श्रीमद्भागवत महापुराण दशम स्कन्ध अध्याय 17 श्लोक 1-13

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दशम स्कन्ध: सप्तदशोऽध्यायः (17) (पूर्वार्ध)

श्रीमद्भागवत महापुराण: दशम स्कन्ध: सप्तदशोऽध्यायः श्लोक 1-13 का हिन्दी अनुवाद

कालिय के कालियदह में आने की कथा तथा भगवान का व्रजवासियों को दावानल से बचाना

राजा परीक्षित् ने पूछा—भगवन्! कालिय नाग ने नागों के निवासस्थान रमणक द्वीप को क्यों छोड़ा था ? और उस अकेले ने ही गरुड़जी का कौन-सा अपराध किया था ?

श्रीशुकदेवजी ने कहा—परीक्षित्! पूर्वकाल में गरुड़जी को उपहार स्वरुप प्राप्त होने वाले सर्पों ने यह नियम कर लिया था कि प्रत्येक मास में निर्दिष्ट वृक्ष के नीचे गरुड़ को एक सर्प की भेँट दी जाय ।

इस नियम के अनुसार प्रत्येक अमावस्या को सारे सर्प अपनी रक्षा के लिये महात्मा गरुड़जी को अपना-अपना भाग देते रहते थे[1]। उन सर्पों में कद्रू का पुत्र कालिय नाग अपने विष और बल के घमण्ड से मतवाला हो रहा था। उसने गरुड़ का तिरस्कार करके स्वयं तो बलि देना दूर रहा—दूसरे साँप जो गरुड़ को बलि देते, उसे भी खा लेता । परीक्षित्! यह सुनकर भगवान के प्यारे पार्षद शक्तिशाली गरुड़ को बड़ा क्रोध आया। इसलिये उन्होंने कालिय नाग को मार डालनेके विचार से बड़े वेग से उस पर आक्रमण किया । विषधर कालिय नाग ने जब देखा कि गरुड़ बड़े वेग से मुझपर आक्रमण करने आ रहे हैं, तब वह अपने एक सौ एक फण फैलाकर डसने के लिए उनपर टूट पड़ा। उसके पास शस्त्र थे केवल दाँत, इसलिये अपने दाँतों से गरुड़ को डस लिया। उस समय वह अपनी भयावनी जीभें लपलपा रहा था, उसकी साँस लंबी चल रही थी और आँखें बड़ी डरावनी जान पड़ती थीं। ताक्षर्यनन्दन गरुड़जी विष्णुभगवान के वाहन हैं और उनका वेग तथा पराक्रम भी अतुलनीय है। कालिय नाग की यह ढिठाई देखकर उनका क्रोध और भी बढ़ गया तथा उन्होंने से अपने शरीर से झटककर फ़ेंक दिया एवं अपने सुनहले बायें पंख से कालिय नाग पर बड़े जोर से प्रहार किया । उनके पंख की चोट से कालिय नाग घायल हो गया। वह घबड़ाकर वहाँ से भगा और यमुनाजी के इस कुण्ड में चला आया। यमुनाजी का यह कुण्ड गरुड़ के लिये अगम्य था। साथ ही वह इतना गहरा था कि उसमें दूसरे लोग भी नहीं जा सकते थे । इसी स्थान पर एक दिन क्षुधातुर गरुड़ ने तपस्वी सौभरि के मना करने पर भी अपने अभीष्ट भक्ष्य मत्स्य को बलपूर्वक पकड़कर खा लिया । अपने मुखिया मत्स्यराज के मारे जाने के कारण मछलियों को बड़ा कष्ट हुआ। वे अत्यन्त दीन और व्याकुल हो गयीं। उनकी यह दशा देखकर महर्षि सौभरि को बड़ी दया आयी। उन्होंने उस कुण्ड में रहने-वाले सब जीवों की भलाई के लिये गरुड़ को यह शाप दे दिया । ‘यदि गरुड़ फिर कभी इस कुण्ड में घुसकर मछलियों को खायेंगे, तो उसी क्षण प्राणों से हाथ धो बैठेंगे। मैं यह सत्य-सत्य कहता हूँ’।

परीक्षित्! महर्षि सौभरि के इस शाप की बात कालिय नाग के सिवा और कोई साँप नहीं जानता था। इसलिये वह गरुड़ के भय से वहाँ रहने लगा था और अब भगवान श्रीकृष्ण ने उसे निर्भय करके वहाँ से रमण द्वीप में भेज दिया ।

परीक्षित्! इधर भगवान श्रीकृष्ण दिव्य माला, गन्ध, वस्त्र, महामूल्य मणि और सुवर्णमय आभूषणों से विभूषित हो उस कुण्ड से बाहर निकले ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. यह कथा इस प्रकार है—गरुड़जी की माता विनता और सर्पों की माता कद्रू में परस्पर वैर था। माता का वैर स्मरण कर गरुड़जी जो सर्प मिलता उसी को खा जाते। इससे व्याकुल होकर सब सर्प ब्रम्हाजी शरण में गये। तब ब्रम्हाजी ने यह नियम कर दिया कि प्रत्येक अमावास्या को प्रत्येक सर्प परिवार बारी-बारी से गरुड़जी को एक सर्प की बलि दिया करे।

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