सातवीं लोकसभा (1980): Difference between revisions

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Latest revision as of 14:22, 19 July 2014

सातवीं लोकसभा चुनावों की घोषणा 1980 में हुई। जनता पार्टी के नेताओं के बीच की लड़ाई और देश में फैली राजनीतिक अस्थिरता ने कांग्रेस (आई) के पक्ष में काम किया, जिसने मतदाताओं को इंदिरा गांधी की मजबूत सरकार की याद दिला दी। इस चुनाव में कांग्रेस ने लोकसभा में 351 सीटें जीतीं और जनता पार्टी या बचे हुए गठबंधन को सिर्फ़ 32 सीटें ही मिल सकीं।

जनता पार्टी का विभाजन

भारतीय लोक दल के नेता चरण सिंह और जगजीवन राम, जिन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी, जनता गठबंधन के सदस्य थे, लेकिन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई से वे खुश नहीं थे। आपातकाल के दौरान मानवाधिकार के हनन की जांच के लिए जो अदालतें सरकार ने गठित की थीं, वे इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ प्रतिशोधी दिखाई पड़ीं। समाजवादियों और हिन्दू राष्ट्रवादियों का मिश्रण जनता पार्टी, 1979 में विभाजित हो गई, जब 'भारतीय जनसंघ' के नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी को छोड़ दिया और बीजेएस ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

कांग्रेस की जीत

मोरारजी देसाई ने संसद में विश्वास मत खो दिया और इस्तीफा दे दिया। चरण सिंह, जिन्होंने जनता गठबंधन के कुछ भागीदारों को बरकरार रखा था, उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में जून, 1979 में शपथ ली। कांग्रेस ने संसद में चरण सिंह के समर्थन का वादा किया, लेकिन बाद में पीछे हट गई। जनवरी, 1980 में उन्होंने चुनाव की घोषणा कर दी। वे अकेले ऐसे प्रधानमंत्री थे, जो कभी संसद नहीं गए। जनता पार्टी के नेताओं के बीच की लड़ाई और देश में फैली राजनीतिक अस्थिरता ने कांग्रेस (आई) के पक्ष में काम किया। कांग्रेस ने लोकसभा में 351 सीटें जीतीं, जबकि जनता पार्टी और बचे हुए गठबंधन को मात्र 32 सीटें मिलीं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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