शाप: Difference between revisions

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
Jump to navigation Jump to search
[unchecked revision][unchecked revision]
m (Text replace - "{{लेख प्रगति |आधार=आधार1 |प्रारम्भिक= |माध्यमिक= |पूर्णता= |शोध= }}" to "{{लेख प्रगति |आधार= |प्रारम्भि�)
m (Text replacement - " महान " to " महान् ")
 
(One intermediate revision by one other user not shown)
Line 1: Line 1:
*क्रोधपूर्वक किसी के अनिष्ट का उदघोष 'शाप' कहलाता है।  
'''शाप''' का अभिप्राय क्रोधपूर्वक किसी के अनिष्ट का उदघोष करना कहलाता है। विशेषकर [[ऋषि]], [[मुनि (तपस्वी)|मुनि]], तपस्वी आदि के अनिष्ट शब्दों को शाप कहते हैं। किसी महान् नैतिक अपराध के हो जाने पर शाप दिया जाता था। इसके अनेक उदाहरण प्राचीन साहित्य में उपलब्ध हैं।  
*विशेषकर [[ऋषि]], [[मुनि (तपस्वी)|मुनि]], तपस्वी आदि के अनिष्ट शब्दों को शाप कहते हैं।  
 
*किसी महान नैतिक अपराध के हो जाने पर शाप दिया जाता था।  
[[हिंदू धर्म]] [[ग्रंथ|ग्रंथों]] में ऋषियों द्वारा श्राप देने के अनेक प्रसंग मिलते हैं। ऋषियों के श्राप से तो पराक्रमी राजा भी घबराते थे। श्राप के कारण भगवान को भी दु:ख भोगने पड़े और मनुष्य रूप में जन्म लेना पड़ा। यहां तक की दूसरों के बुरे कर्मों का हिसाब रखने वाले [[यमराज]] भी श्राप से नहीं बच पाए। [[कृष्ण|भगवान श्रीकृष्ण]] के परिवार का अंत भी [[गांधारी]] के श्राप के कारण हुआ था। [[रामायण]], [[महाभारत]], [[शिवपुराण]], [[श्रीमद्भागवत]] आदि कई ग्रंथों में श्राप देने के अनेक प्रसंग मिलते हैं।
*इसके अनेक उदाहरण प्राचीन साहित्य में उपलब्ध हैं।  
 
*[[गौतम]] ने पतिव्रत भंग के कारण अपनी पत्नी [[अहल्या]] को शाप दिया था कि वह शिला हो जाये।  
*[[गौतम]] ने पतिव्रत भंग के कारण अपनी पत्नी [[अहल्या]] को शाप दिया था कि वह शिला हो जाये।  
*[[दुर्वासा]] ऋषि अपने क्रोधी स्वभाव के कारण शाप देने के लिए प्रसिद्ध थे।
*[[दुर्वासा]] ऋषि अपने क्रोधी स्वभाव के कारण शाप देने के लिए प्रसिद्ध थे।


