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(जीवन परिचय)
 
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'''भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव''' ([[अंग्रेज़ी]]:''Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava'', जन्म:  [[20 जून]], [[1910]]<ref>{{cite web |url=https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/shahjahanpur/Shahjahanpur-44494-123 |title=हिंदी एकांकी के जनक थे भुवनेश्वर|accessmonthday=[[25 मार्च]]  |accessyear=[[2020]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=अमर उजाला|language=[[हिन्दी]]}}</ref> - मृत्यु:  [[1957]]) [[हिंदी]] के प्रसिद्ध एकांकीकार, लेखक एवं कवि थे। भुवनेश्वर साहित्य जगत् का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया। भुवनेश्वर ने मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतीरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जनक होने का गौरव भी हासिल है। [[एकांकी]], [[कहानी]], [[कविता]], समीक्षा जैसी कई विधाओं में भुवनेश्वर ने साहित्य को नए तेवर वाली रचनाएं दीं। एक ऐसा साहित्यकार जिसने अपनी रचनाओं से आधुनिक संवेदनाओं की नई परिपाटी विकसित की। [[प्रेमचंद]] जैसे साहित्यकार ने उनको भविष्य का रचनाकार माना था। इसकी एक ख़ास वजह यह थी कि भुवनेश्वर अपने रचनाकाल से बहुत आगे की सोच के रचनाकार थे। उनकी रचनायों में कलातीतता का बोध है, परन्तु आश्चर्यजनक रूप से यह भूतकाल से न जुड़ कर भविष्य के साथ ज्यादा प्रासंगिक नज़र आती हैं। ‘कारवां’ की भूमिका में स्वयं भुवनेश्वर ने लिखा है कि ‘विवेक और तर्क तीसरी श्रेणी के कलाकारों के चोर दरवाज़े हैं”। उनका यह मानना उनकी रचनाओं में स्पष्टतया द्रष्टिगोचर भी होता भी है। इंसान को वस्तु में बदलते जाने की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी, वो आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।   
 
'''भुवनेश्वर प्रसाद श्रीवास्तव''' ([[अंग्रेज़ी]]:''Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava'', जन्म:  [[20 जून]], [[1910]]<ref>{{cite web |url=https://www.amarujala.com/uttar-pradesh/shahjahanpur/Shahjahanpur-44494-123 |title=हिंदी एकांकी के जनक थे भुवनेश्वर|accessmonthday=[[25 मार्च]]  |accessyear=[[2020]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=अमर उजाला|language=[[हिन्दी]]}}</ref> - मृत्यु:  [[1957]]) [[हिंदी]] के प्रसिद्ध एकांकीकार, लेखक एवं कवि थे। भुवनेश्वर साहित्य जगत् का ऐसा नाम है, जिसने अपने छोटे से जीवन काल में लीक से अलग किस्म का साहित्य सृजन किया। भुवनेश्वर ने मध्य वर्ग की विडंबनाओं को कटु सत्य के प्रतीरूप में उकेरा। उन्हें आधुनिक एकांकियों के जनक होने का गौरव भी हासिल है। [[एकांकी]], [[कहानी]], [[कविता]], समीक्षा जैसी कई विधाओं में भुवनेश्वर ने साहित्य को नए तेवर वाली रचनाएं दीं। एक ऐसा साहित्यकार जिसने अपनी रचनाओं से आधुनिक संवेदनाओं की नई परिपाटी विकसित की। [[प्रेमचंद]] जैसे साहित्यकार ने उनको भविष्य का रचनाकार माना था। इसकी एक ख़ास वजह यह थी कि भुवनेश्वर अपने रचनाकाल से बहुत आगे की सोच के रचनाकार थे। उनकी रचनायों में कलातीतता का बोध है, परन्तु आश्चर्यजनक रूप से यह भूतकाल से न जुड़ कर भविष्य के साथ ज्यादा प्रासंगिक नज़र आती हैं। ‘कारवां’ की भूमिका में स्वयं भुवनेश्वर ने लिखा है कि ‘विवेक और तर्क तीसरी श्रेणी के कलाकारों के चोर दरवाज़े हैं”। उनका यह मानना उनकी रचनाओं में स्पष्टतया द्रष्टिगोचर भी होता भी है। इंसान को वस्तु में बदलते जाने की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी, वो आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।   
 
