4&amp;amp;hl=en&amp;amp;ei=-luZTfKaLIblrAfBssXsCw&amp;amp;sa=X&amp;amp;oi=book_result&amp;amp;ct=result&amp;amp;resnum=1&amp;amp;ved=0CBcQ6AEwAA#v=onepage&amp;amp;q=%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%88%E0%A4%A8%E0%A5%80%20%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A3%E0%A5%80&amp;amp;f=false हिंदुस्तानी संगीत में तानसेन का स्थान]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अकबर के नवरत्न}}&lt;br /&gt;
{{शास्त्रीय गायक कलाकार}}{{मुग़ल साम्राज्य}}&lt;br /&gt;
[[Category:संगीतज्ञ]][[Category:मुग़ल साम्राज्य]][[Category:अकबर के नवरत्न]][[Category:शास्त्रीय गायक कलाकार]][[Category:मध्य काल]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>निदा फ़ाज़ली</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: /* जीवन परिचय */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Nida Fazli.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=निदा फ़ाज़ली &lt;br /&gt;
|पूरा नाम=मुक़्तिदा हसन निदा फ़ाज़ली&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म= [[12 अक्तूबर]] [[1938]] {{आयु|आयु=1938 }}&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[दिल्ली]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=&lt;br /&gt;
|अभिभावक=&lt;br /&gt;
|पालक माता-पिता=&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[भारत]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=उर्दू शायर, गीतकार&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=काव्य संग्रह- खोया हुआ सा कुछ, लफ़्ज़ों के फूल, आँखों भर आकाश, मोर नाच आदि&lt;br /&gt;
|विषय=&lt;br /&gt;
|भाषा=[[हिंदी]], [[उर्दू]], [[अंग्रेज़ी]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=ग्वालियर कॉलेज&lt;br /&gt;
|शिक्षा=स्नातकोत्तर &lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि= [[1998]] में साहित्य अकादमी पुरस्कार - (खोया हुआ सा कुछ)&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन={{अद्यतन|19:41, 29 दिसम्बर 2012 (IST)}}&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''निदा फ़ाज़ली''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''Nida Fazli'', जन्म: [[12 अक्तूबर]] [[1938]]) आधुनिक [[उर्दू]] शायरी के बहुत ही लोकप्रिय शायर हैं। यह शायर [[हिन्दी]] के पाठकों के लिए भी उतना ही सुपरिचित है जितना उर्दू के पाठकों के लिए। इनका पूरा नाम मुक़्तिदा हसन निदा फ़ाज़ली है, जो बाद में निदा फ़ाज़ली के रूप में प्रसिद्ध हुआ। निदा फ़ाज़ली इनका लेखन का नाम है। निदा का अर्थ है स्वर/ आवाज़/ Voice। फ़ाज़िला [[कश्मीर]] के एक इलाके का नाम है जहाँ से निदा के पूर्वज आकर [[दिल्ली]] में बस गए थे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में फ़ाज़ली जोड़ा।&amp;lt;ref name=&amp;quot;SKS&amp;quot;/&amp;gt; &lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
निदा फ़ाज़ली का जन्म [[दिल्ली]] में [[12 अक्तूबर]] [[1938]] को हुआ था। इनकी स्कूली शिक्षा [[ग्वालियर]] में हुई थी। निदा फ़ाज़ली के पिता एक शायर थे, जो [[भारत का विभाजन|भारत विभाजन]] के समय [[पाकिस्तान]] चले गए। भारतीयता के पोषक निदा फ़ाज़ली भारता को छोड़कर पाकिस्तान नहीं गए और आज भी इस देश को अपनी रचनात्मक प्रतिभा से समृद्ध कर रहे हैं। निदा फ़ाज़ली गज़लों के साथ दोहे भी बखूबी कहते हैं, नज़्मों में भी इन्हें महारत हासिल है। 1960 के दशक के दौरान अपने समकालीन शायरों [[कैफ़ी आज़मी]], [[अली सरदार जाफ़री|सरदार अली जाफ़री]] और [[साहिर लुधियानवी]] पर एक समीक्षात्मक किताब मुलाकातें भी निदा फ़ाज़ली ने लिखी है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;SKS&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://sunaharikalamse.blogspot.in/2012/05/blog-post.html |title=लोकप्रिय भारतीय शायर -निदा फ़ाज़ली |accessmonthday=29 दिसम्बर |accessyear=2012 |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher=सुनहरी कलम से (ब्लॉग) |language= हिंदी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;उनकी एक ही बेटी है जिसका नाम तहरीर है। &lt;br /&gt;
निदा फ़ाज़ली की मृत्यु [[8 फरवरी]] [[2016]] को [[मुम्बई]] हुयी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आरम्भिक जीवन==&lt;br /&gt;
सन [[1946]] में जीविका की तलाश में निदा फ़ाज़ली [[मुम्बई]] का रुख़ किया। मुम्बई में प्रारम्भिक दिनों में [[धर्मयुग पत्रिका|धर्मयुग]] और ब्लिट्ज में आलेख भी लिखे। मुम्बई में रहते हुए मुशायरों में भी बेहद लोकप्रियता हासिल की। फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' के निर्माण के समय शायर जानिसार अख्तर के निधन के बाद फ़िल्म निर्माता [[कमाल अमरोही]] ने इन्हें गीत लिखने के लिए अवसर दिया। इनके लिखे गीत काफ़ी लोकप्रिय भी हुए। इसके बाद आज तक इनके फ़िल्मी गीत लेखन का सफ़र जारी है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;SKS&amp;quot;/&amp;gt; &lt;br /&gt;
==भाषा शैली==&lt;br /&gt;
निदा फ़ाज़ली की शायरी की भाषा आम आदमी को भी समझ में आ जाती है। यह कवि /शायर सहज भाषा में गूढ़ से गूढ़ बात कहने में माहिर है। निदा फ़ाज़ली एक सूफ़ी शायर हैं [[रहीम]], [[कबीर]] और [[मीरा]] से प्रभावित होते हैं तो [[मीर]] और [[ग़ालिब]] भी इनमें रच- बस जाते हैं। निदा फाज़ली की शायरी की जमीन विशुद्ध भारतीय है। वो छोटी उम्र से ही लिखने लगे थे। जब वह पढ़ते थे तो उनके सामने की पंक्ति में एक लड़की बैठा करती थी जिससे वो एक अनजाना, अनबोला सा रिश्ता अनुभव करने लगे थे। लेकिन एक दिन कॉलेज के बोर्ड पर एक नोटिस दिखा &amp;quot;Miss Tondon met with an accident and has expired&amp;quot; (कुमारी टंडन का एक्सीडेण्ट हुआ और उनका देहान्त हो गया है)। निदा बहुत दु:खी हुए और उन्होंने पाया कि उनका अभी तक का लिखा कुछ भी उनके इस दुख को व्यक्त नहीं कर पा रहा है, ना ही उनको लिखने का जो तरीक़ा आता था उसमें वो कुछ ऐसा लिख पा रहे थे जिससे उनके अंदर का दुख की गिरहें खुलें। एक दिन सुबह वह एक मंदिर के पास से गुजरे जहाँ पर उन्होंने किसी को [[सूरदास]] का भजन मधुबन तुम क्यौं रहत हरे? बिरह बियोग स्याम सुंदर के ठाढ़े क्यौं न जरे? गाते सुना, जिसमें [[कृष्ण]] के [[मथुरा]] से [[द्वारका]] चले जाने पर उनके वियोग में डूबी [[राधा]] और गोपियाँ फुलवारी से पूछ रही होती हैं ऐ फुलवारी, तुम हरी क्यों बनी हुई हो? कृष्ण के वियोग में तुम खड़े-खड़े क्यों नहीं जल गईं? वह सुन कर निदा को लगा कि उनके अंदर दबे हुए दुख की गिरहें खुल रही है। फिर उन्होंने [[कबीरदास]], [[तुलसीदास]], बाबा फ़रीद इत्यादि कई अन्य कवियों को भी पढ़ा और उन्होंने पाया कि इन कवियों की सीधी-सादी, बिना लाग लपेट की, दो-टूक भाषा में लिखी रचनाएँ अधिक प्रभावकारी है जैसे सूरदास की ही उधो, मन न भए दस बीस। एक हुतो सो गयौ स्याम संग, को अराधै ते ईस॥ तब से वैसी ही सरल भाषा सदैव के लिए उनकी अपनी शैली बन गई।&amp;lt;ref name=&amp;quot;कविता कोश&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==प्रमुख कृतियाँ==&lt;br /&gt;
निदा फ़ाज़ली की कुछ प्रमुख कृतियाँ -आँखों भर आकाश, मौसम आते जाते हैं, खोया हुआ सा कुछ, लफ़्ज़ों के फूल, मोर नाच, आँख और ख़्वाब के दरमियाँ, सफ़र में धूप तो होगी आदि। &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+निदा फ़ाज़ली की रचनाएँ&amp;lt;ref name=&amp;quot;कविता कोश&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://www.kavitakosh.org/kk/%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%AB%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%9C%E0%A4%BC%E0%A4%B2%E0%A5%80_/_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%AF#.UN7orOQ3sac |title=निदा फ़ाज़ली / रचनाएँ|accessmonthday=29 दिसम्बर |accessyear=2012 |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher=कविता कोश |language= हिंदी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
! प्रसिद्ध फ़िल्मी गीत और ग़ज़ल&lt;br /&gt;
! काव्य संग्रह&lt;br /&gt;
! आत्मकथा और संस्मरण&lt;br /&gt;
! संपादन&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot; &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
*तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा गम मेरी हयात है (फ़िल्म- रज़िया सुल्ताना) &lt;br /&gt;
*आई ज़ंजीर की झन्कार, ख़ुदा ख़ैर कर (फ़िल्म- रज़िया सुल्ताना)&lt;br /&gt;
*होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है (फ़िल्म- सरफ़रोश)&lt;br /&gt;
*कभी किसी को मुक़म्मल जहाँ नहीं मिलता (फ़िल्म- आहिस्ता-आहिस्ता) &lt;br /&gt;
* तू इस तरह से मेरी ज़िंदग़ी में शामिल है (फ़िल्म- आहिस्ता-आहिस्ता)&lt;br /&gt;
*चुप तुम रहो, चुप हम रहें (फ़िल्म- इस रात की सुबह नहीं)&lt;br /&gt;
*दुनिया जिसे कहते हैं, मिट्टी का खिलौना है (ग़ज़ल)&lt;br /&gt;
*हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी (ग़ज़ल)&lt;br /&gt;
*अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये (ग़ज़ल)&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
* लफ़्ज़ों के फूल (पहला प्रकाशित संकलन)&lt;br /&gt;
* मोर नाच&lt;br /&gt;
* आँख और ख़्वाब के दरमियाँ&lt;br /&gt;
* खोया हुआ सा कुछ (1996)  &lt;br /&gt;
* आँखों भर आकाश&lt;br /&gt;
* सफ़र में धूप तो होगी&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
; आत्मकथा&lt;br /&gt;
* दीवारों के बीच&lt;br /&gt;
* दीवारों के बाहर&lt;br /&gt;
; संस्मरण&lt;br /&gt;
* मुलाक़ातें&lt;br /&gt;
* सफ़र में धूप तो होगी&lt;br /&gt;
*तमाशा मेरे आगे&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
* बशीर बद्र : नयी ग़ज़ल का एक नाम  &lt;br /&gt;
*जाँनिसार अख़्तर : एक जवान मौत  &lt;br /&gt;
*दाग़ देहलवी : ग़ज़ल का एक स्कूल  &lt;br /&gt;
*मुहम्मद अलवी : शब्दों का चित्रकार  &lt;br /&gt;
*जिगर मुरादाबादी : मुहब्बतों का शायर  &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निदा फ़ाज़ली की ग़ज़लें==&lt;br /&gt;
{| style=&amp;quot;font-size:18px;&amp;quot; cellspacing=15&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
! (1)&lt;br /&gt;
! (2)&lt;br /&gt;
! (3)&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता &lt;br /&gt;
कहीं जमीं तो कहीं आस्मां नहीं मिलता &lt;br /&gt;
बुझा सका है भला कौन वक्त के शोले &lt;br /&gt;
ये ऐसी आग है जिसमें धुआँ नहीं मिलता &lt;br /&gt;
तमाम शहर में ऐसा नहीं खुलूस न हो &lt;br /&gt;
जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता &lt;br /&gt;
कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें &lt;br /&gt;
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता &lt;br /&gt;
ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं &lt;br /&gt;
जुबाँ मिली है मगर हमजुबाँ नहीं मिलता &lt;br /&gt;
चराग़ जलते ही बिनाई बुझने लगती है &lt;br /&gt;
खुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;सफ़र में धूप तो होगी, जो चल सको तो चलो &lt;br /&gt;
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो &lt;br /&gt;
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता &lt;br /&gt;
मुझे गिरा के अगर तुम सम्हल सको तो चलो &lt;br /&gt;
हर इक सफ़र को है महफूज़ रास्तों की तलाश &lt;br /&gt;
हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो &lt;br /&gt;
यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें &lt;br /&gt;
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो &lt;br /&gt;
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं &lt;br /&gt;
तुम अपने आप को खुद ही बदल सको तो चलो&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं &lt;br /&gt;
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं &lt;br /&gt;
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है &lt;br /&gt;
अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं &lt;br /&gt;
वक्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से &lt;br /&gt;
किसको मालूम, कहाँ के हैं किधर के हम हैं &lt;br /&gt;
जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं &lt;br /&gt;
कभी धरती के कभी चाँद नगर के हम हैं &lt;br /&gt;
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब &lt;br /&gt;
सोचते रहते हैं, किस राहगुज़र के हम हैं &lt;br /&gt;
गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम &lt;br /&gt;
हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं &amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==निदा फ़ाज़ली के दोहे==&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;सबकी पूजा एक सी, अलग -अलग हर रीत। &lt;br /&gt;
मस्जिद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
          पूजा -घर में मूरती, मीरा के संग श्याम।&lt;br /&gt;
          जितनी जिसकी चाकरी, उतने उसके दाम॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सीता -रावण, राम का, करें बिभाजन लोग।&lt;br /&gt;
एक ही तन में देखिए, तीनों का संजोग॥ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
          माटी से माटी मिले, खो के सभी निशान।&lt;br /&gt;
          किसमें कितना कौन है, कैसे हो पहचान॥&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
==सम्मान और पुरस्कार==&lt;br /&gt;
* [[1998]] में साहित्य अकादमी पुरस्कार - काव्य संग्रह खोया हुआ सा कुछ (1996)&lt;br /&gt;
* [[2003]] में स्टार स्क्रीन पुरस्कार - श्रेष्टतम गीतकार - फ़िल्म 'सुर के लिए&lt;br /&gt;
* [[2003]] में बॉलीवुड मूवी पुरस्कार - श्रेष्टतम गीतकार - फ़िल्म सुर के गीत 'आ भी जा' के लिए&lt;br /&gt;
*  मध्य प्रदेश सरकार का मीर तकी मीर पुरस्कार (आत्मकथा रूपी उपन्यास 'दीवारों के बीच' के लिए)&lt;br /&gt;
*  मध्य प्रदेश सरकार का खुसरो पुरस्कार - उर्दू और हिन्दी साहित्य के लिए&lt;br /&gt;
*  महाराष्ट्र उर्दू अकादमी का श्रेष्ठतम कविता पुरस्कार - उर्दू साहित्य के लिए&lt;br /&gt;
*  बिहार उर्दू अकादमी पुरस्कार&lt;br /&gt;
*  उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी का पुरस्कार&lt;br /&gt;
*  हिन्दी उर्दू संगम पुरस्कार (लखनऊ)&amp;lt;ref name=&amp;quot;कविता कोश&amp;quot;/&amp;gt;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{गीतकार}}{{उर्दू शायर}}&lt;br /&gt;
[[Category:गीतकार]][[Category:उर्दू शायर]][[Category:कवि]][[Category:सिनेमा]] [[Category:साहित्यकार]][[Category:आधुनिक साहित्यकार]][[Category:साहित्य कोश]][[Category:चरित कोश]][[Category:सिनेमा कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%88_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%9F%E0%A4%A8&amp;diff=540328</id>
		<title>हरदोई पर्यटन</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%88_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%9F%E0%A4%A8&amp;diff=540328"/>
		<updated>2015-10-06T02:02:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: /* पिहानी */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{लेख सूची|लेख का नाम=हरदोई |पर्यटन=हरदोई पर्यटन|ज़िला=हरदोई ज़िला}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Victoria.JPG|विक्टोरिया हॉल, [[हरदोई]]|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
'''हरदोई''' [[उत्तर प्रदेश]] राज्य का एक प्रमुख नगर है। [[साण्डी पक्षी अभयारण्य|संडी पक्षी अभयारण्य]], बालामऊ, माधोगंज, पिहानी, संडीला और बेहता गोकुल आदि यहाँ के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से है। &lt;br /&gt;
==विक्टोरिया मेमोरियल==&lt;br /&gt;
{{main|विक्टोरिया मेमोरियल हरदोई}}&lt;br /&gt;
जिस प्रकार [[रूमी दरवाज़ा लखनऊ|रूमी दरवाज़ा]], [[लखनऊ]] शहर का हस्ताक्षर भवन है ठीक वैसे ही यह विक्टोरिया भवन जनपद [[हरदोई]] का हस्ताक्षर शिल्प भवन है। आज़ादी से पहले [[भारत]] देश 1877 ई. में जब [[महारानी विक्टोरिया]] सम्राज्ञी घोषित की गईं तो भारतवर्ष में दो स्थानों पर इतिहास में समेटने के लिये [[विक्टोरिया मेमोरियल कोलकाता|विक्टोरिया मेमोरियल]] भवनों का निर्माण कराया गया जो तत्कालीन [[कलकत्ता]] और आज [[कोलकाता]] है और दूसरा हरदोई में। वर्तमान में इस भवन में हरदोई क्लब संचालित है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:Victoria-Memorial-Kolkata-3.jpg|[[विक्टोरिया मेमोरियल कोलकाता|विक्टोरिया मेमोरियल]], कोलकाता &amp;lt;br /&amp;gt;Victoria Memorial, Kolkata|thumb|left|250px]]&lt;br /&gt;
==साण्डी पक्षी अभयारण्य==  &lt;br /&gt;
{{main|साण्डी पक्षी अभयारण्य}}&lt;br /&gt;
[[हरदोई ज़िला]] स्थित संडी पक्षी अभयारण्य की स्थापना 1990 ई. में हुई थी। यह अभयारण्य [[लखनऊ]] से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह अभयारण्य लगभग तीन किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। यहां पक्षियों की अनेक प्रजातियां देखी जा सकती है। यहां घूमने के लिए सबसे उचित समय [[दिसम्बर]] से [[फरवरी]] है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Sandi.jpg|साण्डी पक्षी अभ्यारण्य|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
====सकहा शंकर मंदिर====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sakaha.jpg|सकहा शंकर मंदिर हरदोई |thumb|250px]]&lt;br /&gt;
{{main|सकहा शंकर मंदिर}}&lt;br /&gt;
हरदोई जनपद मुख्यालय से लगभग पच्चीस तीस किलोमीटर दूर सकहा नामक स्थान हैं जिसका पुराना नाम सोनिकपुर था तथा यहां पर [[शंकासुर]] नामक दैत्य रहा करता था जो हरदोई के शासक [[हिरण्यकशिपु]] का सहयोगी था। भक्त प्रहलाद के आह्वाहन पर जब भगवान ने नरसिंह रूप धारण कर हिरण्याकश्यप का वध किया तो शंकासुर भी ने भी यह स्थान छोड दिया। इस स्थान पर शिवलिंगों की एक पिरामिड जैसी आकृति उभर आयी जिस पर भगवान शंकर का मंदिर स्थापित हुआ । यह एक प्राचीन मंदिर था जिसका जीर्णोधार लगभग सत्तर वर्ष पूर्व इस क्षेत्र में तैनात रहे कोतवाल द्वारा कराया गया था।&lt;br /&gt;
इसके संबंध में यह भी किंवदंती है कि आजादी से कई वर्ष पूर्व लाला लाहौरीमल नामक एक व्यापारी के पुत्र को फांसी की सजा हुयी थी जिसकी माफी के लिये लाला लाहौरीमल ने यहां दरकार लगायी थी और मनौती पूरी होने के पश्चात उनके द्वारा यहां पर शंकर जी का मंदिर बनवाया गया । कालान्तर में यहां पर आवासीय संस्कृत महाविद्यालय की स्थापना हुयी जो आज भी सुचारू रूप से गतिमान है। वर्तमान में इस मंदिर की व्यवस्था आदि का काम स्थानीय महंत श्री उदयप्रताप गिरि द्वारा देखा जा रहा है।&lt;br /&gt;
[[चित्र:2013-01-12_14.40.03.jpg|सकहा स्थित शंकर जी का लिंग शीर्ष|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
==गांधी भवन==&lt;br /&gt;
{{main|गाँधी भवन, हरदोई}}&lt;br /&gt;
सन 1928 में [[साइमन कमीशन]] के भारत आने के बाद इसका विरोध करने के लिये [[महात्मा गांधी]] ने समूचे भारत में यात्रा कर जनजागरण किया । इसी दौरान 11 अक्टूबर 1929 को गांधी जी ने हरदोई का भी भ्रमण किया। सभी वर्गों के व्यक्तियों द्वारा महात्मा गांधी जी का स्वागत किया तथा उन्होंने टाउन हाल में 4000 से अधिक व्यक्तियों की जनसभा को संबोधित किया। सभा के समापन पर खद्दर के कुछ बढिया कपडें 296 रुपये में नीलाम किये गये और यह धनराशि गांधी जी को भेट की गयी। (संदर्भ:एच आर नेबिल संपादित हरदोई गजेटियर पृष्ठ 56)&lt;br /&gt;
स्वतंत्रता के बाद सम्पूर्ण भारत वर्ष में महात्मा गांधी जी के भृमण स्थलों पर स्मारकों का निर्माण किया गया जिसमें हरदोई में गांधी भवन का निर्माण हुआ । इस भवन का रख रखाव महात्मा गांधी जनकल्याण समिति द्वारा किया जाता है। इस समिति के सचिव अशोक कुमार शुक्ला ने इस परिसर में एक प्रार्थना कक्ष स्थापित कराया और 2013 के नववर्ष पर [[सर्वोदय आश्रम टडियांवा]] के सहयोग से सर्वधर्म प्रार्थना का नियमित आरंभ कराया। यह प्रार्थना कक्ष महात्मा जी की विश्राम स्थली रहे कौसानी में स्थापित [[अनासक्ति आश्रम]] के समरूप है तथा [[कौसानी]] में संचालित नियमित सर्वधर्म प्रार्थना के अनुरूप इस परिसर में भी नियमित रूप से सर्वधर्म प्रार्थना की जाती है &lt;br /&gt;
==सर्वोदय आश्रम टडियांवा==&lt;br /&gt;
{{main|सर्वोदय आश्रम टडियांवा}}&lt;br /&gt;
हरदोई जनपद मुख्यालय से लगभग चालीस किलोमीटर दूर टडियांवा नामक स्थान हैं जहां पर [[आचार्य विनोवा भावे]] और [[महात्मा गांधी]] के दर्शन से प्रेरित इस आश्रम की नीव प्रसिद्ध समाजसेवी रमेश भाई और उर्मिला बहन द्वारा 1984 में रखी गयी। इस आश्रम पसिर में हथकरघा कार्यो के अतिरिक्त छात्र छात्राओं के आवासीय विद्यालय का संचालन भी किया जाता है। दिनांक 1 जनवरी 2013 से यह आश्रम हरदोई स्थित गांधी भवन में स्थापित प्रार्थना कक्ष में नियमित सर्वधर्म प्रार्थना भी सम्पन्न करा रहा है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Sandi_061.JPG|हरदोई में में स्थापित नरसिंह भगवान की मूर्ति|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
==बालामऊ==&lt;br /&gt;
बालामऊ, हरदोई ज़िला के प्राचीन शहरों में से है। माना जाता है कि इस शहर की स्थापना [[अकबर]] काल के अन्तिम समय में बामी मिरमी ने की थी। वर्तमान समय में इस जगह को बामी खेरा ने नाम से जाना जाता है। यह शहर ज़िला मुख्यालय के दक्षिण की ओर तथा सांदिला के उत्तर-पूर्व से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। शहर के समीप ही [[सीतापुर ज़िला]] है जो नैमिषारण्य के लिए प्रसिद्ध है। यह जगह धार्मिक स्थल के रूप में जानी जाती है।&lt;br /&gt;
==माधोगंज==&lt;br /&gt;
राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित माधोगंज, हरदोई ज़िले का एक प्राचीन शहर है। यह शहर ऐतिहासिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस शहर की स्थापना स्वतंत्रता सेनानी श्री नरपति सिंह ने की थी। इन्होंने देश को स्वतंत्रता दिलाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। यहां स्थित रुइया गढ़ी क़िला, जो कि वर्तमान में नष्ट हो चुका है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐतिहासिक क्षणों का गवाह रहा है। वर्तमान समय में यह क़िला पुरातात्विक विभाग, उत्तर-प्रदेश की देख-रेख में है। माधोगंज हरदोई के दक्षिण से लगभग 34 किलोमीटर, [[कानपुर]] से 75 किलोमीटर और [[लखनऊ]] से 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।&lt;br /&gt;
==[[पिहानी]]==&lt;br /&gt;
हरदोई ज़िला स्थित [[पिहानी]] एक ऐतिहासिक जगह है। यह जगह हरदोई, ज़िला मुख्यालय के उत्तर-पूर्व से 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह जगह का नाम पर्शियन शब्द पिनहानी से लिया गया है। जिसका अर्थ होता रहने की जगह। माना जाता है कि पूर्व समय में यह स्थान सघन जंगलों से घिरा हुआ था। [[शेरशाह सूरी|शेरशाह]] ने [[हुमायूँ]] के साथ हुए युद्ध में उनसे बचने के लिए इस जगह पर शरण ली थी। सदारजहां, अकबर शासक के मंत्री का पिहानी से नजदीकी सम्बन्ध रहा है। उनका मकबरा और चित्रकला यहां के प्रमुख आकर्षण केन्द्रों में से हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संडीला==&lt;br /&gt;
संडीला हरदोई ज़िला का एक ख़ूबसूरत नगर है। यह नगर हरदोई के दक्षिण से लगभग 50 किलोमीटर और लखनऊ के उत्तर-पश्चिम से 55 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस जगह की स्थापना ऋषि संडीला ने की थी। उन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम रखा गया है। कई प्राचीन इमारतें, मस्जिद और बाराखम्भा आदि इस शहर का प्रमुख आकर्षण है। इसके अलावा, हत्याहरण यहां का प्रमुख धार्मिक स्थल है।&lt;br /&gt;
==बेहता गोकुल==&lt;br /&gt;
हरदोई ज़िला स्थित यह एक छोटा सा गांव है। यह गांव हरदोई के उत्तर से 16 किलोमीटर और [[शाहाबाद]] के दक्षिण से 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।&lt;br /&gt;
==विलग्राम==&lt;br /&gt;
जनपद हरदोई के सम्बन्ध में एक और आश्चर्यजनक तथ्य बताना चाहता हूं । इस जनपद में ‘विलग्राम‘ नाम का एक उपखंड है जिसके बारे में यह बताया जाता है कि यह मूल रूप से ‘विलग राम‘ शब्द का अपभ्रंश है । ‘विलग राम’ अर्थात राम से विलग रहने वाला। विलग्राम तहसील क्षेत्रान्तरर्गत स्थित [[साण्डी पक्षी अभ्यारण]] का एक मोहक दृष्य देखें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक2 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]][[Category:उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल]][[Category:पर्यटन कोश]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0&amp;diff=540327</id>
		<title>गुरुवायुर मंदिर</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B0_%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0&amp;diff=540327"/>
		<updated>2015-10-05T20:36:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: /* प्रथम निश्चय दिवस */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Guruvayur_Temple_top_view.JPG|गुरुवायुर मंदिर|thumb|250px]]&lt;br /&gt;
'''गुरुवायुर मंदिर''' [[केरल]] में स्थित है, जो भगवान [[श्रीकृष्ण]] को समर्पित है। यह एक प्राचीन मंदिर है, जो अनेक शताब्दियों से सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। केरल में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण यह भगवान 'गुरुवायुरप्पन का मंदिर है, जो बाल गोपाल श्रीकृष्ण का बालरूप हैं। मंदिर मे स्थापित प्रतिमा [[मूर्तिकला]] का एक बेजोड़ नमूना है। यह कहा जाता है कि इस प्रतिमा को भगवान [[विष्णु]] ने [[ब्रह्मा|ब्रह्माजी]] को सौंप दिया था। कई [[धर्म|धर्मों]] को मानने वाले लोग भी भगवान गुरुवायुरप्पन के परम [[भक्त]] रहे हैं।&lt;br /&gt;
{{tocright}}&lt;br /&gt;
==प्रसिद्धि==&lt;br /&gt;
यह मंदिर दो प्रमुख साहित्यिक कृतियों के लिए भी प्रसिद्ध है, जिनमें मेल्पथूर नारायण भट्टाथिरी द्वारा निर्मित 'नारायणीयम' और पून्थानम द्वारा रचित 'ज्नानाप्पना' है। ये दोनो कृतियाँ भगवान गुरुवायुरप्प्न को समर्पित हैं। इन लेखों में भगवान के स्वरूप के आधार पर चर्चा की गई है तथा भगवान के [[अवतार|अवतारों]] को दर्शाया गया है। नारायणीयम जो [[संस्कृत भाषा]] में रचित है, उसमें विष्णु के [[विष्णु के अवतार|दस अवतारों]] का उल्लेख किया आया है। और ज्नानाप्पना जो की [[मलयालम भाषा|मलयालम]] में रचित है, उसमें जीवन के कटु सत्यों का अवलोकन किया गया है एवं जीवन में किन बातों को अपनाना मानव के लिए श्रेष्ठ है व नहीं है, इन सब बातों को गहराई के साथ उल्लेखित किया गया है। इन रचनाओं का निर्माण करने वाले लेखक भगवान गुरुवायुरप्पन के परम भक्त थे।&amp;lt;ref name=&amp;quot;ab&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://astrobix.com/hindudharm/post/guruvayur-guruvayur-temple-kerala-guruvayur-dwaraka-south-guruvayur-temple-history.aspx|title=गुरुवायुर|accessmonthday=12 दिसम्बर|accessyear=2012|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=[[हिन्दी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==पौराणिक संदर्भ==&lt;br /&gt;
गुरुवायुर मंदिर के बारे में धार्मिक [[अभिलेख|अभिलेखों]] द्वारा इसकी महत्ता का वर्णन मिलता है, जिसमें से एक कथानुसार भगवान कृष्ण ने मूर्ति की स्थापना [[द्वारका]] में की थी। एक बार जब द्वारका में भयंकर बाढ़ आयी तो यह मूर्ति बह गई और [[बृहस्पति ऋषि|बृहस्पति]] को भगवान कृष्ण की यह तैरती हुई मूर्ति मिली। उन्होंने [[वायु देव|वायु]] की सहायता द्वारा इस मूर्ति को बचा लिया और प्रतिमा को उचित स्थान पर स्थापित करने के लिए [[पृथ्वी]] पर एक उचित स्थान की खोज आरम्भ कर दी। इसी समय वे [[केरल]] पहुँचे, जहाँ उन्हें भगवान [[शिव]] व माता [[पार्वती]] के दर्शन हुए। शिव ने कहा की यही स्थल सबसे उपयुक्त है, अत: यहीं पर मूर्ति की स्थापना की जानी चाहिए। तब गुरु एवं वायु ने मूर्ति का अभिषेक कर उसकी स्थापना की और भगवान ने उन्हें वरदान दिया कि प्रतिमा की स्थापना गुरु एवं वायु के द्वारा होने के कारण इस स्थान को 'गुरुवायुर' के नाम से ही जाना जाएगा। तब से यह पवित्र स्थल इसी नाम से प्रसिद्ध है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक अन्य मान्यता के अनुसार इस मंदिर का निर्माण स्वंय [[विश्वकर्मा]] द्वारा किया गया था और मंदिर का निर्माण इस प्रकार हुआ कि सूर्य की प्रथम किरणें सीधे भगवान गुरुवायुर के चरणों पर गिरें।&lt;br /&gt;
===प्रथम निश्चय दिवस===&lt;br /&gt;
[[भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन|स्वतंत्रता आन्दोलन]] के दिनों में हिन्दुस्तान की सामाजिक बुराइयों में में छुआछूत एक प्रमुख बुराई थी जिसके के विरूद्ध [[महात्मा गांधी]]  और उनके अनुयायी संघर्षरत रहते थे। उस समय देश के प्रमुख मंदिरों में हरिजनों का प्रवेश पूर्णतः प्रतिबंधित था। केरल राज्य का जनपद त्रिशुर दक्षिण भारत की एक प्रमुख धार्मिक नगरी है। यहीं एक प्रतिष्ठित मंदिर है [[गुरुवायुर मंदिर|श्री गुरूवायूर मंदिर,]] जिसमें कृष्ण भगवान के बालरूप के दर्शन कराती भगवान गुरूवायुरप्पन की मूर्ति स्थापित है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
आजादी से पूर्व अन्य मंदिरों की भांति इस मंदिर में भी हरिजनों के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध था। मंदिर के पुजारी किसी भी गैर ब्राहमण व्यक्ति को मंदिर में प्रवेश नहीं कराने के पक्ष में रहते थे। हरिजनों के साथ इस भेदभावपूर्ण रवैये के कारण स्थानीय हरिजनों में आक्रोश था परन्तु उनका नेतृत्व संभालने वाला कोई नहीं था। केरल के गांधी समर्थक [[ के. केलप्पन|श्री केलप्पन]] ने महात्मा की आज्ञा से इस प्रथा के विरूद्ध आवाज उठायी और अंततः इसके लिये सन् [[1933]] ई0 में सविनय अवज्ञा प्रारंभ की गयी। मंदिर के ट्रस्टियों को इस बात की ताकीद की गयी कि नये वर्ष का प्रथम दिवस अर्थात [[1 जनवरी]] [[1934]] को अंतिम निश्चय दिवस के रूप में मनाया जायेगा और इस तिथि पर उनके स्तर से कोई निश्चय न होने की स्थिति मे महात्मा गांधी तथा श्री केलप्पन द्वारा आन्दोलनकारियों के पक्ष में आमरण अनशन किया जा सकता है। महात्मा गांधी का यह प्रयोग अत्यंत संन्तोषजनक तथा शिक्षाप्रद रहा। उनके द्वारा दी गयी अनशन की धमकी का उत्साहजनक असर हुआ और श्री [[गुरुवायुर मंदिर]] के ट्रस्टियो की ओर से बैठक बुलाकर मंदिर के उपासको की राय भी प्राप्त की गयी। बैठक मे 77 प्रतिशत उपासको के द्वारा दिये गये बहुमत के आधार पर मंदिर में हरिजनों के प्रवेश को स्वीकृति दे दी गयी और इस प्रकार 1 जनवरी 1934 से केरल के श्री गुरूवायूर मंदिर में किये गये निश्चय दिवस की सफलता के रूप में हरिजनों के प्रवेश को सैद्वांतिक स्वीकृति मिल गयी।&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
गुरूवायूर मंदिर जिसमें आज भी गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित है तथापि कई घर्मो को मानने वाले भगवान भगवान गुरूवायूरप्पन के परम भक्त हैं। इस प्रकार महात्मा गांधी की प्रेरणा से जनवरी माह के प्रथम दिवस को निश्चय दिवस के रूप में मनाया गया और किये गये निश्चय को प्राप्त किया गया। हम सब भी नये वर्ष के प्रथम दिवस को कुछ न कुछ निश्चय अवश्य करते है।&amp;lt;ref&amp;gt;संदर्भ: हरिभाउ उपाध्याय संपादित 'बापू कथा' सर्व सेवा संध वाराणसी द्वारा गांधी संवत्सरी वर्ष 1969 ई में प्रकाशित&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====महत्त्व====&lt;br /&gt;
मंदिर में स्थापित प्रतिमा बहुत ही मनोहर है। भगवान कृष्ण को यहाँ पर 'उन्निकृष्णन', 'कन्नन' और 'बालकृष्णन' आदि नामों से जाना जाता है। गुरुवायुर मंदिर को 'बैकुंठद्वार' व 'दक्षिण की द्वारका' भी कहा जाता है। यह प्रसिद्ध [[तीर्थ स्थल]] श्रद्धालुओं के लिए मोक्ष का द्वार है। यहाँ पर आकर लोग अपने पापों से मुक्ति पाते हैं। माना जाता है कि एक बार जब [[श्रीकृष्ण]] के सखा उद्धव प्रभु के स्वर्गारोहण समय के बारे में सोचकर दु:खी हुए और विचार मे पड़ गए की कलयुग के समय जब भगवान नहीं होंगे, तब संसार का अंधकार कौन दूर करेगा। इस पर भगवान ने उन्हें समझाते हुए कहा की वह स्वंय प्रतिमा में विराजमान रहेंगे और जो भी इस मूर्ति का दर्शन करेगा उसे दु:खों से मुक्ति प्राप्त होगी व पापों का नाश होगा। अत: माना जाता है कि यहाँ पर आने से समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।&amp;lt;ref name=&amp;quot;ab&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==उत्सव तथा पूजा==&lt;br /&gt;
मंदिर में स्थापित भगवान की मूर्ति की विशेष [[पूजा]]-अराधना का विधान है। यहाँ गर्भगृह में विराजित भगवान की मूर्ति को [[आदिशंकराचार्य]] द्वारा निर्देशित विधि-विधान द्वारा ही पूजा जाता है। मंदिर में वैदिक परंपरा का निर्धारण होता है। गुरुवायुर की पूजा के पश्चात मम्मियुर शिव की अराधना का विशेष महत्व है। इनकी पूजा किए बिना भगवान गुरुवायुर की पूजा को संपूर्ण नहीं माना जाता है। मंदिर अपने उत्सवों के लिए भी विख्यात है। [[शुक्ल पक्ष]] की [[एकादशी]] तिथि का ख़ास महत्त्व है। इस समय यहाँ पर उत्सव का आयोजन किया जाता है। साथ ही विलक्कु एकादशी का पर्व भी मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1|माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध=}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
* [https://www.youtube.com/watch?v=M-rMYM7CEAs गुरूवायूरप्पन मंदिर में भगवान की आरती दर्शन ] &lt;br /&gt;
* [https://www.facebook.com/notes/%E0%A4%85%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE/%E0%A4%A8%E0%A4%B5%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AD-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80%E0%A4%82-%E0%A4%87%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A4%AF-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A5%87-%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%82-/898635280167243  नववर्षारम्भ नहीं इसे निश्चय दिवस कहिये मित्रों ..!]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{केरल}}&lt;br /&gt;
[[Category:केरल]][[Category:केरल के पर्यटन स्थल]][[Category:हिन्दू धार्मिक स्थल]][[Category:पर्यटन कोश]][[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>परमात्मा एक ही है -स्वामी विवेकानंद</title>
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		<updated>2015-06-04T10:14:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: '{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय |चित्र=Swami Vivekananda.gif| |चित्र ...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Swami Vivekananda.gif|&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=स्वामी विवेकानन्द&lt;br /&gt;
|विवरण= [[स्वामी विवेकानन्द]] &lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=भाषा&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[हिंदी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=देश&lt;br /&gt;
|पाठ 2=[[भारत]]&lt;br /&gt;
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|पाठ 8=[[प्रेरक प्रसंग]] &lt;br /&gt;
|शीर्षक 9=उप शीर्षक&lt;br /&gt;
|पाठ 9=[[स्वामी विवेकानन्द के प्रेरक प्रसंग]]  &lt;br /&gt;
|शीर्षक 10=संकलनकर्ता&lt;br /&gt;
|पाठ 10=[[अशोक कुमार शुक्ला]]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem style=&amp;quot;background:#fbf8df; padding:15px; font-size:14px; border:1px solid #003333; border-radius:5px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[स्वामी विवेकानन्द|स्वामी विवेकानंद जी]] से मुशीं फैज अली ने पूछा :&lt;br /&gt;
&amp;quot;स्वामी जी हमें बताया गया है कि अल्लहा एक ही है। &lt;br /&gt;
यदि वह एक ही है, तो फिर संसार उसी ने बनाया होगा ?&lt;br /&gt;
&amp;quot;स्वामी जी बोले, &amp;quot;सत्य है।&amp;quot;.&lt;br /&gt;
मुशी जी बोले ,&amp;quot;तो फिर इतने प्रकार के मनुष्य क्यों बनाये। &lt;br /&gt;
जैसे कि हिन्दु, मुसलमान, सिख्ख, ईसाइ और सभी को अलग-अलग धार्मिक ग्रंथ भी दिये।&lt;br /&gt;
एक ही जैसे इंसान बनाने में उसे यानि की अल्लाह को क्या एतराज था।&lt;br /&gt;
सब एक होते तो न कोई लङाई और न कोई झगङा होता।&lt;br /&gt;
&amp;quot;.स्वामी हँसते हुए बोले, &amp;quot;मुंशी जी वो सृष्टी कैसी होती जिसमें एक ही प्रकार के फूल होते।&lt;br /&gt;
केवल गुलाब होता, कमल या रंजनिगंधा या गेंदा जैसे फूल न होते!&amp;quot;.&lt;br /&gt;
फैज अली ने कहा सच कहा आपने यदि एक ही दाल होती तो खाने का स्वाद भी एक ही होता। &lt;br /&gt;
दुनिया तो बङी फीकी सी हो जाती!&lt;br /&gt;
स्वामी जी ने कहा, मुंशीजी! इसीलिये तो ऊपर वाले ने अनेक प्रकार के जीव-जंतु और इंसान बनाए ताकि हम पिंजरे का भेद भूलकर जीव की एकता को पहचाने।&lt;br /&gt;
मुशी जी ने पूछा, इतने मजहब क्यों ?&lt;br /&gt;
स्वामी जी ने कहा, &amp;quot; मजहब तो मनुष्य ने बनाए हैं,&lt;br /&gt;
प्रभु ने तो केवल धर्म बनाया है।&lt;br /&gt;
&amp;quot;मुशी जी ने कहा कि, &amp;quot; ऐसा क्यों है कि एक मजहब में कहा गया है कि गाय और सुअर खाओ और दूसरे में कहा गया है कि गाय मत खाओ, सुअर खाओ एवं तीसरे में कहा गया कि गाय खाओ सुअर न खाओ;&lt;br /&gt;
इतना ही नही कुछ लोग तो ये भी कहते हैं कि मना करने पर जो इसे खाये उसे अपना दुश्मन समझो।&amp;quot;&lt;br /&gt;
स्वामी जी जोर से हँसते हुए मुंशी जी से पूछे कि ,&amp;quot;क्या ये सब प्रभु ने कहा है ?&amp;quot;&lt;br /&gt;
मुंशी जी बोले नही,&amp;quot;मजहबी लोग यही कहते हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
स्वामी जी बोले, &amp;quot;मित्र! किसी भी देश या प्रदेश का भोजन वहाँ की जलवायु की देन है। &lt;br /&gt;
सागरतट पर बसने वाला व्यक्ति वहाँ खेती नही कर सकता, वह सागर से पकङ कर मछलियां ही खायेगा।&lt;br /&gt;
उपजाऊ भूमि के प्रदेश में खेती हो सकती है।&lt;br /&gt;
वहाँ अन्न फल एवं शाक-भाजी उगाई जा सकती है। &lt;br /&gt;
उन्हे अपनी खेती के लिए गाय और बैल बहुत उपयोगी लगे। &lt;br /&gt;
उन्होने गाय को अपनी माता माना, धरती को अपनी माता माना और नदी को माता माना ।&lt;br /&gt;
क्योंकि ये सब उनका पालन पोषण माता के समान ही करती हैं।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;quot;अब जहाँ मरुभूमि है वहाँ खेती कैसे होगी?&lt;br /&gt;
खेती नही होगी तो वे गाय और बैल का क्या करेंगे? अन्न है नही तो खाद्य के रूप में पशु को ही खायेंगे।&lt;br /&gt;
तिब्बत में कोई शाकाहारी कैसे हो सकता है?&lt;br /&gt;
वही स्थिति अरब देशों में है। जापान में भी इतनी भूमि नही है कि कृषि पर निर्भर रह सकें।&lt;br /&gt;
&amp;quot;स्वामी जी फैज अलि की तरफ मुखातिब होते हुए बोले, &amp;quot; हिन्दु कहते हैं कि मंदिर में जाने से पहले या पूजा करने से पहले स्नान करो। &lt;br /&gt;
मुसलमान नमाज पढने से पहले वाजु करते हैं। &lt;br /&gt;
क्या अल्लहा ने कहा है कि नहाओ मत, केवल लोटे भर पानी से हांथ-मुँह धो लो?&lt;br /&gt;
&amp;quot;फैज अलि बोला, क्या पता कहा ही होगा!&lt;br /&gt;
स्वामी जी ने आगे कहा,नहीं, अल्लहा ने नही कहा!&lt;br /&gt;
अरब देश में इतना पानी कहाँ है कि वहाँ पाँच समय नहाया जाए। &lt;br /&gt;
जहाँ पीने के लिए पानी बङी मुश्किल से मिलता हो वहाँ कोई पाँच समय कैसे नहा सकता है।&lt;br /&gt;
यह तो भारत में ही संभव है, जहाँ नदियां बहती हैं,&lt;br /&gt;
झरने बहते हैं, कुएँ जल देते हैं।&lt;br /&gt;
तिब्बत में यदि पानीहो तो वहाँ पाँच बार व्यक्ति यदि नहाता है तो ठंड के कारण ही मर जायेगा।&lt;br /&gt;
यह सब प्रकृति ने सबको समझाने के लिये किया है।&lt;br /&gt;
&amp;quot;स्वामी विवेका नंद जी ने आगे समझाते हुए कहा कि,&amp;quot; मनुष्य की मृत्यु होती है।&lt;br /&gt;
उसके शव का अंतिम संस्कार करना होता है। अरब देशों में वृक्ष नही होते थे, केवल रेत थी। अतः वहाँ मृतिका समाधी का प्रचलन हुआ, जिसे आप दफनाना कहते हैं।&lt;br /&gt;
भारत में वृक्ष बहुत बङी संख्या में थे, लकडी.पर्याप्त उपलब्ध थी अतः भारत में अग्नि संस्कार का प्रचलन हुआ।&lt;br /&gt;
जिस देश में जो सुविधा थी वहाँ उसी का प्रचलन बढा। &lt;br /&gt;
वहाँ जो मजहब पनपा उसने उसे अपने दर्शन से जोङ लिया।&lt;br /&gt;
&amp;quot;फैज अलि विस्मित होते हुए बोला! &lt;br /&gt;
&amp;quot;स्वामी जी इसका मतलब है कि हमें शव का अंतिम संस्कार प्रदेश और देश के अनुसार करना चाहिये। मजहब के अनुसार नही।&lt;br /&gt;
&amp;quot;स्वामी जी बोले , &amp;quot;हाँ! यही उचित है।&lt;br /&gt;
&amp;quot; किन्तु अब लोगों ने उसके साथ धर्म को जोङ दिया। मुसलमान ये मानता है कि उसका ये शरीर कयामत के दिन उठेगा इसलिए वह शरीर को जलाकर समाप्त नही करना चाहता।&lt;br /&gt;
हिन्दु मानता है कि उसकी आत्मा फिर से नया शरीर धारण करेगी इसलिए उसे मृत शरीर से एक क्षंण भी मोह नही होता।&lt;br /&gt;
&amp;quot;फैज अलि ने पूछा कि, &amp;quot;एक मुसलमान के शव को जलाया जाए और एक हिन्दु के शव को दफनाया जाए तो क्या प्रभु नाराज नही होंगे?&lt;br /&gt;
&amp;quot;स्वामी जी ने कहा,&amp;quot; प्रकृति के नियम ही प्रभु का आदेश हैं।&lt;br /&gt;
वैसे प्रभु कभी रुष्ट नही होते वे प्रेमसागर हैं, करुणा सागर है।&lt;br /&gt;
&amp;quot;फैज अलि ने पूछा तो हमें उनसे डरना नही चाहिए?&lt;br /&gt;
स्वामी जी बोले, &amp;quot;नही! हमें तो ईश्वर से प्रेम करना चाहिए वो तो पिता समान है, दया का सागर है फिर उससे भय कैसा। &lt;br /&gt;
डरते तो उससे हैं हम जिससे हम प्यार नही करते।&lt;br /&gt;
&amp;quot;फैज अलि ने हाँथ जोङकर स्वामी विवेकानंद जी से पूछा, &amp;quot;तो फिर मजहबों के कठघरों से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है?&lt;br /&gt;
&amp;quot;स्वामी जी ने फैज अलि की तरफ देखते हुए मुस्कराकर कहा,&lt;br /&gt;
&amp;quot;क्या तुम सचमुच कठघरों से मुक्त होना चाहते हो?&amp;quot; &lt;br /&gt;
फैज अलि ने स्वीकार करने की स्थिति में अपना सर हिला दिया।&lt;br /&gt;
स्वामी जी ने आगे समझाते हुए कहा,&amp;quot;फल की दुकान पर जाओ, तुम देखोगे वहाँ आम, नारियल, केले, संतरे,अंगूर आदि अनेक फल बिकते हैं; किंतु वो दुकान तो फल की दुकान ही कहलाती है।&lt;br /&gt;
वहाँ अलग-अलग नाम से फल ही रखे होते हैं।&lt;br /&gt;
&amp;quot; फैज अलि ने हाँ में सर हिला दिया।&lt;br /&gt;
स्वामी विवेकानंद जी ने आगे कहा कि ,&amp;quot;अंश से अंशी की ओर चलो। &lt;br /&gt;
तुम पाओगे कि सब उसी प्रभु के रूप हैं।&lt;br /&gt;
&amp;quot;फैज अलि अविरल आश्चर्य से स्वामी विवेकानंद जी को देखते रहे और बोले &amp;quot;स्वामी जी मनुष्य ये सब क्यों नही समझता?&lt;br /&gt;
&amp;quot;स्वामी विवेकानंद जी ने शांत स्वर में कहा, मित्र! प्रभु की माया को कोई नही समझता। &lt;br /&gt;
मेरा मानना तो यही है कि, &amp;quot;सभी धर्मों का गंतव्य स्थान एक है।&lt;br /&gt;
जिस प्रकार विभिन्न मार्गो से बहती हुई नदियां समुंद्र में जाकर गिरती हैं, उसी प्रकार सब मतमतान्तर परमात्मा की ओर ले जाते हैं। &lt;br /&gt;
मानव धर्म एक है, मानव जाति एक है।&amp;quot;...&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;[[स्वामी विवेकानन्द]]  से जुड़े अन्य प्रसंग पढ़ने के लिए [[स्वामी विवेकानन्द के प्रेरक प्रसंग]] पर जाएँ &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{प्रेरक प्रसंग}}&lt;br /&gt;
[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]][[Category:समकालीन साहित्य]][[Category:प्रेरक प्रसंग]][[Category: स्वामी विवेकानन्द]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>साँचा:प्रेरक प्रसंग - स्वामी विवेकानंद</title>
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		<updated>2015-06-04T10:09:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा कविता सूची&lt;br /&gt;
|कवि का नाम=स्वामी विवेकानंद &lt;br /&gt;
|रचना प्रकार='''प्रेरक प्रसंग - स्वामी विवेकानंद'''&lt;br /&gt;
|रचना 1=स्वयं के स्वामी &lt;br /&gt;
|रचना 2=पाने से बड़ा होता है देने का आनंद &lt;br /&gt;
|रचना 3=लक्ष्य पर ध्यान &lt;br /&gt;
|रचना 4=डर का सामना &lt;br /&gt;
|रचना 5=सच बोलने की हिम्मत&lt;br /&gt;
|रचना 6=माँ से बढ़कर कोई नहीं &lt;br /&gt;
|रचना 7=परमात्मा एक ही है&lt;br /&gt;
|रचना 8=&lt;br /&gt;
|रचना 9=&lt;br /&gt;
|रचना 10= &lt;br /&gt;
|रचना 11= &lt;br /&gt;
|रचना 12=&lt;br /&gt;
|रचना 13=&lt;br /&gt;
|रचना 14=&lt;br /&gt;
|रचना 15= &lt;br /&gt;
|रचना 16=&lt;br /&gt;
|रचना 17= &lt;br /&gt;
|रचना 18=&lt;br /&gt;
|रचना 19=&lt;br /&gt;
|रचना 20=&lt;br /&gt;
|रचना 21=&lt;br /&gt;
|रचना 22=&lt;br /&gt;
|रचना 23=&lt;br /&gt;
|रचना 24=&lt;br /&gt;
|रचना 25=&lt;br /&gt;
}}[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:प्रेरक प्रसंग]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*[[महात्मा गाँधी]] जी की अध्यक्षता में [[1918]] में [[इन्दौर]] में 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के द्वारा [[हिन्दी]] [[राष्ट्रभाषा]] मानी गयी। इस प्रस्ताव के स्वीकृत होने के बाद दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये ''[[दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा]]'' की भी स्थापना हुयी जिसका मुख्यालय [[मद्रास]] में था।&lt;br /&gt;
*[[1947]] में आजादी मिलने के बाद जब भारतीय संविधान लागू हुआ तो उसके अनुच्छेद 343 के द्वारा भारतीय संघ की भाषा हिन्दी और [[देवनागरी लिपि|लिपि देवनागरी]]  निर्धारित की गयी परन्तु संविधान लागू होने के वर्ष [[1950]] से 15 वर्ष तक की अवधि [[1965]] तक के लिये संघ की भाषा के रूप में [[अंगेजी]] का प्रयोग किया जा सकता था। भारतीय संसद को यह अधिकार दिया गया था कि वह चाहे तो संघ की भाषा के रूप में अंगेजी के प्रयोग की अवधि को बढा सकती थी। वर्ष [[1963]] में संसद में [[राजभाषा अधिनियम 1963]] पारित करते हुये यह व्यवस्था कर दी थी कि [[1971]] तक भारतीय संघ के रूप में अंग्रेजी भाषा का उपयोग होता रहेगा । कालान्तर में 1971 की कालावधि समाप्त कर अनिश्चितकाल के लिये इस व्यवस्था को लागू किया गया। &lt;br /&gt;
*[[संविधान]] के अनुच्छेद 344 के द्वारा 22 भाषाओं को [[राजभाषा]] की मान्यता प्रदान की गयी है। जिनके नाम इस प्रकार है:- (1)[[असमिया भाषा|असमिया]] (2)[[बांग्ला भाषा|बांग्ला]] (3)[[गुजराती भाषा|गुजराती]](4)[[हिन्दी भाषा|हिन्दी]](5)[[कन्नड़ भाषा|कन्नड़]](6)[[कश्मीरी भाषा|कश्मीरी]](7)[[कोंकणी भाषा|कोंकणी]](8)[[मलयालम भाषा|मलयालम]](9)[[मणिपुरी भाषा|मणिपुरी]](10)[[मराठी भाषा|मराठी]](11)[[नेपाली भाषा|नेपाली]](12)[[उड़िया भाषा|उड़िया]](13)[[पंजाबी भाषा|पंजाबी]](14)[[संस्कृत भाषा|संस्कृत]](15)[[सिंधी भाषा|सिंधी]](16)[[तमिल भाषा|तमिल]](17)[[उर्दू भाषा|उर्दू]](18)[[तेलुगु भाषा|तेलुगु]](19)[[बोडो भाषा|बोडो]](20)[[डोगरी भाषा|डोगरी]](21)[[मैथिली भाषा|मैथिली]](22)[[संथाली भाषा|संथाली]]।&lt;br /&gt;
*सन् [[2001]] की [[जनगणना]] के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*[[महात्मा गाँधी]] जी की अध्यक्षता में [[1918]] में [[इन्दौर]] में 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के द्वारा [[हिन्दी]] [[राष्ट्रभाषा]] मानी गयी। इस प्रस्ताव के स्वीकृत होने के बाद दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये ''[[दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा]]'' की भी स्थापना हुयी जिसका मुख्यालय [[मद्रास]] में था।&lt;br /&gt;
*[[1947]] में आजादी मिलने के बाद जब भारतीय संविधान लागू हुआ तो उसके अनुच्छेद 343 के द्वारा भारतीय संघ की भाषा हिन्दी और [[देवनागरी लिपि|लिपि देवनागरी]]  निर्धारित की गयी परन्तु संविधान लागू होने के वर्ष [[1950]] से 15 वर्ष तक की अवधि [[1965]] तक के लिये संघ की भाषा के रूप में [[अंगेजी]] का प्रयोग किया जा सकता था। भारतीय संसद को यह अधिकार दिया गया था कि वह चाहे तो संघ की भाषा के रूप में अंगेजी के प्रयोग की अवधि को बढा सकती थी। वर्ष [[1963]] में संसद में राजभाषा अधिनियम 1963 पारित करते हुये यह व्यवस्था कर दी थी कि [[1971]] तक भारतीय संघ के रूप में अंग्रेजी भाषा का उपयोग होता रहेगा । कालान्तर में 1971 की कालावधि समाप्त कर अनिश्चितकाल के लिये इस व्यवस्था को लागू किया गया। &lt;br /&gt;
*[[संविधान]] के अनुच्छेद 344 के द्वारा 22 भाषाओं को [[राजभाषा]] की मान्यता प्रदान की गयी है। जिनके नाम इस प्रकार है:- (1)[[असमिया भाषा|असमिया]] (2)[[बांग्ला भाषा|बांग्ला]] (3)[[गुजराती भाषा|गुजराती]](4)[[हिन्दी भाषा|हिन्दी]](5)[[कन्नड़ भाषा|कन्नड़]](6)[[कश्मीरी भाषा|कश्मीरी]](7)[[कोंकणी भाषा|कोंकणी]](8)[[मलयालम भाषा|मलयालम]](9)[[मणिपुरी भाषा|मणिपुरी]](10)[[मराठी भाषा|मराठी]](11)[[नेपाली भाषा|नेपाली]](12)[[उड़िया भाषा|उड़िया]](13)[[पंजाबी भाषा|पंजाबी]](14)[[संस्कृत भाषा|संस्कृत]](15)[[सिंधी भाषा|सिंधी]](16)[[तमिल भाषा|तमिल]](17)[[उर्दू भाषा|उर्दू]](18)[[तेलुगु भाषा|तेलुगु]](19)[[बोडो भाषा|बोडो]](20)[[डोगरी भाषा|डोगरी]](21)[[मैथिली भाषा|मैथिली]](22)[[संथाली भाषा|संथाली]]।&lt;br /&gt;
*सन् [[2001]] की [[जनगणना]] के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं।&lt;/div&gt;</summary>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*[[महात्मा गाँधी]] जी की अध्यक्षता में [[1918]] में [[इन्दौर]] में 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के द्वारा [[हिन्दी]] [[राष्ट्रभाषा]] मानी गयी। इस प्रस्ताव के स्वीकृत होने के बाद दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये ''[[दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा]]'' की भी स्थापना हुयी जिसका मुख्यालय [[मद्रास]] में था।&lt;br /&gt;
*[[1947]] में आजादी मिलने के बाद जब भारतीय संविधान लागू हुआ तो उसके अनुच्छेद 343 के द्वारा भारतीय संघ की भाषा हिन्दी और [[देवनागरी लिपि|लिपि देवनागरी]]  निर्धारित की गयी परन्तु संविधान लागू होने के वर्ष [[1950]] से 15 वर्ष तक की अवधि [[1965]] तक के लिये संघ की भाषा के रूप में [[अंगेजी]] का प्रयोग किया जा सकता था। भारतीय संसद को यह अधिकार दिया गया था कि वह चाहे तो संघ की भाषा के रूप में अंगेजी के प्रयोग की अवधि को बढा सकती थी। वर्ष [[1963]] में संसद में राजभाषा अधिनियम 1963 पारित करते हुये यह व्यवस्था कर दी थी कि [[1971]] तक भारतीय संघ के रूप में अंग्रेजी भाषा का उपयोग होता रहेगा । कालान्तर में 1971 की कालावधि समाप्त कर अनिश्चितकाल के लिये इस व्यवस्था को लागू किया गया। &lt;br /&gt;
*[[संविधान]] के अनुच्छेद 344 के द्वारा 22 भाषाओं को [[राजभाषा]] की मान्यता प्रदान की गयी है। जिनके नाम इस प्रकार है:- (1)[[असमिया भाषा|असमिया]] (2)[[बांग्ला भाषा|बांग्ला]] (3)[[गुजराती भाषा|गुजराती]]&lt;br /&gt;
(4)[[हिन्दी भाषा|हिन्दी]]&lt;br /&gt;
(5)[[कन्नड़ भाषा|कन्नड़]]&lt;br /&gt;
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(22)[[संथाली भाषा|संथाली]],सन् [[2001]] की [[जनगणना]] के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं।&lt;br /&gt;
*सन् [[2001]] की [[जनगणना]] के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं।&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>राष्ट्रभाषा</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;*[[महात्मा गाँधी]] जी की अध्यक्षता में [[1918]] में [[इन्दौर]] में 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के द्वारा [[हिन्दी]] [[राष्ट्रभाषा]] मानी गयी। इस प्रस्ताव के स्वीकृत होने के बाद दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये ''[[दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा]]'' की भी स्थापना हुयी जिसका मुख्यालय [[मद्रास]] में था।&lt;br /&gt;
*[[1947]] में आजादी मिलने के बाद जब भारतीय संविधान लागू हुआ तो उसके अनुच्छेद 343 के द्वारा भारतीय संघ की भाषा हिन्दी और [[देवनागरी लिपि|लिपि देवनागरी]]  निर्धारित की गयी परन्तु संविधान लागू होने के वर्ष [[1950]] से 15 वर्ष तक की अवधि [[1965]] तक के लिये संघ की भाषा के रूप में [[अंगेजी]] का प्रयोग किया जा सकता था। भारतीय संसद को यह अधिकार दिया गया था कि वह चाहे तो संघ की भाषा के रूप में अंगेजी के प्रयोग की अवधि को बढा सकती थी। वर्ष [[1963]] में संसद में राजभाषा अधिनियम 1963 पारित करते हुये यह व्यवस्था कर दी थी कि [[1971]] तक भारतीय संघ के रूप में अंग्रेजी भाषा का उपयोग होता रहेगा । कालान्तर में 1971 की कालावधि समाप्त कर अनिश्चितकाल के लिये इस व्यवस्था को लागू किया गया। &lt;br /&gt;
*[[संविधान]] के अनुच्छेद 344 के द्वारा 22 भाषाओं को [[राजभाषा]] की मान्यता प्रदान की गयी है।&lt;br /&gt;
सन् [[2001]] की [[जनगणना]] के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति सत्याग्रह -महात्मा गाँधी</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Mahatma_prerak.png&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
|विवरण= [[महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=भाषा&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[हिंदी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=देश&lt;br /&gt;
|पाठ 2=[[भारत]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3=&lt;br /&gt;
