Difference between revisions of "शेरशाह सूरी"

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(सन् 1540 − सन् 1545)<br />
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(सन 1540−सन 1545)<br />
शेरशाह सूरी का नाम फ़रीद ख़ाँ था। वह वैजवाड़ा (होशियारपुर 1472 ई.) में अपने पिता हसन की अफ़ग़ान पत्‍नी से उत्पन्न था। उसका पिता हसन बिहार के सासाराम का ज़मींदार था।
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'''शेरशाह सूरी''' के बचपन का नाम 'फ़रीद ख़ाँ' था। वह वैजवाड़ा (होशियारपुर 1472 ई.) में अपने पिता 'हसन ख़ाँ' की [[अफ़ग़ान]] पत्‍नी से उत्पन्न था। उसका पिता हसन, [[बिहार]] के [[सासाराम]] का ज़मींदार था। फ़रीद ख़ाँ ने अपने अधिकारों की रक्षा एवं शक्ति के विस्तार के लिए [[बिहार]] के सुल्तान मुहम्मद शाह नुहानी के यहाँ नौकरी कर ली। एक बार शिकार पर गये नुहानी के साथ फ़रीद ख़ाँ ने एक शेर को तलवार के एक ही बार से मार दिया। उसकी इस बहादुरी से प्रसन्न होकर मुहम्मद शाह ने उसे ‘शेर ख़ाँ’ की उपाधि प्रदान की। 1529 ई. में [[बंगाल]] के शासक नुसरतशाह को परास्त करके शेरखां ने हजरत-ए-आला की उपाधि धारण की। 1530 ई. में शेरखां ने चुनार के किलेदार ताज खां की विधवा लाड़मलिका से विवाह करके चुनार का किला तथा बहुत सम्पत्ति प्राप्त की। [[हुमायूँ]] को हराने वाला शेर ख़ाँ, 'सूर' नाम के क़बीले का [[पठान]] सरदार था। वह 'शेरशाह' के नाम से बादशाह हुआ। उसने [[आगरा]] को अपनी राजधानी बनाया था।
[[हुमायूँ]] को हराने वाला शेर ख़ाँ 'सूर' नाम के क़बीले का पठान सरदार था। वह 'शेरशाह' के नाम से बादशाह हुआ। उसने [[आगरा]] को राजधानी बनाया था। [[दिल्ली]] के सुल्तानों की हिन्दू विरोधी नीति के ख़िलाफ़ उसने हिन्दुओं से मित्रता की नीति अपनायी। जिससे उसे अपनी शासन व्यवस्था सृदृढ़ करने में सहायता मिली। उसका [[दीवान]] और सेनापति एक हिन्दू सरदार था, जिसका नाम [[हेमू]] (हेमचंद्र)था। उसकी सेना में हिन्दू वीरों की संख्या बहुत थी। उसने अपने राज्य में शांति कर जनता को सुखी और समृद्ध बनाने के प्रयास किये। उसने यात्रियों और व्यापारियों की सुरक्षा का प्रबंध किया। लगान और [[मालगुज़ारी]] वसूल करने की संतोषजनक व्यवस्था की। शेरशाह सूरी के फ़रमान फ़ारसी के साथ नागरी अक्षरों में भी होते थे। वह पहला बादशाह था, जिसने बंगाल के सोनागाँव से सिंध नदी तक दो हज़ार मील लंबी पक्की सड़क बनवाई थी। उस सड़क पर घुड़सवारों द्वारा डाक लाने−ले−जाने की व्यवस्था थी। यह मार्ग उस समय 'सड़क-ए-आज़म' कहलाता था। बंगाल से पेशावर तक की यह सड़क 500 कोस (शुद्ध= [[क्रोश]]) या 2500 किलो मीटर लम्बी थी। शेरशाह का भतीजा [[अदली]] था, जो शेरशाह के पुत्र और उत्तराधिकारी इस्लामशाह के बाद 1554 ई. में गद्दी पर बैठा।
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==पिता का व्यवहार==
==बचपन==
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'''हसन ख़ाँ के आठ लड़के थे'''। फ़रीद ख़ाँ और निज़ाम ख़ाँ एक ही अफ़ग़ान माता से पैदा हुए थे। अली और यूसुफ एक माता से। ख़ुर्रम (कुछ ग्रंथों में यह नाम मुदहिर है) और शाखी ख़ाँ एक अन्य माँ से और सुलेमान और अहमद चौथी माँ से उत्पन्न हुए थे। [[चित्र:Shershah Tomb2.jpg|thumb|200px|left|शेरशाह सूरी का मक़बरा, सासाराम बिहार]] फ़रीद की माँ बड़ी सीधी-सादी, सहनशील और बुद्धिमान थी। फ़रीद के पिता ने इस विवाहिता पत्नी