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	<title>वरुणदेव का वरदान - अवतरण इतिहास</title>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replacement - &quot;पश्चात &quot; to &quot;पश्चात् &quot;</title>
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'मैं वरुण हूँ। इस तालाब में रोज़ एक सोने का फूल खिलता है। उसे मैं पूजा में चढ़ाता हूँ। यह वही फूल है। इसलिए लाओ, यह फूल मुझे दे दो।' कहते हुए अद्भुत पुरुष ने हाथ पसार दिया। त्रिलोक ने फूल उसे दे दिया और शर्मिंदा−सा होकर बोला, 'मुझे नहीं मालूम था, इसलिए धोखे में तोड़ लिया था। आप फूल ले जाइए।' कहते हुए उसने हाथ जोड़कर सिर झुका दिया। वरुण देवता उसकी सरलता और भोलेपन पर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा, 'तुम्हारी सच्चाई और संतोषी स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम क्या चाहते हो? मेरे वरदान से तुम्हारी कोई भी इच्छा पूरी हो जाएगी।' साक्षात वरुण देवता को सामने पाकर त्रिलोक तो वैसे भी हतप्रभ−सा था, अतः निष्कपट भाव से उसने कहा, 'स्वामी! आप तो अंतर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। मैं आपसे क्या माँगूं? आप जो भी देंगे, मेरे लिए बहुत होगा।' वरुण देवता ने प्रसन्न होकर उसके सिर पर अपना हाथ फेर दिया और कहा, 'फिर भी, तुम कुछ तो कहो। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। तुम्हारा भोलापन और निःस्वार्थ आचरण देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।' त्रिलोक ने हाथ जोड़कर कहा, 'भगवान्! यदि आप मुझसे वास्तव में ही प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मेरे घर में किसी को असंतोष न हो। स्त्री और बच्चे सदा प्रसन्न रहें और मैं जीवनभर आपके मंदिर में पूजा करता रहूँ तथा जितना संभव हो सके, दूसरों के सुख−दुःख में हमेशा काम आ सकूँ।'&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;एक दिन त्रिलोक दोपहर को खेतों से काम निपटाकर घर पर लौट रहा था। रास्ते में एक तालाब था। गरमी तो थी ही, अतः त्रिलोक ने सोचा, यहीं नहा लूं। यही सोचकर उसने सिर पर रखा लकड़ियों का गट्ठर एक किनारे रख दिया और तालाब में घुस गया। दोपहर का समय होने के कारण आस−पास कोई न था। तालाब में कमल खिले हुए थे। नहाते−नहाते त्रिलोक ने सोचा कि क्यों न दो−चार फूल तोड़ लूं, घर जाते समय मंदिर में चढ़ा दूंगा। गाँव में [[वरुण देवता|वरुण]] देवता का एक बहुत पुराना मंदिर था। लोग बड़ी श्रद्धा से वहाँ पूजा करने जाते थे। त्रिलोक जब फूल तोड़ रहा था, तभी उसकी निगाह एक कली पर पड़ी। वह सोने की तरह चमक रही थी। उत्सुकता में आकर त्रिलोक ने उसे तोड़ लिया। उसके हाथ में आते ही वह कली फूल बन गयी। लेकिन वह फूल साधारण न होकर सोने का फूल था−ठोस और असली। त्रिलोक दंग रह गया। उसकी समझ में नहीं आया कि यह कैसी और किसकी लीला है और अब उसे करना करना चाहिए? ठीक तभी एक बहुत सुंदर मनुष्य जल में प्रकट हुआ और त्रिलोक के पास आकर बोला, 'त्रिलोक! यह फूल मुझे दे दो।' त्रिलोक ने उस अद्भुत मनुष्य की ओर देखते हुए पूछा, 'क्यों? आप कौन हैं? यह सुंदर फूल मैं आपको क्यों दूं?' 'मैं वरुण हूँ। इस तालाब में रोज़ एक सोने का फूल खिलता है। उसे मैं पूजा में चढ़ाता हूँ। यह वही फूल है। इसलिए लाओ, यह फूल मुझे दे दो।' कहते हुए अद्भुत पुरुष ने हाथ पसार दिया। त्रिलोक ने फूल उसे दे दिया और शर्मिंदा−सा होकर बोला, 'मुझे नहीं मालूम था, इसलिए धोखे में तोड़ लिया था। आप फूल ले जाइए।' कहते हुए उसने हाथ जोड़कर सिर झुका दिया। वरुण देवता उसकी सरलता और भोलेपन पर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा, 'तुम्हारी सच्चाई और संतोषी स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम क्या चाहते हो? मेरे वरदान से तुम्हारी कोई भी इच्छा पूरी हो जाएगी।' साक्षात वरुण देवता को सामने पाकर त्रिलोक तो वैसे भी हतप्रभ−सा था, अतः निष्कपट भाव से उसने कहा, 'स्वामी! आप तो अंतर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। मैं आपसे क्या माँगूं? आप जो भी देंगे, मेरे लिए बहुत होगा।' वरुण देवता ने प्रसन्न होकर उसके सिर पर अपना हाथ फेर दिया और कहा, 'फिर भी, तुम कुछ तो कहो। