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==कला का अद्वितीय मन्दिर==     
 
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कोणार्क [[उड़ीसा]] की प्राचीन वास्तुशैली का विशिष्ट मन्दिर है, जिसमें मन्दिर में मुख्य मन्दिर, महामण्डप, रंगशाला व सटा भोगमण्डप होते थे। इनमें से ज़्यादातर में जगमोहन व मुख्य मन्दिर एक साथ जुड़े होते थे। कोणार्क मन्दिर में थोड़ी भिन्नता है। यहाँ पर जगमोहन व मुख्यमन्दिर सटे थे। पूर्व में स्थित प्रवेश द्वार के बाद नाट्यमण्डप हैं। द्वार पर दोनों ओर दो विशालकाय सिंह एक [[हाथी]] को दबोचे हैं। नाट्यमण्डप पर स्तम्भों को तराश कर विभिन्न आकृतियों से सज्जित किया गया है। मन्दिर का भोगोंडप मन्दिर से पृथक निर्मित है। मुख्य सूर्य मन्दिर में महामण्डप व मुख्य मन्दिर जुड़े थे, जबकि भोगमण्डप रथ से पृथक था। मन्दिर को रथ का स्वरूप देने के लिए मन्दिर के आधार पर दोनों ओर एक जैसे पत्थर के 24 पहिए बनाए गए। पहियों को खींचने के लिए 7 घोड़े बनाए गए। इन पहियों का व्यास तीन मीटर है। मन्दिर के डिजायन व अंकरण में उस समय के सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश का ध्यान रखा गया। आधार की बाहरी दीवार पर लगे पत्थरों पर विभिन्न आकृतियों को इस प्रकार से उकेरा गया कि वे जीवन्त लगें। इनमें कुछ स्थानों पर [[खजुराहो]] की तरह कामातुर आकृतियाँ तो कहीं पर नारी सौंदर्य, महिला व पुरुष वादकों व नर्तकियों की विभिन्न भाव-भंगिमाओं को उकेरा गया। इसके अलावा इसमें मानव, पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं के साथ पुष्पीय व ज्यामितीय अंकरण हैं। मन्दिर का महामण्डप चबूतरे सहित कुल 39 मीटर है। इसकी विशालता से मुख्य मन्दिर की ऊँचाई का अनुमान लगाया जा सकता है, जो सम्भवतया [[लिंगराज मन्दिर|लिंगराज]] व [[पुरी]] से भव्य रहा होगा। पुरातत्ववेत्ता महामण्डप के पीछे इस रेखा मन्दिर या उर्ध्व मन्दिर की ऊँचाई 65 मीटर तक मानते हैं। इस भग्न मन्दिर के एक ओर साढ़े तीन मीटर ऊँची सूर्यदेव की मूर्ति बेहद आकर्षक हैं। इस मन्दिर की मूर्तियाँ लेहराइट, क्लोराइट और खोण्डोलाइट नाम के पत्थरों से बनाई गई हैं। कोर्णाक में ये पत्थर नहीं पाए जाते, इसलिए यह अनुमान लगाया जाता है कि नरसिंह देव ने इसे बाहर से मंगवाया होगा। इस मन्दिर के तीन हिस्से हैं -   
 