==जीवन परिचय==
 
==जीवन परिचय==
भुवनेश्वर का जन्म [[शाहजहांपुर]] ([[उत्तर प्रदेश]]) के केरुगंज (खोया मंडी) में, 20 जून, [[1910]] में एक खाते-पीते [[परिवार]] में हुआ था। परन्तु बचपन में ही [[माँ]] की मौत से अचानक परिस्थितियां उनके विपरीत हो गई। इंटरमीडिएट का ये विद्यार्थी शाहजहांपुर को अलविदा करके [[इलाहाबाद]] चला गया। उस समय के भुवनेश्वर का बौद्धिक ज्ञान, [[हिन्दी]]-[[अंग्रेजी]] भाषाओं पर समान अधिकार, इंसानी रिश्तों को समझने का अदभुत नजरिया समकालीन लेखकों के लिए अचरज से कम नहीं था। परन्तु व्यक्तिगत रूप से स्वयं भुवनेश्वर का जीवन अभावों एवं कठिनताओं का पुलिंदा था। [[इलाहाबाद]], [[बनारस]], [[लखनऊ]] में भटकते भुवनेश्वर के लिए मित्र मंडली के घर आसरा, और कठिनाइयों का चोली दामन का साथ रहा। परन्तु इन परेशानियों में भी उनकी साहित्य यात्रा अनवरत जारी रही। एक बार स्वयं [[प्रेमचंद]] ने उनसे अपने लेखन में ‘कटुता’ कम करने की राय दी थी, जिस पर उन्होंने कहा कि इस ‘कटुता’ की उपज के पीछे के कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिये। शायद यही कारण, वो तमाम विसंगतियां थी, जिनका सामना उन्हें अपने जीवन में करना पड़ा। [[1957]] में लखनऊ स्टेशन पर भुवनेश्वर ने दुनिया को अलविदा कह दिया। भुवनेश्वर की नियति पर रघुवर सहाय की टिप्पणी सर्वाधिक सटीक है, 'उनके साथ समाज ने जो किया, वह सच बोलने और सच्चे होने की ऐसे समाज द्वारा दी गई सजा थी, जो अपने को गुलामी से निकालकर आजाद होने के विरुद्ध था।<ref>{{cite web |url=https://www.amarujala.com/columns/opinion/there-is-no-discussion-of-searching-and-creations-of-creator-bhubaneswar-memories |title=भुवनेश्वर यानी हिंदी के बर्नाड शॉ|accessmonthday=[[25 मार्च]]  |accessyear=[[2020]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=अमर उजाला|language=[[हिन्दी]]}}</ref>  
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भुवनेश्वर का जन्म [[शाहजहांपुर]] ([[उत्तर प्रदेश]]) के केरुगंज (खोया मंडी) में, 20 जून, [[1910]] में एक खाते-पीते [[परिवार]] में हुआ था। परन्तु बचपन में ही [[माँ]] की मौत से अचानक परिस्थितियां उनके विपरीत हो गई। इंटरमीडिएट का ये विद्यार्थी शाहजहांपुर को अलविदा करके [[इलाहाबाद]] चला गया। उस समय के भुवनेश्वर का बौद्धिक ज्ञान, [[हिन्दी]]-[[अंग्रेजी]] भाषाओं पर समान अधिकार, इंसानी रिश्तों को समझने का अदभुत नजरिया समकालीन लेखकों के लिए अचरज से कम नहीं था। परन्तु व्यक्तिगत रूप से स्वयं भुवनेश्वर का जीवन अभावों एवं कठिनताओं का पुलिंदा था। [[इलाहाबाद]], [[बनारस]], [[लखनऊ]] में भटकते भुवनेश्वर के लिए मित्र मंडली के घर आसरा, और कठिनाइयों का चोली दामन का साथ रहा। परन्तु इन परेशानियों में भी उनकी साहित्य यात्रा अनवरत जारी रही। एक बार स्वयं [[प्रेमचंद]] ने उनसे अपने लेखन में ‘कटुता’ कम करने की राय दी थी, जिस पर उन्होंने कहा कि इस ‘कटुता’ की उपज के पीछे के कारणों की भी पड़ताल होनी चाहिये। शायद यही कारण, वो तमाम विसंगतियां थी, जिनका सामना उन्हें अपने जीवन में करना पड़ा। [[1957]] में लखनऊ स्टेशन पर भुवनेश्वर ने दुनिया को अलविदा कह दिया। भुवनेश्वर की नियति पर [[रघुवीर सहाय]] की टिप्पणी सर्वाधिक सटीक है, 'उनके साथ समाज ने जो किया, वह सच बोलने और सच्चे होने की ऐसे समाज द्वारा दी गई सजा थी, जो अपने को गुलामी से निकालकर आज़ाद होने के विरुद्ध था।'<ref>{{cite web |url=https://www.amarujala.com/columns/opinion/there-is-no-discussion-of-searching-and-creations-of-creator-bhubaneswar-memories |title=भुवनेश्वर यानी हिंदी के बर्नाड शॉ|accessmonthday=[[25 मार्च]]  |accessyear=[[2020]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=अमर उजाला|language=[[हिन्दी]]}}</ref>
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==साहित्यिक परिचय==
 
