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मगही शब्द का विकास मागधी से हुआ है (मागधी > मागही >मगही) । मगही [[भारत]] में कुल 17,449,446 लोगों द्वारा बोली जाती है। प्राचीन काल में यह [[मगध साम्राज्य]] की भाषा थी। भगवान [[बुद्ध]] अपने उपदेश इसके प्राचीन रुप "मागधी प्राकृत" में ही देते थे। मगही का [[मैथिली भाषा|मैथिली]] और [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]] भाषाओं से भी गहरा संबंध है जिन्हें सामूहिक रूप से "बिहारी भाषाएं" कहा जाता है जो इन्डो-आर्यन भाषाएं हैं। मैथिली की पारंपरिक लिपि “कैथी” है पर अब यह समन्यतः [[देवनागरी लिपि]] में ही लिखी जाती है। मगही [[बिहार]] के मुख्यतः पटना, गया, जहानाबाद, और औरंगाबाद ज़िले में बोली जाती है। इसके अलावा यह पलामू, गिरिडीह, हज़ारीबाग, मुंगेर, और भागलपुर, झारखंड के कुछ ज़िलों तथा पश्चिम बंगाल के मालदा में भी बोला जाता है।
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==मागधी भाषा==
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मगही या मागधी [[भारत]] की एक भाषा है। मगही शब्द का विकास मागधी से हुआ है (मागधी > मागही >मगही)। मगही [[भारत]] में कुल 17,449,446 लोगों द्वारा बोली जाती है। प्राचीन काल में यह [[मगध साम्राज्य]] की भाषा थी। भगवान [[बुद्ध]] अपने उपदेश इसके प्राचीन रुप मागधी प्राकृत में ही देते थे। मगही का [[मैथिली भाषा|मैथिली]] और [[भोजपुरी भाषा|भोजपुरी]] भाषाओं से भी गहरा संबंध है जिन्हें सामूहिक रूप से बिहारी भाषाएं कहा जाता है जो इन्डो-आर्यन भाषाएं हैं। मैथिली की पारंपरिक लिपि “कैथी” है पर अब यह समन्यतः [[देवनागरी लिपि]] में ही लिखी जाती है। मगही [[बिहार]] के मुख्यतः पटना, गया, जहानाबाद, और औरंगाबाद ज़िले में बोली जाती है। इसके अलावा यह पलामू, गिरिडीह, हज़ारीबाग, मुंगेर, और भागलपुर, झारखंड के कुछ ज़िलों तथा पश्चिम बंगाल के मालदा में भी बोला जाता है।
  
 
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आधुनिक काल में ही मगही के अनेक रुप दृष्टिगत होते हैं। मगही भाषा का क्षेत्र विस्तार अति व्यापक है; अतः स्थान भेद के साथ-साथ इसके रूप बदल जाते हैं । प्रत्येक बोली या भाषा कुछ दूरी पर बदल जाती है। मगही भाषा के निम्नलिखित भेदों का संकेत भाषाविद कृष्णदेव प्रसाद ने किया है :-'सा मागधी मूलभाषा' इस वाक्य से यह बोध होता है कि भगवान गौतम बुद्ध के समय मागधी ही मूल भाषा के रुप में जन सामान्य के बीच बोली जाती थी। कहा जाता है कि भाषा समय पाकर अपना स्वरुप बदलती है और विभिन्न रुपों में विकसित होती है।  
आधुनिक काल में ही मगही के अनेक रुप दृष्टिगत होते हैं। मगही भाषा का क्षेत्र विस्तार अति व्यापक है; अतः स्थान भेद के साथ-साथ इसके रूप बदल जाते हैं । प्रत्येक बोली या भाषा कुछ दूरी पर बदल जाती है। मगही भाषा के निम्नलिखित भेदों का संकेत भाषाविद कृष्णदेव प्रसाद ने किया है :-"सा मागधी मूलभाषा' इस वाक्य से यह बोध होता है कि भगवान गौतम बुद्ध के समय मागधी ही मूल भाषा के रुप में जन सामान्य के बीच बोली जाती थी। कहा जाता है कि भाषा समय पाकर अपना स्वरुप बदलती है और विभिन्न रुपों में विकसित होती है।  
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==मगही का विकास==
 
==मगही का विकास==
मगही का विकास "मागधी' शब्द से हुआ है। ध्वनि परिवर्तन के कारण मागधी > मागही > मगही। आद्य अक्षर में स्वर संकोच होने के कारण मा > म के रुप में विकसित हुआ है। यहां यह प्रश्न उपस्थित होता है कि मगही भाषा का विकास मागधी (पालि) अथवा नाटकों में प्रयुक्त मागधी प्राकृत से हुआ अथवा मगध जनपद में बोली जाने वाली किसी अन्य भाषा से। जहां तक नाटकों में प्रयुक्त होने वाली मागधी प्राकृत का सम्बन्ध है उससे मगही का विकास नहीं माना जा सकता है क्योंकि मागधी में र का ल और स का श हो जाता है। जबकि मगही में र औऱ ल तथा स आदि ध्वनियों का स्वतन्त्र अस्तित्व है। मगही में श का प्रयोग ही नहीं होता है। मागधी में ज का य हो जाता है, किन्तु मगही में यह ज के रुप में ही मिलता है, यथा - जन्म > जनम, जल > जल। मागधी में अन्वर्वती च्छ का श्च हो जाता है जबकि मगही में छ का छ ही रहता है, यथा - गच्छ > गाछ, पुच्छ > पूंछ, गुच्छक > गुच्छा। मागधी में क्ष का श्क हो जाता है जबकि मगही में क्ष का ख हो जाता है, यथा - पक्ष > पक्ख > पख, पंख, क्षेत्र > खेत्त > खेत। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है मागधी प्राकृत से मगही का विकास नहीं माना जा सकता है। पालि जिसे मागधी कहते हैं, उसमें मगही के अनेक शब्द मिलते हैं, यथा - निस्सेनी > निसेनी, गच्छ > गाछ, रुक्ख > रुख, जंखणे > जखने, तंखणे > तखने, कंखणे > कखने, कुहि, कहं > कहां, जहि, जहीं > जहां आदि।
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मगही का विकास 'मागधी' शब्द से हुआ है। ध्वनि परिवर्तन के कारण मागधी > मागही > मगही। आद्य अक्षर में स्वर संकोच होने के कारण मा > म के रुप में विकसित हुआ है। यहां यह प्रश्न उपस्थित होता है कि मगही भाषा का विकास मागधी (पालि) अथवा नाटकों में प्रयुक्त मागधी प्राकृत से हुआ अथवा मगध जनपद में बोली जाने वाली किसी अन्य भाषा से। जहां तक नाटकों में प्रयुक्त होने वाली मागधी प्राकृत का सम्बन्ध है उससे मगही का विकास नहीं माना जा सकता है क्योंकि मागधी में र का ल और स का श हो जाता है। जबकि मगही में र औऱ ल तथा स आदि ध्वनियों का स्वतन्त्र अस्तित्त्वहै। मगही में श का प्रयोग ही नहीं होता है। मागधी में ज का य हो जाता है, किन्तु मगही में यह ज के रुप में ही मिलता है, यथा - जन्म > जनम, जल > जल। मागधी में अन्वर्वती च्छ का श्च हो जाता है जबकि मगही में छ का छ ही रहता है, यथा - गच्छ > गाछ, पुच्छ > पूंछ, गुच्छक > गुच्छा। मागधी में क्ष का श्क हो जाता है जबकि मगही में क्ष का ख हो जाता है, यथा - पक्ष > पक्ख > पख, पंख, क्षेत्र > खेत्त > खेत। उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है मागधी प्राकृत से मगही का विकास नहीं माना जा सकता है। पालि जिसे मागधी कहते हैं, उसमें मगही के अनेक शब्द मिलते हैं, यथा - निस्सेनी > निसेनी, गच्छ > गाछ, रुक्ख > रुख, जंखणे > जखने, तंखणे > तखने, कंखणे > कखने, कुहि, कहं > कहां, जहि, जहीं > जहां आदि।
  
