महाभारत आश्‍वमेधिक पर्व अध्याय 7 श्लोक 1-18

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सप्तम (7) अध्याय: आश्‍वमेधिक पर्व (अश्वमेध पर्व)

महाभारत: आश्‍वमेधिक पर्व: सप्तम अध्याय: श्लोक 1-18 का हिन्दी अनुवाद

संवर्त और मरुत्त की बातचीत, मरुत्त के विशेष आग्रह पर संवर्त का यज्ञ कराने की स्वीकृति देना

संवर्त बोले-राजन्! तुमने मुझे कैसे पहचाना है? किसने तुम्हें मेरा परिचय दिया है? यदि मेरा प्रिय चाहते हो तो यह सब मुझे ठीक-ठीक बताओं। यदि सच-सच ता दोगे तो तुम्हारे सारे मनोरथ पूर्ण होंगे और यदि झूठ बोलोगे तो तुम्हारे मस्तक के सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे। मरूत्त ने कहा- मुने ! भ्रमणशील नारदजी ने रास्ते में मुझे आपका परिचय दिया और पता बताया। आप मेरे गुरू अंगिरा के पुत्र हैं, यह जानकर मुझे प्रसन्नता हुई है। संवर्त बोले- राजन्! ठीक कहते हो, नारदको यह मालूम है कि यज्ञ कराना जानता हूँ और गुप्त वेष में घूम रहा हूँ। मरूत्तने कहा- मुने! मुझे आपका परिचय और पता बताकर देवर्षिशिरोमणि नारद मुझे जाने की आज्ञा दे स्वयं अग्नि में प्रवेश कर गये थे। व्यासजी कहते हैं- राजन्! राजा की यह बात सुनकर संवर्तको बड़ी प्रसन्नता हुई और बोले-‘इतना तो मैं भी कर सकता हूँ।
राजन्! वे उन्मत वेषधारी ब्राह्मण देवता मरूत्त को अपनी रूखी वाणीद्वारा बारंबार फटकारते हुए-से बोले।‘नरेश्वर! मैं तो वायु-प्रधान-बावला हूँ, अपने मनकी मौजसे ही सब काम करता हूँ, मेरा रूप भी विकृत है। अत: मुझ-जैसे व्यक्ति से तुम क्यों यज्ञ कराना चाहते हो? मेरे भाई बृहस्पति इस कार्य में पूर्णत: समर्थ हैं। आजकल इन्द्र के साथ उनका मेलजोल बढ़ा हुआ है। वे उनके या कराने में लगे रहते है। अत: उन्ही से अपने सारे यज्ञकर्म कराओ। घर-गृहस्थी का सारा, सामान, यजमान तथा गृहदेवाताओं के पूजन आदि कर्म-इन सबाको इस समय मेरे बड़े भाई ने अपने अधिकार में कर लिया है। मेरे पास तो केवल मेरा एक शरीद ही छोड़ रखा है। अविक्षित् कुमार! मैं उनकी आज्ञा प्राप्त किये बिना कभी किसी तरह भी तुम्हारा यज्ञ नहीं करा सकता क्योंकि वे मेरे परम पूजनीय भाई है। अत: तुम बृहस्पति के पास जाओ और उनकी आज्ञा लेकर आओ। उस दशा में यदि तुम यज्ञ कराना चाहो तो मैं यज्ञ करह्वा दूँगा।
मरूत्त ने कहा- संवर्तजी ! मैं पहले बृहस्पतिजी के ही पस गया था। वहाँ का समाचार बताता हूँ, सुनिये। वे इन्द्र को प्रसन्न रखने की इच्छा से अब मुझे अपना यजमान बनाना नहीं चाहते हैं।उन्होनें स्पष्ट कह दिया हे कि अमर यजमान पाकर अब मैं मरणधर्मा मनुष्य का यज्ञ नहीं कराऊँगा। साथ ही इन्द्रने मना भी किया है कि आप मरूत्त का यज्ञ न कराइयेगा, क्यांकि ब्रह्मन्! वह राजा सदा मेरे साथ ईर्ष्या रखता है। इन्द्र की इस बात को आपके भाई ने ‘एवमस्तु’ कहकर स्वीकार कर लिया है। मुनिप्रवर! मैं बड़े प्रेम से उनके पास गया था, परंतु वे देवराज इन्द्र का आश्रय लेकर मुझे अपना यजमान बाना ही नहीं चाहते है। अत: मेरी इच्छा यह है कि मै सर्वस्व देकरभी आपसे ही यज्ञ कराऊँ और आपके द्वारा सम्पादित गुणों के प्रभाव से इन्द्र का भी मात कर दूँ। ब्रह्मन्! अब बृहस्पति के पास जाने का मेरा विचार नहीं है क्योंकि बिना अपराध के ही उन्होंने मेरी प्रार्थना अस्वीकृत कर दी है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

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