तारकसी

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तारकसी एक भारतीय कला (काष्ठकला) है। उत्तर प्रदेश का मैनपुरी ज़िला ही पूरी दुनिया में तारकसी कला का एकमात्र केंद्र है। तारकसी लकड़ी पर की जाने वाली एक तरह की नक्काशी है जो धातु के तारों से की जाती है। इसके लिए लकड़ी को खास तरह से तैयार किया जाता है जो एक जटिल और लम्बी प्रक्रिया है।

  • तारकसी कला की शुरुआत कैसे हुई, ये कहना मुश्किल है। लेकिन भारत में जब ब्रितानी हुकमत का सिलसिला शुरू हुआ तो तारकसी सात समुन्द्र पार पहुंच गई।
  • हिंदुस्तान से सीधे इस कला को पहचान नहीं मिली। यूरोप के देशों में इस कला को जबरदस्त लोकप्रियता हासिल हुई।
  • 18वीं सदी में तारकसी के चाहने वाले पुरी दुनिया में हो गए, लेकिन अफसोस मैनपुरी में तारकसी की कला दम तोड़ती रही।
  • मैनपुरी की भोगोलिक स्थिति के चलते तारकसी मैनपुरी की पहचान बनी थी। एक समय था जब मैनपुरी के हर घर में तारकसी की झलक मिलती थी। प्रसिद्ध इतिहासकार परसी ब्राउन ने भी इस कला का जिक्र किया है।
  • आजादी के बाद तारकसी से बनाई गई शीशम की लकड़ी से निर्मित काष्ठ हाथी की प्रतिमा शिल्पकार रामस्वरूप ने राष्ट्रपति को भेंट की थी। मैनपुरी में रामस्वरूप ने इस कला को जीवित रखने में विशेष योगदान दिया।
  • शीशम की प्लेट पर बनी तारकसी की आकृति कलाकृतियां उपहार में देने का चलन है। रथों का प्रयोग इतिहास से मिलता है।
  • तेजगति से चलने वाले रथ और मंझोली के पहिया तारकसी कला का शानदार उदाहरण है।


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