किन्तु पालि और मगही की तुलनात्मक विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि पालि (मागधी) से भी मगही विकसित नहीं हुई है। सुनीति कुमार चटर्जी ने पश्चिमी मागधी अपभ्रंश से बिहारी बोलियों को विकसति माना है। दोहों की भाषा और मगही भाषा की तुलना से यह तथ्य सुनिश्चित होता है कि मगही सिद्धों की भाषा से विकसित हुई है। सर्वनाम में सरहपाद की भाषा में जहां को, जे का प्रयोग होता है, वही मगही के, जे का प्रयोग प्रचलित है। चार, चउदह, दस (दह) आदि संख्यावाचक शब्दों का प्रयोग मगही के समान है। सामयिक परिवर्तन के कारण प्रयोग मगही तथा सिद्धों की मगही में सामयिक परिवर्तन दृष्टिगत होता है किन्तु दोनों की प्रवृति एवं प्रकृति में एकरुपता है।
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किन्तु पालि और मगही की तुलनात्मक विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि पालि (मागधी) से भी मगही विकसित नहीं हुई है। सुनीति कुमार चटर्जी ने पश्चिमी मागधी अपभ्रंश से बिहारी बोलियों को विकसति माना है। दोहों की भाषा और मगही भाषा की तुलना से यह तथ्य सुनिश्चित होता है कि मगही सिद्धों की भाषा से विकसित हुई है। [[सर्वनाम]] में सरहपाद की भाषा में जहां को, जे का प्रयोग होता है, वही मगही के, जे का प्रयोग प्रचलित है। चार, चउदह, दस (दह) आदि संख्यावाचक शब्दों का प्रयोग मगही के समान है। सामयिक परिवर्तन के कारण प्रयोग मगही तथा सिद्धों की मगही में सामयिक परिवर्तन दृष्टिगत होता है किन्तु दोनों की प्रवृति एवं प्रकृति में एकरुपता है।
  
 
सिद्धों की शब्दावलियां कुछ परिवर्तन के साथ मगही में प्रयुक्त होती है। यथा - अइसन, अप्पन, कइसे, लेली-लेली, लेलकइ, आइल > आयल, अइलइ, अन्धारि > अंधार, फटिला > फटिलइ, अधराति, अधरतिया, भइली, भेली भइली, आदि। सिद्ध साहित्य की पंक्तियां भी मगही के अत्यन्त निकट मालूम पड़ती है :
 
सिद्धों की शब्दावलियां कुछ परिवर्तन के साथ मगही में प्रयुक्त होती है। यथा - अइसन, अप्पन, कइसे, लेली-लेली, लेलकइ, आइल > आयल, अइलइ, अन्धारि > अंधार, फटिला > फटिलइ, अधराति, अधरतिया, भइली, भेली भइली, आदि। सिद्ध साहित्य की पंक्तियां भी मगही के अत्यन्त निकट मालूम पड़ती है :
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णिअधरणी चण्डाली लली (चर्यापद 29)। </poem>
 
णिअधरणी चण्डाली लली (चर्यापद 29)। </poem>
  
सिद्धों की भाषाकार गठनात्मक रुप मगही से पूर्णत: एकनिष्ठ है। किसी भाषा की गठनात्मक स्वरुप का निरुपण, संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, विशेषण, उपसर्ग तथा प्रत्यय आदि से होता है। सिद्धों की भाषा की संज्ञा, सर्वनाम, मगही के समान ही हैं। अत: यह कहा जा सकता है कि सिद्धों की भाषा से ही मगही का भाषिक रुप विकसित है।
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सिद्धों की भाषाकार गठनात्मक रुप मगही से पूर्णत: एकनिष्ठ है। किसी भाषा की गठनात्मक स्वरुप का निरुपण, [[संज्ञा]], सर्वनाम, [[क्रिया]], [[विशेषण]], [[उपसर्ग]] तथा [[प्रत्यय]] आदि से होता है। सिद्धों की भाषा की संज्ञा, सर्वनाम, मगही के समान ही हैं। अत: यह कहा जा सकता है कि सिद्धों की भाषा से ही मगही का भाषिक रुप विकसित है। सिद्धों की भाषा और मगही में पर्याप्त समरुपता है। उदाहरण के लिये यर्यापद की कुछ पंक्तियां देखी जा सकती है:
 
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सिद्धों की भाषा और मगही में पर्याप्त समरुपता है। उदाहरण के लिये यर्यापद की कुछ पंक्तियां देखी जा सकती है:
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<poem>सरह भषइ जप उजु भइला
 
<poem>सरह भषइ जप उजु भइला
 
(सरहपा चर्यापद)
 
(सरहपा चर्यापद)
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(बिरुआ, चर्यापद)  
 
(बिरुआ, चर्यापद)  
 