;ऋषि किंदम ने क्यों दिया पाण्डु को श्राप?
[[पाण्डु|राजा पाण्डु]] एक बार वन में घूम रहे थे। तभी उन्हें हिरनों का एक जोड़ा दिखाई दिया। पाण्डु ने निशाना साधकर उन पर पांच [[बाण]] मारे, जिससे हिरन घायल हो गए। वास्तव में वह हिरन [[किंदम|ऋषि किंदम]] नामक एक ऋषि थे जो अपनी पत्नी के साथ विहार कर रहे थे। तब किंदम ऋषि ने अपने वास्तविक स्वरूप में आकर पाण्डु को श्राप दिया कि तुमने अकारण मुझ पर और मेरी तपस्नी पत्नी पर बाण चलाए हैं जब हम विहार कर रहे थे। अब तुम जब भी अपनी पत्नी के साथ सहवास करोगे तो उसी समय तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी तथा वह पत्नी तुम्हारे साथ सती हो जाएगी।
इतना कहकर किंदम ऋषि ने अपनी पत्नी के साथ प्राण त्याग दिए। ऋषि की मृत्यु होने पर पाण्डु को बहुत दु:ख हुआ। ऋषि की मृत्यु का प्रायश्चित करने के उद्देश्य से पाण्डु ने सन्यास लेने का विचार किया। जब [[कुंती]] व [[माद्री]] को यह पता चला तो उन्होंने पाण्डु को समझाया कि वानप्रस्थाश्रम में रहते हुए भी आप प्रायश्चित कर सकते हैं। पाण्डु को यह सुझाव ठीक लगा और उन्होंने वन में रहते हुए ही तपस्या करने का निश्चय किया। पाण्डु ने [[ब्राह्मण|ब्राह्मणों]] के माध्यम से यह संदेश [[हस्तिनापुर]] भी भेजा। यह सुनकर हस्तिनापुरवासियों को बड़ा दु:ख हुआ। तब [[भीष्म]] ने [[धृतराष्ट्र]] को राजा बना दिया। उधर पाण्डु अपनी पत्नियों के साथ [[गंधमादन पर्वत]] पर जाकर ऋषिमुनियों के साथ साधना करने लगे।<ref>{{cite web |url=http://balmuskan.blogspot.in/2010/12/blog-post_3393.html|title=ऋषि किंदम ने क्यों दिया पाण्डु को श्राप?|accessmonthday=5 मार्च|accessyear=2016|last= |first= |authorlink= |format= |publisher=balmuskan.blogspot|language=हिन्दी}}</ref>
;माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप
महाभारत के अनुसार, माण्डव्य नाम के एक [[ऋषि]] थे। राजा ने भूलवश उन्हें चोरी का दोषी मानकर सूली पर चढ़ाने की सजा दी। सूली पर कुछ दिनों तक चढ़े रहने के बाद भी जब उनके प्राण नहीं निकले, तो राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने ऋषि माण्डव्य से क्षमा मांगकर उन्हें छोड़ दिया।
तब ऋषि [[यमराज]] के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि मैंने अपने जीवन में ऐसा कौन-सा अपराध किया था कि मुझे इस प्रकार झूठे आरोप की सजा मिली। तब यमराज ने बताया कि जब आप 12 वर्ष के थे, तब आपने एक फतींगे की पूंछ में सींक चुभाई थी, उसी के फलस्वरूप आपको यह कष्ट सहना पड़ा।
तब ऋषि माण्डव्य ने यमराज से कहा कि 12 वर्ष की उम्र में किसी को भी धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं होता। तुमने छोटे अपराध का बड़ा दण्ड दिया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें शुद्र योनि में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। ऋषि माण्डव्य के इसी श्राप के कारण यमराज ने [[विदुर|महात्मा विदुर]] के रूप में जन्म लिया।
;[[कद्रू]] का अपने पुत्रों को श्राप
महाभारत के अनुसार, [[कश्यप|ऋषि कश्यप]] की कद्रू व [[विनता]] नाम की दो पत्नियां थीं। कद्रू सर्पों की माता थी व विनता गरुड़ की। एक बार कद्रू व विनता ने एक सफेद रंग का घोड़ा देखा और शर्त लगाई। विनता ने कहा कि ये घोड़ा पूरी तरह सफेद है और कद्रू ने कहा कि घोड़ा तो सफेद हैं, लेकिन इसकी पूंछ काली है।
कद्रू ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए अपने सर्प पुत्रों से कहा कि तुम सभी सूक्ष्म रूप में जाकर घोड़े की पूंछ से चिपक जाओ, जिससे उसकी पूंछ काली दिखाई दे और मैं शर्त जीत जाऊं। कुछ सर्पों ने कद्रू की बात नहीं मानी। तब कद्रू ने अपने उन पुत्रों को श्राप दिया कि तुम सभी [[जनमेजय]] के सर्प यज्ञ में भस्म हो जाओगे।<ref>{{cite web |url=http://hindudharamblog.blogspot.in/2016/01/blog-post_94.html|title=माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप, कद्रू का अपने पुत्रों को श्राप|accessmonthday=5 मार्च|accessyear=2016|last= |first= |authorlink= |format= |publisher=hindudharam|language=हिन्दी}}</ref>


{{प्रचार}}
{{प्रचार}}

Latest revision as of 11:02, 1 August 2017

शाप का अभिप्राय क्रोधपूर्वक किसी के अनिष्ट का उदघोष करना कहलाता है। विशेषकर ऋषि, मुनि, तपस्वी आदि के अनिष्ट शब्दों को शाप कहते हैं। किसी महान् नैतिक अपराध के हो जाने पर शाप दिया जाता था। इसके अनेक उदाहरण प्राचीन साहित्य में उपलब्ध हैं।

हिंदू धर्म ग्रंथों में ऋषियों द्वारा श्राप देने के अनेक प्रसंग मिलते हैं। ऋषियों के श्राप से तो पराक्रमी राजा भी घबराते थे। श्राप के कारण भगवान को भी दु:ख भोगने पड़े और मनुष्य रूप में जन्म लेना पड़ा। यहां तक की दूसरों के बुरे कर्मों का हिसाब रखने वाले यमराज भी श्राप से नहीं बच पाए। भगवान श्रीकृष्ण के परिवार का अंत भी गांधारी के श्राप के कारण हुआ था। रामायण, महाभारत, शिवपुराण, श्रीमद्भागवत आदि कई ग्रंथों में श्राप देने के अनेक प्रसंग मिलते हैं।

  • गौतम ने पतिव्रत भंग के कारण अपनी पत्नी अहल्या को शाप दिया था कि वह शिला हो जाये।
  • दुर्वासा ऋषि अपने क्रोधी स्वभाव के कारण शाप देने के लिए प्रसिद्ध थे।


ऋषि किंदम ने क्यों दिया पाण्डु को श्राप?

