धरती उरु असमान बिचि -कबीर
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धरती उरु असमान बिचि, दोइ तूँबड़ा अबध। |
अर्थ सहित व्याख्या
कबीरदास कहते हैं कि हे मानव! पृथ्वी और आकाश के बीच में द्वैत-दृष्टि का तुंबा अविनाश्य है। उसका सरलता से विनाश नहीं किया जा सकता। उसी द्वैत के कारण छहों दर्शन और चौरासी सिद्ध संशय में पड़े रहते हैं तथा सत्य का अनुशरण नहीं कर पाते।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
बाहरी कड़ियाँ
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