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उपर्युक्त पंक्तियों में सिद्धों ने वर्तमान भूतकालिक कृदन्त प्रत्यय "इल' का प्रयोग किया है। ऐसे प्रयोग आधुनिक मगही में भी मिलते हैं। मागधी अपभ्रन्श से आधुनिक मगही पूर्णत: सम्बद्ध है। अपभ्रंश में प्रयुक्त विभक्तियुक्त संज्ञापदों के रुप मगही में पाये जाते हैं, यथा - घरे में दिनरात बइठल ही। बाबू जी घरे न हथुन । अपभ्रंश काल में विभक्तिबोधक पर सर्गों का प्रयोग होने लगा था, जिनका विकास अन्य भाषाओं के साथ मगही में भी हुआ। इसी प्रकार संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण तथा क्रिया आदि का विकास मागधी (पश्चिमी) अपभ्रंश से हुआ। अपभ्रंश में तत्सम शब्दों के बहिष्कार की प्रकृति दृष्टिगत होती है, आधुनिक मगही में भी यह प्रवृति वर्तमान है। मगही के तद्भव और देशी शब्द-तन्त्र मुख्यत: प्राकृत और अपभ्रंश के शब्द-तन्त्र के ही विकसित रुप हैं। यहां यह बता देना समीचीन है कि सिद्ध साहित्य के रुप में प्राप्त मगही के प्राचीनकालिक स्वरुप के अनन्तर उसके आधुनिक रुप ही मिलते हैं, मधयकालीन स्वरुप अप्राप्त है।
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उपर्युक्त पंक्तियों में सिद्धों ने वर्तमान भूतकालिक कृदन्त प्रत्यय "इल' का प्रयोग किया है। ऐसे प्रयोग आधुनिक मगही में भी मिलते हैं। मागधी अपभ्रंश से आधुनिक मगही पूर्णत: सम्बद्ध है। अपभ्रंश में प्रयुक्त विभक्तियुक्त संज्ञापदों के रुप मगही में पाये जाते हैं, यथा - "घरे में दिनरात बइठल ही। बाबू जी घरे न हथुन।" अपभ्रंश काल में विभक्तिबोधक पर सर्गों का प्रयोग होने लगा था, जिनका विकास अन्य भाषाओं के साथ मगही में भी हुआ। इसी प्रकार संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण तथा क्रिया आदि का विकास मागधी (पश्चिमी) अपभ्रंश से हुआ। अपभ्रंश में तत्सम शब्दों के बहिष्कार की प्रकृति दृष्टिगत होती है, आधुनिक मगही में भी यह प्रवृति वर्तमान है। मगही के तद्भव और देशी शब्द-तन्त्र मुख्यत: प्राकृत और अपभ्रंश के शब्द-तन्त्र के ही विकसित रुप हैं। यहां यह बता देना समीचीन है कि सिद्ध साहित्य के रुप में प्राप्त मगही के प्राचीनकालिक स्वरुप के अनन्तर उसके आधुनिक रुप ही मिलते हैं, मध्यकालीन स्वरुप अप्राप्त है।
 
==भाषात्त्व==
 
==भाषात्त्व==
 
मगही का स्वतन्त्र भाषात्त्व है किन्तु मैथिली भाषा वैज्ञानिकों अर्थात जयकान्त मिश्र ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि मगही का स्वतन्त्र अस्तित्त्व है। जयकान्त मिश्र ने मगही को मैथिली की एक उपबोली के रुप में सिद्ध किया है किन्तु मैथिली और मगही को एक दूसरे से पृथक करने वाली विशिष्टता दोनों की औच्चारणिक एवं ध्वन्यात्मक परिवर्तन की प्रकिया है। अत: मगही को मैथिली की उपबोली के रुप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इसका स्वतन्त्र भाषात्त्व है।
 
मगही का स्वतन्त्र भाषात्त्व है किन्तु मैथिली भाषा वैज्ञानिकों अर्थात जयकान्त मिश्र ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि मगही का स्वतन्त्र अस्तित्त्व है। जयकान्त मिश्र ने मगही को मैथिली की एक उपबोली के रुप में सिद्ध किया है किन्तु मैथिली और मगही को एक दूसरे से पृथक करने वाली विशिष्टता दोनों की औच्चारणिक एवं ध्वन्यात्मक परिवर्तन की प्रकिया है। अत: मगही को मैथिली की उपबोली के रुप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। इसका स्वतन्त्र भाषात्त्व है।
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मगही तथा भोजपुरी में भी कुछ भाषिक एवं व्याकरणिक एकरुपता दृष्टिगत होती है, किन्तु दोनों भाषाओं का पृथक-पृथक अस्तित्त्व है। बिहारी बोलियों में पायी जाने वाली आन्तरिक एकरुपता अवश्य मिलती है। किन्तु आन्तरिक विषमता भी प्रभूत रुप में मिलती है। मगही तथा भोजपुरी में व्याकरणिक भिन्नता भी है। मगही क्रियाओं में जहां कर्ता के अनुरुप लिंगभेद नहीं होता वहां भोजपुरी में होता हा। संक्षेपत: यह कहा जा सकता है कि मगही की स्वतन्त्र भाषिक सत्ता है।
 
मगही तथा भोजपुरी में भी कुछ भाषिक एवं व्याकरणिक एकरुपता दृष्टिगत होती है, किन्तु दोनों भाषाओं का पृथक-पृथक अस्तित्त्व है। बिहारी बोलियों में पायी जाने वाली आन्तरिक एकरुपता अवश्य मिलती है। किन्तु आन्तरिक विषमता भी प्रभूत रुप में मिलती है। मगही तथा भोजपुरी में व्याकरणिक भिन्नता भी है। मगही क्रियाओं में जहां कर्ता के अनुरुप लिंगभेद नहीं होता वहां भोजपुरी में होता हा। संक्षेपत: यह कहा जा सकता है कि मगही की स्वतन्त्र भाषिक सत्ता है।
  
मगही भाषा की सीमा का विवेचन करने पर पता चलता है कि यह केवल पटना और गया ज़िले में ही नहीं अपितु झारखण्ड प्रदेश के हजारीबाग, गिरिडीह आदि ज़िलमें भी बोली जाती है। मगध के पश्चिमी सीमा पर [[झारखण्ड]] राज्य के पलामू ज़िले के कुछ भागों में तथा पूर्व में [[बिहार]] राज्य के ही [[मुंगेर]] तथा [[भागलपुर]] के क्षेत्रों में भी मगही बोली जाती है।
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मगही भाषा की सीमा का विवेचन करने पर पता चलता है कि यह केवल पटना और गया ज़िले में ही नहीं अपितु झारखण्ड प्रदेश के हजारीबाग, गिरिडीह आदि ज़िले में भी बोली जाती है। मगध के पश्चिमी सीमा पर [[झारखण्ड]] राज्य के पलामू ज़िले के कुछ भागों में तथा पूर्व में [[बिहार]] राज्य के ही [[मुंगेर]] तथा [[भागलपुर]] के क्षेत्रों में भी मगही बोली जाती है।
  
 
मगही क्षेत्र के उत्तर में गंगापार तिरहुत क्षेत्र में मैथिली बोली का क्षेत्र है। पश्चिम में शाहाबाद तथा पलामू का भोजपुरी क्षेत्र है। उत्तर पूर्वी सीमा पर मुंगेर, भागपुर और संथाल परगना (झारखण्ड) में अंगिका (छिकाछिकी) बोली जाती है। मगही की दक्षिण सीमा पर रांची में सदानी भोजपुरी का क्षेत्र है।
 
मगही क्षेत्र के उत्तर में गंगापार तिरहुत क्षेत्र में मैथिली बोली का क्षेत्र है। पश्चिम में शाहाबाद तथा पलामू का भोजपुरी क्षेत्र है। उत्तर पूर्वी सीमा पर मुंगेर, भागपुर और संथाल परगना (झारखण्ड) में अंगिका (छिकाछिकी) बोली जाती है। मगही की दक्षिण सीमा पर रांची में सदानी भोजपुरी का क्षेत्र है।
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शुद्ध मगही अपने क्षेत्र में बोली जाती है। यह पश्चिमी क्षेत्र में पटना, गया, हजारीबाग, मुंगेर और भागलपुर ज़िले में ही नहीं अपितु पूर्व क्षेत्र में रांची के दक्षिण भाग में, सिंहभूम के उत्तरी क्षेत्र में तथा सरायकेला एवं कारसावां के कुछ क्षेत्रों में मगही बोली जाती है।
 
शुद्ध मगही अपने क्षेत्र में बोली जाती है। यह पश्चिमी क्षेत्र में पटना, गया, हजारीबाग, मुंगेर और भागलपुर ज़िले में ही नहीं अपितु पूर्व क्षेत्र में रांची के दक्षिण भाग में, सिंहभूम के उत्तरी क्षेत्र में तथा सरायकेला एवं कारसावां के कुछ क्षेत्रों में मगही बोली जाती है।
 
;मिश्रित मगही
 
;मिश्रित मगही
पूर्वी मगही तथा शुद्ध मगही के साथ ही मिश्रित मगही की भी एक व्यापक संज्ञा हो सकती है। मिश्रित मगही का रुप वहां दिखाई पड़ता है जहां आदर्श मगही अपनी सीमा पर अन्य सहोदर भाषाओं, जैसे मैथिली और भोजपुरी से एक से एक होकर एवं अपने अस्तित्व को क्षीरोदकीभूत कर सीमावर्ती बोलियों के रुप में व्यक्त होती है।
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पूर्वी मगही तथा शुद्ध मगही के साथ ही मिश्रित मगही की भी एक व्यापक संज्ञा हो सकती है। मिश्रित मगही का रुप वहां दिखाई पड़ता है जहां आदर्श मगही अपनी सीमा पर अन्य सहोदर भाषाओं, जैसे मैथिली और भोजपुरी से एक से एक होकर एवं अपने अस्तित्त्व को क्षीरोदकीभूत कर सीमावर्ती बोलियों के रुप में व्यक्त होती है।
 
==आधुनिक काल में मगही==
 
==आधुनिक काल में मगही==
 
आधुनिक काल में ही मगही के अनेक रुप दृष्टिगत होते हैं। मगही भाषा का क्षेत्र विस्तार अति व्यापक है, परिणामत: स्थान भेद के कारण इसके रुप भेद भी प्रचलित हैं। प्रत्येक बोली या भाषा कुछ दूरी पर बदल जाती है।  
 
आधुनिक काल में ही मगही के अनेक रुप दृष्टिगत होते हैं। मगही भाषा का क्षेत्र विस्तार अति व्यापक है, परिणामत: स्थान भेद के कारण इसके रुप भेद भी प्रचलित हैं। प्रत्येक बोली या भाषा कुछ दूरी पर बदल जाती है।  
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सोन नदी के तटवर्ती भू-भाग में पट्ना और गया ज़िले में सोनतरिया मगही बोली जाती है।
 
सोन नदी के तटवर्ती भू-भाग में पट्ना और गया ज़िले में सोनतरिया मगही बोली जाती है।
 
;जंगली मगही
 
;जंगली मगही
राजगृह, गया, झारखण्ड प्रदेश के छोटानागपु (उत्तरी छोटानागपुर मूलत:) और विशेषतौर से हजारीबाग के वन्य या जंगली क्षेत्रों में जंगली मगही बोली जाती है।
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[[राजगृह]], [[गया]], [[झारखण्ड]] प्रदेश के छोटानागपुर (उत्तरी छोटानागपुर मूलत:) और विशेषतौर से हजारीबाग के वन्य या जंगली क्षेत्रों में जंगली मगही बोली जाती है।
 
;ग्रियर्सन महोदय के अनुसार
 
;ग्रियर्सन महोदय के अनुसार
श्री कृष्णदेव प्रसाद ने पूर्वी मगही का उल्लेख नहीं किया है। ग्रियर्सन महोदय के अनुसार पूर्वी मगही का क्षेत्र हजारीबाग, मानभूम, दक्षिणभूम, दक्षिणपूर्व रांची तथा उड़ीसा में स्थित खारसावां एवं मयुरभंज के कुछ भाग तथा छत्तीसगढ़ के वामड़ा में है। मालदा ज़िले के दक्षिण में भी ग्रियर्सन पूर्वी-मगही की स्थिति स्वीकार करते हैं। भोलानाथ तिवारी ने मगही के चार रुपों का निर्धारण हिन्दी भाषा नामक पुस्तक में किया है :
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श्री कृष्णदेव प्रसाद ने पूर्वी मगही का उल्लेख नहीं किया है। ग्रियर्सन महोदय के अनुसार पूर्वी मगही का क्षेत्र हजारीबाग, मानभूम, दक्षिणभूम, दक्षिणपूर्व रांची तथा उड़ीसा में स्थित खारसावां एवं मयुरभंज के कुछ भाग तथा छत्तीसगढ़ के वामड़ा में है। मालदा ज़िले के दक्षिण में भी ग्रियर्सन पूर्वी-मगही की स्थिति स्वीकार करते हैं। भोलानाथ तिवारी ने मगही के चार रुपों का निर्धारण [[हिन्दी भाषा]] नामक पुस्तक में किया है :
 