==साहित्यिक परिचय==
भुवनेश्वर की साहित्य साधना बहुआयामी थी। [[कहानी]], [[कविता]], [[एकांकी]] और [[समीक्षा]] सब में उनकी लेखनी एक नए कलेवर का एहसास दिलाती है। छोटी सी घटना को भी नई, परन्तु वास्तविकता के सर्वाधिक सन्निकट दृष्टि से देखने का नजरिया भुवनेश्वर की विशेषता है। 'हंस’ में 1933 में भुवनेश्वर का पहला एकांकी ‘श्यामा: एक वैवाहिक विडम्बना’ प्रकाशित हुआ था। 1935 में प्रकाशित एकांकी संग्रह ‘कारवां’ ने उन्हें एकांकीकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।  
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भुवनेश्वर की साहित्य साधना बहुआयामी थी। [[कहानी]], [[कविता]], [[एकांकी]] और [[समीक्षा]] सब में उनकी लेखनी एक नए कलेवर का एहसास दिलाती है। छोटी सी घटना को भी नई, परन्तु वास्तविकता के सर्वाधिक सन्निकट दृष्टि से देखने का नजरिया भुवनेश्वर की विशेषता है। 'हंस’ में [[1933]] में भुवनेश्वर का पहला एकांकी ‘श्यामा: एक वैवाहिक विडम्बना’ प्रकाशित हुआ था। 1935 में प्रकाशित एकांकी संग्रह ‘कारवां’ ने उन्हें एकांकीकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।  
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भुवनेश्वर द्वारा लिखित नाटक ‘तांबे का कीड़ा’ (1946) को विश्व की किसी भी [[भाषा]] में भी लिखे गये पहले '''असंगत नाटक का सम्मान''' प्राप्त है। उनके द्वारा लिखित एकांकियों में ‘श्यामःएक वैवाहिक विडम्वना’, ‘रोमांसः रोमांच’, ‘स्ट्राइक’, ‘ऊसर’, ‘सिकन्दर’ आदि का नाम उल्लेखनीय है। भुवनेश्वर की पहली कहानी ‘मौसी’ को [[प्रेमचंद]] ने समकालीन कहानियों के प्रतिनिधि  संकलन ‘हिंदी की आदर्श कहानियां’ में स्थान दिया। उनकी कहानी ‘भेडिये’ हंस के [[अप्रैल]] [[1938]] अंक में प्रकाशित हुई। इस कहानी ने आधुनिक कहानियों की परम्परा में मज़बूत नींव का निर्माण किया। कैसे रेगिस्तान से गुजरता बंजारा भेड़ियों से जान बचाने के लिए उनके आगे चुग्गा फेंकता है। कहानी और जीवन दोनों में फेंकने के इस क्रम में सबसे पहले फेंकी जाती हैं वो चीजें जो अपेक्षाकृत कम महत्व की हैं। इस कहानी ने जीवन की कडवी सच्चाई को बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत किया। कुछ साहित्यकार तो इस कहानी के मर्म को किसी मैनेजमेंट क्लास के चुनिन्दा निष्कर्षों में भी सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। ‘मौसी’, ‘लड़ाई’, ‘माँ बेटे’, ‘मास्टनी’ आदि अन्य उल्लेखनीय कहानियाँ हैं। <br />
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इसके अतिरिक्त भुवनेश्वर ने [[अंग्रेज़ी]] तथा [[हिन्दी]] में कुछ [[कविता|कविताएं]] तथा आलोचनात्मक लेख भी लिखे हैं। परन्तु उनके कृतित्व को पहचानने में लोगों ने भूल कर दी। शायद यही कारण था, कि इस अनोखे रचनाकार को पूरा जीवन संघर्षो और विवादों में गुजारना पड़ा। [[प्रेमचंद]] ने उनसे हंस से स्थाई रूप से जुड़ने का आग्रह किया था। परन्तु अनजाने कारणों से ये संवाद पूरा ना हो सका। हालांकि उनकी रचनायें हंस में लगातार प्रकाशित होती रहीं। लेकिन अगर वो हंस के साथ जुड़ जाते तो उनका रचना संसार कहीं अधिक विस्तृत रूप में हमारे सामने होता। उनके अंतिम समय की रचनाओं को सहेजना वाला उनके साथ कोई नहीं था, जिसके फलस्वरूप उस दौरान रफ़ कागजों के पीछे लिखा गया हिंदी और अंग्रेजी का पूर्णतया मौलिक साहित्य अंधेरों में गुम हो गया। भुवनेश्वर की उपलब्ध सभी रचनाओं को आज पुनः लोगों तक पंहुचाने की आवश्यकता है।
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==साहित्यकारों की नज़रों में==
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भानु भारती ने एक समय कहा भी था कि जब उन्होंने भुवनेश्वर के नाटक तांबे के कीड़े पर काम करना शुरू किया, तो उन्हें आश्चर्य हुआ कि आख़िर 1946 में जब विश्व रंगमंच पर ऑयनोस्की और बैकेट का आगमन नहीं हुआ था, तो भुवनेश्वर द्वारा ऐसे नाटकों की परिकल्पना करना कितना आश्चर्यजनक है। छोटे कद, उलझे और बिखरे हुए बाल, मैला-सा पुराना कुर्ता-पायजामा, पैरों में साधारण-सी चप्पल और उंगलियों में सुलगी हुई बीड़ी फंसाए इसी मामूली आदमी ने अपनी प्रतिभा के बल पर '''हिंदी नाटकों के एक युग का सूत्रपात''' किया था।
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[[रामविलास शर्मा]] ने उन्हें ‘न्यूरोटिक’ कहा, तो [[शमशेर बहादुर सिंह|शमशेर]] ने उनके लिए नवाब, गिरहकट, ‘विट’ लिखा है। नवाब यानी जेब खाली, लेकिन आदतें रईसों जैसी। रामेश्वर शुक्ल 'अंचल' ने एक बार कहा था कि ‘न जाने क्यों भुवनेश्वर को यह गिला रहता था कि वह साहित्य-जगत में अस्वीकृत होने और ठोकर खाते हुए मिटते जाने के लिए ही लेखक बने हैं।’
  
भुवनेश्वर द्वारा लिखित नाटक ‘तांबे का कीड़ा’ (1946) को विश्व की किसी भी [[भाषा]] में भी लिखे गये पहले '''असंगत नाटक का सम्मान''' प्राप्त है। उनके द्वारा लिखित एकांकियों में ‘श्यामःएक वैवाहिक विडम्वना’, ‘रोमांसःरोमांच’, ‘स्ट्राइक’, ‘ऊसर’, ‘सिकन्दर’ आदि का नाम उल्लेखनीय है। भुवनेश्वर की पहली कहानी ‘मौसी’ को [[प्रेमचंद]] ने समकालीन कहानियों के प्रतिनिधि संकलन ‘हिंदी की आदर्श कहानियां’ में स्थान दिया। उनकी कहानी ‘भेडिये’ हंस के [[अप्रैल]] [[1938]] अंक में प्रकाशित हुई। इस कहानी ने आधुनिक कहानियों की परम्परा में मज़बूत नींव का निर्माण किया। कैसे रेगिस्तान से गुजरता बंजारा भेड़ियों से जान बचाने के लिए उनके आगे चुग्गा फेंकता है। कहानी और जीवन दोनों में फेंकने के इस क्रम में सबसे पहले फेंकी जाती हैं वो चीजें जो अपेक्षाकृत कम महत्व की हैं। इस कहानी ने जीवन की कडवी सच्चाई को बिना लाग-लपेट के प्रस्तुत किया। कुछ साहित्यकार तो इस कहानी के मर्म को किसी मैनेजमेंट क्लास के चुनिन्दा निष्कर्षों में भी सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। ‘मौसी’, ‘लड़ाई’, ‘माँ बेटे’, ‘मास्टनी’ आदि अन्य उल्लेखनीय कहानियाँ हैं। <br />
 