|पाठ 3=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 4=&lt;br /&gt;
|पाठ 4=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 5=&lt;br /&gt;
|पाठ 5=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 6=&lt;br /&gt;
|पाठ 6=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 7=&lt;br /&gt;
|पाठ 7=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 8=मूल शीर्षक&lt;br /&gt;
|पाठ 8=[[प्रेरक प्रसंग]] &lt;br /&gt;
|शीर्षक 9=उप शीर्षक&lt;br /&gt;
|पाठ 9=[[महात्मा गाँधी के प्रेरक प्रसंग]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 10=संकलनकर्ता&lt;br /&gt;
|पाठ 10=[[अशोक कुमार शुक्ला]]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem style=&amp;quot;background:#fbf8df; padding:15px; font-size:14px; border:1px solid #003333; border-radius:5px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[महात्मा गाँधी|गांधी जी]] ने भारत के स्वतंत्रता के लिये सिर्फ जन जागरण अभियान ही नहीं चलाया अपितु [[राष्ट्रभाषा]] के रूप में [[हिन्दी]] को स्थापित करने में भी अग्रणी भूमिका निभायी थी। भारत आने के बाद [[1917]] में जब उन्होंने अपनी पहली सत्याग्रह यात्रा चम्पारण से आरंभ की तो इसी दौरान [[3 जून]] को उन्होंने ऐक परिपत्र निकाला था जिसमें हिन्दी की महत्ता के संदर्भ में लिखा था &lt;br /&gt;
''हिन्दी जल्दी से जल्दी अंग्रेजी का स्थान लेले, यह ईश्वरी संकेत जान पडता है। हिन्दी शिक्षित वर्गों के बीच समान माध्यम ही नहीं बल्कि जनसाधारण के हृदय तक पहुंचने का द्वार बन सकती है । इस दिशा में कोई देसी भाषा इसकी समानता नहीं कर सकती । अंगेजी तो कदापि नहीं कर सकती।''&lt;br /&gt;
गांधी जी हिन्दी का मौखिक प्रचार करके ही, राष्ट्रभाषा के रूप में उसकी महत्ता और प्रतिष्ठा बताकर ही चुप नहीं रहे उन्होंने [[1918]] के ठेठ अंगेजी वर्चस्व के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी का प्रचार करने की व्यवस्था भी की।&lt;br /&gt;
इसी वर्ष [[इन्दौर]] में गांधी जी की अध्यक्षता में हिन्दी साहित्य सम्मेलन आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के द्वारा हिन्दी [[राजभाषा]] मानी गयी। इस प्रस्ताव के स्वीकृत होने के बाद दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये [[दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा]] की भी स्थापना हुयी जिसका मुख्यालय [[मद्रास]] में था। &lt;br /&gt;
महात्मा गांधी जी के इस अभिनव प्रयास के उपरांत ही हिन्दी क्षेत्रीयता के कंटीले तारों की बाढ को पार कर उन्मुक्त आकाश में विचरण करने के लिये पंख फडफडाती दिखी जो आज तक जारी है।&lt;br /&gt;
;[[महात्मा गाँधी]] से जुड़े अन्य प्रसंग पढ़ने के लिए [[महात्मा गाँधी के प्रेरक प्रसंग]] पर जाएँ।  &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{प्रेरक प्रसंग}}&lt;br /&gt;
[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]][[Category:समकालीन साहित्य]][[Category:प्रेरक प्रसंग]][[Category:महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=530837</id>
		<title>हिंदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=530837"/>
		<updated>2015-06-03T15:40:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: /* द्विवेदी युग */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चयनित लेख}}&lt;br /&gt;
{{हिन्दी विषय सूची}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Hindi-Alphabhet.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=हिंदी वर्णमाला&lt;br /&gt;
|विवरण='हिंदी' [[प्रांगण:मुखपृष्ठ/भारत गणराज्य|भारतीय गणराज]] की राजकीय और मध्य भारतीय- आर्य भाषा है।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=लिपी&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[देवनागरी लिपि|देवनागरी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=आधिकारिक भाषा &lt;br /&gt;
|पाठ 2=[[भारत]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3=नियामक&lt;br /&gt;
|पाठ 3=केंद्रीय हिंदी निदेशालय&lt;br /&gt;
|शीर्षक 4=भाषा–परिवार&lt;br /&gt;
|पाठ 4=[[भारोपीय भाषा परिवार]] &lt;br /&gt;
|शीर्षक 5=व्युत्पत्ति&lt;br /&gt;
|पाठ 5=हिंदी शब्द की व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] शब्द सिन्धु से मानी जाती है। &lt;br /&gt;
|शीर्षक 6=&lt;br /&gt;
|पाठ 6=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 7=&lt;br /&gt;
|पाठ 7=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 8=&lt;br /&gt;
|पाठ 8=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 9=&lt;br /&gt;
|पाठ 9=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 10=&lt;br /&gt;
|पाठ 10=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[हिन्दी की उपभाषाएँ एवं बोलियाँ]], [[आठवीं अनुसूची]], [[हिन्दी दिवस]], [[विश्व हिन्दी दिवस]], [[हिंदी पत्रकारिता दिवस]]&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=सन् [[2001]] की जनगणना के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि लगभग 42.20 करोड़ लोग इसकी 50 से अधिक बोलियों में से एक इस्तेमाल करते हैं।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''हिंदी''' भारतीय [[प्रांगण:मुखपृष्ठ/भारत गणराज्य|गणराज]] की राजकीय और मध्य भारतीय- आर्य भाषा है। सन् [[2001]] की जनगणना के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि लगभग 42.20 करोड़ लोग इसकी 50 से अधिक बोलियों में से एक इस्तेमाल करते हैं। सन् 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकड़े मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था। सन् [[1997]] में भारत की जनगणना का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ प्रकाशित होने तथा संसार की भाषाओं की रिपोर्ट तैयार करने के लिए [[यूनेस्को]] द्वारा सन् [[1998]] में भेजी गई यूनेस्को प्रश्नावली के आधार पर उन्हें भारत सरकार के [[केन्द्रीय हिन्दी संस्थान]] के तत्कालीन निदेशक प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन द्वारा भेजी गई विस्तृत रिपोर्ट के बाद अब विश्व स्तर पर यह स्वीकृत है कि मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से संसार की भाषाओं में चीनी भाषा के बाद हिन्दी का दूसरा स्थान है। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्या हिन्दी भाषा से अधिक है किन्तु चीनी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा सीमित है। अँगरेज़ी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा अधिक है किन्तु मातृभाषियों की संख्या अँगरेज़ी भाषियों से अधिक है। इसकी कुछ बोलियाँ, [[मैथिली भाषा|मैथिली]] और [[राजस्थानी भाषा|राजस्थानी]] अलग भाषा होने का दावा करती हैं। हिंदी की प्रमुख बोलियों में [[अवधी भाषा|अवधी]], [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]], [[ब्रजभाषा]], [[छत्तीसगढ़ी]], [[गढ़वाली]], [[हरियाणवी]], [[कुमायूँनी बोली|कुमांऊनी]], [[मागधी]] और [[मारवाड़ी भाषा]] शामिल हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.censusindia.gov.in/Census_Data_2001/Census_Data_Online/Language/Statement1.htm |title=ABSTRACT OF SPEAKERS' STRENGTH OF LANGUAGES AND MOTHER TONGUES - 2001  |accessmonthday=15 सितम्बर |accessyear=2012 |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher=census of india |language=अंग्रेज़ी }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==हिंदी भाषा का विकास==&lt;br /&gt;
;वर्गीकरण&lt;br /&gt;
*हिंदी विश्व की लगभग 3,000 भाषाओं में से एक है।&lt;br /&gt;
*आकृति या रूप के आधार पर हिंदी वियोगात्मक या विश्लिष्ट भाषा है।&lt;br /&gt;
*भाषा–परिवार के आधार पर हिंदी भारोपीय परिवार की भाषा है।&lt;br /&gt;
*[[भारत]] में 4 भाषा–परिवार— [[भारोपीय भाषा परिवार|भारोपीय]], द्रविड़, आस्ट्रिक व चीनी–तिब्बती मिलते हैं। [[भारत]] में बोलने वालों के प्रतिशत के आधार पर भारोपीय परिवार सबसे बड़ा भाषा परिवार है।&lt;br /&gt;
*हिंदी भारोपीय/ भारत [[यूरोप|यूरोपीय]] के भारतीय– [[ईरान|ईरानी]] शाखा के भारतीय आर्य (Indo–Aryan) उपशाखा से विकसित एक भाषा है। &lt;br /&gt;
*भारतीय आर्यभाषा को तीन कालों में विभक्त किया जाता है। &lt;br /&gt;
{{भारत के भाषा परिवार सूची1}}&lt;br /&gt;
हिंदी की आदि जननी [[संस्कृत]] है। संस्कृत [[पालि भाषा|पालि]], [[प्राकृत भाषा]] से होती हुई [[अपभ्रंश भाषा|अपभ्रंश]] तक पहुँचती है। फिर अपभ्रंश, [[अवहट्ट]] से गुजरती हुई प्राचीन/प्रारम्भिक हिंदी का रूप लेती है। विशुद्धतः, हिंदी भाषा के इतिहास का आरम्भ अपभ्रंश से माना जाता है। &lt;br /&gt;
*हिंदी का विकास क्रम- '''[[संस्कृत भाषा|संस्कृत]]→ [[पालि भाषा|पालि]]→ [[प्राकृत भाषा|प्राकृत]]→ [[अपभ्रंश भाषा|अपभ्रंश]]→ अवहट्ट→ प्राचीन / प्रारम्भिक हिंदी'''&lt;br /&gt;
==अपभ्रंश==&lt;br /&gt;
{{main|अपभ्रंश भाषा}}&lt;br /&gt;
[[अपभ्रंश भाषा]] का विकास 500 ई. से लेकर 1000 ई. के मध्य हुआ और इसमें [[साहित्य]] का आरम्भ 8वीं [[सदी]] ई. (स्वयंभू [[कवि]]) से हुआ, जो 13वीं सदी तक जारी रहा। अपभ्रंश (अप+भ्रंश+घञ्) शब्द का यों तो शाब्दिक अर्थ है 'पतन', किन्तु अपभ्रंश साहित्य से अभीष्ट है— प्राकृत भाषा से विकसित भाषा विशेष का साहित्य।&lt;br /&gt;
;प्रमुख रचनाकार-&lt;br /&gt;
[[स्वयंभुव मनु|स्वयंभू]]— अपभ्रंश का [[वाल्मीकि]] ('[[पउम चरिउ]]' अर्थात् राम काव्य), धनपाल ('भविस्सयत कहा'–अपभ्रंश का पहला प्रबन्ध काव्य), पुष्पदंत ('महापुराण', '[[जसहर चरिउ]]'), सरहपा, कण्हपा आदि सिद्धों की रचनाएँ ('चरिया पद', 'दोहाकोशी') आदि।&lt;br /&gt;
==अवहट्ट==&lt;br /&gt;
{{main|अवहट्ट भाषा}}&lt;br /&gt;
अवहट्ट 'अपभ्रंष्ट' शब्द का विकृत रूप है। इसे 'अपभ्रंश का अपभ्रंश' या 'परवर्ती अपभ्रंश' कह सकते हैं। अवहट्ट अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के बीच की संक्रमणकालीन/संक्रांतिकालीन भाषा है। इसका कालखंड 900 ई. से 1100 ई. तक निर्धारित किया जाता है। वैसे साहित्य में इसका प्रयोग 14वीं सदी तक होता रहा है। अब्दुर रहमान, दामोदर पंडित, ज्योतिरीश्वर ठाकुर, [[विद्यापति]] आदि रचनाकारों ने अपनी भाषा को 'अवहट्ट' या 'अवहट्ठ' कहा है। विद्यापति प्राकृत की तुलना में अपनी भाषा को मधुरतर बताते हैं। देश की भाषा सब लोगों के लिए मीठी है। इसे अवहट्ठा कहा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;'देसिल बयना सब जन मिट्ठा/ते तैसन जम्पञो अवहट्ठा'&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
;प्रमुख रचनाकार- &lt;br /&gt;
अद्दहमाण/अब्दुर रहमान ('संनेह रासय'/'संदेश रासक'), दामोदर पंडित ('उक्ति–व्यक्ति–प्रकरण'), ज्योतिरीश्वर ठाकुर ('वर्ण रत्नाकर'), विद्यापति ('कीर्तिलता') आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्राचीन हिंदी==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-purple&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;25%&amp;quot; style=&amp;quot;float:right; margin:10px&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का विकास&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot; style=&amp;quot;background:#dfe8e9&amp;quot;| '''शौरसेनी'''&lt;br /&gt;
| पश्चिमी हिंदी&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| [[राजस्थानी भाषा|राजस्थानी]]&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| [[गुजराती भाषा|गुजराती]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;background:#dfe8e9&amp;quot;| '''अर्द्धमागधी'''&lt;br /&gt;
| पूर्वी हिंदी&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; style=&amp;quot;background:#dfe8e9&amp;quot; | '''मागधी'''&lt;br /&gt;
| [[बिहारी भाषाएँ|बिहारी]]&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| [[उड़िया भाषा|उड़िया]]&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| [[बांग्ला भाषा|बांग्ला]]&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| [[असमिया भाषा|असमिया]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;background:#dfe8e9&amp;quot;|'''खस'''&lt;br /&gt;
| [[पहाड़ी बोली|पहाड़ी]] (शौरसेनी से प्रभावित)&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot; style=&amp;quot;background:#dfe8e9&amp;quot; | '''ब्राचड़'''&lt;br /&gt;
| [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]](शौरसेनी से प्रभावित)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[सिंधी भाषा|सिंधी]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;background:#dfe8e9&amp;quot;| '''महाराष्ट्री'''&lt;br /&gt;
| [[मराठी भाषा|मराठी]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
*मध्यदेशीय भाषा परम्परा की विशिष्ट उत्तराधिकारिणी होने के कारण हिंदी का स्थान आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं में सर्वोपरी है। &lt;br /&gt;
*प्राचीन हिंदी से अभिप्राय है— अपभ्रंश– अवहट्ट के बाद की भाषा।&lt;br /&gt;
*हिंदी का आदिकाल हिंदी भाषा का शिशुकाल है। यह वह काल था, जब अपभ्रंश–अवहट्ट का प्रभाव हिंदी भाषा पर मौजूद था और हिंदी की बोलियों के निश्चित व स्पष्ट स्वरूप विकसित नहीं हुए थे।&lt;br /&gt;
==हिंदी शब्द की व्युत्पत्ति==&lt;br /&gt;
हिंदी शब्द की व्युपत्ति भारत के उत्तर–पश्चिम में प्रवाहमान [[सिंधु नदी]] से सम्बन्धित है। अधिकांश [[विदेशी यात्री]] और आक्रान्ता उत्तर–पश्चिम सिंहद्वार से ही भारत आए। भारत में आने वाले इन विदेशियों ने जिस देश के दर्शन किए, वह '[[सिंधु]]' का देश था। [[ईरान]] ([[फ़ारस]]) के साथ भारत के बहुत प्राचीन काल से ही सम्बन्ध थे और ईरानी 'सिंधु' को 'हिन्दु' कहते थे। (सिंधु - हिन्दु, स का ह में तथा ध का द में परिवर्तन - [[पहलवी भाषा]] प्रवृत्ति के अनुसार ध्वनि परिवर्तन)। '''हिन्दू शब्द [[संस्कृत]] से प्रचलित है परंतु यह संस्कृत के 'सिन्धु' शब्द से विकसित है।''' हिन्दू से 'हिन्द' बना और फिर 'हिन्द' में [[फ़ारसी भाषा]] के सम्बन्ध कारक प्रत्यय 'ई' लगने से 'हिंदी' बन गया। 'हिंदी' का अर्थ है—'हिन्द का'। इस प्रकार हिंदी शब्द की उत्पत्ति हिन्द देश के निवासियों के अर्थ में हुई। आगे चलकर यह शब्द 'हिंदी की भाषा' के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। &lt;br /&gt;
उपर्युक्त बातों से तीन बातें सामने आती हैं—&lt;br /&gt;
#'हिंदी' शब्द का विकास कई चरणों में हुआ- '''सिंधु'''→ '''हिन्दु'''→ '''हिन्द+ई'''→ '''हिंदी'''। प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन ने अपने “हिन्दी-उर्दू का अद्वैत” शीर्षक आलेख में विस्तार से स्पष्ट किया है कि [[ईरान]] की प्राचीन [[अवेस्ता भाषा|भाषा अवेस्ता]] में “स्” ध्वनि नहीं बोली जाती थी। अवेस्ता में “स्” का उच्चारण “ह्” किया जाता था। उदाहरण के लिए [[संस्कृत]] के असुर शब्द का उच्चारण अहुर किया जाता था। अफ़ग़ानिस्तान के बाद की [[सिन्धु नदी]] के पार के हिन्दुस्तान के इलाके को प्राचीन फारसी साहित्य में “हिन्द” एवं “हिन्दुश” के नामों से पुकारा गया है। “हिन्द” के भूभाग की किसी भी वस्तु, भाषा तथा विचार के लिए विशेषण के रूप में “हिन्दीक” का प्रयोग होता था। हिन्दीक माने हिन्द का या हिन्द की। यही हिन्दीक शब्द [[अरबी भाषा|अरबी]] से होता हुआ ग्रीक में “इंदिका” तथा “इंदिके” हो गया। ग्रीक से लैटिन में यह “इंदिया” तथा लैटिन से अंग्रेज़ी में “इंडिया” शब्द रूप बन गए। यही कारण है कि अरबी एवं फ़ारसी साहित्य में “हिन्द” में बोली जाने वाली ज़बानों के लिए “ज़बान-ए-हिन्द” लफ्ज़ मिलता है। [[भारत]] में आने के बाद मुसलमानों ने “ज़बान-ए-हिन्दी” का प्रयोग [[आगरा]]-[[दिल्ली]] के आसपास बोली जाने वाली भाषा के लिए किया। “ज़बान-ए-हिन्दी” माने हिन्द में बोली जाने वाली जबान। इस इलाक़े के गैर-मुस्लिम लोग बोले जाने वाले भाषा-रूप को “भाखा” कहते थे, हिन्दी नहीं। [[कबीरदास]] की प्रसिद्ध पंक्ति है – संस्किरित है कूप जल, भाखा बहता नीर।&lt;br /&gt;
#'हिंदी' शब्द मूलतः फ़ारसी का है न कि 'हिंदी' भाषा का। यह ऐसे ही है जैसे बच्चा हमारे घर जनमे और उसका नामकरण हमारा पड़ोसी करे। हालाँकि कुछ कट्टर हिंदी प्रेमी 'हिंदी' शब्द की व्युत्पत्ति हिंदी भाषा में ही दिखाने की कोशिश करते हैं, जैसे - हिन (हनन करने वाला) + दु (दुष्ट)= हिन्दू अर्थात् दुष्टों का हनन करने वाला हिन्दू और उन लोगों की भाषा 'हिंदी'; हीन (हीनों)+दु (दलन)= हिन्दू अर्थात् हीनों का दलन करने वाला हिन्दू और उनकी भाषा 'हिंदी'। चूँकि इन व्युत्पत्तियों में प्रमाण कम, अनुमान अधिक है, इसलिए सामान्यतः इन्हें स्वीकार नहीं किया जाता। &lt;br /&gt;
#'हिंदी' शब्द के दो अर्थ हैं— 'हिन्द देश के निवासी' (यथा— '''हिंदी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा'''— इक़बाल) और 'हिंदी की भाषा'। हाँ, यह बात अलग है कि अब यह शब्द दो आरम्भिक अर्थों से पृथक हो गया है। इस देश के निवासियों को अब कोई हिंदी नहीं कहता, बल्कि भारतवासी, हिन्दुस्तानी आदि कहते हैं। दूसरे, इस देश की व्यापक भाषा के अर्थ में भी अब 'हिंदी' शब्द का प्रयोग नहीं होता, क्योंकि भारत में अनेक भाषाएँ हैं, जो सब 'हिंदी' नहीं कहलाती हैं। बेशक ये सभी 'हिन्द' की भाषाएँ हैं, लेकिन केवल 'हिंदी' नहीं हैं। उन्हें हम [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]], [[बांग्ला भाषा|बांग्ला]], [[असमिया भाषा|असमिया]], [[उड़िया भाषा|उड़िया]], [[मराठी भाषा|मराठी]] आदि नामों से पुकारते हैं। इसलिए 'हिंदी' की इन सब भाषाओं के लिए 'हिंदी' शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता। हिंदी' शब्द भाषा विशेष का वाचक नहीं है, बल्कि यह भाषा समूह का नाम है। हिंदी जिस भाषा समूह का नाम है, उसमें आज के हिंदी प्रदेश/क्षेत्र की 5 उपभाषाएँ तथा 17 बोलियाँ शामिल हैं। बोलियों में [[ब्रजभाषा]], [[अवधी भाषा|अवधी]] एवं [[खड़ी बोली]] को आगे चलकर [[मध्यकाल]] में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ है। &lt;br /&gt;
*'''ब्रजभाषा'''- प्राचीन हिंदी काल में [[ब्रजभाषा]] अपभ्रंश–अवहट्ट से ही जीवन रस लेती रही। अपभ्रंश–अवहट्ट की रचनाओं में ब्रजभाषा के फूटते हुए अंकुर को देखा जा सकता है। ब्रजभाषा [[साहित्य]] का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ सुधीर अग्रवाल का 'प्रद्युम्न चरित' (1354 ई.) है। &lt;br /&gt;
*'''अवधी'''- [[अवधी भाषा|अवधी]] की पहली कृति मुल्ला दाउद की 'चंद्रायन' या 'लोरकहा' (1370 ई.) मानी जाती है। इसके उपरान्त अवधी भाषा के साहित्य का उत्तरोत्तर विकास होता गया। &lt;br /&gt;
*'''खड़ी बोली'''- प्राचीन हिंदी काल में रचित [[खड़ी बोली]] साहित्य में खड़ी बोली के आरम्भिक प्रयोगों से उसके आदि रूप या बीज रूप का आभास मिलता है। खड़ी बोली का आदिकालीन रूप सरहपा आदि सिद्धों, [[गोरखनाथ]] आदि नाथों, [[अमीर ख़ुसरो]] जैसे सूफ़ियों, [[जयदेव]], [[संत नामदेव|नामदेव]], [[रामानंद]] आदि संतों की रचनाओं में उपलब्ध है। इन रचनाकारों में हमें अपभ्रंश–अवहट्ट से निकलती हुई खड़ी बोली स्पष्टतः दिखाई देती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मध्यकालीन हिंदी==&lt;br /&gt;
मध्यकाल में हिंदी का स्वरूप स्पष्ट हो गया तथा उसकी प्रमुख बोलियाँ विकसित हो गईं। इस काल में भाषा के तीन रूप निखरकर सामने आए— ब्रजभाषा, अवधी व खड़ी बोली। ब्रजभाषा और अवधी का अत्यधिक साहित्यिक विकास हुआ तथा तत्कालीन ब्रजभाषा साहित्य को कुछ देशी राज्यों का संरक्षण भी प्राप्त हुआ। इनके अतिरिक्त मध्यकाल में खड़ी बोली के मिश्रित रूप का साहित्य में प्रयोग होता रहा। इसी खड़ी बोली का 14वीं सदी में दक्षिण में प्रवेश हुआ, अतः वहाँ पर इसका साहित्य में अधिक प्रयोग हुआ। 18वीं सदी में खड़ी बोली को मुसलमान शासकों का संरक्षण मिला तथा इसके विकास को नई दिशा मिली। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Hindi-Area.jpg|thumb|250px|[[भारत]] में हिंदी भाषी क्षेत्र]]&lt;br /&gt;
====ब्रजभाषा====&lt;br /&gt;
{{main|ब्रजभाषा}}&lt;br /&gt;
हिंदी के मध्यकाल में मध्य देश की महान भाषा परम्परा के उत्तरादायित्व का पूरा निर्वाह ब्रजभाषा ने किया। यह अपने समय की परिनिष्ठित व उच्च कोटि की साहित्यिक भाषा थी, जिसको गौरवान्वित करने का सर्वाधिक श्रेय हिंदी के कृष्णभक्त कवियों को है। पूर्व मध्यकाल (अर्थात् भक्तिकाल) में कृष्णभक्त कवियों ने अपने साहित्य में ब्रजभाषा का चरम विकास किया। पुष्टि मार्ग/शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय के [[सूरदास]] (सूरसागर), [[नंददास]], [[निम्बार्क संप्रदाय]] के श्री भट्ट, [[चैतन्य सम्प्रदाय]] के गदाधर भट्ट, [[राधावल्लभ सम्प्रदाय]] के [[हित हरिवंश]] ([[श्रीकृष्ण]] की [[बाँसुरी]] के अवतार) एवं सम्प्रदाय–निरपेक्ष कवियों में [[रसखान]], [[मीराबाई]] आदि प्रमुख कृष्णभक्त कवियों ने ब्रजभाषा के साहित्यिक विकास में अमूल्य योगदान दिया। इनमें सर्वप्रमुख स्थान सूरदास का है, जिन्हें 'अष्टछाप का जहाज़' कहा जाता है। उत्तर मध्यकाल (अर्थात् रीतिकाल) में अनेक आचार्यों एवं कवियों ने ब्रजभाषा में लाक्षणिक एवं रीति ग्रंथ लिखकर ब्रजभाषा के साहित्य को समृद्ध किया। रीतिबद्ध कवियों में [[केशवदास]], [[मतिराम]], [[बिहारी लाल|बिहारी]], देव, [[पद्माकर]], भिखारी दास, सेनापति, आदि तथा रीतिमुक्त कवियों में [[घनानंद]], आलम, बोधा आदि प्रमुख हैं। (ब्रजबुलि—[[बंगाल]] में कृष्णभक्त कवियों के द्वारा प्रचारित भाषा का नाम।)&lt;br /&gt;
====अवधी====&lt;br /&gt;
{{main|अवधी भाषा}}&lt;br /&gt;
अवधी को साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय सूफ़ी/प्रेममार्गी कवियों को है। [[कुतबन]] ('[[मृगावती]]'), [[मलिक मुहम्मद जायसी|जायसी]] ('पद्मावत'), [[मंझन]] ('[[मधुमालती]]'), [[आलम]] ('[[माधवानल कामकंदला]]'), [[उसमान]] ('चित्रावली'), [[नूर मुहम्मद]] ('[[इन्द्रावती -नूर मुहम्मद|इन्द्रावती]]'), [[कासिमशाह]] ('हंस जवाहिर'), शेख निसार ('यूसुफ़ जुलेखा'), अलीशाह ('प्रेम चिंगारी') आदि सूफ़ी कवियों ने अवधी को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। इनमें सर्वप्रमुख जायसी थे। अवधी को रामभक्त कवियों ने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया, विशेषकर [[तुलसीदास]] ने '[[रामचरितमानस]]' की रचना बैसवाड़ी अवधी में कर अवधी भाषा को जिस साहित्यिक ऊँचाई पर पहुँचाया, वह अतुलनीय है। मध्यकाल में साहित्यिक अवधी का चरमोत्कर्ष दो कवियों में मिलता है, जायसी और तुलसीदास। जायसी के यहाँ जहाँ अवधी का ठेठ ग्रामीण रूप मिलता है, वहाँ तुलसी के यहाँ अवधी का तत्सममुखी रूप है। (गोहारी/गोयारी— [[बंगाल]] में सूफ़ियों द्वारा प्रचारित अवधी भाषा का नाम।)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====खड़ी बोली====&lt;br /&gt;
{{main|खड़ी बोली}}&lt;br /&gt;
मध्यकाल में खड़ी बोली का मुख्य केन्द्र उत्तर से बदलकर दक्कन में हो गया। इस प्रकार, मध्यकाल में खड़ी बोली के दो रूप हो गए— उत्तरी हिंदी व दक्कनी हिंदी। खड़ी बोली मध्यकाल रूप [[कबीर]], [[नानक]], [[दादू दयाल|दादू]], मलूकदास, रज्जब आदि संतों; गंग की 'चन्द छन्द वर्णन की महिमा', [[रहीम]] के 'मदनाष्टक', आलम के 'सुदामा चरित', जटमल की 'गोरा बादल की कथा', वली, सौदा, इन्शा, नज़ीर आदि दक्कनी एवं उर्दू के कवियों, 'कुतुबशतम' (17वीं सदी), 'भोगलू पुराण' (18वीं सदी), संत प्राणनाथ के 'कुलजमस्वरूप' आदि में मिलता है।&lt;br /&gt;
==आधुनिक हिंदी==&lt;br /&gt;
*हिंदी के आधुनिक काल तक आते–आते ब्रजभाषा जनभाषा से काफ़ी दूर हट चुकी थी और अवधी ने तो बहुत पहले से ही साहित्य से मुँह मोड़ लिया था। 19वीं सदी के मध्य तक अंग्रेज़ी सत्ता का महत्तम विस्तार भारत में हो चुका था। इस राजनीतिक परिवर्तन का प्रभाव मध्य देश की भाषा हिंदी पर भी पड़ा। नवीन राजनीतिक परिस्थितियों ने खड़ी बोली को प्रोत्साहन प्रदान किया। जब ब्रजभाषा और अवधी का साहित्यिक रूप जनभाषा से दूर हो गया तब उनका स्थान खड़ी बोली धीरे–धीरे लेने लगी। अंग्रेज़ी सरकार ने भी इसका प्रयोग आरम्भ कर दिया। &lt;br /&gt;
*हिंदी के आधुनिक काल में प्रारम्भ में एक ओर उर्दू का प्रचार होने और दूसरी ओर काव्य की भाषा ब्रजभाषा होने के कारण खड़ी बोली को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ा। 19वीं सदी तक कविता की भाषा ब्रजभाषा और गद्य की भाषा खड़ी बोली रही। 20वीं सदी के आते–आते खड़ी बोली गद्य–पद्य दोनों की ही साहित्यिक भाषा बन गई। &lt;br /&gt;
*इस युग में खड़ी बोली को प्रतिष्ठित करने में विभिन्न धार्मिक सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों ने बड़ी सहायता की। फलतः खड़ी बोली साहित्य की सर्वप्रमुख भाषा बन गयी।&lt;br /&gt;
==खड़ी बोली==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kolaz-hindi-writer-poet.jpg|thumb|प्रमुख हिंदी साहित्यकारों की एक झलक]]&lt;br /&gt;
====भारतेन्दु पूर्व युग====&lt;br /&gt;
खड़ी बोली गद्य के आरम्भिक रचनाकारों में फ़ोर्ट विलियम कॉलेज के बाहर दो रचनाकारों— सदासुख लाल 'नियाज' (सुखसागर) व [[इंशा अल्ला ख़ाँ]] (रानी केतकी की कहानी) तथा फ़ोर्ट विलियम कॉलेज, [[कलकत्ता]] के दो भाषा मुंशियों— [[लल्लू लालजी]] (प्रेम सागर) व सदल मिश्र (नासिकेतोपाख्यान) के नाम उल्लेखनीय हैं। भारतेन्दु पूर्व युग में मुख्य संघर्ष हिंदी की स्वीकृति और प्रतिष्ठा को लेकर था। इस युग के दो प्रसिद्ध लेखकों— राजा शिव प्रसाद 'सितारे हिन्द' व राजा लक्ष्मण सिंह ने हिंदी के स्वरूप निर्धारण के सवाल पर दो सीमान्तों का अनुगमन किया। राजा शिव प्रसाद ने हिंदी का गँवारुपन दूर कर उसे उर्दू–ए–मुअल्ला बना दिया तो राजा लक्ष्मण सिंह ने विशुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिंदी का समर्थन किया।&lt;br /&gt;
====भारतेन्दु युग====&lt;br /&gt;
(1850 ई.–[[1900]] ई.)&lt;br /&gt;
इन दोनों के बीच सर्वमान्य हिंदी गद्य की प्रतिष्ठा कर गद्य साहित्य की विविध विधाओं का ऐतिहासिक कार्य भारतेन्दु युग में हुआ। हिंदी सही मायने में [[भारतेन्दु हरिश्चंद्र|भारतेन्दु]] के काल में 'नई चाल में ढली' और उनके समय में ही हिंदी के गद्य के बहुमुखी रूप का सूत्रपात हुआ। उन्होंने न केवल स्वयं रचना की बल्कि अपना एक लेखक मंडल भी तैयार किया, जिसे 'भारतेन्दु मंडल' कहा गया। भारतेन्दु युग की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि गद्य रचना के लिए खड़ी बोली को माध्यम के रूप में अपनाकर युगानुरूप स्वस्थ दृष्टिकोण का परिचय दिया। लेकिन पद्य रचना के मसले में ब्रजभाषा या खड़ी बोली को अपनाने के सवाल पर विवाद बना रहा, जिसका अन्त द्विवेदी के युग में जाकर हुआ। &lt;br /&gt;
====द्विवेदी युग====&lt;br /&gt;
([[1900]] ई.–[[1920]] ई.)&lt;br /&gt;
खड़ी बोली और [[हिंदी साहित्य]] के सौभाग्य से [[1903]] ई. में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' पत्रिका के सम्पादन का भार सम्भाला। वे सरल और शुद्ध भाषा के प्रयोग के हिमायती थे। वे लेखकों की [[वर्तनी (हिंदी)|वर्तनी]] अथवा त्रुटियों का संशोधन स्वयं करते चलते थे। उन्होंने हिंदी के परिष्कार का बीड़ा उठाया और उसे बख़ूबी अन्जाम दिया। गद्य तो भारतेन्दु युग से ही सफलतापूर्वक खड़ी बोली में लिखा जा रहा था, अब पद्य की व्यावहारिक भाषा भी एकमात्र खड़ी बोली प्रतिष्ठित होनी लगी। इस प्रकार ब्रजभाषा, जिसके साथ में 'भाषा' शब्द जुड़ा हुआ है, अपने क्षेत्र में सीमित हो गई अर्थात् 'बोली' बन गई। इसके मुक़ाबले में खड़ी बोली, जिसके साथ 'बोली' शब्द लगा है, 'भाषा बन गई', और इसका सही नाम हिंदी हो गया। अब खड़ी बोली [[दिल्ली]] के आसपास की [[मेरठ]]–जनपदीय बोली नहीं रह गई, अपितु यह समस्त उत्तरी भारत के साहित्य का माध्यम बन गई। द्विवेदी युग में साहित्य रचना की विविध विधाएँ विकसित हुई।। महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्याम सुन्दर दास, पद्म सिंह शर्मा, माधव प्रसाद मिश्र, पूर्णसिंह, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी  आदि के अवदान विशेषतः उल्लेखनीय हैं। इसी दौरान वर्ष [[1918]] में [[इन्दौर]] में गांधी जी की अध्यक्षता में 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के द्वारा हिन्दी [[राष्ट्रभाषा]] मानी गयी। इस प्रस्ताव के स्वीकृत होने के बाद दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये ''दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा'' की भी स्थापना हुयी जिसका मुख्यालय [[मद्रास]] में था।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.gandhibhawan.com/index.php|title=बापू कथा, पृष्ठ 17  |accessmonthday=30 जनवरी |accessyear=2013 |last= |first= |authorlink=लेखक हरिभाउ उपाध्याय |format= |publisher= सर्व सेवा संघ प्रकाशन वाराणसी पृष्ठ 17  |language=हिंदी }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====छायावाद युग====&lt;br /&gt;
([[1920]] ई.–[[1936]] ई. एवं उसके बाद) &lt;br /&gt;
साहित्यिक खड़ी बोली के विकास में छायावाद युग का योगदान काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। [[जयशंकर प्रसाद|प्रसाद]], [[सुमित्रानंदन पंत|पंत]], [[सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला|निराला]], [[महादेवी वर्मा]] और राम कुमार आदि ने महती योगदान किया। इनकी रचनाओं को देखते हुए यह कोई नहीं कह सकता कि खड़ी बोली सूक्ष्म भावों को अभिव्यक्त करने में ब्रजभाषा से कम समर्थ है। हिंदी में अनेक भाषायी गुणों का समावेश हुआ। अभिव्यजंना की विविधता, बिंबों की लाक्षणिकता, रसात्मक लालित्य छायावाद युग की भाषा की अन्यतम विशेषताएँ हैं। हिंदी काव्य में छायावाद युग के बाद प्रगतिवाद युग ([[1936]] ई.–[[1946]] ई.) प्रयोगवाद युग (1943) आदि आए। इस दौर में खड़ी बोली का काव्य भाषा के रूप में उत्तरोत्तर विकास होता गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद्य के ही नहीं, गद्य के सन्दर्भ में भी छायावाद युग साहित्यिक खड़ी बोली के विकास का स्वर्ण युग था। कथा साहित्य (उपन्यास व कहानी) में [[प्रेमचंद]], नाटक में [[जयशंकर प्रसाद]], आलोचना में आचार्य [[रामचंद्र शुक्ल]] ने जो भाषा–शैलियाँ और मर्यादाएँ स्थापित कीं, उनका अनुसरण आज भी किया जा रहा है। गद्य साहित्य के क्षेत्र में इनके महत्त्व का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गद्य–साहित्य के विभिन्न विधाओं के इतिहास में कालों का नामकरण इनके नाम को केन्द्र में रखकर ही किया गया है। जैसे उपन्यास के इतिहास में प्रेमचंद– पूर्व युग, प्रेमचंद युग, प्रेमचंदोत्तर युग; नाटक के इतिहास में प्रसाद– पूर्व युग, प्रसाद युग, प्रसादोत्तर युग; आलोचना के इतिहास में शुक्ल– पूर्व युग, शुक्ल युग, शुक्लोत्तर युग।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिंदी के विभिन्न नाम या रूप== &lt;br /&gt;
====हिन्दवी====&lt;br /&gt;
हिन्दवी को हिन्दुई, जबान–ए–हिन्द, देहलवी नामों से भी जाना जाता है। मध्यकाल में मध्यदेश के हिन्दुओं की भाषा, जिसमें अरबी–फ़ारसी शब्दों का अभाव है। (सर्वप्रथम [[अमीर ख़ुसरो]] (1253-1325) ने मध्य देश की भाषा के लिए हिन्दवी, हिंदी शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने देशी भाषा हिन्दवी, हिंदी के प्रचार–प्रसार के लिए एक फ़ारसी–हिंदी कोश 'ख़ालिक बारी' की रचना की, जिसमें हिन्दवी शब्द 30 बार, हिंदी शब्द 5 बार देशी भाषा के लिए प्रयुक्त हुआ है।)&lt;br /&gt;
====भाषा====&lt;br /&gt;
भाषा को भाखा भी कहा जाता है। विद्यापति, [[कबीर]], [[तुलसी]], [[केशवदास]] आदि ने भाषा शब्द का प्रयोग हिंदी के लिए किया है। (19वीं सदी के प्रारम्भ तक इस शब्द का प्रयोग होता रहा। फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में नियुक्त हिंदी अध्यापकों को 'भाषा मुंशी' के नाम से अभिहित करना इसी बात का सूचक है।)&lt;br /&gt;
====रेख्ता====&lt;br /&gt;
मध्यकाल में [[मुसलमान|मुसलमानों]] में प्रचलित अरबी–फ़ारसी शब्दों से मिश्रित कविता की भाषा। (जैसे– मीर, [[मिर्ज़ा ग़ालिब]] की रचनाएँ)&lt;br /&gt;
====दक्खिनी====&lt;br /&gt;
इसे दक्कनी नाम से भी जाना जाता है। मध्यकाल में दक्कन के मुसलमानों के द्वारा फ़ारसी लिपि में लिखी जाने वाली भाषा। (हिंदी में गद्य रचना परम्परा की शुरुआत करने का श्रेय दक्कनी हिंदी के रचनाकारों को ही है। दक्कनी हिंदी को उत्तर भारत में लाने का श्रेय प्रसिद्ध शायर वली दक्कनी (1688-1741) को है। वह मुग़ल शासक मुहम्मद शाह 'रंगीला' के शासन काल में [[दिल्ली]] पहुँचा और उत्तरी भारत में दक्कनी हिंदी को लोकप्रिय बनाया।)&lt;br /&gt;
====खड़ी बोली====&lt;br /&gt;
खड़ी बोली की तीन शैलियाँ हैं—&lt;br /&gt;
#हिंदी, शुद्ध हिंदी, उच्च हिंदी, नागरी हिंदी, आर्यभाषा– नागरी लिपि में लिखित संस्कृत बहुल खड़ी बोली (जैसे—जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ)।&lt;br /&gt;
#उर्दू, जबान–ए–उर्दू, जबान–ए–उर्दू–मुअल्ला— फ़ारसी लिपि में लिखित अरबी—फ़ारसी बहुल खड़ी बोली।&lt;br /&gt;
#हिन्दुस्तानी— हिंदी और उर्दू का मिश्रित रूप व आमजन द्वारा प्रयुक्त (जैसे–[[प्रेमचंद]] की रचनाएँ)।&amp;lt;ref&amp;gt;13वीं सदी से 18वीं सदी तक हिंदी–उर्दू में कोई मौलिक भेद नहीं था।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==हिंदी के विभिन्न अर्थ==&lt;br /&gt;
====भाषा शास्त्रीय अर्थ====&lt;br /&gt;
नागरी लिपि में लिखित संस्कृत बहुल खड़ी बोली।&lt;br /&gt;
====संवैधानिक/क़ानूनी अर्थ====&lt;br /&gt;
संविधान के अनुसार हिंदी भारत संघ की राजभाषा या अधिकृत भाषा तथा अनेक राज्यों की राजभाषा है।&lt;br /&gt;
====सामान्य अर्थ====&lt;br /&gt;
समस्त हिंदी भाषी क्षेत्र की परिनिष्ठित भाषा अर्थात् शासन, शिक्षा, साहित्य, व्यापार आदि की भाषा।&lt;br /&gt;
====व्यापक अर्थ====&lt;br /&gt;
आधुनिक युग में हिंदी को केवल खड़ी बोली में ही सीमित नहीं किया जा सकता। हिंदी की सभी उपभाषाएँ और बोलियाँ हिंदी के व्यापक अर्थ में आ जाती हैं। &lt;br /&gt;
==हिंदी का राष्ट्रभाषा के रूप में विकास==&lt;br /&gt;
====राष्ट्रभाषा क्या है====&lt;br /&gt;
*राष्ट्रभाषा का शाब्दिक अर्थ है—समस्त राष्ट्र में प्रयुक्त भाषा अर्थात् आमजन की भाषा (जनभाषा)। जो भाषा समस्त राष्ट्र में जन–जन के विचार–विनिमय का माध्यम हो, वह राष्ट्रभाषा कहलाती है।&lt;br /&gt;
*राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय एकता एवं अंतर्राष्ट्रीय संवाद सम्पर्क की आवश्यकता की उपज होती है। वैसे तो सभी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँ होती हैं, किन्तु राष्ट्र की जनता जब स्थानीय एवं तत्कालिक हितों व पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर अपने राष्ट्र की कई भाषाओं में से किसी एक भाषा को चुनकर उसे राष्ट्रीय अस्मिता का एक आवश्यक उपादान समझने लगती है तो वही राष्ट्रभाषा है। &lt;br /&gt;
*स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभाषा की आवश्यकता होती है। भारत के सन्दर्भ में इस आवश्यकता की पूर्ति हिंदी ने की। यही कारण है कि हिंदी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान&amp;lt;ref&amp;gt;विशेषतः 1900 ई.-1947 ई.&amp;lt;/ref&amp;gt; राष्ट्रभाषा बनी। &lt;br /&gt;
* राष्ट्रभाषा शब्द कोई संवैधानिक शब्द नहीं है, बल्कि यह प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है। &lt;br /&gt;
* राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक शर्त देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है। &lt;br /&gt;
* राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्क–भाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होता है। &lt;br /&gt;
* राष्ट्रभाषा हमेशा स्वभाषा ही हो सकती है क्योंकि उसी के साथ जनता का भावनात्मक लगाव होता है।&lt;br /&gt;
* राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है।&lt;br /&gt;
====अंग्रेज़ों का योगदान====&lt;br /&gt;
*राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्क भाषा होती है। हिंदी दीर्घकाल से सारे देश में जन–जन के पारस्परिक सम्पर्क की भाषा रही है। यह केवल उत्तरी भारत की नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के आचार्यों [[वल्लभाचार्य]], [[रामानुज]], [[रामानंद]] आदि ने भी इसी भाषा के माध्यम से अपने मतों का प्रचार किया था। अहिंदी भाषी राज्यों के भक्त–संत कवियों (जैसे—[[असम]] के शंकरदेव, [[महाराष्ट्र]] के [[ज्ञानेश्वर]] व नामदेव, [[गुजरात]] के [[नरसी मेहता]], बंगाल के [[चैतन्य महाप्रभु|चैतन्य]] आदि) ने इसी भाषा को अपने धर्म और साहित्य का माध्यम बनाया था। &lt;br /&gt;
*यही कारण था कि जनता और सरकार के बीच संवाद स्थापना के क्रम में फ़ारसी या अंग्रेज़ी के माध्यम से दिक्कतें पेश आईं तो कम्पनी सरकार ने फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में हिन्दुस्तानी विभाग खोलकर अधिकारियों को हिंदी सिखाने की व्यवस्था की। यहाँ से हिंदी पढ़े हुए अधिकारियों ने भिन्न–भिन्न क्षेत्रों में उसका प्रत्यक्ष लाभ देकर मुक्त कंठ से हिंदी को सराहा। &lt;br /&gt;
*'''सी. टी. मेटकाफ़ ने 1806 ई. में अपने शिक्षा गुरु [[जॉन गिलक्राइस्ट]] को लिखा'''— 'भारत के जिस भाग में भी मुझे काम करना पड़ा है, [[कलकत्ता]] से लेकर [[लाहौर]] तक, कुमाऊँ के पहाड़ों से लेकर [[नर्मदा नदी]] तक मैंने उस भाषा का आम व्यवहार देखा है, जिसकी शिक्षा आपने मुझे दी है। मैं [[कन्याकुमारी]] से लेकर [[कश्मीर]] तक या जावा से सिंधु तक इस विश्वास से यात्रा करने की हिम्मत कर सकता हूँ कि मुझे हर जगह ऐसे लोग मिल जाएँगे जो हिन्दुस्तानी बोल लेते होंगे।'&lt;br /&gt;
*'''टॉमस रोबक ने 1807 ई. में लिखा'''— 'जैसे [[इंग्लैण्ड]] जाने वाले को लैटिन सेक्सन या फ़्रेंच के बदले अंग्रेज़ी सीखनी चाहिए, वैसे ही भारत आने वाले को अरबी–फ़ारसी या संस्कृत के बदले हिन्दुस्तानी सीखनी चाहिए।' &lt;br /&gt;
*'''विलियम केरी ने 1816 ई. में लिखा'''— 'हिंदी किसी एक प्रदेश की भाषा नहीं बल्कि देश में सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है।'&lt;br /&gt;
*'''एच. टी. कोलब्रुक ने लिखा'''— 'जिस भाषा का व्यवहार भारत के प्रत्येक प्रान्त के लोग करते हैं, जो पढ़े–लिखे तथा अनपढ़ दोनों की साधारण बोलचाल की भाषा है, जिसको प्रत्येक गाँव में थोड़े बहुत लोग अवश्य ही समझ लेते हैं, उसी का यथार्थ नाम हिंदी है।'&lt;br /&gt;
*'''[[जार्ज ग्रियर्सन]] ने हिंदी को 'आम बोलचाल की महाभाषा' कहा है।&lt;br /&gt;
*इन विद्वानों के मंतव्यों से स्पष्ट है कि हिंदी की व्यावहारिक उपयोगिता, देशव्यापी प्रसार एवं प्रयोगगत लचीलेपन के कारण [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] ने हिंदी को अपनाया। उस समय हिंदी और उर्दू को एक ही भाषा माना जाता था। अंग्रेज़ों ने हिंदी को प्रयोग में लाकर हिंदी की महती संभावनाओं की ओर राष्ट्रीय नेताओं एवं साहित्यकारों का ध्यान खींचा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====धर्म/समाज सुधारकों का योगदान====&lt;br /&gt;
*धर्म/समाज सुधार की प्रायः सभी संस्थाओं ने हिंदी के महत्त्व को भाँपा और हिंदी की हिमायत की। &lt;br /&gt;
*[[ब्रह्म समाज]] (1828 ई.) के संस्थापक [[राजा राममोहन राय]] ने कहा, '''इस समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है।''' ब्रह्मसमाजी [[केशव चंद्र सेन]] ने 1875 ई. में एक लेख लिखा, भारतीय एकता कैसे हो, 'जिसमें उन्होंने लिखा— '''उपाय है सारे भारत में एक ही भाषा का व्यवहार।''' अभी जितनी भाषाएँ भारत में प्रचलित हैं, उनमें हिंदी भाषा लगभग सभी जगह प्रचलित है। यह हिंदी अगर भारतवर्ष की एकमात्र भाषा बन जाए तो यह काम सहज ही और शीघ्र ही सम्पन्न हो सकता है। एक अन्य ब्रह्मसमाजी नवीन चंद्र राय ने [[पंजाब]] में हिंदी के विकास के लिए स्तुत्य योगदान दिया। &lt;br /&gt;
*[[आर्य समाज]] (1875 ई.) के संस्थापक [[स्वामी दयानंद सरस्वती]] गुजराती भाषी थे एवं [[गुजराती भाषा|गुजराती]] व [[संस्कृत]] के अच्छे जानकार थे। हिंदी का उन्हें सिर्फ़ कामचलाऊ ज्ञान था, पर अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए तथा देश की एकता को मज़बूत करने के लिए उन्होंने अपना सारा धार्मिक साहित्य हिंदी में ही लिखा। उनका कहना था कि '''हिंदी के द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।''' वे इस 'आर्यभाषा' को सर्वात्मना देशोन्नति का मुख्य आधार मानते थे। उन्होंने हिंदी के प्रयोग को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। वे कहते थे, 'मेरी आँखें उस दिन को देखना चाहती हैं, जब [[कश्मीर]] से [[कन्याकुमारी]] तक सब भारतीय एक भाषा समझने और बोलने लग जाएँगे। &lt;br /&gt;
*अरविन्द दर्शन के प्रणेता [[अरविन्द घोष]] की सलाह थी कि 'लोग अपनी–अपनी मातृभाषा की रक्षा करते हुए सामान्य भाषा के रूप में हिंदी को ग्रहण करें।'&lt;br /&gt;
*[[थियोसोफ़िकल सोसाइटी]] (1875 ई.) की संचालिका [[एनी बेसेंट]] ने कहा था, &amp;quot;भारतवर्ष के भिन्न–भिन्न भागों में जो अनेक देशी भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें एक भाषा ऐसी है जिसमें शेष सब भाषाओं की अपेक्षा एक भारी विशेषता है, वह यह कि उसका प्रचार सबसे अधिक है। वह भाषा हिंदी है। हिंदी जानने वाला आदमी सम्पूर्ण भारतवर्ष में यात्रा कर सकता है और उसे हर जगह हिंदी बोलने वाले मिल सकते हैं। भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।&amp;quot;&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त धार्मिक/सामाजिक संस्थाओं के अतिरिक्त [[प्रार्थना समाज]]&amp;lt;ref&amp;gt;स्थापना 1867 ई., संस्थापक—आत्मारंग पाण्डुरंग&amp;lt;/ref&amp;gt;, सनातन धर्म सभा&amp;lt;ref&amp;gt;स्थापना 1895 ई., संस्थापक—[[दीनदयाल उपाध्याय|पंडित दीनदयाल]]&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[रामकृष्ण मिशन]]&amp;lt;ref&amp;gt;स्थापना 1897 ई., संस्थापक—[[स्वामी विवेकानंद]]&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि ने हिंदी के प्रचार में योग दिया। &lt;br /&gt;
*इससे लगता है कि धर्म/समाज सुधारकों की यह सोच बन चुकी थी कि राष्ट्रीय स्तर पर संवाद स्थापित करने के लिए हिंदी आवश्यक है। वे जानते थे कि हिंदी बहुसंख्यक जन की भाषा है, एक प्रान्त के लोग दूसरे प्रान्त के लोगों से सिर्फ़ इस भाषा में ही विचारों का आदान–प्रदान कर सकते हैं। भावी राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को बढ़ाने का कार्य इन्हीं धर्म/समाज सुधारकों ने किया।&lt;br /&gt;
====कांग्रेस के नेताओं का योगदान====&lt;br /&gt;
*[[1885]] ई. में [[कांग्रेस]] की स्थापना हुई। जैसे–जैसे कांग्रेस का राष्ट्रीय आंदोलन ज़ोर पकड़ता गया, वैसे–वैसे राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय झण्डा एवं राष्ट्रभाषा के प्रति आग्रह बढ़ता ही गया।&lt;br /&gt;
*[[1917]] ई. में [[लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक]] ने कहा, &amp;quot;यद्यपि मैं उन लोगों में से हूँ, जो चाहते हैं और जिनका विचार है कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।&amp;quot; तिलक ने भारतवासियों से आग्रह किया कि वे हिंदी सीखें। &lt;br /&gt;
*[[महात्मा गाँधी]] राष्ट्र के लिए राष्ट्रभाषा को नितांत आवश्यक मानते थे। उनका कहना था, &amp;quot;राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।&amp;quot; गाँधीजी हिंदी के प्रश्न को स्वराज का प्रश्न मानते थे— &amp;quot;हिंदी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।&amp;quot; उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में सामने रखकर भाषा–समस्या पर गम्भीरता से विचार किया। 1917 ई. में भड़ौंच में आयोजित गुजरात शिक्षा परिषद के अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए गाँधीजी ने कहा, &lt;br /&gt;
'''राष्ट्रभाषा के लिए 5 लक्षण या शर्तें होनी चाहिए'''—&lt;br /&gt;
#अमलदारों के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए।&lt;br /&gt;
#यह ज़रूरी है कि भारतवर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हों।&lt;br /&gt;
#उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का अपनी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवहार होना चाहिए। &lt;br /&gt;
#राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए।&lt;br /&gt;
#उस भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्पस्थायी स्थिति पर ज़ोर नहीं देना चाहिए।&amp;quot;&lt;br /&gt;
वर्ष 1918 ई. में हिंदी साहित्य सम्मेलन के [[इन्दौर]] अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए गाँधी जी ने राष्ट्रभाषा हिंदी का समर्थन किया, &amp;quot;मेरा यह मत है कि हिंदी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए।&amp;quot; इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि प्रतिवर्ष 6 दक्षिण भारतीय युवक हिंदी सीखने के लिए प्रयाग भेजें जाएँ और 6 उत्तर भारतीय युवक को दक्षिण भाषाएँ सीखने तथा हिंदी का प्रसार करने के लिए [[दक्षिण भारत]] में भेजा जाए। इन्दौर सम्मेलन के बाद उन्होंने हिंदी के कार्य को राष्ट्रीय व्रत बना दिया। दक्षिण में प्रथम हिंदी प्रचारक के रूप में गाँधीजी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास गाँधी को दक्षिण में [[चेन्नई]] भेजा। गाँधीजी की प्रेरणा से मद्रास (1927 ई.) एवं वर्धा (1936 ई.) में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएँ स्थापित की गईं। &lt;br /&gt;
*वर्ष 1925 ई. में कांग्रेस के [[कानपुर]] अधिवेशन में गाँधीजी की प्रेरणा से यह प्रस्ताव पारित हुआ कि 'कांग्रेस का, कांग्रेस की महासमिति का और कार्यकारिणी समिति का काम–काज आमतौर पर हिंदी में चलाया जाएगा।' इस प्रस्ताव में हिंदी–आंदोलन को बड़ा बल मिला। &lt;br /&gt;
*वर्ष [[1927]] ई. में गाँधीजी ने लिखा, &amp;quot;वास्तव में ये [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]] में बोलने वाले नेता हैं, जो आम जनता में हमारा काम जल्दी आगे बढ़ने नहीं देते। वे हिंदी सीखने से इंकार करते हैं, जबकि हिंदी द्रविड़ प्रदेश में भी तीन महीने के अन्दर सीखी जा सकती है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Hindi.jpg|300px|right|thumb]]&lt;br /&gt;
*वर्ष [[1927]] ई. में [[सी. राजगोपालाचारी]] ने दक्षिण वालों को हिंदी सीखने की सलाह दी और कहा, &amp;quot;हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा तो है ही, यही जनतंत्रात्मक भारत में [[राजभाषा]] भी होगी।&amp;quot;&lt;br /&gt;
*वर्ष [[1928]] ई. में प्रस्तुत [[नेहरू रिपोर्ट]] में भाषा सम्बन्धी सिफ़ारिश में कहा गया था, &amp;quot;[[देवनागरी लिपि|देवनागरी]] अथवा [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]] में लिखी जाने वाली हिन्दुस्तानी भारत की राष्ट्रभाषा होगी, परन्तु कुछ समय के लिए अंग्रेज़ी का उपयोग ज़ारी रहेगा।&amp;quot; सिवाय 'देवनागरी या फ़ारसी' की जगह 'देवनागरी' तथा 'हिन्दुस्तानी' की जगह 'हिंदी' रख देने के अंततः स्वतंत्र भारत के संविधान में इसी मत को अपना लिया गया।&lt;br /&gt;
*वर्ष 1929 ई. में [[सुभाषचंद्र बोस]] ने कहा, &amp;quot;प्रान्तीय ईर्ष्या–द्वेष को दूर करने में जितनी सहायता इस हिंदी प्रचार से मिलेगी, उतनी दूसरी किसी चीज़ से नहीं मिल सकती। अपनी प्रान्तीय भाषाओं की भरपूर उन्नति कीजिए, उसमें कोई बाधा नहीं डालना चाहता और न हम किसी की बाधा को सहन ही कर सकते हैं। पर सारे प्रान्तों की सार्वजनिक भाषा का पद हिंदी या हिन्दुस्तानी को ही मिला है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
*वर्ष 1931 ई. में गाँधीजी ने लिखा, &amp;quot;यदि स्वराज्य अंगेज़ी–पढ़े भारतवासियों का है और केवल उनके लिए है तो सम्पर्क भाषा अवश्य अंग्रेज़ी होगी। यदि वह करोड़ों भूखे लोगों, करोड़ों निरक्षर लोगों, निरक्षर स्त्रियों, सताए हुए अछूतों के लिए है तो सम्पर्क भाषा केवल हिंदी हो सकती है।&amp;quot; गाँधीजी जनता की बात जनता की भाषा में करने के पक्षधर थे। &lt;br /&gt;
*वर्ष 1936 ई. में गाँधीजी ने कहा, &amp;quot;अगर हिन्दुस्तान को सचमुच आगे बढ़ना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही बन सकती है, क्योंकि जो स्थान हिंदी को प्राप्त है, वह किसी और भाषा को नहीं मिल सकता है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
*वर्ष 1937 ई. में देश के कुछ राज्यों में कांग्रेस मंत्रिमंडल गठित हुआ। इन राज्यों में हिंदी की पढ़ाई को प्रोत्साहित करने का संकल्प लिया गया। &lt;br /&gt;
*जैसे–जैसे स्वतंत्रता संग्राम तीव्रतम होता गया वैसे–वैसे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का आंदोलन ज़ोर पकड़ता गया। 20वीं सदी के चौथे दशक तक हिंदी राष्ट्रभाषा के रूप में आम सहमति प्राप्त कर चुकी थी। वर्ष 1942 से 1945 का समय ऐसा था जब देश में स्वतंत्रता की लहर सबसे अधिक तीव्र थी, तब राष्ट्रभाषा से ओत–प्रोत जितनी रचनाएँ हिंदी में लिखी गईं उतनी शायद किसी और भाषा में इतने व्यापक रूप से कभी नहीं लिखी गई। राष्ट्रभाषा प्रचार के साथ राष्ट्रीयता के प्रबल हो जाने पर अंग्रेज़ों को भारत छोड़ना पड़ा।&lt;br /&gt;
{| &lt;br /&gt;
|- valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ राष्ट्रभाषा आंदोलन (हिंदी आंदोलन) से सम्बन्धित धार्मिक–सामाजिक संस्थाएँ&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! नाम&lt;br /&gt;
! मुख्यालय&lt;br /&gt;
! स्थापना&lt;br /&gt;
! संस्थापक&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[ब्रह्मसमाज|ब्रह्म समाज]]&lt;br /&gt;
| [[कलकत्ता]]&lt;br /&gt;
| 1828 ई. &lt;br /&gt;
| [[राजा राममोहन राय]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[प्रार्थना समाज]]&lt;br /&gt;
| [[मुम्बई|बंबई]]&lt;br /&gt;
| [[1867]] ई.&lt;br /&gt;
| आत्मारंग पाण्डुरंग&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[आर्य समाज]]&lt;br /&gt;
| [[मुम्बई|बंबई]]&lt;br /&gt;
| [[1875]] ई. &lt;br /&gt;
| [[दयानन्द सरस्वती]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[थियोसॉफिकल सोसायटी]] &lt;br /&gt;
| अडयार, [[चेन्नई]]&lt;br /&gt;
| [[1882]] ई.&lt;br /&gt;
| कर्नल एच.एस.आल्काट एवं मैडम एच.पी.ब्लैवेत्स्की&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सनातन धर्म सभा &lt;br /&gt;
| [[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
| [[1895]] ई.&lt;br /&gt;
| पं. दीनदयाल शर्मा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[रामकृष्ण मिशन|(भारत धर्म महामंडल-1902 में नाम परिवर्तन) रामकृष्ण मिशन]] &lt;br /&gt;
| [[बेलूर]] &lt;br /&gt;
| [[1897]] ई.&lt;br /&gt;
| [[विवेकानंद]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ राष्ट्रभाषा आंदोलन से सम्बन्धित साहित्यिक संस्थाएँ&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
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! स्थापना&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[नागरी प्रचारिणी सभा]]&lt;br /&gt;
| [[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
| [[1893]] ई. (संस्थापक-त्रयी—[[श्यामसुन्दर दास|श्यामसुंदर दास]], रामनारायण मिश्र व [[ठाकुर शिव कुमार सिंह|शिवकुमार सिंह)]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी साहित्य सम्मेलन&lt;br /&gt;
| [[प्रयाग]]&lt;br /&gt;
| [[1910]] ई. (प्रथम सभापति– [[मदन मोहन मालवीय]])&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गुजरात विद्यापीठ&lt;br /&gt;
| [[अहमदाबाद]]&lt;br /&gt;
| [[1920]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिन्दुस्तानी एकेडमी&lt;br /&gt;
| [[इलाहाबाद]]&lt;br /&gt;
| [[1927]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा (पूर्व नाम- हिंदी साहित्य सम्मेलन)&lt;br /&gt;
| [[चेन्नई]]&lt;br /&gt;
| [[1927]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी विद्यापीठ&lt;br /&gt;
| [[देवघर]]&lt;br /&gt;
| [[1929]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| राष्ट्रभाषा प्रचार समिति&lt;br /&gt;
| वर्धा&lt;br /&gt;
| [[1936]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा&lt;br /&gt;
| [[पुणे]]&lt;br /&gt;
| [[1937]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बंबई हिंदी विद्यापीठ&lt;br /&gt;
| [[बंबई]]&lt;br /&gt;
| [[1938]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति&lt;br /&gt;
| [[गुवाहाटी]]&lt;br /&gt;
| [[1938]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना]]&lt;br /&gt;
| [[पटना]]&lt;br /&gt;
| [[1951]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अखिल भारतीय हिंदी संस्था संघ&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| [[1964]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नागरी लिपि परिषद&lt;br /&gt;
| [[नई दिल्ली]]&lt;br /&gt;
| [[1975]] ई.&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राष्ट्रभाषा आंदोलन से सम्बन्धित व्यक्तित्व==&lt;br /&gt;
====बंगाल====&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;25%&amp;quot; style=&amp;quot;margin:5px; float:right&amp;quot; &lt;br /&gt;
|+ हिंदी के लिए महापुरुष कथन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती।&amp;lt;br /&amp;gt; '''[[चन्द्रबली पाण्डेय]]''' &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;है भव्य [[भारत]] ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। &lt;br /&gt;