#आदर्श-मगही
 
#आदर्श-मगही
 
#पूर्वी-मगही
 
#पूर्वी-मगही
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#सोनतरी मगही
 
#सोनतरी मगही
 
;भोलानाथ तिवारी के अनुसार
 
;भोलानाथ तिवारी के अनुसार
भोलानाथ तिवारी की मान्यता है कि मगही का परिनिष्ठित रुप गया ज़िले में बोला जाता है। ग्रियर्सन ने भी गया ज़िले में बोली जाने वाली मगही को विशुद्धतम की संज्ञा<ref>भारत की भाषा का सर्वेक्षण, खण्ड 5 भाग 2, पृ. 123</ref> दी है। प्राचीन गया जनपद में मगही भाषा के तीन स्पष्ट भेद प्रचलित थे। नवादा अनुमण्डल, औरंगाबाद अनुमण्डल तथा गया के शेष क्षेत्र की मगही में स्पष्ट अन्तर है। किन्तु ज़िले के पुनर्गठन के पश्चात गया ज़िले में एक ही प्रकार की मगही प्रचलित है। पटना ज़िले के दक्षिणी भाग और प्राय: सम्पूर्ण गया ज़िले में विशेष रुप से एकरुपता पायी जाती है। पटना और गया ज़िले की भाषा को ही परिनिष्ठित मगही मानना युक्तिसंगत एवं समीचीन है। अत: ब्रजमोहन पाण्डेय "नलिन' जो कि पालि भाषा के मगध विश्वविद्यालय में विबागाध्यक्ष हैं मगही साहित्यकारों से निवेदन करते हुऐ लिखते हैं; "मगही साहित्याकारों से अत: मेरा निवेदन है कि वे गया की मगही को ही परिनिष्ठित मानकर अपने रचनात्मक कार्यों का सम्पादन करें।''
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भोलानाथ तिवारी की मान्यता है कि मगही का परिनिष्ठित रुप गया ज़िले में बोला जाता है। ग्रियर्सन ने भी गया ज़िले में बोली जाने वाली मगही को विशुद्धतम की संज्ञा<ref>भारत की भाषा का सर्वेक्षण, खण्ड 5 भाग 2, पृ. 123</ref> दी है। प्राचीन गया जनपद में मगही भाषा के तीन स्पष्ट भेद प्रचलित थे। नवादा अनुमण्डल, औरंगाबाद अनुमण्डल तथा गया के शेष क्षेत्र की मगही में स्पष्ट अन्तर है। किन्तु ज़िले के पुनर्गठन के पश्चात गया ज़िले में एक ही प्रकार की मगही प्रचलित है। पटना ज़िले के दक्षिणी भाग और प्राय: सम्पूर्ण गया ज़िले में विशेष रुप से एकरुपता पायी जाती है। पटना और गया ज़िले की भाषा को ही परिनिष्ठित मगही मानना युक्तिसंगत एवं समीचीन है। अत: ब्रजमोहन पाण्डेय 'नलिन' जो कि पालि भाषा के मगध विश्वविद्यालय में विबागाध्यक्ष हैं मगही साहित्यकारों से निवेदन करते हुऐ लिखते हैं; 'मगही साहित्याकारों से अत: मेरा निवेदन है कि वे गया की मगही को ही परिनिष्ठित मानकर अपने रचनात्मक कार्यों का सम्पादन करें।'
 
==मगही भाषा के प्राचीन साहित्येतिहास==
 
==मगही भाषा के प्राचीन साहित्येतिहास==
मगही भाषा के प्राचीन साहित्येतिहास का प्रारम्भ आठवीं शताब्दी के सिद्ध कवियों की रचनाओं से होता है। सरहपा की रचनाओं का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक संस्करण दोहाकोष के नाम से प्रकाशित है जिसके सम्पादक महापणिडत राहुल सांकृत्यायन हैं। सिद्धों की परम्परा में मध्यकाल के अनेक संतकवियों ने मगधी भाषा में रचनायें की। इन कवियों में बाबा करमदास, बाबा सोहंगदास, बाबा हेमनाथ दास आदि अनेक कवियों के नाम उल्लेख हैं। सरहपा की रचनाओं का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक संस्करण दोहाकोष के नाम से प्रकाशित है जिसके सम्पादक महापण्डित [[राहुल सांकृत्यायन]] हैं। सिद्धों की परम्परा में मध्यकाल के अनेक संतकवियों ने मगधी भाषा में रचनायें की। इन कवियों में बाबा करमदास, बाबा सोहंगदास, बाबा हेमनाथ दास आदि अनेक कवियों के नाम उल्लेख हैं।
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मगही भाषा के प्राचीन साहित्येतिहास का प्रारम्भ आठवीं शताब्दी के सिद्ध कवियों की रचनाओं से होता है। सरहपा की रचनाओं का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक संस्करण दोहाकोष के नाम से प्रकाशित है जिसके सम्पादक महापणिडत [[राहुल सांकृत्यायन]] हैं। सिद्धों की परम्परा में मध्यकाल के अनेक संतकवियों ने मगधी भाषा में रचनायें की। इन कवियों में बाबा करमदास, बाबा सोहंगदास, बाबा हेमनाथ दास आदि अनेक कवियों के नाम उल्लेख हैं।  
 
==आधुनिक काल में मगही भाषा==
 
==आधुनिक काल में मगही भाषा==
  
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आधुनिक काल में लोकभाषा और लोकसाहित्य सम्बन्धी अध्ययन के परिणामस्वरुप मगही के प्राचीन परम्परागत लोकगीतों, लोककथाओं, लोकनाट्यों, मुहावरों, कहावतों तथा पहेलियों का संग्रह कार्य बड़ी तीव्रता के साथ किया जा रहा है। साथ ही मगही भाषा में युगोचित साहित्य, अर्थात् कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, एकांकी, ललित निबन्ध आदि की रचनाएं, पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एवं भाषा और साहित्य पर अनुसंधान भी हो रहे हैं।
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आधुनिक काल में लोकभाषा और लोकसाहित्य सम्बन्धी अध्ययन के परिणामस्वरुप मगही के प्राचीन परम्परागत लोकगीतों, लोककथाओं, लोकनाट्यों, मुहावरों, कहावतों तथा पहेलियों का संग्रह कार्य बड़ी तीव्रता के साथ किया जा रहा है। साथ ही मगही भाषा में युगोचित साहित्य, अर्थात कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, एकांकी, ललित निबन्ध आदि की रचनाएं, पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एवं भाषा और साहित्य पर अनुसंधान भी हो रहे हैं।
 
====प्रबन्ध काव्य एवं महाकाव्य====
 
====प्रबन्ध काव्य एवं महाकाव्य====
 
*हरिनाथ मिश्र - ललित रामायन
 
*हरिनाथ मिश्र - ललित रामायन
पंक्ति 144: पंक्ति 143:
 
* राजेन्द्र पाण्डेय - ढिबरी
 
* राजेन्द्र पाण्डेय - ढिबरी
  
====कहानी संग्रह====
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====कहानी संग्रह====
 
*जितेन्द्र वत्स - किरिया करम
 
*जितेन्द्र वत्स - किरिया करम
 
*श्रीकान्त शास्री - मगही कहानी सेंगरन
 
*श्रीकान्त शास्री - मगही कहानी सेंगरन

16:57, 4 सितम्बर 2011 का अवतरण

magadhi bhasha

magahi ya magadhi bharat ki ek bhasha hai. magahi shabd ka vikas magadhi se hua hai (magadhi > magahi >magahi). magahi bharat men kul 17,449,446 logon dvara boli jati hai. prachin kal men yah magadh samrajy ki bhasha thi. bhagavan buddh apane upadesh isake prachin rup magadhi prakrit men hi dete the. magahi ka maithili aur bhojapuri bhashaon se bhi gahara snbndh hai jinhen samoohik roop se bihari bhashaen kaha jata hai jo indo-aryan bhashaen hain. maithili ki parnparik lipi “kaithi” hai par ab yah samanyatah devanagari lipi men hi likhi jati hai. magahi bihar ke mukhyatah patana, gaya, jahanabad, aur aurngabad zile men boli jati hai. isake alava yah palamoo, giridih, hazaribag, munger, aur bhagalapur, jharakhnd ke kuchh zilon tatha pashchim bngal ke malada men bhi bola jata hai.