कोणार्क [[उड़ीसा]] की प्राचीन वास्तुशैली का विशिष्ट मन्दिर है, जिसमें मन्दिर में मुख्य मन्दिर, महामण्डप, रंगशाला व सटा भोगमण्डप होते थे। इनमें से ज़्यादातर में जगमोहन व मुख्य मन्दिर एक साथ जुड़े होते थे। कोणार्क मन्दिर में थोड़ी भिन्नता है। यहाँ पर जगमोहन व मुख्यमन्दिर सटे थे। पूर्व में स्थित प्रवेश द्वार के बाद नाट्यमण्डप हैं। द्वार पर दोनों ओर दो विशालकाय सिंह एक [[हाथी]] को दबोचे हैं। नाट्यमण्डप पर स्तम्भों को तराश कर विभिन्न आकृतियों से सज्जित किया गया है। मन्दिर का भोगोंडप मन्दिर से पृथक निर्मित है। मुख्य सूर्य मन्दिर में महामण्डप व मुख्य मन्दिर जुड़े थे, जबकि भोगमण्डप रथ से पृथक था। मन्दिर को रथ का स्वरूप देने के लिए मन्दिर के आधार पर दोनों ओर एक जैसे पत्थर के 24 पहिए बनाए गए। पहियों को खींचने के लिए 7 घोड़े बनाए गए। इन पहियों का व्यास तीन मीटर है। मन्दिर के डिजायन व अंकरण में उस समय के सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश का ध्यान रखा गया। आधार की बाहरी दीवार पर लगे पत्थरों पर विभिन्न आकृतियों को इस प्रकार से उकेरा गया कि वे जीवन्त लगें। इनमें कुछ स्थानों पर [[खजुराहो]] की तरह कामातुर आकृतियाँ तो कहीं पर नारी सौंदर्य, महिला व पुरुष वादकों व नर्तकियों की विभिन्न भाव-भंगिमाओं को उकेरा गया। इसके अलावा इसमें मानव, पेड़-पौधों, जीव-जन्तुओं के साथ पुष्पीय व ज्यामितीय अंकरण हैं। मन्दिर का महामण्डप चबूतरे सहित कुल 39 मीटर है। इसकी विशालता से मुख्य मन्दिर की ऊँचाई का अनुमान लगाया जा सकता है, जो सम्भवतया [[लिंगराज मन्दिर|लिंगराज]] व [[पुरी]] से भव्य रहा होगा। पुरातत्ववेत्ता महामण्डप के पीछे इस रेखा मन्दिर या उर्ध्व मन्दिर की ऊँचाई 65 मीटर तक मानते हैं। इस भग्न मन्दिर के एक ओर साढ़े तीन मीटर ऊँची सूर्यदेव की मूर्ति बेहद आकर्षक हैं। इस मन्दिर की मूर्तियाँ लेहराइट, क्लोराइट और खोण्डोलाइट नाम के पत्थरों से बनाई गई हैं। कोर्णाक में ये पत्थर नहीं पाए जाते, इसलिए यह अनुमान लगाया जाता है कि नरसिंह देव ने इसे बाहर से मंगवाया होगा। इस मन्दिर के तीन हिस्से हैं -   
 
#नृत्यमन्दिर,  
 
#नृत्यमन्दिर,  
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==मान्यताएँ==
 
==मान्यताएँ==
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[[चित्र:Sun-Temple-Konark-3.jpg|सूर्य मंदिर, [[कोणार्क]]|thumb|right|250px]]
 
<blockquote>कोणार्क के आध्यात्मिक महत्त्व, वर्तमान मन्दिर की स्थापना, इसके परित्याग करने से लेकर, मुख्य मन्दिर के ध्वस्त होने के बारे में अनेकानेक मान्यताएँ, अनुश्रुतियाँ हैं। मन्दिर के सम्बन्ध में कई बातें अब भी इतिहास के गर्भ में हैं। इसलिए कई बातों से विद्वतजन एकमत नहीं हैं। [[स्कन्दपुराण]] में कोणार्क की पहचान में सूर्यक्षेत्र, [[ब्रह्म पुराण]] में कोणादित्य, कपि संहिता में रवि क्षेत्र, भाम्बपुराण में मित्रवन व प्राचीन महात्यम में अर्कतीर्थ आदि नामों से की गई है। वहीं निकट में एक सूर्य मन्दिर था। [[पुराण|पुराणों]] में वर्णित मित्रवन व चन्द्रभागा की पहचान के बारे में अलग-अलग तर्क हैं। कुछ लोग इसे [[पाकिस्तान]] के [[मुल्तान]] में बताते हैं, जिसका प्राचीन नाम भाम्बापुरा था और यहीं से [[चिनाब नदी|चिनाब]] या [[चन्द्रभागा नदी|चन्द्रभागा]] गुज़रती है। उधर कोणार्क में भाम्बापुरा तो नहीं है किन्तु मन्दिर से 2 किलोमीटर दूर चन्द्रभागा का तट है, जहाँ पर माघ माह की सप्तमी को विशाल मेला लगता है।  
 