राजा पाण्डु एक बार वन में घूम रहे थे। तभी उन्हें हिरनों का एक जोड़ा दिखाई दिया। पाण्डु ने निशाना साधकर उन पर पांच बाण मारे, जिससे हिरन घायल हो गए। वास्तव में वह हिरन ऋषि किंदम नामक एक ऋषि थे जो अपनी पत्नी के साथ विहार कर रहे थे। तब किंदम ऋषि ने अपने वास्तविक स्वरूप में आकर पाण्डु को श्राप दिया कि तुमने अकारण मुझ पर और मेरी तपस्नी पत्नी पर बाण चलाए हैं जब हम विहार कर रहे थे। अब तुम जब भी अपनी पत्नी के साथ सहवास करोगे तो उसी समय तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी तथा वह पत्नी तुम्हारे साथ सती हो जाएगी। इतना कहकर किंदम ऋषि ने अपनी पत्नी के साथ प्राण त्याग दिए। ऋषि की मृत्यु होने पर पाण्डु को बहुत दु:ख हुआ। ऋषि की मृत्यु का प्रायश्चित करने के उद्देश्य से पाण्डु ने सन्यास लेने का विचार किया। जब कुंतीमाद्री को यह पता चला तो उन्होंने पाण्डु को समझाया कि वानप्रस्थाश्रम में रहते हुए भी आप प्रायश्चित कर सकते हैं। पाण्डु को यह सुझाव ठीक लगा और उन्होंने वन में रहते हुए ही तपस्या करने का निश्चय किया। पाण्डु ने ब्राह्मणों के माध्यम से यह संदेश हस्तिनापुर भी भेजा। यह सुनकर हस्तिनापुरवासियों को बड़ा दु:ख हुआ। तब भीष्म ने धृतराष्ट्र को राजा बना दिया। उधर पाण्डु अपनी पत्नियों के साथ गंधमादन पर्वत पर जाकर ऋषिमुनियों के साथ साधना करने लगे।[1]

माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप

महाभारत के अनुसार, माण्डव्य नाम के एक ऋषि थे। राजा ने भूलवश उन्हें चोरी का दोषी मानकर सूली पर चढ़ाने की सजा दी। सूली पर कुछ दिनों तक चढ़े रहने के बाद भी जब उनके प्राण नहीं निकले, तो राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने ऋषि माण्डव्य से क्षमा मांगकर उन्हें छोड़ दिया। तब ऋषि यमराज के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि मैंने अपने जीवन में ऐसा कौन-सा अपराध किया था कि मुझे इस प्रकार झूठे आरोप की सजा मिली। तब यमराज ने बताया कि जब आप 12 वर्ष के थे, तब आपने एक फतींगे की पूंछ में सींक चुभाई थी, उसी के फलस्वरूप आपको यह कष्ट सहना पड़ा। तब ऋषि माण्डव्य ने यमराज से कहा कि 12 वर्ष की उम्र में किसी को भी धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं होता। तुमने छोटे अपराध का बड़ा दण्ड दिया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें शुद्र योनि में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। ऋषि माण्डव्य के इसी श्राप के कारण यमराज ने महात्मा विदुर के रूप में जन्म लिया।

कद्रू का अपने पुत्रों को श्राप

महाभारत के अनुसार, ऋषि कश्यप की कद्रू व विनता नाम की दो पत्नियां थीं। कद्रू सर्पों की माता थी व विनता गरुड़ की। एक बार कद्रू व विनता ने एक सफेद रंग का घोड़ा देखा और शर्त लगाई। विनता ने कहा कि ये घोड़ा पूरी तरह सफेद है और कद्रू ने कहा कि घोड़ा तो सफेद हैं, लेकिन इसकी पूंछ काली है। कद्रू ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए अपने सर्प पुत्रों से कहा कि तुम सभी सूक्ष्म रूप में जाकर घोड़े की पूंछ से चिपक जाओ, जिससे उसकी पूंछ काली दिखाई दे और मैं शर्त जीत जाऊं। कुछ सर्पों ने कद्रू की बात नहीं मानी। तब कद्रू ने अपने उन पुत्रों को श्राप दिया कि तुम सभी जनमेजय के सर्प यज्ञ में भस्म हो जाओगे।[2]


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऋषि किंदम ने क्यों दिया पाण्डु को श्राप? (हिन्दी) balmuskan.blogspot। अभिगमन तिथि: 5 मार्च, 2016।
  2. माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप, कद्रू का अपने पुत्रों को श्राप (हिन्दी) hindudharam। अभिगमन तिथि: 5 मार्च, 2016।