adhunik kal men hi magahi ke anek rup drishtigat hote hain. magahi bhasha ka kshetr vistar ati vyapak hai; atah sthan bhed ke sath-sath isake roop badal jate hain . pratyek boli ya bhasha kuchh doori par badal jati hai. magahi bhasha ke nimnalikhit bhedon ka snket bhashavid krishnadev prasad ne kiya hai :-'sa magadhi moolabhasha' is vaky se yah bodh hota hai ki bhagavan gautam buddh ke samay magadhi hi mool bhasha ke rup men jan samany ke bich boli jati thi. kaha jata hai ki bhasha samay pakar apana svarup badalati hai aur vibhinn rupon men vikasit hoti hai.

magahi ka vikas

magahi ka vikas 'magadhi' shabd se hua hai. dhvani parivartan ke karan magadhi > magahi > magahi. ady akshar men svar snkoch hone ke karan ma > m ke rup men vikasit hua hai. yahan yah prashn upasthit hota hai ki magahi bhasha ka vikas magadhi (pali) athava natakon men prayukt magadhi prakrit se hua athava magadh janapad men boli jane vali kisi any bhasha se. jahan tak natakon men prayukt hone vali magadhi prakrit ka sambandh hai usase magahi ka vikas nahin mana ja sakata hai kyonki magadhi men r ka l aur s ka sh ho jata hai. jabaki magahi men r auऱ l tatha s adi dhvaniyon ka svatantr astittvahai. magahi men sh ka prayog hi nahin hota hai. magadhi men j ka y ho jata hai, kintu magahi men yah j ke rup men hi milata hai, yatha - janm > janam, jal > jal. magadhi men anvarvati chchh ka shch ho jata hai jabaki magahi men chh ka chh hi rahata hai, yatha - gachchh > gachh, puchchh > poonchh, guchchhak > guchchha. magadhi men ksh ka shk ho jata hai jabaki magahi men ksh ka kh ho jata hai, yatha - paksh > pakkh > pakh, pnkh, kshetr > khett > khet. uparyukt tathyon ke adhar par yah kaha ja sakata hai magadhi prakrit se magahi ka vikas nahin mana ja sakata hai. pali jise magadhi kahate hain, usamen magahi ke anek shabd milate hain, yatha - nisseni > niseni, gachchh > gachh, rukkh > rukh, jnkhane > jakhane, tnkhane > takhane, knkhane > kakhane, kuhi, kahn > kahan, jahi, jahin > jahan adi.

kintu pali aur magahi ki tulanatmak vivechana se yah spasht ho jata hai ki pali (magadhi) se bhi magahi vikasit nahin huee hai. suniti kumar chatarji ne pashchimi magadhi apabhrnsh se bihari boliyon ko vikasati mana hai. dohon ki bhasha aur magahi bhasha ki tulana se yah tathy sunishchit hota hai ki magahi siddhon ki bhasha se vikasit huee hai. sarvanam men sarahapad ki bhasha men jahan ko, je ka prayog hota hai, vahi magahi ke, je ka prayog prachalit hai. char, chudah, das (dah) adi snkhyavachak shabdon ka prayog magahi ke saman hai. samayik parivartan ke karan prayog magahi tatha siddhon ki magahi men samayik parivartan drishtigat hota hai kintu donon ki pravriti evn prakriti men ekarupata hai.

siddhon ki shabdavaliyan kuchh parivartan ke sath magahi men prayukt hoti hai. yatha - aisan, appan, kise, leli-leli, lelaki, ail > ayal, aili, andhari > andhar, phatila > phatili, adharati, adharatiya, bhili, bheli bhili, adi. siddh sahity ki pnktiyan bhi magahi ke atyant nikat maloom padati hai :

bhav n hoi abhav n jagi.
ais snvahai ko patiai..
aji bhoosu bngali bhili
niadharani chandali lali (charyapad 29).

siddhon ki bhashakar gathanatmak rup magahi se poornat: ekanishth hai. kisi bhasha ki gathanatmak svarup ka nirupan, sngya, sarvanam, kriya, visheshan, upasarg tatha pratyay adi se hota hai. siddhon ki bhasha ki sngya, sarvanam, magahi ke saman hi hain. at: yah kaha ja sakata hai ki siddhon ki bhasha se hi magahi ka bhashik rup vikasit hai. siddhon ki bhasha aur magahi men paryapt samarupata hai. udaharan ke liye yaryapad ki kuchh pnktiyan dekhi ja sakati hai:

sarah bhashi jap uju bhila
(sarahapa charyapad)

nana taruvar maulil te ganat lalegi dali.
(sarahapa charyapad)

ail garahak apane bahia.
(birua, charyapad)

uparyukt pnktiyon men siddhon ne vartaman bhootakalik kridant pratyay "il' ka prayog kiya hai. aise prayog adhunik magahi men bhi milate hain. magadhi apabhrnsh se adhunik magahi poornat: sambaddh hai. apabhrnsh men prayukt vibhaktiyukt sngyapadon ke rup magahi men paye jate hain, yatha - "ghare men dinarat bithal hi. baboo ji ghare n hathun." apabhrnsh kal men vibhaktibodhak par sargon ka prayog hone laga tha, jinaka vikas any bhashaon ke sath magahi men bhi hua. isi prakar sngya, sarvanam, visheshan tatha kriya adi ka vikas magadhi (pashchimi) apabhrnsh se hua. apabhrnsh men tatsam shabdon ke bahishkar ki prakriti drishtigat hoti hai, adhunik magahi men bhi yah pravriti vartaman hai. magahi ke tadbhav aur deshi shabd-tantr mukhyat: prakrit aur apabhrnsh ke shabd-tantr ke hi vikasit rup hain. yahan yah bata dena samichin hai ki siddh sahity ke rup men prapt magahi ke prachinakalik svarup ke anantar usake adhunik rup hi milate hain, madhyakalin svarup aprapt hai.

bhashattv

magahi ka svatantr bhashattv hai kintu maithili bhasha vaigyanikon arthat jayakant mishr ne yah siddh karane ka prayatn kiya hai ki magahi ka svatantr astittv hai. jayakant mishr ne magahi ko maithili ki ek upaboli ke rup men siddh kiya hai kintu maithili aur magahi ko ek doosare se prithak karane vali vishishtata donon ki auchcharanik evn dhvanyatmak parivartan ki prakiya hai. at: magahi ko maithili ki upaboli ke rup men svikar nahin kiya ja sakata hai. isaka svatantr bhashattv hai.

