उज्ज्वलनीलमणि

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उज्ज्वलनीलमणि भक्तिरसामृतसिन्धु का परिशिष्ट है। परिशिष्ट होते हुए भी यह गौड़ीय वैष्णव साहित्य का मुकुटमणि है। इसमें रूप गोस्वामी ने साधारण अलंकार शास्त्र की परिभाषा तो ग्रहण की है, पर यह साधारण अलंकार शास्त्र से बहुत भिन्न है। इसमें उन्होंने मधुरारति का मौलिक विश्लेषण किया है। प्रेमवस्तु का ऐसा सूक्ष्म विश्लेषण और कहीं नहीं है। भक्तिरस के समुद्र का मन्थन कर रूप गोस्वामी ने उज्ज्वलनीलमणि - तुल्य मधुर या उज्ज्वल रस का आहरण किया है, इसलिए इसका नाम उज्ज्वलनीलमणि रखा है। उज्ज्वल रस अति गंभीर और रहस्यमय है। स्थूल बुद्धि के विषयानुरक्त व्यक्ति इसमें काम बुद्धि का आरोपण कर अपराध के भागी हो सकते हैं। इसलिए रूपगोस्वामी ने भक्तिरसामृतासिन्धु में इसका संक्षेप में वर्णन किया है और उज्ज्वलनीलमणि के रूप में पृथम ग्रन्थ की रचना कर उसमें इसका विस्तार से वर्णन किया है। उज्ज्वलनीलमणि के शेष में इसका रचना काल नहीं दिया है। पर इसमें भक्तिरसामृतसिन्धु उद्धत है और 1554 ई. में रचित वृहद - वैष्णव - तोषणी में उज्ज्वलनीलमणि उद्धत है। इसलिये यह निश्चित है कि इसकी रचना सनृ 1541 और सन् 1554 के बीच किसी समय हुई। इसकी तीन टीकाएं हैं-

  1. श्रीजीव गोस्वामी की 'लोचनरोचनी',
  2. श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती की 'आनन्द-चन्द्रिका' और
  3. कविराज गोस्वामी के शिष्य श्रीविष्णु दास गोस्वामी की 'स्वात्मप्रबोधिनी'।
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