इसके अतिरिक्त भुवनेश्वर ने [[अंग्रेज़ी]] तथा [[हिन्दी]] में कुछ कविताएं तथा आलोचनात्मक लेख भी लिखे हैं। परन्तु उनके कृतित्व को पहचानने में लोगों ने भूल कर दी। शायद यही कारण था, कि इस अनोखे रचनाकार को पूरा जीवन संघर्षो और विवादों में गुजारना पड़ा। प्रेमचंद ने उनसे हंस से स्थाई रूप से जुड़ने का आग्रह किया था। परन्तु अनजाने कारणों से ये संवाद पूरा ना हो सका। हालांकि उनकी रचनायें हंस में लगातार प्रकाशित होती रहीं। लेकिन अगर वो हंस के साथ जुड़ जाते तो उनका रचना संसार कहीं अधिक विस्तृत रूप में हमारे सामने होता। उनके अंतिम समय की रचनाओं को सहेजना वाला उनके साथ कोई नहीं था, जिसके फलस्वरूप उस दौरान रफ़ कागजों के पीछे लिखा गया हिंदी और अंग्रेजी का पूर्णतया मौलिक साहित्य अंधेरों में गुम हो गया। भुवनेश्वर की उपलब्ध सभी रचनाओं को आज पुनः लोगों तक पंहुचाने की आवश्यकता है।
 
 
==कृतियाँ==
 
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* सवा आठ बजे
 
* सवा आठ बजे
 
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==प्रेमचन्द की खोज==
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'''भुवनेश्वर''' [[प्रेमचन्द]] की खोज हैं । इसके दो प्रमाण हैं-
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#उनकी अब तक प्राप्त 12 [[कहानी|कहानियों]] में से 9 और अब तक प्राप्त 17 [[नाटक|नाटकों]] में से 9 प्रेमचन्द द्वारा संस्थापित ‘हंस’ पत्रिका में ही प्रकाशित हुए ।
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#भुवनेश्वर की पहली और एकमात्र प्रकाशित किताब ‘कारवाँ’ की पहली समीक्षा खुद प्रेमचन्द ने लिखी ।
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लेकिन भुवनेश्वर मात्र एक कहानीकार–एकांकीकार ही नहीं, एक उत्कृष्ट कवि, सूक्तिकार और मारक टिप्पणीकार भी हैं । अपने सम्पूर्ण लेखन में वे कहीं भी दबी ज़बान से नहीं बोलते । उनकी अंग्रेज़ी की 10 कविताओं में सत्यकथन की अघोर हिंसा का जो हाहाकार है वह हिन्दी कविता के तत्कालीन (छायावादी) वातावरण के बिल्कुल विपरीत और अत्याधुनिक है । भुवनेश्वर ने ‘डाकमुंशी’ और ‘एक रात’ जैसी कहानियाँ लिखकर प्रेमचन्द के चरित्रवाद और घटनात्मक कथानकवाद का एक ‘तोड़’ प्रस्तुत किया । उनकी ‘भेड़िये’ कहानी आज की गलाकाट प्रतियोगिताओं की एक प्रतीकात्मक पूर्व झाँकी है, जहाँ अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए दूसरों की बलि चढ़ाने में ज़रा भी हिचक नहीं । उनके प्रसिद्ध नाटक ‘ताँबे के कीड़े’ में संवादों के होते हुए भी संवादात्मकता का पूरी तरह लोप है । भुवनेश्वर के सम्पूर्ण लेखन में सन्नाटे का एक ‘अनहद’ है जो कहीं से भी आध्यात्मिक नहीं । भुवनेश्वर [[हिन्दी]] के एक ऐसे उपेक्षित और भुलाए गए लेखक हैं, जो अपनी पैदाइश के आज सौ वर्षों बाद अब ज़्यादा प्रासंगिक और आधुनिक नज़र आते हैं । भुवनेश्वर आने वाली पीढ़ियों के लेखक हैं। <ref>{{cite web|url=https://www.rajkamalprakashan.com/index.php/default/bhuvneswar-samagra |title=भुवनेश्वर समग्र |accessmonthday=[[26मार्च]]  |accessyear=[[2020]] |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=राजकमल प्रकाशन समूह |language=[[हिन्दी]]}}</ref>
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==साहित्यिक विशेषता==
 
