रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग: Difference between revisions

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
Jump to navigation Jump to search
[unchecked revision][unchecked revision]
m (Text replacement - "कब्जा" to "क़ब्ज़ा")
No edit summary
 
Line 95: Line 95:
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==
==टीका टिप्पणी और संदर्भ==
<references/>
<references/>
==बाहरी कड़ियाँ==
==संबंधित लेख==
==संबंधित लेख==


[[Category:भारत सरकार]][[Category:गणराज्य संरचना कोश]]
[[Category:भारत सरकार]]
[[Category:गुप्तचर संस्थाएँ]]
[[Category:गणराज्य संरचना कोश]]
__INDEX__
__INDEX__
__NOTOC__
__NOTOC__

Latest revision as of 11:44, 19 February 2022

रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग
विवरण 'रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग' (अनुसंधान और विश्लेषण स्कंध) भारतीय खुफिया एजेंसी है, जो देश की सुरक्षा से सम्बंधित कई महत्त्वपूर्ण दायित्वों को निभाती है।
संक्षिप्त नाम रॉ (RAW)
देश भारत
स्थापना 21 सितम्बर, 1968
मुख्यालय नई दिल्ली
मातृ संस्था प्रधानमंत्री कार्यालय, भारत सरकार
संस्था कार्यपालक अनिल धस्माना, सचिव
अधीनस्थ संस्थान एविएशन रिसर्च सेंटर, द रेडियो रिसर्च सेंटर, द इलेक्ट्रानिक एंड टेक्नीकल सर्विसेस, नैशनल टेक्नीकल फैसेलिटीज़ ओर्गानिजेशन तथा स्पेशल फ्रंटियर फ़ोर्स।
अन्य जानकारी रॉ का सिद्धांत है- 'धर्मो रक्षति रक्षितः', जिसका मतलब है- "जो शख्स धर्म की रक्षा करता है, वह हमेशा सुरक्षित रहता है।"

रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग (अनुसंधान और विश्लेषण स्कंध) अथवा रॉ (अंग्रेज़ी: Research and Analysis Wing or RAW) भारत की अंतर्राष्ट्रीय गुप्तचर संस्था है, जिसका मुख्यालय दिल्ली में है। इस संस्था का गठन वर्ष 1968 में किया गया था। 'अन्वेषण ब्यूरो'[1] 1962 के भारत-चीन युद्ध1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में अच्छी तरह कार्य नहीं कर पाई थी, जिसके चलते भारत सरकार को एक ऐसी संस्था की ज़रूरत महसूस हुई, जो स्वतन्त्र और सक्षम तरीके से बाहरी जानकारियाँ जमा कर सके। रॉ का मुख्य कार्य जानकारी इकठ्ठा करना, आतंकवाद को रोकना व गुप्त ऑपरेशनों को अंजाम देना है। इसके साथ ही यह विदेशी सरकारों, कंपनियों व इंसानों से मिली जानकारी पर कार्य करती है ताकि भारतीय नीति निर्माताओं को सलाह दी जा सके।

इतिहास

रॉ के गठन से पहले विदेशी जानकारी को जमा करने का काम अन्वेषण ब्यूरो (आईबी) करती थी, जिसे ब्रिटिशों ने बनाया था। 1933 में विश्व में राजनैतिक अनिश्चितता को देखते हुए, जिसके चलते द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत हुई, अन्वेषण ब्यूरो की ज़िम्मेदारियाँ बढ़ा दी गयीं ताकि भारत के सीमावर्ती इलाकों से जानकारी इकठ्ठा की जा सके। 1947 में स्वतंत्रता के बाद संजीवी पिल्लई ने आईबी के प्रथम भारतीय निदेशक के रूप में भूमिका संभाली। ब्रिटिशों के जाने के बाद मनुष्य बल में आई गिरावट के कारण पिल्लई ने ब्यूरो को एमआई-5 का अनुसरण करते हुए चलाने की कोशिश की। 1949 में पिल्लई ने एक छोटे विदेशी जानकारियों के ऑपरेशन को शुरू किया, परन्तु 1962 के भारत-चीन युद्ध में अक्षमता सामने आई। विदेशी जानकारी की भारत-चीन युद्ध के दौरान नाकामयाबी के कारण प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक विदेशी गुप्तचर संस्था के गठन का आदेश दिया।

