बृहदारण्यकोपनिषद अध्याय-6 ब्राह्मण-4: Difference between revisions

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यदि पति-पत्नी दोनों सन्तान नहीं चाहते या कुछ काल तक 'गर्भनिरोध' चाहते हैं, तो रति-क्रिया में परस्पर मुख से मुख लगाकर इस मन्त्र का उच्चारण करें-<br />
यदि पति-पत्नी दोनों सन्तान नहीं चाहते या कुछ काल तक 'गर्भनिरोध' चाहते हैं, तो रति-क्रिया में परस्पर मुख से मुख लगाकर इस मन्त्र का उच्चारण करें-<br />
'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे।' इससे कभी गर्भ स्थापित नहीं होगा। रजस्वला स्त्री को तीन दिन तक कांसे के पात्र में खाने का भी निषेध है। अधिक शीत और उष्णता से भी बचना चाहिए। माता को अपनी सन्तान को स्तनपान कराने से भी नहीं बचना चाहिए। यह धर्म-विरुद्ध है और स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है।
'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे।' इससे कभी गर्भ स्थापित नहीं होगा। रजस्वला स्त्री को तीन दिन तक कांसे के पात्र में खाने का भी निषेध है। अधिक शीत और उष्णता से भी बचना चाहिए। माता को अपनी सन्तान को स्तनपान कराने से भी नहीं बचना चाहिए। यह धर्म-विरुद्ध है और स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है।
 
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Revision as of 10:35, 3 August 2014

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  • इस ब्राह्मण में मनोवांछित सन्तान की प्राप्ति के लिए किये गये मन्त्रों का विवेचन है।
  • मन्त्र द्वारा गर्भाधान करना, गर्भनिरोध करना तथा स्त्री प्रसंग को भी यज्ञ-प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया गया है।
  • इसमें कहीं भी अश्लीलता-जैसी कोई बात नहीं है।
  • सृष्टि का सृजन और उसके विकास की प्रक्रियायों को शुद्ध और पवित्र तथा नैसर्गिक माना गया है।
  • पंचभूतों का रस पृथ्वी है, पृथ्वी का रस जल है, जल का रस औषधियां हैं, औषधियों का रस पुष्प हैं, पुष्पों का रस फल हैं, फलों का रस पुरुष है और पुरुष का सारतत्त्व वीर्य है। नारी की योनि यज्ञ वेदी है।
  • जो व्यक्ति प्रजनन की इच्छा से, उसकी समस्त मर्यादाओं को भली प्रकार समझते हुए रति-क्रिया में प्रवृत्त होता है, उसे प्रजनन यज्ञ का पुण्य अवश्य प्राप्त होता है।

भारतीय संस्कृति में इस प्रजनन यज्ञ को सर्वाधिक श्रेष्ठ यज्ञ का स्थान प्राप्त है। यहाँ 'काम' का अमर्यादित आवेग नहीं है। ऐसी अमर्यादित रति-क्रिया करने से पुण्यों को क्षय होना माना गया है। ऐसे लोग सुकृतहीन होकर परलोक से पतित हो जाते हैं। यशस्वी पुत्र-पुत्री के लिए प्रजनन यज्ञ-ऋतु धर्म के उपरान्त यशस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए रति-कर्म करने से पूर्व यह मन्त्र पढ़ें-
'इन्द्रियेण ते यशसा यश आदधामि।'इस मन्त्र का आस्थापूर्वक मनन करने से निश्चय ही यशस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी। यदि पुरुष गौरवर्ण पुत्र की इच्छा रखता हो, तो उसे ऋतु धर्म के उपरान्त सम्भोग तक अपनी पत्नी को घी मिलाकर दूध-चावल की खीर खिलानी चाहिए और स्वयं भी खानी चाहिए। इससे पुत्र गौरवर्ण, विद्वान और दीर्घायु होगा। इसके अलावा दही में चावल पकाकर खाने से व जल में चावल पकाकर व घी में मिलाकर खाने से भी पुत्र-रत्न की ही प्राप्ति होगी। यदि पति-पत्नी विदुषी कन्या की कामना करते हों, तो तिल के चावल की खिचड़ी बनाकर खानी चाहिए।
गर्भ निरोध का उपाय
यदि पति-पत्नी दोनों सन्तान नहीं चाहते या कुछ काल तक 'गर्भनिरोध' चाहते हैं, तो रति-क्रिया में परस्पर मुख से मुख लगाकर इस मन्त्र का उच्चारण करें-
'इन्द्रियेण ते रेतसा रेत आददे।' इससे कभी गर्भ स्थापित नहीं होगा। रजस्वला स्त्री को तीन दिन तक कांसे के पात्र में खाने का भी निषेध है। अधिक शीत और उष्णता से भी बचना चाहिए। माता को अपनी सन्तान को स्तनपान कराने से भी नहीं बचना चाहिए। यह धर्म-विरुद्ध है और स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है।

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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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