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। तुम्हारा भोलापन और निःस्वार्थ आचरण देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।' त्रिलोक ने हाथ जोड़कर कहा, 'भगवान्! यदि आप मुझसे वास्तव में ही प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मेरे घर में किसी को असंतोष न हो। स्त्री और बच्चे सदा प्रसन्न रहें और मैं जीवनभर आपके मंदिर में पूजा करता रहूँ तथा जितना संभव हो सके, दूसरों के सुख−दुःख में हमेशा काम आ सकूँ।'&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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'देखो तिरलोक!' आलोक ने कहा, 'तुम मुझे सच−सच बता दो कि तुम इतना सारा धन कहाँ से लाए हो? तुम्हें कहीं से कोई ख़ज़ाना मिल गया है या बापू की कोई रकम तुम छिपाए हुए थे?' भोले त्रिलोक ने बैर−विरोध भूलकर सारी घटना सच−सच सुना दी कि किस प्रकार वरुण देव ने उसे वरदान दिया था।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;'तथास्तु!' कहकर वरुण देवता अंतर्ध्यान हो गए। झटका खाकर गहरी नींद से जागे हुए व्यक्ति की तरह त्रिलोक इधर−उधर देखने लगा। कहीं भी कोई न था। था तो केवल वह तालाब, वही कमल के फूल और पत्ते। लेकिन वरुण देवता या उस सोने के फूल का कहीं कोई चिह्न न था। त्रिलोक सोचने लगा कि कहीं जागती आँखों से वह कोई स्वप्न तो नहीं देख रहा था। किंतु नहीं, अभी−अभी उसके हाथ में सोने का फूल था और स्वयं वरुण देवता उससे मुखातिब थे। 'हे भगवान! क्या होने वाला है?' इसी प्रकार के विचारों में डूबा हुआ तिरलोक कंधे पर लकड़ियों का गट्ठर लादकर घर की ओर चल पड़ा। दूसरे दिन जैसे कोई चमत्कार होने लगा। त्रिलोक जिस काम में हाथ डालता, उसमें दोगुना नहीं, बल्कि दसियों गुना लाभ होता। उसके घर में सारी चीज़ें न जाने कैसे बढ़ जाती थीं। कोई भी वस्तु कम नहीं पड़ती थी। चाहे जितना खर्च किया जाता, सामान बच ही जाता था। खेतों की पैदावार तो इतनी बढ़ी कि कहीं अनाज रखने की जगह नहीं बची। बहुत−सा धान और अनाज त्रिलोक ने गाँव वालों को बाँट दिया। इतने पर भी घमंड उससे कोसों दूर था। वह तो किसी से ऊँची आवाज़ में बात भी नहीं करता था। बँटवारे के समय आलोक ने बेईमानी के कारण बाप का बहुत−कर्ज़ बता रखा था। उसका आधा हिस्सा त्रिलोक को भरना पड़ता था। इन दिनों जब वह सम्पन्न हुआ तो महाजन के पास जाकर अपने और आलोक के हिस्से का भी पूरा कर्ज़ अदा कर आया। गाँव के कितने ही ग़रीबों को वह अनाज व कपड़े बाँट देता था। यहाँ तक कि दूसरे गाँवों के लोग भी उससे सहायता लेने लगे। इस प्रकार त्रिलोक की कीर्ति दिनों−दिन बढ़ती जा रही थी। चारों ओर उसकी सहृदयता के चर्चे सुनाई देते थे। आलोक ने यह सब देखकर सोचा, 'क्या त्रिलोक को कोई ख़ज़ाना मिल गया है? तभी तो वह इस तरह दिल खोलकर रुपया लुटा रहा है। खुद तो मौज मार ही रहा है, दूसरों पर भी धन लुटा रहा है। लगता है, उसने बापू की कोई रकम पहले से ही चुरा रखी थी। जिसका मुझे पता नहीं है और अब इतने दिनों बाद उसे निकालकर मौज कर रहा है। किंतु मैं भी खामोश बैठने वाला नहीं हूँ। मैं यह रहस्य जानकर ही रहूँगा कि उसके पास इतना धन कहाँ से आया।' और फिर दूसरे ही दिन वह त्रिलोक के पास जा पहुँचा। त्रिलोक ने दिल खोलकर उसकी खातिरदारी की। त्रिलोक की पत्नी ने भी उसके आदर से चरण स्पर्श किए। उसके &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;पश्चात् &lt;/ins&gt;त्रिलोक ने पूछा, 'मेरी याद कैसे आ गई भैया?' 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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;मजदूर&quot; to &quot;मज़दूर&quot;</title>
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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;दरवाजे&quot; to &quot;दरवाज़े&quot;</title>
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'मैं वरुण हूँ। इस तालाब में रोज़ एक सोने का फूल खिलता है। उसे मैं पूजा में चढ़ाता हूँ। यह वही फूल है। इसलिए लाओ, यह फूल मुझे दे दो।' कहते हुए अद्भुत पुरुष ने हाथ पसार दिया। त्रिलोक ने फूल उसे दे दिया और शर्मिंदा−सा होकर बोला, 'मुझे नहीं मालूम था, इसलिए धोखे में तोड़ लिया था। आप फूल ले जाइए।' कहते हुए उसने हाथ जोड़कर सिर झुका दिया। वरुण देवता उसकी सरलता और भोलेपन पर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा, 'तुम्हारी सच्चाई और संतोषी स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम क्या चाहते हो? मेरे वरदान से तुम्हारी कोई भी इच्छा पूरी हो जाएगी।' साक्षात वरुण देवता को सामने पाकर त्रिलोक तो वैसे भी हतप्रभ−सा था, अतः निष्कपट भाव से उसने कहा, 'स्वामी! आप तो अंतर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। मैं आपसे क्या माँगूं? आप जो भी देंगे, मेरे लिए बहुत होगा।' वरुण देवता ने प्रसन्न होकर उसके सिर पर अपना हाथ फेर दिया और कहा, 'फिर भी, तुम कुछ तो कहो। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। तुम्हारा भोलापन और निःस्वार्थ आचरण देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।' त्रिलोक ने हाथ जोड़कर कहा, 'भगवान्! यदि आप मुझसे वास्तव में ही प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मेरे घर में किसी को असंतोष न हो। स्त्री और बच्चे सदा प्रसन्न रहें और मैं जीवनभर आपके मंदिर में पूजा करता रहूँ तथा जितना संभव हो सके, दूसरों के सुख−दुःख में हमेशा काम आ सकूँ।'&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;एक दिन त्रिलोक दोपहर को खेतों से काम निपटाकर घर पर लौट रहा था। रास्ते में एक तालाब था। गरमी तो थी ही, अतः त्रिलोक ने सोचा, यहीं नहा लूं। यही सोचकर उसने सिर पर रखा लकड़ियों का गट्ठर एक किनारे रख दिया और तालाब में घुस गया। दोपहर का समय होने के कारण आस−पास कोई न था। तालाब में कमल खिले हुए थे। नहाते−नहाते त्रिलोक ने सोचा कि क्यों न दो−चार फूल तोड़ लूं, घर जाते समय मंदिर में चढ़ा दूंगा। गाँव में [[वरुण देवता|वरुण]] देवता का एक बहुत पुराना मंदिर था। लोग बड़ी श्रद्धा से वहाँ पूजा करने जाते थे। त्रिलोक जब फूल तोड़ रहा था, तभी उसकी निगाह एक कली पर पड़ी। वह सोने की तरह चमक रही थी। उत्सुकता में आकर त्रिलोक ने उसे तोड़ लिया। उसके हाथ में आते ही वह कली फूल बन गयी। लेकिन वह फूल साधारण न होकर सोने का फूल था−ठोस और असली। त्रिलोक दंग रह गया। उसकी समझ में नहीं आया कि यह कैसी और किसकी लीला है और अब उसे करना करना चाहिए? ठीक तभी एक बहुत सुंदर मनुष्य जल में प्रकट हुआ और त्रिलोक के पास आकर बोला, 'त्रिलोक! यह फूल मुझे दे दो।' त्रिलोक ने उस अद्भुत मनुष्य की ओर देखते हुए पूछा, 'क्यों? आप कौन हैं? यह सुंदर फूल मैं आपको क्यों दूं?' 'मैं वरुण हूँ। इस तालाब में रोज़ एक सोने का फूल खिलता है। उसे मैं पूजा में चढ़ाता हूँ। यह वही फूल है। इसलिए लाओ, यह फूल मुझे दे दो।' कहते हुए अद्भुत पुरुष ने हाथ पसार दिया। त्रिलोक ने फूल उसे दे दिया और शर्मिंदा−सा होकर बोला, 'मुझे नहीं मालूम था, इसलिए धोखे में तोड़ लिया था। आप फूल ले जाइए।' कहते हुए उसने हाथ जोड़कर सिर झुका दिया। वरुण देवता उसकी सरलता और भोलेपन पर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा, 'तुम्हारी सच्चाई और संतोषी स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम क्या चाहते हो? मेरे वरदान से तुम्हारी कोई भी इच्छा पूरी हो जाएगी।' साक्षात वरुण देवता को सामने पाकर त्रिलोक तो वैसे भी हतप्रभ−सा था, अतः निष्कपट भाव से उसने कहा, 'स्वामी! आप तो अंतर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। मैं आपसे क्या माँगूं? आप जो भी देंगे, मेरे लिए बहुत होगा।' वरुण देवता ने प्रसन्न होकर उसके सिर पर अपना हाथ फेर दिया और कहा, 'फिर भी, तुम कुछ तो कहो। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। तुम्हारा भोलापन और निःस्वार्थ आचरण देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।' त्रिलोक ने हाथ जोड़कर कहा, 'भगवान्! यदि आप मुझसे वास्तव में ही प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मेरे घर में किसी को असंतोष न हो। स्त्री और बच्चे सदा प्रसन्न रहें और मैं जीवनभर आपके मंदिर में पूजा करता रहूँ तथा जितना संभव हो सके, दूसरों के सुख−दुःख में हमेशा काम आ सकूँ।'&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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'देखो तिरलोक!' आलोक ने कहा, 'तुम मुझे सच−सच बता दो कि तुम इतना सारा धन कहाँ से लाए हो? तुम्हें कहीं से कोई ख़ज़ाना मिल गया है या बापू की कोई रकम तुम छिपाए हुए थे?' भोले त्रिलोक ने बैर−विरोध भूलकर सारी घटना सच−सच सुना दी कि किस प्रकार वरुण देव ने उसे वरदान दिया था।