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी ॥ &amp;lt;br /&amp;gt;'''[[मैथिलीशरण गुप्त]]'''&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जिस भाषा में [[तुलसीदास]] जैसे कवि ने कविता की हो वह अवश्य ही पवित्र है और उसके सामने कोई भाषा नहीं ठहर सकती। &amp;lt;br /&amp;gt;'''[[महात्मा गाँधी]]'''   &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी भारतवर्ष के हृदय-देश स्थित करोड़ों नर-नारियों के [[हृदय]] और मस्तिष्क को खुराक देने वाली भाषा है।  &amp;lt;br /&amp;gt;'''[[हज़ारीप्रसाद द्विवेदी]]'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी को [[गंगा]] नहीं बल्कि समुद्र बनना होगा।  &amp;lt;br /&amp;gt;'''[[विनोबा भावे]]'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी के विरोध का कोई भी आन्दोलन राष्ट्र की प्रगति में बाधक है। &amp;lt;br /&amp;gt;'''सुभाष चन्द्र बसु'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी को [[संस्कृत]] से विच्छिन्न करके देखने वाले उसकी अधिकांश महिमा से अपरिचित हैं।  &amp;lt;br /&amp;gt;'''[[हज़ारीप्रसाद द्विवेदी]]'''&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
[[राजा राममोहन राय]], [[केशवचंद्र सेन]], नवीन चंद्र राय, [[ईश्वर चंद्र विद्यासागर]], तरुणी चरण मिश्र, राजेन्द्र लाल मित्र, राज नारायण बसु, भूदेव मुखर्जी, बंकिम चंद्र चैटर्जी ('हिंदी भाषा की सहायता से भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों के मध्य में जो ऐक्यबंधन संस्थापन करने में समर्थ होंगे वही सच्चे भारतबंधु पुकारे जाने योग्य हैं।)', [[सुभाषचंद्र बोस]] ('अगर आज हिंदी भाषा मान ली गई है तो वह इसलिए नहीं कि वह किसी प्रान्त विशेष की भाषा है, बल्कि इसलिए कि वह अपनी सरलता, व्यापकता तथा क्षमता के कारण सारे देश की भाषा हो सकती है।') [[रवीन्द्रनाथ टैगोर]] ('यदि हम प्रत्येक भारतीय के नैसर्गिक अधिकारों के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं, तो हमें राष्ट्रभाषा के रूप में इस भाषा को स्वीकार करना चाहिए जो देश के सबसे बड़े भू–भाग में बोली जाती है और जिसे स्वीकार करने की सिफ़ारिश महात्मा गाँधीजी ने हम लोगों से की है।') रामानंद चटर्जी, [[सरोजिनी नायडू]], शारदा चरण मित्र, आचार्य क्षिति मोहन सेन ('हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने हेतु जो अनुष्ठान हुए हैं, उनको मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ।') आदि।&lt;br /&gt;
====महाराष्ट्र====&lt;br /&gt;
[[बाल गंगाधर तिलक]] ('यह आंदोलन [[उत्तर भारत]] में केवल एक सर्वमान्य [[लिपि]] के प्रचार के लिए नहीं है। यह तो उस आंदोलन का एक अंग है, जिसे मैं एक राष्ट्रीय आंदोलन कहूँगा और जिसका उद्देश्य समस्त भारतवर्ष के लिए एक राष्ट्रीय भाषा की स्थापना करना है, क्योंकि सबके लिए समान भाषा राष्ट्रीयता का महत्त्वपूर्ण अंग है। अतएव यदि आप किसी राष्ट्र के लोगों को एक–दूसरे के निकट लाना चाहें तो सबके लिए समान भाषा से बढ़कर सशक्त अन्य कोई बल नहीं है।'), एन. सी. केलकर, डॉ. भण्डारकर, वी. डी. सावरकर, [[गोपाल कृष्ण गोखले]], गाडगिल, [[काका कालेलकर]] आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पंजाब====&lt;br /&gt;
[[लाला लाजपत राय]], श्रद्धाराम फिल्लौरी आदि।&lt;br /&gt;
====गुजरात====&lt;br /&gt;
[[दयानंद सरस्वती]], [[महात्मा गाँधी]], [[वल्लभभाई पटेल]], [[कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी]] ('हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना नहीं है, वह तो है ही।') आदि। &lt;br /&gt;
====दक्षिण भारत====&lt;br /&gt;
*[[सी. राजगोपालाचारी]], टी. विजयराघवाचार्य ('हिन्दुस्तान की सभी जीवित और प्रचलित भाषाओं में मुझे हिंदी ही राष्ट्रभाषा बनने के लिए सबसे अधिक योग्य दिखाई पड़ती है।'), &lt;br /&gt;
*सी. पी. रामास्वामी अय्यर ('देश के विभिन्न भागों के निवासियों के व्यवहार के लिए सर्वसुगम और व्यापक तथा एकता स्थापित करने के साधन के रूप में हिंदी का ज्ञान आवश्यक है।') &lt;br /&gt;
*अनन्त शयनम आयगर ('हिंदी ही उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाली समर्थ भाषा है।')&lt;br /&gt;
*[[एस. निजलिंगप्पा]] ('दक्षिण की भाषाओं ने संस्कृत से बहुत कुछ लेन–देन किया है, इसलिए उसी परम्परा में आई हुई हिंदी बड़ी सरलता से राष्ट्रभाषा होने के लायक़ है।') &lt;br /&gt;
*रंगनाथ रामचंद्र दिवाकर ('जो राष्ट्रप्रेमी है, उसे राष्ट्रभाषा प्रेमी होना चाहिए।')&lt;br /&gt;
*के. टी. भाष्यम, आर. वेंकटराम शास्त्री, एन. सुन्दरैया आदि।&lt;br /&gt;
अन्य—[[मदनमोहन मालवीय]], [[पुरुषोत्तम दास टंडन]] ('हिंदी का प्रहरी'), [[राजेन्द्र प्रसाद]], सेठ गोविन्द दास आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====महात्मा गाँधी के विचार====&lt;br /&gt;
#'करोड़ों लोगों को [[अंग्रेज़ी]] की शिक्षा देना उन्हें ग़ुलामी में डालने जैसा है। [[लॉर्ड मैकाले|मैकाले]] ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच ग़ुलामी की बुनियाद थी'।&amp;lt;ref&amp;gt;हिन्द स्वराज, 1909&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#&amp;quot;अंग्रेज़ी भाषा हमारे राष्ट्र के पाँव में बेड़ी बनकर पड़ी हुई है।&amp;quot; भारतीय विद्यार्थी को अंग्रेज़ी के मार्फ़त ज्ञान अर्जित करने पर कम से कम 6 वर्ष अधिक बर्बाद करने पड़ते हैं। यदि हमें एक विदेशी भाषा पर अधिकार पाने के लिए जीवन के अमूल्य वर्ष लगा देने पड़ें, तो फिर और क्या हो सकता है'। ([[1914]])&lt;br /&gt;
#'जिस भाषा में [[तुलसीदास]] जैसे कवि ने [[कविता]] की हो, वह अत्यन्त पवित्र है और उसके सामने कोई भाषा ठहर नहीं सकती'। ([[1916]])&lt;br /&gt;
#'हिंदी ही हिन्दुस्तान के शिक्षित समुदाय की सामान्य भाषा हो सकती है, यह बात निर्विवाद सिद्ध है। जिस स्थान को अंग्रेज़ी भाषा आजकल लेने का प्रयत्न कर रही है और जिसे लेना उसके लिए असम्भव है, वही स्थान हिंदी को मिलना चाहिए, क्योंकि हिंदी का उस पर पूर्ण अधिकार है। यह स्थान अंग्रेज़ी को नहीं मिल सकता, क्योंकि वह विदेशी भाषा है और हमारे लिए बड़ी कठिन है'। ([[1917]])&lt;br /&gt;
#'हिंदी भाषा वह भाषा है जिसको उत्तर में [[हिन्दू]] व [[मुसलमान]] बोलते हैं और जो [[नागरी लिपि|नागरी]] और फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है। यह हिंदी एकदम संस्कृतमयी नहीं है और न ही वह एकदम फ़ारसी शब्दों से लदी है'। ([[1918]])&lt;br /&gt;
#'हिंदी और उर्दू नदियाँ हैं और हिन्दुस्तानी सागर है। हिंदी और [[उर्दू]] दोनों को आपस में झगड़ना नहीं चाहिए। दोनों का मुक़ाबला तो अंग्रेज़ी से है'।&lt;br /&gt;
#'अंग्रेज़ों के व्यामोह से पिंड छुड़ाना स्वराज्य का एक अनिवार्य अंग है'। &lt;br /&gt;
#'मैं यदि तानाशाह होता (मेरा बस चलता तो) आज ही विदेशी भाषा में शिक्षा देना बंद कर देता, सारे अध्यापकों को स्वदेशी भाषाएँ अपनाने पर मजबूर कर देता। जो आनाकानी करते, उन्हें बर्ख़ास्त कर देता। मैं पाठ्य–पुस्तकों की तैयारी का इंतज़ार नहीं करूँगा, वे तो माध्यम के परिवर्तन के पीछे-पीछे अपने आप ही चली आएगी। यह एक ऐसी बुराई है, जिसका तुरन्त ही इलाज होना चाहिए'। &lt;br /&gt;
#'मेरी मातृभाषा में कितनी ही ख़ामियाँ क्यों न हों, मैं इससे इसी तरह से चिपटा रहूँगा, जिस तरह से बच्चा अपनी माँ की छाती से, जो मुझे जीवनदायी दूध दे सकती है। अगर अंग्रेज़ी उस जगह को हड़पना चाहती है, जिसकी वह हक़दार नहीं है, तो मैं उससे सख़्त नफ़रत करूँगा। वह कुछ लोगों के सीखने की वस्तु हो सकती है, लाखों–करोड़ों की नहीं'।&lt;br /&gt;
#'लिपियों में सबसे अव्वल दरजे की लिपि नागरी को ही मानता हूँ। मैं मानता हूँ कि नागरी और उर्दू लिपि के बीच अंत में जीत नागरी लिपि की ही होगी'।&lt;br /&gt;
==राजभाषा के रूप में विकास==&lt;br /&gt;
====राजभाषा क्या है====&lt;br /&gt;
{{Main|राजभाषा}}&lt;br /&gt;
#राजभाषा का शाब्दिक अर्थ है— राज–काज की भाषा। जो भाषा देश के राजकीय कार्यों के लिए प्रयुक्त होती है, वह 'राजभाषा' कहलाती हैं राजाओं–नवाबों के ज़माने में इसे 'दरबारी भाषा' कहा जाता था। &lt;br /&gt;
#राजभाषा सरकारी काम–काज चलाने की आवश्यकता की उपज होती है।&lt;br /&gt;
#स्वशासन आने के पश्चात् राजभाषा की आवश्कता होती है। प्रायः राष्ट्रभाषा ही स्वशासन आने के पश्चात् [[राजभाषा]] बन जाती है। भारत में भी राष्ट्रभाषा हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ।&lt;br /&gt;
#राजभाषा एक संवैधानिक शब्द है। हिंदी को [[14 सितंबर]] [[1949]] ई. को संवैधानिक रूप से राजभाषा घोषित किया गया। इसीलिए प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को '[[हिंदी दिवस]]' के रूप में मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
#राजभाषा देश को अपने प्रशासनिक लक्ष्यों के द्वारा राजनीतिक–आर्थिक इकाई में जोड़ने का काम करती है। अर्थात् राजभाषा की प्राथमिक शर्त राजनीतिक प्रशासनिक एकता क़ायम करना है।&lt;br /&gt;
#राजभाषा का प्रयोग क्षेत्र सीमित होता है, यथा—वर्तमान समय में भारत सरकार के कार्यालयों एवं कुछ राज्यों- हिंदी क्षेत्र के राज्यों में राज–काज हिंदी में होता है। अन्य राज्य सरकारें अपनी–अपनी भाषा में कार्य करती हैं, हिंदी में नहीं; [[महाराष्ट्र]] [[मराठी भाषा|मराठी]] में, [[पंजाब]] [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]] में, [[गुजरात]] [[गुजराती भाषा|गुजराती]] में आदि। &lt;br /&gt;
#राजभाषा कोई भी भाषा हो सकती है, स्वभाषा या परभाषा। जैसे, मुग़ल शासक [[अकबर]] के समय से लेकर मैकाले के काल तक फ़ारसी राजभाषा तथा मैकाले के काल से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक अंग्रेज़ी राजभाषा थी जो कि विदेशी भाषा थी। जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया जो कि स्वभाषा है। &lt;br /&gt;
#राजभाषा का एक निश्चित मानक स्वरूप होता है, जिसके साथ छेड़छाड़ या प्रयोग नहीं किया जा सकता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आठवीं अनुसूची==&lt;br /&gt;
{{Main|आठवीं अनुसूची}}&lt;br /&gt;
आठवीं अनुसूची में संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 22 प्रादेशिक भाषाओं का उल्लेख है। इस अनुसूची में आरम्भ में 14 भाषाएँ ([[असमिया भाषा|असमिया]], [[बांग्ला भाषा|बांग्ला]], [[गुजराती भाषा|गुजराती]], हिंदी, [[कन्नड़ भाषा|कन्नड़]], [[कश्मीरी भाषा|कश्मीरी]], [[मलयालम भाषा|मलयालम]], [[मराठी भाषा|मराठी]], [[उड़िया भाषा|उड़िया]], [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]], [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]], [[तमिल भाषा|तमिल]], [[तेलुगु भाषा|तेलुगु]], [[उर्दू भाषा|उर्दू]]) थीं। बाद में सिंधी को तत्पश्चात् कोंकणी, [[मणिपुरी भाषा|मणिपुरी]]&amp;lt;ref&amp;gt;21वाँ संशोधन, 1967 ई.&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[नेपाली भाषा|नेपाली]] को शामिल किया गया &amp;lt;ref&amp;gt;71वाँ संशोधन, 1992 ई.&amp;lt;/ref&amp;gt;, जिससे इसकी संख्या 18 हो गई। तदुपरान्त [[बोडो भाषा|बोडो]], [[डोगरी भाषा|डोगरी]], [[मैथिली भाषा|मैथिली]], [[संथाली भाषा|संथाली]] को शामिल किया गया&amp;lt;ref&amp;gt;92वाँ संशोधन, 2003&amp;lt;/ref&amp;gt; और इस प्रकार इस अनुसूची में 22 भाषाएँ हो गईं।&lt;br /&gt;
==हिंदी की उपभाषाएँ एवं बोलियाँ==&lt;br /&gt;
{{Main|हिंदी की उपभाषाएँ एवं बोलियाँ}}&lt;br /&gt;
*'''हिंदी भाषी क्षेत्र/हिंदी क्षेत्र/हिंदी पट्टी'''— हिंदी पश्चिम में [[अम्बाला]] ([[हरियाणा]]) से लेकर पूर्व में [[पूर्णिया]] ([[बिहार]]) तक तथा उत्तर में [[बद्रीनाथ]]–[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ]] ([[उत्तराखंड]]) से लेकर दक्षिण में [[खंडवा]] ([[मध्य प्रदेश]]) तक बोली जाती है। इसे हिंदी भाषी क्षेत्र या हिंदी क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र के अंतर्गत 9 राज्य- [[उत्तर प्रदेश]], [[उत्तराखंड]], [[बिहार]], [[झारखंड]], [[मध्य प्रदेश]], [[छत्तीसगढ़]], [[राजस्थान]], [[हरियाणा]] व [[हिमाचल प्रदेश]] तथा 1 केन्द्र शासित प्रदेश ([[राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली]]) आते हैं। इस क्षेत्र में भारत की कुल जनसंख्या के 43% लोग रहते हैं। &lt;br /&gt;
====उपभाषाएँ व बोलियाँ====&lt;br /&gt;
*'''बोली'''— एक छोटे क्षेत्र में बोली जानेवाली भाषा बोली कहलाती है। बोली में साहित्य रचना नहीं होती है।&lt;br /&gt;
*'''उपभाषा'''— अगर किसी बोली में साहित्य रचना होने लगती है और क्षेत्र का विकास हो जाता है तो वह बोली न रहकर उपभाषा बन जाती है।&lt;br /&gt;
*'''भाषा'''— साहित्यकार जब उस भाषा को अपने साहित्य के द्वारा परिनिष्ठित सर्वमान्य रूप प्रदान कर देते हैं तथा उसका और क्षेत्र विस्तार हो जाता है तो वह भाषा कहलाने लगती है।&lt;br /&gt;
*एक भाषा के अंतर्गत कई उपभाषाएँ होती हैं तथा एक उपभाषा के अंतर्गत कई बोलियाँ होती हैं।&lt;br /&gt;
*सर्वप्रथम एक अंग्रेज़ प्रशासनिक अधिकारी जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने [[1927]] ई. में अपनी पुस्तक 'भारतीय भाषा सर्वेक्षण' में हिंदी का उपभाषाओं व बोलियों में वर्गीकरण प्रस्तुत किया। चटर्जी ने पहाड़ी भाषाओं को छोड़ दिया है। वह इन्हें भाषाएँ नहीं मानते। &lt;br /&gt;
*[[धीरेन्द्र वर्मा]] का वर्गीकरण मुख्यतः [[सुनीति कुमार चटर्जी]] के वर्गीकरण पर ही आधारित है। केवल उसमें कुछ ही संशोधन किए गए हैं। जैसे— उसमें पहाड़ी भाषाओं को शामिल किया गया है।&lt;br /&gt;
*इनके अलावा कई विद्वानों ने अपना वर्गीकरण प्रस्तुत किया है। आज इस बात को लेकर आम सहमति है कि हिंदी जिस भाषा–समूह का नाम है, उसमें 5 उपभाषाएँ और 17 बोलियाँ हैं। &lt;br /&gt;
हिंदी क्षेत्र की समस्त बोलियों को 5 वर्गों में बाँटा गया है। इन वर्गों को उपभाषा कहा जाता है। इन उपभाषाओं के अंतर्गत ही हिंदी की 17 बोलियाँ आती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;एक भाषा विद्वान के अनुसार, शुद्ध भाषा–वैज्ञानिक दृष्टि से हिंदी की दो मुख्य उपभाषाएँ हैं—पश्चिमी हिंदी व पूर्वी हिंदी।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==प्रमुख खड़ी बोलियों का संक्षिप्त परिचय==&lt;br /&gt;
====कौरवी या खड़ी बोली====&lt;br /&gt;
{{main|कौरवी बोली}}&lt;br /&gt;
*'''मूल नाम'''— कौरवी&lt;br /&gt;
*'''साहित्यिक भाषा बनने के बाद पड़ा नाम'''— खड़ी बोली&lt;br /&gt;
*'''अन्य नाम'''— बोलचाल की हिन्दुस्तानी, सरहिंदी, वर्नाक्यूलर खड़ी बोली आदि।&lt;br /&gt;
*'''केन्द्र'''— [[कुरु महाजनपद|कुरु जनपद]] अर्थात् [[मेरठ]]– [[दिल्ली]] के आसपास का क्षेत्र। खड़ी बोली एक बड़े भूभाग में बोली जाती है। अपने ठेठ रूप में यह मेरठ, [[बिजनौर]], [[मुरादाबाद]], रामपुर, [[सहारनपुर]], [[देहरादून]] और [[अम्बाला]] ज़िलों में बोली जाती है। इनमें मेरठ की खड़ी बोली आदर्श और मानक मानी जाती है।&lt;br /&gt;
*'''बोलने वालों की संख्या'''— 1.5 से 2 करोड़&lt;br /&gt;
*'''साहित्य'''— मूल कौरवी में लोक–साहित्य उपलब्ध है, जिसमें गीत, गीत–नाटक, लोक कथा, गप्प, पहेली आदि हैं। &lt;br /&gt;
*'''विशेषता'''— आज की हिंदी मूलतः कौरवी पर ही आधारित है।&lt;br /&gt;
*'''नमूना'''— कोई बादसा था। साब उसके दो राण्याँ थीं। वो एक रोज़ अपनी रान्नी से केने लगा मेरे समान ओर कोइ बादसा है बी? तो बड़ी बोल्ले के राजा तुम समान ओर कोन होगा। छोटी से पुच्छा तो किह्या कि एक बिजाण सहर हे उसके किल्ले में जितनी तुम्हारी सारी हैसियत है उतनी एक ईंट लगी है। ओ इसने मेरी कुच बात नई रक्खी इसको तग्मार्ती (निर्वासित) करना चाइए। उस्कू तग्मार्ती कर दिया। ओर बड़ी कू सब राज का मालक कर दिया।&lt;br /&gt;
====ब्रजभाषा====&lt;br /&gt;
{{main|ब्रजभाषा}}&lt;br /&gt;
*'''केन्द्र'''— [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
*'''बोलने वालों की संख्या'''— 3 करोड़&lt;br /&gt;
*देश के बाहर ताज्जुबेकिस्तान में ब्रजभाषा बोली जाती है, जिसे 'ताज्जुबेकी ब्रजभाषा' कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*'''साहित्य'''— कृष्ण भक्ति काव्य की एकमात्र भाषा, लगभग सारा [[रीतिकाल|रीतिकाल साहित्य]]। साहित्यिक दृष्टि से हिंदी भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण बोली। साहित्यिक महत्त्व के कारण ही इसे ब्रजबोली नहीं ब्रजभाषा की संज्ञा दी जाती है। मध्यकाल में इस भाषा ने अखिल भारतीय विस्तार पाया। बंगाल में इस भाषा से बनी भाषा का नाम 'ब्रज बुलि' पड़ा। आधुनिक काल तक इस भाषा में साहित्य सृजन होता रहा। पर परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि ब्रजभाषा साहित्यिक सिंहासन से उतार दी गई और उसका स्थान खड़ी बोली ने ले लिया। &lt;br /&gt;
*'''रचनाकार'''— भक्तिकालीन– [[सूरदास]], [[नन्ददास]] आदि।&lt;br /&gt;
'''रीतिकाल'''— [[बिहारी लाल|बिहारी]], [[मतिराम]], [[भूषण]], [[देव (कवि)|देव]] आदि। &lt;br /&gt;
'''आधुनिक कालीन'''— [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]], जगन्नाथ दास 'रत्नाकर' आदि।&lt;br /&gt;
*'''नमूना'''— एक मथुरा जी के चौबे हे (थे), जो डिल्ली सैहर कौ चलै। गाड़ी वारे बनिया से चौबेजी की भेंट है गई। तो वे चौबे बोले, अर भइया सेठ, कहाँ जायगो। वौ बोलो, महराजा डिल्ली जाऊँगो। तो चौबे बोले, भइया हमऊँ बैठाल्लेय। बनिया बोलो, चार रूपा चलिंगे भाड़े के। चौबे बोले, अच्छा भइया चारी दिंगे।&lt;br /&gt;
====अवधी====&lt;br /&gt;
{{main|अवधी भाषा}}&lt;br /&gt;
*'''केन्द्र'''— [[अयोध्या]]/अवध&lt;br /&gt;
*'''बोलने वालों की संख्या'''— 2 करोड़&lt;br /&gt;
*देश के बाहर फीजी में अवधी बोलने वाले लोग हैं।&lt;br /&gt;
*'''साहित्य'''— सूफ़ी काव्य, रामभक्ति काव्य। अवधी में प्रबन्ध काव्य परम्परा विशेषतः विकसित हुई।&lt;br /&gt;
*'''रचनाकार'''— सूफ़ी कवि— मुल्ला दाउद ('चंदायन'), [[मलिक मुहम्मद जायसी|जायसी]] ('[[पद्मावत -जायसी|पद्मावत]]'), क़ुत्बन ('मृगावती'), उसमान ('चित्रावली'), रामभक्त कवि— [[तुलसीदास]] ('[[रामचरितमानस]]')।&lt;br /&gt;
*'''नमूना'''— एक गाँव मा एक अहिर रहा। ऊ बड़ा भोंग रहा। सबेरे जब सोय के उठै तो पहले अपने महतारी का चार टन्नी धमकाय दिये तब कौनो काम करत रहा। बेचारी बहुत पुरनिया रही नाहीं तौ का मज़ाल रहा केऊ देहिं पै तिरिन छुआय देत।&lt;br /&gt;
====भोजपुरी====&lt;br /&gt;
{{main|भोजपुरी भाषा}}&lt;br /&gt;
*'''केन्द्र'''— [[भोजपुर मध्य प्रदेश|भोजपुर]]&lt;br /&gt;
*'''बोलने वालों की संख्या'''— 3.5 करोड़ (बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से हिंदी प्रदेश की बोलियों में सबसे अधिक बोली जाने वाली बोली)।&lt;br /&gt;
*इस बोली का प्रसार भारत के बाहर [[सूरीनामी हिंदी|सूरीनाम]], [[फिजी हिन्दी|फिजी]], [[मॉरिशसी हिन्दी|मॉरिशस]], गयाना, त्रिनिडाड में है। इस दृष्टि से भोजपुरी अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की बोली है।&lt;br /&gt;
*'''साहित्य'''— भोजपुरी में लिखित साहित्य नहीं के बराबर है। मूलतः भोजपुरी भाषी साहित्यकार मध्यकाल में ब्रजभाषा व अवधी में तथा आधुनिक काल में हिंदी में लेखन करते रहे हैं। लेकिन अब स्थिति में परिवर्तन आ रहा है। &lt;br /&gt;
*'''रचनाकार'''— [[भिखारी ठाकुर]] (उपनाम— 'भोजपुरी का शेक्सपीयर', 'भोजपुरी का भारतेन्दु')। &lt;br /&gt;
*'''सिनेमा'''— [[सिनेमा|सिनेमा जगत]] में भोजपुरी ही हिंदी की वह बोली है, जिसमें सबसे अधिक फ़िल्में बनती हैं। &lt;br /&gt;
*'''नमूना'''— काहे दस–दस पनरह–पनरह हज़ार के भीड़ होला ई नाटक देखें ख़ातिर। मालूम होतआ कि एही नाटक में पबलिक के रस आवेला।&lt;br /&gt;
====मैथिली====&lt;br /&gt;
{{main|मैथिली भाषा}}&lt;br /&gt;
*'''लिपि'''— तिरहुता व देवनागरी&lt;br /&gt;
*'''केन्द्र'''— मिथिला या विदेह या तिरहुत&lt;br /&gt;
*'''बोलने वालों की संख्या'''— 1.5 करोड़&lt;br /&gt;
*'''साहित्य'''— साहित्य की दृष्टि से [[मैथिली भाषा|मैथिली]] बहुत सम्पन्न है।&lt;br /&gt;
*'''रचनाकार'''— [[विद्यापति]] (पदावली)— यदि ब्रजभाषा को [[सूरदास]] ने, अवधी को [[तुलसीदास]] ने चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया तो मैथिली को [[विद्यापति]] ने, हरिमोहन झा (उपन्यास— कन्यादान, द्विरागमन, कहानी संग्रह—एकादशी, 'खट्टर काकाक तरंग'), [[नागार्जुन]] (मैथिली में 'यात्री' नाम से लेखन; उपन्यास— पारो, कविता संग्रह— 'कविक स्वप्न', 'पत्रहीन नग्न गाछ'), राजकमल चौधरी ('स्वरगंघा') आदि।&lt;br /&gt;
*'''आठवीं अनुसूची में स्थान'''— 92वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, [[2003]] के द्वारा संविधान की 8वीं अनुसूची में 4 भाषाओं को स्थान दिया गया। मैथिली हिंदी क्षेत्र की बोलियों में से 8वीं अनुसूची में स्थान पाने वाली एकमात्र बोली है। &lt;br /&gt;
*'''नमूना'''— [[पटना]] किए एलऽह? पटना एलिअइ नोकरी करैले।&lt;br /&gt;
भेटलह नोकरी? नाकरी कत्तौ नइ भेटल।&lt;br /&gt;
गाँ में काज नइ भेटइ छलऽह? भेटै छलै, रूपैयाबला नइ, अऽनबला।&lt;br /&gt;
तखन एलऽ किऐ? रिनियाँ तङ केलकइ, तै।&lt;br /&gt;
कत्ते रीन छऽह? चाइर बीस।&lt;br /&gt;
सूद कत्ते लइ छऽह? दू पाइ महिनबारी।&lt;br /&gt;
==देवनागरी लिपि==&lt;br /&gt;
{{Main|देवनागरी लिपि}}&lt;br /&gt;
[[भारत]] में सर्वाधिक प्रचलित लिपि जिसमें [[संस्कृत]], हिंदी और [[मराठी भाषा|मराठी]] भाषाएँ लिखी जाती हैं। इस शब्द का सबसे पहला उल्लेख 453 ई. में जैन ग्रंथों में मिलता है। 'नागरी' नाम के संबंध में मतैक्य नहीं है। कुछ लोग इसका कारण नगरों में प्रयोग को बताते हैं। यह अपने आरंभिक रूप में [[ब्राह्मी लिपि]] के नाम से जानी जाती थी। इसका वर्तमान रूप नवी-दसवीं शताब्दी से मिलने लगता है। भाषा विज्ञान की शब्दावली में यह 'अक्षरात्मक' लिपि कहलाती है। यह विश्व में प्रचलित सभी लिपियों की अपेक्षा अधिक पूर्णतर है। इसके लिखित और उच्चरित रूप में कोई अंतर नहीं पड़ता है। प्रत्येक ध्वनि संकेत यथावत लिखा जाता है। &lt;br /&gt;
*देवनागरी एक लिपि है जिसमें अनेक भारतीय भाषाएँ तथा कुछ विदेशी भाषाएँ लिखीं जाती हैं। [[संस्कृत]], [[पालि भाषा|पालि]], हिंदी, [[मराठी भाषा|मराठी]], [[कोंकणी भाषा|कोंकणी]], [[सिन्धी भाषा|सिन्धी]], [[कश्मीरी भाषा|कश्मीरी]], [[नेपाली भाषा|नेपाली]], गढ़वाली, [[बोडो भाषा|बोडो]], अंगिका, मगही, [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]], [[मैथिली भाषा|मैथिली]], [[संथाली भाषा|संथाली]] आदि भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं। इसे नागरी लिपि भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त कुछ स्थितियों में [[गुजराती भाषा|गुजराती]], [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]], बिष्णुपुरिया मणिपुरी, रोमानी और [[उर्दू]] भाषाएं भी देवनागरी में लिखी जाती हैं।&lt;br /&gt;
*इसमें कुल '''52 अक्षर हैं, जिसमें 14 [[स्वर (व्याकरण)|स्वर]] और 38 [[व्यंजन (व्याकरण)|व्यंजन]]''' हैं। अक्षरों की क्रम व्यवस्था (विन्यास) भी बहुत ही वैज्ञानिक है। स्वर-व्यंजन, कोमल-कठोर, अल्पप्राण-महाप्राण, अनुनासिक्य-अन्तस्थ-ऊष्म इत्यादि वर्गीकरण भी वैज्ञानिक हैं। एक मत के अनुसार देवनगर ([[काशी]]) में प्रचलन के कारण इसका नाम देवनागरी पड़ा।&amp;lt;ref name=&amp;quot;dev&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://vimisahitya.wordpress.com/2008/09/02/dewanaagaree_parichay/ |title=हिंदी साहित्य |accessmonthday=28 सितंबर |accessyear=2010 |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher= |language=[[हिंदी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==नागरी लिपि==&lt;br /&gt;
{{main|नागरी लिपि}}&lt;br /&gt;
*'''पश्चिमी शाखा'''- देवनागरी, राजस्थानी, गुजराती, महाजनी, कैथी।&lt;br /&gt;
*'''पूर्वी शाखा'''- [[बांग्ला लिपि]], असमी, उड़िया।&lt;br /&gt;
==हिंदी व्याकरण==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|व्याकरण (व्यावहारिक)}}&lt;br /&gt;
जिस विद्या से किसी [[भाषा]] के बोलने तथा लिखने के नियमों की व्यवस्थित पद्धति का ज्ञान होता है, उसे 'व्याकरण' कहते हैं।&lt;br /&gt;
====वर्णमाला====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वर्णमाला (व्याकरण)}}&lt;br /&gt;
[[हिंदी भाषा]] में जितने वर्णों का प्रयोग होता है, उन वर्णों के समूह को 'वर्णमाला' कहा जाता है।&lt;br /&gt;
====हिंदी वर्णमाला====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|हिंदी वर्णमाला (व्याकरण)}}&lt;br /&gt;
हिंदी भाषा में जितने वर्ण प्रयुक्त होते हैं, उन वर्णों के समूह को 'हिंदी-वर्णमाला' कहा जाता है।&lt;br /&gt;
====शब्द====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|शब्द (व्याकरण)}}&lt;br /&gt;
*वर्ण-समूह या ध्वनि-समूह को 'शब्द' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*शब्द दो प्रकार के होते हैं- [[सार्थक शब्द (व्याकरण)|सार्थक]] और [[निरर्थक शब्द (व्याकरण)|निरर्थक]]।&lt;br /&gt;
====संज्ञा====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|संज्ञा (व्याकरण)}}&lt;br /&gt;
*यह सार्थक वर्ण-समूह शब्द कहलाता है।&lt;br /&gt;
*जब इसका प्रयोग वाक्य में होता है तो वह व्याकरण के नियमों में बँध जाता है और इसका रूप भी बदल जाता है।&lt;br /&gt;
====सर्वनाम====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|सर्वनाम}} &lt;br /&gt;
*संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्द को सर्वनाम कहते हैं। &lt;br /&gt;
*संज्ञा की पुनरुक्ति न करने के लिए सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है।&lt;br /&gt;
====विशेषण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|विशेषण}} &lt;br /&gt;
संज्ञा अथवा सर्वनाम शब्दों की विशेषता (गुण, दोष, संख्या, परिमाण आदि) बताने वाले शब्द ‘विशेषण’ कहलाते हैं। &lt;br /&gt;
====क्रिया====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|क्रिया}}&lt;br /&gt;
*जिन शब्दों से किसी कार्य या व्यापार के होने या किए जाने का बोध होता है उन्हें क्रिया कहते हैं।&lt;br /&gt;
*जैसे- उठना, बैठना, सोना जागना।  &lt;br /&gt;
====क्रियाविशेषण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|क्रियाविशेषण}}&lt;br /&gt;
जिन अविकारी शब्दों से क्रिया की विशेषता का बोध होता है वे क्रियाविशेषण कहलाते हैं।&lt;br /&gt;
====कारक====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|कारक}}&lt;br /&gt;
कारक शब्द का अर्थ है क्रिया को करने वाला अर्थात क्रिया को पूरी करने में किसी न किसी भूमिका को निभाने वाला। &lt;br /&gt;
====काल====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|काल}}&lt;br /&gt;
क्रिया के व्यापार का समय सूचित करने वाले क्रिया रूप को 'काल' कहते हैं।&lt;br /&gt;
====संधि====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|संधि}}&lt;br /&gt;
*दो समीपवर्ती वर्णों के मेल से जो विकार होता है, वह संधि कहलाता है।&lt;br /&gt;
*जैसे- देव+ आलय= देवालय, मन:+ योग= मनोयोग &lt;br /&gt;
====उपवाक्य====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|उपवाक्य}}&lt;br /&gt;
*यदि किसी एक वाक्य में एक से अधिक समापिका क्रियाएँ होती हैं तो वह वाक्य उपवाक्यों में बँट जाता है। &lt;br /&gt;
*उसमें जितनी भी समापिका क्रियाएँ होती हैं उतने ही उपवाक्य होते हैं।&lt;br /&gt;
====वचन====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वचन (हिंदी)}}&lt;br /&gt;
*विकारी शब्दों के जिस रूप से संख्या का बोध होता है, उसे वचन कहते हैं। &lt;br /&gt;
*वैसे तो शब्दों का संज्ञा भेद विविध प्रकार का होता है, परन्तु व्याकरण में उसके एक और अनेक भेद प्रचलित हैं।&lt;br /&gt;
====वर्तनी====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वर्तनी (हिंदी)}}&lt;br /&gt;
*लिखने की रीति को वर्तनी या अक्षरी कहते हैं। &lt;br /&gt;
*इसे हिज्जे भी कहा जाता है। &lt;br /&gt;
====उपसर्ग====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|उपसर्ग}}&lt;br /&gt;
*वे शब्दांश जो यौगिक शब्द बनाते समय पहले लगते हैं, उपसर्ग कहलाते हैं।&lt;br /&gt;
*जैसे- प्रति= प्रतिनिधि, प्रतिकूल, प्रतिष्ठा, प्रत्यक्ष।&lt;br /&gt;
====रस====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|रस}}&lt;br /&gt;
*रस का शाब्दिक अर्थ है 'आनन्द'। काव्य को पढ़ने या सुनने से जिस आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रस कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*रस को 'काव्य की आत्मा' या 'प्राण [[तत्व]]' माना जाता है। &lt;br /&gt;
====अलंकार====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|अलंकार}}&lt;br /&gt;
*अलंकार का शाब्दिक अर्थ है, 'आभूषण'। जिस प्रकार सुवर्ण आदि के आभूषणों से शरीर की शोभा बढ़ती है उसी प्रकार काव्य अलंकारों से काव्य की।&lt;br /&gt;
*[[हिंदी]] के कवि [[केशवदास]] एक अलंकारवादी हैं। &lt;br /&gt;
====छन्द====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|छन्द}}&lt;br /&gt;
*वर्णों या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा हो, तो उसे छंद कहते हैं। &lt;br /&gt;
*छंद का सर्वप्रथम उल्लेख '[[ऋग्वेद]]' में मिलता है।&lt;br /&gt;
==हिंदी का मानकीकरण==&lt;br /&gt;
{{Main|हिंदी का मानकीकरण}}&lt;br /&gt;
====मानक भाषा====&lt;br /&gt;
*मानक का अभिप्राय है—आदर्श, श्रेष्ठ अथवा परिनिष्ठित। भाषा का जो रूप उस भाषा के प्रयोक्ताओं के अलावा अन्य भाषा–भाषियों के लिए आदर्श होता है, जिसके माध्यम से वे उस भाषा को सीखते हैं, जिस भाषा–रूप का व्यवहार पत्राचार, शिक्षा, सरकारी काम–काज एवं सामाजिक–सांस्कृतिक आदान–प्रदान में समान स्तर पर होता है, वह उस भाषा का मानक रूप कहलाता है। &lt;br /&gt;
*मानक भाषा किसी देश अथवा राज्य की वह प्रतिनिधि तथा आदर्श भाषा होती है, जिसका प्रयोग वहाँ के शिक्षित वर्ग के द्वारा अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, व्यापारिक व वैज्ञानिक तथा प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है। &lt;br /&gt;
*किसी भाषा का बोलचाल के स्तर से ऊपर उठकर मानक रूप ग्रहण कर लेना, उसका 'मानकीकरण' कहलाता है।&lt;br /&gt;
==अखिल भारतीयता का इतिहास==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|हिंदी की अखिल भारतीयता का इतिहास}}&lt;br /&gt;
हिंदी 'शब्द' का प्रयोग [[हरियाणा]] से लेकर [[बिहार]] तक प्रचलित बाँगरु, [[कौरवी बोली|कौरवी]], [[ब्रजभाषा]], कनौजी, [[राजस्थानी भाषा|राजस्थानी]], [[अवधी भाषा|अवधी]], [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]], [[मैथिली भाषा|मैथिली]] आदि कई भाषाओं के लिए किया जाता है, किंतु वर्तमान शताब्दी में व्यवहार की दृष्टि से इसका अर्थ खड़ीबोली हो गया है। हिंदी के रूप में यही खड़ीबोली भारतीय संविधान द्वारा स्वीकृत संपर्क भाषा है तथा हिंदी भाषी राज्यों में राजभाषा है। भौगोलिक दृष्टि से विचार करने पर यह [[दिल्ली]], हरियाणा तथा [[उत्तर प्रदेश]] के [[मुरादाबाद]], [[बिजनौर]], [[मेरठ]] आदि थोड़े से ज़िलों तक सीमित भाषा है, जो शताब्दियों तक ब्रजभाषा और अवधी की तुलना में उपेक्षितप्राय रही है और ऐतिहासिक कारणों के प्रसाद से ही यह न केवल आधुनिक युग में [[भारत]] से बाहर के कई देशों में फैल गई है, वरन सुदूर अतीत से ही अंतर्राष्ट्रीय यात्रा करती रही है।&lt;br /&gt;
==अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय==&lt;br /&gt;
{{Main|महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mahatma Gandhi International Hindi University.jpg|[[महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय]], वर्धा |thumb|250px]]&lt;br /&gt;
महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, [[महाराष्ट्र]] राज्य के [[वर्धा ज़िला|वर्धा ज़िले]] में स्थित है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना भारत सरकार ने [[संसद]] द्वारा पारित एक अधिनियम द्वारा की है। इस अधिनियम को [[भारत]] के राजपत्र में [[8 जनवरी]] सन् [[1997]] को प्रकाशित किया गया। यह अधिनियम शिक्षा और अनुसंधान के माध्यम से [[हिंदी भाषा]] और [[साहित्य]] का संवर्धन एवं विकास करने हेतु एक शैक्षणिक विश्वविद्यालय की स्थापना करता है, जिससे हिंदी बेहतर कार्यदक्षता प्राप्त कर प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय भाषा बने। साथ ही विभिन्न ज्ञानानुशासनों में मौलिक सृजन हिंदी भाषा के माध्यम से हो सके तथा विश्व की अन्य भाषाओं में विद्यमान ज्ञान संपदा का अनुवाद हिंदी भाषा में किया जा सके।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.hindivishwa.org/index_s.php |title=महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय |accessmonthday=04 जनवरी |accessyear=2011 |last= |first= |authorlink= |format=पी.एच.पी |publisher=ज्ञान शांति मैत्री |language=[[हिंदी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==समाचार==&lt;br /&gt;
====हिंदी सुधारने के लिए अंग्रेज़ी शब्दों की छूट====&lt;br /&gt;
; 13 अक्टूबर, 2011 गुरुवार&lt;br /&gt;
आज़ादी के 64 साल बाद भी सरकार हिंदी को [[राजभाषा]] से राष्ट्रभाषा नहीं बना पाई है, मगर अब उसने सरकारी दफ़्तरों में इस्तेमाल होने वाली हिंदी को बदलने के प्रयास अवश्य तेज कर दिए हैं। दफ़्तरों में इस्तेमाल होने वाले हिंदी के कठिन शब्दों की जगह [[उर्दू]], [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]], सामान्य हिंदी और [[अंग्रेज़ी]] के शब्दों का उपयोग करने के निर्देश दिए हैं। गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग की सचिव वीणा उपाध्याय ने इस सिलसिले में सभी मंत्रालयों और विभागों को दिशा-निर्देश जारी किए हैं। निर्देशों के मुताबिक, कामकाज के दौरान साहित्यिक हिंदी का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। किसी भी शब्द का हिंदी में उपयोग बतौर अनुवाद न हो। इससे आम लोगों को समस्या होती है। एक हद के बाद यही समस्या किसी भी व्यक्ति को मानसिक तौर पर भाषा के ख़िलाफ़ खड़ा करती है। गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग की सचिव वीणा उपाध्याय ने सभी मंत्रालयों और विभागों को जारी किए दिशा-निर्देश मंत्रालय के '''इस आदेश के बाद पुलिस, कोर्ट, ब्यूरो, रेलवे स्टेशन, बटन, कोट, पैंट, सिग्नल, लिफ़्ट, फीस, क़ानून, अदालत, मुक़दमा, दफ़्तर, एफ़आईआर जैसे अंग्रेज़ी, फ़ारसी और तुर्की भाषा के शब्दों का चलन जारी रहेगा।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====समाचार को विभिन्न स्रोतों पर पढ़ें==== &lt;br /&gt;
*[http://www.bhaskar.com/article/NAT-in-government-offices-will-now-hinglish-2498483.html दैनिक भास्कर डॉट कॉम]&lt;br /&gt;
*'हिन्दुस्तान' दैनिक समाचार पत्र, दिनांक 13 अक्टूबर, 2011 पृष्ठ संख्या- 14  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====दुनिया के 80 करोड़ लोग जानते हैं हिंदी====&lt;br /&gt;
; 20 सितम्बर, 2012 गुरुवार&lt;br /&gt;
[[भारत]] की राजभाषा हिंदी दुनिया में दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। बहुभाषी भारत के हिंदी भाषी राज्यों की आबादी 46 करोड़ से अधिक है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की 1.2 अरब आबादी में से 41.03 फीसदी की मातृभाषा हिंदी है। हिंदी को दूसरी भाषा के तौर पर इस्तेमाल करने वाले अन्य भारतीयों को मिला लिया जाए तो देश के लगभग 75 प्रतिशत लोग हिंदी बोल सकते हैं। भारत के इन 75 प्रतिशत हिंदी भाषियों सहित पूरी दुनिया में तकरीबन 80 करोड़ लोग ऐसे हैं जो इसे बोल या समझ सकते हैं। भारत के अलावा इसे [[नेपाल]], मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, यूगांडा, [[दक्षिण अफ्रीका]], कैरिबियन देशों, ट्रिनिडाड एवं टोबेगो और कनाडा आदि में बोलने वालों की अच्छी ख़ासी संख्या है। इसके आलावा [[इंग्लैंड]], [[अमेरिका]], मध्य एशिया में भी इसे बोलने और समझने वाले अच्छे ख़ासे लोग हैं।&lt;br /&gt;
====समाचार को विभिन्न स्रोतों पर पढ़ें==== &lt;br /&gt;
*[http://www.livehindustan.com/news/desh/national/article1-story-39-39-264287.html लाइव हिन्दुस्तान]&lt;br /&gt;
*[http://hindi.webdunia.com/nri-specialnews/%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-1120920028_1.htm वेबदुनिया हिन्दी]&lt;br /&gt;
====ऑस्ट्रेलिया के स्कूलों में पढ़ाई जाएगी हिंदी====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Julia-Gillard.jpg|thumb|ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड]]&lt;br /&gt;
; 29 अक्टूबर, 2012 सोमवार &lt;br /&gt;
[[ऑस्ट्रेलिया]] के स्कूलों में हिंदी और अन्य प्रमुख एशियाई भाषाएं पढ़ाई जाएंगी। [[भारत]] और अन्य एशियाई देशों से संबंध मजबूत बनाने के लिए यह रणनीति तय की गई है। ऑस्ट्रेलिया की प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने नई नीति का पहला खाका रखते हुए कहा, &amp;quot;जिस समय ऑस्ट्रेलिया बदल रहा था उसी समय एशिया में भी बदलाव हो रहा था, इस सदी में चाहे जो मिले, यह निश्चित ही [[एशिया]] को नेतृत्व में फिर से लाएगा। एशिया के उत्थान को कोई नहीं रोक सकता। यह तेज हो रहा है।&amp;quot; प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने एशियन सेंचुरी व्हाइट पेपर जारी करते हुए इसकी घोषणा की। गिलार्ड ने कहा कि शुरुआत स्कूलों, प्रशिक्षण केंद्रों से करना होगी। हरेक स्कूल एशिया के किसी स्कूल के साथ जुड़ेगा और एक प्रमुख एशियाई भाषा हिंदी, मंदारिन, जापानी या इंडोनेशियन सीखने की पहल करेगा। उन्होंने कहा कि बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने की कोशिश करना होगी। अब पहले जैसा नहीं चलेगा। गिलार्ड ने कहा कि इस सदी में एशिया के बड़ी ताकत बनने की संभावना है। विश्व में यह क्षेत्र नेतृत्व की भूमिका में होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====समाचार को विभिन्न स्रोतों पर पढ़ें==== &lt;br /&gt;
*[http://www.bhaskar.com/article/INT-hindi-to-be-taught-in-australian-schools-3983411-NOR.html दैनिक भास्कर]&lt;br /&gt;
*[http://dainiktribuneonline.com/2012/10/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%A2%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%91%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F-2/ दैनिक ट्रिब्यून]&lt;br /&gt;
*[http://www.dw.de/%E0%A4%91%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%88-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%82%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%82-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80/a-16338765 डी. डब्ल्यू.]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=|माध्यमिक=माध्यमिक3|पूर्णता=|शोध=}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Refbox}}{{top}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.pravakta.com/indian-aryan-languages-of-the-indo-european-family भारोपीय परिवार की भारतीय भाषाएँ]&lt;br /&gt;
*[http://www.pravakta.com/reflections-in-relation-to-hindi-language हिन्दी भाषा के सम्बंध में कुछ विचार]&lt;br /&gt;
*[http://www.rachanakar.org/2010/03/blog-post_3350.html प्रोफेसर महावीर सरन जैन - हिन्दी भाषा-क्षेत्र एवं हिन्दी के क्षेत्रगत रूप]&lt;br /&gt;
*[http://www.scribd.com/doc/22142436/Hindi-Urdu हिन्दी-उर्दू का अद्वैत]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दी भाषा}}{{भाषा और लिपि}}{{व्याकरण}}&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा और लिपि]][[Category:भाषा कोश]][[Category:साहित्य_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी भाषा]]&lt;br /&gt;
[[Category:जनगणना अद्यतन]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE&amp;diff=530836</id>
		<title>राष्ट्रभाषा</title>
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		<updated>2015-06-03T15:37:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: 'महात्मा गाँधी जी की अध्यक्षता में इन्दौर में 'हिन...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[महात्मा गाँधी]] जी की अध्यक्षता में [[इन्दौर]] में 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के द्वारा [[हिन्दी]] [[राष्ट्रभाषा]] मानी गयी।&lt;br /&gt;
[[1947]] में आजादी मिलने के बाद जब भारतीय संविधान लागू हुआ तो उसके अनुच्छेद 343 के द्वारा भारतीय संघ की भाषा हिन्दी और [[देवनागरी लिपि|लिपि देवनागरी]]  निर्धारित की गयी परन्तु संविधान लागू होने के वर्ष [[1950]] से 15 वर्ष तक की अवधि [[1965]] तक के लिये संघ की भाषा के रूप में [[अंगेजी]] का प्रयोग किया जा सकता था। भारतीय संसद को यह अधिकार दिया गया था कि वह चाहे तो संघ की भाषा के रूप में अंगेजी के प्रयोग की अवधि को बढा सकती थी। वर्ष [[1963]] में संसद में राजभाषा अधिनियम 1963 पारित करते हुये यह व्यवस्था कर दी थी कि [[1971]] तक भारतीय संघ के रूप में अंग्रेजी भाषा का उपयोग होता रहेगा । कालान्तर में 1971 की कालावधि समाप्त कर अनिश्चितकाल के लिये इस व्यवस्था को लागू किया गया। [[संविधान]] के अनुच्छेद 344 के द्वारा 22 भाषाओं को [[राजभाषा]] की मान्यता प्रदान की गयी है।&lt;br /&gt;
सन् [[2001]] की [[जनगणना]] के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=530835</id>
		<title>हिंदी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%80&amp;diff=530835"/>
		<updated>2015-06-03T15:11:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: /* द्विवेदी युग */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{चयनित लेख}}&lt;br /&gt;
{{हिन्दी विषय सूची}}&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Hindi-Alphabhet.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=हिंदी वर्णमाला&lt;br /&gt;
|विवरण='हिंदी' [[प्रांगण:मुखपृष्ठ/भारत गणराज्य|भारतीय गणराज]] की राजकीय और मध्य भारतीय- आर्य भाषा है।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=लिपी&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[देवनागरी लिपि|देवनागरी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=आधिकारिक भाषा &lt;br /&gt;
|पाठ 2=[[भारत]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3=नियामक&lt;br /&gt;
|पाठ 3=केंद्रीय हिंदी निदेशालय&lt;br /&gt;
|शीर्षक 4=भाषा–परिवार&lt;br /&gt;
|पाठ 4=[[भारोपीय भाषा परिवार]] &lt;br /&gt;
|शीर्षक 5=व्युत्पत्ति&lt;br /&gt;
|पाठ 5=हिंदी शब्द की व्युत्पत्ति [[संस्कृत]] शब्द सिन्धु से मानी जाती है। &lt;br /&gt;
|शीर्षक 6=&lt;br /&gt;
|पाठ 6=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 7=&lt;br /&gt;
|पाठ 7=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 8=&lt;br /&gt;
|पाठ 8=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 9=&lt;br /&gt;
|पाठ 9=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 10=&lt;br /&gt;
|पाठ 10=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=[[हिन्दी की उपभाषाएँ एवं बोलियाँ]], [[आठवीं अनुसूची]], [[हिन्दी दिवस]], [[विश्व हिन्दी दिवस]], [[हिंदी पत्रकारिता दिवस]]&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=सन् [[2001]] की जनगणना के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि लगभग 42.20 करोड़ लोग इसकी 50 से अधिक बोलियों में से एक इस्तेमाल करते हैं।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''हिंदी''' भारतीय [[प्रांगण:मुखपृष्ठ/भारत गणराज्य|गणराज]] की राजकीय और मध्य भारतीय- आर्य भाषा है। सन् [[2001]] की जनगणना के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि लगभग 42.20 करोड़ लोग इसकी 50 से अधिक बोलियों में से एक इस्तेमाल करते हैं। सन् 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकड़े मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था। सन् [[1997]] में भारत की जनगणना का भारतीय भाषाओं के विश्लेषण का ग्रन्थ प्रकाशित होने तथा संसार की भाषाओं की रिपोर्ट तैयार करने के लिए [[यूनेस्को]] द्वारा सन् [[1998]] में भेजी गई यूनेस्को प्रश्नावली के आधार पर उन्हें भारत सरकार के [[केन्द्रीय हिन्दी संस्थान]] के तत्कालीन निदेशक प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन द्वारा भेजी गई विस्तृत रिपोर्ट के बाद अब विश्व स्तर पर यह स्वीकृत है कि मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से संसार की भाषाओं में चीनी भाषा के बाद हिन्दी का दूसरा स्थान है। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्या हिन्दी भाषा से अधिक है किन्तु चीनी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा सीमित है। अँगरेज़ी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा अधिक है किन्तु मातृभाषियों की संख्या अँगरेज़ी भाषियों से अधिक है। इसकी कुछ बोलियाँ, [[मैथिली भाषा|मैथिली]] और [[राजस्थानी भाषा|राजस्थानी]] अलग भाषा होने का दावा करती हैं। हिंदी की प्रमुख बोलियों में [[अवधी भाषा|अवधी]], [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]], [[ब्रजभाषा]], [[छत्तीसगढ़ी]], [[गढ़वाली]], [[हरियाणवी]], [[कुमायूँनी बोली|कुमांऊनी]], [[मागधी]] और [[मारवाड़ी भाषा]] शामिल हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.censusindia.gov.in/Census_Data_2001/Census_Data_Online/Language/Statement1.htm |title=ABSTRACT OF SPEAKERS' STRENGTH OF LANGUAGES AND MOTHER TONGUES - 2001  |accessmonthday=15 सितम्बर |accessyear=2012 |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher=census of india |language=अंग्रेज़ी }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==हिंदी भाषा का विकास==&lt;br /&gt;
;वर्गीकरण&lt;br /&gt;
*हिंदी विश्व की लगभग 3,000 भाषाओं में से एक है।&lt;br /&gt;
*आकृति या रूप के आधार पर हिंदी वियोगात्मक या विश्लिष्ट भाषा है।&lt;br /&gt;
*भाषा–परिवार के आधार पर हिंदी भारोपीय परिवार की भाषा है।&lt;br /&gt;
*[[भारत]] में 4 भाषा–परिवार— [[भारोपीय भाषा परिवार|भारोपीय]], द्रविड़, आस्ट्रिक व चीनी–तिब्बती मिलते हैं। [[भारत]] में बोलने वालों के प्रतिशत के आधार पर भारोपीय परिवार सबसे बड़ा भाषा परिवार है।&lt;br /&gt;
*हिंदी भारोपीय/ भारत [[यूरोप|यूरोपीय]] के भारतीय– [[ईरान|ईरानी]] शाखा के भारतीय आर्य (Indo–Aryan) उपशाखा से विकसित एक भाषा है। &lt;br /&gt;
*भारतीय आर्यभाषा को तीन कालों में विभक्त किया जाता है। &lt;br /&gt;
{{भारत के भाषा परिवार सूची1}}&lt;br /&gt;
हिंदी की आदि जननी [[संस्कृत]] है। संस्कृत [[पालि भाषा|पालि]], [[प्राकृत भाषा]] से होती हुई [[अपभ्रंश भाषा|अपभ्रंश]] तक पहुँचती है। फिर अपभ्रंश, [[अवहट्ट]] से गुजरती हुई प्राचीन/प्रारम्भिक हिंदी का रूप लेती है। विशुद्धतः, हिंदी भाषा के इतिहास का आरम्भ अपभ्रंश से माना जाता है। &lt;br /&gt;
*हिंदी का विकास क्रम- '''[[संस्कृत भाषा|संस्कृत]]→ [[पालि भाषा|पालि]]→ [[प्राकृत भाषा|प्राकृत]]→ [[अपभ्रंश भाषा|अपभ्रंश]]→ अवहट्ट→ प्राचीन / प्रारम्भिक हिंदी'''&lt;br /&gt;
==अपभ्रंश==&lt;br /&gt;
{{main|अपभ्रंश भाषा}}&lt;br /&gt;
[[अपभ्रंश भाषा]] का विकास 500 ई. से लेकर 1000 ई. के मध्य हुआ और इसमें [[साहित्य]] का आरम्भ 8वीं [[सदी]] ई. (स्वयंभू [[कवि]]) से हुआ, जो 13वीं सदी तक जारी रहा। अपभ्रंश (अप+भ्रंश+घञ्) शब्द का यों तो शाब्दिक अर्थ है 'पतन', किन्तु अपभ्रंश साहित्य से अभीष्ट है— प्राकृत भाषा से विकसित भाषा विशेष का साहित्य।&lt;br /&gt;
;प्रमुख रचनाकार-&lt;br /&gt;
[[स्वयंभुव मनु|स्वयंभू]]— अपभ्रंश का [[वाल्मीकि]] ('[[पउम चरिउ]]' अर्थात् राम काव्य), धनपाल ('भविस्सयत कहा'–अपभ्रंश का पहला प्रबन्ध काव्य), पुष्पदंत ('महापुराण', '[[जसहर चरिउ]]'), सरहपा, कण्हपा आदि सिद्धों की रचनाएँ ('चरिया पद', 'दोहाकोशी') आदि।&lt;br /&gt;
==अवहट्ट==&lt;br /&gt;
{{main|अवहट्ट भाषा}}&lt;br /&gt;
अवहट्ट 'अपभ्रंष्ट' शब्द का विकृत रूप है। इसे 'अपभ्रंश का अपभ्रंश' या 'परवर्ती अपभ्रंश' कह सकते हैं। अवहट्ट अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के बीच की संक्रमणकालीन/संक्रांतिकालीन भाषा है। इसका कालखंड 900 ई. से 1100 ई. तक निर्धारित किया जाता है। वैसे साहित्य में इसका प्रयोग 14वीं सदी तक होता रहा है। अब्दुर रहमान, दामोदर पंडित, ज्योतिरीश्वर ठाकुर, [[विद्यापति]] आदि रचनाकारों ने अपनी भाषा को 'अवहट्ट' या 'अवहट्ठ' कहा है। विद्यापति प्राकृत की तुलना में अपनी भाषा को मधुरतर बताते हैं। देश की भाषा सब लोगों के लिए मीठी है। इसे अवहट्ठा कहा जाता है।&amp;lt;ref&amp;gt;'देसिल बयना सब जन मिट्ठा/ते तैसन जम्पञो अवहट्ठा'&amp;lt;/ref&amp;gt; &lt;br /&gt;
;प्रमुख रचनाकार- &lt;br /&gt;
अद्दहमाण/अब्दुर रहमान ('संनेह रासय'/'संदेश रासक'), दामोदर पंडित ('उक्ति–व्यक्ति–प्रकरण'), ज्योतिरीश्वर ठाकुर ('वर्ण रत्नाकर'), विद्यापति ('कीर्तिलता') आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्राचीन हिंदी==&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-purple&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;25%&amp;quot; style=&amp;quot;float:right; margin:10px&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं का विकास&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;3&amp;quot; style=&amp;quot;background:#dfe8e9&amp;quot;| '''शौरसेनी'''&lt;br /&gt;
| पश्चिमी हिंदी&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| [[राजस्थानी भाषा|राजस्थानी]]&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| [[गुजराती भाषा|गुजराती]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;background:#dfe8e9&amp;quot;| '''अर्द्धमागधी'''&lt;br /&gt;
| पूर्वी हिंदी&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;4&amp;quot; style=&amp;quot;background:#dfe8e9&amp;quot; | '''मागधी'''&lt;br /&gt;
| [[बिहारी भाषाएँ|बिहारी]]&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| [[उड़िया भाषा|उड़िया]]&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| [[बांग्ला भाषा|बांग्ला]]&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| [[असमिया भाषा|असमिया]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;background:#dfe8e9&amp;quot;|'''खस'''&lt;br /&gt;
| [[पहाड़ी बोली|पहाड़ी]] (शौरसेनी से प्रभावित)&lt;br /&gt;
|- &lt;br /&gt;
| rowspan=&amp;quot;2&amp;quot; style=&amp;quot;background:#dfe8e9&amp;quot; | '''ब्राचड़'''&lt;br /&gt;
| [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]](शौरसेनी से प्रभावित)&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[सिंधी भाषा|सिंधी]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;background:#dfe8e9&amp;quot;| '''महाराष्ट्री'''&lt;br /&gt;
| [[मराठी भाषा|मराठी]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
*मध्यदेशीय भाषा परम्परा की विशिष्ट उत्तराधिकारिणी होने के कारण हिंदी का स्थान आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं में सर्वोपरी है। &lt;br /&gt;
*प्राचीन हिंदी से अभिप्राय है— अपभ्रंश– अवहट्ट के बाद की भाषा।&lt;br /&gt;
*हिंदी का आदिकाल हिंदी भाषा का शिशुकाल है। यह वह काल था, जब अपभ्रंश–अवहट्ट का प्रभाव हिंदी भाषा पर मौजूद था और हिंदी की बोलियों के निश्चित व स्पष्ट स्वरूप विकसित नहीं हुए थे।&lt;br /&gt;
==हिंदी शब्द की व्युत्पत्ति==&lt;br /&gt;
हिंदी शब्द की व्युपत्ति भारत के उत्तर–पश्चिम में प्रवाहमान [[सिंधु नदी]] से सम्बन्धित है। अधिकांश [[विदेशी यात्री]] और आक्रान्ता उत्तर–पश्चिम सिंहद्वार से ही भारत आए। भारत में आने वाले इन विदेशियों ने जिस देश के दर्शन किए, वह '[[सिंधु]]' का देश था। [[ईरान]] ([[फ़ारस]]) के साथ भारत के बहुत प्राचीन काल से ही सम्बन्ध थे और ईरानी 'सिंधु' को 'हिन्दु' कहते थे। (सिंधु - हिन्दु, स का ह में तथा ध का द में परिवर्तन - [[पहलवी भाषा]] प्रवृत्ति के अनुसार ध्वनि परिवर्तन)। '''हिन्दू शब्द [[संस्कृत]] से प्रचलित है परंतु यह संस्कृत के 'सिन्धु' शब्द से विकसित है।''' हिन्दू से 'हिन्द' बना और फिर 'हिन्द' में [[फ़ारसी भाषा]] के सम्बन्ध कारक प्रत्यय 'ई' लगने से 'हिंदी' बन गया। 'हिंदी' का अर्थ है—'हिन्द का'। इस प्रकार हिंदी शब्द की उत्पत्ति हिन्द देश के निवासियों के अर्थ में हुई। आगे चलकर यह शब्द 'हिंदी की भाषा' के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा। &lt;br /&gt;
उपर्युक्त बातों से तीन बातें सामने आती हैं—&lt;br /&gt;
#'हिंदी' शब्द का विकास कई चरणों में हुआ- '''सिंधु'''→ '''हिन्दु'''→ '''हिन्द+ई'''→ '''हिंदी'''। प्रोफ़ेसर महावीर सरन जैन ने अपने “हिन्दी-उर्दू का अद्वैत” शीर्षक आलेख में विस्तार से स्पष्ट किया है कि [[ईरान]] की प्राचीन [[अवेस्ता भाषा|भाषा अवेस्ता]] में “स्” ध्वनि नहीं बोली जाती थी। अवेस्ता में “स्” का उच्चारण “ह्” किया जाता था। उदाहरण के लिए [[संस्कृत]] के असुर शब्द का उच्चारण अहुर किया जाता था। अफ़ग़ानिस्तान के बाद की [[सिन्धु नदी]] के पार के हिन्दुस्तान के इलाके को प्राचीन फारसी साहित्य में “हिन्द” एवं “हिन्दुश” के नामों से पुकारा गया है। “हिन्द” के भूभाग की किसी भी वस्तु, भाषा तथा विचार के लिए विशेषण के रूप में “हिन्दीक” का प्रयोग होता था। हिन्दीक माने हिन्द का या हिन्द की। यही हिन्दीक शब्द [[अरबी भाषा|अरबी]] से होता हुआ ग्रीक में “इंदिका” तथा “इंदिके” हो गया। ग्रीक से लैटिन में यह “इंदिया” तथा लैटिन से अंग्रेज़ी में “इंडिया” शब्द रूप बन गए। यही कारण है कि अरबी एवं फ़ारसी साहित्य में “हिन्द” में बोली जाने वाली ज़बानों के लिए “ज़बान-ए-हिन्द” लफ्ज़ मिलता है। [[भारत]] में आने के बाद मुसलमानों ने “ज़बान-ए-हिन्दी” का प्रयोग [[आगरा]]-[[दिल्ली]] के आसपास बोली जाने वाली भाषा के लिए किया। “ज़बान-ए-हिन्दी” माने हिन्द में बोली जाने वाली जबान। इस इलाक़े के गैर-मुस्लिम लोग बोले जाने वाले भाषा-रूप को “भाखा” कहते थे, हिन्दी नहीं। [[कबीरदास]] की प्रसिद्ध पंक्ति है – संस्किरित है कूप जल, भाखा बहता नीर।&lt;br /&gt;