==साहित्यिक विशेषता==
लेखक की रचनाओं के अनुशीलन से यही धारणा बनती है कि पश्चिम के आधुनिक साहित्य का उन्होंने अच्छा अध्ययन किया है। इब्सन, शा. डी. एच., लारेंस तथा फ्रायड के प्रति विशेष अनुरक्त प्रतीत होते हैं। ज़िन्दगी को उन्होंने कड़वाहट, तीखेपन, विकृति और विद्रुपता से ही देखा था। सम्भवतः इसी कारण उनमें समाज के प्रति तीव्र वितृष्णा, प्रबल आक्रोश और उग्र विद्रोह का भाव प्रकट हुआ है। जीवन की इस कटु अनुभूति ने ही उन्हें फक्क्ड़, निर्द्वन्द्व और संयमहीन बना दिया था। भुवनेश्वर ने हिन्दी पाश्चात्य शैली के एकांकी की परंपरा बनायी। उनकी प्रथम रचना 'श्यामा--एक वैवाहिक विडंबना', 'हंस' के [[दिसंबर]], 1933 ई. के अंक में प्रकाशित हुई। इसके बाद अन्य एकांकी रचनाएँ 'शैतान' (1934 ई.), 'एक साम्यहीन साम्यवादी' (हंस, [[मार्च]] [[1934]] ई.), 'प्रतिभा का विवाह' (1933 ई.), 'रहस्य रोमांच' (1935 ई.), 'लाटरी' (1935 ई.) प्रकाशित हुईं। इन्हें संग्रहीत करके उन्होंने सन 1956 ई. में 'कारवां' संज्ञा देकर प्रकाशित किया। इन सभी एकांकियों पर पश्चिम की एकांकी शैली की छाप है। विषय-वस्तु और समस्या के विश्लेषण में पश्चिम के बुद्धिवादी नाटककारों इब्सन और शा का प्रभाव है। परिशिष्ट करने वाले जो सूत्र-वाक्य दिये हैं, वे शा के व्यंग और फ्रायड की यौन-प्रधान विचारधारा का स्मरण दिलाते हैं। भुवनेश्वर के और भी [[एकांकी]] प्रकाशित होते रहे- 'मृत्यु' ('हंस 1936 ई.), 'हम अकेले नहीं हैं' तथा 'सवा आठ बजे' ('भारत'), 'स्ट्राइक' और 'ऊसर' ('हंस' 1938 ई.) इन रचनाओं में उनकी दृष्टि का विस्स्तार देखने को मिलता है। यौन-समस्या तथा प्रेम के त्रिकोण से ऊपर उठकर वे समाज के दुख-दर्द को भी देखने लगे। सन 1938 ई. में [[सुमित्रानंदन पंत]] द्वारा संपादित 'रूपाभ' पत्रिका में उन्होंने एक बड़े नाटक 'आदमखोर' का पहला अंक प्रकाशित कराया। इससे उन्होंने जीवन की कटु वास्तविकताओं के उदघाटन का घोर यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाया है। सन 1940 ई. में उन्होंने गोगोल के प्रसिद्ध नाटक 'इंस्पेक्टर जनरल' को लगभग पौन घंटे के एकांकी का रूप दिया। सन 1941 ई. में 'विश्ववाणी' में 'रोशनी और आग'  शीर्षक एक प्रयोग उपस्थित  किया, जिसमें ग्रीक नाटकों जैसा पूर्वालाप (कोरस) था। 'कठपुतलियाँ' (1942 ई.) में उन्होंने प्रतीकवादी शैली अपनायी। इन प्रयोगात्मक रचनाओं के अनंतर भुवनेवर की नाट्यकला परिपक्व रूप में देखने को मिली। 'फोटोग्राफर के सामने' (1945 ई.),'तांबे के कीड़े' (1946 ई.) में मनुष्य की बढ़ती हुई अर्थलोलुपता का उद्घाटन है। सन 1948 ई. में 'इतिहास की केंचुल' एकाकी लिखा और इसके अनंतर उनके कई एतिहासिक एकांकी प्रकाशित हुए- 'आज़ादी की नींव' (1949 ई.), 'जेरूसलम' (1949 ई.),'सिकंदर (1949 ई.),'अकबर' (1950 ई.) तथा चंगेज़ खाँ (1950 ई.)। इन रचनाओं में राष्ट्रीयता का स्वर भी उभारा है। अंतिम कृति 'सीओ की गाड़ी' (1950 ई.) है।<ref>पुस्तक- हिंदी साहित्य कोश-2 | सम्पादक- धीरेंद्र वर्मा | पृष्ठ- 414</ref>
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लेखक की रचनाओं के अनुशीलन से यही धारणा बनती है कि पश्चिम के आधुनिक साहित्य का उन्होंने अच्छा अध्ययन किया है। इब्सन, शॉ. डी. एच., लॉरेंस तथा फ्रॉयड के प्रति विशेष अनुरक्त प्रतीत होते हैं। ज़िन्दगी को उन्होंने कड़वाहट, तीखेपन, विकृति और विद्रुपता से ही देखा था। सम्भवतः इसी कारण उनमें समाज के प्रति तीव्र वितृष्णा, प्रबल आक्रोश और उग्र विद्रोह का भाव प्रकट हुआ है। जीवन की इस कटु अनुभूति ने ही उन्हें फक्क्ड़, निर्द्वन्द्व और संयमहीन बना दिया था। भुवनेश्वर ने हिन्दी पाश्चात्य शैली के एकांकी की परंपरा बनायी।  
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उनकी प्रथम रचना 'श्यामा--एक वैवाहिक विडंबना', 'हंस' के [[दिसंबर]], 1933 ई. के अंक में प्रकाशित हुई। इसके बाद अन्य एकांकी रचनाएँ 'शैतान' (1934 ई.), 'एक साम्यहीन साम्यवादी' (हंस, [[मार्च]] [[1934]] ई.), 'प्रतिभा का विवाह' (1933 ई.), 'रहस्य रोमांच' (1935 ई.), 'लाटरी' (1935 ई.) प्रकाशित हुईं। इन्हें संग्रहीत करके उन्होंने सन 1956 ई. में 'कारवां' संज्ञा देकर प्रकाशित किया। इन सभी एकांकियों पर पश्चिम की एकांकी शैली की छाप है। विषय-वस्तु और समस्या के विश्लेषण में पश्चिम के बुद्धिवादी नाटककारों इब्सन और शॉ का प्रभाव है। परिशिष्ट करने वाले जो सूत्र-वाक्य दिये हैं, वे शॉ के व्यंग और फ्रॉयड की यौन-प्रधान विचारधारा का स्मरण दिलाते हैं।  
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भुवनेश्वर के और भी [[एकांकी]] प्रकाशित होते रहे- 'मृत्यु' ('हंस 1936 ई.), 'हम अकेले नहीं हैं' तथा 'सवा आठ बजे' ('भारत'), 'स्ट्राइक' और 'ऊसर' ('हंस' 1938 ई.)इन रचनाओं में उनकी दृष्टि का विस्तार देखने को मिलता है। यौन-समस्या तथा प्रेम के त्रिकोण से ऊपर उठकर वे समाज के दुख-दर्द को भी देखने लगे। सन 1938 ई. में [[सुमित्रानंदन पंत]] द्वारा संपादित 'रूपाभ' पत्रिका में उन्होंने एक बड़े नाटक 'आदमखोर' का पहला अंक प्रकाशित कराया। इससे उन्होंने जीवन की कटु वास्तविकताओं के उद्घाटन का घोर यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाया है।  
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सन 1940 ई. में उन्होंने गोगोल के प्रसिद्ध नाटक 'इंस्पेक्टर जनरल' को लगभग पौन घंटे के एकांकी का रूप दिया। सन 1941 ई. में 'विश्ववाणी' में 'रोशनी और आग'  शीर्षक एक प्रयोग उपस्थित  किया, जिसमें ग्रीक नाटकों जैसा पूर्वालाप, कोरस था। 'कठपुतलियाँ' (1942 ई.) में उन्होंने प्रतीकवादी शैली अपनायी। इन प्रयोगात्मक रचनाओं के अनंतर भुवनेवर की नाट्यकला परिपक्व रूप में देखने को मिली। 'फोटोग्राफर के सामने' (1945 ई.), 'तांबे के कीड़े' (1946 ई.) में मनुष्य की बढ़ती हुई अर्थलोलुपता का उद्घाटन है। सन 1948 ई. में 'इतिहास की केंचुल' एकांकी लिखा और इसके अनंतर उनके कई ऐतिहासिक एकांकी प्रकाशित हुए- 'आज़ादी की नींव' (1949 ई.), 'जेरूसलम' (1949 ई.), 'सिकंदर (1949 ई.), 'अकबर' (1950 ई.) तथा चंगेज़ खाँ (1950 ई.)। इन रचनाओं में राष्ट्रीयता का स्वर भी उभरा है। अंतिम कृति 'सीओ की गाड़ी' (1950 ई.) है।<ref>पुस्तक- हिंदी साहित्य कोश-2 | सम्पादक- धीरेंद्र वर्मा | पृष्ठ- 414</ref>
  
