कांग्रेस अधिवेशन लखनऊ: Difference between revisions

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'''कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन''' [[अम्बिकाचरण मजूमदार]] की अध्यक्षता में [[1916]] ई. में [[लखनऊ]] में सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन में ही [[गरम दल]] तथा नरम दल, जिनके आपसी मतभेदों के कारण [[कांग्रेस]] का दो भागों में विभाजन हो गया था, उन्हें फिर एक साथ लाया गया। लखनऊ अधिवेशन में 'स्वराज्य प्राप्ति' का भी प्रस्ताव पारित किया गया। कांग्रेस ने '[[मुस्लिम लीग]]' द्वारा की जा रही साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग को भी स्वीकार कर लिया।  
'''कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन''' [[अम्बिकाचरण मजूमदार]] की अध्यक्षता में [[1916]] ई. में [[लखनऊ]] में सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन में ही [[गरम दल]] तथा [[नरम दल]], जिनके आपसी मतभेदों के कारण [[कांग्रेस]] का दो भागों में विभाजन हो गया था, उन्हें फिर एक साथ लाया गया। लखनऊ अधिवेशन में 'स्वराज्य प्राप्ति' का भी प्रस्ताव पारित किया गया। कांग्रेस ने '[[मुस्लिम लीग]]' द्वारा की जा रही साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग को भी स्वीकार कर लिया।  
==कांग्रेस में एकता==
==कांग्रेस में एकता==
सूरत अधिवेशन (1907 ई.) के समय कांग्रेस में जो विभाजन हुआ था, वह 1916 ई. तक बना रहा। इस बीच जहाँ एक ओर सरकार क्रांतिकारी कार्यवाहियों को कुचलनें में लगी रही, वहीं [[मार्ले-मिण्टो सुधार]] से [[हिन्दू|हिन्दुओं]] एवं [[मुस्लिम|मुस्लिमों]] के मध्य मतभेद की खाई गहरी हो रही थी। [[1915]] ई. में उदारवादी नेता [[गोपाल कृष्ण गोखले]] एवं [[फ़िरोजशाह मेहता]] की मृत्यु हो गई। [[गरम दल]] एवं नरम दल को पुनः कांग्रेस के मंच पर एक साथ लाने का प्रयास [[बाल गंगाधर तिलक]] एवं [[एनी बेसेंट]] ने किया और इनका प्रयास सफल भी रहा। इस प्रकार एक बार फिर से कांग्रेस में एकता का माहौल व्याप्त हो गया।
सूरत अधिवेशन (1907 ई.) के समय कांग्रेस में जो विभाजन हुआ था, वह 1916 ई. तक बना रहा। इस बीच जहाँ एक ओर सरकार क्रांतिकारी कार्यवाहियों को कुचलनें में लगी रही, वहीं [[मार्ले-मिण्टो सुधार]] से [[हिन्दू|हिन्दुओं]] एवं [[मुस्लिम|मुस्लिमों]] के मध्य मतभेद की खाई गहरी हो रही थी। [[1915]] ई. में उदारवादी नेता [[गोपाल कृष्ण गोखले]] एवं [[फ़िरोजशाह मेहता]] की मृत्यु हो गई। [[गरम दल]] एवं नरम दल को पुनः कांग्रेस के मंच पर एक साथ लाने का प्रयास [[बाल गंगाधर तिलक]] एवं [[एनी बेसेंट]] ने किया और इनका प्रयास सफल भी रहा। इस प्रकार एक बार फिर से कांग्रेस में एकता का माहौल व्याप्त हो गया।
====स्वराज्य प्राप्ति का प्रस्ताव====
====स्वराज्य प्राप्ति का प्रस्ताव====
1916 ई. के 'लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन' की अध्यक्षता अम्बिका चरण मजूमदार ने की। बाल्कन युद्ध के बाद भारतीय मुस्लिम [[अंग्रेज़]] सरकार से नाराज़ थे। उस समय [[अब्दुल कलाम |मौलाना अब्दुल कलाम आजाद]], मौलाना मुहम्मद अली, शौकत अली, [[मुहम्मद अली जिन्ना]] आदि '[[मुस्लिम लीग]]' के महत्तवपूर्ण नेता थे। लीग ने लखनऊ अधिवेशन में 'स्वराज्य प्राप्ति' का प्रस्ताव पारित किया। 1916 ई. में लखनऊ कांग्रेस में ही 'मुस्लिम लीग' के नेता मुहम्मद अली जिन्ना एवं [[कांग्रेस]] के मध्य एक समझौता हुआ।
1916 ई. के 'लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन' की अध्यक्षता अम्बिका चरण मजूमदार ने की। बाल्कन युद्ध के बाद भारतीय मुस्लिम [[अंग्रेज़]] सरकार से नाराज़ थे। उस समय [[अब्दुल कलाम |मौलाना अब्दुल कलाम आजाद]], मौलाना मुहम्मद अली, शौकत अली, [[मुहम्मद अली जिन्ना]] आदि '[[मुस्लिम लीग]]' के महत्त्वपूर्ण नेता थे। लीग ने लखनऊ अधिवेशन में 'स्वराज्य प्राप्ति' का प्रस्ताव पारित किया। 1916 ई. में लखनऊ कांग्रेस में ही 'मुस्लिम लीग' के नेता मुहम्मद अली जिन्ना एवं [[कांग्रेस]] के मध्य एक समझौता हुआ।


==साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व==
==साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व==

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कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन अम्बिकाचरण मजूमदार की अध्यक्षता में 1916 ई. में लखनऊ में सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन में ही गरम दल तथा नरम दल, जिनके आपसी मतभेदों के कारण कांग्रेस का दो भागों में विभाजन हो गया था, उन्हें फिर एक साथ लाया गया। लखनऊ अधिवेशन में 'स्वराज्य प्राप्ति' का भी प्रस्ताव पारित किया गया। कांग्रेस ने 'मुस्लिम लीग' द्वारा की जा रही साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व की मांग को भी स्वीकार कर लिया।

कांग्रेस में एकता

सूरत अधिवेशन (1907 ई.) के समय कांग्रेस में जो विभाजन हुआ था, वह 1916 ई. तक बना रहा। इस बीच जहाँ एक ओर सरकार क्रांतिकारी कार्यवाहियों को कुचलनें में लगी रही, वहीं मार्ले-मिण्टो सुधार से हिन्दुओं एवं मुस्लिमों के मध्य मतभेद की खाई गहरी हो रही थी। 1915 ई. में उदारवादी नेता गोपाल कृष्ण गोखले एवं फ़िरोजशाह मेहता की मृत्यु हो गई। गरम दल एवं नरम दल को पुनः कांग्रेस के मंच पर एक साथ लाने का प्रयास बाल गंगाधर तिलक एवं एनी बेसेंट ने किया और इनका प्रयास सफल भी रहा। इस प्रकार एक बार फिर से कांग्रेस में एकता का माहौल व्याप्त हो गया।

स्वराज्य प्राप्ति का प्रस्ताव

1916 ई. के 'लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन' की अध्यक्षता अम्बिका चरण मजूमदार ने की। बाल्कन युद्ध के बाद भारतीय मुस्लिम अंग्रेज़ सरकार से नाराज़ थे। उस समय मौलाना अब्दुल कलाम आजाद, मौलाना मुहम्मद अली, शौकत अली, मुहम्मद अली जिन्ना आदि 'मुस्लिम लीग' के महत्त्वपूर्ण नेता थे। लीग ने लखनऊ अधिवेशन में 'स्वराज्य प्राप्ति' का प्रस्ताव पारित किया। 1916 ई. में लखनऊ कांग्रेस में ही 'मुस्लिम लीग' के नेता मुहम्मद अली जिन्ना एवं कांग्रेस के मध्य एक समझौता हुआ।

साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व

समझौते के तहत कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की 'साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व' की मांग को स्वीकार कर लिया। कालान्तर में इसका परिणाम भयानक रहा। इस समझौते को 'लखनऊ पैक्ट' के नाम से भी जाना जाता है। मदनमोहन मालवीय सहित कई वरिष्ठ नेता इस समझौते के ख़िलाफ़ थे। उनका आरोप था कि यह समझौता 'मुस्लिम लीग' को बहुत तवज्जो देता है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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