<blockquote>कोणार्क के आध्यात्मिक महत्त्व, वर्तमान मन्दिर की स्थापना, इसके परित्याग करने से लेकर, मुख्य मन्दिर के ध्वस्त होने के बारे में अनेकानेक मान्यताएँ, अनुश्रुतियाँ हैं। मन्दिर के सम्बन्ध में कई बातें अब भी इतिहास के गर्भ में हैं। इसलिए कई बातों से विद्वतजन एकमत नहीं हैं। [[स्कन्दपुराण]] में कोणार्क की पहचान में सूर्यक्षेत्र, [[ब्रह्म पुराण]] में कोणादित्य, कपि संहिता में रवि क्षेत्र, भाम्बपुराण में मित्रवन व प्राचीन महात्यम में अर्कतीर्थ आदि नामों से की गई है। वहीं निकट में एक सूर्य मन्दिर था। [[पुराण|पुराणों]] में वर्णित मित्रवन व चन्द्रभागा की पहचान के बारे में अलग-अलग तर्क हैं। कुछ लोग इसे [[पाकिस्तान]] के [[मुल्तान]] में बताते हैं, जिसका प्राचीन नाम भाम्बापुरा था और यहीं से [[चिनाब नदी|चिनाब]] या [[चन्द्रभागा नदी|चन्द्रभागा]] गुज़रती है। उधर कोणार्क में भाम्बापुरा तो नहीं है किन्तु मन्दिर से 2 किलोमीटर दूर चन्द्रभागा का तट है, जहाँ पर माघ माह की सप्तमी को विशाल मेला लगता है।  
 
गंग नरेश नरसिंहदेव ने सूर्य मन्दिर का ही निर्माण क्यों करवाया, इसे लेकर अनेक मान्यताएँ हैं।</blockquote>
 
गंग नरेश नरसिंहदेव ने सूर्य मन्दिर का ही निर्माण क्यों करवाया, इसे लेकर अनेक मान्यताएँ हैं।</blockquote>
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==बारह महीने के प्रतीक चक्र==
 
==बारह महीने के प्रतीक चक्र==
 
दीवार पर मन्दिर के बाहर बने विशालकाय चक्र पर्यटकों का ध्यान खींच लेते हैं। हर चक्र का व्यास तीन मीटर से ज़्यादा है। चक्रों के नीचे हाथियों के समूह को बेहद बारीकी से उकेरा गया है। सूर्य देवता के रथ के चबूतरे पर बारह जोड़ी चक्र हैं, जो साल के बारह महीने के प्रतीक हैं।
 
दीवार पर मन्दिर के बाहर बने विशालकाय चक्र पर्यटकों का ध्यान खींच लेते हैं। हर चक्र का व्यास तीन मीटर से ज़्यादा है। चक्रों के नीचे हाथियों के समूह को बेहद बारीकी से उकेरा गया है। सूर्य देवता के रथ के चबूतरे पर बारह जोड़ी चक्र हैं, जो साल के बारह महीने के प्रतीक हैं।
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[[चित्र:Sun-Temple-Konark-4.jpg|सूर्य मंदिर, [[कोणार्क]]|thumb|left|250px]]
 
==खोज व संरक्षण==
 
==खोज व संरक्षण==
 
'''1806 में जब इसका पता चला''' तो उस समय यह स्थान चारों ओर पेड़ों व झाड़ियों से घिरा व रेत से ढका था। 1838 में [[एशियाटिक सोसाइटी]] ने पहली बार इसके संरक्षण की बात उठाई। यहाँ से जंगल, झाड़ियों व रेत को हटाया गया। एक बात अच्छी रही कि दबे होने से मन्दिर आतताइयों से सुरक्षित रहा। उस समय मन्दिर का जगमोहन सुरक्षित था, जबकि मुख्य मन्दिर का पिछला हिस्सा ध्वस्त अवस्था में था और चारों ओर खण्डित मन्दिर के पत्थरों की बहुलता थी। 1900 में यहाँ पर वास्तविक संरक्षण करने का प्रयास हुआ। खण्डित हिस्सों को पुरानी संरचना के अनुसार संरक्षित करने का प्रयास किया गया। महामण्डप जो कि गिरने की हालत में था, को बचाने के लिए दरारों को पाटा गया। इसके लिए महामण्डप के आन्तरिक भाग को पत्थरों से भर दिया गया। शेष दोनों ओर के दरवाज़े भी चिनाई करके बन्द कर दिये गये। इस पर लगे पत्थरों का रासायनिक उपचार करके मन्दिर के स्वरूप को निखारा गया। संरक्षण का काम कई सालों तक चला। 20वीं सदी के मध्य में इसे '''भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण''' के अधीन कर दिया गया। अन्य सामग्री को लेकर निकट एक संग्रहालय बनाया गया। 1984 के बाद इसे [[विश्व विरासत स्थल]] घोषित किया गया।
 