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद भारतीय थल सेना के सचिव जनरल जयंतानाथ चौधरी ने और अधिक जानकारी इकठ्ठा करने की ज़रूरत बताई। 1962 के अंत में एक अलग स्वतन्त्र विदेशी गुप्तचर संस्था को बनाने की योजना आकार लेने लगी। 1968 में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह निश्चय किया गया कि एक पूर्णत: अलग सुरक्षा संस्था की आवश्यकता है। आर.एन काओ, जो उस वक्त अन्वेषण ब्यूरो के उपनिदेशक थे, ने एक नई संस्था का ढांचा पेश किया। काओ को भारत की पहली अंतर्राष्ट्रीय गुप्तचर संस्था 'रिसर्च और एनालिसिस विंग' का सचिव बनाया गया।

सर्विसेस संस्थाएँ

रॉ में सर्विसेस जैसी संस्थाएं 19701990 में जुड़ गई। 1990 में स्पेशल फ्रंटियर फ़ोर्स रॉ की सशक्त बल बन गई और गोपनीय सैन्य अभियानों में सहकार्य प्रदान करने लगे। 2004 में भारतीय सरकार नैशनल टेक्नीकल फैसिलिटीज़ ऑर्गनैजेशन (राष्ट्रिय तकनिकी सहकार्य संस्था) का गठन किया गया, जिसे माना जाता है कि वह रॉ का ही एक विभाग है, परन्तु अब तक इसकी विचारधारा गुप्त रही है। अब तक इसका कार्य गुप्त रखा गया है; परन्तु यह माना जाता है की इसका कार्य जानकारी व चित्रों पर कई तकनीकों का उपयोग करके ध्यान रखना है।

रॉ से जुड़े प्रमुख तथ्य

खुफिया एजेंसियां किसी भी देश की सुरक्षा में अपना एक अलग महत्त्व रखती हैं। भारतीय खुफिया एजेंसी 'राॅ' (RAW) है, जिससे सम्बंधित कुछ तथ्य निम्न प्रकार हैं[2]-

