बुंदेलखंड का इतिहास: Difference between revisions
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मध्यकाल से पहले बुंदेलखंड शब्द इस नाम से प्रयोग में नहीं आया है। आधुनिक युग में ही इसके अन्य नाम और उनके उपयोग हुए हैं। बीसवीं शती के प्रारंभिक दशक में बुंदेलखंड का इतिहास महाराज रायबहादुर सिंह ने लिखा था। इसमें बुंदेलखंड के अन्तर्गत आने वाली जागीरों और उनके शासकों के नामों की गणना मुख्य थी। पन्ना दरबार के प्रसिद्ध कवि 'कृष्ण' तथा दीवान प्रतिपाल सिंह ने अपने स्रोतों से बुंदेलखंड का इतिहास लिखा परन्तु वे विद्वान भी सामाजिक सांस्कृतिक चेतनाओं के प्रति उदासीन रहे। | मध्यकाल से पहले बुंदेलखंड शब्द इस नाम से प्रयोग में नहीं आया है। आधुनिक युग में ही इसके अन्य नाम और उनके उपयोग हुए हैं। बीसवीं शती के प्रारंभिक दशक में बुंदेलखंड का इतिहास महाराज रायबहादुर सिंह ने लिखा था। इसमें बुंदेलखंड के अन्तर्गत आने वाली जागीरों और उनके शासकों के नामों की गणना मुख्य थी। पन्ना दरबार के प्रसिद्ध कवि 'कृष्ण' तथा दीवान प्रतिपाल सिंह ने अपने स्रोतों से बुंदेलखंड का इतिहास लिखा परन्तु वे विद्वान भी सामाजिक सांस्कृतिक चेतनाओं के प्रति उदासीन रहे। | ||
==पौराणिक इतिहास== | |||
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==मौर्यकाल== | |||
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====वाकाटक और गुप्तशासन==== | |||
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*बुंदेलखंड के इतिहास में मराठों का शासन बुंदेलखंड पर छत्रसाल के समय से ही प्रारंभ हो गया था। | |||
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*सन [[1847]] में महाराज [[रणजीत सिंह]] के बाद उनके पुत्र को पंजाब का राजा बनाया गया था। | |||
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छत्रसाल के समय तक बुंदेलखंड की सीमायें अत्यंत व्यापक थीं। | |||
*इस प्रदेश में उत्तर प्रदेश के [[झाँसी]], हमीरपुर, [[जालौन]], [[बांदा]]। | |||
*[[मध्यप्रदेश]] के [[सागर]], [[जबलपुर]], [[नरसिंहपुर]], [[होशंगाबाद]], [[मण्डला]]। | |||
*मालवा संघ के [[शिवपुरी]], [[कटेरा]], [[पिछोर]], [[कोलारस]], [[भिण्ड]], [[लहार]] और मोण्डेर के ज़िले और परगने शामिल थे। | |||
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Revision as of 06:55, 1 November 2010
बुंदेलों का पूर्वज पंचम बुंदेला था। बुंदेलखंड बुंदेल राजपूतों के नाम पर प्रसिद्ध है जिनके राज्य की स्थापना 14वीं शती में हुई थी। इससे पूर्व यह प्रदेश जुझौती अथवा जेजाकभुक्ति नाम से जाना जाता था और चन्देलों द्वारा नवीं से चौदहवीं शताब्दी तक शासित होता रहा। राज्य के प्रमुख नगर थे-
- खजुराहो, ज़िला छतरपुर- खजुराहो में आज भी अनेक भव्य वास्तुकृतियाँ अवशिष्ट हैं।
- महोवा-ज़िला, हमीरपुर तथा कालिंजर- कालिंजर में राज्य की सुरक्षा के लिए एक मज़बूत क़िला था। शेरशाह इस क़िले की घेराबन्दी के समय 1545 ई. के समय यहीं मारा गया था।