  
 
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==
 
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==
 
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19:17, 26 मार्च 2020 के समय का अवतरण

bhuvaneshvar (sahityakar)
bhuvaneshvar
poora nam bhuvaneshvar prasad shrivastav
janm 20 joon, 1910
janm bhoomi shahajahanpur, uttar pradesh
mrityu 1957
mrityu sthan lakhanoo, uttar pradesh
karm-kshetr ekankikar, kahanikar, alochak, kavi
mukhy rachanaen shyama : ek vaivahik vidnbana, ek samyahin samyavadi, pratibha ka vivah (sabhi ekanki), bhediye, ‘mausi’, ‘ladaee’, ‘man bete’, ‘mastani’ (sabhi kahani) adi
bhasha hindi
nagarikata bharatiy
any janakari premachnd ne bhuvaneshvar ko bhavishy ka rachanakar mana tha. isaki ek khas vajah thi ki bhuvaneshvar apane rachanakal se bahut age ki soch ke rachanakar the.
inhen bhi dekhen kavi soochi, sahityakar soochi
Disamb2.jpg bhuvaneshvar ek bahuvikalpi shabd hai any arthon ke lie dekhen:- bhuvaneshvar (bahuvikalpi)

bhuvaneshvar prasad shrivastav (angrezi:Bhuvaneshvar Prasad Shrivastava, janm: 20 joon, 1910[1] - mrityu: 1957) hindi ke prasiddh ekankikar, lekhak evn kavi the. bhuvaneshvar sahity jagath ka aisa nam hai, jisane apane chhote se jivan kal men lik se alag kism ka sahity srijan kiya. bhuvaneshvar ne madhy varg ki vidnbanaon ko katu saty ke pratiroop men ukera. unhen adhunik ekankiyon ke janak hone ka gaurav bhi hasil hai. ekanki, kahani, kavita, samiksha jaisi kee vidhaon men bhuvaneshvar ne sahity ko ne tevar vali rachanaen din. ek aisa sahityakar jisane apani rachanaon se adhunik snvedanaon ki nee paripati vikasit ki. premachnd jaise sahityakar ne unako bhavishy ka rachanakar mana tha. isaki ek khas vajah yah thi ki bhuvaneshvar apane rachanakal se bahut age ki soch ke rachanakar the. unaki rachanayon men kalatitata ka bodh hai, parantu ashcharyajanak roop se yah bhootakal se n jud kar bhavishy ke sath jyada prasngik nazar ati hain. ‘karavan’ ki bhoomika men svayn bhuvaneshvar ne likha hai ki ‘vivek aur tark tisari shreni ke kalakaron ke chor daravaze hain”. unaka yah manana unaki rachanaon men spashtataya drashtigochar bhi hota bhi hai. insan ko vastu men badalate jane ki jo tasvir unhonne ukeri, vo aj ke samay men aur bhi adhik prasngik ho jati hai.

jivan parichay

bhuvaneshvar ka janm shahajahanpur (uttar pradesh) ke kerugnj (khoya mndi) men, 20 joon, 1910 men ek khate-pite parivar men hua tha. parantu bachapan men hi man ki maut se achanak paristhitiyan unake viparit ho gee. intaramidiet ka ye vidyarthi shahajahanpur ko alavida karake ilahabad chala gaya. us samay ke bhuvaneshvar ka bauddhik gyan, hindi-angreji bhashaon par saman adhikar, insani rishton ko samajhane ka adabhut najariya samakalin lekhakon ke lie acharaj se kam nahin tha. parantu vyaktigat roop se svayn bhuvaneshvar ka jivan abhavon evn kathinataon ka pulinda tha. ilahabad, banaras, lakhanoo men bhatakate bhuvaneshvar ke lie mitr mndali ke ghar asara, aur kathinaiyon ka choli daman ka sath raha. parantu in pareshaniyon men bhi unaki sahity yatra anavarat jari rahi. ek bar svayn premachnd ne unase apane lekhan men ‘katuta’ kam karane ki ray di thi, jis par unhonne kaha ki is ‘katuta’ ki upaj ke pichhe ke karanon ki bhi padatal honi chahiye. shayad yahi karan, vo tamam visngatiyan thi, jinaka samana unhen apane jivan men karana pada. 1957 men lakhanoo steshan par bhuvaneshvar ne duniya ko alavida kah diya. bhuvaneshvar ki niyati par raghuvir sahay ki tippani sarvadhik satik hai, 'unake sath samaj ne jo kiya, vah sach bolane aur sachche hone ki aise samaj dvara di gee saja thi, jo apane ko gulami se nikalakar azad hone ke viruddh tha.'[2]

