चंद्रवल्ली: Difference between revisions

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*उत्तर पाषाण काल के प्रामाणिक [[अवशेष|अवशेषों]] का यहाँ अभाव है।
*उत्तर पाषाण काल के प्रामाणिक [[अवशेष|अवशेषों]] का यहाँ अभाव है।
*इस संस्कृति के अंतिम दिनों में आंध्र सभ्यता के चिह्न मिलने लगते हैं। इसकी सूचना काँच की चूड़ियों, श्वेत या पीले रंग से चित्रित पात्रों एवं आंध्र सिक्कों से मिलती है।
*इस संस्कृति के अंतिम दिनों में आंध्र सभ्यता के चिह्न मिलने लगते हैं। इसकी सूचना काँच की चूड़ियों, श्वेत या पीले रंग से चित्रित पात्रों एवं आंध्र सिक्कों से मिलती है।
*रोमन सम्राट आगस्टस (28 ई. पू.-14 ई.) और टाइबेरियस (14 ई.-37 ई.) के दीनार, यूनानी ऐंफोरा एवं रुलेटेड मृद्भांड भी यहाँ मिले हैं, जिससे इनके भूमध्य सागरीय प्रदेशों से संबंध प्रमाणित होते हैं।
*रोमन सम्राट आगस्टस (28 ई. पू.-14 ई.) और टाइबेरियस (14 ई.-37 ई.) के [[दीनार]], यूनानी ऐंफोरा एवं रुलेटेड मृद्भांड भी यहाँ मिले हैं, जिससे इनके भूमध्य सागरीय प्रदेशों से संबंध प्रमाणित होते हैं।
*स्पष्ट है, यह नगर आंध्र सभ्यता के प्रमुख केंद्रों एवं रोमन व्यापारिक क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखता रहा होगा।
*स्पष्ट है, यह नगर आंध्र सभ्यता के प्रमुख केंद्रों एवं रोमन व्यापारिक क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखता रहा होगा।
*चंद्रवल्ली की कहानी समीपवर्ती [[ब्रह्मगिरि]] की संस्कृति से पर्याप्त साम्य रखती है।<ref>{{cite web |url=http://khoj.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80|title=चंद्रवल्ली|accessmonthday=26 अप्रैल|accessyear=2014|last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिन्दी}}</ref>
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Revision as of 13:29, 28 July 2014

चंद्रवल्ली मैसूर के ऐतिहासिक स्थानों में से एक है। यह चीतलदुर्ग से 1 मील (लगभग 1.6 कि.मी.) की दूरी पर पश्चिम में स्थित है।[1] ई. सन के प्रारंभिक काल में यह स्थान व्यापारिक दृष्टि से काफ़ी महत्त्वपूर्ण था। तत्कालीन रोम साम्राज्य में प्रचलित अनेक सिक्के इस स्थान से मिले हैं, जो इसकी महत्ता को सिद्ध करते हैं।

  • चंद्रवल्ली मैसूर, कर्नाटक के चीतलदुर्ग ज़िले में चीतलदुर्ग पहाड़ी के पश्चिम में स्थित है, जो दीर्घकाल से किंवंदंतियों का विषय एवं सातवाहन (आंध्र) मुद्राओं का स्त्रोत रहा है।
  • यहाँ से प्राप्त सिक्कों में ऑगस्टस सीजर तथा टाइबेरियस नामक रोम सम्राटों के सिक्के भी हैं।
  • पुरातत्ववेत्ताओं को उत्खनन से यहाँ दो सांस्कृतिक स्तर प्राप्त हुए हैं। प्रारंभिक स्तरों की संस्कृति मेगालिथ कब्रों की सभ्यता के निकट है। यह सभ्यता की प्रथम अवस्था है, जिसमें सिक्के या चित्रित मृण्पात्र नहीं मिलते।
  • उत्तर पाषाण काल के प्रामाणिक अवशेषों का यहाँ अभाव है।
  • इस संस्कृति के अंतिम दिनों में आंध्र सभ्यता के चिह्न मिलने लगते हैं। इसकी सूचना काँच की चूड़ियों, श्वेत या पीले रंग से चित्रित पात्रों एवं आंध्र सिक्कों से मिलती है।
  • रोमन सम्राट आगस्टस (28 ई. पू.-14 ई.) और टाइबेरियस (14 ई.-37 ई.) के दीनार, यूनानी ऐंफोरा एवं रुलेटेड मृद्भांड भी यहाँ मिले हैं, जिससे इनके भूमध्य सागरीय प्रदेशों से संबंध प्रमाणित होते हैं।
  • स्पष्ट है, यह नगर आंध्र सभ्यता के प्रमुख केंद्रों एवं रोमन व्यापारिक क्षेत्र में विशिष्ट स्थान रखता रहा होगा।
  • चंद्रवल्ली की कहानी समीपवर्ती ब्रह्मगिरि की संस्कृति से पर्याप्त साम्य रखती है।[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |पृष्ठ संख्या: 319 |
  2. चंद्रवल्ली (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 26 अप्रैल, 2014।

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