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;'तथास्तु!' कहकर वरुण देवता अंतर्ध्यान हो गए। झटका खाकर गहरी नींद से जागे हुए व्यक्ति की तरह त्रिलोक इधर−उधर देखने लगा। कहीं भी कोई न था। था तो केवल वह तालाब, वही कमल के फूल और पत्ते। लेकिन वरुण देवता या उस सोने के फूल का कहीं कोई चिह्न न था। त्रिलोक सोचने लगा कि कहीं जागती आँखों से वह कोई स्वप्न तो नहीं देख रहा था। किंतु नहीं, अभी−अभी उसके हाथ में सोने का फूल था और स्वयं वरुण देवता उससे मुखातिब थे। 'हे भगवान! क्या होने वाला है?' इसी प्रकार के विचारों में डूबा हुआ तिरलोक कंधे पर लकड़ियों का गट्ठर लादकर घर की ओर चल पड़ा। दूसरे दिन जैसे कोई चमत्कार होने लगा। त्रिलोक जिस काम में हाथ डालता, उसमें दोगुना नहीं, बल्कि दसियों गुना लाभ होता। उसके घर में सारी चीज़ें न जाने कैसे बढ़ जाती थीं। कोई भी वस्तु कम नहीं पड़ती थी। चाहे जितना खर्च किया जाता, सामान बच ही जाता था। खेतों की पैदावार तो इतनी बढ़ी कि कहीं अनाज रखने की जगह नहीं बची। बहुत−सा धान और अनाज त्रिलोक ने गाँव वालों को बाँट दिया। इतने पर भी घमंड उससे कोसों दूर था। वह तो किसी से ऊँची &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;आवाज़ &lt;/ins&gt;में बात भी नहीं करता था। बँटवारे के समय आलोक ने बेईमानी के कारण बाप का बहुत−कर्ज़ बता रखा था। उसका आधा हिस्सा त्रिलोक को भरना पड़ता था। इन दिनों जब वह सम्पन्न हुआ तो महाजन के पास जाकर अपने और आलोक के हिस्से का भी पूरा कर्ज़ अदा कर आया। गाँव के कितने ही ग़रीबों को वह अनाज व कपड़े बाँट देता था। यहाँ तक कि दूसरे गाँवों के लोग भी उससे सहायता लेने लगे। इस प्रकार त्रिलोक की कीर्ति दिनों−दिन बढ़ती जा रही थी। चारों ओर उसकी सहृदयता के चर्चे सुनाई देते थे। आलोक ने यह सब देखकर सोचा, 'क्या त्रिलोक को कोई ख़ज़ाना मिल गया है? तभी तो वह इस तरह दिल खोलकर रुपया लुटा रहा है। खुद तो मौज मार ही रहा है, दूसरों पर भी धन लुटा रहा है। लगता है, उसने बापू की कोई रकम पहले से ही चुरा रखी थी। जिसका मुझे पता नहीं है और अब इतने दिनों बाद उसे निकालकर मौज कर रहा है। किंतु मैं भी खामोश बैठने वाला नहीं हूँ। मैं यह रहस्य जानकर ही रहूँगा कि उसके पास इतना धन कहाँ से आया।' और फिर दूसरे ही दिन वह त्रिलोक के पास जा पहुँचा। त्रिलोक ने दिल खोलकर उसकी खातिरदारी की। त्रिलोक की पत्नी ने भी उसके आदर से चरण स्पर्श किए। उसके पश्चात त्रिलोक ने पूछा, 'मेरी याद कैसे आ गई भैया?' 'देखो तिरलोक!' आलोक ने कहा, 'तुम मुझे सच−सच बता दो कि तुम इतना सारा धन कहाँ से लाए हो? तुम्हें कहीं से कोई ख़ज़ाना मिल गया है या बापू की कोई रकम तुम छिपाए हुए थे?' भोले त्रिलोक ने बैर−विरोध भूलकर सारी घटना सच−सच सुना दी कि किस प्रकार वरुण देव ने उसे वरदान दिया था।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;चीजें&quot; to &quot;चीज़ें&quot;</title>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;जमीन&quot; to &quot;ज़मीन&quot;</title>
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		<updated>2011-03-08T14:25:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot;जमीन&amp;quot; to &amp;quot;ज़मीन&amp;quot;&lt;/p&gt;
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'मैं वरुण हूँ। इस तालाब में रोज़ एक सोने का फूल खिलता है। उसे मैं पूजा में चढ़ाता हूँ। यह वही फूल है। इसलिए लाओ, यह फूल मुझे दे दो।' कहते हुए अद्भुत पुरुष ने हाथ पसार दिया। त्रिलोक ने फूल उसे दे दिया और शर्मिंदा−सा होकर बोला, 'मुझे नहीं मालूम था, इसलिए धोखे में तोड़ लिया था। आप फूल ले जाइए।' कहते हुए उसने हाथ जोड़कर सिर झुका दिया। वरुण देवता उसकी सरलता और भोलेपन पर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा, 'तुम्हारी सच्चाई और संतोषी स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम क्या चाहते हो? मेरे वरदान से तुम्हारी कोई भी इच्छा पूरी हो जाएगी।' साक्षात वरुण देवता को सामने पाकर त्रिलोक तो वैसे भी हतप्रभ−सा था, अतः निष्कपट भाव से उसने कहा, 'स्वामी! आप तो अंतर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। मैं आपसे क्या माँगूं? आप जो भी देंगे, मेरे लिए बहुत होगा।' वरुण देवता ने प्रसन्न होकर उसके सिर पर अपना हाथ फेर दिया और कहा, 'फिर भी, तुम कुछ तो कहो। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। तुम्हारा भोलापन और निःस्वार्थ आचरण देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।' त्रिलोक ने हाथ जोड़कर कहा, 'भगवान्! यदि आप मुझसे वास्तव में ही प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मेरे घर में किसी को असंतोष न हो। स्त्री और बच्चे सदा प्रसन्न रहें और मैं जीवनभर आपके मंदिर में पूजा करता रहूँ तथा जितना संभव हो सके, दूसरों के सुख−दुःख में हमेशा काम आ सकूँ।'