'''1806 में जब इसका पता चला''' तो उस समय यह स्थान चारों ओर पेड़ों व झाड़ियों से घिरा व रेत से ढका था। 1838 में [[एशियाटिक सोसाइटी]] ने पहली बार इसके संरक्षण की बात उठाई। यहाँ से जंगल, झाड़ियों व रेत को हटाया गया। एक बात अच्छी रही कि दबे होने से मन्दिर आतताइयों से सुरक्षित रहा। उस समय मन्दिर का जगमोहन सुरक्षित था, जबकि मुख्य मन्दिर का पिछला हिस्सा ध्वस्त अवस्था में था और चारों ओर खण्डित मन्दिर के पत्थरों की बहुलता थी। 1900 में यहाँ पर वास्तविक संरक्षण करने का प्रयास हुआ। खण्डित हिस्सों को पुरानी संरचना के अनुसार संरक्षित करने का प्रयास किया गया। महामण्डप जो कि गिरने की हालत में था, को बचाने के लिए दरारों को पाटा गया। इसके लिए महामण्डप के आन्तरिक भाग को पत्थरों से भर दिया गया। शेष दोनों ओर के दरवाज़े भी चिनाई करके बन्द कर दिये गये। इस पर लगे पत्थरों का रासायनिक उपचार करके मन्दिर के स्वरूप को निखारा गया। संरक्षण का काम कई सालों तक चला। 20वीं सदी के मध्य में इसे '''भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण''' के अधीन कर दिया गया। अन्य सामग्री को लेकर निकट एक संग्रहालय बनाया गया। 1984 के बाद इसे [[विश्व विरासत स्थल]] घोषित किया गया।
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==वीथिका==
 
==वीथिका==
 
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चित्र:Sun-Temple-Konark-3.jpg|सूर्य मंदिर, [[कोणार्क]]
 
चित्र:Sun-Temple-Konark-4.jpg|सूर्य मंदिर, [[कोणार्क]]
 
 
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चित्र:Sun-Temple-Konark-6.jpg|सूर्य मंदिर, [[कोणार्क]]

17:15, 4 सितम्बर 2011 का अवतरण

Disamb2.jpg soory ek bahuvikalpi shabd hai any arthon ke lie dekhen:- soory (bahuvikalpi)
soory mndir, konark
Sun Temple, Konark

soory mndir bharat ke udisa rajy ke puri zile ke puri namak shahar men sthit hai.yah mndir apane nirman ke 750 sal bad bhi apani advitiyata, vishalata v kalatmak bhavyata se har kisi ko niruttar kar deta hai. konark soory mndir ke lie prasiddh hai. vastav men jise ham konark ke soory mandir ke roop men pahachanate hain, vah parshv men bane us soory mandir ka jagamohan ya mahamandap hai, jo ki bahut pahale dhvast ho chuka hai. puravid v vastukar mandir ki snrachana, moortishilp v pattharon par ukeri akritiyon ko vaigyanik, takaniki v tarkik kasauti par kasane ke bad tathyon ko duniya ke samane rakhate rahe hain aur yah kram jari hai. baharahal is mahamandap ya jagamohan ki viratata v bhagn ho chuke mukhy mandir ke adhar par utkirn sajja se hi ise yoonesko ke vishv virasat sthal ki pahachan mili hai. bharat se hi nahin balki duniya bhar se lakhon paryatak isako dekhane konark ate hain. konark men bani is bhavy kriti ko mahaj dekhakar samajhana kathin hai ki yah kaise bani hogi. ise dekhane ka anand tabhi hai jab isake itihas ki prishthabhoomi men jakar ise dekha jae.

