सती संतोसी सावधान -कबीर: Difference between revisions
Jump to navigation
Jump to search
[unchecked revision] | [unchecked revision] |
('{| style="background:transparent; float:right" |- | {{सूचना बक्सा कविता |चित्र=Kabirdas-2.jpg |...' के साथ नया पन्ना बनाया) |
No edit summary |
||
Line 30: | Line 30: | ||
{{Poemopen}} | {{Poemopen}} | ||
<poem> | <poem> | ||
सती | सती संतोसी सावधान, सबदभेद सुबिचार। | ||
सतगुर के परसाद तैं, सहज शील मत सार॥ | सतगुर के परसाद तैं, सहज शील मत सार॥ | ||
</poem> | </poem> |
Latest revision as of 12:20, 11 January 2014
| ||||||||||||||||||||
|
सती संतोसी सावधान, सबदभेद सुबिचार। |
अर्थ सहित व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि जो साधक सत्यनिष्ठ है, सहनशील है और अवधानपूर्वक सभी ध्वनियों के रहस्य पर भली-भाँति विचार करता है, वह सत्गुरु के कृपा से उस सहज अवस्था को प्राप्त करता है जो सब मतों का सार है।
|
|
|
|
|
टीका टिप्पणी और संदर्भ
बाहरी कड़ियाँ
संबंधित लेख