  1. रॉ का कानूनी दर्जा अभी भी अस्पष्ट है। आखिर क्यों रॉ एक एजेंसी नहीं बल्कि विंग है?
  2. इसका गठन 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद तब किया गया, जब इंदिरा गांधी की सरकार ने भारत की सुरक्षा की ज़रूरत को महसूस किया।
  3. राॅ पर आर.टी.आई. (RTI) नहीं डाल सकते, क्योंकि यह देश की सुरक्षा का मामला है।
  4. इस गुप्तचर संस्था में शामिल होने के लिए माता-पिता का भारतीय होना अनिवार्य है।
  5. रॉ का सिद्धांत है- धर्मो रक्षति रक्षितः, जिसका मतलब है- "जो शख्स धर्म की रक्षा करता है, वह हमेशा सुरक्षित रहता है।"
  6. रॉ अपनी रिपोर्ट सीधे देश के प्रधानमंत्री को भेजती है। इसके डायरेक्टर का चुनाव, सेक्रेटरी (रिसर्च) द्वारा होता है।
  7. ऐसे प्रत्याशी जिनका चुनाव रक्षा बलों से हुआ हो, उन्हें इसमें शामिल होने से पहले अपने मूल विभाग से इस्तीफा देना आवश्यक है।
  8. मिशन पूरा होने के बाद, अधिकारी को अनुमति होती है कि वह अपने मूल विभाग में वापस शामिल हो सकते है।
  9. सिक्किम को भारत में शामिल करने का श्रेय भी बहुत हद तक रॉ को जाता है। रॉ ने वहां के नागरिकों को भारत समर्थक (प्रो इंडियन) बनाने में अहम भूमिका निभाई थी।
  10. यदि कोई रॉ का कर्मचारी है तो उसे यह बात पूर्णत: गुप्त रखनी होगी कि वह रॉ के लिए कार्य करता है।
  11. रॉ के लिए काम करना एक डेस्क में बैठकर काम करने जैसा नहीं है। आप किसी मिशन पर हों, तो पूरी सम्भावना है कि आपके परिवार को भी नहीं पता होगा कि आप कहाँ हैं।
  12. यह साबित करने के लिए हमेशा तैयार रहें कि आप दिन के चौबीसों घंटे, हफ्ते के सातों दिन, किसी भी परिस्थिति में काम कर सकते हैं और खुद को उन परिस्थितियों के अनुरूप ढाल सकते हैंं।
  13. अगर आप किसी खेल में अच्छे हैं तो ये रॉ में आपके प्रवेश के अवसर को बढ़ा देता है। चीनी, अफ़ग़ानी या किसी दूसरी भाषा का ज्ञान आपको दूसरो से ऊपर खड़ा करता है।
  14. रॉ में ड्यूटी पर तैनात अधिकारी को बंदूक नहीं मिलती। बचाव के लिए ये अपनी तेज बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं।
  15. रॉ का गठन अमेरिका के सीआईए की तर्ज पर ही किया गया है। इसके ऑफिशर्स को अमेरिका, यूके और इजरायल में प्रशिक्षण दिया जाता है।
  16. रॉ के प्रशिक्षुओं को आत्मरक्षा के कठिन प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है। खासतौर से क्रव मगा और जासूसी डिवाइस के इस्तेमाल के मामले में। फ़ाइनैंशियल, इकोनॉमिक अनैलिसिसि, स्पेस टेक्नोलॉजी, इंफॉर्मेशन सिक्यॉरिटी, एनर्जी सिक्यॉरिटी और साइंटिफिक नॉलेज जैसी जानकारी प्रशिक्षुओं को दी जाती हैं।[3]
  17. प्रशिक्षणार्थि को किसी एक फॉरेन लैंग्वेज में निपुण किया जाता है और उसे जियो स्ट्रैटिजिक अनैलिसिस से भी परिचित कराया जाता है। सीआईए, केजीबी, आईएसआई, मोसाद, एमआई6 जैसी घातक खुफिया एजेंसियों की केस स्टडीज भी पढ़ाई जाती है।
  18. शुरुआत में रॉ में नियुक्ति आईबी, इंडियन पुलिस सर्विस, मिलिट्री या रेवेन्यू डिपार्टमेंट से होती है। हालांकि, खुफिया एजेंसी ने यूनिवर्सिटीज से स्टूडेंट्स को लेने की प्रक्रिया शुरू नहीं की है।
  19. बांग्लादेश का उदय- 1970 के दशक के शुरुआती वर्षों में जब बांग्लादेश की नींव डालने की कोशिश जारी थी, उस समय रॉ ने सूचनाओं के आदान-प्रदान में बेहतरीन भूमिका निभाई। मुक्ति वाहिनी की रॉ ने भरपूर मदद की, जिसके परिणामस्वरूप पूर्वी पाकिस्तान को नया नाम ‘बांग्लादेश’ मिला, हालांकि पहले राष्ट्र अध्यक्ष मुजीबुर रहमान ने रॉ के इनपुट की अवहेलना की, जिसके कारण वे इस्लामी कट्टरपंथियों का शिकार बन गए।
  20. 1984 में रॉ ने पाकिस्तान के ऑपरेशन अबाबील के बारे में जानकारी दी, जिसमें दुश्मन देश सियाचिन की सल्तोरो चोटी पर क़ब्ज़ा करने के मिशन में जुटा था। इसी जानकारी के आधार पर भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन मेघदूत' शुरू किया और पाकिस्तानी सेना को क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले ही बुरी तरह खदेड़ दिया गया।