#'हिंदी' शब्द मूलतः फ़ारसी का है न कि 'हिंदी' भाषा का। यह ऐसे ही है जैसे बच्चा हमारे घर जनमे और उसका नामकरण हमारा पड़ोसी करे। हालाँकि कुछ कट्टर हिंदी प्रेमी 'हिंदी' शब्द की व्युत्पत्ति हिंदी भाषा में ही दिखाने की कोशिश करते हैं, जैसे - हिन (हनन करने वाला) + दु (दुष्ट)= हिन्दू अर्थात् दुष्टों का हनन करने वाला हिन्दू और उन लोगों की भाषा 'हिंदी'; हीन (हीनों)+दु (दलन)= हिन्दू अर्थात् हीनों का दलन करने वाला हिन्दू और उनकी भाषा 'हिंदी'। चूँकि इन व्युत्पत्तियों में प्रमाण कम, अनुमान अधिक है, इसलिए सामान्यतः इन्हें स्वीकार नहीं किया जाता। &lt;br /&gt;
#'हिंदी' शब्द के दो अर्थ हैं— 'हिन्द देश के निवासी' (यथा— '''हिंदी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा'''— इक़बाल) और 'हिंदी की भाषा'। हाँ, यह बात अलग है कि अब यह शब्द दो आरम्भिक अर्थों से पृथक हो गया है। इस देश के निवासियों को अब कोई हिंदी नहीं कहता, बल्कि भारतवासी, हिन्दुस्तानी आदि कहते हैं। दूसरे, इस देश की व्यापक भाषा के अर्थ में भी अब 'हिंदी' शब्द का प्रयोग नहीं होता, क्योंकि भारत में अनेक भाषाएँ हैं, जो सब 'हिंदी' नहीं कहलाती हैं। बेशक ये सभी 'हिन्द' की भाषाएँ हैं, लेकिन केवल 'हिंदी' नहीं हैं। उन्हें हम [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]], [[बांग्ला भाषा|बांग्ला]], [[असमिया भाषा|असमिया]], [[उड़िया भाषा|उड़िया]], [[मराठी भाषा|मराठी]] आदि नामों से पुकारते हैं। इसलिए 'हिंदी' की इन सब भाषाओं के लिए 'हिंदी' शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता। हिंदी' शब्द भाषा विशेष का वाचक नहीं है, बल्कि यह भाषा समूह का नाम है। हिंदी जिस भाषा समूह का नाम है, उसमें आज के हिंदी प्रदेश/क्षेत्र की 5 उपभाषाएँ तथा 17 बोलियाँ शामिल हैं। बोलियों में [[ब्रजभाषा]], [[अवधी भाषा|अवधी]] एवं [[खड़ी बोली]] को आगे चलकर [[मध्यकाल]] में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ है। &lt;br /&gt;
*'''ब्रजभाषा'''- प्राचीन हिंदी काल में [[ब्रजभाषा]] अपभ्रंश–अवहट्ट से ही जीवन रस लेती रही। अपभ्रंश–अवहट्ट की रचनाओं में ब्रजभाषा के फूटते हुए अंकुर को देखा जा सकता है। ब्रजभाषा [[साहित्य]] का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ सुधीर अग्रवाल का 'प्रद्युम्न चरित' (1354 ई.) है। &lt;br /&gt;
*'''अवधी'''- [[अवधी भाषा|अवधी]] की पहली कृति मुल्ला दाउद की 'चंद्रायन' या 'लोरकहा' (1370 ई.) मानी जाती है। इसके उपरान्त अवधी भाषा के साहित्य का उत्तरोत्तर विकास होता गया। &lt;br /&gt;
*'''खड़ी बोली'''- प्राचीन हिंदी काल में रचित [[खड़ी बोली]] साहित्य में खड़ी बोली के आरम्भिक प्रयोगों से उसके आदि रूप या बीज रूप का आभास मिलता है। खड़ी बोली का आदिकालीन रूप सरहपा आदि सिद्धों, [[गोरखनाथ]] आदि नाथों, [[अमीर ख़ुसरो]] जैसे सूफ़ियों, [[जयदेव]], [[संत नामदेव|नामदेव]], [[रामानंद]] आदि संतों की रचनाओं में उपलब्ध है। इन रचनाकारों में हमें अपभ्रंश–अवहट्ट से निकलती हुई खड़ी बोली स्पष्टतः दिखाई देती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मध्यकालीन हिंदी==&lt;br /&gt;
मध्यकाल में हिंदी का स्वरूप स्पष्ट हो गया तथा उसकी प्रमुख बोलियाँ विकसित हो गईं। इस काल में भाषा के तीन रूप निखरकर सामने आए— ब्रजभाषा, अवधी व खड़ी बोली। ब्रजभाषा और अवधी का अत्यधिक साहित्यिक विकास हुआ तथा तत्कालीन ब्रजभाषा साहित्य को कुछ देशी राज्यों का संरक्षण भी प्राप्त हुआ। इनके अतिरिक्त मध्यकाल में खड़ी बोली के मिश्रित रूप का साहित्य में प्रयोग होता रहा। इसी खड़ी बोली का 14वीं सदी में दक्षिण में प्रवेश हुआ, अतः वहाँ पर इसका साहित्य में अधिक प्रयोग हुआ। 18वीं सदी में खड़ी बोली को मुसलमान शासकों का संरक्षण मिला तथा इसके विकास को नई दिशा मिली। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Hindi-Area.jpg|thumb|250px|[[भारत]] में हिंदी भाषी क्षेत्र]]&lt;br /&gt;
====ब्रजभाषा====&lt;br /&gt;
{{main|ब्रजभाषा}}&lt;br /&gt;
हिंदी के मध्यकाल में मध्य देश की महान भाषा परम्परा के उत्तरादायित्व का पूरा निर्वाह ब्रजभाषा ने किया। यह अपने समय की परिनिष्ठित व उच्च कोटि की साहित्यिक भाषा थी, जिसको गौरवान्वित करने का सर्वाधिक श्रेय हिंदी के कृष्णभक्त कवियों को है। पूर्व मध्यकाल (अर्थात् भक्तिकाल) में कृष्णभक्त कवियों ने अपने साहित्य में ब्रजभाषा का चरम विकास किया। पुष्टि मार्ग/शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय के [[सूरदास]] (सूरसागर), [[नंददास]], [[निम्बार्क संप्रदाय]] के श्री भट्ट, [[चैतन्य सम्प्रदाय]] के गदाधर भट्ट, [[राधावल्लभ सम्प्रदाय]] के [[हित हरिवंश]] ([[श्रीकृष्ण]] की [[बाँसुरी]] के अवतार) एवं सम्प्रदाय–निरपेक्ष कवियों में [[रसखान]], [[मीराबाई]] आदि प्रमुख कृष्णभक्त कवियों ने ब्रजभाषा के साहित्यिक विकास में अमूल्य योगदान दिया। इनमें सर्वप्रमुख स्थान सूरदास का है, जिन्हें 'अष्टछाप का जहाज़' कहा जाता है। उत्तर मध्यकाल (अर्थात् रीतिकाल) में अनेक आचार्यों एवं कवियों ने ब्रजभाषा में लाक्षणिक एवं रीति ग्रंथ लिखकर ब्रजभाषा के साहित्य को समृद्ध किया। रीतिबद्ध कवियों में [[केशवदास]], [[मतिराम]], [[बिहारी लाल|बिहारी]], देव, [[पद्माकर]], भिखारी दास, सेनापति, आदि तथा रीतिमुक्त कवियों में [[घनानंद]], आलम, बोधा आदि प्रमुख हैं। (ब्रजबुलि—[[बंगाल]] में कृष्णभक्त कवियों के द्वारा प्रचारित भाषा का नाम।)&lt;br /&gt;
====अवधी====&lt;br /&gt;
{{main|अवधी भाषा}}&lt;br /&gt;
अवधी को साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय सूफ़ी/प्रेममार्गी कवियों को है। [[कुतबन]] ('[[मृगावती]]'), [[मलिक मुहम्मद जायसी|जायसी]] ('पद्मावत'), [[मंझन]] ('[[मधुमालती]]'), [[आलम]] ('[[माधवानल कामकंदला]]'), [[उसमान]] ('चित्रावली'), [[नूर मुहम्मद]] ('[[इन्द्रावती -नूर मुहम्मद|इन्द्रावती]]'), [[कासिमशाह]] ('हंस जवाहिर'), शेख निसार ('यूसुफ़ जुलेखा'), अलीशाह ('प्रेम चिंगारी') आदि सूफ़ी कवियों ने अवधी को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। इनमें सर्वप्रमुख जायसी थे। अवधी को रामभक्त कवियों ने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया, विशेषकर [[तुलसीदास]] ने '[[रामचरितमानस]]' की रचना बैसवाड़ी अवधी में कर अवधी भाषा को जिस साहित्यिक ऊँचाई पर पहुँचाया, वह अतुलनीय है। मध्यकाल में साहित्यिक अवधी का चरमोत्कर्ष दो कवियों में मिलता है, जायसी और तुलसीदास। जायसी के यहाँ जहाँ अवधी का ठेठ ग्रामीण रूप मिलता है, वहाँ तुलसी के यहाँ अवधी का तत्सममुखी रूप है। (गोहारी/गोयारी— [[बंगाल]] में सूफ़ियों द्वारा प्रचारित अवधी भाषा का नाम।)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====खड़ी बोली====&lt;br /&gt;
{{main|खड़ी बोली}}&lt;br /&gt;
मध्यकाल में खड़ी बोली का मुख्य केन्द्र उत्तर से बदलकर दक्कन में हो गया। इस प्रकार, मध्यकाल में खड़ी बोली के दो रूप हो गए— उत्तरी हिंदी व दक्कनी हिंदी। खड़ी बोली मध्यकाल रूप [[कबीर]], [[नानक]], [[दादू दयाल|दादू]], मलूकदास, रज्जब आदि संतों; गंग की 'चन्द छन्द वर्णन की महिमा', [[रहीम]] के 'मदनाष्टक', आलम के 'सुदामा चरित', जटमल की 'गोरा बादल की कथा', वली, सौदा, इन्शा, नज़ीर आदि दक्कनी एवं उर्दू के कवियों, 'कुतुबशतम' (17वीं सदी), 'भोगलू पुराण' (18वीं सदी), संत प्राणनाथ के 'कुलजमस्वरूप' आदि में मिलता है।&lt;br /&gt;
==आधुनिक हिंदी==&lt;br /&gt;
*हिंदी के आधुनिक काल तक आते–आते ब्रजभाषा जनभाषा से काफ़ी दूर हट चुकी थी और अवधी ने तो बहुत पहले से ही साहित्य से मुँह मोड़ लिया था। 19वीं सदी के मध्य तक अंग्रेज़ी सत्ता का महत्तम विस्तार भारत में हो चुका था। इस राजनीतिक परिवर्तन का प्रभाव मध्य देश की भाषा हिंदी पर भी पड़ा। नवीन राजनीतिक परिस्थितियों ने खड़ी बोली को प्रोत्साहन प्रदान किया। जब ब्रजभाषा और अवधी का साहित्यिक रूप जनभाषा से दूर हो गया तब उनका स्थान खड़ी बोली धीरे–धीरे लेने लगी। अंग्रेज़ी सरकार ने भी इसका प्रयोग आरम्भ कर दिया। &lt;br /&gt;
*हिंदी के आधुनिक काल में प्रारम्भ में एक ओर उर्दू का प्रचार होने और दूसरी ओर काव्य की भाषा ब्रजभाषा होने के कारण खड़ी बोली को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ा। 19वीं सदी तक कविता की भाषा ब्रजभाषा और गद्य की भाषा खड़ी बोली रही। 20वीं सदी के आते–आते खड़ी बोली गद्य–पद्य दोनों की ही साहित्यिक भाषा बन गई। &lt;br /&gt;
*इस युग में खड़ी बोली को प्रतिष्ठित करने में विभिन्न धार्मिक सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों ने बड़ी सहायता की। फलतः खड़ी बोली साहित्य की सर्वप्रमुख भाषा बन गयी।&lt;br /&gt;
==खड़ी बोली==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Kolaz-hindi-writer-poet.jpg|thumb|प्रमुख हिंदी साहित्यकारों की एक झलक]]&lt;br /&gt;
====भारतेन्दु पूर्व युग====&lt;br /&gt;
खड़ी बोली गद्य के आरम्भिक रचनाकारों में फ़ोर्ट विलियम कॉलेज के बाहर दो रचनाकारों— सदासुख लाल 'नियाज' (सुखसागर) व [[इंशा अल्ला ख़ाँ]] (रानी केतकी की कहानी) तथा फ़ोर्ट विलियम कॉलेज, [[कलकत्ता]] के दो भाषा मुंशियों— [[लल्लू लालजी]] (प्रेम सागर) व सदल मिश्र (नासिकेतोपाख्यान) के नाम उल्लेखनीय हैं। भारतेन्दु पूर्व युग में मुख्य संघर्ष हिंदी की स्वीकृति और प्रतिष्ठा को लेकर था। इस युग के दो प्रसिद्ध लेखकों— राजा शिव प्रसाद 'सितारे हिन्द' व राजा लक्ष्मण सिंह ने हिंदी के स्वरूप निर्धारण के सवाल पर दो सीमान्तों का अनुगमन किया। राजा शिव प्रसाद ने हिंदी का गँवारुपन दूर कर उसे उर्दू–ए–मुअल्ला बना दिया तो राजा लक्ष्मण सिंह ने विशुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिंदी का समर्थन किया।&lt;br /&gt;
====भारतेन्दु युग====&lt;br /&gt;
(1850 ई.–[[1900]] ई.)&lt;br /&gt;
इन दोनों के बीच सर्वमान्य हिंदी गद्य की प्रतिष्ठा कर गद्य साहित्य की विविध विधाओं का ऐतिहासिक कार्य भारतेन्दु युग में हुआ। हिंदी सही मायने में [[भारतेन्दु हरिश्चंद्र|भारतेन्दु]] के काल में 'नई चाल में ढली' और उनके समय में ही हिंदी के गद्य के बहुमुखी रूप का सूत्रपात हुआ। उन्होंने न केवल स्वयं रचना की बल्कि अपना एक लेखक मंडल भी तैयार किया, जिसे 'भारतेन्दु मंडल' कहा गया। भारतेन्दु युग की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि गद्य रचना के लिए खड़ी बोली को माध्यम के रूप में अपनाकर युगानुरूप स्वस्थ दृष्टिकोण का परिचय दिया। लेकिन पद्य रचना के मसले में ब्रजभाषा या खड़ी बोली को अपनाने के सवाल पर विवाद बना रहा, जिसका अन्त द्विवेदी के युग में जाकर हुआ। &lt;br /&gt;
====द्विवेदी युग====&lt;br /&gt;
([[1900]] ई.–[[1920]] ई.)&lt;br /&gt;
खड़ी बोली और [[हिंदी साहित्य]] के सौभाग्य से [[1903]] ई. में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'सरस्वती' पत्रिका के सम्पादन का भार सम्भाला। वे सरल और शुद्ध भाषा के प्रयोग के हिमायती थे। वे लेखकों की [[वर्तनी (हिंदी)|वर्तनी]] अथवा त्रुटियों का संशोधन स्वयं करते चलते थे। उन्होंने हिंदी के परिष्कार का बीड़ा उठाया और उसे बख़ूबी अन्जाम दिया। गद्य तो भारतेन्दु युग से ही सफलतापूर्वक खड़ी बोली में लिखा जा रहा था, अब पद्य की व्यावहारिक भाषा भी एकमात्र खड़ी बोली प्रतिष्ठित होनी लगी। इस प्रकार ब्रजभाषा, जिसके साथ में 'भाषा' शब्द जुड़ा हुआ है, अपने क्षेत्र में सीमित हो गई अर्थात् 'बोली' बन गई। इसके मुक़ाबले में खड़ी बोली, जिसके साथ 'बोली' शब्द लगा है, 'भाषा बन गई', और इसका सही नाम हिंदी हो गया। अब खड़ी बोली [[दिल्ली]] के आसपास की [[मेरठ]]–जनपदीय बोली नहीं रह गई, अपितु यह समस्त उत्तरी भारत के साहित्य का माध्यम बन गई। द्विवेदी युग में साहित्य रचना की विविध विधाएँ विकसित हुई।। महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्याम सुन्दर दास, पद्म सिंह शर्मा, माधव प्रसाद मिश्र, पूर्णसिंह, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी  आदि के अवदान विशेषतः उल्लेखनीय हैं। इसी दौरान वर्ष [[1918]] में [[इन्दौर]] में गांधी जी की अध्यक्षता में 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के द्वारा हिन्दी [[राष्ट्रभाषा]] मानी गयी। इस प्रस्ताव के स्वीकृत होने के बाद दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये ''दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा'' की भी स्थापना हुयी जिसका मुख्यालय [[मद्रास]] में था।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====छायावाद युग====&lt;br /&gt;
([[1920]] ई.–[[1936]] ई. एवं उसके बाद) &lt;br /&gt;
साहित्यिक खड़ी बोली के विकास में छायावाद युग का योगदान काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। [[जयशंकर प्रसाद|प्रसाद]], [[सुमित्रानंदन पंत|पंत]], [[सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला|निराला]], [[महादेवी वर्मा]] और राम कुमार आदि ने महती योगदान किया। इनकी रचनाओं को देखते हुए यह कोई नहीं कह सकता कि खड़ी बोली सूक्ष्म भावों को अभिव्यक्त करने में ब्रजभाषा से कम समर्थ है। हिंदी में अनेक भाषायी गुणों का समावेश हुआ। अभिव्यजंना की विविधता, बिंबों की लाक्षणिकता, रसात्मक लालित्य छायावाद युग की भाषा की अन्यतम विशेषताएँ हैं। हिंदी काव्य में छायावाद युग के बाद प्रगतिवाद युग ([[1936]] ई.–[[1946]] ई.) प्रयोगवाद युग (1943) आदि आए। इस दौर में खड़ी बोली का काव्य भाषा के रूप में उत्तरोत्तर विकास होता गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद्य के ही नहीं, गद्य के सन्दर्भ में भी छायावाद युग साहित्यिक खड़ी बोली के विकास का स्वर्ण युग था। कथा साहित्य (उपन्यास व कहानी) में [[प्रेमचंद]], नाटक में [[जयशंकर प्रसाद]], आलोचना में आचार्य [[रामचंद्र शुक्ल]] ने जो भाषा–शैलियाँ और मर्यादाएँ स्थापित कीं, उनका अनुसरण आज भी किया जा रहा है। गद्य साहित्य के क्षेत्र में इनके महत्त्व का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गद्य–साहित्य के विभिन्न विधाओं के इतिहास में कालों का नामकरण इनके नाम को केन्द्र में रखकर ही किया गया है। जैसे उपन्यास के इतिहास में प्रेमचंद– पूर्व युग, प्रेमचंद युग, प्रेमचंदोत्तर युग; नाटक के इतिहास में प्रसाद– पूर्व युग, प्रसाद युग, प्रसादोत्तर युग; आलोचना के इतिहास में शुक्ल– पूर्व युग, शुक्ल युग, शुक्लोत्तर युग।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हिंदी के विभिन्न नाम या रूप== &lt;br /&gt;
====हिन्दवी====&lt;br /&gt;
हिन्दवी को हिन्दुई, जबान–ए–हिन्द, देहलवी नामों से भी जाना जाता है। मध्यकाल में मध्यदेश के हिन्दुओं की भाषा, जिसमें अरबी–फ़ारसी शब्दों का अभाव है। (सर्वप्रथम [[अमीर ख़ुसरो]] (1253-1325) ने मध्य देश की भाषा के लिए हिन्दवी, हिंदी शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने देशी भाषा हिन्दवी, हिंदी के प्रचार–प्रसार के लिए एक फ़ारसी–हिंदी कोश 'ख़ालिक बारी' की रचना की, जिसमें हिन्दवी शब्द 30 बार, हिंदी शब्द 5 बार देशी भाषा के लिए प्रयुक्त हुआ है।)&lt;br /&gt;
====भाषा====&lt;br /&gt;
भाषा को भाखा भी कहा जाता है। विद्यापति, [[कबीर]], [[तुलसी]], [[केशवदास]] आदि ने भाषा शब्द का प्रयोग हिंदी के लिए किया है। (19वीं सदी के प्रारम्भ तक इस शब्द का प्रयोग होता रहा। फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में नियुक्त हिंदी अध्यापकों को 'भाषा मुंशी' के नाम से अभिहित करना इसी बात का सूचक है।)&lt;br /&gt;
====रेख्ता====&lt;br /&gt;
मध्यकाल में [[मुसलमान|मुसलमानों]] में प्रचलित अरबी–फ़ारसी शब्दों से मिश्रित कविता की भाषा। (जैसे– मीर, [[मिर्ज़ा ग़ालिब]] की रचनाएँ)&lt;br /&gt;
====दक्खिनी====&lt;br /&gt;
इसे दक्कनी नाम से भी जाना जाता है। मध्यकाल में दक्कन के मुसलमानों के द्वारा फ़ारसी लिपि में लिखी जाने वाली भाषा। (हिंदी में गद्य रचना परम्परा की शुरुआत करने का श्रेय दक्कनी हिंदी के रचनाकारों को ही है। दक्कनी हिंदी को उत्तर भारत में लाने का श्रेय प्रसिद्ध शायर वली दक्कनी (1688-1741) को है। वह मुग़ल शासक मुहम्मद शाह 'रंगीला' के शासन काल में [[दिल्ली]] पहुँचा और उत्तरी भारत में दक्कनी हिंदी को लोकप्रिय बनाया।)&lt;br /&gt;
====खड़ी बोली====&lt;br /&gt;
खड़ी बोली की तीन शैलियाँ हैं—&lt;br /&gt;
#हिंदी, शुद्ध हिंदी, उच्च हिंदी, नागरी हिंदी, आर्यभाषा– नागरी लिपि में लिखित संस्कृत बहुल खड़ी बोली (जैसे—जयशंकर प्रसाद की रचनाएँ)।&lt;br /&gt;
#उर्दू, जबान–ए–उर्दू, जबान–ए–उर्दू–मुअल्ला— फ़ारसी लिपि में लिखित अरबी—फ़ारसी बहुल खड़ी बोली।&lt;br /&gt;
#हिन्दुस्तानी— हिंदी और उर्दू का मिश्रित रूप व आमजन द्वारा प्रयुक्त (जैसे–[[प्रेमचंद]] की रचनाएँ)।&amp;lt;ref&amp;gt;13वीं सदी से 18वीं सदी तक हिंदी–उर्दू में कोई मौलिक भेद नहीं था।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==हिंदी के विभिन्न अर्थ==&lt;br /&gt;
====भाषा शास्त्रीय अर्थ====&lt;br /&gt;
नागरी लिपि में लिखित संस्कृत बहुल खड़ी बोली।&lt;br /&gt;
====संवैधानिक/क़ानूनी अर्थ====&lt;br /&gt;
संविधान के अनुसार हिंदी भारत संघ की राजभाषा या अधिकृत भाषा तथा अनेक राज्यों की राजभाषा है।&lt;br /&gt;
====सामान्य अर्थ====&lt;br /&gt;
समस्त हिंदी भाषी क्षेत्र की परिनिष्ठित भाषा अर्थात् शासन, शिक्षा, साहित्य, व्यापार आदि की भाषा।&lt;br /&gt;
====व्यापक अर्थ====&lt;br /&gt;
आधुनिक युग में हिंदी को केवल खड़ी बोली में ही सीमित नहीं किया जा सकता। हिंदी की सभी उपभाषाएँ और बोलियाँ हिंदी के व्यापक अर्थ में आ जाती हैं। &lt;br /&gt;
==हिंदी का राष्ट्रभाषा के रूप में विकास==&lt;br /&gt;
====राष्ट्रभाषा क्या है====&lt;br /&gt;
*राष्ट्रभाषा का शाब्दिक अर्थ है—समस्त राष्ट्र में प्रयुक्त भाषा अर्थात् आमजन की भाषा (जनभाषा)। जो भाषा समस्त राष्ट्र में जन–जन के विचार–विनिमय का माध्यम हो, वह राष्ट्रभाषा कहलाती है।&lt;br /&gt;
*राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय एकता एवं अंतर्राष्ट्रीय संवाद सम्पर्क की आवश्यकता की उपज होती है। वैसे तो सभी भाषाएँ राष्ट्रभाषाएँ होती हैं, किन्तु राष्ट्र की जनता जब स्थानीय एवं तत्कालिक हितों व पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर अपने राष्ट्र की कई भाषाओं में से किसी एक भाषा को चुनकर उसे राष्ट्रीय अस्मिता का एक आवश्यक उपादान समझने लगती है तो वही राष्ट्रभाषा है। &lt;br /&gt;
*स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभाषा की आवश्यकता होती है। भारत के सन्दर्भ में इस आवश्यकता की पूर्ति हिंदी ने की। यही कारण है कि हिंदी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान&amp;lt;ref&amp;gt;विशेषतः 1900 ई.-1947 ई.&amp;lt;/ref&amp;gt; राष्ट्रभाषा बनी। &lt;br /&gt;
* राष्ट्रभाषा शब्द कोई संवैधानिक शब्द नहीं है, बल्कि यह प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है। &lt;br /&gt;
* राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक शर्त देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है। &lt;br /&gt;
* राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्क–भाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होता है। &lt;br /&gt;
* राष्ट्रभाषा हमेशा स्वभाषा ही हो सकती है क्योंकि उसी के साथ जनता का भावनात्मक लगाव होता है।&lt;br /&gt;
* राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है।&lt;br /&gt;
====अंग्रेज़ों का योगदान====&lt;br /&gt;
*राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्क भाषा होती है। हिंदी दीर्घकाल से सारे देश में जन–जन के पारस्परिक सम्पर्क की भाषा रही है। यह केवल उत्तरी भारत की नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के आचार्यों [[वल्लभाचार्य]], [[रामानुज]], [[रामानंद]] आदि ने भी इसी भाषा के माध्यम से अपने मतों का प्रचार किया था। अहिंदी भाषी राज्यों के भक्त–संत कवियों (जैसे—[[असम]] के शंकरदेव, [[महाराष्ट्र]] के [[ज्ञानेश्वर]] व नामदेव, [[गुजरात]] के [[नरसी मेहता]], बंगाल के [[चैतन्य महाप्रभु|चैतन्य]] आदि) ने इसी भाषा को अपने धर्म और साहित्य का माध्यम बनाया था। &lt;br /&gt;
*यही कारण था कि जनता और सरकार के बीच संवाद स्थापना के क्रम में फ़ारसी या अंग्रेज़ी के माध्यम से दिक्कतें पेश आईं तो कम्पनी सरकार ने फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में हिन्दुस्तानी विभाग खोलकर अधिकारियों को हिंदी सिखाने की व्यवस्था की। यहाँ से हिंदी पढ़े हुए अधिकारियों ने भिन्न–भिन्न क्षेत्रों में उसका प्रत्यक्ष लाभ देकर मुक्त कंठ से हिंदी को सराहा। &lt;br /&gt;
*'''सी. टी. मेटकाफ़ ने 1806 ई. में अपने शिक्षा गुरु [[जॉन गिलक्राइस्ट]] को लिखा'''— 'भारत के जिस भाग में भी मुझे काम करना पड़ा है, [[कलकत्ता]] से लेकर [[लाहौर]] तक, कुमाऊँ के पहाड़ों से लेकर [[नर्मदा नदी]] तक मैंने उस भाषा का आम व्यवहार देखा है, जिसकी शिक्षा आपने मुझे दी है। मैं [[कन्याकुमारी]] से लेकर [[कश्मीर]] तक या जावा से सिंधु तक इस विश्वास से यात्रा करने की हिम्मत कर सकता हूँ कि मुझे हर जगह ऐसे लोग मिल जाएँगे जो हिन्दुस्तानी बोल लेते होंगे।'&lt;br /&gt;
*'''टॉमस रोबक ने 1807 ई. में लिखा'''— 'जैसे [[इंग्लैण्ड]] जाने वाले को लैटिन सेक्सन या फ़्रेंच के बदले अंग्रेज़ी सीखनी चाहिए, वैसे ही भारत आने वाले को अरबी–फ़ारसी या संस्कृत के बदले हिन्दुस्तानी सीखनी चाहिए।' &lt;br /&gt;
*'''विलियम केरी ने 1816 ई. में लिखा'''— 'हिंदी किसी एक प्रदेश की भाषा नहीं बल्कि देश में सर्वत्र बोली जाने वाली भाषा है।'&lt;br /&gt;
*'''एच. टी. कोलब्रुक ने लिखा'''— 'जिस भाषा का व्यवहार भारत के प्रत्येक प्रान्त के लोग करते हैं, जो पढ़े–लिखे तथा अनपढ़ दोनों की साधारण बोलचाल की भाषा है, जिसको प्रत्येक गाँव में थोड़े बहुत लोग अवश्य ही समझ लेते हैं, उसी का यथार्थ नाम हिंदी है।'&lt;br /&gt;
*'''[[जार्ज ग्रियर्सन]] ने हिंदी को 'आम बोलचाल की महाभाषा' कहा है।&lt;br /&gt;
*इन विद्वानों के मंतव्यों से स्पष्ट है कि हिंदी की व्यावहारिक उपयोगिता, देशव्यापी प्रसार एवं प्रयोगगत लचीलेपन के कारण [[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]] ने हिंदी को अपनाया। उस समय हिंदी और उर्दू को एक ही भाषा माना जाता था। अंग्रेज़ों ने हिंदी को प्रयोग में लाकर हिंदी की महती संभावनाओं की ओर राष्ट्रीय नेताओं एवं साहित्यकारों का ध्यान खींचा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====धर्म/समाज सुधारकों का योगदान====&lt;br /&gt;
*धर्म/समाज सुधार की प्रायः सभी संस्थाओं ने हिंदी के महत्त्व को भाँपा और हिंदी की हिमायत की। &lt;br /&gt;
*[[ब्रह्म समाज]] (1828 ई.) के संस्थापक [[राजा राममोहन राय]] ने कहा, '''इस समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है।''' ब्रह्मसमाजी [[केशव चंद्र सेन]] ने 1875 ई. में एक लेख लिखा, भारतीय एकता कैसे हो, 'जिसमें उन्होंने लिखा— '''उपाय है सारे भारत में एक ही भाषा का व्यवहार।''' अभी जितनी भाषाएँ भारत में प्रचलित हैं, उनमें हिंदी भाषा लगभग सभी जगह प्रचलित है। यह हिंदी अगर भारतवर्ष की एकमात्र भाषा बन जाए तो यह काम सहज ही और शीघ्र ही सम्पन्न हो सकता है। एक अन्य ब्रह्मसमाजी नवीन चंद्र राय ने [[पंजाब]] में हिंदी के विकास के लिए स्तुत्य योगदान दिया। &lt;br /&gt;
*[[आर्य समाज]] (1875 ई.) के संस्थापक [[स्वामी दयानंद सरस्वती]] गुजराती भाषी थे एवं [[गुजराती भाषा|गुजराती]] व [[संस्कृत]] के अच्छे जानकार थे। हिंदी का उन्हें सिर्फ़ कामचलाऊ ज्ञान था, पर अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए तथा देश की एकता को मज़बूत करने के लिए उन्होंने अपना सारा धार्मिक साहित्य हिंदी में ही लिखा। उनका कहना था कि '''हिंदी के द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है।''' वे इस 'आर्यभाषा' को सर्वात्मना देशोन्नति का मुख्य आधार मानते थे। उन्होंने हिंदी के प्रयोग को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। वे कहते थे, 'मेरी आँखें उस दिन को देखना चाहती हैं, जब [[कश्मीर]] से [[कन्याकुमारी]] तक सब भारतीय एक भाषा समझने और बोलने लग जाएँगे। &lt;br /&gt;
*अरविन्द दर्शन के प्रणेता [[अरविन्द घोष]] की सलाह थी कि 'लोग अपनी–अपनी मातृभाषा की रक्षा करते हुए सामान्य भाषा के रूप में हिंदी को ग्रहण करें।'&lt;br /&gt;
*[[थियोसोफ़िकल सोसाइटी]] (1875 ई.) की संचालिका [[एनी बेसेंट]] ने कहा था, &amp;quot;भारतवर्ष के भिन्न–भिन्न भागों में जो अनेक देशी भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें एक भाषा ऐसी है जिसमें शेष सब भाषाओं की अपेक्षा एक भारी विशेषता है, वह यह कि उसका प्रचार सबसे अधिक है। वह भाषा हिंदी है। हिंदी जानने वाला आदमी सम्पूर्ण भारतवर्ष में यात्रा कर सकता है और उसे हर जगह हिंदी बोलने वाले मिल सकते हैं। भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।&amp;quot;&lt;br /&gt;
*उपर्युक्त धार्मिक/सामाजिक संस्थाओं के अतिरिक्त [[प्रार्थना समाज]]&amp;lt;ref&amp;gt;स्थापना 1867 ई., संस्थापक—आत्मारंग पाण्डुरंग&amp;lt;/ref&amp;gt;, सनातन धर्म सभा&amp;lt;ref&amp;gt;स्थापना 1895 ई., संस्थापक—[[दीनदयाल उपाध्याय|पंडित दीनदयाल]]&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[रामकृष्ण मिशन]]&amp;lt;ref&amp;gt;स्थापना 1897 ई., संस्थापक—[[स्वामी विवेकानंद]]&amp;lt;/ref&amp;gt; आदि ने हिंदी के प्रचार में योग दिया। &lt;br /&gt;
*इससे लगता है कि धर्म/समाज सुधारकों की यह सोच बन चुकी थी कि राष्ट्रीय स्तर पर संवाद स्थापित करने के लिए हिंदी आवश्यक है। वे जानते थे कि हिंदी बहुसंख्यक जन की भाषा है, एक प्रान्त के लोग दूसरे प्रान्त के लोगों से सिर्फ़ इस भाषा में ही विचारों का आदान–प्रदान कर सकते हैं। भावी राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को बढ़ाने का कार्य इन्हीं धर्म/समाज सुधारकों ने किया।&lt;br /&gt;
====कांग्रेस के नेताओं का योगदान====&lt;br /&gt;
*[[1885]] ई. में [[कांग्रेस]] की स्थापना हुई। जैसे–जैसे कांग्रेस का राष्ट्रीय आंदोलन ज़ोर पकड़ता गया, वैसे–वैसे राष्ट्रीयता, राष्ट्रीय झण्डा एवं राष्ट्रभाषा के प्रति आग्रह बढ़ता ही गया।&lt;br /&gt;
*[[1917]] ई. में [[लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक]] ने कहा, &amp;quot;यद्यपि मैं उन लोगों में से हूँ, जो चाहते हैं और जिनका विचार है कि हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।&amp;quot; तिलक ने भारतवासियों से आग्रह किया कि वे हिंदी सीखें। &lt;br /&gt;
*[[महात्मा गाँधी]] राष्ट्र के लिए राष्ट्रभाषा को नितांत आवश्यक मानते थे। उनका कहना था, &amp;quot;राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।&amp;quot; गाँधीजी हिंदी के प्रश्न को स्वराज का प्रश्न मानते थे— &amp;quot;हिंदी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।&amp;quot; उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में सामने रखकर भाषा–समस्या पर गम्भीरता से विचार किया। 1917 ई. में भड़ौंच में आयोजित गुजरात शिक्षा परिषद के अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए गाँधीजी ने कहा, &lt;br /&gt;
'''राष्ट्रभाषा के लिए 5 लक्षण या शर्तें होनी चाहिए'''—&lt;br /&gt;
#अमलदारों के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए।&lt;br /&gt;
#यह ज़रूरी है कि भारतवर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हों।&lt;br /&gt;
#उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का अपनी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवहार होना चाहिए। &lt;br /&gt;
#राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए।&lt;br /&gt;
#उस भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्पस्थायी स्थिति पर ज़ोर नहीं देना चाहिए।&amp;quot;&lt;br /&gt;
वर्ष 1918 ई. में हिंदी साहित्य सम्मेलन के [[इन्दौर]] अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए गाँधी जी ने राष्ट्रभाषा हिंदी का समर्थन किया, &amp;quot;मेरा यह मत है कि हिंदी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए।&amp;quot; इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि प्रतिवर्ष 6 दक्षिण भारतीय युवक हिंदी सीखने के लिए प्रयाग भेजें जाएँ और 6 उत्तर भारतीय युवक को दक्षिण भाषाएँ सीखने तथा हिंदी का प्रसार करने के लिए [[दक्षिण भारत]] में भेजा जाए। इन्दौर सम्मेलन के बाद उन्होंने हिंदी के कार्य को राष्ट्रीय व्रत बना दिया। दक्षिण में प्रथम हिंदी प्रचारक के रूप में गाँधीजी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास गाँधी को दक्षिण में [[चेन्नई]] भेजा। गाँधीजी की प्रेरणा से मद्रास (1927 ई.) एवं वर्धा (1936 ई.) में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएँ स्थापित की गईं। &lt;br /&gt;
*वर्ष 1925 ई. में कांग्रेस के [[कानपुर]] अधिवेशन में गाँधीजी की प्रेरणा से यह प्रस्ताव पारित हुआ कि 'कांग्रेस का, कांग्रेस की महासमिति का और कार्यकारिणी समिति का काम–काज आमतौर पर हिंदी में चलाया जाएगा।' इस प्रस्ताव में हिंदी–आंदोलन को बड़ा बल मिला। &lt;br /&gt;
*वर्ष [[1927]] ई. में गाँधीजी ने लिखा, &amp;quot;वास्तव में ये [[अंग्रेज़ी भाषा|अंग्रेज़ी]] में बोलने वाले नेता हैं, जो आम जनता में हमारा काम जल्दी आगे बढ़ने नहीं देते। वे हिंदी सीखने से इंकार करते हैं, जबकि हिंदी द्रविड़ प्रदेश में भी तीन महीने के अन्दर सीखी जा सकती है। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Hindi.jpg|300px|right|thumb]]&lt;br /&gt;
*वर्ष [[1927]] ई. में [[सी. राजगोपालाचारी]] ने दक्षिण वालों को हिंदी सीखने की सलाह दी और कहा, &amp;quot;हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा तो है ही, यही जनतंत्रात्मक भारत में [[राजभाषा]] भी होगी।&amp;quot;&lt;br /&gt;
*वर्ष [[1928]] ई. में प्रस्तुत [[नेहरू रिपोर्ट]] में भाषा सम्बन्धी सिफ़ारिश में कहा गया था, &amp;quot;[[देवनागरी लिपि|देवनागरी]] अथवा [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]] में लिखी जाने वाली हिन्दुस्तानी भारत की राष्ट्रभाषा होगी, परन्तु कुछ समय के लिए अंग्रेज़ी का उपयोग ज़ारी रहेगा।&amp;quot; सिवाय 'देवनागरी या फ़ारसी' की जगह 'देवनागरी' तथा 'हिन्दुस्तानी' की जगह 'हिंदी' रख देने के अंततः स्वतंत्र भारत के संविधान में इसी मत को अपना लिया गया।&lt;br /&gt;
*वर्ष 1929 ई. में [[सुभाषचंद्र बोस]] ने कहा, &amp;quot;प्रान्तीय ईर्ष्या–द्वेष को दूर करने में जितनी सहायता इस हिंदी प्रचार से मिलेगी, उतनी दूसरी किसी चीज़ से नहीं मिल सकती। अपनी प्रान्तीय भाषाओं की भरपूर उन्नति कीजिए, उसमें कोई बाधा नहीं डालना चाहता और न हम किसी की बाधा को सहन ही कर सकते हैं। पर सारे प्रान्तों की सार्वजनिक भाषा का पद हिंदी या हिन्दुस्तानी को ही मिला है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
*वर्ष 1931 ई. में गाँधीजी ने लिखा, &amp;quot;यदि स्वराज्य अंगेज़ी–पढ़े भारतवासियों का है और केवल उनके लिए है तो सम्पर्क भाषा अवश्य अंग्रेज़ी होगी। यदि वह करोड़ों भूखे लोगों, करोड़ों निरक्षर लोगों, निरक्षर स्त्रियों, सताए हुए अछूतों के लिए है तो सम्पर्क भाषा केवल हिंदी हो सकती है।&amp;quot; गाँधीजी जनता की बात जनता की भाषा में करने के पक्षधर थे। &lt;br /&gt;
*वर्ष 1936 ई. में गाँधीजी ने कहा, &amp;quot;अगर हिन्दुस्तान को सचमुच आगे बढ़ना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही बन सकती है, क्योंकि जो स्थान हिंदी को प्राप्त है, वह किसी और भाषा को नहीं मिल सकता है।&amp;quot; &lt;br /&gt;
*वर्ष 1937 ई. में देश के कुछ राज्यों में कांग्रेस मंत्रिमंडल गठित हुआ। इन राज्यों में हिंदी की पढ़ाई को प्रोत्साहित करने का संकल्प लिया गया। &lt;br /&gt;
*जैसे–जैसे स्वतंत्रता संग्राम तीव्रतम होता गया वैसे–वैसे हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का आंदोलन ज़ोर पकड़ता गया। 20वीं सदी के चौथे दशक तक हिंदी राष्ट्रभाषा के रूप में आम सहमति प्राप्त कर चुकी थी। वर्ष 1942 से 1945 का समय ऐसा था जब देश में स्वतंत्रता की लहर सबसे अधिक तीव्र थी, तब राष्ट्रभाषा से ओत–प्रोत जितनी रचनाएँ हिंदी में लिखी गईं उतनी शायद किसी और भाषा में इतने व्यापक रूप से कभी नहीं लिखी गई। राष्ट्रभाषा प्रचार के साथ राष्ट्रीयता के प्रबल हो जाने पर अंग्रेज़ों को भारत छोड़ना पड़ा।&lt;br /&gt;
{| &lt;br /&gt;
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|+ राष्ट्रभाषा आंदोलन (हिंदी आंदोलन) से सम्बन्धित धार्मिक–सामाजिक संस्थाएँ&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! नाम&lt;br /&gt;
! मुख्यालय&lt;br /&gt;
! स्थापना&lt;br /&gt;
! संस्थापक&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[ब्रह्मसमाज|ब्रह्म समाज]]&lt;br /&gt;
| [[कलकत्ता]]&lt;br /&gt;
| 1828 ई. &lt;br /&gt;
| [[राजा राममोहन राय]]&lt;br /&gt;
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| [[प्रार्थना समाज]]&lt;br /&gt;
| [[मुम्बई|बंबई]]&lt;br /&gt;
| [[1867]] ई.&lt;br /&gt;
| आत्मारंग पाण्डुरंग&lt;br /&gt;
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| [[आर्य समाज]]&lt;br /&gt;
| [[मुम्बई|बंबई]]&lt;br /&gt;
| [[1875]] ई. &lt;br /&gt;
| [[दयानन्द सरस्वती]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[थियोसॉफिकल सोसायटी]] &lt;br /&gt;
| अडयार, [[चेन्नई]]&lt;br /&gt;
| [[1882]] ई.&lt;br /&gt;
| कर्नल एच.एस.आल्काट एवं मैडम एच.पी.ब्लैवेत्स्की&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| सनातन धर्म सभा &lt;br /&gt;
| [[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
| [[1895]] ई.&lt;br /&gt;
| पं. दीनदयाल शर्मा&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[रामकृष्ण मिशन|(भारत धर्म महामंडल-1902 में नाम परिवर्तन) रामकृष्ण मिशन]] &lt;br /&gt;
| [[बेलूर]] &lt;br /&gt;
| [[1897]] ई.&lt;br /&gt;
| [[विवेकानंद]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot;&lt;br /&gt;
|+ राष्ट्रभाषा आंदोलन से सम्बन्धित साहित्यिक संस्थाएँ&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! नाम&lt;br /&gt;
! मुख्यालय&lt;br /&gt;
! स्थापना&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[नागरी प्रचारिणी सभा]]&lt;br /&gt;
| [[वाराणसी]]&lt;br /&gt;
| [[1893]] ई. (संस्थापक-त्रयी—[[श्यामसुन्दर दास|श्यामसुंदर दास]], रामनारायण मिश्र व [[ठाकुर शिव कुमार सिंह|शिवकुमार सिंह)]]&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी साहित्य सम्मेलन&lt;br /&gt;
| [[प्रयाग]]&lt;br /&gt;
| [[1910]] ई. (प्रथम सभापति– [[मदन मोहन मालवीय]])&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| गुजरात विद्यापीठ&lt;br /&gt;
| [[अहमदाबाद]]&lt;br /&gt;
| [[1920]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिन्दुस्तानी एकेडमी&lt;br /&gt;
| [[इलाहाबाद]]&lt;br /&gt;
| [[1927]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा (पूर्व नाम- हिंदी साहित्य सम्मेलन)&lt;br /&gt;
| [[चेन्नई]]&lt;br /&gt;
| [[1927]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी विद्यापीठ&lt;br /&gt;
| [[देवघर]]&lt;br /&gt;
| [[1929]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| राष्ट्रभाषा प्रचार समिति&lt;br /&gt;
| वर्धा&lt;br /&gt;
| [[1936]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा सभा&lt;br /&gt;
| [[पुणे]]&lt;br /&gt;
| [[1937]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| बंबई हिंदी विद्यापीठ&lt;br /&gt;
| [[बंबई]]&lt;br /&gt;
| [[1938]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति&lt;br /&gt;
| [[गुवाहाटी]]&lt;br /&gt;
| [[1938]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| [[बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना]]&lt;br /&gt;
| [[पटना]]&lt;br /&gt;
| [[1951]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| अखिल भारतीय हिंदी संस्था संघ&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
| [[1964]] ई.&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| नागरी लिपि परिषद&lt;br /&gt;
| [[नई दिल्ली]]&lt;br /&gt;
| [[1975]] ई.&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राष्ट्रभाषा आंदोलन से सम्बन्धित व्यक्तित्व==&lt;br /&gt;
====बंगाल====&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;25%&amp;quot; style=&amp;quot;margin:5px; float:right&amp;quot; &lt;br /&gt;
|+ हिंदी के लिए महापुरुष कथन&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती।&amp;lt;br /&amp;gt; '''[[चन्द्रबली पाण्डेय]]''' &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;है भव्य [[भारत]] ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। &lt;br /&gt;
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी ॥ &amp;lt;br /&amp;gt;'''[[मैथिलीशरण गुप्त]]'''&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| जिस भाषा में [[तुलसीदास]] जैसे कवि ने कविता की हो वह अवश्य ही पवित्र है और उसके सामने कोई भाषा नहीं ठहर सकती। &amp;lt;br /&amp;gt;'''[[महात्मा गाँधी]]'''   &lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी भारतवर्ष के हृदय-देश स्थित करोड़ों नर-नारियों के [[हृदय]] और मस्तिष्क को खुराक देने वाली भाषा है।  &amp;lt;br /&amp;gt;'''[[हज़ारीप्रसाद द्विवेदी]]'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी को [[गंगा]] नहीं बल्कि समुद्र बनना होगा।  &amp;lt;br /&amp;gt;'''[[विनोबा भावे]]'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी के विरोध का कोई भी आन्दोलन राष्ट्र की प्रगति में बाधक है। &amp;lt;br /&amp;gt;'''सुभाष चन्द्र बसु'''&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
| हिंदी को [[संस्कृत]] से विच्छिन्न करके देखने वाले उसकी अधिकांश महिमा से अपरिचित हैं।  &amp;lt;br /&amp;gt;'''[[हज़ारीप्रसाद द्विवेदी]]'''&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
[[राजा राममोहन राय]], [[केशवचंद्र सेन]], नवीन चंद्र राय, [[ईश्वर चंद्र विद्यासागर]], तरुणी चरण मिश्र, राजेन्द्र लाल मित्र, राज नारायण बसु, भूदेव मुखर्जी, बंकिम चंद्र चैटर्जी ('हिंदी भाषा की सहायता से भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों के मध्य में जो ऐक्यबंधन संस्थापन करने में समर्थ होंगे वही सच्चे भारतबंधु पुकारे जाने योग्य हैं।)', [[सुभाषचंद्र बोस]] ('अगर आज हिंदी भाषा मान ली गई है तो वह इसलिए नहीं कि वह किसी प्रान्त विशेष की भाषा है, बल्कि इसलिए कि वह अपनी सरलता, व्यापकता तथा क्षमता के कारण सारे देश की भाषा हो सकती है।') [[रवीन्द्रनाथ टैगोर]] ('यदि हम प्रत्येक भारतीय के नैसर्गिक अधिकारों के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं, तो हमें राष्ट्रभाषा के रूप में इस भाषा को स्वीकार करना चाहिए जो देश के सबसे बड़े भू–भाग में बोली जाती है और जिसे स्वीकार करने की सिफ़ारिश महात्मा गाँधीजी ने हम लोगों से की है।') रामानंद चटर्जी, [[सरोजिनी नायडू]], शारदा चरण मित्र, आचार्य क्षिति मोहन सेन ('हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने हेतु जो अनुष्ठान हुए हैं, उनको मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ।') आदि।&lt;br /&gt;
====महाराष्ट्र====&lt;br /&gt;
[[बाल गंगाधर तिलक]] ('यह आंदोलन [[उत्तर भारत]] में केवल एक सर्वमान्य [[लिपि]] के प्रचार के लिए नहीं है। यह तो उस आंदोलन का एक अंग है, जिसे मैं एक राष्ट्रीय आंदोलन कहूँगा और जिसका उद्देश्य समस्त भारतवर्ष के लिए एक राष्ट्रीय भाषा की स्थापना करना है, क्योंकि सबके लिए समान भाषा राष्ट्रीयता का महत्त्वपूर्ण अंग है। अतएव यदि आप किसी राष्ट्र के लोगों को एक–दूसरे के निकट लाना चाहें तो सबके लिए समान भाषा से बढ़कर सशक्त अन्य कोई बल नहीं है।'), एन. सी. केलकर, डॉ. भण्डारकर, वी. डी. सावरकर, [[गोपाल कृष्ण गोखले]], गाडगिल, [[काका कालेलकर]] आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====पंजाब====&lt;br /&gt;
[[लाला लाजपत राय]], श्रद्धाराम फिल्लौरी आदि।&lt;br /&gt;
====गुजरात====&lt;br /&gt;
[[दयानंद सरस्वती]], [[महात्मा गाँधी]], [[वल्लभभाई पटेल]], [[कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी]] ('हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना नहीं है, वह तो है ही।') आदि। &lt;br /&gt;
====दक्षिण भारत====&lt;br /&gt;
*[[सी. राजगोपालाचारी]], टी. विजयराघवाचार्य ('हिन्दुस्तान की सभी जीवित और प्रचलित भाषाओं में मुझे हिंदी ही राष्ट्रभाषा बनने के लिए सबसे अधिक योग्य दिखाई पड़ती है।'), &lt;br /&gt;
*सी. पी. रामास्वामी अय्यर ('देश के विभिन्न भागों के निवासियों के व्यवहार के लिए सर्वसुगम और व्यापक तथा एकता स्थापित करने के साधन के रूप में हिंदी का ज्ञान आवश्यक है।') &lt;br /&gt;
*अनन्त शयनम आयगर ('हिंदी ही उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाली समर्थ भाषा है।')&lt;br /&gt;
*[[एस. निजलिंगप्पा]] ('दक्षिण की भाषाओं ने संस्कृत से बहुत कुछ लेन–देन किया है, इसलिए उसी परम्परा में आई हुई हिंदी बड़ी सरलता से राष्ट्रभाषा होने के लायक़ है।') &lt;br /&gt;
*रंगनाथ रामचंद्र दिवाकर ('जो राष्ट्रप्रेमी है, उसे राष्ट्रभाषा प्रेमी होना चाहिए।')&lt;br /&gt;
*के. टी. भाष्यम, आर. वेंकटराम शास्त्री, एन. सुन्दरैया आदि।&lt;br /&gt;
अन्य—[[मदनमोहन मालवीय]], [[पुरुषोत्तम दास टंडन]] ('हिंदी का प्रहरी'), [[राजेन्द्र प्रसाद]], सेठ गोविन्द दास आदि।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====महात्मा गाँधी के विचार====&lt;br /&gt;
#'करोड़ों लोगों को [[अंग्रेज़ी]] की शिक्षा देना उन्हें ग़ुलामी में डालने जैसा है। [[लॉर्ड मैकाले|मैकाले]] ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच ग़ुलामी की बुनियाद थी'।&amp;lt;ref&amp;gt;हिन्द स्वराज, 1909&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
#&amp;quot;अंग्रेज़ी भाषा हमारे राष्ट्र के पाँव में बेड़ी बनकर पड़ी हुई है।&amp;quot; भारतीय विद्यार्थी को अंग्रेज़ी के मार्फ़त ज्ञान अर्जित करने पर कम से कम 6 वर्ष अधिक बर्बाद करने पड़ते हैं। यदि हमें एक विदेशी भाषा पर अधिकार पाने के लिए जीवन के अमूल्य वर्ष लगा देने पड़ें, तो फिर और क्या हो सकता है'। ([[1914]])&lt;br /&gt;
#'जिस भाषा में [[तुलसीदास]] जैसे कवि ने [[कविता]] की हो, वह अत्यन्त पवित्र है और उसके सामने कोई भाषा ठहर नहीं सकती'। ([[1916]])&lt;br /&gt;
#'हिंदी ही हिन्दुस्तान के शिक्षित समुदाय की सामान्य भाषा हो सकती है, यह बात निर्विवाद सिद्ध है। जिस स्थान को अंग्रेज़ी भाषा आजकल लेने का प्रयत्न कर रही है और जिसे लेना उसके लिए असम्भव है, वही स्थान हिंदी को मिलना चाहिए, क्योंकि हिंदी का उस पर पूर्ण अधिकार है। यह स्थान अंग्रेज़ी को नहीं मिल सकता, क्योंकि वह विदेशी भाषा है और हमारे लिए बड़ी कठिन है'। ([[1917]])&lt;br /&gt;
#'हिंदी भाषा वह भाषा है जिसको उत्तर में [[हिन्दू]] व [[मुसलमान]] बोलते हैं और जो [[नागरी लिपि|नागरी]] और फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है। यह हिंदी एकदम संस्कृतमयी नहीं है और न ही वह एकदम फ़ारसी शब्दों से लदी है'। ([[1918]])&lt;br /&gt;
#'हिंदी और उर्दू नदियाँ हैं और हिन्दुस्तानी सागर है। हिंदी और [[उर्दू]] दोनों को आपस में झगड़ना नहीं चाहिए। दोनों का मुक़ाबला तो अंग्रेज़ी से है'।&lt;br /&gt;
#'अंग्रेज़ों के व्यामोह से पिंड छुड़ाना स्वराज्य का एक अनिवार्य अंग है'। &lt;br /&gt;
#'मैं यदि तानाशाह होता (मेरा बस चलता तो) आज ही विदेशी भाषा में शिक्षा देना बंद कर देता, सारे अध्यापकों को स्वदेशी भाषाएँ अपनाने पर मजबूर कर देता। जो आनाकानी करते, उन्हें बर्ख़ास्त कर देता। मैं पाठ्य–पुस्तकों की तैयारी का इंतज़ार नहीं करूँगा, वे तो माध्यम के परिवर्तन के पीछे-पीछे अपने आप ही चली आएगी। यह एक ऐसी बुराई है, जिसका तुरन्त ही इलाज होना चाहिए'। &lt;br /&gt;
#'मेरी मातृभाषा में कितनी ही ख़ामियाँ क्यों न हों, मैं इससे इसी तरह से चिपटा रहूँगा, जिस तरह से बच्चा अपनी माँ की छाती से, जो मुझे जीवनदायी दूध दे सकती है। अगर अंग्रेज़ी उस जगह को हड़पना चाहती है, जिसकी वह हक़दार नहीं है, तो मैं उससे सख़्त नफ़रत करूँगा। वह कुछ लोगों के सीखने की वस्तु हो सकती है, लाखों–करोड़ों की नहीं'।&lt;br /&gt;
#'लिपियों में सबसे अव्वल दरजे की लिपि नागरी को ही मानता हूँ। मैं मानता हूँ कि नागरी और उर्दू लिपि के बीच अंत में जीत नागरी लिपि की ही होगी'।&lt;br /&gt;
==राजभाषा के रूप में विकास==&lt;br /&gt;
====राजभाषा क्या है====&lt;br /&gt;
{{Main|राजभाषा}}&lt;br /&gt;
#राजभाषा का शाब्दिक अर्थ है— राज–काज की भाषा। जो भाषा देश के राजकीय कार्यों के लिए प्रयुक्त होती है, वह 'राजभाषा' कहलाती हैं राजाओं–नवाबों के ज़माने में इसे 'दरबारी भाषा' कहा जाता था। &lt;br /&gt;
#राजभाषा सरकारी काम–काज चलाने की आवश्यकता की उपज होती है।&lt;br /&gt;
#स्वशासन आने के पश्चात् राजभाषा की आवश्कता होती है। प्रायः राष्ट्रभाषा ही स्वशासन आने के पश्चात् [[राजभाषा]] बन जाती है। भारत में भी राष्ट्रभाषा हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ।&lt;br /&gt;
#राजभाषा एक संवैधानिक शब्द है। हिंदी को [[14 सितंबर]] [[1949]] ई. को संवैधानिक रूप से राजभाषा घोषित किया गया। इसीलिए प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को '[[हिंदी दिवस]]' के रूप में मनाया जाता है।&lt;br /&gt;
#राजभाषा देश को अपने प्रशासनिक लक्ष्यों के द्वारा राजनीतिक–आर्थिक इकाई में जोड़ने का काम करती है। अर्थात् राजभाषा की प्राथमिक शर्त राजनीतिक प्रशासनिक एकता क़ायम करना है।&lt;br /&gt;
#राजभाषा का प्रयोग क्षेत्र सीमित होता है, यथा—वर्तमान समय में भारत सरकार के कार्यालयों एवं कुछ राज्यों- हिंदी क्षेत्र के राज्यों में राज–काज हिंदी में होता है। अन्य राज्य सरकारें अपनी–अपनी भाषा में कार्य करती हैं, हिंदी में नहीं; [[महाराष्ट्र]] [[मराठी भाषा|मराठी]] में, [[पंजाब]] [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]] में, [[गुजरात]] [[गुजराती भाषा|गुजराती]] में आदि। &lt;br /&gt;
#राजभाषा कोई भी भाषा हो सकती है, स्वभाषा या परभाषा। जैसे, मुग़ल शासक [[अकबर]] के समय से लेकर मैकाले के काल तक फ़ारसी राजभाषा तथा मैकाले के काल से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक अंग्रेज़ी राजभाषा थी जो कि विदेशी भाषा थी। जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया जो कि स्वभाषा है। &lt;br /&gt;
#राजभाषा का एक निश्चित मानक स्वरूप होता है, जिसके साथ छेड़छाड़ या प्रयोग नहीं किया जा सकता।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==आठवीं अनुसूची==&lt;br /&gt;
{{Main|आठवीं अनुसूची}}&lt;br /&gt;
आठवीं अनुसूची में संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 22 प्रादेशिक भाषाओं का उल्लेख है। इस अनुसूची में आरम्भ में 14 भाषाएँ ([[असमिया भाषा|असमिया]], [[बांग्ला भाषा|बांग्ला]], [[गुजराती भाषा|गुजराती]], हिंदी, [[कन्नड़ भाषा|कन्नड़]], [[कश्मीरी भाषा|कश्मीरी]], [[मलयालम भाषा|मलयालम]], [[मराठी भाषा|मराठी]], [[उड़िया भाषा|उड़िया]], [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]], [[संस्कृत भाषा|संस्कृत]], [[तमिल भाषा|तमिल]], [[तेलुगु भाषा|तेलुगु]], [[उर्दू भाषा|उर्दू]]) थीं। बाद में सिंधी को तत्पश्चात् कोंकणी, [[मणिपुरी भाषा|मणिपुरी]]&amp;lt;ref&amp;gt;21वाँ संशोधन, 1967 ई.&amp;lt;/ref&amp;gt;, [[नेपाली भाषा|नेपाली]] को शामिल किया गया &amp;lt;ref&amp;gt;71वाँ संशोधन, 1992 ई.&amp;lt;/ref&amp;gt;, जिससे इसकी संख्या 18 हो गई। तदुपरान्त [[बोडो भाषा|बोडो]], [[डोगरी भाषा|डोगरी]], [[मैथिली भाषा|मैथिली]], [[संथाली भाषा|संथाली]] को शामिल किया गया&amp;lt;ref&amp;gt;92वाँ संशोधन, 2003&amp;lt;/ref&amp;gt; और इस प्रकार इस अनुसूची में 22 भाषाएँ हो गईं।&lt;br /&gt;
==हिंदी की उपभाषाएँ एवं बोलियाँ==&lt;br /&gt;
{{Main|हिंदी की उपभाषाएँ एवं बोलियाँ}}&lt;br /&gt;
*'''हिंदी भाषी क्षेत्र/हिंदी क्षेत्र/हिंदी पट्टी'''— हिंदी पश्चिम में [[अम्बाला]] ([[हरियाणा]]) से लेकर पूर्व में [[पूर्णिया]] ([[बिहार]]) तक तथा उत्तर में [[बद्रीनाथ]]–[[केदारनाथ ज्योतिर्लिंग|केदारनाथ]] ([[उत्तराखंड]]) से लेकर दक्षिण में [[खंडवा]] ([[मध्य प्रदेश]]) तक बोली जाती है। इसे हिंदी भाषी क्षेत्र या हिंदी क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र के अंतर्गत 9 राज्य- [[उत्तर प्रदेश]], [[उत्तराखंड]], [[बिहार]], [[झारखंड]], [[मध्य प्रदेश]], [[छत्तीसगढ़]], [[राजस्थान]], [[हरियाणा]] व [[हिमाचल प्रदेश]] तथा 1 केन्द्र शासित प्रदेश ([[राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली]]) आते हैं। इस क्षेत्र में भारत की कुल जनसंख्या के 43% लोग रहते हैं। &lt;br /&gt;
====उपभाषाएँ व बोलियाँ====&lt;br /&gt;
*'''बोली'''— एक छोटे क्षेत्र में बोली जानेवाली भाषा बोली कहलाती है। बोली में साहित्य रचना नहीं होती है।&lt;br /&gt;
*'''उपभाषा'''— अगर किसी बोली में साहित्य रचना होने लगती है और क्षेत्र का विकास हो जाता है तो वह बोली न रहकर उपभाषा बन जाती है।&lt;br /&gt;
*'''भाषा'''— साहित्यकार जब उस भाषा को अपने साहित्य के द्वारा परिनिष्ठित सर्वमान्य रूप प्रदान कर देते हैं तथा उसका और क्षेत्र विस्तार हो जाता है तो वह भाषा कहलाने लगती है।&lt;br /&gt;
*एक भाषा के अंतर्गत कई उपभाषाएँ होती हैं तथा एक उपभाषा के अंतर्गत कई बोलियाँ होती हैं।&lt;br /&gt;
*सर्वप्रथम एक अंग्रेज़ प्रशासनिक अधिकारी जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने [[1927]] ई. में अपनी पुस्तक 'भारतीय भाषा सर्वेक्षण' में हिंदी का उपभाषाओं व बोलियों में वर्गीकरण प्रस्तुत किया। चटर्जी ने पहाड़ी भाषाओं को छोड़ दिया है। वह इन्हें भाषाएँ नहीं मानते। &lt;br /&gt;
*[[धीरेन्द्र वर्मा]] का वर्गीकरण मुख्यतः [[सुनीति कुमार चटर्जी]] के वर्गीकरण पर ही आधारित है। केवल उसमें कुछ ही संशोधन किए गए हैं। जैसे— उसमें पहाड़ी भाषाओं को शामिल किया गया है।&lt;br /&gt;
*इनके अलावा कई विद्वानों ने अपना वर्गीकरण प्रस्तुत किया है। आज इस बात को लेकर आम सहमति है कि हिंदी जिस भाषा–समूह का नाम है, उसमें 5 उपभाषाएँ और 17 बोलियाँ हैं। &lt;br /&gt;
हिंदी क्षेत्र की समस्त बोलियों को 5 वर्गों में बाँटा गया है। इन वर्गों को उपभाषा कहा जाता है। इन उपभाषाओं के अंतर्गत ही हिंदी की 17 बोलियाँ आती हैं।&amp;lt;ref&amp;gt;एक भाषा विद्वान के अनुसार, शुद्ध भाषा–वैज्ञानिक दृष्टि से हिंदी की दो मुख्य उपभाषाएँ हैं—पश्चिमी हिंदी व पूर्वी हिंदी।&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==प्रमुख खड़ी बोलियों का संक्षिप्त परिचय==&lt;br /&gt;
====कौरवी या खड़ी बोली====&lt;br /&gt;
{{main|कौरवी बोली}}&lt;br /&gt;
*'''मूल नाम'''— कौरवी&lt;br /&gt;
*'''साहित्यिक भाषा बनने के बाद पड़ा नाम'''— खड़ी बोली&lt;br /&gt;
*'''अन्य नाम'''— बोलचाल की हिन्दुस्तानी, सरहिंदी, वर्नाक्यूलर खड़ी बोली आदि।&lt;br /&gt;
*'''केन्द्र'''— [[कुरु महाजनपद|कुरु जनपद]] अर्थात् [[मेरठ]]– [[दिल्ली]] के आसपास का क्षेत्र। खड़ी बोली एक बड़े भूभाग में बोली जाती है। अपने ठेठ रूप में यह मेरठ, [[बिजनौर]], [[मुरादाबाद]], रामपुर, [[सहारनपुर]], [[देहरादून]] और [[अम्बाला]] ज़िलों में बोली जाती है। इनमें मेरठ की खड़ी बोली आदर्श और मानक मानी जाती है।&lt;br /&gt;
*'''बोलने वालों की संख्या'''— 1.5 से 2 करोड़&lt;br /&gt;
*'''साहित्य'''— मूल कौरवी में लोक–साहित्य उपलब्ध है, जिसमें गीत, गीत–नाटक, लोक कथा, गप्प, पहेली आदि हैं। &lt;br /&gt;
*'''विशेषता'''— आज की हिंदी मूलतः कौरवी पर ही आधारित है।&lt;br /&gt;
*'''नमूना'''— कोई बादसा था। साब उसके दो राण्याँ थीं। वो एक रोज़ अपनी रान्नी से केने लगा मेरे समान ओर कोइ बादसा है बी? तो बड़ी बोल्ले के राजा तुम समान ओर कोन होगा। छोटी से पुच्छा तो किह्या कि एक बिजाण सहर हे उसके किल्ले में जितनी तुम्हारी सारी हैसियत है उतनी एक ईंट लगी है। ओ इसने मेरी कुच बात नई रक्खी इसको तग्मार्ती (निर्वासित) करना चाइए। उस्कू तग्मार्ती कर दिया। ओर बड़ी कू सब राज का मालक कर दिया।&lt;br /&gt;
====ब्रजभाषा====&lt;br /&gt;
{{main|ब्रजभाषा}}&lt;br /&gt;
*'''केन्द्र'''— [[मथुरा]]&lt;br /&gt;
*'''बोलने वालों की संख्या'''— 3 करोड़&lt;br /&gt;
*देश के बाहर ताज्जुबेकिस्तान में ब्रजभाषा बोली जाती है, जिसे 'ताज्जुबेकी ब्रजभाषा' कहा जाता है।&lt;br /&gt;
*'''साहित्य'''— कृष्ण भक्ति काव्य की एकमात्र भाषा, लगभग सारा [[रीतिकाल|रीतिकाल साहित्य]]। साहित्यिक दृष्टि से हिंदी भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण बोली। साहित्यिक महत्त्व के कारण ही इसे ब्रजबोली नहीं ब्रजभाषा की संज्ञा दी जाती है। मध्यकाल में इस भाषा ने अखिल भारतीय विस्तार पाया। बंगाल में इस भाषा से बनी भाषा का नाम 'ब्रज बुलि' पड़ा। आधुनिक काल तक इस भाषा में साहित्य सृजन होता रहा। पर परिस्थितियाँ ऐसी बनी कि ब्रजभाषा साहित्यिक सिंहासन से उतार दी गई और उसका स्थान खड़ी बोली ने ले लिया। &lt;br /&gt;
*'''रचनाकार'''— भक्तिकालीन– [[सूरदास]], [[नन्ददास]] आदि।&lt;br /&gt;