magahi tatha bhojapuri men bhi kuchh bhashik evn vyakaranik ekarupata drishtigat hoti hai, kintu donon bhashaon ka prithak-prithak astittv hai. bihari boliyon men payi jane vali antarik ekarupata avashy milati hai. kintu antarik vishamata bhi prabhoot rup men milati hai. magahi tatha bhojapuri men vyakaranik bhinnata bhi hai. magahi kriyaon men jahan karta ke anurup lingabhed nahin hota vahan bhojapuri men hota ha. snkshepat: yah kaha ja sakata hai ki magahi ki svatantr bhashik satta hai.

magahi bhasha ki sima ka vivechan karane par pata chalata hai ki yah keval patana aur gaya zile men hi nahin apitu jharakhand pradesh ke hajaribag, giridih adi zile men bhi boli jati hai. magadh ke pashchimi sima par jharakhand rajy ke palamoo zile ke kuchh bhagon men tatha poorv men bihar rajy ke hi munger tatha bhagalapur ke kshetron men bhi magahi boli jati hai.

magahi kshetr ke uttar men gngapar tirahut kshetr men maithili boli ka kshetr hai. pashchim men shahabad tatha palamoo ka bhojapuri kshetr hai. uttar poorvi sima par munger, bhagapur aur snthal paragana (jharakhand) men angika (chhikachhiki) boli jati hai. magahi ki dakshin sima par ranchi men sadani bhojapuri ka kshetr hai.

magahi ke roop

griyarsan ne magahi ke do rupon ko svikar kiya hai:

  1. poorvi magahi
  2. shuddh magahi
poorvi magahi

poorvi magahi ka koee shrrinkhalabaddh rup nahin hai. yah magahi hajaribag ke dakshinapoorv bhag, manabhoom evn ranchi ke dakshin poorv bhag kharasavan tatha dakshin men mayoorabhnj evn bamara tak boli jati hai. malada zile ke pashchimi bhag men bhi poorvi magahi ka kshetr hai.

shuddh magahi

shuddh magahi apane kshetr men boli jati hai. yah pashchimi kshetr men patana, gaya, hajaribag, munger aur bhagalapur zile men hi nahin apitu poorv kshetr men ranchi ke dakshin bhag men, sinhabhoom ke uttari kshetr men tatha sarayakela evn karasavan ke kuchh kshetron men magahi boli jati hai.

mishrit magahi

poorvi magahi tatha shuddh magahi ke sath hi mishrit magahi ki bhi ek vyapak sngya ho sakati hai. mishrit magahi ka rup vahan dikhaee padata hai jahan adarsh magahi apani sima par any sahodar bhashaon, jaise maithili aur bhojapuri se ek se ek hokar evn apane astittv ko kshirodakibhoot kar simavarti boliyon ke rup men vyakt hoti hai.

adhunik kal men magahi

adhunik kal men hi magahi ke anek rup drishtigat hote hain. magahi bhasha ka kshetr vistar ati vyapak hai, parinamat: sthan bhed ke karan isake rup bhed bhi prachalit hain. pratyek boli ya bhasha kuchh doori par badal jati hai.

krishnadev prasad ke anusar

magahi bhasha ke nimnalikhit bhedon ka snket krishnadev prasad ne kiya hai :

  1. adarsh-magahi
  2. shuddh-magahi
  3. talahamagahi
  4. sonatariyamagahi
  5. jngalimagahi
adarsh- magahi

yah mukhyat: gaya zile men boli jati hai.

shuddh -magahi

is prakar ki magahi rajagrih se lekar biharashariph ke uttar char kos bayana steshan (relave) patana zile ke any kshetron men boli jati hai

talaha -magahi

talaha magahi mukhy rup se mokama, badahiya, badh anumandal ke is par ke kuchh poorvi bhag aur lakkhisaray thana ke kuchh uttari bhag giddhaur aur poorv men phatuhan men boli jati hai.

sonatariya magahi

son nadi ke tatavarti bhoo-bhag men patna aur gaya zile men sonatariya magahi boli jati hai.

jngali magahi

rajagrih, gaya, jharakhand pradesh ke chhotanagapur (uttari chhotanagapur moolat:) aur visheshataur se hajaribag ke vany ya jngali kshetron men jngali magahi boli jati hai.

griyarsan mahoday ke anusar

shri krishnadev prasad ne poorvi magahi ka ullekh nahin kiya hai. griyarsan mahoday ke anusar poorvi magahi ka kshetr hajaribag, manabhoom, dakshinabhoom, dakshinapoorv ranchi tatha udisa men sthit kharasavan evn mayurabhnj ke kuchh bhag tatha chhattisagadh ke vamada men hai. malada zile ke dakshin men bhi griyarsan poorvi-magahi ki sthiti svikar karate hain. bholanath tivari ne magahi ke char rupon ka nirdharan hindi bhasha namak pustak men kiya hai :

  1. adarsh-magahi
  2. poorvi-magahi
  3. jngali-magahi
  4. sonatari magahi
bholanath tivari ke anusar

bholanath tivari ki manyata hai ki magahi ka parinishthit rup gaya zile men bola jata hai. griyarsan ne bhi gaya zile men boli jane vali magahi ko vishuddhatam ki sngya[1] di hai. prachin gaya janapad men magahi bhasha ke tin spasht bhed prachalit the. navada anumandal, aurngabad anumandal tatha gaya ke shesh kshetr ki magahi men spasht antar hai. kintu zile ke punargathan ke pashchat gaya zile men ek hi prakar ki magahi prachalit hai. patana zile ke dakshini bhag aur pray: sampoorn gaya zile men vishesh rup se ekarupata payi jati hai. patana aur gaya zile ki bhasha ko hi parinishthit magahi manana yuktisngat evn samichin hai. at: brajamohan pandey 'nalin' jo ki pali bhasha ke magadh vishvavidyalay men vibagadhyaksh hain magahi sahityakaron se nivedan karate huai likhate hain; 'magahi sahityakaron se at: mera nivedan hai ki ve gaya ki magahi ko hi parinishthit manakar apane rachanatmak karyon ka sampadan karen.'

magahi bhasha ke prachin sahityetihas

magahi bhasha ke prachin sahityetihas ka prarambh athavin shatabdi ke siddh kaviyon ki rachanaon se hota hai. sarahapa ki rachanaon ka suvyavasthit evn vaigyanik snskaran dohakosh ke nam se prakashit hai jisake sampadak mahapanidat rahul sankrityayan hain. siddhon ki parampara men madhyakal ke anek sntakaviyon ne magadhi bhasha men rachanayen ki. in kaviyon men baba karamadas, baba sohngadas, baba hemanath das adi anek kaviyon ke nam ullekh hain.

