एथेंस का सत्यार्थी -रश्मि प्रभा: Difference between revisions

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चित्र:Icon-edit.gif यह लेख स्वतंत्र लेखन श्रेणी का लेख है। इस लेख में प्रयुक्त सामग्री, जैसे कि तथ्य, आँकड़े, विचार, चित्र आदि का, संपूर्ण उत्तरदायित्व इस लेख के लेखक/लेखकों का है भारतकोश का नहीं।
संक्षिप्त परिचय

150px|रश्मि प्रभा|center

लेखिका रश्मि प्रभा
जन्म 13 फ़रवरी, 1958
जन्मस्थान सीतामढ़ी, बिहार
शिक्षा: स्नातक (इतिहास प्रतिष्ठा)
अभिभावक: श्री रामचंद्र प्रसाद और श्रीमती सरस्वती प्रसाद
ई-मेल [email protected]
फ़ेसबुक रश्मि प्रभा
सम्पर्क: मो.- 9579122103

कोश एक ऐसा संग्रह होता है, जहाँ हमें शब्दों के समूह, ज्ञान के अपरिमित भण्डार, विचारों के सूक्ष्म गह्वर मिलते हैं। बचपन में कई दिलचस्प कहानियाँ होती हैं, जो हमारे अंतर्मन में नीँव का ईंट बनती हैं, और हर दोराहे पर पुकारती हैं। ऐसी ही एक कहानी सुनी थी "एथेंस का सत्यार्थी"

एथेंस का सत्यार्थी उसने जब सत्य को देखा उसकी आँखें चौंधिया गई। जब यह कहानी सुनी तब इसकी गूढ़ता समझ से परे थी,
आखिर सत्य
इतना चमकीला हो सकता है क्या
कि कोई उसे देख न सके
देखना चाहे तो
न चाहते हुए भी
आँखें बंद हो जाएँ।
एथेंस का सत्यार्थी तो अँधा हो गया था … तात्पर्य यह कि सच को देखने का साहस नहीं होता, कहने में तो शब्दों का तोड़-मरोड़ होता ही है तो सब सही रहता है।
पर उम्र के हर पायदान पर इस सत्यार्थी ने एक नया नजरिया दिया।

सच को देख
एथेंस का सत्यार्थी
अंधा हो गया ...
सच की भयानकता से
या उस विपरीत सत्य के साक्षात्कार से
जिसका एक कोमल खाका उसने खींच रखा था !
... आह !
पर एथेंस के सत्यार्थी की इस विडंबना ने
मुझे अपंग और अपाहिज नहीं किया
चेतनाशून्य मनोदशा की हर गहरी ख़ामोशी ने
मुझे केशव का विराट स्वरूप दिखाया
अहोभाग्य !
सत्य के आगे लड़खड़ाते मेरे क़दमों के आगे
कृष्ण ने हर बार मेरी ऊँगली थामी
और दुर्योधन से बचाया !!!

सब कहते हैं, मत जानो किसी का सच क्योंकि सच क्रूर होता है। क्या सच में सच क्रूर होता है ? या झूठ की चकाचौंध में हम उसे दयनीय, निरुपाय बनाकर जर्जर हड्डी का ढांचा बना देते हैं, बंद करके उसे किसी तहखाने में कह देते हैं - "वहाँ भूत रहता है" .
सत्य !!!
एक गहन गंभीर आवरण
जिसे जानना कठिन नहीं पर मानना बिल्कुल ही आसान नहीं, क्योंकि सत्य को स्वीकार करने में अधिकांश व्यक्ति को अपनी हार लगती है और वह स्वयं एक झूठा स्वरूप तैयार करता है और हमारे जीवन में मुहर की तरह लगा देता है फिर कहता है 'स्वीकार करो'....... सत्य के आगे हम उस झूठ को स्वीकार तो नहीं करते पर अपने सत्य का रास्ता अकेले ही तय करते हैं।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

बाहरी कड़ियाँ

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