'''रीतिकाल'''— [[बिहारी लाल|बिहारी]], [[मतिराम]], [[भूषण]], [[देव (कवि)|देव]] आदि। &lt;br /&gt;
'''आधुनिक कालीन'''— [[भारतेन्दु हरिश्चन्द्र]], जगन्नाथ दास 'रत्नाकर' आदि।&lt;br /&gt;
*'''नमूना'''— एक मथुरा जी के चौबे हे (थे), जो डिल्ली सैहर कौ चलै। गाड़ी वारे बनिया से चौबेजी की भेंट है गई। तो वे चौबे बोले, अर भइया सेठ, कहाँ जायगो। वौ बोलो, महराजा डिल्ली जाऊँगो। तो चौबे बोले, भइया हमऊँ बैठाल्लेय। बनिया बोलो, चार रूपा चलिंगे भाड़े के। चौबे बोले, अच्छा भइया चारी दिंगे।&lt;br /&gt;
====अवधी====&lt;br /&gt;
{{main|अवधी भाषा}}&lt;br /&gt;
*'''केन्द्र'''— [[अयोध्या]]/अवध&lt;br /&gt;
*'''बोलने वालों की संख्या'''— 2 करोड़&lt;br /&gt;
*देश के बाहर फीजी में अवधी बोलने वाले लोग हैं।&lt;br /&gt;
*'''साहित्य'''— सूफ़ी काव्य, रामभक्ति काव्य। अवधी में प्रबन्ध काव्य परम्परा विशेषतः विकसित हुई।&lt;br /&gt;
*'''रचनाकार'''— सूफ़ी कवि— मुल्ला दाउद ('चंदायन'), [[मलिक मुहम्मद जायसी|जायसी]] ('[[पद्मावत -जायसी|पद्मावत]]'), क़ुत्बन ('मृगावती'), उसमान ('चित्रावली'), रामभक्त कवि— [[तुलसीदास]] ('[[रामचरितमानस]]')।&lt;br /&gt;
*'''नमूना'''— एक गाँव मा एक अहिर रहा। ऊ बड़ा भोंग रहा। सबेरे जब सोय के उठै तो पहले अपने महतारी का चार टन्नी धमकाय दिये तब कौनो काम करत रहा। बेचारी बहुत पुरनिया रही नाहीं तौ का मज़ाल रहा केऊ देहिं पै तिरिन छुआय देत।&lt;br /&gt;
====भोजपुरी====&lt;br /&gt;
{{main|भोजपुरी भाषा}}&lt;br /&gt;
*'''केन्द्र'''— [[भोजपुर मध्य प्रदेश|भोजपुर]]&lt;br /&gt;
*'''बोलने वालों की संख्या'''— 3.5 करोड़ (बोलने वालों की संख्या की दृष्टि से हिंदी प्रदेश की बोलियों में सबसे अधिक बोली जाने वाली बोली)।&lt;br /&gt;
*इस बोली का प्रसार भारत के बाहर [[सूरीनामी हिंदी|सूरीनाम]], [[फिजी हिन्दी|फिजी]], [[मॉरिशसी हिन्दी|मॉरिशस]], गयाना, त्रिनिडाड में है। इस दृष्टि से भोजपुरी अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की बोली है।&lt;br /&gt;
*'''साहित्य'''— भोजपुरी में लिखित साहित्य नहीं के बराबर है। मूलतः भोजपुरी भाषी साहित्यकार मध्यकाल में ब्रजभाषा व अवधी में तथा आधुनिक काल में हिंदी में लेखन करते रहे हैं। लेकिन अब स्थिति में परिवर्तन आ रहा है। &lt;br /&gt;
*'''रचनाकार'''— [[भिखारी ठाकुर]] (उपनाम— 'भोजपुरी का शेक्सपीयर', 'भोजपुरी का भारतेन्दु')। &lt;br /&gt;
*'''सिनेमा'''— [[सिनेमा|सिनेमा जगत]] में भोजपुरी ही हिंदी की वह बोली है, जिसमें सबसे अधिक फ़िल्में बनती हैं। &lt;br /&gt;
*'''नमूना'''— काहे दस–दस पनरह–पनरह हज़ार के भीड़ होला ई नाटक देखें ख़ातिर। मालूम होतआ कि एही नाटक में पबलिक के रस आवेला।&lt;br /&gt;
====मैथिली====&lt;br /&gt;
{{main|मैथिली भाषा}}&lt;br /&gt;
*'''लिपि'''— तिरहुता व देवनागरी&lt;br /&gt;
*'''केन्द्र'''— मिथिला या विदेह या तिरहुत&lt;br /&gt;
*'''बोलने वालों की संख्या'''— 1.5 करोड़&lt;br /&gt;
*'''साहित्य'''— साहित्य की दृष्टि से [[मैथिली भाषा|मैथिली]] बहुत सम्पन्न है।&lt;br /&gt;
*'''रचनाकार'''— [[विद्यापति]] (पदावली)— यदि ब्रजभाषा को [[सूरदास]] ने, अवधी को [[तुलसीदास]] ने चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया तो मैथिली को [[विद्यापति]] ने, हरिमोहन झा (उपन्यास— कन्यादान, द्विरागमन, कहानी संग्रह—एकादशी, 'खट्टर काकाक तरंग'), [[नागार्जुन]] (मैथिली में 'यात्री' नाम से लेखन; उपन्यास— पारो, कविता संग्रह— 'कविक स्वप्न', 'पत्रहीन नग्न गाछ'), राजकमल चौधरी ('स्वरगंघा') आदि।&lt;br /&gt;
*'''आठवीं अनुसूची में स्थान'''— 92वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, [[2003]] के द्वारा संविधान की 8वीं अनुसूची में 4 भाषाओं को स्थान दिया गया। मैथिली हिंदी क्षेत्र की बोलियों में से 8वीं अनुसूची में स्थान पाने वाली एकमात्र बोली है। &lt;br /&gt;
*'''नमूना'''— [[पटना]] किए एलऽह? पटना एलिअइ नोकरी करैले।&lt;br /&gt;
भेटलह नोकरी? नाकरी कत्तौ नइ भेटल।&lt;br /&gt;
गाँ में काज नइ भेटइ छलऽह? भेटै छलै, रूपैयाबला नइ, अऽनबला।&lt;br /&gt;
तखन एलऽ किऐ? रिनियाँ तङ केलकइ, तै।&lt;br /&gt;
कत्ते रीन छऽह? चाइर बीस।&lt;br /&gt;
सूद कत्ते लइ छऽह? दू पाइ महिनबारी।&lt;br /&gt;
==देवनागरी लिपि==&lt;br /&gt;
{{Main|देवनागरी लिपि}}&lt;br /&gt;
[[भारत]] में सर्वाधिक प्रचलित लिपि जिसमें [[संस्कृत]], हिंदी और [[मराठी भाषा|मराठी]] भाषाएँ लिखी जाती हैं। इस शब्द का सबसे पहला उल्लेख 453 ई. में जैन ग्रंथों में मिलता है। 'नागरी' नाम के संबंध में मतैक्य नहीं है। कुछ लोग इसका कारण नगरों में प्रयोग को बताते हैं। यह अपने आरंभिक रूप में [[ब्राह्मी लिपि]] के नाम से जानी जाती थी। इसका वर्तमान रूप नवी-दसवीं शताब्दी से मिलने लगता है। भाषा विज्ञान की शब्दावली में यह 'अक्षरात्मक' लिपि कहलाती है। यह विश्व में प्रचलित सभी लिपियों की अपेक्षा अधिक पूर्णतर है। इसके लिखित और उच्चरित रूप में कोई अंतर नहीं पड़ता है। प्रत्येक ध्वनि संकेत यथावत लिखा जाता है। &lt;br /&gt;
*देवनागरी एक लिपि है जिसमें अनेक भारतीय भाषाएँ तथा कुछ विदेशी भाषाएँ लिखीं जाती हैं। [[संस्कृत]], [[पालि भाषा|पालि]], हिंदी, [[मराठी भाषा|मराठी]], [[कोंकणी भाषा|कोंकणी]], [[सिन्धी भाषा|सिन्धी]], [[कश्मीरी भाषा|कश्मीरी]], [[नेपाली भाषा|नेपाली]], गढ़वाली, [[बोडो भाषा|बोडो]], अंगिका, मगही, [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]], [[मैथिली भाषा|मैथिली]], [[संथाली भाषा|संथाली]] आदि भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं। इसे नागरी लिपि भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त कुछ स्थितियों में [[गुजराती भाषा|गुजराती]], [[पंजाबी भाषा|पंजाबी]], बिष्णुपुरिया मणिपुरी, रोमानी और [[उर्दू]] भाषाएं भी देवनागरी में लिखी जाती हैं।&lt;br /&gt;
*इसमें कुल '''52 अक्षर हैं, जिसमें 14 [[स्वर (व्याकरण)|स्वर]] और 38 [[व्यंजन (व्याकरण)|व्यंजन]]''' हैं। अक्षरों की क्रम व्यवस्था (विन्यास) भी बहुत ही वैज्ञानिक है। स्वर-व्यंजन, कोमल-कठोर, अल्पप्राण-महाप्राण, अनुनासिक्य-अन्तस्थ-ऊष्म इत्यादि वर्गीकरण भी वैज्ञानिक हैं। एक मत के अनुसार देवनगर ([[काशी]]) में प्रचलन के कारण इसका नाम देवनागरी पड़ा।&amp;lt;ref name=&amp;quot;dev&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://vimisahitya.wordpress.com/2008/09/02/dewanaagaree_parichay/ |title=हिंदी साहित्य |accessmonthday=28 सितंबर |accessyear=2010 |last= |first= |authorlink= |format=एच.टी.एम.एल |publisher= |language=[[हिंदी]] }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==नागरी लिपि==&lt;br /&gt;
{{main|नागरी लिपि}}&lt;br /&gt;
*'''पश्चिमी शाखा'''- देवनागरी, राजस्थानी, गुजराती, महाजनी, कैथी।&lt;br /&gt;
*'''पूर्वी शाखा'''- [[बांग्ला लिपि]], असमी, उड़िया।&lt;br /&gt;
==हिंदी व्याकरण==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|व्याकरण (व्यावहारिक)}}&lt;br /&gt;
जिस विद्या से किसी [[भाषा]] के बोलने तथा लिखने के नियमों की व्यवस्थित पद्धति का ज्ञान होता है, उसे 'व्याकरण' कहते हैं।&lt;br /&gt;
====वर्णमाला====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वर्णमाला (व्याकरण)}}&lt;br /&gt;
[[हिंदी भाषा]] में जितने वर्णों का प्रयोग होता है, उन वर्णों के समूह को 'वर्णमाला' कहा जाता है।&lt;br /&gt;
====हिंदी वर्णमाला====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|हिंदी वर्णमाला (व्याकरण)}}&lt;br /&gt;
हिंदी भाषा में जितने वर्ण प्रयुक्त होते हैं, उन वर्णों के समूह को 'हिंदी-वर्णमाला' कहा जाता है।&lt;br /&gt;
====शब्द====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|शब्द (व्याकरण)}}&lt;br /&gt;
*वर्ण-समूह या ध्वनि-समूह को 'शब्द' कहते हैं। &lt;br /&gt;
*शब्द दो प्रकार के होते हैं- [[सार्थक शब्द (व्याकरण)|सार्थक]] और [[निरर्थक शब्द (व्याकरण)|निरर्थक]]।&lt;br /&gt;
====संज्ञा====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|संज्ञा (व्याकरण)}}&lt;br /&gt;
*यह सार्थक वर्ण-समूह शब्द कहलाता है।&lt;br /&gt;
*जब इसका प्रयोग वाक्य में होता है तो वह व्याकरण के नियमों में बँध जाता है और इसका रूप भी बदल जाता है।&lt;br /&gt;
====सर्वनाम====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|सर्वनाम}} &lt;br /&gt;
*संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होने वाले शब्द को सर्वनाम कहते हैं। &lt;br /&gt;
*संज्ञा की पुनरुक्ति न करने के लिए सर्वनाम का प्रयोग किया जाता है।&lt;br /&gt;
====विशेषण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|विशेषण}} &lt;br /&gt;
संज्ञा अथवा सर्वनाम शब्दों की विशेषता (गुण, दोष, संख्या, परिमाण आदि) बताने वाले शब्द ‘विशेषण’ कहलाते हैं। &lt;br /&gt;
====क्रिया====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|क्रिया}}&lt;br /&gt;
*जिन शब्दों से किसी कार्य या व्यापार के होने या किए जाने का बोध होता है उन्हें क्रिया कहते हैं।&lt;br /&gt;
*जैसे- उठना, बैठना, सोना जागना।  &lt;br /&gt;
====क्रियाविशेषण====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|क्रियाविशेषण}}&lt;br /&gt;
जिन अविकारी शब्दों से क्रिया की विशेषता का बोध होता है वे क्रियाविशेषण कहलाते हैं।&lt;br /&gt;
====कारक====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|कारक}}&lt;br /&gt;
कारक शब्द का अर्थ है क्रिया को करने वाला अर्थात क्रिया को पूरी करने में किसी न किसी भूमिका को निभाने वाला। &lt;br /&gt;
====काल====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|काल}}&lt;br /&gt;
क्रिया के व्यापार का समय सूचित करने वाले क्रिया रूप को 'काल' कहते हैं।&lt;br /&gt;
====संधि====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|संधि}}&lt;br /&gt;
*दो समीपवर्ती वर्णों के मेल से जो विकार होता है, वह संधि कहलाता है।&lt;br /&gt;
*जैसे- देव+ आलय= देवालय, मन:+ योग= मनोयोग &lt;br /&gt;
====उपवाक्य====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|उपवाक्य}}&lt;br /&gt;
*यदि किसी एक वाक्य में एक से अधिक समापिका क्रियाएँ होती हैं तो वह वाक्य उपवाक्यों में बँट जाता है। &lt;br /&gt;
*उसमें जितनी भी समापिका क्रियाएँ होती हैं उतने ही उपवाक्य होते हैं।&lt;br /&gt;
====वचन====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वचन (हिंदी)}}&lt;br /&gt;
*विकारी शब्दों के जिस रूप से संख्या का बोध होता है, उसे वचन कहते हैं। &lt;br /&gt;
*वैसे तो शब्दों का संज्ञा भेद विविध प्रकार का होता है, परन्तु व्याकरण में उसके एक और अनेक भेद प्रचलित हैं।&lt;br /&gt;
====वर्तनी====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|वर्तनी (हिंदी)}}&lt;br /&gt;
*लिखने की रीति को वर्तनी या अक्षरी कहते हैं। &lt;br /&gt;
*इसे हिज्जे भी कहा जाता है। &lt;br /&gt;
====उपसर्ग====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|उपसर्ग}}&lt;br /&gt;
*वे शब्दांश जो यौगिक शब्द बनाते समय पहले लगते हैं, उपसर्ग कहलाते हैं।&lt;br /&gt;
*जैसे- प्रति= प्रतिनिधि, प्रतिकूल, प्रतिष्ठा, प्रत्यक्ष।&lt;br /&gt;
====रस====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|रस}}&lt;br /&gt;
*रस का शाब्दिक अर्थ है 'आनन्द'। काव्य को पढ़ने या सुनने से जिस आनन्द की अनुभूति होती है, उसे रस कहा जाता है। &lt;br /&gt;
*रस को 'काव्य की आत्मा' या 'प्राण [[तत्व]]' माना जाता है। &lt;br /&gt;
====अलंकार====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|अलंकार}}&lt;br /&gt;
*अलंकार का शाब्दिक अर्थ है, 'आभूषण'। जिस प्रकार सुवर्ण आदि के आभूषणों से शरीर की शोभा बढ़ती है उसी प्रकार काव्य अलंकारों से काव्य की।&lt;br /&gt;
*[[हिंदी]] के कवि [[केशवदास]] एक अलंकारवादी हैं। &lt;br /&gt;
====छन्द====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|छन्द}}&lt;br /&gt;
*वर्णों या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा हो, तो उसे छंद कहते हैं। &lt;br /&gt;
*छंद का सर्वप्रथम उल्लेख '[[ऋग्वेद]]' में मिलता है।&lt;br /&gt;
==हिंदी का मानकीकरण==&lt;br /&gt;
{{Main|हिंदी का मानकीकरण}}&lt;br /&gt;
====मानक भाषा====&lt;br /&gt;
*मानक का अभिप्राय है—आदर्श, श्रेष्ठ अथवा परिनिष्ठित। भाषा का जो रूप उस भाषा के प्रयोक्ताओं के अलावा अन्य भाषा–भाषियों के लिए आदर्श होता है, जिसके माध्यम से वे उस भाषा को सीखते हैं, जिस भाषा–रूप का व्यवहार पत्राचार, शिक्षा, सरकारी काम–काज एवं सामाजिक–सांस्कृतिक आदान–प्रदान में समान स्तर पर होता है, वह उस भाषा का मानक रूप कहलाता है। &lt;br /&gt;
*मानक भाषा किसी देश अथवा राज्य की वह प्रतिनिधि तथा आदर्श भाषा होती है, जिसका प्रयोग वहाँ के शिक्षित वर्ग के द्वारा अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, व्यापारिक व वैज्ञानिक तथा प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है। &lt;br /&gt;
*किसी भाषा का बोलचाल के स्तर से ऊपर उठकर मानक रूप ग्रहण कर लेना, उसका 'मानकीकरण' कहलाता है।&lt;br /&gt;
==अखिल भारतीयता का इतिहास==&lt;br /&gt;
{{मुख्य|हिंदी की अखिल भारतीयता का इतिहास}}&lt;br /&gt;
हिंदी 'शब्द' का प्रयोग [[हरियाणा]] से लेकर [[बिहार]] तक प्रचलित बाँगरु, [[कौरवी बोली|कौरवी]], [[ब्रजभाषा]], कनौजी, [[राजस्थानी भाषा|राजस्थानी]], [[अवधी भाषा|अवधी]], [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]], [[मैथिली भाषा|मैथिली]] आदि कई भाषाओं के लिए किया जाता है, किंतु वर्तमान शताब्दी में व्यवहार की दृष्टि से इसका अर्थ खड़ीबोली हो गया है। हिंदी के रूप में यही खड़ीबोली भारतीय संविधान द्वारा स्वीकृत संपर्क भाषा है तथा हिंदी भाषी राज्यों में राजभाषा है। भौगोलिक दृष्टि से विचार करने पर यह [[दिल्ली]], हरियाणा तथा [[उत्तर प्रदेश]] के [[मुरादाबाद]], [[बिजनौर]], [[मेरठ]] आदि थोड़े से ज़िलों तक सीमित भाषा है, जो शताब्दियों तक ब्रजभाषा और अवधी की तुलना में उपेक्षितप्राय रही है और ऐतिहासिक कारणों के प्रसाद से ही यह न केवल आधुनिक युग में [[भारत]] से बाहर के कई देशों में फैल गई है, वरन सुदूर अतीत से ही अंतर्राष्ट्रीय यात्रा करती रही है।&lt;br /&gt;
==अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय==&lt;br /&gt;
{{Main|महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय}}&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mahatma Gandhi International Hindi University.jpg|[[महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय]], वर्धा |thumb|250px]]&lt;br /&gt;
महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, [[महाराष्ट्र]] राज्य के [[वर्धा ज़िला|वर्धा ज़िले]] में स्थित है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना भारत सरकार ने [[संसद]] द्वारा पारित एक अधिनियम द्वारा की है। इस अधिनियम को [[भारत]] के राजपत्र में [[8 जनवरी]] सन् [[1997]] को प्रकाशित किया गया। यह अधिनियम शिक्षा और अनुसंधान के माध्यम से [[हिंदी भाषा]] और [[साहित्य]] का संवर्धन एवं विकास करने हेतु एक शैक्षणिक विश्वविद्यालय की स्थापना करता है, जिससे हिंदी बेहतर कार्यदक्षता प्राप्त कर प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय भाषा बने। साथ ही विभिन्न ज्ञानानुशासनों में मौलिक सृजन हिंदी भाषा के माध्यम से हो सके तथा विश्व की अन्य भाषाओं में विद्यमान ज्ञान संपदा का अनुवाद हिंदी भाषा में किया जा सके।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.hindivishwa.org/index_s.php |title=महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय |accessmonthday=04 जनवरी |accessyear=2011 |last= |first= |authorlink= |format=पी.एच.पी |publisher=ज्ञान शांति मैत्री |language=[[हिंदी]]}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==समाचार==&lt;br /&gt;
====हिंदी सुधारने के लिए अंग्रेज़ी शब्दों की छूट====&lt;br /&gt;
; 13 अक्टूबर, 2011 गुरुवार&lt;br /&gt;
आज़ादी के 64 साल बाद भी सरकार हिंदी को [[राजभाषा]] से राष्ट्रभाषा नहीं बना पाई है, मगर अब उसने सरकारी दफ़्तरों में इस्तेमाल होने वाली हिंदी को बदलने के प्रयास अवश्य तेज कर दिए हैं। दफ़्तरों में इस्तेमाल होने वाले हिंदी के कठिन शब्दों की जगह [[उर्दू]], [[फ़ारसी भाषा|फ़ारसी]], सामान्य हिंदी और [[अंग्रेज़ी]] के शब्दों का उपयोग करने के निर्देश दिए हैं। गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग की सचिव वीणा उपाध्याय ने इस सिलसिले में सभी मंत्रालयों और विभागों को दिशा-निर्देश जारी किए हैं। निर्देशों के मुताबिक, कामकाज के दौरान साहित्यिक हिंदी का उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। किसी भी शब्द का हिंदी में उपयोग बतौर अनुवाद न हो। इससे आम लोगों को समस्या होती है। एक हद के बाद यही समस्या किसी भी व्यक्ति को मानसिक तौर पर भाषा के ख़िलाफ़ खड़ा करती है। गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग की सचिव वीणा उपाध्याय ने सभी मंत्रालयों और विभागों को जारी किए दिशा-निर्देश मंत्रालय के '''इस आदेश के बाद पुलिस, कोर्ट, ब्यूरो, रेलवे स्टेशन, बटन, कोट, पैंट, सिग्नल, लिफ़्ट, फीस, क़ानून, अदालत, मुक़दमा, दफ़्तर, एफ़आईआर जैसे अंग्रेज़ी, फ़ारसी और तुर्की भाषा के शब्दों का चलन जारी रहेगा।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====समाचार को विभिन्न स्रोतों पर पढ़ें==== &lt;br /&gt;
*[http://www.bhaskar.com/article/NAT-in-government-offices-will-now-hinglish-2498483.html दैनिक भास्कर डॉट कॉम]&lt;br /&gt;
*'हिन्दुस्तान' दैनिक समाचार पत्र, दिनांक 13 अक्टूबर, 2011 पृष्ठ संख्या- 14  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====दुनिया के 80 करोड़ लोग जानते हैं हिंदी====&lt;br /&gt;
; 20 सितम्बर, 2012 गुरुवार&lt;br /&gt;
[[भारत]] की राजभाषा हिंदी दुनिया में दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। बहुभाषी भारत के हिंदी भाषी राज्यों की आबादी 46 करोड़ से अधिक है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की 1.2 अरब आबादी में से 41.03 फीसदी की मातृभाषा हिंदी है। हिंदी को दूसरी भाषा के तौर पर इस्तेमाल करने वाले अन्य भारतीयों को मिला लिया जाए तो देश के लगभग 75 प्रतिशत लोग हिंदी बोल सकते हैं। भारत के इन 75 प्रतिशत हिंदी भाषियों सहित पूरी दुनिया में तकरीबन 80 करोड़ लोग ऐसे हैं जो इसे बोल या समझ सकते हैं। भारत के अलावा इसे [[नेपाल]], मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम, यूगांडा, [[दक्षिण अफ्रीका]], कैरिबियन देशों, ट्रिनिडाड एवं टोबेगो और कनाडा आदि में बोलने वालों की अच्छी ख़ासी संख्या है। इसके आलावा [[इंग्लैंड]], [[अमेरिका]], मध्य एशिया में भी इसे बोलने और समझने वाले अच्छे ख़ासे लोग हैं।&lt;br /&gt;
====समाचार को विभिन्न स्रोतों पर पढ़ें==== &lt;br /&gt;
*[http://www.livehindustan.com/news/desh/national/article1-story-39-39-264287.html लाइव हिन्दुस्तान]&lt;br /&gt;
*[http://hindi.webdunia.com/nri-specialnews/%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B8%E0%A4%AC%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%95-%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-1120920028_1.htm वेबदुनिया हिन्दी]&lt;br /&gt;
====ऑस्ट्रेलिया के स्कूलों में पढ़ाई जाएगी हिंदी====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Julia-Gillard.jpg|thumb|ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड]]&lt;br /&gt;
; 29 अक्टूबर, 2012 सोमवार &lt;br /&gt;
[[ऑस्ट्रेलिया]] के स्कूलों में हिंदी और अन्य प्रमुख एशियाई भाषाएं पढ़ाई जाएंगी। [[भारत]] और अन्य एशियाई देशों से संबंध मजबूत बनाने के लिए यह रणनीति तय की गई है। ऑस्ट्रेलिया की प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने नई नीति का पहला खाका रखते हुए कहा, &amp;quot;जिस समय ऑस्ट्रेलिया बदल रहा था उसी समय एशिया में भी बदलाव हो रहा था, इस सदी में चाहे जो मिले, यह निश्चित ही [[एशिया]] को नेतृत्व में फिर से लाएगा। एशिया के उत्थान को कोई नहीं रोक सकता। यह तेज हो रहा है।&amp;quot; प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड ने एशियन सेंचुरी व्हाइट पेपर जारी करते हुए इसकी घोषणा की। गिलार्ड ने कहा कि शुरुआत स्कूलों, प्रशिक्षण केंद्रों से करना होगी। हरेक स्कूल एशिया के किसी स्कूल के साथ जुड़ेगा और एक प्रमुख एशियाई भाषा हिंदी, मंदारिन, जापानी या इंडोनेशियन सीखने की पहल करेगा। उन्होंने कहा कि बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने की कोशिश करना होगी। अब पहले जैसा नहीं चलेगा। गिलार्ड ने कहा कि इस सदी में एशिया के बड़ी ताकत बनने की संभावना है। विश्व में यह क्षेत्र नेतृत्व की भूमिका में होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====समाचार को विभिन्न स्रोतों पर पढ़ें==== &lt;br /&gt;
*[http://www.bhaskar.com/article/INT-hindi-to-be-taught-in-australian-schools-3983411-NOR.html दैनिक भास्कर]&lt;br /&gt;
*[http://dainiktribuneonline.com/2012/10/%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%AA%E0%A4%A2%E0%A4%BC%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F-%E0%A4%91%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F-2/ दैनिक ट्रिब्यून]&lt;br /&gt;
*[http://www.dw.de/%E0%A4%91%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%88-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%95%E0%A5%82%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%82-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%97%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%80/a-16338765 डी. डब्ल्यू.]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=|माध्यमिक=माध्यमिक3|पूर्णता=|शोध=}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
{{Refbox}}{{top}}&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.pravakta.com/indian-aryan-languages-of-the-indo-european-family भारोपीय परिवार की भारतीय भाषाएँ]&lt;br /&gt;
*[http://www.pravakta.com/reflections-in-relation-to-hindi-language हिन्दी भाषा के सम्बंध में कुछ विचार]&lt;br /&gt;
*[http://www.rachanakar.org/2010/03/blog-post_3350.html प्रोफेसर महावीर सरन जैन - हिन्दी भाषा-क्षेत्र एवं हिन्दी के क्षेत्रगत रूप]&lt;br /&gt;
*[http://www.scribd.com/doc/22142436/Hindi-Urdu हिन्दी-उर्दू का अद्वैत]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{हिन्दी भाषा}}{{भाषा और लिपि}}{{व्याकरण}}&lt;br /&gt;
[[Category:भाषा और लिपि]][[Category:भाषा कोश]][[Category:साहित्य_कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दी भाषा]]&lt;br /&gt;
[[Category:जनगणना अद्यतन]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=3_%E0%A4%9C%E0%A5%82%E0%A4%A8&amp;diff=530781</id>
		<title>3 जून</title>
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		<updated>2015-06-03T02:24:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: /* 3 जून की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{कैलंडर}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[ग्रेगोरी कैलंडर]] के अनुसार 3 जून [[वर्ष]] का 154 वाँ ([[लीप वर्ष]] में यह 155 वाँ) दिन है। साल में अभी और 211 दिन शेष हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==3 जून की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ==&lt;br /&gt;
* [[1918]] -  गांधी जी की अध्यक्षता [[इन्दौर]] में 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन' आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के द्वारा [[हिन्दी]] [[राजभाषा]] मानी गयी। &lt;br /&gt;
* [[1994]] - भारत सहायता क्लब का नया नाम 'भारत सहायता मंच' किया गया। &lt;br /&gt;
* [[1999]] - हावरक्राफ़्ट विमानों के अविष्कारक क्रिसटोफ़र काकरैल का निधन, यूगोस्लाविया द्वारा कोसोवो शांति योजना को मंजूरी, मिस्र के राष्ट्रपति हुश्नी मोबारक लगातार चौथी बार राष्ट्रपति चुने गये। &lt;br /&gt;
* [[2004]] - केन फ़ोर्ड नासा के अंतरिक्ष खोज पैनल के नेतृत्वकर्ता बने। &lt;br /&gt;
* [[2005]] - फ़्रांस ने सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी का समर्थन दुहराया। &lt;br /&gt;
* [[2008]] - &lt;br /&gt;
**तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष [[के. चन्द्रशेखर राव]] ने उपचुनाव में क़रारी हार के बाद अपने पर से इस्तीफ़ा दिया। केन्द्र सरकार ने सीमेंट निर्यात पर रिफंड को दी गई मंज़ूरी वापस ली।&lt;br /&gt;
**जापानी प्रयोगशाला के साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का डिस्कवरी यान [[अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन]] पहुँचा। वैज्ञानिकों को सौर परिवार के बाहर अब तक का सबसे छोटा ग्रह मिला।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==3 जून को जन्मे व्यक्ति==&lt;br /&gt;
* 1844 - [[बालकृष्ण भट्ट]] - आधुनिक [[हिन्दी साहित्य]] के शीर्ष निर्माताओं में से एक।&lt;br /&gt;
* [[1895]] - [[पणीक्कर, के. एम.]] - [[मैसूर]] ([[कर्नाटक]]) के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ, राजनीयक और विद्वान।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==3 जून को हुए निधन==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==3 जून के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
{{कैलंडर बाहरी कड़ियाँ}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{कैलंडर2}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति सत्याग्रह -महात्मा गाँधी</title>
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		<updated>2015-06-03T02:22:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: '{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय |चित्र=Mahatma_prerak.png |चित्र का...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Mahatma_prerak.png&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
|विवरण= [[महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=भाषा&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[हिंदी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=देश&lt;br /&gt;
|पाठ 2=[[भारत]]&lt;br /&gt;
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|पाठ 7=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 8=मूल शीर्षक&lt;br /&gt;
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|शीर्षक 9=उप शीर्षक&lt;br /&gt;
|पाठ 9=[[महात्मा गाँधी के प्रेरक प्रसंग]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 10=संकलनकर्ता&lt;br /&gt;
|पाठ 10=[[अशोक कुमार शुक्ला]]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem style=&amp;quot;background:#fbf8df; padding:15px; font-size:14px; border:1px solid #003333; border-radius:5px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[महात्मा गाँधी|गांधी जी]] ने भारत के स्वतंत्रता के लिये सिर्फ जन जागरण अभियान ही नहीं चलाया अपितु [[राष्ट्रभाषा]] के रूप में [[हिन्दी]] को स्थापित करने में भी अग्रणी भूमिका निभायी थी। भारत आने के बाद [[1917]] में जब उन्होंने अपनी पहली सत्याग्रह यात्रा चम्पारण से आरंभ की तो इसी दौरान [[3 जून]] को उन्होंने ऐक परिपत्र निकाला था जिसमें हिन्दी की महत्ता के संदर्भ में लिखा था &lt;br /&gt;
''हिन्दी जल्दी से जल्दी अंग्रेजी का स्थान लेले, यह ईश्वरी संकेत जान पडता है। हिन्दी शिक्षित वर्गों के बीच समान माध्यम ही नहीं बल्कि जनसाधारण के हृदय तक पहुंचने का द्वार बन सकती है । इस दिशा में कोई देसी भाषा इसकी समानता नहीं कर सकती । अंगेजी तो कदापि नहीं कर सकती।''&lt;br /&gt;
गांधी जी हिन्दी का मौखिक प्रचार करके ही, राष्ट्रभाषा के रूप में उसकी महत्ता और प्रतिष्ठा बताकर ही चुप नहीं रहे उन्होंने [[1918]] के ठेठ अंगेजी वर्चस्व के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी का प्रचार करने की व्यवस्था भी की।&lt;br /&gt;
इसी वर्ष [[इन्दौर]] में गांधी जी की अध्यक्षता में हिन्दी साहित्य सम्मेलन आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के द्वारा हिन्दी राजभाषा मानी गयी। इस प्रस्ताव के स्वीकृत होने के बाद दक्षिण भारत में हिन्दी के प्रचार प्रसार के लिये दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा की भी स्थापना हुयी जिसका मुख्यालय [[मद्रास]] में था। &lt;br /&gt;
महात्मा गांधी जी के इस अभिनव प्रयास के उपरांत ही हिन्दी क्षेत्रीयता के कंटीले तारों की बाढ को पार कर उन्मुक्त आकाश में विचरण करने के लिये पंख फडफडाती दिखी जो आज तक जारी है।&lt;br /&gt;
;[[महात्मा गाँधी]] से जुड़े अन्य प्रसंग पढ़ने के लिए [[महात्मा गाँधी के प्रेरक प्रसंग]] पर जाएँ।  &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{प्रेरक प्रसंग}}&lt;br /&gt;
[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]][[Category:समकालीन साहित्य]][[Category:प्रेरक प्रसंग]][[Category:महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>साँचा:प्रेरक प्रसंग - महात्मा गाँधी</title>
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		<updated>2015-06-03T02:19:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा कविता सूची&lt;br /&gt;
|कवि का नाम=महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
|रचना प्रकार='''प्रेरक प्रसंग - महात्मा गाँधी'''&lt;br /&gt;
|रचना 1=स्वयं पर विजय &lt;br /&gt;
|रचना 2=गांधीजी का मंदिर  &lt;br /&gt;
|रचना 3=बहुत बड़ा पाठ  &lt;br /&gt;
|रचना 4=नियम का पालन &lt;br /&gt;
|रचना 5=मुंह लगाकर जहर निकालने की कोशिश&lt;br /&gt;
|रचना 6=सिक्के का मूल्य &lt;br /&gt;
|रचना 7=भूतों से डर &lt;br /&gt;
|रचना 8=मृत्यु का पाप &lt;br /&gt;
|रचना 9=समय धन है, इसे मत गंवाओ..! &lt;br /&gt;
|रचना 10=संयम की सीख&lt;br /&gt;
|रचना 11=जनसेवक का पश्चाताप कैसा हो?&lt;br /&gt;
|रचना 12=किसी एक ने तो अपना गुस्सा थूंका.. &lt;br /&gt;
|रचना 13=बड़े दिल वाला&lt;br /&gt;
|रचना 14=नववर्षारम्भ नहीं 'निश्चय दिवस'&lt;br /&gt;
|रचना 15=मेरी जगह तुम्हारी जेल में होगी&lt;br /&gt;
|रचना 16=असहयोग  आन्दोलन  की  प्रेरणा&lt;br /&gt;
|रचना 17=राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रति सत्याग्रह&lt;br /&gt;
|रचना 18=&lt;br /&gt;
|रचना 19=&lt;br /&gt;
|रचना 20=&lt;br /&gt;
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}}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:प्रेरक प्रसंग]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>प्रार्थना</title>
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		<updated>2015-05-25T15:47:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Prarthana.jpg|right|thumb|250px|[[कौसानी]] के [[अनासक्ति आश्रम]] में आयोजित दैनिक प्रार्थना सभा]] &lt;br /&gt;
'''प्रार्थना''' एक धार्मिक [[क्रिया]] है जो [[ब्रह्माण्ड]] के किसी 'महान शक्ति' से सम्बन्ध जोड़ने की कोशिश करती है। प्रार्थना व्यक्तिगत हो सकती है और सामूहिक भी। इसमें शब्दों ([[मंत्र]], [[गीत]] आदि) का प्रयोग हो सकता है या प्रार्थना मौन भी हो सकती है।&lt;br /&gt;
;एल. क्राफार्ड ने कहा था- ‘‘प्रार्थना परिष्कार एवं परिमार्जन की उत्तम प्रक्रिया है।’’&lt;br /&gt;
==प्रार्थना संकलन==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Prarthana1.jpg|[[हरदोई]] के [[गांधी भवन]] परिसर में प्रार्थना|left|thumb]] {{दाँयाबक्सा|पाठ=गिरजों में घुसते ही बाहर की अशान्ति भूल जाती है। लोगों का व्यवहार बदल जाता है। लोग अदब से पेश आते हैं। वहाँ कोलाहल नहीं होता। कुमारी मरियम की मूर्ति के सम्मुख कोई न कोई प्रार्थना करता ही रहता है। यह सब वहम नहीं है, बल्कि हृदय की भावना है, ऐसा प्रभाव मुझ पर पड़ा था और बढ़ता ही गया है। कुमारिका की मूर्ति के सम्मुख घुटनों के बल बैठकर प्रार्थना करने वाले उपासक संगमरमर के पत्थर को नहीं पूजते थे, बल्कि उसमें मानी हुई अपनी कल्पित शक्ति को पूजते थे। ऐसा करके वे ईश्वर की महिमा को घटाते नहीं बल्कि बढ़ाते थे।&amp;lt;ref&amp;gt;महात्मा गांधी जीवनी सत्य के प्रयोग से संग्रहित &amp;lt;/ref&amp;gt;|विचारक=[[महात्मा गाँधी]]}}&lt;br /&gt;
*[[सरस्वती प्रार्थना]]&lt;br /&gt;
*[[नमाज़]]&lt;br /&gt;
*[[पंडित श्रद्धाराम शर्मा|नित्यप्रार्थना]]&lt;br /&gt;
*[[लोहड़ी|अग्नि को समर्पित प्रार्थना ]]&lt;br /&gt;
*[[अक्षय तृतीया|क्षमा-प्रार्थना का दिन]]&lt;br /&gt;
*[[गुड फ़्राइडे|यीशु की प्रार्थना का दिन]]&lt;br /&gt;
*[[वृक्षों का प्रार्थना गीत -राजेश जोशी|वृक्षों का प्रार्थना गीत]]&lt;br /&gt;
*[[छठपूजा|उदयमान सूर्य की प्रार्थना उपासना]]&lt;br /&gt;
*[[ओणम|विष्णु भगवान की पूजा के गीत]]&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; style=&amp;quot;border:1px solid #a7d7f9; border-radius:10px; color:#075352;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:50%; padding:20px; text-align:justify;&amp;quot;|&lt;br /&gt;
मैंने यह अनुभव किया है कि जब हम सारी आशा छोड़कर बैठ जाते हैं, हमारे दोनों हाथ टिक जाते हैं, तब कहीं न कहीं से मदद आ पहुंचती है। स्तुति, उपासना, प्रार्थना वहम नहीं है, बल्कि हमारा खाना पीना, चलना बैठना जितना सच है, उससे भी अधिक सच यह चीज है। यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं है कि यही सच है और सब झूठ है। ऐसी उपासना, ऐसी प्रार्थना निरा वाणी विलास नहीं होती उसका मूल कंठ नहीं हृदय है।&amp;lt;ref&amp;gt;महात्मा गांधी जीवनी पृष्ट 92 से संग्रहित&amp;lt;/ref&amp;gt;---[[महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:25%; padding:20px; text-align:justify;&amp;quot;|&lt;br /&gt;
प्रार्थना निवेदन करके उर्जा प्राप्त करने की शक्ति है और अपने इष्ट अथवा विद्या के प्रधान देव से सीधा संवाद है। प्रार्थना लौकिक व अलौकिक समस्या का समाधान है।&amp;lt;ref&amp;gt; आदि शक्ति से संग्रहित&amp;lt;/ref&amp;gt;---आदि शक्ति&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:25%; padding:20px; text-align:justify;&amp;quot;|&lt;br /&gt;
मुझे इस विषय में कोई शंका नहीं है कि विकार रूपी मलों की शुद्धि के लिए हार्दिक उपासना एक रामबाण औषधि है।&amp;lt;ref&amp;gt;सत्य के प्रयोग पृष्ट 69&amp;lt;/ref&amp;gt;---[[महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
==प्रार्थनाओं की प्रार्थना==&lt;br /&gt;
हेनरी डेविड थोरो की इस प्रार्थना को गांधी जी '''प्रार्थनाओं की प्रार्थना''' कहते थे-&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;100%&amp;quot; style=&amp;quot;border:1px solid #a7d7f9; border-radius:10px; color:#075352;&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
| style=&amp;quot;width:100%; padding:20px; text-align:justify;&amp;quot;|&lt;br /&gt;
&amp;quot; हे प्रभो ! मुझे इतनी शक्ति दे दो कि मैं अपने को अपनी करनी से कभी निराश न करूँ । मेरे हस्त, मेरी द्रढ़ता, श्रद्धा का कभी अनादर न करें । मेरा प्रेम मेरे मित्रों के प्रेम से घटिया न रहे । मेरी वाणी जितना कहे-- जीवन उससे ज्यादा करता चले । तेरी मंगलमय स्रष्टि का हर अमंगल पचा सकूँ, इतनी शक्ति मुझ में बनी रहे । &amp;quot;&amp;lt;ref&amp;gt;महात्मा गांधी जीवनी पृष्ट 143 से संग्रहित&amp;lt;/ref&amp;gt;---हेनरी डेविड थोरो&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/aashokshuklaa/entry/%E0%A4%A6-%E0%A4%A8-%E0%A4%95-%E0%A4%AA-%E0%A4%B0-%E0%A4%B0-%E0%A4%A5%E0%A4%A8-%E0%A4%95-%E0%A4%AE%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A4%B7-%E0%A4%A4-%E0%A4%B7-%E0%A4%95-%E0%A4%AA%E0%A4%B0-%E0%A4%B8-%E0%A4%A5-%E0%A4%AF-%E0%A4%AA-%E0%A4%B0%E0%A4%AD-%E0%A4%B5 प्रार्थना का मष्तिष्क पर प्रभाव]&lt;br /&gt;
*[http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/aashokshuklaa/entry/%E0%A4%AA-%E0%A4%B0-%E0%A4%A4-%E0%A4%AA-%E0%A4%B0-%E0%A4%B0-%E0%A4%A5%E0%A4%A8-%E0%A4%95-%E0%A4%B5-%E0%A4%9C-%E0%A4%9E-%E0%A4%A8-%E0%A4%95-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%A4-%E0%A4%B5 प्रातः प्रार्थना का वैज्ञानिक महत्व]&lt;br /&gt;
*[http://vichaarsankalan.wordpress.com/2010/01/31/यजुर्वेद-में-औषधीय-वनस्प/#comment-41 यजुर्वेद में औषधीय वनस्पति की प्रार्थना]&lt;br /&gt;
*[http://www.prayerinamerica.org/ PBS Documentary on Prayer in America]&lt;br /&gt;
*[http://www.washingtonpost.com/wp-dyn/content/article/2006/03/23/AR2006032302177.html/ Scientific study of effect of prayer on recovery of patients]&lt;br /&gt;
*[http://rssonnet.org/index.php?option=com_content&amp;amp;task=view&amp;amp;id=75&amp;amp;Itemid=41 संघ की प्रार्थना]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{आरती स्तुति स्तोत्र}}&lt;br /&gt;
[[Category:आरती स्तुति स्तोत्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू संस्कार]] &lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म कोश]][[Category:धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:हिन्दू धर्म]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>असहयोग आन्दोलन की प्रेरणा -महात्मा गाँधी</title>
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		<updated>2015-05-25T15:39:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Mahatma_prerak.png&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
|विवरण= [[महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=भाषा&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[हिंदी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=देश&lt;br /&gt;
|पाठ 2=[[भारत]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3=&lt;br /&gt;
|पाठ 3=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 4=&lt;br /&gt;
|पाठ 4=&lt;br /&gt;
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|शीर्षक 7=&lt;br /&gt;
|पाठ 7=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 8=मूल शीर्षक&lt;br /&gt;
|पाठ 8=[[प्रेरक प्रसंग]] &lt;br /&gt;
|शीर्षक 9=उप शीर्षक&lt;br /&gt;
|पाठ 9=[[महात्मा गाँधी के प्रेरक प्रसंग]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 10=संकलनकर्ता&lt;br /&gt;
|पाठ 10=[[अशोक कुमार शुक्ला]]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem style=&amp;quot;background:#fbf8df; padding:15px; font-size:14px; border:1px solid #003333; border-radius:5px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[महात्मा गाँधी|गांधी जी]] हेनरी डेविड थोरो नामक एक अमेरिकी विचारक से प्रभावित थे। थोरो का मानना था कि संसार में स्वविवेक से बड़ा कोई कानून नहीं है। ईश्वर ने मनुष्य को ये शक्ति दी है कि वो अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकता है, और इसी सोच के आधार पर उन्होंने अमेरिका में एक बार सिटी टैक्स नहीं देने के लिए लेख लिखा। उनका ऐसा लिखना कानून की निगाह में ज़ुर्म था, लिहाजा उन्होंने अपना ज़ुर्म कबूल करते हुए सजा भी पाई। सजा अपनी जगह थी, लेकिन उनका कहना था कि कोई भी कानून स्वविवेक से बढ़ कर नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;
थोरो का यही सिद्धांत गांधी जी के लिए सत्याग्रह का विज्ञान बना। गांधी जी ने समझ लिया कि किसी कानून की अवज्ञा नैतिक आधार पर की जा सकती है। हेनरी  थोरो  ने  कहा  था---- &amp;quot; लोकतंत्र  पर  मेरी  आस्था  है,  पर  वोटों  से  चुने  गये  व्यक्ति  स्वेच्छाचार  करें  मैं  यह  कभी  बर्दाश्त  नहीं  कर  सकता  | राजसंचालन  उन   व्यक्तियों  के  हाथ  में   होना   चाहिए  जिनमे  मनुष्य  मात्र  के  कल्याण  की   भावना  और  कर्तव्य-परायणता  विद्दमान  हो  और  जो  उसकी  पूर्ति  के  लिए  त्याग  भी  कर  सकते  हों  । &amp;quot; &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
किसी  ने  कहा---- यदि  ऐसा  न  हुआ  तो  ?'   &lt;br /&gt;
उन्होंने  कहा--- &amp;quot; तो  हम  ऐसी  राज्य  सत्ता  के  साथ  कभी  सहयोग   नहीं  करेंगे  चाहे  उसमे  हमें  कितना  ही  कष्ट  क्योँ  न  उठाना  पड़े  ।  &amp;quot;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे  सविनय-असहयोग  आंदोलन  के  प्रवर्तक  थे,  उनका  कहना  था--- 'अन्याय  चाहे  अपनें  घर  में  होता  हो  या  बाहर,  उसका    विरोध  करने  से   नहीं   डरना  चाहिए  और  कुछ  न  कर  सको  तो  भी  बुराई  के  साथ  सहयोग  तो  करना  ही  नहीं  चाहिए   ।&lt;br /&gt;
       &lt;br /&gt;
बुराइयाँ  चाहे  राजनैतिक  हों    या  सामाजिक,  नैतिक  हों    या  धार्मिक,   जिस  देश  के  नागरिक  उनके  विरुद्ध  खड़े  हो  जाते  हैं,  सविनय  असहयोग  से  उसकी   शक्ति  कमजोर  कर  देतें  हैं  वहां  अमेरिका  की  तरह  ही  सामाजिक  जीवन  में   परिवर्तन  भी  अवश्य  होते  हैं   ।&lt;br /&gt;
   &lt;br /&gt;
महात्मा  गांधी  को   [[सविनय अवज्ञा आन्दोलन]]   की  प्रेरणा  हेनरी  डेविड  थोरो  से  प्राप्त  हुई  ।  उनकी  प्रार्थना  को  गांधी  जी  '  प्रार्थनाओं  की  प्रार्थना  '  कहते  थे  । उनकी  [[प्रार्थना]]  थी----- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot; हे  प्रभो !  मुझे  इतनी  शक्ति  दे  दो  कि  मैं  अपने  को  अपनी  करनी  से  कभी  निराश  न  करूँ  ।  मेरे  हस्त,  मेरी  द्रढ़ता,  श्रद्धा  का  कभी  अनादर   न  करें  ।  मेरा  प्रेम  मेरे  मित्रों  के  प्रेम  से  घटिया  न  रहे  ।  मेरी  वाणी  जितना  कहे-- जीवन  उससे  ज्यादा  करता  चले  ।  तेरी  मंगलमय  स्रष्टि  का  हर  अमंगल  पचा  सकूँ,  इतनी  शक्ति  मुझ  में  बनी  रहे  । &amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;[[महात्मा गाँधी]] से जुड़े अन्य प्रसंग पढ़ने के लिए [[महात्मा गाँधी के प्रेरक प्रसंग]] पर जाएँ।  &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{प्रेरक प्रसंग}}&lt;br /&gt;
[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]][[Category:समकालीन साहित्य]][[Category:प्रेरक प्रसंग]][[Category:महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B2_%E0%A4%B5%E0%A4%9A%E0%A4%A8_7&amp;diff=528842</id>
		<title>अनमोल वचन 7</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B2_%E0%A4%B5%E0%A4%9A%E0%A4%A8_7&amp;diff=528842"/>
		<updated>2015-05-25T15:39:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: /* हेनरी डेविड थोरो (Henry David Thoreau) (1817 - 1862) */&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{पुनरीक्षण}}&lt;br /&gt;
{{seealso|अनमोल वचन 1|अनमोल वचन 2|अनमोल वचन 3|अनमोल वचन 4|अनमोल वचन 5|अनमोल वचन 6|अनमोल वचन 8|कहावत लोकोक्ति मुहावरे|सूक्ति और कहावत}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right; width:98%; border:thin solid #aaaaaa; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| width=&amp;quot;98%&amp;quot; class=&amp;quot;bharattable-purple&amp;quot; style=&amp;quot;float:right&amp;quot;;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
! width=&amp;quot;100%&amp;quot;| अनमोल वचन&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 600px; overflow: auto;overflow-x:hidden;&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable&amp;quot; border=&amp;quot;1&amp;quot; width=&amp;quot;98%&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
==अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) (1879 - 1955)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Albert_Einstein.jpg|अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* विश्व एक महान पुस्तक है जिसमें वे लोग केवल एक ही पृष्ठ पढ पाते हैं जो कभी घर से बाहर नहीं निकलते।  ~ आगस्टाइन&lt;br /&gt;
* धर्मरहित विज्ञान लंगडा है, और विज्ञान रहित धर्म अंधा।  ~ आइन्स्टाइन&lt;br /&gt;
* अवसर के रहने की जगह कठिनाइयों के बीच है।  ~ अलबर्ट आइन्स्टाइन&lt;br /&gt;
* तर्क, आप को किसी एक बिन्दु 'क' से दूसरे बिन्दु 'ख' तक पहुँचा सकते हैं। लेकिन, कल्पना, आप को सर्वत्र ले जा सकती है।  ~ अलबर्ट आइन्सटीन&lt;br /&gt;
* हम भारतीयों के बहुत ऋणी हैं जिन्होंने हमे गिनना सिखाया, जिसके बिना कोई भी मूल्यवान वैज्ञानिक खोज सम्भव नहीं होती।  ~ अलबर्ट आइन्स्टीन&lt;br /&gt;
* अट्ठारह वर्ष की उम्र तक इकट्ठा किये गये पूर्वाग्रहों का नाम ही सामान्य बुद्धि है।  ~ आइन्स्टीन&lt;br /&gt;
* प्रकृति को गहराई से देखें, और आप हर चीज़ को बेहतर समझ पाएंगे।  ~ अल्बर्ट आइंस्टीन&lt;br /&gt;
* आपकी कल्पनाशक्ति आपके जीवन के आने वाले आकर्षणों का पूर्वावलोकन है।  ~ एल्बर्ट आइन्स्टाइन&lt;br /&gt;
* ऐसा नहीं है कि मैं कोई अति प्रतिभाशाली व्यक्ति हूँ; लेकिन मैं निश्चित रूप से अधिक जिज्ञासु हूँ और किसी समस्या को सुलझाने में अधिक देर तक लगा रहता हूँ।  ~ आइंस्टीन&lt;br /&gt;
* सफल मनुष्य बनने के प्रयास से बेहतर है गुणी मनुष्य बनने का प्रयास।  ~ एल्बर्ट आइंस्टीन&lt;br /&gt;
* सफल व्यक्ति होने का प्रयास न करें, अपितु गरिमामय व्यक्ति बनने का प्रयास करें।  ~ अल्बर्ट आईंसटीन&lt;br /&gt;
* ऐसा नहीं है कि मैं बहुत चतुर हूं; सच्चाई यह है कि मैं समस्याओं का सामना अधिक समय तक करता हूं।  ~ अल्बर्ट आंईस्टीन&lt;br /&gt;
* एक ऐसा व्यक्ति जिसने कभी ग़लती नहीं की है, उसने जीवन में कुछ नया करने का कभी प्रयास ही नहीं किया होता है।  ~ अल्बर्ट आईंस्टिन&lt;br /&gt;
* अपना जीवन जीने के केवल दो ही तरीके हैं. पहला यह मानना कि कोई चमत्कार नहीं होता है, दूसरा है कि हर वस्तु एक चमत्कार है।  ~ अल्बर्ट आईन्सटीन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जॉर्ज बर्नार्ड शॉ (George Bernard Shaw) (1856 - 1950)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:George Bernard Shaw.jpg|जॉर्ज बर्नार्ड शॉ (George Bernard Shaw)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* सत्य को कह देना ही मेरा मज़ाक करने का तरीका है। संसार में यह सब से विचित्र मज़ाक है।  ~ जार्ज बर्नार्ड शॉ&lt;br /&gt;
* आमतौर पर आदमी उन चीजों के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहता है जिनका उससे कोई लेना देना नहीं होता।  ~ जॉर्ज बर्नार्ड शॉ&lt;br /&gt;
* पुस्तक प्रेमी सबसे धनवान व सुखी होता है, संपूर्ण रूप से त्रुटिहीन पुस्तक कभी पढ़ने लायक़ नहीं होती।  ~ जॉर्ज बर्नार्ड शॉ&lt;br /&gt;
* शिक्षा और प्रशिक्षण का एकमात्र उद्देश्य समस्या-समाधान होना चाहिये।  ~ जार्ज बर्नार्ड शा&lt;br /&gt;
* बिना कुछ किए बिताने वाले जीवन की अपेक्षा ग़लतियाँ करते हुए बिताने वाला जीवन अधिक सम्माननीय होता है।  ~ जॉर्ज बर्नार्ड शॉ&lt;br /&gt;
* संसार मे समस्या यह है कि मूढ लोग अत्यन्त सन्देहरहित होते है और बुद्धिमान सन्देह से परिपूर्ण।  ~ जार्ज बर्नार्ड शा&lt;br /&gt;
* आप कुछ देखते हैं; तो कहते हैं, &amp;quot;क्यों?&amp;quot;, लेकिन मैं असंभव से सपने देखता हूँ और कहता हूँ, &amp;quot;क्यों नहीं?&amp;quot;  ~ जॉर्ज बर्नार्ड शॉ&lt;br /&gt;
* आप को अच्छा करने का अधिकार बुरा करने के अधिकार के बिना नहीं मिल सकता, माता का दूध शूरवीरों का ही नहीं, वधिकों का भी पोषण करता है।  ~ जॉर्ज बर्नार्ड शॉ&lt;br /&gt;
* आप प्रसन्न है या नहीं यह सोचने के लिए फुरसत होना ही दुखी होने का रहस्य है, और इसका उपाय है व्यवसाय।  ~ जॉर्ज बर्नार्ड शॉ&lt;br /&gt;
* किसी पुरुष या महिला के पालन-पोषण की आज़माइश तो एक झगड़े में उनके बर्ताव से होती है. जब सब ठीक चल रहा हो तब अच्छा बर्ताव तो कोई भी कर सकता है।  ~ जॉर्ज बर्नार्ड शॉ&lt;br /&gt;
* आज अध्‍ययन करना सब जानते हैं, पर क्‍या अध्‍ययन करना चाहिए यह कोई नहीं जानता।  ~ जार्ज बर्नाड शॉ&lt;br /&gt;
* सबसे कम खर्चीला मनोरंजन होता है श्रेष्‍ठ पुस्‍तकों के अध्‍ययन से और यह स्‍थाई होता है।  ~ जार्ज बनार्ड शॉ&lt;br /&gt;
* आप अपने भविष्य को नहीं बदल सकते लेकिन आप अपनी आदतों को बदल सकते है तथा सुनिश्चित मानें आपकी आदतें आपका भविष्य बदल देंगी।  ~ बर्नाड शॉ&lt;br /&gt;
* कमाए बगैर धन का उपभोग करने की तरह ही खुशी दिए बगैर खुश रहने का अधिकार हमें नहीं है।  ~ जार्ज बरनार्ड शा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बेंजामिन फ्रैंकलिन (Benjamin Franklin) (1706 - 1790)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Benjamin Franklin.jpg|बेंजामिन फ्रैंकलिन (Benjamin Franklin)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* मछली एवं अतिथि, तीन दिनों के बाद दुर्गन्धजनक और अप्रिय लगने लगते हैं।  ~ बेंजामिन फ्रैंकलिन&lt;br /&gt;
* हँसमुख चेहरा रोगी के लिये उतना ही लाभकर है जितना कि स्वस्थ ऋतु।  ~ बेन्जामिन&lt;br /&gt;
* चींटी से अच्छा उपदेशक कोई और नहीं है। वह काम करते हुए खामोश रहती है।  ~ बैंजामिन फ्रैंकलिन&lt;br /&gt;
* यदि कोई व्यक्ति अपने धन को ज्ञान अर्जित करने में ख़र्च करता है, तो उससे उस ज्ञान को कोई नहीं छीन सकता! ज्ञान के लिए किये गए निवेश में हमेशा अच्छा प्रतिफल प्राप्त होता है!  ~ बेंजामिन फ्रेंकलिन&lt;br /&gt;
* आप रुक सकते हैं लेकिन समय नहीं रुकता।  ~ बेंजामिन फ्रैंकलिन&lt;br /&gt;
* खोया समय कभी फिर नहीं मिलता।  ~ बेंजामिन फ्रैंकलिन&lt;br /&gt;
* धन से आज तक किसी को खुशी नहीं मिली और न ही मिलेगी, जितना अधिक व्यक्ति के पास धन होता है, वह उससे कहीं अधिक चाहता है। धन रिक्त स्थान को भरने के बजाय शून्यता को पैदा करता है।  ~ बेंजामिन फ्रेंकलिन&lt;br /&gt;
* क्रोध कभी भी बिना कारण नहीं होता, लेकिन कदाचित ही यह कारण सार्थक होता है।  ~ बेंजामिन फ्रेंकलिन&lt;br /&gt;
* ज्ञान में पूंजी लगाने से सर्वाधिक ब्याज मिलता है।  ~ बेंजामिन फ्रेंकलिन&lt;br /&gt;
* क्रोध से शुरू होने वाली हर बात, लज्‍जा पर समाप्‍त होती है।  ~ बेंजामिन फ्रेंकलिन&lt;br /&gt;
* बुद्धिमान व्यक्तियों की सलाह की आवश्यकता नहीं होती है, मूर्ख लोग इसे स्वीकार नहीं करते हैं।  ~ बेंजामिन फ्रेंकलिन&lt;br /&gt;
* जीवन में दुखद बात यह है कि हम बड़े दो जल्दी हो जाते हैं, लेकिन समझदार देर से होते हैं।  ~ बेंजामिन फ्रेंकलिन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विलियम शेक्सपियर (William Shakespeare) (1564 - 1616)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:William Shakespeare.jpg|विलियम शेक्सपियर (William Shakespeare)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* हम जानते हैं कि हम क्या हैं, पर ये नहीं जानते कि हम क्या बन सकते हैं।  ~ शेक्सपीयर&lt;br /&gt;
* गहरी नदी का जल प्रवाह शांत व गंभीर होता है।  ~ शेक्सपीयर &lt;br /&gt;
* ईमानदारी से बड़ी कोई विरासत नहीं है।  ~ विलियम शेक्सपियर&lt;br /&gt;
* अपेक्षा ही मनोव्यथा का मूल है।  ~ विलियम शेक्सपियर&lt;br /&gt;
* सभी से प्रेम करें, कुछ पर विश्वास करें और किसी के साथ भी ग़लत न करें।  ~ विलियम शेक्सपियर&lt;br /&gt;
* जिस श्रम से हमें आनन्‍द प्राप्‍त होता है, वह हमारी व्‍याधियों के लिए अमृत, तुल्‍य है, हमारी वेदना की निवृत्‍ित है।  ~ शेक्‍सपीयर&lt;br /&gt;
* जिस पर तुम्‍हारा वश नहीं, उसके लिये दुख करना बंद कर दो।  ~ शेक्‍सपियर&lt;br /&gt;
* ऐसा व्यक्ति जिसने कभी आशा नहीं की, वह कभी निराशा भी नहीं होता है।  ~ विलियम शेक्सपियर&lt;br /&gt;
* मूर्ख व्यक्ति स्वयं को बुद्धिमान मानता है लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति स्वयं को मूर्ख मानता है।  ~ विलियम शेक्सपियर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विंस्टन चर्चिल (Winston Churchill) (1874 - 1965)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Winston Churchill.jpg|विंस्टन चर्चिल (Winston Churchill)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* किसी कम पढे व्यक्ति द्वारा सुभाषित पढना उत्तम होगा।  ~ सर विंस्टन चर्चिल&lt;br /&gt;
* सतत प्रयास - न कि ताकत या बुद्धिमानी - ही हमारे सामर्थ्य को साकार करने की कुंजी है।  ~ विंस्टन चर्चिल&lt;br /&gt;
* सफलता हमेशा के लिए नहीं होती, असफलता कभी घातक नहीं होती: यह तो लगे रहने की प्रवृत्ति है जो मायने रखती है।  ~ विंस्टन चर्चिल&lt;br /&gt;
* आशावादी व्यक्ति हर आपदा में एक अवसर देखता है; निराशावादी व्यक्ति हर अवसर में एक आपदा देखता है।  ~ विन्सटन चर्चिल&lt;br /&gt;
* रणनीति कितनी भी सुंदर क्यों न हो, आप को कभी कभी परिणामों पर भी विचार करना चाहिए।  ~ सर विंसटन चर्चिल&lt;br /&gt;
* मानव के सभी गुणों में साहस पहला गुण है, क्‍योंकि वह सभी गुणों की जिम्‍मेदारी लेता है।  ~ चर्चिल&lt;br /&gt;
* निराशावादी हर अवसर में कठिनाई देखता हैं, जबकि आशावादी हर कठिनाई में अवसर देखता हैं।  ~ विन्स्टन चर्चिल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अरस्तू (Aristotle) (384 BC - 322 BC)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Aristotle.jpg|अरस्तू (Aristotle)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* खुशी ही जीवन का अर्थ और उद्देश्य है, और मानव अस्तित्व का लक्ष्य और मनोरथ।  ~ अरस्तू&lt;br /&gt;