vastu rachana

sthan chayan se lekar mandir nirman samagri ki vyavastha aur moortiyon ke nirman ke lie badi yojana ko roop diya gaya. choonki us kal men nirman vastushastr ke adhar par hi hota tha, isalie mandir nirman men bhoomi se lekar sthan v din chayan men nirdharit niyamon ka palan kiya gaya. isake nirman men 1200 kushal shilpiyon ne 12 sal tak lagatar kam kiya. shilpiyon ko nirdesh the ki ek bar nirman arambh hone par ve anyatr n ja sakenge. nirman sthal men nirman yogy pattharon ka abhav tha. isalie sambhavataya nirman samagri nadi marg se yahan par laee gee. ise mandir ke nikat hi tarasha gaya. pattharon ko sthirata pradan karane ke lie jngarahit lohe ke qabzon ka prayog kiya gaya. isamen pattharon ko is prakar se tarasha gaya ki ve is prakar se baithen ki jodon ka pata n chale.

sooryamandir bharat ka ikalauta soory mandir hai jo poori duniya men apani bhavyata aur banavat ke lie jana jata hai. soory mandir udisa ki rajadhani bhuvaneshvar se 65 kilomitar door konark men apane samay ki utkrisht vastu rachana hai. poorvi gng vnsh ke raja narasinh dev pratham ne soory mandir ko terahavin shatabdi men banavaya tha. prachin udiya sthapaty kala ka yah mandir bejod udaharan hai. soory mandir ki rachana is tarah se ki gee hai ki yah sabhi ko akarshit karati hai. soory ko oorja, jivan aur gyan ka pratik mana jata hai. soory devata ki sabhi snskritiyon men pooja ki jati rahi hai. soory ki is mandir men manaviy akar men moorti hai jo any kahin nahin hai.

is mndir ko dekhakar aisa pratit hota hai ki apane sat ghode vale rath par virajaman soory dev abhi-abhi kahin prasthan karane vale hain. yah moorti soory mandir ki sabase bhavy mootiyon men se ek hai. soory ki char patniyan rajani, nikshubha, chhaya aur suvarchasa moorti ke donon taraph hain. soory ki moorti ke charanon ke pas hi rath ka sarathi arun bhi upasthit hai.

Blockquote-open.gif isake nirman men 1200 kushal shilpiyon ne 12 sal tak lagatar kam kiya. shilpiyon ko nirdesh the ki ek bar nirman arambh hone par ve anyatr n ja sakenge. nirman sthal men nirman yogy pattharon ka abhav tha. isalie sambhavataya nirman samagri nadi marg se yahan par laee gee. ise mandir ke nikat hi tarasha gaya. pattharon ko sthirata pradan karane ke lie jngarahit lohe ke qabzon ka prayog kiya gaya. isamen pattharon ko is prakar se tarasha gaya ki ve is prakar se baithen ki jodon ka pata n chale. Blockquote-close.gif