sahityik parichay

bhuvaneshvar ki sahity sadhana bahuayami thi. kahani, kavita, ekanki aur samiksha sab men unaki lekhani ek ne kalevar ka ehasas dilati hai. chhoti si ghatana ko bhi nee, parantu vastavikata ke sarvadhik sannikat drishti se dekhane ka najariya bhuvaneshvar ki visheshata hai. 'hns’ men 1933 men bhuvaneshvar ka pahala ekanki ‘shyama: ek vaivahik vidambana’ prakashit hua tha. 1935 men prakashit ekanki sngrah ‘karavan’ ne unhen ekankikar ke roop men pratishthit kar diya.

bhuvaneshvar dvara likhit natak ‘tanbe ka kida’ (1946) ko vishv ki kisi bhi bhasha men bhi likhe gaye pahale asngat natak ka samman prapt hai. unake dvara likhit ekankiyon men ‘shyamahek vaivahik vidamvana’, ‘romansah romanch’, ‘straik’, ‘oosar’, ‘sikandar’ adi ka nam ullekhaniy hai. bhuvaneshvar ki pahali kahani ‘mausi’ ko premachnd ne samakalin kahaniyon ke pratinidhi snkalan ‘hindi ki adarsh kahaniyan’ men sthan diya. unaki kahani ‘bhediye’ hns ke aprail 1938 ank men prakashit huee. is kahani ne adhunik kahaniyon ki parampara men mazaboot ninv ka nirman kiya. kaise registan se gujarata bnjara bhediyon se jan bachane ke lie unake age chugga phenkata hai. kahani aur jivan donon men phenkane ke is kram men sabase pahale phenki jati hain vo chijen jo apekshakrit kam mahatv ki hain. is kahani ne jivan ki kadavi sachchaee ko bina lag-lapet ke prastut kiya. kuchh sahityakar to is kahani ke marm ko kisi mainejament klas ke chuninda nishkarshon men bhi sarvashreshth manate hain. ‘mausi’, ‘ladaee’, ‘man bete’, ‘mastani’ adi any ullekhaniy kahaniyan hain.

isake atirikt bhuvaneshvar ne angrezi tatha hindi men kuchh kavitaen tatha alochanatmak lekh bhi likhe hain. parantu unake krititv ko pahachanane men logon ne bhool kar di. shayad yahi karan tha, ki is anokhe rachanakar ko poora jivan sngharsho aur vivadon men gujarana pada. premachnd ne unase hns se sthaee roop se judane ka agrah kiya tha. parantu anajane karanon se ye snvad poora na ho saka. halanki unaki rachanayen hns men lagatar prakashit hoti rahin. lekin agar vo hns ke sath jud jate to unaka rachana snsar kahin adhik vistrit roop men hamare samane hota. unake antim samay ki rachanaon ko sahejana vala unake sath koee nahin tha, jisake phalasvaroop us dauran raf kagajon ke pichhe likha gaya hindi aur angreji ka poornataya maulik sahity andheron men gum ho gaya. bhuvaneshvar ki upalabdh sabhi rachanaon ko aj punah logon tak pnhuchane ki avashyakata hai.

sahityakaron ki nazaron men

bhanu bharati ne ek samay kaha bhi tha ki jab unhonne bhuvaneshvar ke natak tanbe ke kide par kam karana shuroo kiya, to unhen ashchary hua ki akhir 1946 men jab vishv rngamnch par aauyanoski aur baiket ka agaman nahin hua tha, to bhuvaneshvar dvara aise natakon ki parikalpana karana kitana ashcharyajanak hai. chhote kad, ulajhe aur bikhare hue bal, maila-sa purana kurta-payajama, pairon men sadharan-si chappal aur ungaliyon men sulagi huee bidi phnsae isi mamooli adami ne apani pratibha ke bal par hindi natakon ke ek yug ka sootrapat kiya tha.

ramavilas sharma ne unhen ‘nyoorotik’ kaha, to shamasher ne unake lie navab, girahakat, ‘vit’ likha hai. navab yani jeb khali, lekin adaten reeson jaisi. rameshvar shukl 'anchal' ne ek bar kaha tha ki ‘n jane kyon bhuvaneshvar ko yah gila rahata tha ki vah sahity-jagat men asvikrit hone aur thokar khate hue mitate jane ke lie hi lekhak bane hain.’

kritiyan

kahani
  • ajadi : ek patr
  • ek rat
  • jivan ki jhalak
  • dakamunshi
  • bhediye
  • bhavishy ke garbh men
  • man-bete
  • mastarani
  • mausi
  • ladaee
  • sooryapooja
  • hay re, manav hriday!
ekanki
  • ek samyahin samyavadi
  • ekaki ke bhav
  • patit (shaitan)
  • pratibha ka vivah
  • shyama : ek vaivahik vidnbana
  • azadi ki ninv
  • jeroosalam
  • sikndar
  • akabar
  • chngez khan
  • mrityu
  • ham akele nahin hain
  • sava ath baje

premachand ki khoj

bhuvaneshvar premachand ki khoj hain . isake do praman hain-

  1. unaki ab tak prapt 12 kahaniyon men se 9 aur ab tak prapt 17 natakon men se 9 premachand dvara snsthapit ‘hns’ patrika men hi prakashit hue .
  2. bhuvaneshvar ki pahali aur ekamatr prakashit kitab ‘karavan’ ki pahali samiksha khud premachand ne likhi .