&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;एक दिन त्रिलोक दोपहर को खेतों से काम निपटाकर घर पर लौट रहा था। रास्ते में एक तालाब था। गरमी तो थी ही, अतः त्रिलोक ने सोचा, यहीं नहा लूं। यही सोचकर उसने सिर पर रखा लकड़ियों का गट्ठर एक किनारे रख दिया और तालाब में घुस गया। दोपहर का समय होने के कारण आस−पास कोई न था। तालाब में कमल खिले हुए थे। नहाते−नहाते त्रिलोक ने सोचा कि क्यों न दो−चार फूल तोड़ लूं, घर जाते समय मंदिर में चढ़ा दूंगा। गाँव में [[वरुण देवता|वरुण]] देवता का एक बहुत पुराना मंदिर था। लोग बड़ी श्रद्धा से वहाँ पूजा करने जाते थे। त्रिलोक जब फूल तोड़ रहा था, तभी उसकी निगाह एक कली पर पड़ी। वह सोने की तरह चमक रही थी। उत्सुकता में आकर त्रिलोक ने उसे तोड़ लिया। उसके हाथ में आते ही वह कली फूल बन गयी। लेकिन वह फूल साधारण न होकर सोने का फूल था−ठोस और असली। त्रिलोक दंग रह गया। उसकी समझ में नहीं आया कि यह कैसी और किसकी लीला है और अब उसे करना करना चाहिए? ठीक तभी एक बहुत सुंदर मनुष्य जल में प्रकट हुआ और त्रिलोक के पास आकर बोला, 'त्रिलोक! यह फूल मुझे दे दो।' त्रिलोक ने उस अद्भुत मनुष्य की ओर देखते हुए पूछा, 'क्यों? आप कौन हैं? यह सुंदर फूल मैं आपको क्यों दूं?' 'मैं वरुण हूँ। इस तालाब में रोज़ एक सोने का फूल खिलता है। उसे मैं पूजा में चढ़ाता हूँ। यह वही फूल है। इसलिए लाओ, यह फूल मुझे दे दो।' कहते हुए अद्भुत पुरुष ने हाथ पसार दिया। त्रिलोक ने फूल उसे दे दिया और शर्मिंदा−सा होकर बोला, 'मुझे नहीं मालूम था, इसलिए धोखे में तोड़ लिया था। आप फूल ले जाइए।' कहते हुए उसने हाथ जोड़कर सिर झुका दिया। वरुण देवता उसकी सरलता और भोलेपन पर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा, 'तुम्हारी सच्चाई और संतोषी स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम क्या चाहते हो? मेरे वरदान से तुम्हारी कोई भी इच्छा पूरी हो जाएगी।' साक्षात वरुण देवता को सामने पाकर त्रिलोक तो वैसे भी हतप्रभ−सा था, अतः निष्कपट भाव से उसने कहा, 'स्वामी! आप तो अंतर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। मैं आपसे क्या माँगूं? आप जो भी देंगे, मेरे लिए बहुत होगा।' वरुण देवता ने प्रसन्न होकर उसके सिर पर अपना हाथ फेर दिया और कहा, 'फिर भी, तुम कुछ तो कहो। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। तुम्हारा भोलापन और निःस्वार्थ आचरण देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।' त्रिलोक ने हाथ जोड़कर कहा, 'भगवान्! यदि आप मुझसे वास्तव में ही प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मेरे घर में किसी को असंतोष न हो। स्त्री और बच्चे सदा प्रसन्न रहें और मैं जीवनभर आपके मंदिर में पूजा करता रहूँ तथा जितना संभव हो सके, दूसरों के सुख−दुःख में हमेशा काम आ सकूँ।'&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot; रोज &quot; to &quot; रोज़ &quot;</title>
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		<updated>2011-03-08T13:51:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Text replace - &amp;quot; रोज &amp;quot; to &amp;quot; रोज़ &amp;quot;&lt;/p&gt;
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'मैं वरुण हूँ। इस तालाब में &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;रोज &lt;/del&gt;एक सोने का फूल खिलता है। उसे मैं पूजा में चढ़ाता हूँ। यह वही फूल है। इसलिए लाओ, यह फूल मुझे दे दो।' कहते हुए अद्भुत पुरुष ने हाथ पसार दिया। त्रिलोक ने फूल उसे दे दिया और शर्मिंदा−सा होकर बोला, 'मुझे नहीं मालूम था, इसलिए धोखे में तोड़ लिया था। आप फूल ले जाइए।' कहते हुए उसने हाथ जोड़कर सिर झुका दिया। वरुण देवता उसकी सरलता और भोलेपन पर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा, 'तुम्हारी सच्चाई और संतोषी स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम क्या चाहते हो? मेरे वरदान से तुम्हारी कोई भी इच्छा पूरी हो जाएगी।' साक्षात वरुण देवता को सामने पाकर त्रिलोक तो वैसे भी हतप्रभ−सा था, अतः निष्कपट भाव से उसने कहा, 'स्वामी! आप तो अंतर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। मैं आपसे क्या माँगूं? आप जो भी देंगे, मेरे लिए बहुत होगा।' वरुण देवता ने प्रसन्न होकर उसके सिर पर अपना हाथ फेर दिया और कहा, 'फिर भी, तुम कुछ तो कहो। