महाभारत आदि पर्व अध्याय 41 श्लोक 1-22

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
Revision as of 08:58, 8 August 2015 by व्यवस्थापन (talk | contribs) (1 अवतरण)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

एकचत्‍वारिंश (41) अध्‍याय: आदि पर्व (आस्तीक पर्व)

महाभारत: आदि पर्व: एकचत्‍वारिंश अध्‍याय: श्लोक 1-22 का हिन्दी अनुवाद

उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनकजी ! कृश के ऐसा कहने पर तेजस्वी श्रृंगी ऋषि को बड़ा क्रोध हुआ। अपने पिता के कंधे पर मृतक (सर्प) रखे जाने की बात सुनकर वह रोष और शोक से संतप्त हो उठा। उसने कृश की ओर देखकर मधुर वाणी में पूछा—‘भैया ! बताओ तो, आज मेरे पिता अपने कंधे पर मृतक कैसे धारण कर रहे हैं?’ कृश ने कहा—तात ! आज राजा परीक्षित अपने शिकार के पीछे दौड़ते हुए आये थे। उन्होंने तुम्हारे पिता के कंधे पर मृतक साँप रख दिया है। श्रृंगी बोला—कृश ! ठीक-ठीक बताओ, मेरे पिता ने उस दुरात्मा राजा का क्या अपराध किया था? फिर मेरी तपस्या का बल देखना। कृश ने कहा—अभिमन्युपुत्र राजा परीक्षित अकेले शिकार खेलने आये थे। उन्होंने एक शीघ्रगामी हिंसक मृग (पशु) को बाण से बींध डाला; किंतु उस विशाल वन में विचरते हुए राजा को वह मृग कहीं दिखायी न दिया। फिर उन्होंने तुम्हारे मौनी पिता को देखकर उसके विषय में पूछा। राजा भूख-प्यास और थकावट से व्याकुल थे। इधर तुम्हारे पिता काठ की भाँति अविचल भाव से बैठे थे। राजा ने बार-बार तुम्हारे पिता से उस भागे हुए मृग के विषय में प्रश्न किया, परंतु मौन-व्रर्तावलम्बी होने के कारण उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया। तब राजा ने धनुष की नोक से एक मरा हुआ साँप उठाकर उनके कंधे पर डाल दिया। श्रृंगिन ! संयमपूर्वक व्रत का पालन करने वाले तुम्हारे पिता अभी उस अवस्था में बैठे हैं और वे राजा परीक्षित अपनी राजधानी हस्तिनापुर को चले गये हैं। उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनकजी ! इस प्रकार अपने पिता के कंधे पर मृतक सर्प के रखे जाने का समाचार सुनकर ऋषिकुमार श्रृंगी क्रोध से जल उठा। कोप से उसकी आँखें लाल हो गयीं। वह तेजस्वी बालक रोष के आवेश में आकर प्रचण्ड क्रोध के वेग से युक्त हो गया था। उसने जल से आचमन करके हाथ में जल लेकर उस समय राजा परीक्षित को इस प्रकार शाप दिया। श्रृंगी बोल—जिस पापात्मा नरेश ने वैसे धर्म-संकट में पड़े हुए मेरे बूढ़े पिता के कंधे पर मरा साँप रख दिया है, ब्राह्मणों का अपमान करने वाले उस कुरूकुल कलंक पापी परीक्षित को आज से सात रात के बाद प्रचण्ड तेजस्वी पन्नगोत्तम तक्षक नामक विषैला नाग अत्यन्त कोप में भरकर मेरे वाक्यबल से प्रेरित हो यमलोक पहुँचा देगा। उग्रश्रवाजी कहते हैं—इस प्रकार अत्यन्त क्रोधपूर्वक शाप देकर श्रृंगी अपने पिता के पास आया, जो उस समय गोष्ठ में कंधे पर मृतक सर्प धारण किये बैठे थे। कंधे पर रखे हुए मुर्दे साँप से युक्त पिता को देखकर श्रृंगी पुनः क्रोध से व्याकुल हो उठा। वह दुःख से आँसू बहाने लगा। उसने पिता से कहा—‘तात ! उस दुरात्मा राजा परीक्षित द्वारा अपने इस अपमान की बात सुनकर मैंने उसे क्रोधपूर्वक जैसा शाप दिया है, वह कुरूकुलाधम वैसे ही भयंकर शाप के योग्य हैं। आज के सातवें दिन नागराज तक्षक उस पापी को अत्यन्त भयंकर यमलोक में पहुँचा देगा।’ब्रह्मन ! इस प्रकार क्रोध में भरे हुए पुत्र से उसके पिता शमीक ने कहा।। शमीक बोले—वत्स ! तुमने शाप देकर मेरा प्रिय कार्य नहीं किया है। यह तपस्वियों का धर्म नहीं है। हम लोग उन महाराज परीक्षित के राज्य में निवास करते हैं और उनके द्वारा न्यायपूर्वक हमारी रक्षा होती है। अतः उनको शाप देना मुझे पसंद नहीं है। हमारे जैसे साधु पुरुषों को तो वर्तमान राजा परीक्षित के अपराध को सब प्रकार से क्षमा ही करना चाहिये। बेटा ! यदि धर्म को नष्ट किया जाये तो वह मनुष्य का नाश कर देता है, इसमें संशय नहीं है। यदि राजा रक्षा न करे तो हमें भारी कष्ट पहुँच सकता है।


« पीछे आगे »

टीका टिप्पणी और संदर्भ

संबंधित लेख

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः