अनल आकासाँ घर किया -कबीर
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अनल आकासाँ घर किया, मद्धि निरन्तर बास। |
अर्थ सहित व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि हे मानव! एक पक्षी अन्तरिक्ष में अपना नीड़ बनाता है और आकाश तथा पृथ्वी भूलोक और स्वर्गलोक के बीच में ही निरन्तर वास करता है। यद्यपि अन्तरिक्ष में कोई प्रत्यक्ष आश्रय नहीं है, तथापि अपने दृढ़ विश्वास से वह वहाँ स्थित रहता है। ठीक इसी प्रकार साधक को द्वन्द्वों से अलग रहकर ‘सहज-समरस’ अवस्था में स्थित रहना चाहिए।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
बाहरी कड़ियाँ
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