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। तुम्हारा भोलापन और निःस्वार्थ आचरण देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।' त्रिलोक ने हाथ जोड़कर कहा, 'भगवान्! यदि आप मुझसे वास्तव में ही प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मेरे घर में किसी को असंतोष न हो। स्त्री और बच्चे सदा प्रसन्न रहें और मैं जीवनभर आपके मंदिर में पूजा करता रहूँ तथा जितना संभव हो सके, दूसरों के सुख−दुःख में हमेशा काम आ सकूँ।'&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;एक दिन त्रिलोक दोपहर को खेतों से काम निपटाकर घर पर लौट रहा था। रास्ते में एक तालाब था। गरमी तो थी ही, अतः त्रिलोक ने सोचा, यहीं नहा लूं। यही सोचकर उसने सिर पर रखा लकड़ियों का गट्ठर एक किनारे रख दिया और तालाब में घुस गया। दोपहर का समय होने के कारण आस−पास कोई न था। तालाब में कमल खिले हुए थे। नहाते−नहाते त्रिलोक ने सोचा कि क्यों न दो−चार फूल तोड़ लूं, घर जाते समय मंदिर में चढ़ा दूंगा। गाँव में [[वरुण देवता|वरुण]] देवता का एक बहुत पुराना मंदिर था। लोग बड़ी श्रद्धा से वहाँ पूजा करने जाते थे। त्रिलोक जब फूल तोड़ रहा था, तभी उसकी निगाह एक कली पर पड़ी। वह सोने की तरह चमक रही थी। उत्सुकता में आकर त्रिलोक ने उसे तोड़ लिया। उसके हाथ में आते ही वह कली फूल बन गयी। लेकिन वह फूल साधारण न होकर सोने का फूल था−ठोस और असली। त्रिलोक दंग रह गया। उसकी समझ में नहीं आया कि यह कैसी और किसकी लीला है और अब उसे करना करना चाहिए? ठीक तभी एक बहुत सुंदर मनुष्य जल में प्रकट हुआ और त्रिलोक के पास आकर बोला, 'त्रिलोक! यह फूल मुझे दे दो।' त्रिलोक ने उस अद्भुत मनुष्य की ओर देखते हुए पूछा, 'क्यों? आप कौन हैं? यह सुंदर फूल मैं आपको क्यों दूं?' 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'देखो तिरलोक!' आलोक ने कहा, 'तुम मुझे सच−सच बता दो कि तुम इतना सारा धन कहाँ से लाए हो? तुम्हें कहीं से कोई ख़ज़ाना मिल गया है या बापू की कोई रकम तुम छिपाए हुए थे?' भोले त्रिलोक ने बैर−विरोध भूलकर सारी घटना सच−सच सुना दी कि किस प्रकार वरुण देव ने उसे वरदान दिया था।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;'तथास्तु!' कहकर वरुण देवता अंतर्ध्यान हो गए। झटका खाकर गहरी नींद से जागे हुए व्यक्ति की तरह त्रिलोक इधर−उधर देखने लगा। कहीं भी कोई न था। था तो केवल वह तालाब, वही कमल के फूल और पत्ते। लेकिन वरुण देवता या उस सोने के फूल का कहीं कोई चिह्न न था। त्रिलोक सोचने लगा कि कहीं जागती आँखों से वह कोई स्वप्न तो नहीं देख रहा था। किंतु नहीं, अभी−अभी उसके हाथ में सोने का फूल था और स्वयं वरुण देवता उससे मुखातिब थे। 'हे भगवान! क्या होने वाला है?' इसी प्रकार के विचारों में डूबा हुआ तिरलोक कंधे पर लकड़ियों का गट्ठर लादकर घर की ओर चल पड़ा। दूसरे दिन जैसे कोई चमत्कार होने लगा। त्रिलोक जिस काम में हाथ डालता, उसमें दोगुना नहीं, बल्कि दसियों गुना लाभ होता। उसके घर में सारी चीजें न जाने कैसे बढ़ जाती थीं। कोई भी वस्तु कम नहीं पड़ती थी। चाहे जितना खर्च किया जाता, सामान बच ही जाता था। खेतों की पैदावार तो इतनी बढ़ी कि कहीं अनाज रखने की जगह नहीं बची। बहुत−सा धान और अनाज त्रिलोक ने गाँव वालों को बाँट दिया। इतने पर भी घमंड उससे कोसों दूर था। वह तो किसी से ऊँची आवाज में बात भी नहीं करता था। बँटवारे के समय आलोक ने बेईमानी के कारण बाप का बहुत−कर्ज़ बता रखा था। उसका आधा हिस्सा त्रिलोक को भरना पड़ता था। इन दिनों जब वह सम्पन्न हुआ तो महाजन के पास जाकर अपने और आलोक के हिस्से का भी पूरा कर्ज़ अदा कर आया। गाँव के कितने ही ग़रीबों को वह अनाज व कपड़े बाँट देता था। यहाँ तक कि दूसरे गाँवों के लोग भी उससे सहायता लेने लगे। इस प्रकार त्रिलोक की कीर्ति दिनों−दिन बढ़ती जा रही थी। चारों ओर उसकी सहृदयता के चर्चे सुनाई देते थे। आलोक ने यह सब देखकर सोचा, 'क्या त्रिलोक को कोई ख़ज़ाना मिल गया है? तभी तो वह इस तरह दिल खोलकर रुपया लुटा रहा है। खुद तो मौज मार ही रहा है, दूसरों पर भी धन लुटा रहा है। लगता है, उसने बापू की कोई रकम पहले से ही चुरा रखी थी। जिसका मुझे पता नहीं है और अब इतने दिनों बाद उसे निकालकर मौज कर रहा है। किंतु मैं भी खामोश बैठने वाला नहीं हूँ। मैं यह रहस्य जानकर ही रहूँगा कि उसके पास इतना धन कहाँ से आया।' और फिर दूसरे ही दिन वह त्रिलोक के पास जा पहुँचा। त्रिलोक ने दिल खोलकर उसकी खातिरदारी की। त्रिलोक की पत्नी ने भी उसके आदर से चरण स्पर्श किए। उसके पश्चात त्रिलोक ने पूछा, 'मेरी याद कैसे आ गई भैया?' 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		<author><name>व्यवस्थापन</name></author>
