मण्डूक

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मण्डूक वर्षाकालिक जलचर है, जिसकी टर्र-टर्र ध्वनि की तुलना बालकों के वेदपाठ से की जाती है। सम्भवत: इसीलिए एक वेदशाखाकार ऋषि इस नाम से प्रसिद्ध थे।

  • ऋग्वेदीय प्रसिद्ध मण्डूकऋचा[1] में ब्राह्मणों की तुलना मण्डूकों की वर्षाकालीन ध्वनि से की गई है, जब ये पुन: वर्षा ऋतु के आगमन के साथ कार्यरत जीवन आरम्भ करने के लिए जाग पड़ते हैं।
  • कुछ विद्वानों ने इस ऋचा को वर्षा का जादू मंत्र माना है।
  • जल से सम्बन्ध रखने के कारण मेंढक ठंडा करने का गुण रखते हैं, एतदर्थ मृतक को जलाने के पश्चात् शीतलता के लिए मण्डूकों को आमंत्रित करते हैं।[2]
  • अथर्ववेद में मण्डूक को ज्वराग्नि को शान्त करने के लिए आमंत्रित किया गया है।[3]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मण्डूकऋचा (7.103 तथा अ. वेद 4.15,12
  2. ऋग्वेद 10.16,14
  3. अथर्ववेद (7.116

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