अनुचित बचत न मानिए -रहीम
अनुचित बचत न मानिए, जदपि गुरायसु गाढ़ि ।
हैं ‘रहीम’ रघुनाथ ते, सुजस भरत को बाढ़ि ॥
- अर्थ
बड़ों की भी ऐसी आज्ञा नहीं माननी चाहिए, जो अनुचित हो। पिता का वचन मानकर राम वन को चले गए। किन्तु भरत ने बड़ों की आज्ञा नहीं मानी, जबकी उनको राज करने को कहा गया था फिर भी राम के यश से भरत का यश महान् माना जाता है।[1]
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ तुलसीदास जी ने बिल्कुल सही कहा है कि- ‘जग जपु राम, राम जपु जेही’ अर्थात् संसार जहां राम का नाम का जाप करता हैं, वहां राम भरत का नाम सदा जपते रहते हैं।
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