विभिन्न अभियान

ऑपरेशन काहुटा- यह ऑपरेशन बेहद ही साहसिक अभियान था। इस ऑपरेशन में रॉ ने पाकिस्तान के लॉन्ग रेंज मिसाइल प्रोग्राम का पता लगा लिया था, वो भी उस मिशन में लगे वैज्ञानिकों के बालों के माध्यम से। रॉ एजेंट्स ने 1978 के पहले ही पकिस्तान के खूंखार परमाणु क्षमता से लैस होने की तैयारी का पता लगा लिया था, लेकिन यह मिशन देश के तत्कालीन नेतृत्व की कूटनीतिक खामी की वजह से कामयाब नहीं हो सका।[3]

ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्धा- भारत के पहले न्यूक्लियर प्रोग्राम को रहस्य में रखने के लिए 'ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्धा' नाम रॉ ने ही दिया था। इस मिशन में रॉ को भारत में ही डिप्लॉय किया गया था। नतीजा सबको पता है कि किस तरह भारत द्वारा 15 किलोटन प्लुटोनियम डिवाइस के विस्फोट के बाद दुनिया में हमारी सामरिक साख में कैसा परिवर्तन आया और अमेरिका और पाक सहित सभी पश्चिमी देश ठगे से रह गए।

ऑपरेशन चाणक्य- पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा समर्थित कई अलगाववादी संगठनों और आतंकवाद को कश्मीर घाटी से दूर करने के लिए रॉ ने 'ऑपरेशन चाणक्य' नाम से एक खुफिया ऑपरेशन चलाया। यह कितना सफल रहा, इसका अंदाजा इसी बात से लगता है कि आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के दो धड़ों में बंटने के पीछे का कारण भी यही ऑपरेशन था।

ऑपरेशन लीच- यह रॉ के सबसे बेहतरीन ऑपरेशंस में से एक माना जाता है। उत्तर-पूर्व के विद्रोही देश की अखंडता को भंग करना चाहते थे, इसलिए रॉ ने बर्मा के विद्रोहियों और लोकतांत्रिक लोगों का खूब पोषण किया। रॉ ने एन.यू.पी.ए. के 34 गुरिल्ले विद्रोहियों को गिरफ्तार कर लिया और उनके मिलिट्री कमांडर को मार गिराया।

उत्तरी गठबंधन को समर्थन- अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान और अमेरिका समर्थित तालिबान के उदय होने के बाद भारत ने उत्तरी गठबंधन[4] और सोवियत यूनियन को समर्थन देने का फैसला किया। साल 1996 में रॉ ने 25 बेड वाला एक अस्पताल फरखुर एअरबेस पर बनवाया। इस हवाई अड्डे को रॉ की एक टोही इकाई भारतीय उड्डयन अनुसंधान केंद्र द्वारा इस्तेमाल में लाया जाता था, ताकि उत्तरी गठबंधन को हवाई सहायता उपलब्ध करवाई जा सके। इन संबंधों में साल 2001 के अफ़ग़ान युद्ध के दौरान और मजबूती आई। भारत ने तब करीब 8 से 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर जितनी रकम वाले हवाई युद्धक समान उपलब्ध करवाए थे। रॉ पहली खुफिया एजेंसी थी, जिसने कुंदुज एअरलिफ्ट की सीमा को निर्धारित किया था।[5]

कारगिल की लड़ाई- रॉ को उस वक्त बड़ी सफलता मिली थी, जब उसने पाकिस्तान के तात्कालीन सैन्य प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ (बीजिंग में) और उनके चीफ ऑफ स्टॉफ लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अजीज (इस्लामाबाद में) के बीच हुई बातचीत को टेप करने में सफलता पाई। इस टेप को बाद में भारत ने सामने किया ताकि साबित हो सके कि कारगिल घुसपैठ में पाकिस्तान की भूमिका थी। हालांकि रॉ की इस बात को लेकर आलोचना भी हुई कि उन्होंने पाकिस्तान के इस सशस्त्र घुसपैठ की पुख्ता जानकारी नहीं उपलब्ध करवाई थी, जिसके कारण 10 दिन लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी और हजारों सैनिक मारे गए।