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		<title>व्यवस्थापन: Text replace - &quot;खजाना&quot; to &quot;ख़ज़ाना&quot;</title>
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'मैं वरुण हूँ। इस तालाब में रोज एक सोने का फूल खिलता है। उसे मैं पूजा में चढ़ाता हूँ। यह वही फूल है। इसलिए लाओ, यह फूल मुझे दे दो।' कहते हुए अद्भुत पुरुष ने हाथ पसार दिया। त्रिलोक ने फूल उसे दे दिया और शर्मिंदा−सा होकर बोला, 'मुझे नहीं मालूम था, इसलिए धोखे में तोड़ लिया था। आप फूल ले जाइए।' कहते हुए उसने हाथ जोड़कर सिर झुका दिया। वरुण देवता उसकी सरलता और भोलेपन पर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा, 'तुम्हारी सच्चाई और संतोषी स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम क्या चाहते हो? मेरे वरदान से तुम्हारी कोई भी इच्छा पूरी हो जाएगी।' साक्षात वरुण देवता को सामने पाकर त्रिलोक तो वैसे भी हतप्रभ−सा था, अतः निष्कपट भाव से उसने कहा, 'स्वामी! आप तो अंतर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। मैं आपसे क्या माँगूं? आप जो भी देंगे, मेरे लिए बहुत होगा।' वरुण देवता ने प्रसन्न होकर उसके सिर पर अपना हाथ फेर दिया और कहा, 'फिर भी, तुम कुछ तो कहो। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। तुम्हारा भोलापन और निःस्वार्थ आचरण देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।' त्रिलोक ने हाथ जोड़कर कहा, 'भगवान्! यदि आप मुझसे वास्तव में ही प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मेरे घर में किसी को असंतोष न हो। स्त्री और बच्चे सदा प्रसन्न रहें और मैं जीवनभर आपके मंदिर में पूजा करता रहूँ तथा जितना संभव हो सके, दूसरों के सुख−दुःख में हमेशा काम आ सकूँ।'&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;background-color: #f8f9fa; color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #eaecf0; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;एक दिन त्रिलोक दोपहर को खेतों से काम निपटाकर घर पर लौट रहा था। रास्ते में एक तालाब था। गरमी तो थी ही, अतः त्रिलोक ने सोचा, यहीं नहा लूं। यही सोचकर उसने सिर पर रखा लकड़ियों का गट्ठर एक किनारे रख दिया और तालाब में घुस गया। दोपहर का समय होने के कारण आस−पास कोई न था। तालाब में कमल खिले हुए थे। नहाते−नहाते त्रिलोक ने सोचा कि क्यों न दो−चार फूल तोड़ लूं, घर जाते समय मंदिर में चढ़ा दूंगा। गाँव में [[वरुण देवता|वरुण]] देवता का एक बहुत पुराना मंदिर था। लोग बड़ी श्रद्धा से वहाँ पूजा करने जाते थे। त्रिलोक जब फूल तोड़ रहा था, तभी उसकी निगाह एक कली पर पड़ी। वह सोने की तरह चमक रही थी। उत्सुकता में आकर त्रिलोक ने उसे तोड़ लिया। उसके हाथ में आते ही वह कली फूल बन गयी। लेकिन वह फूल साधारण न होकर सोने का फूल था−ठोस और असली। त्रिलोक दंग रह गया। उसकी समझ में नहीं आया कि यह कैसी और किसकी लीला है और अब उसे करना करना चाहिए? ठीक तभी एक बहुत सुंदर मनुष्य जल में प्रकट हुआ और त्रिलोक के पास आकर बोला, 'त्रिलोक! यह फूल मुझे दे दो।' त्रिलोक ने उस अद्भुत मनुष्य की ओर देखते हुए पूछा, 'क्यों? आप कौन हैं? यह सुंदर फूल मैं आपको क्यों दूं?' 