अहंकार

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अहंकार मैं की भावना। सांख्य दर्शन में अहंकार पारिभाषिक शब्द है। प्रकृति-पुरुष-संयोग से 'महत्‌' उत्पन्न होता है। महत्‌ से अहंकार की उत्पत्ति है। अहंकार से ही सूक्ष्म स्थूल सृष्टि उत्पन्न होता है तथा इसी में क्रिया होती है, पुरुष में नहीं। अहंकार के कारण पुरुष प्रकृति के कार्यों से तादात्म्य अनुभव करता है। अहंकार ही अनुभवों को पुरुष तक पहुँचाता है। इसके सत्वगुणप्रधान होने पर सत्कर्म होते हैं, रज:प्रधान होने पर पापकर्म होते हैं तथा तम:प्रधान होने पर मोह होता है। सात्विक अहंकार से मन, पंच ज्ञानेंद्रियों तथा पंच कर्मेंद्रियों की उत्पत्ति होती है। तामस अहंकार से पंच तन्मात्राएँ होती हैं। विज्ञानभिक्षु के अनुसार सात्विक अहंकार से मन, राजस से दस इंद्रियाँ तथा पंच तन्मात्राएँ उत्पन्न होती हैं। अहंकार को दर्शनों में पतन का कारण माना गया है क्योंकि प्राय: सभी भारतीय दर्शन अनुभवगम्य आत्मा के रूप को आत्का का वास्तविक स्वरूप नहीं मानते। अत: 'मैं' की भावना से किया गया कार्य आत्मा के मिथ्या ज्ञान से प्रेरित है। पारमार्थिक जगत्‌ में अहंकारमुक्त होना चाहिए किंतु व्यावहारिक जगत्‌ में अहंकार के बिना निर्वाह संभव नहीं है।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 316-17 |

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