जब दुपहरी ज़िंदगी पर -गजानन माधव मुक्तिबोध
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कवि
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गजानन माधव 'मुक्तिबोध'
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जन्म
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13 नवंबर, 1917
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जन्म स्थान
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श्यौपुर, ग्वालियर
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मृत्यु
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11 सितंबर 1964
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मृत्यु स्थान
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दिल्ली
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मुख्य रचनाएँ
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कविता संग्रह- चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी भूरी खाक धूल कहानी संग्रह- काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी आलोचना- कामायनी : एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्मसंघर्ष, नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, समीक्षा की समस्याएँ, एक साहित्यिक की डायरी रचनावली- मुक्तिबोध रचनावली (6 खंडों में)
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इन्हें भी देखें
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कवि सूची, साहित्यकार सूची
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गजानन माधव मुक्तिबोध की रचनाएँ
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जब दुपहरी ज़िंदगी पर गजानन माधव मुक्तिबोध की अप्रकाशित कविता है जिसका रचनाकाल लगभग 1948-50 है।
जब दुपहरी ज़िन्दगी पर रोज सूरज
एक जॉबर-सा
बराबर रौब अपना गांठता-सा है
कि रोज़ी छूटने का डर हमें
फटकारता-सा काम दिन का बांटता-सा है
अचानक ही हमें बेखौफ करती तब
हमारी भूख की मुस्तैद आँखेंं ही
थका-सा दिल बहादुर रहनुमाई
पास पा के भी
बुझा-सा ही रहा इस ज़िन्दगी के कारखाने में
उभरता भी रहा पर बैठता भी तो रहा
बेरुह इस काले ज़माने में
जब दुपहरी ज़िन्दगी को रोज सूरज
जिन्न-सा पीछे पड़ा
रोज की इस राह पर
यों सुबह-शाम खयाल आते हैं....
आगाह करते से हमें.... ?
या बेराह करते से हमें ?
यह सुबह की धूल सुबह के इरादों-सी
सुनहली होकर हवा में ख्वाब लहराती
सिफत-से जिन्दगी में नई इज्जत, आब लहराती
दिलों के गुम्बजों में
बन्द बासी हवाओं के बादलों को दूर करती-सी
सुबह की राह के केसरिया
गली का मुंह अचानक चूमती-सी है
कि पैरों में हमारे नई मस्ती झूमती-सी है
सुबह की राह पर हम सीखचों को भूल इठलाते
चले जाते मिलों में मदरसों में
फ़तह पाने के लिए
क्या फ़तह के ये खयाल खयाल हैं
क्या सिर्फ धोखा है ?....
सवाल है।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
बाहरी कड़ियाँ
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