* अच्छी शुरुआत से आधा काम हो जाता है।  ~ अरस्तू&lt;br /&gt;
* जन्म देने वाले माता पिता से अध्यापक कहीं अधिक सम्मान के पात्र हैं, क्योंकि माता पिता तो केवल जन्म देते हैं, लेकिन अध्यापक उन्हें शिक्षित बनाते हैं, माता पिता तो केवल जीवन प्रदान करते हैं, जबकि अध्यापक उनके लिए बेहतर जीवन को सुनिश्चित करते हैं।  ~ अरस्तू&lt;br /&gt;
* मित्र क्या है? एक आत्मा जो दो शरीरों में निवास करती है।  ~ अरस्तू&lt;br /&gt;
* शिक्षा की जड़े भले ही कड़वी हों, इसके फल मीठे होते हैं।  ~ अरस्‍तू&lt;br /&gt;
* खुशी हम पर निर्भर करती है।  ~ अरस्तु&lt;br /&gt;
* अपने दुश्मनों पर विजय पाने वाले की तुलना में मैं उसे शूरवीर मानता हूं जिसने अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर ली है; क्योंकि सबसे कठिन विजय अपने आप पर विजय होती है।  ~ अरस्तु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मार्टिन लुथर किंग, जूनियर (Martin Luther King, Jr.) (1929 - 1968)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Martin Luther King, Jr.jpg|मार्टिन लुथर किंग, जूनियर (Martin Luther King, Jr.)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* आँख के बदले आँख' के प्राचीन सिद्धान्त से तो एक दिन सभी अंधे हो जाएंगे।  ~ मार्टिन लुथर किंग, जूनियर&lt;br /&gt;
* हमारे जीवन का उस दिन अंत होना शुरू हो जाता है जिस दिन हम उन विषयों के बारे में चुप रहना शुरू कर देते हैं जो मायने रखते हैं।  ~ मार्टिन लुथर किंग, जूनियर&lt;br /&gt;
* मैंने प्रेम को ही अपनाने का निर्णय किया है। द्वेष करना तो बेहद बोझिल काम है।  ~ मार्टिन लूथर किंग, जूनियर&lt;br /&gt;
* पत्नी को चाहिए कि पति घर लौटने पर खुश हो, और पति को चाहिए कि पत्नी को उसके घर से निकलने पर दुख हो।  ~ मार्टिन लूथर&lt;br /&gt;
* हमें परिमित निराशा को स्वीकार करना चाहिए, लेकिन अपरिमित आशा को कभी नहीं खोना चाहिए।  ~ मार्टिन लूथर किंग, जूनियर (1929-1967), अश्वेत मानवाधिकारी नेता&lt;br /&gt;
* हमे सीमित मात्रा में निराशा को स्वीकार करना चाहिये, लेकिन असीमित आशा को नहीं छोडना चाहिये।  ~ मार्टिन लुथर किंग&lt;br /&gt;
* दीर्घायु होना नहीं बल्कि जीवन की गुणवत्ता का महत्व होता है।  ~ मार्टिन लूथर किंग, जूनियर&lt;br /&gt;
* हमारे जीवन का उस दिन अंत होना शुरू हो जाता है जिस दिन हम उन विषयों के बारे में चुप रहना शुरू कर देते हैं जो मायने रखते हैं।   ~ मार्टिन लुथर किंग, जूनियर&lt;br /&gt;
* हमें भाईयों की तरह मिलकर रहना अवश्य सीखना होगा अन्यथा मूर्खों की तरह सभी बरबाद हो जाएंगे।  ~ मार्टिन लूथर किंग, जूनियर&lt;br /&gt;
* अंधकार से अंधकार को दूर नहीं किया जा सकता है, केवल प्रकाश से ही ऐसा किया जा सकता है, नफरत से नफरत को नहीं हटाया जा सकता है, केवल प्यार से ही ऐसा किया जा सकता है।  ~ मार्टिन लूथर किंग, जूनियर&lt;br /&gt;
* सही काम करने के लिए समय हर वक्त ही ठीक होता है।  ~ मार्टिन लूथर किंग जूनियर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हेनरी वार्ड बीचर (Henry Ward Beecher) (1813 - 1887)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Henry-Ward-Beecher.jpg|हेनरी वार्ड बीचर (Henry Ward Beecher)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* हम जब तक खुद मां बाप नहीं बन जाएं, मां बाप का प्यार कभी नहीं जान पाते।  ~ हेनरी वार्ड बीचर, (1813-1887), अमरीकी पादरी&lt;br /&gt;
* संगीत की धुनों में जो स्वर्ग की ऊंचाइयों तक पहूंची है, वह है एक स्नेहभरे दिल की धड़कन।  ~ हेनरी वार्ड बीचर&lt;br /&gt;
* प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह याद रखना बेहतर होगा कि सभी सफल व्यवसाय नैतिकता की नींव पर आधारित होते हैं।  ~ हैनरी वार्ड बीचर&lt;br /&gt;
* इस दुनिया में जो कुछ हम अर्जित करते हैं, उससे नहीं अपितु जो कुछ त्याग करते हैं, उससे समृद्ध बनते हैं।  ~ हैनरी वार्ड बीचर&lt;br /&gt;
* अपने मित्र को उसके दोषों को बताना मित्रता की सबसे कठोर परीक्षा होती है।  ~ हैनरी वार्ड बीचर&lt;br /&gt;
* विचारों को मूर्त रूप देने की क्षमता ही सफलता का रहस्य है।  ~ हैनरी वार्ड बीचर&lt;br /&gt;
* कठिनाईयां भगवान का संदेश होती हैं, उनका सामना करते समय हमें भगवान के विश्‍वास के रूप में, भगवान से अभिनंदन के रूप में उनका सम्‍मान करना चाहिये।  ~ हेनरी वार्ड बीचर&lt;br /&gt;
* काम वह वस्तु नहीं है जिससे किसी व्यक्ति की पराजय होती है, वास्तव में वह वस्तु चिंता है।  ~ हेनरी वार्ड बीचर&lt;br /&gt;
* मुश्किलें वे औजार हैं जिनसे ईश्वर हमें बेहतर कामों के लिए तैयार करता हैं।  ~ एच. डबल्यू वीचर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==राल्फ वाल्डो एमर्सन (Ralph Waldo Emerson) (1803 - 1882)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:ralph-waldo-emerson.jpg|राल्फ वाल्डो एमर्सन (Ralph Waldo Emerson)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* यदि किसी असाधारण प्रतिभा वाले आदमी से हमारा सामना हो तो हमें उससे पूछना चाहिये कि वो कौन सी पुस्तकें पढता है।  ~ एमर्शन&lt;br /&gt;
* प्रत्येक व्यक्ति के लिये उसके विचार ही सारे तालो की चाबी हैं।  ~ इमर्सन&lt;br /&gt;
* आओं हम मौन रहें ताकि फ़रिस्तों की कानाफूसियाँ सुन सकें।  ~ एमर्शन&lt;br /&gt;
* डर सदैव अज्ञानता से पैदा होता है।  ~ एमर्सन&lt;br /&gt;
* सम्पूर्ण जीवन ही एक प्रयोग है। जितने प्रयोग करोगे उतना ही अच्छा है।  ~ इमर्सन&lt;br /&gt;
* जैसे जैसे हम बूढ़े होते जाते हैं, सुंदरता भीतर घुसती जाती है।  ~ रॉल्फ वाल्डो इमर्सन&lt;br /&gt;
* लम्बी आयु का महत्व नहीं है जितना महत्व इसकी गहनता है।  ~ राल्फ वाल्डो एमर्सन&lt;br /&gt;
* हर सुबह जब आप जागते हैं तो अपने भगवान को धन्यवाद दें तथा आप अनुभव करते है कि आपने वह कार्य करना है जिसे अवश्य किया जाना चाहिए, चाहे आप इसे पसंद करें या नहीं, इससे चरित्र का निर्माण होता है।  ~ एमरसन&lt;br /&gt;
* प्रत्येक कलाकार एक दिन नौसिखिया ही होता है।  ~ राल्फ वाल्डो एमर्सन&lt;br /&gt;
* बिना उत्साह के आज तक कुछ भी महान उपलब्धि हासिल नहीं की गई है।  ~ राल्फ वाल्डो एमर्सन&lt;br /&gt;
* पूरा जीवन एक प्रयोग है। जितने अधिक प्रयोग आप करेंगे, उतना ही अच्छा।  ~ राल्फ इमरसन&lt;br /&gt;
* प्रकृति की गति अपनाएं: उसका रहस्य है धीरज।  ~ राल्फ इमर्सन&lt;br /&gt;
* पूरा जीवन एक अनुभव है, आप जितने अधिक प्रयोग करते हैं, उतना ही इसे बेहतर बनाते हैं।  ~ राल्फ वाल्डो एमर्सन&lt;br /&gt;
* एक बार जब आप निर्णय कर लेते हैं तो समस्त सृष्टि इसके भलीभूत होने के लिए तत्पर हो जाती है।  ~ राल्फ वाल्डो एमर्सन&lt;br /&gt;
* एक बार एक युवक को एक अच्छी सलाह प्राप्त करते हुए मैंने सुना था कि, &amp;quot;हमेशा वह कार्य करो जिसको करने से आप ड़रते हैं।  ~ राल्फ वाल्डो एमर्सन&lt;br /&gt;
* उत्साह, प्रयास की जननी है, तथा इसके बिना आज तक कोई महान उपलब्धि हासिल नहीं की गई है।  ~ राल्फ वाल्डो एमर्सन&lt;br /&gt;
* हमारे भीतर क्या छिपा है इसकी तुलना में हमारे विगत में क्या था और हमारे भविष्य में क्या है, यह बहुत छोटी छोटी बातें है।  ~ राल्फ वाल्डो एमर्सन&lt;br /&gt;
* वे जीत जाते हैं, जिन्हें यह विश्वास होता हैं कि वे जीत सकते है।  ~ इमर्सन&lt;br /&gt;
* जो आदमी इरादा कर सकता है, उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं।  ~ एमर्सन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==दलाई लामा (Dalai Lama) (1935 - )==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Dalai-Lama2800600.jpg|दलाई लामा (Dalai Lama)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* इस जीवन का प्रथम लक्ष्य है दूसरों की सहायता करना। और यदि आप दूसरों की सहायता नहीं कर सकते तो कम से कम उन्हें आहत तो न करें।  ~ दलाई लामा&lt;br /&gt;
* हम धर्म और चिंतन के बिना रह सकते हैं किन्तु मानवीय प्रेम के बिना नहीं।  ~ दलाई लामा&lt;br /&gt;
* खुशी अपने आप नहीं मिलती। यह आपके अपने कर्मों से ही आती है।  ~ दलाई लामा&lt;br /&gt;
* जब तक हम अपने आप से सुलह नहीं कर लेते तब तक हम दुनिया से भी सुलह नहीं कर सकते।  ~ दलाई लामा&lt;br /&gt;
* सहिष्णुता के अभ्यास में आपका शत्रु ही सर्वश्रेष्ठ शिक्षक होता है।  ~ दलाई लामा&lt;br /&gt;
* मैं इस आसान धर्म में विश्वास रखता हूं। मन्दिरों की कोई आवश्यकता नहीं; जटिल दर्शनशास्त्र की कोई आवश्यकता नहीं। हमारा मस्तिष्क, हमारा हृदय ही हमारा मन्दिर है; और दयालुता जीवन-दर्शन है।  ~ दलाई लामा&lt;br /&gt;
* जब आप कुछ गंवा बैठते हैं, तो उससे प्राप्त शिक्षा को न गंवाएं।  ~ दलाई लामा&lt;br /&gt;
* हमारी खुशी का स्रोत हमारे ही भीतर है, यह स्रोत दूसरों के प्रति संवेदना से पनपता है।  ~ दलाईलामा &lt;br /&gt;
* यदि आप दूसरों को खुश देखना चाहते हैं तो सहानुभूति को अपनाएं, यदि आप खुश होना चाहते हैं तो सहानुभूति अपनाएं।  ~ तेंजिन ग्यात्सो, 14वें दलाई लामा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अब्राहम लिंकन (Abraham Lincoln) (1809 - 1865)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Abraham-Lincoln.jpg|अब्राहम लिंकन (Abraham Lincoln)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* हर किसी पर विश्वास कर लेना खतरनाक है; किसी पर भी विश्वास न करना बहुत खतरनाक है।  ~ अब्राहम लिंकन&lt;br /&gt;
* यदि शांति पाना चाहते हो, तो लोकप्रियता से बचो।  ~ अब्राहम लिंकन&lt;br /&gt;
* मुझे एक पेड़ काटने के लिए यदि आप छह घंटे देते हैं तो मैं पहले चार घंटे अपनी कुल्हाड़ी की धार बनाने में लगाऊँगा।  ~ अब्राहम लिंकन&lt;br /&gt;
* चरित्र एक वृक्ष है और मान एक छाया। हम हमेशा छाया की सोचते हैं; लेकिन असलियत तो वृक्ष ही है।  ~ अब्राहम लिंकन&lt;br /&gt;
* चरित्र वृक्ष के समान है तो प्रतिष्‍ठा, उसकी छाया है। हम अक्‍सर छाया के, बारे में सोचते हैं, जबकि असल, चीज़ तो वृक्ष ही है।  ~ अब्राहम लिंकन&lt;br /&gt;
* अपने विरोधियो से मित्रता कर लेना क्या विरोधियों को नष्ट करने के समान नहीं है?  ~ अब्राहम लिंकन&lt;br /&gt;
* इंसान जितना अपने मन को मना सके उतना खुश रह सकता है।  ~ अब्राहम लिंकन&lt;br /&gt;
* जिस प्रकार मैं एक ग़ुलाम नहीं बनना चाहता, उसी प्रकार मैं किसी ग़ुलाम का मालिक भी नहीं बनना चाहता. यह सोच लोकतंत्र के सिद्धांत को दर्शाती है।  ~ अब्राहम लिंकन&lt;br /&gt;
* उस व्यक्ति को आलोचना करने का अधिकार है जो सहायता करने की भावना रखता है।  ~ अब्राहम लिंकन&lt;br /&gt;
* मुझे अधिक संबंध इस बात से नहीं है कि आप असफ़ल हुए, बल्कि इस बात से कि आप अपनी असफलता से कितने संतुष्ट है।  ~ अब्राहम लिंकन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मार्क ट्वेन (Mark Twain) (1835 - 1910)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Mark Twain.jpg|मार्क ट्वेन (Mark Twain)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* स्वास्थ्य के संबंध में, पुस्तकों पर भरोसा न करें। छपाई की एक ग़लती जानलेवा भी हो सकती है।  ~ मार्क ट्वेन&lt;br /&gt;
* अगर आप सच बोलते हैं, तो आप को ज़्यादा कुछ याद रखने की ज़रूरत नहीं।  ~ मार्क ट्वेन&lt;br /&gt;
* उन लोगों से दूर रहें जो आप आपकी महत्वकांक्षाओं को तुच्छ बनाने का प्रयास करते हैं। छोटे लोग हमेशा ऐसा करते हैं, लेकिन महान लोग आपको इस बात की अनुभूति करवाते हैं कि आप भी वास्तव में महान बन सकते हैं।  ~ मार्क ट्वेन&lt;br /&gt;
* देरी से प्राप्त की गई सम्पूर्णता की तुलना में निरन्तर सुधार बेहतर होता है।  ~ मार्क टवैन&lt;br /&gt;
* भारत मानव जाति का पलना है, मानव-भाषा की जन्मस्थली है, इतिहास की जननी है, पौराणिक कथाओं की दादी है, और प्रथाओं की परदादी है। मानव इतिहास की हमारी सबसे कीमती और सबसे ज्ञान-गर्भित सामग्री केवल भारत में ही संचित है।  ~ मार्क ट्वेन&lt;br /&gt;
* क्रोध एक तेजाब है जो उस बर्तन का अधिक अनिष्ट कर सकता है जिसमें वह भरा होता है न कि उसका जिस पर वह डाला जाता है।  ~ मार्क ट्वेन&lt;br /&gt;
* जो पढ़ता नहीं है, वह उस व्‍यक्ति से क़तई बेहतर नहीं है जो अनपढ़ है।  ~ मार्क ट्वेन&lt;br /&gt;
* एक शब्‍द और लगभग सही शब्‍द में ठीक उतना ही अंतर है जितना कि रोशनी और जुगनू में।  ~ मार्क ट्वेन&lt;br /&gt;
* जीवन मुख्य रुप से अथवा मोटे तौर पर तथ्यों और घटनाओं पर आधारित नहीं है. यह मुख्य रुप से किसी व्यक्ति के दिलो दिमाग में निरन्तर उठने वाले विचारों के तूफ़ानों पर आधारित होती है।  ~ मार्क ट्वेन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गोथे (Johann Wolfgang von Goethe) (1749 - 1832)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Johann Wolfgang von Goethe.jpg|जोहेन वोल्फ़्गेंग गोथ (Johann Wolfgang von Goethe)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* सही मायने में बुद्धिपूर्ण विचार हजारों दिमागों में आते रहे हैं। लेकिन उनको अपना बनाने के लिये हमको ही उन पर गहराई से तब तक विचार करना चाहिये जब तक कि वे हमारी अनुभूति में जड न जमा लें।  ~ गोथे&lt;br /&gt;
* बाँटो और राज करो, एक अच्छी कहावत है; (लेकिन) एक होकर आगे बढो, इससे भी अच्छी कहावत है।  ~ गोथे&lt;br /&gt;
* जो कुछ आप कर सकते हैं या कर जाने की इच्छा रखते है उसे करना आरम्भ कर दीजिये। निर्भीकता के अन्दर मेधा (बुद्धि), शक्ति और जादू होते हैं।  ~ गोथे&lt;br /&gt;
* यदि आप अपरिमित में जाना चाहते हैं, तो पहले परिमित को अच्छे से जान लेने का प्रयत्न करें।  ~ जोहेन वोल्फ़्गेंग गोथ&lt;br /&gt;
* सोचना आसान होता है, कर्म करना कठिन होता है, लेकिन दुनिया में सबसे कठिन कार्य अपनी सोच के अनुसार काम करना होता है।  ~ गोएथ&lt;br /&gt;
* केवल जानना पर्याप्त नहीं है, हमें अवश्य ही प्रयोग भी करना चाहिए, केवल इच्छा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि हमें कार्य करना भी चाहिए।  ~ गोएथ&lt;br /&gt;
* अज्ञानी व्यक्ति वह प्रश्न पूछते हैं जिनका उत्तर समझदार व्यक्तियों द्वारा एक हज़ार पहले दे दिया गया होता है।  ~ गोएथ&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==कंफ्यूशियस (Confucious) (551 BC - 479)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Confucius.gif|कंफ्यूशियस (Confucious)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* जब तुम्हारे खुद के दरवाज़े की सीढ़ियाँ गंदी हैं तो पड़ोसी की छत पर पड़ी गंदगी का उलाहना मत दीजिए।  ~ कनफ़्यूशियस&lt;br /&gt;
* बुद्धि का अर्जन हम तीन तरीकों से कर सकते हैं: प्रथम, चिंतन से, जो कि उत्तम है; द्वितीय, दूसरों से सीखकर, जो सबसे आसान है; और तृतीय, अनुभव से, जो सबसे कठिन है।  ~ कन्फ़्यूशियस&lt;br /&gt;
* ऐसे पेशे का चयन करें जो आपको दिलचस्प लगता हो, और आपको अपने जीवन में एक भी दिन काम नहीं करना पड़ेगा।  ~ कंफ्यूशियस&lt;br /&gt;
* जो व्यक्ति दूसरों की भलाई चाहता है, वह अपनी भलाई को सुनिश्चित कर लेता है।  ~ कंफ्यूशियस&lt;br /&gt;
* जब यह साफ़ हो कि लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकता है, तो लक्ष्यों में फेरबदल न करें, बल्कि अपनी प्रयासों में बदलाव करें।  ~ कंफ्यूशिअस&lt;br /&gt;
* श्रेष्ठ व्यक्ति बोलने में संयमी होता है लेकिन अपने कार्यों में अग्रणी होता है।  ~ कंफ्यूशियस&lt;br /&gt;
* प्रत्येक कृति में सुंदरता होती है, लेकिन हर कोई इसे देख नहीं सकता।  ~ कन्फूशियस&lt;br /&gt;
* हमारी महानतम विशालता (सफलता) कभी भी न गिरने में नहीं अपितु हर बार गिरने पर फिर उठने में निहित होती है।  ~ कंफ्यूशियस&lt;br /&gt;
* आप कहीं भी जाएं, दिल से जाएं।  ~ कंफ्यूशियस&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विलियम ड्रूमंड (William James [Will] Durant) (1885 - 1981)==&lt;br /&gt;
* जो तर्क को अनसुना कर देते हैं, वह कटर हैं! जो तर्क ही नहीं कर सकते, वह मुर्ख हैं और जो तर्क करने का साहस ही नहीं दिखा सकते, वह ग़ुलाम हैं।  ~ विलियम ड्रूमंड&lt;br /&gt;
* सभ्यता सुव्यस्था के जन्मती है, स्वतन्त्रता के साथ बडी होती है और अव्यवस्था के साथ मर जाती है।  ~ विल डुरान्ट&lt;br /&gt;
* भारत हमारी संपूर्ण (मानव) जाति की जननी है तथा संस्कृत यूरोप के सभी भाषाओं की जननी है: भारतमाता हमारे दर्शनशास्त्र की जननी है, अरबॊं के रास्ते हमारे अधिकांश गणित की जननी है, बुद्ध के रास्ते इसाईयत मे निहित आदर्शों की जननी है, ग्रामीण समाज के रास्ते स्व-शाशन और लोकतंत्र की जननी है। अनेक प्रकार से भारत माता हम सबकी माता है।  ~ विल्ल डुरान्ट, अमरीकी इतिहासकार&lt;br /&gt;
* विज्ञान हमे ज्ञानवान बनाता है लेकिन दर्शन (फिलासफी) हमे बुद्धिमान बनाता है।  ~ विल्ल डुरान्ट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अलबर्ट हबर्ड (Elbert Hubbard) (1856 - 1915)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Elbert Hubbard.jpg|अलबर्ट हबर्ड (Elbert Hubbard)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* ग़लती करने में कोई ग़लती नहीं है। ग़लती करने से डरना सबसे बडी ग़लती है।  ~ एल्बर्ट हब्बार्ड&lt;br /&gt;
* स्पष्टीकरण से बचें। मित्रों को इसकी आवश्यकता नहीं; शत्रु इस पर विश्वास नहीं करेंगे।  ~ अलबर्ट हबर्ड&lt;br /&gt;
* कभी भी सफाई नहीं दें। आपके दोस्तों को इसकी आवश्यकता नहीं है और आपके दुश्मनों को विश्वास ही नहीं होगा।  ~ अलबर्ट हब्बार्ड&lt;br /&gt;
* यदि आपके पास स्वास्थ्य है तो संभवतः आप प्रसन्न होंगे, और यदि आपके पास स्वास्थ्य और प्रसन्नता दोनों हैं, तो आपके पास अपनी आवश्यकता के अनुसार समस्त सम्पदा होगी फिर चाहे आप इसे न भी चाहते हों।  ~ एल्बर्ट हुब्बार्ड&lt;br /&gt;
* जब हम कठिन कार्यों को चुनौती के रुप में स्वीकार करते हैं और उन्हें खुशी और उत्साह से निष्पादित करते हैं, तो चमत्कार हो सकते हैं।  ~ अल्बर्ट गिल्बर्ट&lt;br /&gt;
* आप इस जीवन में सबसे बड़ी ग़लती यह कर सकते हैं कि आप निरन्तर इस बात को लेकर डरते रहें कि आप कोई ग़लती कर देंगे।  ~ एल्बर्ट हुब्बार्ड&lt;br /&gt;
* असफलता की उत्पत्ति तभी होती है जब आप प्रयास करना बन्द कर देते हैं।  ~ एल्बर्ट हब्बार्ड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==खलील ज़िब्रान (Khalil Gibran) (1883 - 1931)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:khalil-gibran.jpg|खलील ज़िब्रान (Khalil Gibran)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* बीता कल आज की याद है, और आने वाला कल आज का स्‍वप्‍न।  ~ खलील जिब्रान&lt;br /&gt;
* मानवता प्रकाश की वह नदी है जो सीमित से असीम की ओर बहती है।  ~ खलील जिब्रान&lt;br /&gt;
* बीता कल आज की याद है, और आने वाला कल आज का स्वप्न।  ~ खलील जिब्रान&lt;br /&gt;
* दानशीलता हमारी क्षमता से अधिक देने में, और गौरव अपनी आवश्यकता से कम लेने में है।  ~ खलील गिब्रान&lt;br /&gt;
* किसी भी नींव का सबसे मज़बूत पत्थर सबसे निचला ही होता है।  ~ खलील ज़िब्रान (1883-1931), सीरियाई कवि&lt;br /&gt;
* किसी व्यक्ति के दिल-दिमाग को समझने के लिए इस बात को न देखें कि उसने अभी तक क्या प्राप्त किया है, अपितु इस बात को देखें कि वह क्या अभिलाषा रखता है।  ~ कैहलिल जिब्रान&lt;br /&gt;
* जिनसे प्रेम करते हैं, उन्हें जाने दें, वे यदि लौट आते हैं तो वे सदा के लिए आपके हैं। और अगर नहीं लौटते हैं तो वे कभी आपके थे ही नहीं।  ~ खलील ज़िब्रान (1883-1931), सीरियाई कवि&lt;br /&gt;
* आप अपने रहस्य यदि पवन पर खोल देते हैं तो वृक्षों में बात फैल जाने का दोष पवन पर मत मढ़ें।  ~ ख़लील जिब्रान (1883-1931), सीरियाई कवि एवं चित्रकार&lt;br /&gt;
* प्रेम के बिना जीवन उस वृक्ष की भांति है जो फूल तथा फलों से रहित है।  ~ काहलिल जिब्रान&lt;br /&gt;
* मित्रता कभी भी अवसर नहीं अपितु हमेशा एक मधुर उत्तरदायित्व होती है।  ~ कैहलिल गिब्रान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==शेख सादी (Sadi)==&lt;br /&gt;
* इंसान अगर लोभ को ठुकरा दे तो बादशाह से भी ऊंचा दर्जा हासिल कर सकता है, क्‍योंकि संतोष ही इंसान का माथा हमेशा ऊंचा रख सकता है।  ~ शेख सादी&lt;br /&gt;
* अज्ञानी आदमी के लिये खामोशी से बढ़कर कोई चीज़ नहीं, और अगर उसमें यह समझने की बुद्धि है तो वह अज्ञानी नहीं रहेगा।  ~ शेखी सादी&lt;br /&gt;
* वाणी मधुर हो तो सब कुछ वश में हो जाता है, अन्‍यथा सब शत्रु बन जाते हैं।  ~ शेख सादी&lt;br /&gt;
* वह आदमी वास्‍तव में बुद्धिमान है जो क्रोध में भी ग़लत बात मुंह से नहीं निकालता।  ~ शेख सादी&lt;br /&gt;
* लोभी को पूरा संसार मिल जाए तो भी वह, भूखा रहता है, लेकिन संतोषी का पेट, एक रोटी से ही भर जाता है।  ~ शेख सादी&lt;br /&gt;
* ग़रीबों के समान विनम्र अमीर और अमीरों के समान उदार ग़रीब ईश्वर के प्रिय पात्र होते हैं।  ~ शेख़ सादी &lt;br /&gt;
* घमंड करना जाहिलों का काम है।  ~ शेख सादी&lt;br /&gt;
* जो नसीहतें नहीं सुनता, उसे लानत-मलामत सुनने का सुख होता है।  ~ शेख़ सादी&lt;br /&gt;
* बुरे आदमी के साथ भी भलाई करनी चाहिए – कुत्ते को रोटी का एक टुकड़ा डालकर उसका मुंह बन्द करना ही अच्छा है।  ~ शेख सादी&lt;br /&gt;
* खुदा एक दरवाज़ा बन्द करने से पहले दूसरा खोल देता है, उसे प्रयत्न कर देखो।  ~ शेख सादी&lt;br /&gt;
* धैर्य रखें, सभी कार्य सरल होने से पहले कठिन ही दिखाई देते हैं।  ~ सादी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==थामस फुलर (Thomas Fuller) (1654 - 1734)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Thomas Fuller.jpg|थामस फुलर (Thomas Fuller)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* जो पाप में पड़ता है, वह मनुष्य है, जो उसमें पड़ने पर दुखी होता है, वह साधु है और जो उस पर अभिमान करता है, वह शैतान होता है।  ~ फुलर&lt;br /&gt;
* हमारी शक्ति हमारे निर्णय करने की क्षमता में निहित है।  ~ फुलर&lt;br /&gt;
* ज्ञान एक ख़ज़ाना है, लेकिन अभ्यास इसकी चाभी है।  ~ थामस फुलर&lt;br /&gt;
* जब तक रुग्णता का सामना नहीं करना पड़ता; तब तक स्वास्थ्य का महत्व समझ में नहीं आता है।  ~ डा. थॉमस फुल्लर&lt;br /&gt;
* प्रार्थनाः दिन की कुंजी तथा रात का ताला होती है।  ~ थॉमस फुल्लर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==डिज़रायली==&lt;br /&gt;
* अपनी अज्ञानता का अहसास होना ज्ञान की दिशा में एक बहुत बडा क़दम है।  ~ डिजरायली&lt;br /&gt;
* निराशा मूर्खता का परिणाम है।  ~ डिज़रायली&lt;br /&gt;
* धीरज प्रतिभा का आवश्यक अंग है।  ~ डिजरायली&lt;br /&gt;
* बुद्धिमानो की बुद्धिमता और बरसों का अनुभव सुभाषितों में संग्रह किया जा सकता है।  ~ आईजक दिसराली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सेनेका (Lucius Annaeus Seneca) (4? B.C. - 65 A.D.)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Lucius Annaeus Seneca.jpg|सेनेका (Lucius Annaeus Seneca)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* आप हर इंसान का चरित्र बता सकते हैं यदि आप देखें कि वह प्रशंसा से कैसे प्रभावित होता है।  ~ सेनेका&lt;br /&gt;
* जिस प्रकार से श्रम करने से शरीर मज़बूत होता है, उसी प्रकार से कठिनाईयों से मस्तिष्क सुदृढ़ होता है।  ~ सेनेका&lt;br /&gt;
* अगर एक व्यक्ति को मालूम ही नहीं कि उसे किस बंदरगाह की ओर जाना है, तो हवा की हर दिशा उसे अपने विरुद्ध ही प्रतीत होगी।  ~ सेनेका&lt;br /&gt;
* वह व्यक्ति ग़रीब नहीं है जिस के पास थोड़ा बहुत ही है। ग़रीब तो वह है जो ज़्यादा के लिए मरा जा रहा है।  ~ सैनेका, रोमन दार्शनिक&lt;br /&gt;
* जिस प्रकार से श्रम करने से शरीर मज़बूत होता है, उसी प्रकार से कठिनाईयों से मस्तिष्क सुदृढ़ होता है।  ~ सेनेका&lt;br /&gt;
* ऐसा नहीं है कि कार्य कठिन हैं इसलिए हमें हिम्मत नहीं करनी चाहिए, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम हिम्मत नहीं करते हैं इसलिए कार्य कठिन हो जाते हैं।  ~ सेनेका&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विलियम जेम्स (William James)==&lt;br /&gt;
* जीवन का उत्तम उपयोग है इसे ऐसा कुछ करने में बिताना जो इससे अधिक स्थायी हो।  ~ विलियम जेम्स&lt;br /&gt;
* अपने जीवन में परिवर्तन करने के लिए तत्काल कार्य करना आरम्भ करें, ऐसा शानदार ढ़ंग से करें, इसमें कोई अपवाद नहीं है।  ~ विलियम जेम्स&lt;br /&gt;
* जीवन का महानतम उपयोग इसे किन्हीं ऐसे अच्छे कार्यों पर व्यय करना है जो कि इसके जाने के बाद भी बने रहें।  ~ विलियम जेम्स&lt;br /&gt;
* मेरी पीढ़ी की महानतम खोज यह रही है कि मनुष्य अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन कर के अपने जीवन को बदल सकता है।  ~ विलियम जेम्स (1842-1910), अमरीकी दार्शनिक&lt;br /&gt;
* मानव अपनी सोच की आंतरिक प्रवृति को बदलकर अपने जीवन के बाह्य पहलूओं को बदल सकता है।  ~ विलिमय जेम्स&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==विलियम ऑर्थर वार्ड (William Arthur Ward)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:William Arthur Ward.jpg|विलियम ऑर्थर वार्ड (William Arthur Ward)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* मेरी चापलूसी करो, और मैं आप पर भरोसा नहीं करुंगा, मेरी आलोचना करो, और मैं आपको पसंद नहीं करुंगा। मेरी उपेक्षा करो, और मैं आपको माफ़ नहीं करुंगा, मुझे प्रोत्साहित करो, और मैं कभी आपको नहीं भूलूंगा।  ~ विलियम ऑर्थर वार्ड&lt;br /&gt;
* जब दूसरे व्यक्ति सोए हों, तो उस समय अध्ययन करें; उस समय कार्य करें जब दूसरे व्यक्ति अपने समय को नष्ट करते हैं; उस समय तैयारी करें जब दूसरे खेल रहे हों; और उस समय सपने देखें जब दूसरे केवल कामना ही कर रहे हों।  ~ विलियम आर्थर वार्ड&lt;br /&gt;
* कुशलतापूर्वक किसी की बात सुनना अकेलेपन, वाचालता और कंठशोथ का सब से बढ़िया इलाज है।  ~ विलियम आर्थर वार्ड&lt;br /&gt;
* अवसर सूर्योदय की तरह होते हैं, यदि आप ज़्यादा देर तक प्रतीक्षा करते हैं तो आप उन्हें गंवा बैठते हैं।  ~ विलियम आर्थर वार्ड&lt;br /&gt;
* निराशावादी व्यक्ति पवन के बारे में शिकायत करता है; आशावादी इसका रुख़ बदलने की आशा करता है; लेकिन यथार्थवादी पाल को अनुकूल बनाता है।  ~ विलियम आर्थर वार्ड&lt;br /&gt;
* प्रतिकूल परिस्थितियों से कुछ व्यक्ति टूट जाते हैं, जबकि कुछ अन्य व्यक्ति रिकार्ड तोड़ते हैं।  ~ विलियम ए. वार्ड&lt;br /&gt;
* उपलब्धि के चार कदम: उद्देश्यपूर्ण योजना बनाए, प्रार्थना के साथ तैयारी करें, सकारात्मक रूप से आगे बढ़े निरन्तर अपने लक्ष्य के लिए प्रयासरत रहें।  ~ विलियम ए. वार्ड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एनॉन==&lt;br /&gt;
* हम उन लोगों को प्रभावित करने के लिये महंगे ढंग से रहते हैं जो हम पर प्रभाव जमाने के लिये महंगे ढंग से रहते है।  ~ अनोन&lt;br /&gt;
* अपने काम पर मै सदा समय से 15 मिनट पहले पहुँचा हूँ और मेरी इसी आदत ने मुझे कामयाब व्यक्ति बना दिया है।  ~ एनॉन&lt;br /&gt;
* किसी व्यक्ति को एक मछली दे दो तो उसका पेट दिन भर के लिए भर जाएगा। उसे इंटरनेट चलाना सिखा दो तो वह हफ़्तों आपको परेशान नहीं करेगा।  ~ एनन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हैरी एस ट्रुमेन (Harry S. Truman) (1884 - 1972)==&lt;br /&gt;
* यदि आप इस बात की चिंता न करें कि आपके काम का श्रेय किसे मिलने वाला है तो आप आश्चर्यजनक कार्य कर सकते हैं।  ~ हैरी एस. ट्रूमेन&lt;br /&gt;
* यदि आप गर्मी सहन नहीं कर सकते तो रसोई के बाहर निकल जाईये।  ~ हैरी एस ट्रुमेन&lt;br /&gt;
* बच्चों को सीख देने का जो श्रेष्ठ तरीका मुझे पता चला है वह यह है कि बच्चों की चाह का पता लगाया जाए और फिर उन्हें वही करने की सलाह दी जाए।  ~ हैरी ट्रूमेन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नेपोलियन (Napoleon Hill)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Napoleon_Hill_young_portrait.jpg|नेपोलियन (Napoleon Hill)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* सही अवसर न मिलने पर क्षमता के, मायने बेहद सीमित हो जाते हैं।  ~ नेपोलियन&lt;br /&gt;
* जब तक आप न चाहें तब तक आपको, कोई भी ईर्ष्‍यालु, क्रोधी प्रतिशोधी या लालची नहीं बना सकता।  ~ नेपोलियन हिल&lt;br /&gt;
* अपने कार्य की योजना बनाएं तथा अपनी योजना पर कार्य करें।  ~ नेपोलियन हिल&lt;br /&gt;
* यदि आपने अपनी मनोवृतियों पर विजय प्राप्त नहीं की, तो मनोवृत्तियां आप पर विजय प्राप्त कर लेंगी।  ~ नेपोलियन हिल&lt;br /&gt;
* असफलता आपको महान कार्यों के लिये तैयार करने की प्रकृति की योजना है।  ~ नैपोलियन हिल&lt;br /&gt;
* जब किसी व्यक्ति द्वारा अपने लक्ष्य को इतनी गहराई से चाहा जाता है कि वह उसके लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिए तैयार होता है, तो उसका जीतना सुनिश्चित होता है।  ~ नेपोलियन हिल&lt;br /&gt;
* इच्छा सफलता का शुरुआती बिन्दु हैं, यह हमेशा याद दखें, जिस तरह छोटी आग से कम गर्माहट मिलती हैं उसी तरह कमज़ोर इच्छा से कमज़ोर परिणाम मिलते है।  ~ नेपोलियन हिल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==फ्रांसिस बेकन (Francis Bacon) (1561 - 1626)==&lt;br /&gt;
* बुरा व्‍यक्ति उस समय और भी बुरा हो जाता है जब वह अच्‍छा होने का ढोंग करता है।  ~ फ्रांसिस बेकन&lt;br /&gt;
* जो नए सुधारों पर अमल नहीं, करेगा वह नए खतरों को न्‍यौता देगा।  ~ फ्रांसिस बेकन&lt;br /&gt;
* बुद्धिमान व्‍यक्ति को जितने, अवसर मिलते हैं उससे अधिक वह स्‍वयं बनाता है।  ~ फ्रांसिस बेकन&lt;br /&gt;
* प्रतिशोध लेते समय मनुष्‍य अपने शत्रु के समान ही होता है, लेकिन उसकी उपेक्षा कर देने पर वह उससे बड़ा हो जाता है।  ~ फ्रांसिस बेकन&lt;br /&gt;
* हम स्‍वभाव के मुताबिक सोचते हैं, कायदे के मुताबिक बोलते हैं, रिवाज के मुताबिक आचरण करते हैं।  ~ फ्रांसिस बेकन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==थॉमस जैफर्सन (Thomas Jefferson) (1743 - 1826)==&lt;br /&gt;
* क्या आप जानना चाहते हैं कि आप कौन हैं? तो किसी से पूछिये मत। कार्य करना शुरू कर दें। आपका कार्य आपको परिभाषित एवं चित्रित कर देगा।  ~ थॉमस जेफर्सन&lt;br /&gt;
* विनम्र तो सबके साथ रहें, लेकिन घनिष्ठ कुछ एक के साथ ही।  ~ थॉमस जैफरसन&lt;br /&gt;
* बुद्धिमत्ता की पुस्तक में ईमानदारी पहला अध्याय है।  ~ थॉमस जैफर्सन&lt;br /&gt;
* ग़लती करने की बजाय देर करना कहीं अधिक अच्छा होता है।  ~ थॉमस जैफरसन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==फ़ोर्ब्स (Malcolm S. Forbes (1919 - 1990)==&lt;br /&gt;
* ख़ाली दिमाग को खुला दिमाग बना देना ही शिक्षा का उद्देश्य है।  ~ फ़ोर्ब्स&lt;br /&gt;
* कम्प्यूटर को प्रोग्राम करने के लिये संस्कृत सबसे सुविधाजनक भाषा है।  ~ फोर्ब्स पत्रिका (जुलाई, 1987)&lt;br /&gt;
* भूले नहीं कि जीवन का व्यवसाय व्यवसाय नहीं बल्कि जीवन है।  ~ बी सी फोर्ब्स&lt;br /&gt;
* यदि हम असफलता से शिक्षा प्राप्त करते हैं तो वह सफलता ही है।  ~ मैल्कम फोर्ब्स&lt;br /&gt;
* शिक्षा का ध्येय है एक ख़ाली दिमाग को खुले दिमाग में बदलना।  ~ मेल्कम फोर्ब्स&lt;br /&gt;
* हार का स्‍वाद मालूम हो तो जीत हमेशा मीठी लगती है।  ~ माल्‍कम फोर्बस&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जॉन रस्किन (John Ruskin) (1819 - 1900)==&lt;br /&gt;
* हम क्या सोचते हैं, क्या जानते हैं, और किसमें विश्वास करते हैं – अंततः ये बातें मायने नहीं रखतीं. हम क्या करते हैं वही महत्त्वपूर्ण है।  ~ जॉन रस्किन&lt;br /&gt;
* जब किसी कार्य में रुचि और उसे करने के हुनर का संगम हो, तो उत्कृष्टता स्वाभाविक है।  ~ जॉन रस्किन&lt;br /&gt;
* जब हम निर्माण करें, तो ऐसा सोच कर करें कि यह हमेशा हमेशा के लिए है।  ~ जॉन रस्किन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बिल कोस्बी (Bill Cosby)==&lt;br /&gt;
* मैं नहीं जानता कि सफलता की सीढी क्या है; पर असफला की सीढी है, हर किसी को प्रसन्न करने की चाह।  ~ बिल कोस्बी&lt;br /&gt;
* मुझे सफलता का उपाय नहीं मालूम लेकिन यह मालूम है कि सब को खुश करने का प्रयत्न असफलता का उपाय है।  ~ बिल कोस्बी&lt;br /&gt;
* सफल होने के लिए ज़रूरी है कि आप में सफलता की आस असफलता के डर से कहीं अधिक हो।  ~ बिल कोज़्बी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==सुकरात (Socrates) (469 - 399 BC)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Socrates.jpg|सुकरात (Socrates)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* हर वर्ष एक बुरी आदत को मूल से खोदकर, फेंका जाए तो कुछ ही वर्षों में बुरे से बुरा, व्‍यक्ति भला हो सकता है।  ~ सुकरात&lt;br /&gt;
* धन से अच्‍छे गुण नहीं मिलते, धन अच्‍छे गुणों से मिलता है।  ~ सुकरात&lt;br /&gt;
* निकम्मे लोग सिर्फ खाने पीने के लिए जीते हैं, लेकिन सार्थक जीवन वाले जीवित रहने के लिए ही खाते और पीते हैं।  ~ सुकरात&lt;br /&gt;
* जो मनुष्य अपने क्रोध को अपने वश में कर लेता है, वह दूसरों के क्रोध से (फलस्वरूप) स्वयमेव बच जाता है।  ~ सुकरात&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ओरिसन स्‍वेट मार्डन (Orison Swett Marden)==&lt;br /&gt;
* ऊंची से ऊंची चोटी पर पहुंचना मकसद हो तो अपना काम निचली सतह से शुरू करना चाहिए।  ~ स्‍वेट मार्डेन&lt;br /&gt;
* जो मनुष्‍य अपने मन का ग़ुलाम बना रहता है वह कभी नेता और प्रभावशाली पुरूष नहीं हो सकता।  ~ स्‍वेट मार्डन&lt;br /&gt;
* आशा और आत्‍मविश्‍वास से ही हमारी, शक्तियां जागृत होती हैं, इनसे हमारी, उत्‍पादन शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।  ~ स्‍वेट मार्डेन&lt;br /&gt;
* हमारी अधिकतर बाधाएँ पिघल जाएंगी अगर उनके सामने दुबकने के बजाय हम उनसे निडरतापूर्वक निपटने का मानस बनाएँ।  ~ ओरिसन स्वेट मार्डेन&lt;br /&gt;
* ऐसे सभी व्‍यक्ति जिन्‍होंने महान उपलब्धियां हासिल की हैं, वह महान स्‍वप्‍नदृष्‍टा भी होते हैं।  ~ ओरिसन स्‍वेट मार्डन&lt;br /&gt;
* अपनी शक्ति को छोटा न समझें, एक छोटी सी चिनगारी भी विशाल वन को जला कर राख कर सकती हैं।  ~ स्वेट मार्डन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==गेटे==&lt;br /&gt;
* जब कोई व्यक्ति ठीक काम करता है, तो उसे पता तक नहीं चलता कि वह क्या कर रहा है पर ग़लत काम करते समय उसे हर क्षण यह ख्याल रहता है कि वह जो कर रहा है, वह ग़लत है।  ~ गेटे&lt;br /&gt;
* इस संसार में सबसे सुखी वही व्‍यक्ति है जो अपने घर में शांति पाता है।  ~ गेटे&lt;br /&gt;
* सबसे अच्‍छी सरकार वही है जो हमें स्‍वयं अपने ऊपर शासन करना सिखाती है।  ~ गेटे&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==थियोडॉर रूज़वेल्ट (Theodore Roosevelt) (1858 - 1919)==&lt;br /&gt;
* अपनी आंखों को सितारों पर टिकाने से पहले अपने पैर ज़मीन में गड़ा लो।  ~ थियोडॉर रूज़वेल्ट&lt;br /&gt;
* आपसे जितना हो सके करें, वहीं जहां आप हैं और उनसे जो साधन आपके पास हैं।  ~ थियोडोर रूसवेल्ट&lt;br /&gt;
* लोगों के साथ सामंजस्य स्थापित कर पाना ही सफ़लता का एक अति महत्त्वपूर्ण सूत्र है।  ~ थियोडोर रूसवेल्ट&lt;br /&gt;
* वास्तविक कठिनाईयों को दूर किया जा सकता है; केवल कल्पनात्मक कठिनाईयां को ही पराजित नहीं किया जा सकता है।  ~ थियोडोर एन. वेल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जेम्स एलन (James Allen)==&lt;br /&gt;
* सुविचरों से सुफल उपजते हैं और कुविचारों से कुफल।  ~ जेम्स एलन&lt;br /&gt;
* उस मनुष्‍य के पास कौन बैठना चाहेगा, उस मनुष्‍य को कौन अपने पास बिठाना चाहेगा, जो हमेशा बारूद का ढेर बना घूमता है, और जिसका पता नहीं कि वह कब फट पड़े।  ~ जेम्‍स एलन&lt;br /&gt;
* लक्ष्‍मी को पाना है तो या तो उल्‍लू बनना होगा या प्रभु विष्‍णु, लक्ष्‍मी केवल इन्‍हीं दोनों के पास ही रहती है। एक की सवारी करती है और एक की सेवा। जितने अंश तक उल्‍लू या विष्‍णु के गुण तुम्‍हारे भीतर होंगे, उतने ही अंश तक लक्ष्‍मी तुम्‍हारे पास रहेगी।  ~ जेम्‍स एलन&lt;br /&gt;
* रेल के इंजन के पास खड़े होकर देखो, काम करने वाली भाप का स्‍वर कोई नहीं सुनता, केवल व्‍यर्थ जाने वाली भाप ही शोर मचाती है, जो ऊर्जा और शक्ति तुम्‍हारे भीतर उपयोग हो रही है वह गुप्‍त और अज्ञात रहती है, तुम जो शोर मचाते फिरते हो और उपद्रव करते हो यह बेकार जाने वाली बिना काम की ऊर्जा और शक्ति है।  ~ जेम्‍स एलन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==स्टीव जॉब्स (Steve Jobs)==&lt;br /&gt;
* गुणवत्ता की कसौटी बनें। कई लोग ऐसे वातावरण के अभ्यस्त नहीं होते जहां उत्कृष्टता अपेक्षित होती है।  ~ स्टीव जॉब्स&lt;br /&gt;
* मैं अपने जीवन को एक पेशा नहीं मानता, मैं कर्म में विश्वास रखता हूं, मैं परिस्थितियों से शिक्षा लेता हूं, यह पेशा या नौकरी नहीं है - यह तो जीवन का सार है।  ~ स्टीव जॉब्स, संस्थापक, एप्पल&lt;br /&gt;
* मुझे यकीन है कि सफल और असफल उद्यमियों में आधा फ़र्क़ तो केवल अध्यवसाय का ही है।  ~ स्टीव जॉब्स&lt;br /&gt;
* गुणवत्ता प्रचुरता से अधिक महत्त्वपूर्ण है, एक छक्का दो-दो रन बनाने से कहीं बेहतर है।  ~ स्टीव जॉब्स&lt;br /&gt;
* अभिकल्पना किसी यंत्र की बाहरी बनावट मात्र नहीं है, अभिकल्पना तो इसकी कार्यविधि का मूल है।  ~ स्टीव जॉब्स &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मदर टेरेसा (Mother Teresa) (1910 - 1997)==&lt;br /&gt;
* यदि आप सौ व्यक्तियों की सहायता नहीं कर सकते तो केवल एक की ही सहायता कर दें। - मदर टेरेसा&lt;br /&gt;
* भगवान यह अपेक्षा नहीं करते कि हम सफल हों, वे तो केवल इतना ही चाहते हैं कि हम प्रयास करें। - मदर टेरेसा&lt;br /&gt;
* मीठे बोल संक्षिप्त और बोलने में आसान हो सकते हैं, लेकिन उन की गूँज सचमुच अनंत होती है। - मां टेरेसा&lt;br /&gt;
* कल तो चला गया. आने वाले कल अभी आया नहीं है, हमारे पास केवल आज है, आईये शुरुआत करें।  ~ मदर टेरेसा&lt;br /&gt;
* मैं सफलता की प्रार्थना नहीं करती हूं, मैं विश्वास के लिए कहती हूं।  ~ मदर टेरेसा&lt;br /&gt;
* हम कभी नहीं जान पाएंगे कि एक छोटी सी मुस्कान कितना भला कर सकती है। - संत तरेसा&lt;br /&gt;
* छोटी छोटी बातों में विश्वास रखें, क्योंकि इन में ही आपकी शक्ति निहित है। - संत तरेसा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==मुहम्मद अली (Muhammad Ali)==&lt;br /&gt;
* आयु आपकी सोच में है। जितनी आप सोचते हैं उतनी ही आपकी उम्र है।  ~ मुहम्मद अली&lt;br /&gt;
* बच्चों को देखकर इच्छा होती है कि जीवन फिर से शुरू करें।  ~ मुहम्मद अली&lt;br /&gt;
* मैं अपने ट्रेनिंग सत्र के प्रत्येक मिनट से घृणा करता था, परंतु मैं कहता था – 'भागो मत, अभी तो भुगत लो, और फिर पूरी ज़िंदगी चैम्पियन की तरह जिओ'  ~ मुहम्मद अली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एलेनोर रुज़वेल्ट (Eleanor Roosevelt) (1884 - 1962)==&lt;br /&gt;
* आप प्रत्येक ऐसे अनुभव जिसमें आपको वस्तुत डर सामने दिखाई देता है, से बल, साहस तथा विश्वास अर्जित करते हैं, आपको ऐसे कार्य अवश्य करने चाहिए जिनके बारे में आप सोचते हैं कि आप उनको नहीं कर सकते हैं।  ~ एलेनोर रुज़वेल्ट&lt;br /&gt;
* भविष्य उनका है जो अपने सपनों की सुंदरता में यकीन करते हैं।  ~ एलेअनोर रूज़वेल्ट&lt;br /&gt;
* आपकी मर्जी के बिना कोई भी आपको तुच्छ होने का अहसास नहीं करवा सकता है।  ~ एलेयनोर रूज़वेल्ट&lt;br /&gt;
* महान मानस के लोग विचारों पर बात करते हैं, साधारण मानस के लोग घटनाक्रम की बात करते हैं, और निम्न स्तर के लोग दूसरों के बारे में बात करते हैं।  ~ एलेनोर रूसवेल्ट&lt;br /&gt;
* यदि मैं उदास महसूस करती हूं तो मैं काम पर चली जाती हूं, काम में व्यस्तता उदासी का उत्तम प्रतिकार है।  ~ एलेनोर रूजवेल्ट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==प्लूटार्क (Plutarch) (c. - 120)==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Plutarch.gif|प्लूटार्क (Plutarch)|thumb|150px]]&lt;br /&gt;
* वह व्यक्ति अच्छा कार्य निष्पादन करता है जो परिस्थितियों का ठीक से सामना करता है।  ~ प्लुटार्च&lt;br /&gt;
* कोई ग़लती न करना मनुष्य के बूते की बात नहीं है, लेकिन अपनी त्रुटियों और ग़लतियों से समझदार व्यक्ति भविष्य के लिए बुद्धिमत्ता अवश्य सीख लेते हैं।  ~ प्लूटार्क &lt;br /&gt;
* मुझे ऐसे मित्र की आवश्यकता नहीं जो मेरे साथ-साथ बदले और मेरी हां में हां भरे; ऐसा तो मेरी परछाई कहीं बेहतर कर लेती है।  ~ प्लूटार्क&lt;br /&gt;
* क्रोध बुद्धि को घर से बाहर, निकाल देता है और दरवाज़े पर, चटकनी लगा देता है।  ~ प्‍लूटार्क&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==थॉमस एडिसन (Thomas Edison)==&lt;br /&gt;
* मैं यह नहीं कहूँगा कि मैं 1000 बार असफल हुआ, मैं यह कहूँगा कि ऐसे 1000 रास्ते हैं जो आपको असफलता तक पहुँचाते हैं।  ~ थॉमस एडिसन&lt;br /&gt;
* अगर हम अपने सामर्थ्यानुसार कर्म करें, तो हम अपने आप को अचंभित कर डालेंगें।  ~ थॉमस एडिसन&lt;br /&gt;
* जीवन में अनेक विफलताएं केवल इसलिए होती हैं क्योंकि लोगों को यह आभास नहीं होता है कि जब उन्होंने प्रयास बन्द कर दिए तो उस समय वह सफलता के कितने क़रीब थे।  ~ थोमस एडिसन &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बिल गेट्स (Bill Gates)==&lt;br /&gt;
* चाहे आप में कितनी भी योग्यता क्यों न हो, केवल एकाग्रचित्त होकर ही आप महान कार्य कर सकते हैं।  ~ बिल गेट्स &lt;br /&gt;
* टीवी वास्तविकता से परे है, वास्तविक जीवन में लोगों को फुरसत छोड़ कर नौकरी और कारोबार करना होता है।  ~ बिल गेट्स &lt;br /&gt;
* सफलता की खुशियां मनाना ठीक है, लेकिन असफलताओं से सबक सीखना अधिक महत्‍वपूर्ण है।  ~ बिल गेट्स&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हेनरी फ़ोर्ड (Henry Ford) (1863 - 1947)==&lt;br /&gt;
* ग़लतियाँ मत ढूंढो, हल ढूंढो।  ~ हेनरी फ़ोर्ड, कार निर्माता&lt;br /&gt;
* अगर सफलता का कोई राज़ है, तो वह दूसरे के दृष्टिकोण को समझने और चीजों को उसके दृष्टिकोण से अपने दृष्टिकोण जितने अच्छे से देख पाने की क्षमता में निहित है।  ~ हेनरी फोर्ड&lt;br /&gt;
* असफलता मात्र फिर से कार्यारम्भ करने का अवसर होती है, इस बार और अधिक बुद्धिमत्ता से।  ~ हेनरी फोर्ड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==हेनरी डेविड थोरो (Henry David Thoreau) (1817 - 1862)==&lt;br /&gt;
* व्यस्त रहना काफ़ी नहीं है, व्यस्त तो चींटियाँ भी रहती हैं। सवाल यह है - हम किस लिए व्यस्त हैं?  ~ हेनरी डेविड थोरु&lt;br /&gt;
* प्रातःकाल का भ्रमण पूरे दिन के लिए वरदान होता है।  ~ हेनरी डेविड थोरो (1817-1862), लेखक&lt;br /&gt;
* यदि आपने हवाई किलों का निर्माण किया है तो आपका कार्य बेकार नहीं जाना चाहिए, हवाई किले हवा में ही बनाए जाते हैं, अब, उनके नीचे नींव रखने का कार्य करें।  ~ हैनरी डेविड थोरेयू&lt;br /&gt;
* अन्याय चाहे अपनें घर में होता हो या बाहर, उसका विरोध करने से नहीं डरना चाहिए और कुछ न कर सको तो भी बुराई के साथ सहयोग तो करना ही नहीं चाहिए!~ हेनरी डेविड थोरु&lt;br /&gt;
* हेनरी डेविड थोरु की [[प्रार्थना]]- ''हे प्रभो ! मुझे इतनी शक्ति दे दो कि मैं अपने को अपनी करनी से कभी निराश न करूँ । मेरे हस्त, मेरी द्रढ़ता, श्रद्धा का कभी अनादर न करें । मेरा प्रेम मेरे मित्रों के प्रेम से घटिया न रहे । मेरी वाणी जितना कहे-- जीवन उससे ज्यादा करता चले । तेरी मंगलमय स्रष्टि का हर अमंगल पचा सकूँ, इतनी शक्ति मुझ में बनी रहे ।''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==डब्ल्यू सोमरसेट मोघम (W. Somerset Maugham) (1874 - 1965)==&lt;br /&gt;
* लोग आपको समालोचना के लिए पूछ भले ही लें, लेकिन चाहते वे केवल प्रशंसा ही हैं।  ~ डब्लू सोमरसेट मोघेम&lt;br /&gt;
* जब आप अपने मित्रों का चयन करते हैं तो चरित्र के स्थान पर व्यक्तित्व को न चुनें।  ~ डब्ल्यू सोमरसेट मोघम&lt;br /&gt;
* जीवन के बारे में एक मजेदार बात यह है कि यदि आप सर्वश्रेष्ठ वस्तु से कुछ भी कम स्वीकार करने से इंकार करते हैं तो अकसर आप उसको प्राप्त कर ही लेते हैं।  ~ डब्ल्यू. सोमरसेट मोघम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==ज़िग ज़िगलर (Zig Zigler)==&lt;br /&gt;
* लोग अक्सर कहते हैं कि प्रेरक विचारों से कुछ नहीं होता। हाँ भाई, वैसे तो नहाने से भी कुछ नहीं होता, तभी तो हम इसे रोज़ करने की सलाह देते हैं।  ~ ज़िग ज़िगलर&lt;br /&gt;
* एकाग्र-चिन्तन वांछित फल देता है।  ~ जिग जिग्लर&lt;br /&gt;
* जीतने का इतना महत्व नहीं है जितना की जीतने के लिए प्रयास करने का महत्व होता है।  ~ जिग जिगलार&lt;br /&gt;
* आपकी उपलब्धियों का निर्धारण आपकी प्रवृति से नहीं अपितु आपके रवैय्ये से होता है।  ~ जिग जिगलर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जॉन बेइज़ (Joan Baez) (1941 - )==&lt;br /&gt;
* जब तक आप ढूंढते रहेंगे, समाधान मिलते रहेंगे।  ~ जॉन बेज&lt;br /&gt;
* निराशा को काम में व्यस्त रहकर दूर भगाया जा सकता है।  ~ जॉन बेइज़&lt;br /&gt;
* आपको यह चुनने का अवसर नहीं मिलता है कि आप किस प्रकार से अथवा कब मरेंगे, आप केवल इतना ही निर्णय कर सकते हैं कि आप किस प्रकार से ज़िंदगी को ज़ीने जा रहे हैं।  ~ जॉन बेइज़&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==एंथनी राबिन्स (Anthony Robbins)==&lt;br /&gt;
* समस्त सफलताएं कर्म की नींव पर आधारित होती हैं।  ~ एंथनी राबिन्स&lt;br /&gt;
* मुझे काफ़ी समय पहले ही पता लग गया था कि यदि मैं लोगों की उनकी चाहतों को पूरा करने में सहायता करता हूं तो मुझे हमेशा वह सब मिल जाएगा जो मैं चाहता था और मुझे कभी भी चिंता नहीं करनी पड़ेगी।  ~ एंथनी राबिन्स&lt;br /&gt;
* आप हमेशा परिस्थितियों को नियंत्रित, नहीं कर सकते, लेकिन आप खुद को ज़रूर नियंत्रित कर सकते हैं।  ~ एंथनी रोबिन्‍स&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वाल्ट डिज़्नी (Walt Disney) (1901 - 1966)==&lt;br /&gt;
* यदि आप किसी चीज़ का सपना देख सकते हैं, तो आप उसे प्राप्त कर सकते हैं।  ~ वाल्ट डिज़नी&lt;br /&gt;
* जब हम किसी नई परियोजना पर विचार करते हैं तो हम बड़े गौर से उसका अध्ययन करते हैं - केवल सतह मात्र का नहीं, बल्कि उसके हर एक पहलू का।  ~ वाल्ट डिज़्नी&lt;br /&gt;
* हम आगे बढ़ते हैं, नए रास्ते बनाते हैं, और नई योजनाएं बनाते हैं, क्योंकि हम जिज्ञासु है और जिज्ञासा हमें नई राहों पर ले जाती है।  ~ वाल्ट डिज़्नी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==नॉर्मन विंसेंट पील (Norman Vincent Peale) (1898 - 1993)==&lt;br /&gt;
* एक मूल नियम है कि समान विचारधारा के व्यक्ति एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं, नकारात्मक सोच सुनिश्चित रुप से नकारात्मक परिणामो को आकर्षित करती है, इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति आशा और विश्वास के साथ सोचने को आदत ही बना लेता है तो उसकी सकारात्मक सोच से सृजनात्मक शक्तियों सक्रिय हो जाती हैं- और सफलता उससे दूर जाने की बजाय उसी ओर चलने लगती है।  ~ नार्मन विंसेन्ट पीएले&lt;br /&gt;
* आप अपना सोच बदल दीजिए, आप की दुनिया बदल जाएगी।  ~ नॉर्मन विंसेंट पील, अमरीकी पादरी (1898-1993)&lt;br /&gt;
* जीवन में खुशी का अर्थ लड़ाइयां लड़ना नहीं, बल्कि उन से बचना है। कुशलतापूर्वक पीछे हटना भी अपने आप में एक जीत है।  ~ नॉरमन विंसेंट पील (1896-1993)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==डेनिस वेटले==&lt;br /&gt;
* जीवन में दो मूल विकल्‍प होते हैं, स्थितियों को उसी रूप में स्‍वीकार करना जैसी वे हैं या उन्‍हें, बदलने का उत्‍तरदायित्‍व स्‍वीकार करना।  ~ डेनिस वेटले&lt;br /&gt;
* समय और स्‍वास्‍थ्‍य दो बहुमूल्‍य संपत्तियां हैं, जिनकी पहचान तथा मूल्‍य हम उस समय तक नहीं समझते जब तक उनका नाश नहीं हो जाता।  ~ डेनिस वेटले&lt;br /&gt;
* यदि आप यह मानते हैं कि आप कर सकते हैं, तो संभवतः आप कर सकते हैं, यदि यह सोचते हैं कि आप नहीं कर सकते, तो आप सुनिश्चित रुप से नहीं कर सकते, विश्वास वह स्विच है जो आपको आगे बढ़ाता है।  ~ डेनिस वेटले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==वोल्टेयर (Voltaire [Francois Marie Arouet]) (1694 - 1778)==&lt;br /&gt;
* हो सकता है कि मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊँ, परन्तु विचार प्रकट करने के आपके अधिकार की रक्षा करूँगा।  ~ वाल्तेयर&lt;br /&gt;
* किसी निर्दोष को दंडित करने से बेहतर है एक दोषी व्यक्ति को बख़्श देने का जोख़िम उठाना।  ~ वाल्तेयर (1694 - 1778)&lt;br /&gt;
* सत्य से प्यार करें और ग़लती को क्षमा कर दें।  ~ वोल्टेयर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जिम रॉन==&lt;br /&gt;
* प्रेरणा कार्य आरम्भ करने में सहायता करती है, आदत कार्य को जारी रखने में सहायता करती है।  ~ जिम रयून&lt;br /&gt;
* अनुशासन, लक्ष्यों और उपलब्धि के बीच का सेतु है।  ~ जिम रॉन&lt;br /&gt;
* औपचारिक शिक्षा आपको जीविकोपार्जन के लिए उपयुक्त बना देती है; स्व शिक्षा (अनुभव) आपका भाग्य बनाती है।  ~ जिन रॉन&lt;br /&gt;
* जीवन हमें जो ताश के पत्ते देता हैं, उन्हे हर खिलाड़ी को स्वीकार करना पड़ता हैं, लेकिन जब पत्ते हाथ में आ जावे तो खिलाड़ी को यह तय करना होता हैं कि वह उन पत्तों को किस तरह खेलें, ताकि वह बाज़ी जीत सके।  ~ वाल्तेयर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==अन्य==&lt;br /&gt;
* अपना जीवन ऐसे जिये कि आपके बच्चे अपने बच्चों से कह सकें कि आप न केवल किसी प्रशंसनीय निमित्त के समर्थक थे - आप उसका पालन भी करते थे।  ~ डेन जाद्रा&lt;br /&gt;
* रोष एक बोझ है जो आपकी सफलता के साथ असंगत है। क्षमा करने में अव्वल रहें; और अपने आप को सबसे पहले क्षमा करें।  ~ डेन जाड्रा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* प्रत्येक उतकृष्ट कार्य पहले पहल असम्भव होता है।  ~ थॉमस कार्लेले (Thomas Carlyle) (1795 - 1881)&lt;br /&gt;
* अंतर्दृष्टि के बिना ही काम करने से अधिक भयानक दूसरी चीज़ नहीं है।  ~ थामस कार्लाइल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;चार्ली चेपलिन (Charlie Chaplin) (1889 - 1977)&lt;br /&gt;
* मेरे जीवन में कईं कठिनाईयाँ आई है, मगर मेरे होठों को कभी भी उसकी जानकारी नहीं थी क्यूंकि वह हमेशा हंसते ही रहते है।  ~ चार्ली चेपलिन&lt;br /&gt;
* क्लोज़-अप में जीवन एक त्रासदी (ट्रेजेडी) है, तो लंबे शॉट में प्रहसन (कॉमेडी)।  ~ चार्ली चेपलिन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* कठिन परिश्रम से भविष्य सुधरता है। आलस्य से वर्तमान।  ~ स्टीवन राइट&lt;br /&gt;
* आप को सब कुछ नहीं मिल सकता| आप इसे रखेंगे कहां?  ~ स्टीवन राइट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ज्ञान की अपेक्षा अज्ञान ज़्यादा आत्मविश्वास पैदा करता है।  ~ चार्ल्स डार्विन&lt;br /&gt;
* ऐसा व्यक्ति जो एक घंटे का समय बरबाद करता है, उसने जीवन के मूल्य को समझा ही नहीं है।  ~ चार्ल्स डारविन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* जो सब की प्रशंसा करता है, वह किसी की प्रशंसा नहीं करता।  ~ सैमुअल जॉनसन&lt;br /&gt;
* परस्पर आदान-प्रदान के बिना समाज में जीवन का निर्वाह संभव नहीं है।  ~ सेमुअल जॉन्सन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* कभी संदेह न करें कि विचारशील नागरिकों का छोटा समूह दुनिया बदल सकता है। वास्तव में, कभी कुछ बदला है तो ऐसे ही।  ~ माग्रेट मीड&lt;br /&gt;
* मनुष्य की सबसे शुरुआती आवश्यकताओं में एक है किसी ऐसे की ज़रूरत जो आपके रात को घर न लौटने पर चिंतित हो कि आप कहाँ हैं।  ~ माग्रेट मीड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* आशा वह शक्ति है जो उन परिस्थितियों में भी हमें प्रसन्न बनाए रखती है जिनके बारे में हम जानते हैं कि वे ख़राब हैं।  ~ जी. के. चेस्टर्टन&lt;br /&gt;
* इस धरा पर जैसा कोई विषय नहीं जो अरुचिकर हो; यदि ऐसा कुछ है तो वह एक बेसरोकार व्यक्ति ही हो सकता है।  ~ जी. के. चेस्टरटन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* सफलता का कोई रहस्य नहीं हैं, यह तैयारी, कड़ी मेहनत और असफलता से सीखने का ही परिणाम होता है।  ~ जन. कोलिन एल. पावेल&lt;br /&gt;
* हम जो हैं वह हमें ईश्वर की देन है, हम जो बनते हैं वह परमेश्वर को हमारी देन है।  ~ एलानर पॉवेल&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* यदि आप बार बार नहीं गिर रहे हैं तो इसका अर्थ है कि आप कुछ नया नहीं कर रहे हैं।  ~ वुडी एलन&lt;br /&gt;
* यदि बार-बार असफल नहीं हो रहे हैं तो इसका अर्थ है कि आप कुछ आविष्कारक काम भी नहीं कर रहे हैं।  ~ वुडी एल्लेन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* जो व्यक्ति किसी तारे से बंधा होता है वह पीछे नहीं मुड़ता।  ~ लेओनार्दो दा विंची (1452-1519), इतालवी कलाकार, संगीतकार एवं वैज्ञानिक&lt;br /&gt;
* सीखने से मस्तिष्क कभी नहीं थकता है।  ~ लियोनार्डो दा विंची&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* यदि आपको पहली बार में सफलता नहीं मिलती है, तो फिर से कड़ी मेहनत करें।  ~ विलियम फैदर (William Feather)&lt;br /&gt;
* सफलता का एक ही सूत्र है और वह जब अन्य हिम्मत हार चुके हों तो भी आप डटे रहते हैं।  ~ विलियम फैदर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* हम सभी रोज़ कुछ-न-कुछ सीखते हैं। और ज़्यादातर हम यही सीखते हैं कि पिछले दिन हमने जो सीखा था वह ग़लत था।  ~ बिल वौगेन&lt;br /&gt;
* आकार का इतना अधिक महत्व नहीं होता है, व्हेल मछली का अस्तित्व खतरे में है जबकि चींटी एक सहज जीवन जी रही है।  ~ बिल वाघन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* अपने विचारों पर ध्यान दो, वे शब्द बन जाते हैं। अपने शब्दों पर ध्यान दो, वे क्रिया बन जाते हैं। अपनी क्रियाओं पर ध्यान दो, वे आदत बन जाती हैं। अपनी आदतों पर ध्यान दो, वे तुम्हारा चरित्र बनाती हैं। अपने चरित्र पर ध्यान दो, वह तुम्हारी नियति का निर्माण करता है।  ~ लाओ-त्जु (Lao-Tzu)&lt;br /&gt;