  1. REDIRECTसाँचा:मुख्य

कनिष्का बाम्बिंग मामला- यह अभियान रॉ के बेहतर ढंग से काम करने की साख पर लगा बड़ा झटका था। 23 जून, 1985 को भारतीय एअरक्राफ्ट बोइंग 747-237B को आयरलैंड के पास करीब 31 हजार फीट की ऊंचाई पर बम से उड़ा दिया गया। इस अभियान में करीब 329 लोगों की जानें गई थीं। इसी दिन ठीक एक घंटे के बाद टोक्यो के नारिता हवाई अड्डे की ट्रांजिट बैगेज बिल्डिंग में धमाका हुआ। यहां पर कैथे पैसिफिक फ्लाइट नंबर CP 003 से एअर इंडिया की फ्लाइट 301 में, जो कि बैंकॉक जाने वाली थी, सामान लादा जाना था। दोनों विमानों को कनाडा के हवाई अड्डों पर विस्फोटकों से भरा गया था। फ्लाइट 301 उड़ान भरने में देरी के कारण बच गई। इस अभियान को रॉ की सबसे बड़ी चूक माना गया।


रॉ के सभी चीफ पाकिस्तान या चीन के एक्सपर्ट होते हैं। 31 दिसंबर, 2014 को रॉ चीफ का पद संभालने वाले राजिंदर खन्ना इस्लामिक आतंकवाद के एक्सपर्ट थे। रॉ ने पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख रहे परवेज मुशर्रफ और उनके चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल मोहम्मद अजीज की बातचीत को टैप किया था। इस टैपिंग से कारगिल घुसपैठ में पाकिस्तान की संलिप्तता की बात की पुष्टि हो गई थी।

रॉ एजेंट की जीवन शैली

रॉ के कुछ इंटेलिजेंस एजेंट केवल काग़ज़ी करवाई करते हैं और कुछ एजेंटों का कार्य रोमांचकारी एवं जोखिम भरा होता है। कई बार ये एजेंट विदेशी भाषा, संचार अधिकारी, कॉल सेंटर सहायक आदि के रूप में देश की सीक्रेट इंटेलिजेंस एजेंसियों की सहायता करते हैं। रॉ एजेंट बनने के बाद देश-विदेश की यात्रा करने का अवसर मिलता है और विदेशी भाषाओं की जानकारी बहुत लाभकारी होती है और इस पेशे में अकेलापन भी महसूस होता है और काफ़ी जाँच-पड़ताल करनी पड़ती है। बैठकों में शामिल होना पड़ता है। कई बार कुछ सीक्रेट ऑपरेशन बहुत खतरनाक होते हैं, जिसके कारण अधिकारियों की सुरक्षा हेतु उनके नाम की जानकारी किसी को भी नही दी जाती है। उनकी जानकारी गोपनीय रखी जाती है।[6]

प्रशिक्षण

रॉ एजेंटों के प्रशिक्षण में कई वर्ष लगते हैं। पहले इन्हें बुनियादी प्रशिक्षण और बाद में उच्च स्तरीय प्रशिक्षण दिया जाता है। बुनियादी प्रशिक्षण लगभग 10 दिन का होता है, जिसमें जासूसी की असली दुनिया से उनका परिचय कराया जाता है। उन्हें अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, सूचना सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, वैज्ञानिक ज्ञान, वित्तीय, आर्थिक और सामरिक विश्लेषण जैसे विषयों से संबंधित जानकारी भी प्रदान की जाती है। इसके अलावा उन्हें सीआईए, आईएसआई, एम16 जैसी अन्य एजेंसियों से संबंधित कुछ मामलों का अध्ययन करवाया जाता है। बुनियादी प्रशिक्षण के बाद उन्हें 'फील्ड इंटेलिजेंस ब्यूरो' (FIB) में भेजा जाता है। वहाँ उन्हें 1-2 वर्षों तक ठंडें क्षेत्रों एवं जंगलों में सुरक्षित रहने के तरीकों एवं गुप्त ऑपरेशनों को संचालित करने के तरीके सिखाये जाते हैं। इसके बाद उन्हें बातचीत के तरीके एवं मिशन संचालित करने की कला सिखाई जाती है। बाद में उन्हें बुनियादी प्रशिक्षण शिविर भेज दिया जाता है।