'मैं वरुण हूँ। इस तालाब में रोज एक सोने का फूल खिलता है। उसे मैं पूजा में चढ़ाता हूँ। यह वही फूल है। इसलिए लाओ, यह फूल मुझे दे दो।' कहते हुए अद्भुत पुरुष ने हाथ पसार दिया। त्रिलोक ने फूल उसे दे दिया और शर्मिंदा−सा होकर बोला, 'मुझे नहीं मालूम था, इसलिए धोखे में तोड़ लिया था। आप फूल ले जाइए।' कहते हुए उसने हाथ जोड़कर सिर झुका दिया। वरुण देवता उसकी सरलता और भोलेपन पर प्रसन्न हो उठे। उन्होंने कहा, 'तुम्हारी सच्चाई और संतोषी स्वभाव से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। बोलो, तुम क्या चाहते हो? मेरे वरदान से तुम्हारी कोई भी इच्छा पूरी हो जाएगी।' साक्षात वरुण देवता को सामने पाकर त्रिलोक तो वैसे भी हतप्रभ−सा था, अतः निष्कपट भाव से उसने कहा, 'स्वामी! आप तो अंतर्यामी हैं, सब कुछ जानते हैं। मैं आपसे क्या माँगूं? आप जो भी देंगे, मेरे लिए बहुत होगा।' वरुण देवता ने प्रसन्न होकर उसके सिर पर अपना हाथ फेर दिया और कहा, 'फिर भी, तुम कुछ तो कहो। मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ। तुम्हारा भोलापन और निःस्वार्थ आचरण देखकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ।' त्रिलोक ने हाथ जोड़कर कहा, 'भगवान्! यदि आप मुझसे वास्तव में ही प्रसन्न हैं तो मुझे ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि मेरे घर में किसी को असंतोष न हो। स्त्री और बच्चे सदा प्रसन्न रहें और मैं जीवनभर आपके मंदिर में पूजा करता रहूँ तथा जितना संभव हो सके, दूसरों के सुख−दुःख में हमेशा काम आ सकूँ।'&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;/tr&gt;
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'देखो तिरलोक!' आलोक ने कहा, 'तुम मुझे सच−सच बता दो कि तुम इतना सारा धन कहाँ से लाए हो? तुम्हें कहीं से कोई &lt;del style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;खजाना &lt;/del&gt;मिल गया है या बापू की कोई रकम तुम छिपाए हुए थे?' भोले त्रिलोक ने बैर−विरोध भूलकर सारी घटना सच−सच सुना दी कि किस प्रकार वरुण देव ने उसे वरदान दिया था।&lt;/div&gt;&lt;/td&gt;&lt;td class=&quot;diff-marker&quot; data-marker=&quot;+&quot;&gt;&lt;/td&gt;&lt;td style=&quot;color: #202122; font-size: 88%; border-style: solid; border-width: 1px 1px 1px 4px; border-radius: 0.33em; border-color: #a3d3ff; vertical-align: top; white-space: pre-wrap;&quot;&gt;&lt;div&gt;'तथास्तु!' कहकर वरुण देवता अंतर्ध्यान हो गए। झटका खाकर गहरी नींद से जागे हुए व्यक्ति की तरह त्रिलोक इधर−उधर देखने लगा। कहीं भी कोई न था। था तो केवल वह तालाब, वही कमल के फूल और पत्ते। लेकिन वरुण देवता या उस सोने के फूल का कहीं कोई चिह्न न था। त्रिलोक सोचने लगा कि कहीं जागती आँखों से वह कोई स्वप्न तो नहीं देख रहा था। किंतु नहीं, अभी−अभी उसके हाथ में सोने का फूल था और स्वयं वरुण देवता उससे मुखातिब थे। 'हे भगवान! क्या होने वाला है?' इसी प्रकार के विचारों में डूबा हुआ तिरलोक कंधे पर लकड़ियों का गट्ठर लादकर घर की ओर चल पड़ा। दूसरे दिन जैसे कोई चमत्कार होने लगा। त्रिलोक जिस काम में हाथ डालता, उसमें दोगुना नहीं, बल्कि दसियों गुना लाभ होता। उसके घर में सारी चीजें न जाने कैसे बढ़ जाती थीं। कोई भी वस्तु कम नहीं पड़ती थी। चाहे जितना खर्च किया जाता, सामान बच ही जाता था। खेतों की पैदावार तो इतनी बढ़ी कि कहीं अनाज रखने की जगह नहीं बची। बहुत−सा धान और अनाज त्रिलोक ने गाँव वालों को बाँट दिया। इतने पर भी घमंड उससे कोसों दूर था। वह तो किसी से ऊँची आवाज में बात भी नहीं करता था। बँटवारे के समय आलोक ने बेईमानी के कारण बाप का बहुत−कर्ज़ बता रखा था। उसका आधा हिस्सा त्रिलोक को भरना पड़ता था। इन दिनों जब वह सम्पन्न हुआ तो महाजन के पास जाकर अपने और आलोक के हिस्से का भी पूरा कर्ज़ अदा कर आया। गाँव के कितने ही ग़रीबों को वह अनाज व कपड़े बाँट देता था। यहाँ तक कि दूसरे गाँवों के लोग भी उससे सहायता लेने लगे। इस प्रकार त्रिलोक की कीर्ति दिनों−दिन बढ़ती जा रही थी। चारों ओर उसकी सहृदयता के चर्चे सुनाई देते थे। आलोक ने यह सब देखकर सोचा, 'क्या त्रिलोक को कोई &lt;ins style=&quot;font-weight: bold; text-decoration: none;&quot;&gt;ख़ज़ाना &lt;/ins&gt;मिल गया है? तभी तो वह इस तरह दिल खोलकर रुपया लुटा रहा है। खुद तो मौज मार ही रहा है, दूसरों पर भी धन लुटा रहा है। लगता है, उसने बापू की कोई रकम पहले से ही चुरा रखी थी। जिसका मुझे पता नहीं है और अब इतने दिनों बाद उसे निकालकर मौज कर रहा है। किंतु मैं भी खामोश बैठने वाला नहीं हूँ। मैं यह रहस्य जानकर ही रहूँगा कि उसके पास इतना धन कहाँ से आया।' और फिर दूसरे ही दिन वह त्रिलोक के पास जा पहुँचा। त्रिलोक ने दिल खोलकर उसकी खातिरदारी की। त्रिलोक की पत्नी ने भी उसके आदर से चरण स्पर्श किए। उसके पश्चात त्रिलोक ने पूछा, 'मेरी याद कैसे आ गई भैया?' 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