* हज़ार मील का सफर भी एक क़दम से ही आरंभ होता है।  ~ लाओ त्ज़ु&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* अपने शत्रुओं को सदैव क्षमा कर दो, वे और किसी बात से इससे ज़्यादा नहीं चिढ़ते।  ~ ऑस्कर वाइल्ड&lt;br /&gt;
* जीवन का लक्ष्य है आत्मविकास। अपने स्वभाव को पूर्णतः जानने के लिऐ ही हम इस दुनिया में है।  ~ ऑस्कर वाइल्ड&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ना कहने का साहस रखें, सच्चाई का सामना करने का साहस रखें, सही कार्य करें क्योंकि यह सही है, यह जीवन को सत्यनिष्ठा से जीने की जादुई चाबियां हैं।  ~ डब्ल्यू क्लेमैन्ट स्टोन&lt;br /&gt;
* जब हम अपने विचारों को सही दिशा निर्देशन प्रदान करते हैं, तो हम अपनी भावनाओं को नियंत्रित कर सकते हैं।  ~ डब्ल्यू. क्लेमेंट स्टोन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;कार्ल सैंडबर्ग (Carl Sandburg) (1878 - 1967)&lt;br /&gt;
* कोई सपना देखे बिना कुछ नहीं होता।  ~ कार्ल सैंडबर्ग (1878 - 1967), कवि&lt;br /&gt;
* नन्हे शिशु के जन्म का अर्थ है कि भगवान यह चाहते हैं कि यह दुनिया बनी रहे।  ~ कार्ल सैन्बर्ग&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* पठन किसी को सम्पूर्ण आदमी बनाता है, वार्तालाप उसे एक तैयार आदमी बनाता है, लेकिन लेखन उसे एक अति शुद्ध आदमी बनाता है।  ~ बेकन &lt;br /&gt;
* मौन निद्रा के सदृश है। यह ज्ञान में नयी स्फूर्ति पैदा करता है।  ~ बेकन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;जोसेफ एडिशन (Joseph Addison) (1672 - 1719)&lt;br /&gt;
* अध्ययन हमें आनन्द तो प्रदान करता ही है, अलंकृत भी करता है और योग्य भी बनाता है, मस्तिष्क के लिये अध्ययन की उतनी ही आवश्यकता है जितनी शरीर के लिये व्यायाम की।  ~ जोसेफ एडिशन&lt;br /&gt;
* पढने से सस्ता कोई मनोरंजन नहीं; न ही कोई खुशी, उतनी स्थायी।  ~ जोसेफ एडिशन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* सारी चीजों के बारे मे कुछ-कुछ और कुछेक के बारे मे सब कुछ सीखने कीकोशिश करनी चाहिये।  ~ थामस ह. हक्सले&lt;br /&gt;
* जीवन के आरम्भ में ही कुछ असफलताएँ मिल जाने का बहुत अधिक व्यावहारिक महत्व है।  ~ हक्सले&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* साहस और दृढ़ निश्चय जादुई तावीज़ हैं जिनके आगे कठिनाईयां दूर हो जाती हैं और बाधाएं उड़न-छू हो जाती है।  ~ जॉन क्विंसी एडम्स&lt;br /&gt;
* सिद्धांत न त्यागें, चाहे ऐसा करने वाले आप अकेले ही क्यों न हों।  ~ जॉन एडम्स&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* अपने प्रत्येक दिन को सर्वोत्कृष्ट बनाएं।  ~ जॉन वुडन&lt;br /&gt;
* अपने सम्मान की बजाय अपने चरित्र के प्रति अधिक गम्भीर रहें, आपका चरित्र ही यह बताता है कि आप वास्तव में क्या हैं जबकि आपका सम्मान केवल यही दर्शाता है कि दूसरे आपके बारे में क्या सोचते हैं।  ~ जॉन वुडन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* विवाह करने से पहले मेरे पास बच्चों को पालने के छः सिद्धांत थे, अब मेरे पास छः बच्चे हैं पर सिद्धांत एक भी नहीं।  ~ जॉन विल्मोट&lt;br /&gt;
* जब तक उम्मीद की जगह अफ़सोस नहीं ले लेता, तब तक इंसान वृद्ध नहीं होता।  ~ जॉन बैरिमोर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* जिन्‍दगी वैसी नहीं है जैसी आप इसके लिये कामना करते हैं, यह तो वैसी बन जाती है, जैसा आप इसे बनाते हैं।  ~ एंथनी रयान&lt;br /&gt;
* जीवन वह नहीं है जिसकी आप चाहत रखते हैं, बल्कि वह तो वैसा बन जाता है जैसा आप इसे बनाते हैं।  ~ एंथनी रयान&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तुएं वस्तुएं नहीं होती।  ~ एंथनी डी'एंजेलो &lt;br /&gt;
* सफल होने के लिए आपको असफलता का स्वाद अवश्य चखना चाहिए, ताकि आपको यह पता चल सके कि अगली बार क्या नहीं करना है।  ~ एंथनी जे. डीएंजेलो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* प्रत्येक समस्या अपने साथ आपके लिए एक उपहार लेकर आती है।  ~ रिचर्ड बैक&lt;br /&gt;
* वह रिश्ता जो आपके परिवार को वास्तव में बाँधता है, वह ख़ून का नहीं है, बल्कि एक दूसरे के जीवन के प्रति आदर और खुशी का रिश्ता होता है।  ~ रिचर्ड बैक&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* आप जितना कम बोलेंगे, आप की उतनी ही सुनी जाएगी।  ~ एबिगैल वैन ब्यूरेन&lt;br /&gt;
* अकेलापन निर्धनता की पराकाष्ठा है।  ~ एबिगैल वैन ब्यूरेन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* प्रेरणा अंतर्मन से उत्पन्न होने वाली आग है, यदि आपके भीतर इस आग को जलाने का प्रयास किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जाता है तो इस बात की संभावना है कि यह थोड़ी ही देर जलेगी।  ~ स्टीफन आर. कोवे&lt;br /&gt;
* अपनी कल्पना को जीवन का मार्गदर्शक बनाएं, अपने अतीत को नहीं।  ~ स्टीफन कोवि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* हर सुबह जब मैं अपनी आंखे खोलता हूं तो अपने आप से कहता हूं कि आज मुझमें स्वयं को खुश या उदास रखने का सामर्थ्य है न कि घटनाओं में, मैं इस बात को चुन सकता हूं कि यह क्या होगी, कल तो जा चुका है, कल अभी आया नहीं है, मेरे पास केवल एक दिन है, आज तथा मैं दिन भर प्रसन्न रहूंगा।  ~ ग्रोचो मार्क्स&lt;br /&gt;
* मुझे टीवी बहुत शिक्षाप्रद लगता है। जब भी कोई टीवी चलाता है, तो मैं दूसरे कमरे में जाता हूँ और किताब पढ़ता हूँ।  ~ ग्रौचो मार्क्स&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* ईमानदारी किसी कायदे क़ानून की मोहताज़ नहीं होती।  ~ आल्बेर कामू (1913-1960), 1957 में साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता&lt;br /&gt;
* यह एक प्रकार का आध्यात्मिक दंभ है जिसमें लोगों को लगता है कि वे धन के बिना सुखी रह सकते हैं।  ~ एल्बर्ट कामू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* कोई भी व्यक्ति सेब के बीजों की गिनती कर सकता है, लेकिन बीज में सेबों की गिनती केवल भगवान ही कर सकते हैं।  ~ राबर्ट एच. शुलर&lt;br /&gt;
* असफलता का मतलब यह नहीं कि आप असफल हैं, इसका मतलब सिर्फ इतना है कि आप अब तक सफल नहीं हो पाएँ हैं।  ~ रोबर्ट शुलर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* नेतृत्व का रहस्य है, आगे-आगे सोचने की कला।  ~ मैरी पार्कर फोलेट&lt;br /&gt;
* प्रबंधन अन्य लोगों के माध्यम से काम करवाने की कला है।  ~ मैरी पार्कर फोल्लेट्ट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* प्रत्येक बच्चा एक कलाकार होता है, समस्या यह है कि युवा होने पर कलाकार कैसे बने रहा जाए।  ~ पाबलो पिकासो&lt;br /&gt;
* काम समस्त सफलता की आधारभूत नींव होता है।  ~ पाब्लो पिकासो&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* अगर आप लोगों के साथ अच्छा बर्ताव करेंगे, तो वे भी आप के साथ अच्छा बर्ताव करेंगे - कम से कम 90% वक़्त।  ~ फ्रेंकलिन डी रूसवेल्ट&lt;br /&gt;
* एक चीज़ जिससे डरा जाना चाहिए वह डर है।  ~ फ्रेंकलिन डी. रुज़वेल्ट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* बिना उचित अवसर के योग्‍यता किसी काम की, नहीं है भले आप में लाख गुण हों लेकिन यदि, अवसर नहीं मिला तो योग्‍यता व्‍यर्थ है।  ~ नेपोलियन बोनापार्ट&lt;br /&gt;
* अशिक्षित रहने से पैदा न होना अच्‍छा है, क्‍योंकि अज्ञान सब बुराईयों का मूल हैं।  ~ नेपोलियन बोनापार्ट&lt;br /&gt;
* सच्ची से सच्ची और अच्छी से अच्छी चतुराई दृढ संकल्प है।  ~ नेपोलियन बोनापार्ट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* यदि आप बार-बार शिकायत नहीं करते हैं तो आप किसी भी कठिनाई को दूर कर सकते हैं।  ~ बर्नार्ड एम. बारूच&lt;br /&gt;
* अधिकांश सफल व्यक्ति जिन्हें मैं जानता हूं वे ऐसे व्यक्ति हैं जो बोलते कम और सुनते ज़्यादा हैं।  ~ बर्नार्ड एम. बारूच&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* निष्क्रियता से संदेह और डर की उत्पत्ति होती है, क्रियाशीलता से विश्वास और साहस का सृजन होता है, यदि आप डर पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं, तो चुपचाप घर पर बैठ कर इसके बारे में विचार न करें, बाहर निकले और व्यस्त रहें।  ~ डेल कार्नेगी&lt;br /&gt;
* इस तरह से कार्य करें जैसे कि आप पहले से ही खुश हैं तथा इसके परिणामस्वरुप आप खुशी प्राप्त कर लेंगे।  ~ डेल कार्नेज&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* गरीब वह है जिसकी अभिलाषायें बढी हुई हैं।  ~ डेनियल&lt;br /&gt;
* कोई छोटी-छोटी योजनाएं न बनाएं; उनमें मनुष्य को प्रेरित करने का कोई जादु नहीं समाया होता, बड़ी योजनाएं बनाएं, उच्च आशा रखें और काम करें।  ~ डैनियल एच. बर्नहम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
* मैंने सीखा है कि लोग भूल जाते हैं कि आपने क्या कहा था, लोग भूल जाते हैं कि आपने क्या किया था, लेकिन लोग कभी नहीं भूलते कि आपने उनके साथ कैसा बर्ताव किया था।  ~ माया एंजेलो&lt;br /&gt;
* हमारी नित्य की दिनचर्या में हम भूल जाते हैं कि हमारा जीवन तो एक अविरत अद्भुत अनुभव है।  ~ माया एंजेलू&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार= |प्रारम्भिक= |माध्यमिक=माध्यमिक1 |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{अनमोल वचन}}&lt;br /&gt;
[[Category:अनमोल वचन]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A4%AF_%E0%A4%85%E0%A4%B5%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A4%BE_%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A5%8B%E0%A4%B2%E0%A4%A8&amp;diff=528841</id>
		<title>सविनय अवज्ञा आन्दोलन</title>
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		<updated>2015-05-25T15:33:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=MKGandhi.gif&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
|विवरण= [[ब्रिटिश साम्राज्य|ब्रिटिश साम्राज्यवाद]] के विरुद्ध [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] द्वारा चलाये गए जन आन्दोलन में से एक था।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=शुरुआत&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[6 अप्रैल]], [[1930]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=उद्देश्य &lt;br /&gt;
|पाठ 2=कुछ विशिष्ट प्रकार के ग़ैर-क़ानूनी कार्य सामूहिक रूप से करके ब्रिटिश सरकार को झुका देना था।&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3=प्रभाव&lt;br /&gt;
|पाठ 3=ब्रिटिश सरकार ने आन्दोलन को दबाने के लिए सख़्त क़दम उठाये और [[महात्मा गाँधी|गांधी जी]] सहित अनेक कांग्रेसी नेताओं व उनके समर्थकों को जेल में डाल दिया। आन्दोलनकारियों और सरकारी सिपाहियों के बीच जगह-जगह ज़बर्दस्त संघर्ष हुए&lt;br /&gt;
|शीर्षक 4=&lt;br /&gt;
|पाठ 4=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 5=&lt;br /&gt;
|पाठ 5=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 6=&lt;br /&gt;
|पाठ 6=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 7=&lt;br /&gt;
|पाठ 7=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 8=&lt;br /&gt;
|पाठ 8=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 9=&lt;br /&gt;
|पाठ 9=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 10=&lt;br /&gt;
|पाठ 10=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=इस आंदोलन ने ब्रिटिश सरकार को यह दिखा दिया कि [[भारत]] की जनता अब उसकी सत्ता को ठुकराने और उसकी अवज्ञा के लिए कमर कस चुकी है और उस पर काबू पाना अब मुश्किल है।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''सविनय अवज्ञा आन्दोलन''', [[ब्रिटिश साम्राज्य|ब्रिटिश साम्राज्यवाद]] के विरुद्ध [[भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस]] द्वारा चलाये गए जन आन्दोलन में से एक था। [[1929]] ई. तक [[भारत]] को ब्रिटेन के इरादे पर शक़ होने लगा कि वह [[औपनिवेशिक स्वराज्य]] प्रदान करने की अपनी घोषणा पर अमल करेगा कि नहीं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने [[लाहौर]] अधिवेशन (1929 ई.) में घोषणा कर दी कि उसका लक्ष्य भारत के लिए पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना है। [[महात्मा गांधी]] ने अपनी इस माँग पर ज़ोर देने के लिए [[6 अप्रैल]], [[1930]] ई. को सविनय अविज्ञा आन्दोलन छेड़ा। जिसका उद्देश्य कुछ विशिष्ट प्रकार के ग़ैर-क़ानूनी कार्य सामूहिक रूप से करके ब्रिटिश सरकार को झुका देना था।&lt;br /&gt;
{{seealso|असहयोग आन्दोलन की प्रेरणा -महात्मा गाँधी}}&lt;br /&gt;
==सविनय अवज्ञा आन्दोलन का कार्यक्रम==&lt;br /&gt;
सविनय अवज्ञा आन्दोलन के अंतर्गत चलाये जाने वाले कार्यक्रम निम्नलिखित थे-&lt;br /&gt;
*नमक क़ानून का उल्लघंन कर स्वयं द्वारा नमक बनाया जाए।&lt;br /&gt;
*सरकारी सेवाओं, शिक्षा केन्द्रों एवं उपाधियों का बहिष्कार किया जाए।&lt;br /&gt;
*महिलाएँ स्वयं शराब, अफ़ीम एवं विदेशी कपड़े की दुकानों पर जाकर धरना दें।&lt;br /&gt;
*समस्त विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करते हुए उन्हें जला दिया जाए।&lt;br /&gt;
*कर अदायगी को रोका जाए।&lt;br /&gt;
==क़ानून तोड़ने की नीति==&lt;br /&gt;
क़ानूनों को जानबूझ कर तोड़ने की इस नीति का कार्यान्वयन औपचारिक रूप से उस समय हुआ, जब महात्मा गांधी ने अपने कुछ चुने हुए अनुयायियों के साथ [[साबरमती आश्रम]] से समुद्र तट पर स्थित डांडी नामक स्थान तक कूच किया और वहाँ पर लागू नमक क़ानून को तोड़ा। लिबरलों और [[मुसलमान|मुसलमानों]] के बहुत वर्ग ने इस आन्दोलन में भाग नहीं लिया। किन्तु देश का सामान्य जन इस आन्दोलन में कूद पड़ा। हज़ारों नर-नारी और आबाल-वृद्ध क़ानूनों को तोड़ने के लिए सड़कों पर आ गए। सम्पूर्ण देश गम्भीर रूप से आन्दोलित हो उठा।&lt;br /&gt;
====गांधी जी की चिंता====&lt;br /&gt;
{{मुख्य|महात्मा गांधी}}&lt;br /&gt;
ब्रिटिश सरकार ने आन्दोलन को दबाने के लिए सख़्त क़दम उठाये और गांधी जी सहित अनेक कांग्रेसी नेताओं व उनके समर्थकों को जेल में डाल दिया। आन्दोलनकारियों और सरकारी सिपाहियों के बीच जगह-जगह ज़बर्दस्त संघर्ष हुए। [[शोलापुर]] जैसे स्थानों पर औद्योगिक उपद्रव और [[कानपुर]] जैसे नगरों में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे। हिंसा के इस विस्फ़ोट से गांधी जी चिन्तित हो उठे। वे आन्दोलन को बिल्कुल अहिंसक ढंग से चलाना चाहते थे।&lt;br /&gt;
====गाँधी-इरविन समझौता====&lt;br /&gt;
{{main|गाँधी-इरविन समझौता}}&lt;br /&gt;
सरकार ने भी गांधी जी व अन्य कांग्रेसी नेताओं को रिहा कर दिया और [[वाइसराय]] [[लॉर्ड इरविन]] और गांधी जी के बीच सीधी बातचीत का आयोजन करके समझौते की अभिलाषा प्रकट की। गांधी जी और [[लॉर्ड इरविन]] में समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत सविनय अवज्ञा आन्दोलन वापस ले लिया गया। हिंसा के दोषी लोगों को छोड़कर आन्दोलन में भाग लेने वाले सभी बन्दियों को रिहा कर दिया गया और [[कांग्रेस]] [[गोलमेज सम्मेलन]] के दूसरे अधिवेशन में भाग लेने को सहमत हो गई।&lt;br /&gt;
==भारतीयों की निराशा==&lt;br /&gt;
[[गोलमेज सम्मेलन]] का यह अधिवेशन भारतीयों के लिए निराशा के साथ समाप्त हुआ। इंग्लैण्ड से लौटने के बाद तीन हफ्तों के अन्दर ही गांधी जी को गिरफ़्तार करके जेल में ठूँस दिया गया और [[कांग्रेस]] पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इस कार्यवाही से [[1932]] ई. में सविनय अवज्ञा आन्दोलन फिर से भड़क उठा। आन्दोलन में भाग लेने के लिए हज़ारों लोग फिर से निकल पड़े, किन्तु ब्रिटिश सरकार ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन के इस दूसरे चरण को बर्बरतापूर्वक कुचल दिया। आन्दोलन तो कुचल दिया गया, लेकिन उसके पीछे छिपी विद्रोह की भावना जीवित रही, जो [[1942]] ई. में तीसरी बार फिर से भड़क उठी। &lt;br /&gt;
====हिंसक प्रदर्शन====&lt;br /&gt;
इस बार गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध '[[भारत छोड़ो आन्दोलन]]' छेड़ा। सरकार ने फिर ताकत का इस्तेमाल किया और गांधी जी सहित कांग्रेस कार्यसमिति के सभी सदस्यों को क़ैद कर लिया। इसके विरोध में देश भर में तोड़फोड़ और हिंसक आन्दोलन भड़क उठा। सरकार ने गोलियाँ बरसाईं, सैकड़ों लोग मारे गए और करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति नष्ट हो गई। यह आन्दोलन फिर से दबा दिया गया, लेकिन इस बार यह निष्फल नहीं हुआ। इसने ब्रिटिश सरकार को यह दिखा दिया कि [[भारत]] की जनता अब उसकी सत्ता को ठुकराने और उसकी अवज्ञा के लिए कमर कस चुकी है और उस पर काबू पाना अब मुश्किल है।&lt;br /&gt;
==आज़ादी==&lt;br /&gt;
सन [[1942]] में '[[अंग्रेज़|अंग्रेज़ों]], भारत छोड़ो' का जो नारा गांधीजी ने दिया था, उसके ठीक पाँच वर्षों के बाद अगस्त, [[1947]] ई. में ब्रिटेन को भारत छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3|माध्यमिक=|पूर्णता=|शोध=}}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन}}{{महात्मा गाँधी}}&lt;br /&gt;
[[Category:महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
[[Category:अंग्रेज़ी शासन]]&lt;br /&gt;
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[[Category:भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन]]&lt;br /&gt;
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{{सुलेख}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
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		<title>असहयोग आन्दोलन की प्रेरणा -महात्मा गाँधी</title>
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem style=&amp;quot;background:#fbf8df; padding:15px; font-size:14px; border:1px solid #003333; border-radius:5px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[महात्मा गाँधी|गांधी जी]] हेनरी डेविड थोरो नामक एक अमेरिकी विचारक से प्रभावित थे। थोरो का मानना था कि संसार में स्वविवेक से बड़ा कोई कानून नहीं है। ईश्वर ने मनुष्य को ये शक्ति दी है कि वो अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकता है, और इसी सोच के आधार पर उन्होंने अमेरिका में एक बार सिटी टैक्स नहीं देने के लिए लेख लिखा। उनका ऐसा लिखना कानून की निगाह में ज़ुर्म था, लिहाजा उन्होंने अपना ज़ुर्म कबूल करते हुए सजा भी पाई। सजा अपनी जगह थी, लेकिन उनका कहना था कि कोई भी कानून स्वविवेक से बढ़ कर नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;
थोरो का यही सिद्धांत गांधी जी के लिए सत्याग्रह का विज्ञान बना। गांधी जी ने समझ लिया कि किसी कानून की अवज्ञा नैतिक आधार पर की जा सकती है। हेनरी  थोरो  ने  कहा  था---- &amp;quot; लोकतंत्र  पर  मेरी  आस्था  है,  पर  वोटों  से  चुने  गये  व्यक्ति  स्वेच्छाचार  करें  मैं  यह  कभी  बर्दाश्त  नहीं  कर  सकता  | राजसंचालन  उन   व्यक्तियों  के  हाथ  में   होना   चाहिए  जिनमे  मनुष्य  मात्र  के  कल्याण  की   भावना  और  कर्तव्य-परायणता  विद्दमान  हो  और  जो  उसकी  पूर्ति  के  लिए  त्याग  भी  कर  सकते  हों  । &amp;quot; &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
किसी  ने  कहा---- यदि  ऐसा  न  हुआ  तो  ?'   &lt;br /&gt;
उन्होंने  कहा--- &amp;quot; तो  हम  ऐसी  राज्य  सत्ता  के  साथ  कभी  सहयोग   नहीं  करेंगे  चाहे  उसमे  हमें  कितना  ही  कष्ट  क्योँ  न  उठाना  पड़े  ।  &amp;quot;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे  सविनय-असहयोग  आंदोलन  के  प्रवर्तक  थे,  उनका  कहना  था--- 'अन्याय  चाहे  अपनें  घर  में  होता  हो  या  बाहर,  उसका    विरोध  करने  से   नहीं   डरना  चाहिए  और  कुछ  न  कर  सको  तो  भी  बुराई  के  साथ  सहयोग  तो  करना  ही  नहीं  चाहिए   ।&lt;br /&gt;
       &lt;br /&gt;
बुराइयाँ  चाहे  राजनैतिक  हों    या  सामाजिक,  नैतिक  हों    या  धार्मिक,   जिस  देश  के  नागरिक  उनके  विरुद्ध  खड़े  हो  जाते  हैं,  सविनय  असहयोग  से  उसकी   शक्ति  कमजोर  कर  देतें  हैं  वहां  अमेरिका  की  तरह  ही  सामाजिक  जीवन  में   परिवर्तन  भी  अवश्य  होते  हैं   ।&lt;br /&gt;
   &lt;br /&gt;
महात्मा  गांधी  को   [[सविनय अवज्ञा आन्दोलन]]   की  प्रेरणा  हेनरी  डेविड  थोरो  से  प्राप्त  हुई  ।  उनकी  प्रार्थना  को  गांधी  जी  '  प्रार्थनाओं  की  प्रार्थना  '  कहते  थे  । उनकी  प्रार्थना  थी----- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot; हे  प्रभो !  मुझे  इतनी  शक्ति  दे  दो  कि  मैं  अपने  को  अपनी  करनी  से  कभी  निराश  न  करूँ  ।  मेरे  हस्त,  मेरी  द्रढ़ता,  श्रद्धा  का  कभी  अनादर   न  करें  ।  मेरा  प्रेम  मेरे  मित्रों  के  प्रेम  से  घटिया  न  रहे  ।  मेरी  वाणी  जितना  कहे-- जीवन  उससे  ज्यादा  करता  चले  ।  तेरी  मंगलमय  स्रष्टि  का  हर  अमंगल  पचा  सकूँ,  इतनी  शक्ति  मुझ  में  बनी  रहे  । &amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;[[महात्मा गाँधी]] से जुड़े अन्य प्रसंग पढ़ने के लिए [[महात्मा गाँधी के प्रेरक प्रसंग]] पर जाएँ।  &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{प्रेरक प्रसंग}}&lt;br /&gt;
[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]][[Category:समकालीन साहित्य]][[Category:प्रेरक प्रसंग]][[Category:महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
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		<title>असहयोग आन्दोलन की प्रेरणा -महात्मा गाँधी</title>
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|चित्र=Mahatma_prerak.png&lt;br /&gt;
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|शीर्षक 1=भाषा&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
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[[महात्मा गाँधी|गांधी जी]] हेनरी डेविड थोरो नामक एक अमेरिकी विचारक से प्रभावित थे। थोरो का मानना था कि संसार में स्वविवेक से बड़ा कोई कानून नहीं है। ईश्वर ने मनुष्य को ये शक्ति दी है कि वो अपने विवेक का इस्तेमाल कर सकता है, और इसी सोच के आधार पर उन्होंने अमेरिका में एक बार सिटी टैक्स नहीं देने के लिए लेख लिखा। उनका ऐसा लिखना कानून की निगाह में ज़ुर्म था, लिहाजा उन्होंने अपना ज़ुर्म कबूल करते हुए सजा भी पाई। सजा अपनी जगह थी, लेकिन उनका कहना था कि कोई भी कानून स्वविवेक से बढ़ कर नहीं हो सकता।&lt;br /&gt;
थोरो का यही सिद्धांत गांधी जी के लिए सत्याग्रह का विज्ञान बना। गांधी जी ने समझ लिया कि किसी कानून की अवज्ञा नैतिक आधार पर की जा सकती है। हेनरी  थोरो  ने  कहा  था---- &amp;quot; लोकतंत्र  पर  मेरी  आस्था  है,  पर  वोटों  से  चुने  गये  व्यक्ति  स्वेच्छाचार  करें  मैं  यह  कभी  बर्दाश्त  नहीं  कर  सकता  | राजसंचालन  उन   व्यक्तियों  के  हाथ  में   होना   चाहिए  जिनमे  मनुष्य  मात्र  के  कल्याण  की   भावना  और  कर्तव्य-परायणता  विद्दमान  हो  और  जो  उसकी  पूर्ति  के  लिए  त्याग  भी  कर  सकते  हों  । &amp;quot; &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
किसी  ने  कहा---- यदि  ऐसा  न  हुआ  तो  ?'   &lt;br /&gt;
उन्होंने  कहा--- &amp;quot; तो  हम  ऐसी  राज्य  सत्ता  के  साथ  कभी  सहयोग   नहीं  करेंगे  चाहे  उसमे  हमें  कितना  ही  कष्ट  क्योँ  न  उठाना  पड़े  ।  &amp;quot;  &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे  सविनय-असहयोग  आंदोलन  के  प्रवर्तक  थे,  उनका  कहना  था--- 'अन्याय  चाहे  अपनें  घर  में  होता  हो  या  बाहर,  उसका    विरोध  करने  से   नहीं   डरना  चाहिए  और  कुछ  न  कर  सको  तो  भी  बुराई  के  साथ  सहयोग  तो  करना  ही  नहीं  चाहिए   ।&lt;br /&gt;
       &lt;br /&gt;
बुराइयाँ  चाहे  राजनैतिक  हों    या  सामाजिक,  नैतिक  हों    या  धार्मिक,   जिस  देश  के  नागरिक  उनके  विरुद्ध  खड़े  हो  जाते  हैं,  सविनय  असहयोग  से  उसकी   शक्ति  कमजोर  कर  देतें  हैं  वहां  अमेरिका  की  तरह  ही  सामाजिक  जीवन  में   परिवर्तन  भी  अवश्य  होते  हैं   ।&lt;br /&gt;
   &lt;br /&gt;
महात्मा  गांधी  को   [[भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन|सविनय   असहयोग  आन्दोलन]]   की  प्रेरणा  हेनरी  डेविड  थोरो  से  प्राप्त  हुई  ।  उनकी  प्रार्थना  को  गांधी  जी  '  प्रार्थनाओं  की  प्रार्थना  '  कहते  थे  । उनकी  प्रार्थना  थी----- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot; हे  प्रभो !  मुझे  इतनी  शक्ति  दे  दो  कि  मैं  अपने  को  अपनी  करनी  से  कभी  निराश  न  करूँ  ।  मेरे  हस्त,  मेरी  द्रढ़ता,  श्रद्धा  का  कभी  अनादर   न  करें  ।  मेरा  प्रेम  मेरे  मित्रों  के  प्रेम  से  घटिया  न  रहे  ।  मेरी  वाणी  जितना  कहे-- जीवन  उससे  ज्यादा  करता  चले  ।  तेरी  मंगलमय  स्रष्टि  का  हर  अमंगल  पचा  सकूँ,  इतनी  शक्ति  मुझ  में  बनी  रहे  । &amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;[[महात्मा गाँधी]] से जुड़े अन्य प्रसंग पढ़ने के लिए [[महात्मा गाँधी के प्रेरक प्रसंग]] पर जाएँ।  &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
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==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{प्रेरक प्रसंग}}&lt;br /&gt;
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[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
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		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>साँचा:प्रेरक प्रसंग - महात्मा गाँधी</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE:%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%95_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%97_-_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%97%E0%A4%BE%E0%A4%81%E0%A4%A7%E0%A5%80&amp;diff=528838"/>
		<updated>2015-05-25T15:21:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा कविता सूची&lt;br /&gt;
|कवि का नाम=महात्मा गाँधी&lt;br /&gt;
|रचना प्रकार='''प्रेरक प्रसंग - महात्मा गाँधी'''&lt;br /&gt;
|रचना 1=स्वयं पर विजय &lt;br /&gt;
|रचना 2=गांधीजी का मंदिर  &lt;br /&gt;
|रचना 3=बहुत बड़ा पाठ  &lt;br /&gt;
|रचना 4=नियम का पालन &lt;br /&gt;
|रचना 5=मुंह लगाकर जहर निकालने की कोशिश&lt;br /&gt;
|रचना 6=सिक्के का मूल्य &lt;br /&gt;
|रचना 7=भूतों से डर &lt;br /&gt;
|रचना 8=मृत्यु का पाप &lt;br /&gt;
|रचना 9=समय धन है, इसे मत गंवाओ..! &lt;br /&gt;
|रचना 10=संयम की सीख&lt;br /&gt;
|रचना 11=जनसेवक का पश्चाताप कैसा हो?&lt;br /&gt;
|रचना 12=किसी एक ने तो अपना गुस्सा थूंका.. &lt;br /&gt;
|रचना 13=बड़े दिल वाला&lt;br /&gt;
|रचना 14=नववर्षारम्भ नहीं 'निश्चय दिवस'&lt;br /&gt;
|रचना 15=मेरी जगह तुम्हारी जेल में होगी&lt;br /&gt;
|रचना 16=असहयोग  आन्दोलन  की  प्रेरणा&lt;br /&gt;
|रचना 17=&lt;br /&gt;
|रचना 18=&lt;br /&gt;
|रचना 19=&lt;br /&gt;
|रचना 20=&lt;br /&gt;
|रचना 21=&lt;br /&gt;
|रचना 22=&lt;br /&gt;
|रचना 23=&lt;br /&gt;
|रचना 24=&lt;br /&gt;
|रचना 25=&lt;br /&gt;
}}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:प्रेरक प्रसंग]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
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		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8_%E0%A4%AA%E0%A4%82%E0%A4%A4&amp;diff=528736</id>
		<title>सुमित्रानंदन पंत</title>
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		<updated>2015-05-22T02:36:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{| style=&amp;quot;background:transparent; float:right&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Sumitranandan-Pant.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=सुमित्रानंदन पंत&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=गुसाईं दत्त&lt;br /&gt;
|जन्म=[[20 मई]] [[1900]]&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=[[कौसानी]], [[उत्तराखण्ड]], [[भारत]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[28 दिसंबर]], [[1977]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[इलाहाबाद]], [[उत्तर प्रदेश]], [[भारत]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=[[इलाहाबाद]]&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=अध्यापक, लेखक, कवि&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=[[वीणा -सुमित्रानन्दन पंत|वीणा]], [[पल्लव -सुमित्रानन्दन पंत|पल्लव]], [[चिदंबरा -सुमित्रानन्दन पंत|चिदंबरा]], [[युगवाणी -सुमित्रानन्दन पंत|युगवाणी]], [[लोकायतन]], [[युगपथ -सुमित्रानन्दन पंत|युगपथ]], [[स्वर्णकिरण -सुमित्रानन्दन पंत|स्वर्णकिरण]], [[कला और बूढ़ा चाँद -सुमित्रानन्दन पंत|कला और बूढ़ा चाँद]] आदि  &lt;br /&gt;
|विषय=गीत, कविताएँ&lt;br /&gt;
|भाषा=[[हिन्दी]]&lt;br /&gt;
|विद्यालय=जयनारायण हाईस्कूल, म्योर सेंट्रल कॉलेज&lt;br /&gt;
|शिक्षा=&lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[ज्ञानपीठ पुरस्कार]], [[पद्म भूषण]], [[साहित्य अकादमी पुरस्कार हिन्दी|साहित्य अकादमी पुरस्कार ]], 'लोकायतन' पर सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=आंदोलन&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[रहस्यवाद]] व प्रगतिवाद&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=  &lt;br /&gt;
|पाठ 2= &lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
|-&lt;br /&gt;
|  style=&amp;quot;width:18em; float:right;&amp;quot;|&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;border:thin solid #a7d7f9; margin:10px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{|  align=&amp;quot;center&amp;quot;&lt;br /&gt;
! सुमित्रानंदन पंत की रचनाएँ&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;height: 250px; overflow:auto; overflow-x: hidden; width:99%&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{सुमित्रानंदन पंत की रचनाएँ}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
'''सुमित्रानंदन पंत''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''Sumitranandan Pant'',  जन्म: [[20 मई]] [[1900]] - मृत्यु:  [[28 दिसंबर]], [[1977]]) [[हिन्दी साहित्य]] में [[छायावादी युग]] के चार स्तंभों में से एक हैं। सुमित्रानंदन पंत नये युग के प्रवर्तक के रूप में आधुनिक [[हिन्दी साहित्य]] में उदित हुए। सुमित्रानंदन पंत ऐसे साहित्यकारों में गिने जाते हैं जिनका प्रकृति चित्रण समकालीन कवियों में सबसे बेहतरीन था। आकर्षक व्यक्तित्व के धनी सुमित्रानंदन पंत के बारे में साहित्यकार [[राजेन्द्र यादव]] कहते हैं कि 'पंत [[अंग्रेज़ी]] के रूमानी कवियों जैसी वेशभूषा में रहकर प्रकृति केन्द्रित साहित्य लिखते थे।' जन्म के महज छह घंटे के भीतर उन्होंने अपनी माँ को खो दिया। पंत लोगों से बहुत जल्द प्रभावित हो जाते थे। पंत ने [[महात्मा गाँधी]] और कार्ल मार्क्‍स से प्रभावित होकर उन पर रचनाएँ लिख डालीं। हिंदी साहित्य के '''विलियम वर्ड्सवर्थ''' कहे जाने वाले इस कवि ने महानायक [[अमिताभ बच्चन]] को ‘अमिताभ’ नाम दिया था। [[पद्मभूषण]], [[ज्ञानपीठ पुरस्कार]] और [[साहित्य अकादमी पुरस्कार हिन्दी|साहित्य अकादमी पुरस्कारों]] से नवाजे जा चुके पंत की रचनाओं में समाज के यथार्थ के साथ-साथ प्रकृति और मनुष्य की सत्ता के बीच टकराव भी होता था। [[हरिवंश राय बच्चन|हरिवंश राय ‘बच्चन’]] और [[अरविंदो घोष|श्री अरविंदो]] के साथ उनकी ज़िंदगी के अच्छे दिन गुजरे। आधी सदी से भी अधिक लंबे उनके रचनाकाल में आधुनिक [[हिंदी]] [[कविता]] का एक पूरा युग समाया हुआ है।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/remembrance/0912/29/1091229096_1.htm |title=सुमित्रानंदन पंत : प्रकृति के सुकोमल कवि |accessmonthday=13 सितम्बर |accessyear=2013 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=वेबदुनिया हिंदी |language=हिंदी  }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==जीवन परिचय==&lt;br /&gt;
सुमित्रानंदन पंत का जन्म [[20 मई]] [[1900]] में [[कौसानी]], [[उत्तराखण्ड]], [[भारत]] में हुआ था। जन्म के छह घंटे बाद ही [[माँ]] को क्रूर मृत्यु ने छीन लिया। शिशु को उसकी दादी ने पाला पोसा। शिशु का नाम रखा गया गुसाईं दत्त। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिन्दी के सुकुमार कवि पंत की प्रारंभिक शिक्षा [[कौसानी]] गांव के स्कूल में हुई, फिर वह [[वाराणसी]] आ गए और 'जयनारायण हाईस्कूल' में शिक्षा पाई, इसके बाद उन्होंने [[इलाहाबाद]] में 'म्योर सेंट्रल कॉलेज' में प्रवेश लिया, पर इंटरमीडिएट की परीक्षा में बैठने से पहले ही [[1921]] में [[असहयोग आंदोलन]] में शामिल हो गए। &lt;br /&gt;
[[चित्र:Pant.jpg|left|thumb|250px|[[कौसानी]] में महाकवि का दुर्लभ चित्र]] &lt;br /&gt;
====प्रारम्भिक जीवन====&lt;br /&gt;
कवि के बचपन का नाम 'गुसाईं दत्त' था। स्लेटी छतों वाले पहाड़ी घर, आंगन के सामने आडू, खुबानी के पेड़, पक्षियों का कलरव, सर्पिल पगडण्डियां, बांज, बुरांश व चीड़ के पेड़ों की बयार व नीचे दूर दूर तक मखमली कालीन सी पसरी कत्यूर घाटी व उसके उपर [[हिमालय]] के उत्तंग शिखरों और दादी से सुनी [[कहानी|कहानियों]] व शाम के समय सुनायी देने वाली [[आरती]] की स्वर लहरियों ने गुसाईं दत्त को बचपन से ही कवि हृदय बना दिया था। मां जन्म के छः सात घण्टों में ही चल बसी थीं सो प्रकृति की यही रमणीयता इनकी मां बन गयी। प्रकृति के इसी ममतामयी छांव में बालक गुसाईं दत्त धीरे- धीरे यहां के सौन्दर्य को शब्दों के माध्यम से [[काग़ज़]] में उकेरने लगा। [[पिता]] 'गंगादत्त' उस समय कौसानी चाय बग़ीचे के मैनेजर थे। उनके भाई [[संस्कृत]] व [[अंग्रेज़ी]] के अच्छे जानकार थे, जो [[हिन्दी]] व [[कुमाँऊनी भाषा|कुमाँऊनी]] में कविताएं भी लिखा करते थे। यदाकदा जब उनके भाई अपनी पत्नी को मधुर कंठ से कविताएं सुनाया करते तो बालक गुसाईं दत्त किवाड़ की ओट में चुपचाप सुनता रहता और उसी तरह के शब्दों की तुकबन्दी कर [[कविता]] लिखने का प्रयास करता। बालक गुसाईं दत्त की प्राइमरी तक की शिक्षा कौसानी के 'वर्नाक्यूलर स्कूल' में हुई। इनके कविता पाठ से मुग्ध होकर स्कूल इंसपैक्टर ने इन्हें उपहार में एक पुस्तक दी थी। ग्यारह साल की उम्र में इन्हें पढा़ई के लिये [[अल्मोड़ा|अल्मोडा़]] के 'गवर्नमेंट हाईस्कूल' में भेज दिया गया। कौसानी के सौन्दर्य व एकान्तता के अभाव की पूर्ति अब नगरीय सुख वैभव से होने लगी। अल्मोडा़ की ख़ास संस्कृति व वहां के समाज ने गुसाईं दत्त को अन्दर तक प्रभावित कर दिया। सबसे पहले उनका ध्यान अपने नाम पर गया। और उन्होंने [[लक्ष्मण]] के चरित्र को आदर्श मानकर अपना नाम गुसाईं दत्त से बदल कर 'सुमित्रानंदन' कर लिया। कुछ समय बाद [[नेपोलियन]] के युवावस्था के चित्र से प्रभावित होकर अपने लम्बे व घुंघराले बाल रख लिये।&amp;lt;ref name=&amp;quot;hillwani&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://www.hillwani.com/ndisplay.php?n_id=195 |title=कौसानी के कवि पंत |accessmonthday=13 सितम्बर |accessyear=2013 |last=तिवारी |first= चंद्रशेखर |authorlink= |format= |publisher=हिलवाणी |language=हिंदी }}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
==साहित्यिक परिचय==&lt;br /&gt;
[[अल्मोड़ा]] में तब कई साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियां होती रहती थीं जिसमें पंत अक्सर भाग लेते रहते। स्वामी सत्यदेव जी के प्रयासों से नगर में ‘शुद्व साहित्य समिति‘ नाम से एक पुस्तकालय चलता था। इस पुस्तकालय से पंत जी को उच्च कोटि के विद्वानों का साहित्य पढ़ने को मिलता था। [[कौसानी]] में [[साहित्य]] के प्रति पंत जी में जो अनुराग पैदा हुआ वह यहां के साहित्यिक वातावरण में अब अंकुरित होने लगा। [[कविता]] का प्रयोग वे सगे सम्बन्धियों को पत्र लिखने में करने लगे। शुरुआती दौर में उन्होंने 'बागेश्वर के मेले', 'वकीलों के धनलोलुप स्वभाव' व 'तम्बाकू का धुंआ' जैसी कुछ छुटपुट कविताएं लिखी। आठवीं कक्षा के दौरान उनका परिचय प्रख्यात नाटककार [[गोविन्द बल्लभ पंत]], श्यामाचरण दत्त पंत, [[इलाचन्द्र जोशी]] व हेमचन्द्र जोशी से हो गया था। अल्मोड़ा से तब हस्तलिखित पत्रिका ‘सुधाकर‘ व ‘अल्मोड़ा अखबार‘ नामक पत्र निकलता था जिसमें वे कविताएं लिखते रहते। अल्मोड़ा में पंत जी के घर के ठीक उपर स्थित गिरजाघर की घण्टियों की आवाज़ उन्हें अत्यधिक सम्मोहित करती थीं। अक़्सर प्रत्येक [[रविवार]] को वे इस पर एक कविता लिखते। ‘गिरजे का घण्टा‘ शीर्षक से उनकी यह कविता सम्भवतः पहली रचना है-&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sumitranandan-Pant-kavita-paath.jpg|thumb|left|सुमित्रानंदन पंत कविता पढ़ते हुए]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem&amp;gt;नभ की उस नीली चुप्पी पर घण्टा है एक टंगा सुन्दर&lt;br /&gt;
जो घड़ी घड़ी मन के भीतर कुछ कहता रहता बज बज कर&amp;lt;/poem&amp;gt; &lt;br /&gt;
दुबले पतले व सुन्दर काया के कारण पंत जी को स्कूल के नाटकों में अधिकतर स्त्री पात्रों का अभिनय करने को मिलता। [[1916]] में जब वे जाड़ों की छुट्टियों में कौसानी गये तो उन्होंने ‘हार‘ शीर्षक से 200 पृष्ठों का 'एक खिलौना' [[उपन्यास]] लिख डाला। जिसमें उनके किशोर मन की कल्पना के नायक नायिकाओं व अन्य पात्रों की मौजूदगी थी। कवि पंत का किशोर कवि जीवन कौसानी व अल्मोड़ा में ही बीता था। इन दोनों जगहों का वर्णन भी उनकी कविताओं में मिलता है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;hillwani&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==स्वतंत्रता संग्राम में योगदान ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Harivanshrai-bachchan-sumitra-nandan-pant-ramdhari-singh-dinkar.jpg|thumb|300px|[[हरिवंशराय बच्चन]], सुमित्रानंदन पंत और [[रामधारी सिंह 'दिनकर']]]]&lt;br /&gt;
[[1921]] के [[असहयोग आंदोलन]] में उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया था, पर देश के [[स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन|स्वतंत्रता संग्राम]] की गंभीरता के प्रति उनका ध्यान [[1930]] के [[नमक सत्याग्रह]] के समय से अधिक केंद्रित होने लगा, इन्हीं दिनों संयोगवश उन्हें कालाकांकर में ग्राम जीवन के अधिक निकट संपर्क में आने का अवसर मिला। उस ग्राम जीवन की पृष्ठभूमि में जो संवेदन उनके [[हृदय]] में अंकित होने लगे, उन्हें वाणी देने का प्रयत्न उन्होंने [[युगवाणी -सुमित्रानन्दन पंत|युगवाणी]] (1938) और [[ग्राम्या -सुमित्रनन्दन पंत|ग्राम्या]] (1940) में किया। यहाँ से उनका काव्य, युग का जीवन-संघर्ष तथा नई चेतना का दर्पण बन जाता है। [[स्वर्णकिरण -सुमित्रनन्दन पंत|स्वर्णकिरण]] तथा उसके बाद की रचनाओं में उन्होंने किसी आध्यात्मिक या दार्शनिक सत्य को वाणी न देकर व्यापक मानवीय सांस्कृतिक तत्त्व को अभिव्यक्ति दी, जिसमें अन्न प्राण, मन आत्मा, आदि मानव-जीवन के सभी स्वरों की चेतना को संयोजित करने का प्रयत्न किया गया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==काव्य एवं साहित्य की साधना==&lt;br /&gt;
पंतजी संघर्षों के एक लंबे दौर से गुज़रे, जिसके दौरान स्वयं को काव्य एवं साहित्य की साधना में लगाने के लिए उन्होंने अपनी आजीविका सुनिश्चित करने का प्रयास किया। बहुत पहले ही उन्होंने यह समझ लिया था कि उनके जीवन का लक्ष्य और कार्य यदि कोई है, तो वह काव्य साधना ही है। पंत की भाव-चेतना महाकवि [[रबींद्रनाथ ठाकुर]], [[महात्मा गांधी]] और श्री [[अरबिंदो घोष]] की रचनाओं से प्रभावित हुई। साथ ही कुछ मित्रों ने मार्क्सवाद के अध्ययन की ओर भी उन्हें प्रवृत किया और उसके विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पक्षों को उन्होंने गहराई से देखा व समझा। [[1950]] में रेडियो विभाग से जुड़ने से उनके जीवन में एक ओर मोड़ आया। सात [[वर्ष]] उन्होंने 'हिन्दी चीफ़ प्रोड्यूसर' के पद पर कार्य किया और उसके बाद साहित्य सलाहकार के रूप में कार्यरत रहे। &lt;br /&gt;
====युग प्रवर्तक कवि====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pant amitabh.jpg|left|thumb|250px|[[हरिवंशराय बच्चन]] और सदी के महानायक [[अमिताभ बच्चन]] के साथ महाकवि सुमित्रानंदन पंत]]&lt;br /&gt;
सुमित्रानंदन पंत आधुनिक [[हिन्दी साहित्य]] के एक युग प्रवर्तक कवि हैं। उन्होंने [[भाषा]] को निखार और संस्कार देने, उसकी सामर्थ्य को उद्घाटित करने के अतिरिक्त नवीन विचार व भावों की समृद्धि दी। पंत सदा ही अत्यंत सशक्त और ऊर्जावान कवि रहे हैं। सुमित्रानंदन पंत को मुख्यत: प्रकृति का कवि माना जाने लगा। लेकिन पंत वास्तव में मानव-सौंदर्य और आध्यात्मिक चेतना के भी कुशल कवि थे।&lt;br /&gt;
==रचनाकाल==&lt;br /&gt;
पंत का [[पल्लव पंत|पल्लव]], ज्योत्सना तथा गुंजन का रचनाकाल काल (1926-33) उनकी सौंदर्य एवं कला-साधना का काल रहा है। वह मुख्यत: भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आदर्शवादिता से अनुप्राणिक थे। किंतु युगांत (1937) तक आते-आते बहिर्जीवन के खिंचाव से उनके भावात्मक दृष्टिकोण में परिवर्तन आए। पन्तजी की रचनाओं का क्षेत्र बहुविध और बहुआयामी है। आपकी रचनाओं सा संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-&lt;br /&gt;
====महाकाव्य====&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sumitranandan pant1.jpg|thumb|सुमित्रानन्दन पंत हस्तलिपि 'याद']]&lt;br /&gt;
'[[लोकायतन]]' कवि सुमित्रानन्दन पन्त का [[महाकाव्य]] है। [[कवि]] की विचारधारा और लोक-जीवन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता इस रचना में अभिव्यक्त हुई है। इस पर कवि को 'सोवियत रूस' तथा [[उत्तर प्रदेश]] शासन से पुरस्कार प्राप्त हुआ है। पंत जी को अपने [[माता]]-[[पिता]] के प्रति असीम-सम्मान था। इसलिए उन्होंने अपने दो [[महाकाव्य|महाकाव्यों]] में से एक महाकाव्य '[[लोकायतन -सुमित्रानन्दन पंत|लोकायतन]]' अपने पूज्य पिता को और दूसरा महाकाव्य '[[सत्यकाम -सुमित्रानन्दन पंत|सत्यकाम]]' अपनी स्नेहमयी माता को, जो इन्हें जन्म देते ही स्वर्ग सिधार गईं, समर्पित किया है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;BSS&amp;quot;&amp;gt;{{cite web |url=http://pustak.org/bs/home.php?bookid=2150|title=सुमित्रानन्दन पंत रचना संचयन|accessmonthday=13 सितम्बर|accessyear=2013|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= भारतीय साहित्य संग्रह|language=हिन्दी}}&amp;lt;/ref&amp;gt; अपनी माँ सरस्वती देवी&amp;lt;ref&amp;gt;पीहर का पुकारू नाम 'सरुली'&amp;lt;/ref&amp;gt; को स्मरण करते हुए इन्होंने अपना दूसरा महाकाव्य 'सत्यकाम' जिन शब्दों के साथ उन्हें समर्पित किया है, वे द्रष्टव्य हैं-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;lt;poem&amp;gt;मुझे छोड़ अनगढ़ जग में तुम हुई अगोचर,&lt;br /&gt;
भाव-देह धर लौटीं माँ की ममता से भर !&lt;br /&gt;
वीणा ले कर में, शोभित प्रेरणा-हंस पर, &lt;br /&gt;
साध चेतना-तंत्रि रसौ वै सः झंकृत कर&lt;br /&gt;
खोल हृदय में भावी के सौन्दर्य दिगंतर !&amp;lt;/poem&amp;gt;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
====काव्य-संग्रह====&lt;br /&gt;
'[[वीणा -सुमित्रानन्दन पंत|वीणा]]', '[[पल्लव -सुमित्रानन्दन पंत|पल्लव]]' तथा '[[गुंजन -सुमित्रानन्दन पंत|गुंजन]]' छायावादी शैली में सौन्दर्य और प्रेम की प्रस्तुति है। '[[युगांत -सुमित्रानन्दन पंत|युगान्त]]', [[युगवाणी -सुमित्रानन्दन पंत|युगवाणी]]' तथा '[[ग्राम्या -सुमित्रानन्दन पंत|ग्राम्या]]' में पन्तजी के प्रगतिवादी और यथार्थपरक भावों का प्रकाशन हुआ है। '[[स्वर्णकिरण -सुमित्रानन्दन पंत|स्वर्ण-किरण]]', '[[स्वर्णधूलि -सुमित्रनन्दन पंत|स्वर्ण-धूलि]]', '[[युगपथ -सुमित्रानन्दन पंत|युगपथ]]', '[[उत्तरा -सुमित्रनन्दन पंत|उत्तरा]]', 'अतिमा', तथा 'रजत-रश्मि' संग्रहों में अरविन्द-दर्शन का प्रभाव परिलक्षित होता है। इनके अतिरिक्त '[[कला और बूढ़ा चाँद -सुमित्रानन्दन पंत|कला और बूढ़ा चाँद]]' तथा '[[चिदम्बरा -सुमित्रानन्दन पंत|चिदम्बरा]]' भी आपकी सम्मानित रचनाएँ हैं। पन्तजी की अन्तर्दृष्टि तथा संवेदनशीलता ने जहाँ उनके भाव-पक्ष को गहराई और विविधता प्रदान की हैं, वहीं उनकी कल्पना-प्रबलता और अभिव्यक्ति-कौशल ने उनके कला-पक्ष को सँवारा है।&lt;br /&gt;
==रचनाएँ==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sumitranandan.jpg|thumb|सुमित्रानंदन पंत]]&lt;br /&gt;
[[चिदंबरा -सुमित्रानन्दन पंत|चिदंबरा]] [[1958]] का प्रकाशन है। इसमें [[युगवाणी -सुमित्रनन्दन पंत|युगवाणी]] ([[1937]]-38) से अतिमा ([[1948]]) तक कवि की 10 कृतियों से चुनी हुई 196 कविताएं संकलित हैं। एक लंबी आत्मकथात्मक कविता आत्मिका भी इसमें सम्मिलित है, जो वाणी ([[1957]]) से ली गई है। चिदंबरा पंत की काव्य चेतना के द्वितीय उत्थान की परिचायक है। प्रमुख रचनाएं इस प्रकार  है:- &lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-green&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
; कविताएं  &lt;br /&gt;
*[[वीणा पंत|वीणा]] ([[1919]])&lt;br /&gt;
*[[ग्रंथि पंत|ग्रंथि]]  ([[1920]])&lt;br /&gt;
*[[पल्लव पंत|पल्लव]] ([[1926]])&lt;br /&gt;
*[[गुंजन पंत|गुंजन]] ([[1932]])&lt;br /&gt;
*[[युगांत]] ([[1937]])&lt;br /&gt;
*[[युगवाणी पंत|युगवाणी]] ([[1938]])&lt;br /&gt;
*[[ग्राम्या पंत|ग्राम्या]] ([[1940]])&lt;br /&gt;
*[[स्वर्णकिरण पंत|स्वर्णकिरण]] ([[1947]])&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
; कविताएं  &lt;br /&gt;
*[[स्वर्णधूलि पंत|स्वर्णधूलि]] ([[1947]])&lt;br /&gt;
*[[उत्तरा पंत|उत्तरा]] ([[1949]])&lt;br /&gt;
*[[युगपथ पंत|युगपथ]] ([[1949]])&lt;br /&gt;
*[[चिदंबरा -सुमित्रानन्दन पंत|चिदंबरा]] ([[1958]])&lt;br /&gt;
*[[कला और बूढ़ा चाँद -सुमित्रानन्दन पंत|कला और बूढ़ा चाँद]] ([[1959]])&lt;br /&gt;
*[[लोकायतन]] ([[1964]])&lt;br /&gt;
*गीतहंस ([[1969]])।&lt;br /&gt;
|&lt;br /&gt;
; कहानियाँ &lt;br /&gt;
*पाँच कहानियाँ (1938)&lt;br /&gt;
; उपन्यास&lt;br /&gt;
* हार (1960), &lt;br /&gt;
; आत्मकथात्मक संस्मरण&lt;br /&gt;
* साठ वर्ष : एक रेखांकन ([[1963]])।&lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
==साहित्यिक विशेषताएँ==&lt;br /&gt;
छायावाद को मुख्यतः ‘प्रेरणा का काव्य’ मानने वाले इस कोमल-प्राण कवि ने 'हार' नामक उपन्यास के लेखन से अपनी रचना-यात्रा आरंभ की थी, जो ‘मुक्ताभ’ के प्रणयन तक जारी रही। मुख्यतः कवि-रूप में प्रसिद्ध होने के अलावा ये 'प्रथम कोटि के आलोचक, विचारक और गद्यकार' थे। इन्होंने [[मुक्तक]], लंबी कविता, गद्य-नाटिका, पद्य-नाटिका, रेडियो-रूपक, [[एकांकी]], [[उपन्यास]], [[कहानी]] इत्यादि जैसी विभिन्न विधाओं में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं और [[लोकायतन -सुमित्रनन्दन पंत|लोकायतन]] तथा [[सत्यकाम -सुमित्रानन्दन पंत|सत्यकाम]] जैसे वृहद [[महाकाव्य]] भी लिखे हैं। विधाओं की विविधता की दृष्टि से इनके द्वारा संपादित 'रूपाभ पत्रिका' (सन् [[1938]] ईस्वी) की संपादकीय टिप्पणियाँ और मधुज्वाल की भावानुवादाश्रित कविताएँ भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। आशय यह कि विभिन्न विधाओं में उपलब्ध इनके विपुल साहित्य को एक नातिदीर्घ रचना-संचयन में प्रस्तुत करना कठिन कार्य है। रचनाओं की विपुलता के साथ ही यह भी लक्ष्य करने योग्य है कि प्रकृति और नारी–सौंदर्य से रचनारंभ करनेवाले पंत जी मानव, सामान्य जन और समग्र मानवता की कल्याण-कामना से सदैव जुड़े रहे। इनकी मान्यता थी कि ‘आने वाला मानव निश्चिय ही न पूर्व का होगा, न पश्चिम का।’ ये सार्वभौम मनुष्यता के विश्वासी थे। अध्यात्म, अंतश्चेतना, प्रेम, समदिक् संचरण इत्यादि जैसा संकल्पनाओं से भावाकुल पंत के लेखन-चिन्तन का केन्द्र-बिन्दु हमेशा ‘लोक’ पक्ष ही रहा, जो लोकायतन के नामकरण से भी संकेतित होता है। पंत-काव्य का तृतीय चरण, जो ‘नवीन सगुण’ के नाम से चर्चित है और जिसे हम शुभैषणा-सदिच्छा का स्वस्ति-काव्य कह सकते हैं, इसी ‘लोक’ के मंगल पर केन्द्रित है।&amp;lt;ref name=&amp;quot;BSS&amp;quot;/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sumitranandan pant-nakshtra.jpg|thumb|सुमित्रानन्दन पंत हस्तलिपि 'नक्षत्र']]&lt;br /&gt;
====प्रकृति-प्रेमी कवि====&lt;br /&gt;
'उच्छास' से लेकर 'गुंजन' तक की कविता का सम्पूर्ण भावपट कवि की सौन्दर्य-चेतना का काल है। सौन्दर्य-सृष्टि के उनके प्रयत्न के मुख्य उपादान हैं- प्रकृति, प्रेम और आत्म-उद्बोधन। अल्मोड़ा की प्राकृतिक सुषमा ने उन्हें बचपन से ही अपनी ओर आकृष्ट किया। ऐसा प्रतीत होता है जैसे मां की ममता से रहित उनके जीवन में मानो प्रकृति ही उनकी मां हो। [[उत्तर प्रदेश]] के [[अल्मोड़ा]] के पर्वतीय अंचल की गोद में पले बढ़े पंत जी स्वयं यह स्वीकार करते हैं कि उस मनोरम वातावरण का इनके व्यक्तित्व पर गंभीर प्रभाव पड़ा। कवि या कलाकार कहां से प्रेरणा ग्रहण करता है इस बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए पंत जी कहते हैं, संभवत: प्रेरणा के स्रोत भीतर न होकर अधिकतर बाहर ही रहते हैं। अपनी काव्य यात्रा में पन्त जी सदैव सौन्दर्य को खोजते नजर आते हें। शब्द, शिल्प, भाव और भाषा के द्वारा कवि पंत प्रकृति और प्रेम के उपादानों से एक अत्यंत सूक्ष्य और हृदयकारी सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं, किंतु उनके शब्द केवल प्रकृति-वर्णन के अंग न होकर एक दूसरे अर्थ की गहरी व्यंजना से संयोजित हैं। उनकी रचनाओं में छायावाद एवं [[रहस्यवाद]] का समावेश भी है। साथ ही शेली, कीट्स, टेनिसन आदि अंग्रेज़ी कवियों का प्रभाव भी है। मेरे मूक कवि को बाहर लाने का सर्वाधिक श्रेय मेरी जन्मभूमि के उस नैसर्गिक सौन्दर्य को है जिसकी गोद में पलकर मैं बड़ा हुआ जिसने छुटपन से ही मुझे अपने रूपहले एकांत में एकाग्र तन्मयता के रश्मिदोलन में झुलाया, रिझाया तथा कोमल कण्ठ वन-पखियों ने साथ बोलना कुहुकन सिखाया। पंतजी को जन्म के उपरांत ही मातृ-वियोग सहना पड़ा।&amp;lt;ref&amp;gt;{{cite web |url=http://www.deshbandhu.co.in/newsdetail/4919/3/0|title=वियोगी होगा पहला कवि...|accessmonthday=13 सितम्बर|accessyear=2013|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= देशबंधु|language=हिन्दी}}&amp;lt;/ref&amp;gt;&lt;br /&gt;
====भाव पक्ष====&lt;br /&gt;
पन्तजी के भाव-पक्ष का एक प्रमुख तत्त्व उनका मनोहारी प्रकृति चित्रण है। [[कौसानी]] की सौन्दर्यमयी प्राकृतिक छटा के बीच पन्तजी ने अपनी बाल-कल्पनाओं को रूपायित किया था। प्रकृति के प्रति उनका सहज आकर्षण उनकी रचनाओं के बहुत बड़े भाग को प्रभावित किए हुए है। प्रकृति के विविध आयामों और भंगिमाओं को हम पन्त के काव्य में रूपांकित देखते हैं। वह मानवी-कृता सहेली है, भावोद्दीपिका है, अभिव्यक्ति का आलम्बन है और अलंकृता प्रकृति-वधू भी है। इसके अतिरिक्त प्रकृति कवि पन्त के लिए उपदेशिका और दार्शनिक चिन्तन का आधार भी बनी है। कवि पन्त को सामान्यतया कोमल-कान्त भावनाओं और सौन्दर्य का कवि समझा जाता है किन्तु जीवन के यथार्थों से सामना होने पर कवि में जीवन के प्रति यथार्थपरक और दार्शनिक दृष्टिकोण का विकास होता गया है। सर्वप्रथम पन्त मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित हुए, जिसका प्रभाव उनकी 'युगान्त', 'युगवाणी' आदि रचनाओं में परिलक्षित होता है। गाँधीवाद से भी आप प्रभावित दिखते हैं। '[[लोकायतन]]' में यह प्रभाव विद्यमान है। [[महर्षि अरविन्द]] की विचारधारा का भी आप पर गहरा प्रभाव पड़ा। '[[गीत विहग -सुमित्रानंदन पंत|गीत-विहग]]' रचना इसका उदाहरण है। सौन्दर्य और उल्लास के कवि पन्त को जीवन का निराशामय विरूप-पक्ष भी भोगना पड़ा और इसकी प्रतिक्रिया 'परिवर्तन' नामक रचना में दृष्टिगत होती है-&lt;br /&gt;
[[चित्र:Sumitranandan-pant.jpg|thumb|left|राजकीय संग्रहालय [[कौसानी]] में स्थापित महाकवि की मूर्ति]] &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;अखिल यौवन के रंग उभार हड्डियों के हिलते कंकाल,&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
खोलता इधर जन्म लोचन मूँदती उधर मृत्यु क्षण-क्षण।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
पन्तजी के [[काव्य]] में मानवतावादी दृष्टि को भी सम्मानित स्थान प्राप्त है। वह मानवीय प्रतिष्ठा और मानव-जाति के भावी विकास में दृढ़ विश्वास रखते हैं। 'द्रुमों की छाया' और 'प्रकृति की माया' को छोड़कर जो पन्त 'बाला के बाल-जाल' में 'लोचन उलझाने' को प्रस्तुत नहीं थे, वही मानव को विधाता की सुन्दरतम कृति स्वीकार करते हैं-&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;सुन्दर है विहग सुमन सुन्दर, मानव तुम सबसे सुन्दरतम।&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
वह चाहते हैं कि देश, जाति और वर्गों में विभाजित मनुष्य की केवल एक ही पहचान हो - मानव।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====भाषा-शैली====&lt;br /&gt;
कवि पन्त का [[भाषा]] पर असाधारण अधिकार है। भाव और विषय के अनुकूल मार्मिक शब्दावली उनकी लेखनी से सहज प्रवाहित होती है। यद्यपि पन्त की भाषा का एक विशिष्ट स्तर है फिर भी वह विषयानुसार परिवर्तित होती है। पन्तजी के काव्य में एकाधिक शैलियों का प्रयोग हुआ है। प्रकृति-चित्रण में भावात्मक, आलंकारिक तथा दृश्य विधायनी शैली का प्रयोग हुआ है। विचार-प्रधान तथा दार्शनिक विषयों की शैली विचारात्मक एवं विश्लेषणात्मक भी हो गई है। इसके अतिरिक्त प्रतीक-शैली का प्रयोग भी हुआ है। सजीव बिम्ब-विधान तथा ध्वन्यात्मकता भी आपकी रचना-शैली की विशेषताएँ हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
