दुर्गा खोटे

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दुर्गा खोटे (अंग्रेज़ी: Durga Khote) (जन्म: 14 जनवरी, 1905− मृत्यु: 22 सितंबर, 1991) अपने जमाने मे हिन्दी व मराठी फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री थीं। उन्होंने अनेक हिट फिल्मों में शानदार अभिनय किया। आरम्भिक फिल्मों में नायिका की भूमिकाएँ करने के बाद जब वे चरित्र अभिनेत्री की भूमिकाओं में दर्शकों के सामने आईं, तब उनके बेमिसाल अभिनय को आज तक लोग याद करते हैं। दुर्गा खोटे ने करीब 200 फिल्मों के साथ ही सैंकड़ों नाटकों में भी अभिनय किया और फिल्मों को लेकर सामजिक वर्जनाओं को दूर करने में अहम भूमिका निभाई।

जीवन परिचय

एक प्रतिष्ठित परिवार में 14 जनवरी 1905 को पैदा हुईं दुर्गा खोटे का शुरुआती जीवन सुखमय नहीं रहा और मात्र 26 साल की उम्र में ही उनके पति का निधन हो गया। दुर्गा खोटे का बचपन तो सामान्य रूप से कटा लेकिन अपनी पसन्द से विवाह के बाद भी उनका घरेलू जीवन बहुत ही कठिन व दुख से भरा रहा। अपने पति की ओर से बेहद परेशान रही दुर्गा को जो कुछ खुशी मिली, वह अपने बच्चों से ही मिली।

फ़िल्मों में प्रवेश

पति के निधन के बाद दुर्गा खोटे पर दो बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी आ गई थी। ऐसे में उन्होंने फिल्मों की राह ली। उस दौर में बहुधा पुरुष ही महिलाओं की भूमिका निभाते थे और अधिकतर घरों में फिल्मों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। दुर्गा खोटे मूक फिल्मों के दौर में ही फिल्मों में आ गई थी और 'फरेबी जाल' उनकी पहली फिल्म थी। बतौर नायिका 'अयोध्येचा राजा' उनकी पहली फिल्म थी जो मराठी के साथ साथ हिंदी में भी थी। यह फिल्म कामयाब रही और दुर्गा खोटे नायिका के रूप में सिनेमा की दुनिया में स्थापित हो गईं। दुर्गा खोटे की कामयाबी ने कइयों को प्रेरित किया और हिंदी फिल्मों से जुड़ी सामाजिक वर्जना टूटने लगी। दुर्गा खोटे ने एक और पहल करते हुए स्टूडियो व्यवस्था को भी दरकिनार कर दिया और फ्रीलांस कलाकार बन गई। स्टूडियो सिस्टम में कलाकार मासिक वेतन पर किसी एक कंपनी के लिए काम करते थे। लेकिन दुर्गा खोटे ने इस व्यवस्था को अस्वीकार करते हुए एक साथ कई फिल्म कंपनियों के लिए काम किया।[1]

यादगार फ़िल्में

हिंदी फिल्मों में उन्हें मां की भूमिका के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है। फिल्मकार के. आसिफ की बहुचर्चित फिल्म मुगल ए आजम में जहां उन्होंने सलीम की मां जोधाबाई की यादगार भूमिका निभाई वहीं उन्होंने विजय भट्ट की 'भरत मिलाप' में कैकेई की भूमिका को भी जीवंत बना दिया। बतौर मां उन्होंने चरणों की दासी, मिर्जा गालिब, बॉबी, विदाई जैसी फिल्मों में भी बेहतरीन भूमिका की।

आत्मकथा

दुर्गा खोटे ने अपनी आत्मकथा (मी दुर्गा खोटे) भी लिखी जिसकी व्यापक सराहना हुई। मूल रूप से मराठी भाषा में लिखी आत्मकथा का अंग्रेज़ी में भी अनुवाद हुआ है।

निधन

सिनेमा जगत में महिलाओं की स्थिति मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली इस हस्ती का 22 सितंबर 1991 में निधन हो गया। हिंदी एवं मराठी फिल्मों के अलावा रंगमंच की दुनिया में करीब पांच दशक तक सक्रिय रहीं दुर्गा खोटे अपने दौर की प्रमुख हस्तियों में थी जिन्होंने फिल्मों में महिलाओं की राह सुगम बनाई।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. दुर्गा खोटे: सिने जगत में महिलाओं की राह सुगम बनाई (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) जागरण याहू इंडिया। अभिगमन तिथि: 21 सितम्बर, 2012।

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