nirman sambandhi anushrutiyan

mukhy mandir ki snrachana ko lekar anek kahaniyan prachalit hain. kaha jata hai ki jahan par mukhy mandir tha, usake garbhagrih men sooryadev ki moorti oopar v niche chumbakiy prabhav ke karan hava men dolit hoti thi. prat: soory ki kiranen rngashala se hote hue vartaman men maujood jagamohan se hote hue kuchh der ke lie garbhagrih men sthit moorti par padati thin. samudr ka tat us samay mandir ke samip hi tha, jahan badi naukaon ka avagaman hota rahata tha. aksar chumbakiy prabhav ke karan naukaon ke disha mapak yantr disha ka gyan nahin kara pate the. isalie in chumbakon ko hata diya gaya aur mandir asthir hone se dhvast ho gaya. isaki khyati uttar men jab mugalon tak pahunchi to unhonne ise nasht karane men koee kasar nahin chhodi. 16vin sadi ke madhy men mugal akramanakari kalapahad ne isake amalak ko nuqasan pahunchaya v kee moortiyon ko khandit kiya, jisake karan mandir ka parityag kar diya gaya. isase huee upeksha ke karan isaka ksharan hone laga. kuchh vidvan mukhy mandir ke tootane ka karan isaki vishalata v dijain men dosh ko batate hain. jo retili bhoomi men banane ke karan dhnsane laga tha, lekin is bare men ek ray nahin hai. kuchh ka yah manana hai ki yah mandir kabhi poorn nahin hua, jabaki aeene akabari men abul fazal ne is mandir ka bhraman karake isaki kirti ka varnan kiya hai. kuchh vidvanon ka mat hai ki kafi samay tak yah mandir apane mool svaroop men hi tha. british puravid fargyusan ne jab 1837 men isaka bhraman kiya tha, to us samay mukhy mandir ka ek kona bacha hua tha, jisaki oonchaee us samay 45 mitar bataee gee. kuchh vidvan mukhy mandir ke khandit hone ka karan prakriti ki mar yatha bhookamp v samudri toofan adi ko manate hain. lekin is kshetr men bhookamp ke bad bhi nikatavarti mandir kaise bache rah ge, yah vicharaniy hai. girane ka any karan isamen kam gunavatta ka patthar prayog hona bhi hai, jo kal ke thapedon v isake bhar ko n sah saka. kintu ek sarvasvikary tathy ke anusar samudr se khare pani ki vashp yukt hava ke lagatar thapedon se mandir men lage pattharon ka ksharan hota chala gaya aur mukhy mandir dhvast ho gaya. yah prabhav sarvatr dikhaee deta hai.

kala ka advitiy mandir

soory mndir, konark
Sun Temple, Konark

konark udisa ki prachin vastushaili ka vishisht mandir hai, jisamen mandir men mukhy mandir, mahamandap, rngashala v sata bhogamandap hote the. inamen se zyadatar men jagamohan v mukhy mandir ek sath jude hote the. konark mandir men thodi bhinnata hai. yahan par jagamohan v mukhyamandir sate the. poorv men sthit pravesh dvar ke bad natyamandap hain. dvar par donon or do vishalakay sinh ek hathi ko daboche hain. natyamandap par stambhon ko tarash kar vibhinn akritiyon se sajjit kiya gaya hai. mandir ka bhogondap mandir se prithak nirmit hai. mukhy soory mandir men mahamandap v mukhy mandir jude the, jabaki bhogamandap rath se prithak tha. mandir ko rath ka svaroop dene ke lie mandir ke adhar par donon or ek jaise patthar ke 24 pahie banae ge. pahiyon ko khinchane ke lie 7 ghode banae ge. in pahiyon ka vyas tin mitar hai. mandir ke dijayan v ankaran men us samay ke samajik v sanskritik parivesh ka dhyan rakha gaya. adhar ki bahari divar par lage pattharon par vibhinn akritiyon ko is prakar se ukera gaya ki ve jivant lagen. inamen kuchh sthanon par khajuraho ki tarah kamatur akritiyan to kahin par nari saundary, mahila v purush vadakon v nartakiyon ki vibhinn bhav-bhngimaon ko ukera gaya. isake alava isamen manav, ped-paudhon, jiv-jantuon ke sath pushpiy v jyamitiy ankaran hain. mandir ka mahamandap chabootare sahit kul 39 mitar hai. isaki vishalata se mukhy mandir ki oonchaee ka anuman lagaya ja sakata hai, jo sambhavataya lingaraj v puri se bhavy raha hoga. puratatvavetta mahamandap ke pichhe is rekha mandir ya urdhv mandir ki oonchaee 65 mitar tak manate hain. is bhagn mandir ke ek or sadhe tin mitar oonchi sooryadev ki moorti behad akarshak hain. is mandir ki moortiyan leharait, klorait aur khondolait nam ke pattharon se banaee gee hain. kornak men ye patthar nahin pae jate, isalie yah anuman lagaya jata hai ki narasinh dev ne ise bahar se mngavaya hoga. is mandir ke tin hisse hain -

  1. nrityamandir,
  2. jagamohan mandir
  3. garbhagrih.

mandir ka mahamandap behad akarshak hai, jisaka shirsh piramid ke akar ka hai. isamen vibhinn staron par soory, chandr, mngal, budh, shani adi nakshatron ki pratimaen hain. isake oopar vishal amalak hai. samip hi soory ki patni mayadevi v vaishnav mandir khandit avastha men hai. samip men bhogamandap tha. ek navagrah mandir bhi yahan par hai.

manyataen

soory mndir, konark
konark ke adhyatmik mahattv, vartaman mandir ki sthapana, isake parityag karane se lekar, mukhy mandir ke dhvast hone ke bare men anekanek manyataen, anushrutiyan hain. mandir ke sambandh men kee baten ab bhi itihas ke garbh men hain. isalie kee baton se vidvatajan ekamat nahin hain. skandapuran men konark ki pahachan men sooryakshetr, brahm puran men konadity, kapi snhita men ravi kshetr, bhambapuran men mitravan v prachin mahatyam men arkatirth adi namon se ki gee hai. vahin nikat men ek soory mandir tha. puranon men varnit mitravan v chandrabhaga ki pahachan ke bare men alag-alag tark hain. kuchh log ise pakistan ke multan men batate hain, jisaka prachin nam bhambapura tha aur yahin se chinab ya chandrabhaga guzarati hai. udhar konark men bhambapura to nahin hai kintu mandir se 2 kilomitar door chandrabhaga ka tat hai, jahan par magh mah ki saptami ko vishal mela lagata hai. gng naresh narasinhadev ne soory mandir ka hi nirman kyon karavaya, ise lekar anek manyataen hain.

barah mahine ke pratik chakr

divar par mandir ke bahar bane vishalakay chakr paryatakon ka dhyan khinch lete hain. har chakr ka vyas tin mitar se zyada hai. chakron ke niche hathiyon ke samooh ko behad bariki se ukera gaya hai. soory devata ke rath ke chabootare par barah jodi chakr hain, jo sal ke barah mahine ke pratik hain.

soory mndir, konark

khoj v snrakshan

1806 men jab isaka pata chala to us samay yah sthan charon or pedon v jhadiyon se ghira v ret se dhaka tha. 1838 men eshiyatik sosaiti ne pahali bar isake snrakshan ki bat uthaee. yahan se jngal, jhadiyon v ret ko hataya gaya. ek bat achchhi rahi ki dabe hone se mandir atataiyon se surakshit raha. us samay mandir ka jagamohan surakshit tha, jabaki mukhy mandir ka pichhala hissa dhvast avastha men tha aur charon or khandit mandir ke pattharon ki bahulata thi. 1900 men yahan par vastavik snrakshan karane ka prayas hua. khandit hisson ko purani snrachana ke anusar snrakshit karane ka prayas kiya gaya. mahamandap jo ki girane ki halat men tha, ko bachane ke lie dararon ko pata gaya. isake lie mahamandap ke antarik bhag ko pattharon se bhar diya gaya. shesh donon or ke daravaze bhi chinaee karake band kar diye gaye. is par lage pattharon ka rasayanik upachar karake mandir ke svaroop ko nikhara gaya. snrakshan ka kam kee salon tak chala. 20vin sadi ke madhy men ise bharatiy puratattv sarvekshan ke adhin kar diya gaya. any samagri ko lekar nikat ek sngrahalay banaya gaya. 1984 ke bad ise vishv virasat sthal ghoshit kiya gaya.

pauranik bharat ke alag-alag pranton men dharmik utsavon ke dauran shobhayatra men dev moortiyon ko lakadi ke bane rath par saza kar shraddhaluon ke bich men le jaya jata tha. isilie yah mana jata hai ki soory ke is mandir ko rath ka roop de diya gaya hoga.[1]


panne ki pragati avastha
adhar
prarambhik
madhyamik
poornata
shodh

vithika


tika tippani aur sndarbh

  1. soory ke divy rath ka pratik hai kornak sooryamandir (hindi) adhi abadi daaut kaaum. abhigaman tithi: 15 sitnbar, 2010.

snbndhit lekh