विशेषताएँ

एक रॉ एजेंट के अंदर कई विशेषताओं का होना अत्यंत आवश्यक है। उसमें बातचीत करने का शानदार तरीका होना चाहिए। इसके अलावा उस व्यक्ति में किसी भी दबाव, स्थिति और वातावरण में परिणाम प्राप्त करने का आत्मविश्वास एवं दृढ़ संकल्प होना चाहिए। इसके अलावा उस व्यक्ति में पेशेवर अंदाज़और व्यक्तिगत निष्ठा होनी चाहिए, जो कठिन प्रशिक्षण और विकासात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से आती है।

पात्रता

रॉ का एजेंट बनने के लिए निम्नलिखित बातों का होना अनिवार्य है-

  1. व्यक्ति को देश का नागरिक होना चाहिए।
  2. उसका कभी कोई आपराधिक अतीत नहीं होना चाहिए।
  3. उसे नशीली दवाओं का आदि नहीं होना चाहिए।
  4. उसने प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की हो।
  5. कम से कम एक विदेशी भाषा पर उसकी पकड़ होनी चाहिए।
  6. हमेशा देश के किसी भी हिस्से में यात्रा करने के लिए तैयार रहना चाहिए।[6]

भर्ती और वेतन

प्रारम्भ में रॉ मुख्य रूप से उन प्रशिक्षित खुफिया अधिकारियों पर निर्भर था, जिनकी सीधी भर्ती होती थी। इन अधिकारियों का संबंध इंटेलिजेंस ब्यूरो के बाहरी विंग से होता था। इसके बाद जब रॉ के कार्यों का विस्तार हुआ तो सेना, पुलिस और भारतीय राजस्व सेवा से भी उम्मीदवारों की भर्ती की गई। बाद में, रॉ में विश्वविद्यालय से स्नातक हुए अभ्यर्थियों की भी भर्ती शुरू की गई। 1983 में रॉ ने अपनी खुद की 'रिसर्च एंड एनालिसिस सेवा' (RAS) प्रारंभ की एवं केन्द्रीय स्टाफिंग योजना के तहत ग्रुप ए सिविल सेवकों की नियुक्ति शुरू की थी। इन उम्मीदवारों को सिविल सेवा परीक्षा के सभी चरणों में पास होना पड़ता था और उसमें से सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवारों को रॉ की परीक्षा में भाग लेने की अनुमति दी जाती थी। इसके अलावा उम्मीदवार के पास 20 साल का कार्य अनुभव होना चाहिये। यह एक स्थायी नौकरी नहीं है, लेकिन एक व्यक्ति प्रति माह 0.8-1.3 लाख रुपये कमा सकता है।


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. जो पहले घरेलु व अंतर्राष्ट्रीय मामले संभालती थी।
  2. भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ से जुड़े रोचक तथ्य (हिंदी) gazabhindi.com। अभिगमन तिथि: 14 जनवरी, 2016।
  3. 3.0 3.1 भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ की 22 बड़ी बातें (हिंदी) hindi.news18.com। अभिगमन तिथि: 15 जनवरी, 2017।
  4. तालिबान सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन करने वाला बल
  5. भारत की खुफिया एजेंसी रॉ से जुड़ी पांच दिलचस्प बातें (हिंदी) m.dailyhunt.in। अभिगमन तिथि: 15 जनवरी, 2017।
  6. 6.0 6.1 रॉ एजेंट कैसे काम करते हैं (हिंदी) khabridost.in। अभिगमन तिथि: 19 जनवरी, 2016।

संबंधित लेख