adhunik kal men magahi bhasha

adhunik kal men magahi bhasha men sahity pranayan ki parampara age tivr gati se badhi hai. shrikant shasri adhunik magahi sahity ki chetana ka arambh shrikrishnadev prasad ki rachanaon se manate hain. adhunik magahi sahity ki shrivriddhi karane valon men shrikant shasri, shrikrishnadev prasad, ramanaresh, pathak, jayaram sinh, ramanandan, mrityunjay mishr "karunesh', yogeshvar sinh "yogesh', ram naresh mishr "hns', baboolal "madhukar', satish mishr, ramakrishn mishr, ramaprasad sinh, ramanaresh prasad varma, ramapukar sinh rathaur, govardhan prasad saday, sooryanarayan sharma, mathura prasad "navin', shrinandan shasri, suresh doobe "saras', sheshanand madhukar, ramaprasad pundarik, anik vibhakar, mithilesh jaitapuriya, rajesh pathak, suresh anand pathak, devanandan vikal, ramasinhasan sinh vidyarthi, shridhar prasad sharma, kapiladev prasad trivedi, "dev magahiya', harishchandr priyadarshi, harinandan mishr "kisalay', ramagopal sharma "rudr', ramasanehi sinh "sanehi', sidhdeshvar pandey "nalin', radhakrishn ray adi ke nam pramuk hai. jin kaviyon, lekhakon, natakakaron, kahanikaron, upanyasakaron evn nibandhakaron ne sahity ki vividh vidhaon men rachanadharmita ko jivant rakhate hue kalam chalaee hai, unaka snkshipt vivaran niche diya ja raha hai :


adhunik kal men lokabhasha aur lokasahity sambandhi adhyayan ke parinamasvarup magahi ke prachin paramparagat lokagiton, lokakathaon, lokanatyon, muhavaron, kahavaton tatha paheliyon ka sngrah kary badi tivrata ke sath kiya ja raha hai. sath hi magahi bhasha men yugochit sahity, arthat kavita, kahani, natak, upanyas, ekanki, lalit nibandh adi ki rachanaen, patr-patrikaon ka prakashan evn bhasha aur sahity par anusndhan bhi ho rahe hain.

prabandh kavy evn mahakavy

  • harinath mishr - lalit ramayan
  • harinath mishr - lalit bhagavat
  • ramaprasad sinh - loha marad
  • yogeshvar prasad sinh "yogesh' - gautam
  • yogesh pathak - jarasndh

khand kavy

  • mithilesh prasad mithilesh - radhiya
  • ramaprasad sinh - sarahapad

muktak kavy

  • ramanaresh prasad varma - chyavan
  • svarnakiran - jivak, sujata
  • suresh doove ""saras - nihora
  • prasad sinh - parasapallav
  • ramavilas rajakan - vasnti
  • ramavilas rajakan - dooj ke chand
  • ramavilas rajakan - panasokha rajanigndha
  • ramapukar sinh rathaur - aujan
  • ramasinhasan sinh - jagarana
  • yogeshvar prasad ""yogesh - lotachutti

gitikavy aur kavita

  • ramakrishn mishr - git ke judachhant
  • ramakrishn mishr - belapattar
  • ramadas ary - git adami ke
  • svarnakiran - dharati phat gelee
  • shrinandan shasri - appanagit
  • mahendr prasad dehati - papihara
  • jay prakash - mati ke diya
  • ramadhar sinh ""adhar - magahi kavitavali
  • satish kumar mishr - toosa
  • svarnakiran - dharati ke pati
  • jayanath kavi - panaghat
  • ramanagina sinh ""magahiya - halapha
  • rajenedr sinh - luathi
  • yogeshvar prasad sinh "yogesh' - tulasidas
  • rnjan kumar mishr - dharakit lor
  • mathura prasad navin - badahiya goli kand
  • rajakumar prasad - lutti
  • mrityunjay mishr ""karunesh - gajal he nam
  • dinabandhu - tit-mith-gajalagit
  • suresh datt mishr - ugen
  • ramagopal sharma ""rudr - upades - gatha
  • shyamapyari kunar - vndana
  • ramanagina sinh ""magahiya - bhor
  • svarnakiran - muar
  • brajamohan pandey ""nalin (sn) - atit - gatha
  • ramaprasad sinh (sn.) - jharokha
  • ramaprasad sinh (sn.) - muskan
  • baboolal madhukar - lahara
  • ramanagina sinh ""mahariya - vikramapukar
  • ramanagina sinh ""mahariya - dharadaya git
  • ramanagina sinh ""mahariya - vikram pratigya
  • ramanagina sinh ""mahariya - gavee git
  • ramanagina sinh ""mahariya - jay magahi
  • yogeshvar prasad sinh ""yogesh - injor
  • baboolal madhukar - anguri ke dag
  • mahendr prasad shubhansu - taras uthal jiyara
  • govind pyasa - badhava men bhelad bihan
  • govind pyasa - snjhuti
  • rajendr pandey - dhibari

kahani sngrah

  • jitendr vats - kiriya karam
  • shrikant shasri - magahi kahani sengaran
  • rajeshvar pathak ""rajesh - nagarabahoo
  • lakshman prasad - katha thud
  • ramanaresh prasad varma - sejiyadan
  • abhimanyu prasad maury - katha sarovar
  • alakhadev prasad achal - kathakali
  • suresh pradas nirdvenddh - muraga bol delak
  • tarakeshvar bharati - naina kajar
  • radhakrishn - e neur too gnga ja
  • ramanandan - lut geliya
  • brajamohan pandey ""nalin - ek par ek
  • ramachandr adip - gamala men gachh
  • ramachandr adip - bikharit gulapasa

natak

  • baboolal madhukar - nayaka bhor
  • harinandan kisalay - appan ganv
  • babooram sinh ""lamagoda - gandhari ke sarap
  • babooram sinh ""lamagoda - bujjhal diya k matti
  • alakhadev prasad achal - badalav
  • abhimanyu prasad maury - prem aisan hovad he
  • satyendr prasad sinh - ancharava ke laj
  • keshav prasad varma - kanahiya k darad
  • ranandan - kaumudi mahotsav
  • ramanaresh mistr ""hns - sujata
  • raghuvir prasad samadarshi - bhasmasur
  • gopal ravat pipasa - adhi rat ke bad

ekanki sngrah

  • chhotoo narayan sharma - magahi ke doo phool
  • keshav prasad varma - sona ke sita

upanyas

  • jayanath pati - sunita
  • jayanath pati - phoolabahadur
  • jayanath pati - gadahanit
  • rajendr prasad chaudhey - bisesara
  • ram nandan - adami au devata
  • shrikant shasri - godana
  • chakradhar sharma - hay re u din
  • chakradhar sharma - sakaly
  • baboolal madhukar - ramaratiya
  • dvarika prasad - monabhinya
  • upama datt - piyakkad
  • ramaprasad sinh - narak-sarag-dharati
  • ramavilas rajakan - dhoomail dhoti
  1. bharat ki bhasha ka sarvekshan, khand 5 bhag 2, pri. 123