अर्थ -न्याय दर्शन

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  • न्याय दर्शन में चौथा प्रमेय का नाम अर्थ है यह इन्द्रिय का अर्थ होता है। क्रमश: पाँच इन्द्रियों से ग्रहण करने योग्य पाँच विशेष गुण - गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्द को इन्द्रियार्थ कहते हैं।[1] गन्ध, रस, रूप तथा स्पर्श पृथिवी के गुण हैं।
  • रस, रूप तथा स्पर्श जल के गुण हैं, रूप और स्पर्श तेजस के गुण हैं केवल स्पर्श वायु का और केवल शब्द आकाश का गुण है। जिस इन्द्रिय में जिस गुण का उत्कर्ष रहता है, उससे उसी गुण का प्रत्यक्ष होता है।
  • घ्राण पार्थिव द्रव्य है। उसमें यद्यपि गन्ध, रूप, रस तथा स्पर्श इन चार गुणों का समावेश रहता है तथापि गन्ध का ही उत्कर्ष रहता है। अतएव उससे गन्ध का ही प्रत्यक्ष होता है। जिस द्रव्य तथा जिस गुण में प्रत्यक्ष का प्रयोजक धर्म रहता है, उस द्रव्य और गुण का प्रत्यक्ष होता है। केवल उद्भूतत्त्व धर्म से युक्त रूप विशेष और उस रूप से युक्त द्रव्य का ही प्रत्यक्ष होता है।
  • यद्यपि रूप चक्षुष में भी है किन्तु वह उद्भूतत्त्व धर्म-विशिष्ट नहीं है। अतएव उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है। जैसे पाषाण आदि अनेक द्रव्यों में गन्ध रहने पर भी उसमें गन्ध की उत्कटता नहीं है, अत: उसका प्रत्यक्ष नहीं होता है। इसी तरह से घ्राणगत गन्ध का भी प्रत्यक्ष नहीं होता है। रसना आदि इन्द्रियों में रहने वाले रस आदि गुणों का प्रत्यक्ष नहीं होता है। इस मत में इन्द्रिय को अतीन्द्रिय माना गया है।


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. न्यायसूत्र 1/1/14

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