महाभारत कर्ण पर्व अध्याय 41 श्लोक 78-87

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एकचत्वारिंश (41) अध्याय: कर्ण पर्व

महाभारत: कर्ण पर्व: एकचत्वारिंश अध्याय: श्लोक 78-87 का हिन्दी अनुवाद

कर्ण ! पुनः तुम्हारे गुरु परशुराम जी ने भी उस दिन राजसभा में अर्जुन और श्रीकृष्ण के पुरातन प्रभाव का वर्णन किया था। तुमने समस्त भूपालों के समीप द्रोणाचार्य और भीष्म की कही हुई बातें सदा सुनी हैं। वे दोनों श्रीकृष्ण और अर्जुन को अवध्य बताया करते थे। मैं कहाँ तक गिन-गिनकर बताऊँ कि किन-किन गुणों के कारण अर्जुन तुमसे बढ़े-चढ़े हैं। जैसे ब्राह्मण समस्त प्राणियों से श्रेष्ठ हैं,उसी प्रकार अर्जुन तुमसे रेष्ठ हैं। तुम इसी समय प्रधान रथ पर बैठे हुए वसुदेननन्दन श्रीकृष्ण तथा कुन्ती कुमार पाण्डुपुत्र अर्जुन को देखोगे। जैसे कौआ उत्तम बुद्धि का आश्रय लेकर चक्रांग की शरण में गया था,उसी प्रकार तुम भी वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुन की शरण लो। कर्ण ! जब तुम युद्ध स्थल में पराक्रमी श्रीकृष्ण और अर्जुन को एक रथ पर बैइे देखोगे,तब ऐसी बातें नहीं बोल सकोगे। जब अर्जुन अपने सैंकड़ों बाणों द्वारा तुम्हारा घमंड चूर-चूर कर देंगे,तब तुम स्वयं ही देख लोगे कि तुममें और अर्जुन में कितना अन्तर है ?। जैसे जुगनू प्रकाशमान सूर्य और चन्द्रमा का तिरस्कार करे,उसी प्रकार तुम देवताओं,असुरों और मनुष्यों में भी विख्यात उन दोनों नरश्रेष्ठ वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन का मूर्खतावश अपमान न करो। जैसे सूर्य और चन्द्रमा हैं,वैसे श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं। वे दोनों अपने तेज से सर्वत्र विख्यात हैं;परंतु तुम तो मनुष्यों में जुगनू के ही समान हो। सूतपुत्र ! तुम महात्मा पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुन को ऐसा जानकर उनका अपमान न करो। बढ़-बढ़कर बातें बनाना बंद करके चुपचाप बैठे रहो।

इस प्रकार श्रीमहाभारत में कर्ण पर्व में कर्ण-शल्य संवाद के अन्तर्गत हंस काकीयोपाख्यान विषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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