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{{पुनरीक्षण}}[[हल्दीघाटी]] का युद्ध [[अकबर]] और [[महाराणा प्रताप]] के बीच हुआ। [[अकबर]] ने सन 1624 में मेवाड़ पर आक्रमण कर [[चित्तौड़]] को घेर लिया, पर [[राणा उदयसिंह]] ने उसकी अधीनता स्वीकार नहीं की थी और प्राचीन आधाटपुर के पास [[उदयपुर]] नामक अपनी राजधानी बसाकर वहाँ चला गया था। उनके बाद [[महाराणा प्रताप]] ने भी युद्ध जारी रखा और अधीनता नहीं मानी थी। उनका हल्दीघाटी का युद्ध इतिहास प्रसिद्ध है। इस युद्ध के बाद प्रताप की युद्ध-नीति छापामार लड़ाई की रही थी। अकबर ने कुम्भलमेर दुर्ग से भी प्रताप को खदेड़ दिया तथा मेवाड़ पर अनेक आक्रमण करवाये थे पर प्रताप ने अधीनता स्वीकार नहीं की थी। अंत में सन 1642 के बाद अकबर का ध्यान दूसरे कामों में लगे रहने के कारण प्रताप ने अपने स्थानों पर फिर अधिकार कर लिया था। सन 1654 में चावंड में उनकी मृत्यु हो गई थी।  
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{{पुनरीक्षण}}[[हल्दीघाटी]] का युद्ध [[अकबर]] और [[महाराणा प्रताप]] के बीच हुआ। [[अकबर]] ने सन 1624 में मेवाड़ पर आक्रमण कर [[चित्तौड़]] को घेर लिया पर [[राणा उदयसिंह]] ने उसकी अधीनता स्वीकार नहीं की थी और प्राचीन आधाटपुर के पास [[उदयपुर]] नामक अपनी राजधानी बसाकर वहाँ चला गया था। उनके बाद [[महाराणा प्रताप]] ने भी युद्ध जारी रखा और अधीनता नहीं मानी थी। उनका हल्दीघाटी का युद्ध इतिहास प्रसिद्ध है। इस युद्ध के बाद प्रताप की युद्ध-नीति छापामार लड़ाई की रही थी। अकबर ने कुम्भलमेर दुर्ग से भी प्रताप को खदेड़ दिया तथा मेवाड़ पर अनेक आक्रमण करवाये थे पर प्रताप ने अधीनता स्वीकार नहीं की थी। अंत में सन 1642 के बाद अकबर का ध्यान दूसरे कामों में लगे रहने के कारण प्रताप ने अपने स्थानों पर फिर अधिकार कर लिया था। सन 1654 में चावंड में उनकी मृत्यु हो गई थी।  
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==युद्ध की समाप्ति==
 
==युद्ध की समाप्ति==
 
युद्ध राणा प्रताप के पक्ष में निर्णायक न हो सका। खुला युद्ध समाप्त हो गया था किंतु संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था। भविष्य में संघर्षो को अंजाम देने के लिए, प्रताप एवं उसकी सेना युद्धस्थल से हटकर पहाड़ी प्रदेश में आ गयी थी। [[अकबर]] की अधीनता स्वीकार न किए जाने के कारण प्रताप के साहस एवं शौर्य की गाथाएँ तब तक गुंजित रहेंगी जब तक युद्धों का वर्णन किया जाता रहेगा। युद्ध के दौरान प्रताप का स्वामिभक्त घोड़ा चेतक घायल हो गया था। फिर भी, उसने अपने स्वामी की रक्षा की। अंत में चेतक वीरगति को प्राप्त हुआ। युद्धस्थली के समीप ही चेतक की स्मृति में स्मारक बना हुआ है। अब यहाँ पर एक संग्रहालय है। इस संग्रहालय में हल्‍दीघाटी के युद्ध के मैदान का एक मॉडल रखा गया है। इसके अलावा यहाँ महाराणा प्रताप से संबंधित वस्‍तुओं को रखा गया है।  
 
युद्ध राणा प्रताप के पक्ष में निर्णायक न हो सका। खुला युद्ध समाप्त हो गया था किंतु संघर्ष समाप्त नहीं हुआ था। भविष्य में संघर्षो को अंजाम देने के लिए, प्रताप एवं उसकी सेना युद्धस्थल से हटकर पहाड़ी प्रदेश में आ गयी थी। [[अकबर]] की अधीनता स्वीकार न किए जाने के कारण प्रताप के साहस एवं शौर्य की गाथाएँ तब तक गुंजित रहेंगी जब तक युद्धों का वर्णन किया जाता रहेगा। युद्ध के दौरान प्रताप का स्वामिभक्त घोड़ा चेतक घायल हो गया था। फिर भी, उसने अपने स्वामी की रक्षा की। अंत में चेतक वीरगति को प्राप्त हुआ। युद्धस्थली के समीप ही चेतक की स्मृति में स्मारक बना हुआ है। अब यहाँ पर एक संग्रहालय है। इस संग्रहालय में हल्‍दीघाटी के युद्ध के मैदान का एक मॉडल रखा गया है। इसके अलावा यहाँ महाराणा प्रताप से संबंधित वस्‍तुओं को रखा गया है।  

16:38, 5 अक्टूबर 2011 का अवतरण

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haldighati ka yuddh akabar aur maharana pratap ke bich hua. akabar ne san 1624 men mevad par akraman kar chittaud ko gher liya par rana udayasinh ne usaki adhinata svikar nahin ki thi aur prachin adhatapur ke pas udayapur namak apani rajadhani basakar vahan chala gaya tha. unake bad maharana pratap ne bhi yuddh jari rakha aur adhinata nahin mani thi. unaka haldighati ka yuddh itihas prasiddh hai. is yuddh ke bad pratap ki yuddh-niti chhapamar ladaee ki rahi thi. akabar ne kumbhalamer durg se bhi pratap ko khaded diya tatha mevad par anek akraman karavaye the par pratap ne adhinata svikar nahin ki thi. ant men san 1642 ke bad akabar ka dhyan doosare kamon men lage rahane ke karan pratap ne apane sthanon par phir adhikar kar liya tha. san 1654 men chavnd men unaki mrityu ho gee thi.

yuddh ki samapti

yuddh rana pratap ke paksh men nirnayak n ho saka. khula yuddh samapt ho gaya tha kintu sngharsh samapt nahin hua tha. bhavishy men sngharsho ko anjam dene ke lie, pratap evn usaki sena yuddhasthal se hatakar pahadi pradesh men a gayi thi. akabar ki adhinata svikar n kie jane ke karan pratap ke sahas evn shaury ki gathaen tab tak gunjit rahengi jab tak yuddhon ka varnan kiya jata rahega. yuddh ke dauran pratap ka svamibhakt ghoda chetak ghayal ho gaya tha. phir bhi, usane apane svami ki raksha ki. ant men chetak viragati ko prapt hua. yuddhasthali ke samip hi chetak ki smriti men smarak bana hua hai. ab yahan par ek sngrahalay hai. is sngrahalay men halh‍dighati ke yuddh ke maidan ka ek maaudal rakha gaya hai. isake alava yahan maharana pratap se snbndhit vash‍tuon ko rakha gaya hai.


panne ki pragati avastha
adhar
prarambhik
madhyamik
poornata
shodh

tika tippani aur sndarbh


bahari kadiyan

snbndhit lekh