====अलंकरण====&lt;br /&gt;
पन्तजी ने परम्परागत एवं नवीन, दोनों ही प्रकार के [[अलंकार|अलंकारों]] का भव्यता से प्रयोग किया है। बिम्बों की मौलिकता तथा उपमानों की मार्मिकता हृदयहारिणी है। [[रूपक अलंकार|रूपक]], [[उपमा अलंकार|उपमा]], सांगरूपक, मानवीकरण, विशेषण-विपर्यय तथा ध्वन्यर्थ-व्यंजना का आकर्षक प्रयोग आपने किया है।&lt;br /&gt;
====छंद====&lt;br /&gt;
पन्तजी ने परम्परागत [[छन्द|छन्दों]] के साथ-साथ नवीन छंदों की भी रचना की है। आपने गेयता और ध्वनि-प्रभाव पर ही बल दिया है, मात्राओं और वर्णों के क्रम तथा संख्या पर नहीं। प्रकृति के चितेरे तथा छायावादी कवि के रूप में पन्तजी का स्थान निश्चय ही विशिष्ट है। [[हिन्दी]] की लालित्यपूर्ण और संस्कारित [[खड़ी बोली]] भी पन्तजी की देन है। पन्तजी विश्व-साहित्य में भी अपना स्थान बना गए हैं।&lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
[[चित्र:Pant_sagrahalay.jpg|right|thumb|250px|महाकवि की स्मृतियों को संजोता राजकीय संग्रहालय]] &lt;br /&gt;
सुमित्रानंदन पंत को [[पद्म भूषण]] ([[1961]]) और [[ज्ञानपीठ पुरस्कार]] ([[1968]]) से सम्मानित किया गया। '''[[कला और बूढ़ा चाँद -सुमित्रानन्दन पंत|कला और बूढ़ा चाँद]]''' के लिए [[साहित्य अकादमी पुरस्कार हिन्दी|साहित्य अकादमी पुरस्कार]], '''[[लोकायतन -सुमित्रनन्दन पंत|लोकायतन]]''' पर 'सोवियत लैंड नेहरु पुरस्कार' एवं '[[चिदंबरा -सुमित्रानन्दन पंत|चिदंबरा]]' पर इन्हें 'भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार' प्राप्त हुआ।&lt;br /&gt;
==मृत्यु==&lt;br /&gt;
[[कौसानी]] चाय बागान के व्यवस्थापक के [[परिवार]] में जन्मे महाकवि सुमित्रानंदन पंत की मृत्यु [[28 दिसम्बर]], [[1977]] को [[इलाहाबाद]], [[उत्तर प्रदेश]] में हो गयी थी। [[उत्तराखंड]] राज्य के कौसानी में महाकवि की जन्म स्थली को सरकारी तौर पर अधिग्रहीत कर उनके नाम पर एक राजकीय संग्रहालय बनाया गया है जिसकी देखरेख एक स्थानीय व्यक्ति करता है। इस स्थल के प्रवेश द्वार से लगे भवन की छत पर महाकवि की मूर्ति स्थापित है। वर्ष [[1990]] में स्थापित इस मूर्ति का का अनावरण वयोवृद्ध साहित्यकार तथा इतिहासवेत्ता पंडित नित्यनंद मिश्र द्वारा उनके जन्म दिवस [[20 मई]] को किया गया था। महाकवि सुमित्रानंदन पंत का पैत्रक ग्राम यहां से कुछ ही दूरी पर है परन्तु वह आज भी अनजाना तथा तिरस्कृत है। संग्रहालय में महाकवि द्वारा उपयोग में लायी गयी दैनिक वस्तुयें यथा शॉल, दीपक, पुस्तकों की अलमारी तथा महाकवि को समर्पित कुछ सम्मान-पत्र, पुस्तकें तथा हस्तलिपि सुरक्षित हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.sahityashilpi.com/2008/12/blog-post_28.html सुमित्रानंदन पंत – जीवन एवं रचना संसार ]&lt;br /&gt;
*[http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/snp/ सुमित्रानंदन पंत]&lt;br /&gt;
*[http://gadyakosh.org/gk/%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%B5%E0%A4%BF_%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%AE%E0%A4%BF_%E0%A4%95%E0%A5%8C%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A5%87....._/_%E0%A4%85%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE जन्मभूमि कौसानी से.....]&lt;br /&gt;
*[http://www.aazad.com/sumitranandan-pant-.html#.UjLgRX9mids Sumitranandan Pant (सुमित्रानंदन पंत) ]&lt;br /&gt;
*[http://www.zipmytravel.com/photogallery-images-pictures-of-Sumitranandan%20Pant%20Gallery-Kausani Photogallery Of Sumitranandan Pant Gallery, Kausani]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{ज्ञानपीठ पुरस्कार}}{{सुमित्रानन्दन पंत}}{{भारत के कवि}}&lt;br /&gt;
[[Category:कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्म भूषण]]&lt;br /&gt;
[[Category:जीवनी साहित्य]]  &lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्यकार]]&lt;br /&gt;
[[Category:उपन्यासकार]][[Category:ज्ञानपीठ पुरस्कार]][[Category:साहित्य अकादमी पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
[[Category:छायावादी कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:छायावादी युग]]&lt;br /&gt;
[[Category:आधुनिक साहित्यकार]][[Category:आधुनिक कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:सुमित्रानंदन पंत]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2&amp;diff=528630</id>
		<title>श्रीलाल शुक्ल</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2&amp;diff=528630"/>
		<updated>2015-05-20T03:23:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा साहित्यकार&lt;br /&gt;
|चित्र=Shrilal Shukla55.jpg&lt;br /&gt;
|पूरा नाम=श्रीलाल शुक्ल&lt;br /&gt;
|अन्य नाम=&lt;br /&gt;
|जन्म=[[31 दिसंबर]], [[1925]] ई.&lt;br /&gt;
|जन्म भूमि=अतरौली गाँव, [[लखनऊ]]&lt;br /&gt;
|मृत्यु=[[28 अक्तूबर]], [[2011]] ई.&lt;br /&gt;
|मृत्यु स्थान=[[लखनऊ]],[[भारत]]&lt;br /&gt;
|अविभावक=&lt;br /&gt;
|पति/पत्नी=&lt;br /&gt;
|संतान=&lt;br /&gt;
|कर्म भूमि=&lt;br /&gt;
|कर्म-क्षेत्र=साहित्यकार, लेखक&lt;br /&gt;
|मुख्य रचनाएँ=सूनी घाटी का सूरज, आओ बैठ लें कुछ देर, अंगद का पांव, राग दरबारी, अज्ञातवास, आदमी का ज़हर, इस उम्र में, उमराव नगर में कुछ दिन, कुछ ज़मीन पर कुछ हवा में, ख़बरों की जुगाली, विश्रामपुर का संत, मकान, सीमाएँ टूटती हैं, संचयिता, जहालत के पचास साल, यह घर मेरा नहीं है&lt;br /&gt;
|विषय=व्यंग्य, उपन्यास, विनिबंध, आलोचना &lt;br /&gt;
|भाषा=[[अवधी|अवधी]], [[अंग्रेज़ी]], [[उर्दू]], [[संस्कृत]] और [[हिन्दी]]  &lt;br /&gt;
|विद्यालय=&lt;br /&gt;
|शिक्षा=इलाहाबाद विश्‍वविद्‍यालय से स्नातक &lt;br /&gt;
|पुरस्कार-उपाधि=[[साहित्य अकादमी पुरस्कार हिन्दी|साहित्य अकादमी पुरस्कार]], 1999 में [[व्यास सम्मान]], 2005 में यश भारती, 2008 में [[पद्मभूषण]], 2009 का [[ज्ञानपीठ पुरस्कार]] लोहिया सम्मान, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, शरद जोशी सम्मान।&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=राग दरबारी, व्यंग्य लेखन &lt;br /&gt;
|विशेष योगदान=उपन्यासकार व व्यंग्यकार के रूप में प्रतिष्ठित, 130 से अधिक पुस्तकों का लेखन।&lt;br /&gt;
|नागरिकता=भारतीय&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=1949 में [[उत्तर प्रदेश राज्य प्रशासनिक सेवा|राज्य सिविल सेवा (पी.सी.एस.)]] में चयनित, 1983 में [[भारतीय प्रशासनिक सेवा|भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस)]] के सेवानिवृत्त।&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
'''श्रीलाल शुक्ल''' ([[अंग्रेज़ी]]: ''Srilal Sukla'', जन्म: [[31 दिसंबर]], [[1925]] - मृत्यु: [[28 अक्टूबर]], [[2011]]) को [[लखनऊ|लखनऊ जनपद]] के समकालीन कथा-साहित्य में उद्देश्यपूर्ण व्यंग्य लेखन के लिये विख्यात साहित्यकार माने जाते थे। उन्होंने 1947 में [[इलाहाबाद विश्वविद्यालय]] से स्नातक परीक्षा पास की। 1949 में [[उत्तर प्रदेश राज्य प्रशासनिक सेवा|राज्य सिविल सेवा]] से नौकरी शुरू की। 1983 में [[भारतीय प्रशासनिक सेवा]] से निवृत्त हुए। उनका विधिवत लेखन 1954 से शुरू होता है और इसी के साथ [[हिंदी]] गद्य का एक गौरवशाली अध्याय आकार लेने लगता है। &lt;br /&gt;
==व्यक्तित्व==&lt;br /&gt;
श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व अपनी मिसाल आप था। सहज लेकिन सतर्क, विनोदी लेकिन विद्वान, अनुशासनप्रिय लेकिन अराजक। श्रीलाल शुक्ल [[अंग्रेज़ी]], [[उर्दू]], [[संस्कृत]] और [[हिन्दी]] भाषा के विद्वान थे। श्रीलाल शुक्ल [[संगीत]] के शास्त्रीय और सुगम दोनों पक्षों के रसिक-मर्मज्ञ थे। 'कथाक्रम' समारोह समिति के वह अध्यक्ष रहे। श्रीलाल शुक्ल जी ने गरीबी झेली, संघर्ष किया, मगर उसके विलाप से लेखन को नहीं भरा। उन्हें नई पीढ़ी भी सबसे ज़्यादा पढ़ती है। वे नई पीढ़ी को सबसे अधिक समझने और पढ़ने वाले वरिष्ठ रचनाकारों में से एक रहे। न पढ़ने और लिखने के लिए लोग सैद्धांतिकी बनाते हैं। श्रीलाल जी का लिखना और पढ़ना रुका तो स्वास्थ्य के गंभीर कारणों के चलते। श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व बड़ा सहज था। वह हमेशा मुस्कुराकर सबका स्वागत करते थे। लेकिन अपनी बात बिना लाग-लपेट कहते थे। व्यक्तित्व की इसी ख़ूबी के चलते उन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए भी व्यवस्था पर करारी चोट करने वाली '''राग दरबारी''' जैसी रचना हिंदी साहित्य को दी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==लखनऊ का गौरव==&lt;br /&gt;
'विश्वनाथ त्रिपाठी' ने [[हरिशंकर परसाई]] के लेखन को ‘स्वतंत्र भारत की आवाज़’ कहा है। श्रीलाल शुक्ल का स्वर मिला लें तो यह आवाज़ और प्रखर व पुख्ता होती है। वैसे तो वे पूरे [[भारत]] के थे, लेकिन [[लखनऊ]] के ख़ास गौरव थे। [[यशपाल]] - [[भगवतीचरण वर्मा]] - [[अमृतलाल नागर]] के बाद रचनात्मक मानचित्र पर लखनऊ चमकता रहा तो इसका बड़ा श्रेय श्रीलाल शुक्ल को दिया जायेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==रचनाएँ==&lt;br /&gt;
*10 उपन्यास, 4 कहानी संग्रह, 9 व्यंग्य संग्रह, 2 विनिबंध, 1 आलोचना पुस्तक आदि उनकी कीर्ति को बनाये रखेंगे। उनका पहला उपन्यास सूनी घाटी का सूरज 1957 में प्रकाशित हुआ. उनका सबसे लोकप्रिय उपन्यास राग दरबारी 1968 में छपा। राग दरबारी का पन्द्रह भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ। राग विराग श्रीलाल शुक्ल का आखिरी उपन्यास था। उन्होंने हिंदी साहित्य को कुल मिलाकर 25 रचनाएं दीं। इनमें मकान, पहला पड़ाव, अज्ञातवास और विश्रामपुर का संत प्रमुख हैं।&lt;br /&gt;
{| class=&amp;quot;bharattable-pink&amp;quot;&lt;br /&gt;
|-valign=&amp;quot;top&amp;quot;&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
;प्रसिद्ध रचनाएँ &lt;br /&gt;
#सूनी घाट का सूरज (1957)&lt;br /&gt;
#अज्ञातवास (1962)&lt;br /&gt;
#राग दरबारी (1968) &lt;br /&gt;
#आदमी का ज़हर (1972)&lt;br /&gt;
#सीमाएँ टूटती हैं (1973)&lt;br /&gt;
#‘मकान (1976) &lt;br /&gt;
#‘पहला पड़ाव’(1987) &lt;br /&gt;
#‘विश्रामपुर का संत (1998) &lt;br /&gt;
#बब्बरसिंह और उसके साथी (1999) &lt;br /&gt;
#राग विराग (2001) &lt;br /&gt;
#‘यह घर मेरी नहीं (1979)&lt;br /&gt;
#सुरक्षा और अन्य कहानियाँ (1991)&lt;br /&gt;
#इस उम्र में (2003)&lt;br /&gt;
#दस प्रतिनिधि कहानियाँ (2003)&lt;br /&gt;
| &lt;br /&gt;
; प्रसिद्ध व्यंग्य रचनाएँ&lt;br /&gt;
#अंगद का पाँव (1958) &lt;br /&gt;
#यहाँ से वहाँ (1970)&lt;br /&gt;
#मेरी श्रेष्‍ठ व्यंग्य रचनाएँ (1979)&lt;br /&gt;
#उमरावनगर में कुछ दिन (1986) &lt;br /&gt;
#कुछ ज़मीन में कुछ हवा में (1990)&lt;br /&gt;
#आओ बैठ लें कुछ देरे (1995)&lt;br /&gt;
#अगली शताब्दी का शहर (1996) &lt;br /&gt;
#जहालत के पचास साल (2003) &lt;br /&gt;
#खबरों की जुगाली (2005) &lt;br /&gt;
;आलोचना&lt;br /&gt;
#अज्ञेय:कुछ रंग और कुछ राग (1999)&lt;br /&gt;
;विनिबंध&lt;br /&gt;
#भगवतीचरण वर्मा (1989) &lt;br /&gt;
#अमृतलाल नागर (1994) &lt;br /&gt;
|}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==भाषा शैली==&lt;br /&gt;
उन्होंने शिवपालगंज के रूप में अपनी अद्भुत भाषा शैली, मिथकीय शिल्प और देशज मुहावरों से गढ़ा था। त्रासदियों और विडंबनाओं के इसी साम्य ने ‘राग दरबारी’ को महान कृति बनाया, तो इस कृति ने श्रीलाल शुक्ल को महान लेखक। राग दरबारी व्यंग्य है या उपन्यास, यह एक श्रेष्ठ रचना है, जिसकी तसदीक करोड़ों पाठकों ने की है और कर रहे हैं। ‘विश्रामपुर का संत’, ‘सूनी घाटी का सूरज’ और ‘यह मेरा घर नहीं’ जैसी कृतियाँ साहित्यिक कसौटियों में खरी साबित हुई हैं। बल्कि ‘विश्रामपुर का संत’ को स्वतंत्र भारत में सत्ता के खेल की सशक्त अभिव्यक्ति तक कहा गया था। राग दरबारी को इतने वर्षों बाद भी पढ़ते हुए उसके पात्र हमारे आसपास नजर आते हैं। शुक्लजी ने जब इसे लिखा था, तब एक तरह की हताशा चारों तरफ़ नजर आ रही थी। यह मोहभंग का दौर था। ऐसे निराशा भरे महौल में उन्होंने समाज की विसंगतियों को चुटीली शैली में सामने लाया था। वह श्रेष्ठ रचनाकार के साथ ही एक संवेदनशील और विनम्र इंसान भी थे।&lt;br /&gt;
;ग्रामीण परिवेश&lt;br /&gt;
श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं का एक बड़ा हिस्सा गाँव के जीवन से संबंध रखता है। ग्रामीण जीवन के व्यापक अनुभव और निरंतर परिवर्तित होते परिदृश्‍य को उन्होंने बहुत गहराई से विश्‍लेषित किया है। यह भी कहा जा सकता है कि श्रीलाल शुक्ल ने जड़ों तक जाकर व्यापक रूप से समाज की छान बीन कर, उसकी नब्ज को पकड़ा है। इसीलिए यह ग्रामीण संसार उनके [[साहित्य]] में देखने को मिला है। उनके साहित्य की मूल पृष्‍ठभूमि ग्राम समाज है परंतु नगरीय जीवन की भी सभी छवियाँ उसमें देखने को मिलती हैं। श्रीलाल शुक्ल ने साहित्य और जीवन के प्रति अपनी एक सहज धारणा का उल्लेख करते हुए कहा है कि -&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;कथालेखन में मैं जीवन के कुछ मूलभूत नैतिक मूल्यों से प्रतिबद्ध होते हुए भी यथार्थ के प्रति बहुत आकृष्‍ट हूँ। पर यथार्थ की यह धारणा इकहरी नहीं है, वह बहुस्तरीय है और उसके सभी स्तर - आध्यात्मिक, आभ्यंतरिक, भौतिक आदि जटिल रूप से अंतर्गुम्फित हैं। उनकी समग्र रूप में पहचान और अनुभूति कहीं-कहीं रचना को जटिल भले ही बनाए, पर उस समग्रता की पकड़ ही रचना को श्रेष्‍ठता देती है। जैसे मनुष्‍य एक साथ कई स्तरों पर जीता है, वैंसे ही इस समग्रता की पहचान रचना को भी बहुस्तरीयता देती है।&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
;सामाजिक व्यंग्य&lt;br /&gt;
श्रीलाल शुक्ल की सूक्ष्म और पैनी दृष्‍टि व्यवस्था की छोटी-से-छोटी विकृति को भी सहज ही देख लेती है, परख लेती है। उन्होंने अपने लेखन को सिर्फ राजनीति पर ही केंद्रित नहीं होने दिया। शिक्षा के क्षेत्र की दुर्दशा पर भी उन्होंने व्यंग्य कसा। '''1963 में प्रकाशित उनकी पहली रचना ‘धर्मयुग’ शिक्षा के क्षेत्र में''' व्याप्‍त विसंगतियों पर आधारित है। व्यंग्य संग्रह ‘अंगद का पाँव’ और  उपन्यास ‘राग दरबारी’ में श्रीलाल शुक्ल ने इसे विस्तार दिया है।&lt;br /&gt;
;शिक्षा व्यवस्था पर व्यंग्य&lt;br /&gt;
देश के अनेक सकारी स्कूलों की स्थिति दयनीय है। उनके पास अच्छा भवन तक नहीं है। कहीं कहीं तो तंबुओं में कक्षाएँ चलाती हैं, अर्थात न्यूतम सुविधाओं का भी अभाव है। श्रीलाल शुक्ल इस पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि - &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&amp;quot;यही हाल ‘राग दरबारी’ के छंगामल विद्‍यालय इंटरमीडियेट कॉलेज का भी है, जहाँ से इंटरमीडियेट पास करने वाले लड़के सिर्फ इमारत के आधार पर कह सकते हैं, सैनिटरी फिटिंग किस चिड़िया का नाम है। हमने विलायती तालीम तक देशी परंपरा में पाई है और इसीलिए हमें देखो, हम आज भी उतने ही प्राकृत हैं, हमारे इतना पढ़ लेने पर भी हमारा पेशाब पेड़ के तने पर ही उतरता है।&amp;quot;&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विडंबना यह है कि आज कल अध्यापक भी अध्यपन के अलावा सब कुछ करते हैं। ‘राग दरबारी’ के मास्टर मोतीराम की तरह वे कक्षा में पढ़ाते कम हैं और ज़्यादा समय अपनी आटे की चक्‍की को समर्पित करते हैं। ज़्यादातर शिक्षक मोतीराम ही हैं, नाम भले ही कुछ भी हो। ट्‍यूशन लेते हैं, दुकान चलाते हैं और तरह तरह के निजी धंधे करते हैं। छात्रों को देने के लिए उनके पास समय कहाँ बचता है?&lt;br /&gt;
;समसामयिक स्थितियों पर व्यंग्य&lt;br /&gt;
श्रीलाल शुक्ल ने अपने साहित्य के माध्यम से समसामयिक स्थितियों पर करारी चोट की है। वे कहते हैं कि - &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;‘आज मानव समाज अपने पतन के लिए खुद जिम्‍मेदार है। आज वह खुलकर हँस नहीं सकता। हँसने के लिए भी ‘लाफिंग क्लब’ का सहारा लेना पड़ता है। शुद्ध हवा के लिए ऑक्सीजन पार्लर जाना पड़ता है। बंद बोतल का पानी पीना पड़ता है। इंस्टेंट फूड़ खाना पड़ता है। खेलने के लिए, एक-दूसरे से बात करने के लिए भी वक्‍त की कमी है।’&amp;lt;/blockquote&amp;gt; &lt;br /&gt;
कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि श्रीलाल शुक्ल के साहित्य में जीवन का संघर्ष है और उनका साहित्य सामाजिक सरोकारों से जुड़ा है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==पुरस्कार==&lt;br /&gt;
1969 में श्रीलाल शुक्ल को [[साहित्य अकादमी पुरस्कार हिन्दी|साहित्य अकादमी]] का पुरस्कार मिला। लेकिन इसके बाद [[ज्ञानपीठ पुरस्कार|ज्ञानपीठ]] के लिए 42 साल तक इंतज़ार करना पड़ा। इस बीच उन्हें '''बिरला फ़ाउन्डेशन का [[व्यास सम्मान]]''', '''यश भारती और [[पद्म भूषण]]''' पुरस्कार भी मिले। लंबे समय से बीमार चल रहे शुक्ल को 18 अक्टूबर को [[उत्तर प्रदेश]] के [[राज्यपाल]] बी. एल. जोशी ने अस्पताल में ही [[ज्ञानपीठ पुरस्कार]] से सम्मानित किया था। [[वर्ष]] 2008 में शुक्ल को [[पद्म भूषण|पद्मभूषण पुरस्कार]] नवाजा गया था। वह '''भारतेंदु  नाट्य अकादमी लखनऊ''' के निदेशक तथा '''भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की मानद फैलोशिप''' से भी सम्मानित थे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==यात्राएँ==&lt;br /&gt;
एक लेखक के रुप में श्रीलाल शुक्ल ने [[ब्रिटेन]], [[जर्मनी]], पोलैंड, सूरीनाम, [[चीन]], यूगोस्लाविया जैसे देशों की यात्रा कर [[भारत]] का प्रतिनिधित्व किया था।&lt;br /&gt;
==निधन==&lt;br /&gt;
[[ज्ञानपीठ पुरस्कार]] और [[पद्म भूषण]] से सम्मानित तथा 'राग दरबारी' जैसा कालजयी व्यंग्य उपन्यास लिखने वाले मशहूर व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल को [[16 अक्टूबर]] को [[पार्किंसन]] बीमारी के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। [[28 अक्तूबर]], [[2011]] को [[शुक्रवार]] सुबह 11.30 बजे सहारा अस्पताल में श्रीलाल शुक्ल का निधन हो गया। वह 86 वर्ष के थे। उनके निधन पर [[लखनऊ]] के साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक3 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
*[http://www.gadyakosh.org/gk/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2_/_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%AF#.UOoseHl8_4I  श्रीलाल शुक्ल कौन है ?]&lt;br /&gt;
*[http://fresh-cartoons.blogspot.in/2011/09/blog-post_23.html?spref=fb  भारतीय ज्ञानपीठ में भी गूंजा लखनऊ का रागदरबारी]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{ज्ञानपीठ पुरस्कार}}{{साहित्यकार}}&lt;br /&gt;
[[Category:ज्ञानपीठ पुरस्कार]][[Category:साहित्य अकादमी पुरस्कार]]&lt;br /&gt;
[[Category:लेखक]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्यकार]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
[[Category:पद्म भूषण]]&lt;br /&gt;
[[Category:समकालीन कवि]]&lt;br /&gt;
[[Category:समकालीन साहित्य]][[Category:चरित कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=528290</id>
		<title>सांकाश्य</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF&amp;diff=528290"/>
		<updated>2015-05-14T08:19:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा ऐतिहासिक स्थान&lt;br /&gt;
|चित्र=Buddha-Dharma-Stambh-Sankisa.jpg&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=बुद्ध धर्म स्तम्भ, संकिसा&lt;br /&gt;
|विवरण=[[गौतम बुद्ध]] के जीवन काल में सांकाश्य ख्याति प्राप्त नगर था। [[पाली]] कथाओं के अनुसार यहीं बुद्ध त्रयस्त्रिंश स्वर्ग से अवतरित होकर आए थे। [[महाभारत]] काल में सांकाश्य की स्थिति पूर्व [[पंचाल जनपद|पंचाल देश]] में थी और यह नगर पंचाल की राजधानी [[कांपिल्य]] से अधिक दूर नहीं था।&lt;br /&gt;
|राज्य=[[उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
|केन्द्र शासित प्रदेश=&lt;br /&gt;
|ज़िला=[[एटा ज़िला]]&lt;br /&gt;
|निर्माण काल=&lt;br /&gt;
|स्थापना=&lt;br /&gt;
|मार्ग स्थिति=&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=चीनी यात्री [[युवानच्वांग]] ने सांकाश्य का नाम 'कपित्थ' भी लिखा है। संकिसा के उत्तर की ओर एक स्थान 'कारेवर' तथा 'नागताल' नाम से प्रसिद्ध हैं। &lt;br /&gt;
|मानचित्र लिंक=&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=[[जैन]] मतावलंबी सांकाश्य को तेरहवें [[विमलनाथ|तीर्थंकर विमलनाथ]] की ज्ञान-प्राप्ति का स्थान मानते हैं। यह ग्राम आजकल एक ऊँचे टीले पर स्थित है। &lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सांकाश्य''' अथवा 'संकश्या' [[प्राचीन भारत]] में [[पंचाल महाजनपद|पंचाल जनपद]] का प्रसिद्ध बौद्ध कालीन नगर, जो वर्तमान 'बसंतपुर' (ज़िला [[एटा]], [[उत्तर प्रदेश]]) है। यह [[फ़र्रुख़ाबाद]] के निकट स्थित है। सांकाश्य का सर्वप्रथम उल्लेख संभवत: [[वाल्मीकि रामायण]]&amp;lt;ref&amp;gt;वाल्मीकि आदि. 71, 16-19&amp;lt;/ref&amp;gt; में है।&lt;br /&gt;
== सुधन्वा का वध==&lt;br /&gt;
यहाँ सांकाश्य नरेश 'सुधन्वा' का [[जनक]] की राजधानी [[मिथिला]] पर आक्रमण करने का उल्लेख है। सुधन्वा [[सीता]] से [[विवाह]] करने का इच्छुक था। जनक के साथ युद्ध में सुधन्वा मारा गया तथा सांकाश्य  के राज्य का शासक जनक ने अपने भाई [[कुशध्वज]] को बना दिया। [[उर्मिला]] इन्हीं कुशध्वज की पुत्री थी-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;'कस्यचित्त्वथ कालस्य सांकाश्यादागत: पुरात्, सुधन्व्रा वीर्यवान् राजा मिथिलामवरोधक:। निहत्य तं मुनिश्रेष्ठ सुधन्वानं नराधिपम् सांकाश्ये भ्रातरं शूरमभ्यषिञ्चं कुशध्वजम्।'&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*[[महाभारत]] काल में सांकाश्य की स्थिति पूर्व [[पंचाल]] देश में थी और यह नगर पंचाल की राजधानी [[कांपिल्य]] से अधिक दूर नहीं था। &lt;br /&gt;
== बुद्ध का आगमन==&lt;br /&gt;
[[गौतम बुद्ध]] के जीवन काल में सांकाश्य ख्याति प्राप्त नगर था। [[पाली]] कथाओं के अनुसार यहीं [[बुद्ध]] त्रयस्त्रिंश स्वर्ग से अवतरित होकर आए थे। इस स्वर्ग में वे अपनी [[माता]] तथा तैंतीस देवताओं को अभिधम्म की शिक्षा देने गए थे। पाली दंतकथाओं के अनुसार बुद्ध तीन सीढ़ियों द्वारा स्वर्ग से उतरे थे और उनके साथ [[ब्रह्मा]] और शक भी थे। इस घटना से संबन्ध होने के कारण बौद्ध, सांकाश्य को पवित्र [[तीर्थ]] मानते थे और इसी कारण यहाँ अनेक [[स्तूप]] एवं विहार आदि का निर्माण हुआ था। यह उनके जीवन की चार आश्चर्यजनक घटनाओं में से एक मानी जाती है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सांकाश्य ही में बुद्ध ने अपने प्रमुख शिष्य [[आनन्द (बौद्ध)|आनन्द]] के कहने से स्त्रियों की प्रव्रज्या पर लगाई हुई रोक को तोड़ा था और भिक्षुणी उत्पलवर्णा को दीक्षा देकर स्त्रियों के लिए भी बौद्ध संघ का द्वार खोल दिया था। पालि ग्रंथ 'अभिधानप्पदीपिका' में संकस्स (सांकाश्य) की उत्तरी [[भारत]] के बीस प्रमुख नगरों में गणना की गई है। [[पाणिनी]] ने&amp;lt;ref&amp;gt;पाली कथाओं 4,2,80&amp;lt;/ref&amp;gt; में सांकाश्य की स्थिति [[इक्षुमती नदी]] पर कहीं है, जो [[संकिसा]] के पास बहने वाली ईखन है।&lt;br /&gt;
== फ़ाह्यान द्वारा उल्लेख==&lt;br /&gt;
5वीं शती में चीनी यात्री [[फ़ाह्यान]] ने संकिसा के जनपद के संख्यातीत [[बौद्ध विहार|बौद्ध विहारों]] का उल्लेख किया है। वह लिखता है कि यहाँ इतने अधिक विहार थे कि कोई मनुष्य एक-दो दिन ठहर कर तो उनकी गिनती भी नहीं कर सकता था। [[संकिसा]] के [[संघाराम]] में उस समय छ: या सात सौ भिक्षुओं का निवास था। [[युवानच्वांग]] ने 7वीं शती में सांकाश्य में स्थित एक 70 फुट ऊँचे स्तम्भ का उल्लेख किया है, जिसे राजा [[अशोक]] ने बनवाया था। इसका [[रंग]] बैंजनी था। यह इतना चमकदार था कि [[जल]] से भीगा सा जान पड़ता था। स्तम्भ के शीर्ष पर सिंह की विशाल प्रतिमा जटित थी, जिसका मुख राजाओं द्वारा बनाई हुई सीढ़ियों की ओर था। इस स्तम्भ पर चित्र-विचित्र रचनायें बनी थीं, जो बौद्धों के विश्वास के अनुसार केवल [[साधु]] पुरुषों को ही दिखलाई देती थीं। चीनी-यात्री ने इस स्तम्भ का जो वर्णन किया है, वह वास्तव में अद्भुत है। यह स्तम्भ सांकाश्य की खुदाई में अभी तक नहीं मिला है।&lt;br /&gt;
====स्तम्भ-शीर्ष====&lt;br /&gt;
विषहरी देवी के मन्दिर के पास जो स्तम्भ-शीर्ष रखा है, वह सम्भवत: एक विशाल [[हाथी]] की प्रतिमा है न कि सिंह की। इस प्रकार इसका [[अशोक स्‍तम्‍भ]] का शीर्ष होना संदिग्ध है। युवांगच्वांग ने सांकाश्य का नाम 'कपित्थ' भी लिखा है। संकिसा के उत्तर की ओर एक स्थान 'कारेवर' तथा 'नागताल' नाम से प्रसिद्ध है। प्राचीन किंवदंती के अनुसार कारेवर एक विशाल सर्प का नाम था। लोग उसकी [[पूजा]] करते थे और इस प्रकार उसकी कृपा से आसपास का क्षेत्र सुरक्षित रहता था। ताल के चिह्न आज भी हैं। इसकी परिक्रमा बौद्ध यात्री करते हैं। &lt;br /&gt;
==ज्ञान-प्राप्ति का स्थान==&lt;br /&gt;
[[जैन धर्म|जैन]] मतावलंबी सांकाश्य को तेरहवें [[तीर्थंकर]] [[विमलनाथ]] की ज्ञान-प्राप्ति का स्थान मानते हैं। संकिसा ग्राम आजकल एक ऊँचे टीले पर स्थित है। इसके आसपास अनेक टीले हैं, जिन्हें 'कोटपाकर', 'कोटमुझा', 'कोटद्वारा', 'ताराटीला', 'गौंसरताल' आदि नामों से अभिहित किया जाता है। इसका [[उत्खनन]] होने पर इस स्थान से अनेक बहुमूल्य प्राचीन अवशेषों के प्राप्त होने की आशा है। प्राचीन सांकाश्य पर्याप्त बड़ा नगर रहा होगा, क्योंकि इसकी नगर-भित्ति के [[अवशेष]] जो आज भी वर्तमान हैं, प्राय: 4 मील के घेरे में हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==वीथिका==&lt;br /&gt;
&amp;lt;gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
चित्र:Sankhisa.jpg|पुरातात्विक अधिग्रहण&lt;br /&gt;
चित्र:Sankhisa1.jpg|अशोककालीन स्तम्भ के अवशेष&lt;br /&gt;
चित्र:Sankhisa4 (2).jpg |पाली दंतकथाओं में वर्णित स्वर्ग की सीढियां&lt;br /&gt;
चित्र:Sankhisa2.jpg|विषहरी देवी मंदिर के अवशेष&lt;br /&gt;
चित्र:Sankhisa3.jpg|पुर्नस्थापित अशोककालीन स्तम्भ शीर्ष&lt;br /&gt;
&amp;lt;/gallery&amp;gt;&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
[https://www.facebook.com/notes/%E0%A4%85%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B0-%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%BE/%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%AC-%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%9F-%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%B6%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%AC%E0%A5%8C%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A8%E0%A4%97%E0%A4%B0-4/965464053484365 अभिशप्त बौद्धनगर]&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान}}{{उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]][[Category:उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्थान]][[Category:उत्तर प्रदेश के पर्यटन स्थल]][[Category:ऐतिहासिक स्थान कोश]][[Category:ऐतिहासिक स्थल]][[Category:पर्यटन कोश]][[Category:इतिहास कोश]][[Category:बौद्ध धार्मिक स्थल]][[Category:बौद्ध धर्म कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE_-%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%82&amp;diff=528280</id>
		<title>बच्चे की मां की भूमिका -जवाहरलाल नेहरू</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://bharatdiscovery.org/w/index.php?title=%E0%A4%AC%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%9A%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%AE%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE_-%E0%A4%9C%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%82&amp;diff=528280"/>
		<updated>2015-05-14T08:00:03Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Nehru_prerak.png&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=जवाहरलाल नेहरू &lt;br /&gt;
|विवरण= [[जवाहरलाल नेहरू]] &lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=भाषा&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[हिंदी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=देश&lt;br /&gt;
|पाठ 2=[[भारत]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3=&lt;br /&gt;
|पाठ 3=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 4=&lt;br /&gt;
|पाठ 4=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 5=&lt;br /&gt;
|पाठ 5=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 6=&lt;br /&gt;
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|शीर्षक 10=संकलनकर्ता&lt;br /&gt;
|पाठ 10=[[अशोक कुमार शुक्ला]]&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem style=&amp;quot;background:#fbf8df; padding:15px; font-size:14px; border:1px solid #003333; border-radius:5px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
एक दिन [[दिल्ली के संग्रहालय|तीन मूर्ति भवन]] के बगीचे में लगे पेड़-पौधों के बीच से गुजरते हुए घुमावदार रास्ते पर [[जवाहरलाल नेहरू]] जी टहल रहे थे. उनका ध्यान पौधों पर था. तभी पौधों के बीच से उन्हें एक बच्चे के रोने की आवाज आई. नेहरूजी ने आसपास देखा तो उन्हें पेड़ों के बीच एक-दो माह का बच्चा दिखाई दिया जो रो रहा था.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[जवाहरलाल नेहरू]] ने उसकी मां को इधर-उधर ढूंढ़ा पर वह नहीं मिली. चाचा ने सोचा शायद वह बगीचे में ही कहीं माली के साथ काम कर रही होगी. नेहरूजी यह सोच ही रहे थे कि बच्चे ने रोना तेज कर दिया. इस पर उन्होंने उस बच्चे की मां की भूमिका निभाने का मन बना लिया.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह बच्चे को गोद में उठाकर खिलाने लगे और वह तब तक उसके साथ रहे जब तक उसकी मां वहां नहीं आ गई. उस बच्चे को देश के [[प्रधानमंत्री]] के हाथ में देखकर उसकी मां को यकीन ही नहीं हुआ.&lt;br /&gt;
;[[जवाहरलाल नेहरू]] से जुड़े अन्य प्रसंग पढ़ने के लिए [[जवाहरलाल नेहरू के प्रेरक प्रसंग]] पर जाएँ।  &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{प्रेरक प्रसंग}}&lt;br /&gt;
[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]][[Category:समकालीन साहित्य]][[Category:प्रेरक प्रसंग]][[Category:जवाहर लाल नेहरू]][[Category:महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<title>बच्चे की मां की भूमिका -जवाहरलाल नेहरू</title>
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एक दिन [[तीन मूर्ति भवन]] के बगीचे में लगे पेड़-पौधों के बीच से गुजरते हुए घुमावदार रास्ते पर [[जवाहरलाल नेहरू]] जी टहल रहे थे. उनका ध्यान पौधों पर था. तभी पौधों के बीच से उन्हें एक बच्चे के रोने की आवाज आई. नेहरूजी ने आसपास देखा तो उन्हें पेड़ों के बीच एक-दो माह का बच्चा दिखाई दिया जो रो रहा था.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[जवाहरलाल नेहरू]] ने उसकी मां को इधर-उधर ढूंढ़ा पर वह नहीं मिली. चाचा ने सोचा शायद वह बगीचे में ही कहीं माली के साथ काम कर रही होगी. नेहरूजी यह सोच ही रहे थे कि बच्चे ने रोना तेज कर दिया. इस पर उन्होंने उस बच्चे की मां की भूमिका निभाने का मन बना लिया.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह बच्चे को गोद में उठाकर खिलाने लगे और वह तब तक उसके साथ रहे जब तक उसकी मां वहां नहीं आ गई. उस बच्चे को देश के [[प्रधानमंत्री]] के हाथ में देखकर उसकी मां को यकीन ही नहीं हुआ.&lt;br /&gt;
;[[जवाहरलाल नेहरू]] से जुड़े अन्य प्रसंग पढ़ने के लिए [[जवाहरलाल नेहरू के प्रेरक प्रसंग]] पर जाएँ।  &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{प्रेरक प्रसंग}}&lt;br /&gt;
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एक बार जब [[जवाहरलाल नेहरू]] [[तमिलनाडु]] के दौरे पर गए तब जिस सड़क से वे गुजर रहे थे वहां लोग साइकलों पर खड़े होकर तो कहीं दीवारों पर चढ़कर नेताजी को निहार रहे थे. प्रधानमंत्री की एक झलक पाने के लिए हर आदमी इतना उत्सुक था कि जिसे जहां समझ आया वहां खड़े होकर नेहरू जी को निहारने लगा.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस भीड़ भरे इलाके में नेहरूजी ने देखा कि दूर खड़ा एक गुब्बारे वाला पंजों के बल खड़ा डगमगा रहा था. ऐसा लग रहा था कि उसके हाथों के तरह-तरह के रंग-बिरंगी गुब्बारे मानो पंडितजी को देखने के लिए डोल रहे हों. जैसे वे कह रहे हों हम तुम्हारा तमिलनाडु में स्वागत करते हैं. नेहरूजी की गाड़ी जब गुब्बारे वाले तक पहुंची तो गाड़ी से उतरकर वे गुब्बारे खरीदने के लिए आगे बढ़े तो गुब्बारे वाला हक्का-बक्का-सा रह गया.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[जवाहरलाल नेहरू]]  ने अपने तमिल जानने वाले सचिव से कहकर सारे गुब्बारे खरीदवाए और वहां उपस्थित सारे बच्चों को वे गुब्बारे बंटवा दिए. ऐसे प्यारे चाचा नेहरू को बच्चों के प्रति बहुत लगाव था. नेहरू जी के मन में बच्चों के प्रति विशेष प्रेम और सहानुभूति देखकर लोग उन्हें चाचा नेहरू के नाम से संबोधित करने लगे और जैसे-जैसे गुब्बारे बच्चों के हाथों तक पहुंचे बच्चों ने चाचा नेहरू-चाचा नेहरू की तेज आवाज से वहां का वातावरण उल्लासित कर दिया. तभी से वे चाचा नेहरू के नाम से प्रसिद्ध हो गए.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;[[जवाहरलाल नेहरू]] से जुड़े अन्य प्रसंग पढ़ने के लिए [[जवाहरलाल नेहरू के प्रेरक प्रसंग]] पर जाएँ।  &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{प्रेरक प्रसंग}}&lt;br /&gt;
[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]][[Category:समकालीन साहित्य]][[Category:प्रेरक प्रसंग]][[Category:जवाहर लाल नेहरू]][[Category:महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
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&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा कविता सूची&lt;br /&gt;
|कवि का नाम=जवाहरलाल नेहरू&lt;br /&gt;
|रचना प्रकार='''प्रेरक प्रसंग - जवाहरलाल नेहरू '''&lt;br /&gt;
|रचना 1=आज़ादी की चाह &lt;br /&gt;
|रचना 2=सजा तो वाजिब ही मिली &lt;br /&gt;
|रचना 3=सिग्नेचर या हस्ताक्षर &lt;br /&gt;
|रचना 4=वृद्धा ने लगाई डांट&lt;br /&gt;
|रचना 5=पुस्तक का सम्मान&lt;br /&gt;
|रचना 6=सकारात्मक ऊर्जा&lt;br /&gt;
|रचना 7=चर्खे को विदाई&lt;br /&gt;
|रचना 8=आपको रेत का बोरा दें &lt;br /&gt;
|रचना 9=बच्चे की मां की भूमिका&lt;br /&gt;
|रचना 10=गुब्बारे खरीदने के लिए आगे बढ़े&lt;br /&gt;
|रचना 11=&lt;br /&gt;
|रचना 12=&lt;br /&gt;
|रचना 13=&lt;br /&gt;
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}}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
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&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
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वर्ष [[1956]] में जब [[जवाहरलाल नेहरू]] सऊदी अरब की राजनायिक यात्रा पर गए तो वहां से वापस आते समय शाह सऊद ने उन्हें एक कैडलक कार और उनके साथ आए लोगों को स्विस घड़ियां उपहार में दीं. लेकिन नेहरू इतने महंगे-महंगे तोहफों को पाकर काफी परेशान हो गए थे, वह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि यहां से इतने महंगे तोहफे लेकर लौटें. उनके साथ गए एक सदस्य ने उन्हें कहा कि &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अगर शाह सऊद आपको कार नहीं देंगे तो उनके पास और है ही क्या आपको देने के लिए. वह आपको रेत का बोरा दें या तेल का पीपा.”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बात पर नेहरू जोर से हंसे और कार स्वीकार कर ली. भारत लौटते ही उन्होंने कैडलक कार [[राष्ट्रपति भवन]] के वीआईपी कार बेड़े में शामिल करवा दी और वर्ष [[1956]] में तोहफे में मिली यह कार आज भी राष्ट्रपति भवन के कार बेड़े में शामिल है.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;[[जवाहरलाल नेहरू]] से जुड़े अन्य प्रसंग पढ़ने के लिए [[जवाहरलाल नेहरू के प्रेरक प्रसंग]] पर जाएँ।  &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{प्रेरक प्रसंग}}&lt;br /&gt;
[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]][[Category:समकालीन साहित्य]][[Category:प्रेरक प्रसंग]][[Category:जवाहर लाल नेहरू]][[Category:महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>आपको रेत का बोरा दें -जवाहरलाल नेहरू</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: '{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय |चित्र=Nehru_prerak.png |चित्र का ...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा संक्षिप्त परिचय&lt;br /&gt;
|चित्र=Nehru_prerak.png&lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=जवाहरलाल नेहरू &lt;br /&gt;
|विवरण= [[जवाहरलाल नेहरू]] &lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=भाषा&lt;br /&gt;
|पाठ 1=[[हिंदी]]&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=देश&lt;br /&gt;
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|पाठ 8=[[प्रेरक प्रसंग]] &lt;br /&gt;
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|शीर्षक 10=संकलनकर्ता&lt;br /&gt;
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|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
&amp;lt;poem style=&amp;quot;background:#fbf8df; padding:15px; font-size:14px; border:1px solid #003333; border-radius:5px&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
वर्ष [[1956]] में जब [[जवाहरलाल नेहरू|पंडित जवाहरलाल नेहरू]] सऊदी अरब की राजनायिक यात्रा पर गए तो वहां से वापस आते समय शाह सऊद ने उन्हें एक कैडलक कार और उनके साथ आए लोगों को स्विस घड़ियां उपहार में दीं. लेकिन नेहरू इतने महंगे-महंगे तोहफों को पाकर काफी परेशान हो गए थे, वह बिल्कुल नहीं चाहते थे कि यहां से इतने महंगे तोहफे लेकर लौटें. उनके साथ गए एक सदस्य ने उन्हें कहा कि &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“अगर शाह सऊद आपको कार नहीं देंगे तो उनके पास और है ही क्या आपको देने के लिए. वह आपको रेत का बोरा दें या तेल का पीपा.”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बात पर नेहरू जोर से हंसे और कार स्वीकार कर ली. भारत लौटते ही उन्होंने कैडलक कार [[राष्ट्रपति भवन]] के वीआईपी कार बेड़े में शामिल करवा दी और वर्ष [[1956]] में तोहफे में मिली यह कार आज भी राष्ट्रपति भवन के कार बेड़े में शामिल है.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
;[[जवाहरलाल नेहरू]] से जुड़े अन्य प्रसंग पढ़ने के लिए [[जवाहरलाल नेहरू के प्रेरक प्रसंग]] पर जाएँ।  &lt;br /&gt;
&amp;lt;/poem&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=|प्रारम्भिक=प्रारम्भिक1 |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{प्रेरक प्रसंग}}&lt;br /&gt;
[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]][[Category:समकालीन साहित्य]][[Category:प्रेरक प्रसंग]][[Category:जवाहर लाल नेहरू]][[Category:महात्मा गाँधी]]&lt;br /&gt;
[[Category:साहित्य कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
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		<title>साँचा:प्रेरक प्रसंग - जवाहरलाल नेहरू</title>
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		<updated>2015-05-14T07:20:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा कविता सूची&lt;br /&gt;
|कवि का नाम=जवाहरलाल नेहरू&lt;br /&gt;
|रचना प्रकार='''प्रेरक प्रसंग - जवाहरलाल नेहरू '''&lt;br /&gt;
|रचना 1=आज़ादी की चाह &lt;br /&gt;
|रचना 2=सजा तो वाजिब ही मिली &lt;br /&gt;
|रचना 3=सिग्नेचर या हस्ताक्षर &lt;br /&gt;
|रचना 4=वृद्धा ने लगाई डांट&lt;br /&gt;
|रचना 5=पुस्तक का सम्मान&lt;br /&gt;
|रचना 6=सकारात्मक ऊर्जा&lt;br /&gt;
|रचना 7=चर्खे को विदाई&lt;br /&gt;
|रचना 8=आपको रेत का बोरा दें &lt;br /&gt;
|रचना 9=&lt;br /&gt;
|रचना 10=&lt;br /&gt;
|रचना 11=&lt;br /&gt;
|रचना 12=&lt;br /&gt;
|रचना 13=&lt;br /&gt;
|रचना 14=&lt;br /&gt;
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|रचना 20=&lt;br /&gt;
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}}&amp;lt;noinclude&amp;gt;[[Category:अशोक कुमार शुक्ला]]&amp;lt;/noinclude&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>औरैया ज़िला</title>
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&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा ज़िला&lt;br /&gt;
|चित्र=Auraiya.jpg &lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=[[ओरैया]] &lt;br /&gt;
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|खण्डों की सँख्या=[[ओरैया]], अजीतमल, विधूना, सहार, अछल्‍दा, भाग्‍यनगर, एरवाकटरा.&lt;br /&gt;
|आदिवासी=-&lt;br /&gt;
|विधान सभा क्षेत्र =&lt;br /&gt;
|लोकसभा=-&lt;br /&gt;
|नगर पालिका=-&lt;br /&gt;
|नगर निगम=-&lt;br /&gt;
|नगर=-&lt;br /&gt;
|क़स्बे=-&lt;br /&gt;
|कुल ग्राम=-&lt;br /&gt;
|विद्युतीकृत ग्राम=-&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=-&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=-&lt;br /&gt;
|वनक्षेत्र=-&lt;br /&gt;
|बुआई क्षेत्र =-&lt;br /&gt;
|सिंचित क्षेत्र =-&lt;br /&gt;
|नगरीय जनसंख्या=-&lt;br /&gt;
|ग्रामीण जनसंख्या=-&lt;br /&gt;
|राजस्व ग्राम=-&lt;br /&gt;
|आबादी रहित ग्राम=-&lt;br /&gt;
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|नगर पंचायत=-&lt;br /&gt;
|ग्राम पंचायत=-&lt;br /&gt;
|जनपद पंचायत=-&lt;br /&gt;
|सीमा=-&lt;br /&gt;
|अनुसूचित जाति=-&lt;br /&gt;
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|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=864&lt;br /&gt;
|साक्षरता=78.95&lt;br /&gt;
|स्त्री=-&lt;br /&gt;
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|ऊँचाई=139 मीटर ऊंचाई-&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
'''औरैया''' [[भारत]] में [[उत्तर प्रदेश]] राज्य का एक प्रमुख मुख्यालय एवं नगरपालिका है। &lt;br /&gt;
जनपद के रूप में इस शहर औरैया का इतिहास नया है। [[17 सितम्बर]] [[1997]] को [[इटावा]] जनपद की दो तहसीलों औरैया और विधूना को काटकर एक नये जनपद का सृजन किया गया और इसका मुख्यालय प्रमुख रेलवे स्टेशन दिबियापुर से औरेया जाने लगभग 22 किलोमीटर मार्ग के मध्य में काकोर नामक स्थान पर बनाया गया। औरैया जनपद मुख्यालय [[राष्ट्रीय राजमार्ग 2|राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 2]] ([[मुगल रोड]]) पर स्थित है जो कि [[कानपुर]] [[महानगर]] से 105 किमी. पश्चिम तथा [[इटावा]] जनपद मुख्या‍लय से 63 किमी. पूर्व में है। इस क्षेत्र की ऐतिहासिकता इसे मराठों के गौरव से लेकर अवध के इतिहास तक जोडती है जो कि प्राचीन काल में [[पांचाल]] राज्य में शामिल था।&lt;br /&gt;
{{ज़िला लेख}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]][[Category:उत्तर प्रदेश के ज़िले]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के ज़िले]][[Category:गणराज्य संरचना कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा ज़िला&lt;br /&gt;
|चित्र=Auraiya.jpg &lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=[[औरैया]] &lt;br /&gt;
|राज्य= [[उत्तर प्रदेश]] &lt;br /&gt;
|मुख्यालय=काकोर&lt;br /&gt;
|स्थापना=है। [[17 सितम्बर]] [[1997]]&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=1379545&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=2051&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=26 अंश 21 उत्तरी अक्षांश तथा 79 अंश 31 पूर्वी देशान्तर &lt;br /&gt;
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|मंडल=[[कानपुर मण्डल]]&lt;br /&gt;
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|आदिवासी=-&lt;br /&gt;
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|अनुसूचित जनजाति=-&lt;br /&gt;
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|ऊँचाई=139 मीटर ऊंचाई-&lt;br /&gt;
|तापमान=-&lt;br /&gt;
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|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
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|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
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}}&lt;br /&gt;
'''औरैया''' [[भारत]] में [[उत्तर प्रदेश]] राज्य का एक प्रमुख मुख्यालय एवं नगरपालिका है। &lt;br /&gt;
जनपद के रूप में इस शहर औरैया का इतिहास नया है। [[17 सितम्बर]] [[1997]] को [[इटावा]] जनपद की दो तहसीलों औरैया और विधूना को काटकर एक नये जनपद का सृजन किया गया और इसका मुख्यालय प्रमुख रेलवे स्टेशन दिबियापुर से औरेया जाने लगभग 22 किलोमीटर मार्ग के मध्य में काकोर नामक स्थान पर बनाया गया। औरैया जनपद मुख्यालय [[राष्ट्रीय राजमार्ग 2|राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 2]] ([[मुगल रोड]]) पर स्थित है जो कि [[कानपुर]] [[महानगर]] से 105 किमी. पश्चिम तथा [[इटावा]] जनपद मुख्या‍लय से 63 किमी. पूर्व में है। इस क्षेत्र की ऐतिहासिकता इसे मराठों के गौरव से लेकर अवध के इतिहास तक जोडती है जो कि प्राचीन काल में [[पांचाल]] राज्य में शामिल था।&lt;br /&gt;
{{ज़िला लेख}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]][[Category:उत्तर प्रदेश के ज़िले]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के ज़िले]][[Category:गणराज्य संरचना कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>औरैया ज़िला</title>
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		<updated>2015-05-13T09:12:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{सूचना बक्सा ज़िला&lt;br /&gt;
|चित्र=Auraiya.jpg &lt;br /&gt;
|चित्र का नाम=औरैया &lt;br /&gt;
|राज्य= उत्तर प्रदेश &lt;br /&gt;
|मुख्यालय=काकोर&lt;br /&gt;
|स्थापना=है। [[17 सितम्बर]] [[1997]]&lt;br /&gt;
|जनसंख्या=1379545&lt;br /&gt;
|क्षेत्रफल=2051&lt;br /&gt;
|भौगोलिक निर्देशांक=26 अंश 21 उत्तरी अक्षांश तथा 79 अंश 31 पूर्वी देशान्तर &lt;br /&gt;
|तहसील=[[औरैया]], अजीतमल, विधूना&lt;br /&gt;
|मंडल=[[कानपुर मण्डल]]&lt;br /&gt;
|खण्डों की सँख्या=औरैया, अजीतमल, विधूना, सहार, अछल्‍दा, भाग्‍यनगर, एरवाकटरा.&lt;br /&gt;
|आदिवासी=-&lt;br /&gt;
|विधान सभा क्षेत्र =&lt;br /&gt;
|लोकसभा=-&lt;br /&gt;
|नगर पालिका=-&lt;br /&gt;
|नगर निगम=-&lt;br /&gt;
|नगर=-&lt;br /&gt;
|क़स्बे=-&lt;br /&gt;
|कुल ग्राम=-&lt;br /&gt;
|विद्युतीकृत ग्राम=-&lt;br /&gt;
|मुख्य ऐतिहासिक स्थल=-&lt;br /&gt;
|मुख्य पर्यटन स्थल=-&lt;br /&gt;
|वनक्षेत्र=-&lt;br /&gt;
|बुआई क्षेत्र =-&lt;br /&gt;
|सिंचित क्षेत्र =-&lt;br /&gt;
|नगरीय जनसंख्या=-&lt;br /&gt;
|ग्रामीण जनसंख्या=-&lt;br /&gt;
|राजस्व ग्राम=-&lt;br /&gt;
|आबादी रहित ग्राम=-&lt;br /&gt;
|आबाद ग्राम=-&lt;br /&gt;
|नगर पंचायत=-&lt;br /&gt;
|ग्राम पंचायत=-&lt;br /&gt;
|जनपद पंचायत=-&lt;br /&gt;
|सीमा=-&lt;br /&gt;
|अनुसूचित जाति=-&lt;br /&gt;
|अनुसूचित जनजाति=-&lt;br /&gt;
|प्रसिद्धि=&lt;br /&gt;
|लिंग अनुपात=864&lt;br /&gt;
|साक्षरता=78.95&lt;br /&gt;
|स्त्री=-&lt;br /&gt;
|पुरुष=-&lt;br /&gt;
|ऊँचाई=139 मीटर ऊंचाई-&lt;br /&gt;
|तापमान=-&lt;br /&gt;
|ग्रीष्म=-&lt;br /&gt;
|शरद=-&lt;br /&gt;
|वर्षा=-&lt;br /&gt;
|दूरभाष कोड= 05683&lt;br /&gt;
|वाहन पंजी.=-&lt;br /&gt;
|संबंधित लेख=&lt;br /&gt;
|पाठ 1=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 1=&lt;br /&gt;
|पाठ 2=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 2=&lt;br /&gt;
|पाठ 3=&lt;br /&gt;
|शीर्षक 3=&lt;br /&gt;
|अन्य जानकारी=घनत्व (681/ वर्ग किमी)&lt;br /&gt;
|बाहरी कड़ियाँ=&lt;br /&gt;
|अद्यतन=&lt;br /&gt;
}}&lt;br /&gt;
{{ज़िला लेख}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]][[Category:उत्तर प्रदेश के ज़िले]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के ज़िले]][[Category:गणराज्य संरचना कोश]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>मुग़ल रोड</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''मुगल रोड''' [[ग्राण्ड ट्रंक रोड]] के उस हिस्से को कहा जाता है जो भारत देश के अंतरगत पडता है। [[शेरशाह सूरी]] ने [[बंगाल]] के [[सोनागाँव]] से [[सिंध प्रांत]] तक दो हज़ार मील लंबी पक्की सड़क बनवाई थी, ताकि यातायात की उत्तम व्यवस्था हो सके। साथ ही उसने यात्रियों एवं व्यापारियों की सुरक्षा का भी संतोषजनक प्रबंध किया। यह प्राचीन [[ग्राण्ड ट्रंक रोड]] [[भारत]] [[पाकिस्तान]] और [[अफगानिस्तान]] के तीन खण्डों में विभाजित हो गयी है। इस मार्ग का वह हिस्सा जो भारत के अंतरगत आता है अब [[राष्ट्रीय राजमार्ग 1]] और [[राष्ट्रीय राजमार्ग 2]] के नाम से जाना जाता है।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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		<title>मुग़ल रोड</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: ''''मुगल रोड'''ग्राण्ड ट्रंक रोड के उस हिस्से को कहा जा...' के साथ नया पन्ना बनाया&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;'''मुगल रोड'''[[ग्राण्ड ट्रंक रोड]] के उस हिस्से को कहा जाता है जो भारत के अंतरगत पडता है। [[शेरशाह सूरी]] ने [[बंगाल]] के [[सोनागाँव]] से [[सिंध प्रांत]] तक दो हज़ार मील लंबी पक्की सड़क बनवाई थी, ताकि यातायात की उत्तम व्यवस्था हो सके। साथ ही उसने यात्रियों एवं व्यापारियों की सुरक्षा का भी संतोषजनक प्रबंध किया। यह प्राचीन [[ग्राण्ड ट्रंक रोड]] [[भारत]] [[पाकिस्तान]] और [[अफगानिस्तान]] के तीन खण्डों में विभाजित हो गयी है। इस मार्ग का वह हिस्सा जो भारत के अंतरगत आता है अब [[राष्ट्रीय राजमार्ग 1]] और [[राष्ट्रीय राजमार्ग 2]] के नाम से जाना जाता है।&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>ओरैया</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Dr, ashok shukla: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[चित्र:Auraiya.jpg|thumb|250px|ओरैया]]&lt;br /&gt;
'''औरैया''' [[भारत]] में [[उत्तर प्रदेश]] राज्य का एक प्रमुख मुख्यालय एवं नगरपालिका है। &lt;br /&gt;
जनपद के रूप में इस शहर औरैया का इतिहास नया है। [[17 सितम्बर]] [[1997]] को [[इटावा]] जनपद की दो तहसीलों औरैया और विधूना को काटकर एक नये जनपद का सृजन किया गया और इसका मुख्यालय प्रमुख रेलवे स्टेशन दिबियापुर से औरेया जाने लगभग 22 किलोमीटर मार्ग के मध्य में काकोर नामक स्थान पर बनाया गया। प्रदेश का यह यह नवीन जनपद है [[कानपुर मण्डल]] के अन्तर्गत है। जनपद मुख्यालय बनने से पूर्व यह [[इटावा]] जनपद का तहसील मुख्यालय रहा है।  औरैया जनपद मुख्यालय [[राष्ट्रीय राजमार्ग 2|राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 2]] ([[मुगल रोड]]) पर स्थित है जो कि कानपुर महानगर से 105 किमी. पश्चिम तथा [[इटावा]] जनपद मुख्या‍लय से 63 किमी. पूर्व में है। समुद़ तल से यह 139 मीटर ऊंचाई पर 26 अंश 21 उत्तरी अक्षांश तथा 79 अंश 31 पूर्वी देशान्तर पर बसा है। जनपद की साक्षरता 79 प्रतिशत और लिंगानुपात 864 है।&lt;br /&gt;
==ऐतिहासिकता== &lt;br /&gt;
इस क्षेत्र की ऐतिहासिकता इसे मराठों के गौरव से लेकर अवध के इतिहास तक जोडती है जो कि प्राचीन काल में [[पांचाल]] राज्य में शामिल था।&lt;br /&gt;
==नवसृजन==&lt;br /&gt;
[[4 दिसम्बर]] [[2013]] को उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश के सात जनपदों में नई तहसीलों के गठन का निर्णय लिया जिसमें औरेया जनपद में अजितमल नामक तहसील का नवसृजन हुआ| वर्तमान औरैया जनपद में तीन तहसीलें तथा 7 [[विकास खण्ड]] ‍‍‍हैं जिनके नाम हैं,औरैया, अजीतमल, विधूना, सहार, अछल्‍दा, भाग्‍यनगर, एरवाकटरा...|&lt;br /&gt;
{{प्रचार}}&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
{{उत्तर प्रदेश के नगर}}&lt;br /&gt;
{{ब्रज}}&lt;br /&gt;
{{ब्रज के दर्शनीय स्थल}}&lt;br /&gt;
{{ब्रज के प्रमुख स्थल}}&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश]]&lt;br /&gt;
[[Category:उत्तर प्रदेश के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:भारत के नगर]]&lt;br /&gt;
[[Category:ब्रज]]&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;br /&gt;
{{लेख प्रगति|आधार=आधार1|प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}&lt;br /&gt;
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==&lt;br /&gt;
&amp;lt;references/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==बाहरी कड़ियाँ==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==संबंधित लेख==&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[Category:नया पन्ना {{LOCALMONTHNAME}} {{LOCALYEAR}}]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
__INDEX__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dr, ashok shukla</name></author>
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