मात्रक

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किसी भौतिक राशि को व्यक्त करने के लिए उसी प्रकार की राशि के मात्रक की आवश्यकता होती है। प्रत्येक राशि की माप के लिए उसी राशि को कोई मानक मान चुन लिया जाता है। इस मानक को मात्रक कहते हैं। किसी राशि की माप को प्रकट करने के लिए दो बातों का बताना आवश्यक है—

  • राशि का मात्रक—भौतिक राशि जिसमें मापी जाती है।
  • आंकिक मान—जिसमें राशि के परिमाण को व्यक्त किया जाता है। इससे यह बताना सम्भव होता है कि उस राशि में उसका मात्रक कितनी बार प्रयोग किया गया है।

उदाहरण स्वरूप यदि तार की लम्बाई '3 मीटर' है , तो इसका अर्थ यह है कि लम्बाई मापने का मात्रक 'मीटर' है और तार की लम्बाई चुने गये मात्रक 'मीटर' की तीन गुनी है।

मापने की अन्तर्राष्ट्रीय मान पद्धति या SI पद्धति

भौतिक में अनेक राशियों को मापना पड़ता है और यदि प्रत्येक भौतिक राशि के लिए अलग मात्रक माना जाए तो मात्रकों की संख्या इतनी अधिक हो जाएगी कि उनको याद रख सकना असम्भव हो जाएगा। इसीलिए सभी भौतिक राशियों को व्यक्त करने के लिए एक पद्धति अपनायी गयी है, जिसे मूल मात्रकों की अन्तर्राष्ट्रीय पद्धति अथवा इसे SI पद्धति कहते हैं। इस पद्धति के अनुसार यांत्रिकी में आने वाली सभी राशियों को लम्बाई, द्रव्यमान, व समय के मात्रकों में व्यक्त कर सकते हैं। ऊष्मा गति की, विद्युत तथा चुम्बकत्व एवं प्रकाशिकी में काम आने वाली राशियों को ताप, विद्युत धारा व ज्योति तीव्रता के मानकों में व्यक्त करते हैं।

1971 में माप और तौल की अन्तर्राष्ट्रीय समिति के द्वारा पदार्थ की मात्रा को मूल राशि मानते हुए मोल को इसका मूल मात्रक निर्धारित किया गया है। इस प्रकार सात भौतिक राशियाँ—

  • लम्बाई,
  • द्रव्यमान,
  • समय,
  • वैद्युत धारा,
  • ताप,
  • ज्योति तीव्रता, और
  • पदारर्थ की मात्रा,

इनको मूल राशियाँ कहते हैं। मूल राशियों के मात्रक एक–दूसरे से पृथक और स्वतंत्र होते हैं। साथ ही इन राशियों में से किसी एक को किसी अन्य मात्रकों में न तो बदला जा सकता है और न ही उससे सम्बन्धित किया जा सकता है। मूल राशियों के मात्रक को मूल मात्रक कहा जाता है। उपर्युक्त सात मूल भौतिक राशियों के अतिरिक्त दो पूरक मूल राशियाँ 'कोण' तथा 'घन कोण' भी होती हैं।


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