बुंदेली माटी में जन्मी अनेक विभूतियों ने न केवल अपना बल्कि इस अंचल का नाम ख़ूब रोशन किया और इतिहास में अमर हो गए। आल्हा-ऊदल, ईसुरी, कवि पद्माकर, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, डॉ. हरिसिंह गौर आदि अनेक महान विभूतियाँ इसी क्षेत्र से संबद्ध हैं। अनेक इतिहास पुरुषों और आल्हा की बाबन लड़ाईयाँ बुंदेलखंड का प्रमाण हैं। यहाँ के वीर योद्धा बुन्देला कहलाए, बुन्देली यहाँ की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना की बोली रही है। यहाँ के लोग बुन्देली बोली बोलने के कारण ही बुन्देला कहलाए। बुन्देलखण्ड के रुपायन का गहरा सम्बन्ध महाराजा छत्रसाल के महत्त्वपूर्ण स्थान जेजाकभुक्ति से है।
मध्यकाल से पहले बुंदेलखंड शब्द इस नाम से प्रयोग में नहीं आया है। आधुनिक युग में ही इसके अन्य नाम और उनके उपयोग हुए हैं। बीसवीं शती के प्रारंभिक दशक में बुंदेलखंड का इतिहास महाराज रायबहादुर सिंह ने लिखा था। इसमें बुंदेलखंड के अन्तर्गत आने वाली जागीरों और उनके शासकों के नामों की गणना मुख्य थी। पन्ना दरबार के प्रसिद्ध कवि 'कृष्ण' तथा दीवान प्रतिपाल सिंह ने अपने स्रोतों से बुंदेलखंड का इतिहास लिखा परन्तु वे विद्वान भी सामाजिक सांस्कृतिक चेतनाओं के प्रति उदासीन रहे।
पौराणिक इतिहास
मौर्यकाल
वाकाटक और गुप्तशासन
कलचुरियों का शासन
चन्देलों का शासन
महोबा चन्देलों का केन्द्र था। गहरवारों ने इस पर हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद अधिकार कर लिया था। गहरवारों को पराजित करने वाले परिहार थे। चन्देलों की उत्पति विवादास्पद है। किवदन्ती के अनुसार हेमावती के पुत्र का चन्द्रमा से उत्पन्न होना चन्देल कहलाया है।
बुंदेलों का शासन
बुंदेल क्षत्रीय जाति के शासक थे तथा सुदूर अतीत में सूर्यवंशी राजा मनु से संबन्धित हैं। इक्ष्वाकु के बाद रामचन्द्र जी के पुत्र लव से उनके वंशजो की परंपरा आगे बढ़ाई गई है और गहरवार शाखा के कृर्त्तराज को इसी में काशी के साथ जोड़ा गया है। लव के अलावा कृर्त्तराज के उत्तराधिकारियों में गगनसेन, कनकसेन, प्रद्युम्न आदि के नाम ही महत्वपूर्ण हैं।
ओरछा के बुंदेला
ओरछा के शासकों का युगारंभ रुद्रप्रताप के साथ ही होता है। रुद्रप्रताप सिकन्दर और इब्राहिम लोदी दोनों से लड़ा था। सन 1530 में ओरछा की स्थापना हुई थी। रुद्रप्रताप बड़ा नीतिज्ञ था, उसने मैत्री संधी ग्वालियर के तोमर नरेशों से की थी। उसकी मृत्यु के बाद भारतीचन्द्र (1531ई.-1554ई.) गद्दी पर बैठा था।
मराठों का शासन
- बुंदेलखंड के इतिहास में मराठों का शासन बुंदेलखंड पर छत्रसाल के समय से ही प्रारंभ हो गया था।
- उस समय मराठों को ओरछा का शासक भी चौथ देता था।
बुंदेलखंड में राजविद्रोह
- सन 1847 में महाराज रणजीत सिंह के बाद उनके पुत्र को पंजाब का राजा बनाया गया था।
- इसीलिए यह वर्ष अंग्रेज़ों के लिए उत्तम सिद्ध हुआ था क्योंकि लार्ड डलहौज़ी इस समय गवर्नर जनरल थे और उन्होंने दिलीपसिंह को अयोग्य शासक बताकर पंजाब पर कब्ज़ा जमा लिया था।
अंग्रेज़ी राज्य में विलयन
छत्रसाल के समय तक बुंदेलखंड की सीमायें अत्यंत व्यापक थीं।