lekin bhuvaneshvar matr ek kahanikar–ekankikar hi nahin, ek utkrisht kavi, sooktikar aur marak tippanikar bhi hain . apane sampoorn lekhan men ve kahin bhi dabi zaban se nahin bolate . unaki angrezi ki 10 kavitaon men satyakathan ki aghor hinsa ka jo hahakar hai vah hindi kavita ke tatkalin (chhayavadi) vatavaran ke bilkul viparit aur atyadhunik hai . bhuvaneshvar ne ‘dakamunshi’ aur ‘ek rat’ jaisi kahaniyan likhakar premachand ke charitravad aur ghatanatmak kathanakavad ka ek ‘tod’ prastut kiya . unaki ‘bhediye’ kahani aj ki galakat pratiyogitaon ki ek pratikatmak poorv jhanki hai, jahan apana astitv bachae rakhane ke lie doosaron ki bali chadhane men zara bhi hichak nahin . unake prasiddh natak ‘tanbe ke kide’ men snvadon ke hote hue bhi snvadatmakata ka poori tarah lop hai . bhuvaneshvar ke sampoorn lekhan men sannate ka ek ‘anahad’ hai jo kahin se bhi adhyatmik nahin . bhuvaneshvar hindi ke ek aise upekshit aur bhulae ge lekhak hain, jo apani paidaish ke aj sau varshon bad ab zyada prasngik aur adhunik nazar ate hain . bhuvaneshvar ane vali pidhiyon ke lekhak hain. [3]

sahityik visheshata

lekhak ki rachanaon ke anushilan se yahi dharana banati hai ki pashchim ke adhunik sahity ka unhonne achchha adhyayan kiya hai. ibsan, shaau. di. ech., laaurens tatha phraauyad ke prati vishesh anurakt pratit hote hain. zindagi ko unhonne kadavahat, tikhepan, vikriti aur vidrupata se hi dekha tha. sambhavatah isi karan unamen samaj ke prati tivr vitrishna, prabal akrosh aur ugr vidroh ka bhav prakat hua hai. jivan ki is katu anubhooti ne hi unhen phakkd, nirdvandv aur snyamahin bana diya tha. bhuvaneshvar ne hindi pashchaty shaili ke ekanki ki parnpara banayi.

unaki pratham rachana 'shyama--ek vaivahik vidnbana', 'hns' ke disnbar, 1933 ee. ke ank men prakashit huee. isake bad any ekanki rachanaen 'shaitan' (1934 ee.), 'ek samyahin samyavadi' (hns, march 1934 ee.), 'pratibha ka vivah' (1933 ee.), 'rahasy romanch' (1935 ee.), 'latari' (1935 ee.) prakashit hueen. inhen sngrahit karake unhonne san 1956 ee. men 'karavan' sngya dekar prakashit kiya. in sabhi ekankiyon par pashchim ki ekanki shaili ki chhap hai. vishay-vastu aur samasya ke vishleshan men pashchim ke buddhivadi natakakaron ibsan aur shaau ka prabhav hai. parishisht karane vale jo sootr-vaky diye hain, ve shaau ke vyng aur phraauyad ki yaun-pradhan vicharadhara ka smaran dilate hain.

bhuvaneshvar ke aur bhi ekanki prakashit hote rahe- 'mrityu' ('hns 1936 ee.), 'ham akele nahin hain' tatha 'sava ath baje' ('bharat'), 'straik' aur 'oosar' ('hns' 1938 ee.). in rachanaon men unaki drishti ka vistar dekhane ko milata hai. yaun-samasya tatha prem ke trikon se oopar uthakar ve samaj ke dukh-dard ko bhi dekhane lage. san 1938 ee. men sumitranndan pnt dvara snpadit 'roopabh' patrika men unhonne ek bade natak 'adamakhor' ka pahala ank prakashit karaya. isase unhonne jivan ki katu vastavikataon ke udghatan ka ghor yatharthavadi drishtikon apanaya hai.

san 1940 ee. men unhonne gogol ke prasiddh natak 'inspektar janaral' ko lagabhag paun ghnte ke ekanki ka roop diya. san 1941 ee. men 'vishvavani' men 'roshani aur ag' shirshak ek prayog upasthit kiya, jisamen grik natakon jaisa poorvalap, koras tha. 'kathaputaliyan' (1942 ee.) men unhonne pratikavadi shaili apanayi. in prayogatmak rachanaon ke anntar bhuvanevar ki natyakala paripakv roop men dekhane ko mili. 'photographar ke samane' (1945 ee.), 'tanbe ke kide' (1946 ee.) men manushy ki badhati huee arthalolupata ka udghatan hai. san 1948 ee. men 'itihas ki kenchul' ekanki likha aur isake anntar unake kee aitihasik ekanki prakashit hue- 'azadi ki ninv' (1949 ee.), 'jeroosalam' (1949 ee.), 'sikndar (1949 ee.), 'akabar' (1950 ee.) tatha chngez khan (1950 ee.). in rachanaon men rashtriyata ka svar bhi ubhara hai. antim kriti 'sio ki gadi' (1950 ee.) hai.[4]


panne ki pragati avastha
adhar
prarambhik
madhyamik
poornata
shodh

tika tippani aur sndarbh

  1. hindi ekanki ke janak the bhuvaneshvar (hindi) amar ujala. abhigaman tithi: 25 march, 2020.
  2. bhuvaneshvar yani hindi ke barnad shaau (hindi) amar ujala. abhigaman tithi: 25 march, 2020.
  3. bhuvaneshvar samagr (hindi) rajakamal prakashan samooh. abhigaman tithi: 26march, 2020.
  4. pustak- hindi sahity kosh-2 | sampadak- dhirendr varma | prishth- 414

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