के अतिरिक्त अन्य तीन दासियों को हरम में रख लिया था। बाद में इन्हें पत्नी का स्थान प्राप्त हुआ। फ़रीद और निज़ाम के अतिरिक्त शेष छह पुत्र इन्हीं की संतान थे। कुछ समय बाद हसन ख़ाँ, फ़रीद और निज़ाम की माँ से उदासीन और दासियों के प्रति आसक्त रहने लगा। वह सुलेमान और अहमद ख़ाँ की माँ के प्रति विशेष आसक्त था। वह इसे अधिक चाहने लगा था। हसन की यह चहेती (सुलेमान और अहमद ख़ाँ की माँ) फ़रीद और निज़ाम की माँ से जलती थी, क्योंकि सबसे बड़ा होने के कारण फ़रीद जागीर का हकदार था। इस परिस्थिति में फ़रीद का दुखी होना स्वाभाविक ही था। पिता उसकी ओर से उदासीन रहने लगा।
हसन ख़ाँ के आठ लड़के थे। फ़रीद ख़ाँ और निज़ाम ख़ाँ एक ही अफ़ग़ान माता से पैदा हुए थे। अली और यूसुफ एक मां से। ख़ुर्रम (कुछ ग्रंथों में यह नाम मुदहिर है) और शाखी ख़ाँ एक अन्य मां से और सुलेमान और अहमद चौथी मां से उत्पन्न हुए थे। फ़रीद की मां बड़ी सीधी-सादी, सहनशील और बुद्धिमान थी। फ़रीद के पिता ने इस विवाहिता पत्नी के अतिरिक्त अन्य तीन दासियों को हरम में रख लिया था। बाद में इन्हें पत्नी का स्थान प्राप्त हुआ। फ़रीद और निज़ाम के अतिरिक्त शेष छह पुत्र इन्हीं की संतान थे। कुछ समय बाद हसन ख़ाँ, फ़रीद और निज़ाम की मां से उदासीन और दासियों के प्रति आसक्त रहने लगा। वह सुलेमान और अहमद ख़ाँ की मां के प्रति विशेष आसक्त था। वह इसे अधिक चाहने लगा था। इस कारण कौटुंबिक विवाद खड़ा होने लगा। हसन की यह चहेती (सुलेमान और अहमद ख़ाँ की मां) फ़रीद और निज़ाम की मां से जलती थी क्योंकि सबसे बड़ा होने के कारण फ़रीद जागीर का हकदार था। इस परिस्थिति में फ़रीद का दुखी होना स्वाभाविक। पिता उसकी ओर से उदासीन रहने लगा।
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==हिन्दू मित्रता की नीति==
[[चित्र:Shershah Tomb2.jpg|thumb|200px|left|शेरशाह सूरी का मक़बरा, सासाराम बिहार]]
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[[दिल्ली]] के सुल्तानों की [[हिन्दू]] विरोधी नीति के ख़िलाफ़ उसने हिन्दुओं से मित्रता की नीति अपनायी। जिससे उसे अपनी शासन व्यवस्था सृदृढ़ करने में सहायता मिली। उसका [[दीवान]] और सेनापति एक हिन्दू सरदार था, जिसका नाम [[हेमू]] (हेमचंद्र) था। उसकी सेना में हिन्दू वीरों की संख्या बहुत थी। उसने अपने राज्य में शांति स्थापित कर जनता को सुखी और समृद्ध बनाने के प्रयास किये। उसने यात्रियों और व्यापारियों की सुरक्षा का प्रबंध किया। लगान और [[मालगुज़ारी]] वसूल करने की संतोषजनक व्यवस्था की। शेरशाह सूरी के फ़रमान [[फ़ारसी भाषा]] के साथ नागरी अक्षरों में भी होते थे। वह पहला बादशाह था, जिसने [[बंगाल]] के सोनागाँव से [[सिंधु नदी]] तक दो हज़ार मील लम्बी पक्की सड़क बनवाई थी। उस सड़क पर घुड़सवारों द्वारा डाक लाने−ले−जाने की व्यवस्था थी। यह मार्ग उस समय 'सड़क-ए-आज़म' कहलाता था। बंगाल से [[पेशावर]] तक की यह सड़क 500 कोस (शुद्ध= [[क्रोश]]) या 2500 किलो मीटर लम्बी थी। शेरशाह का भतीजा अदली था, जो शेरशाह के पुत्र और उत्तराधिकारी इस्लामशाह के बाद 1554 ई. में गद्दी पर बैठा था।
पिता-पुत्र के आपसी संबंध कटु हो गए। इसका एक अच्छा फल भी हुआ। पिता की उदासीनता, विमाता की निष्ठुरता माता की गंभीरता और परिवार में बढ़ते हुए विद्वेषमय वातावरण से बालक फ़रीद शुरू से ही गंभीर, दृढ़निश्चयी और आत्मनिर्भर होने लगा। यद्यपि नारनौल से सहसराम और खवासपुर पहुंचकर तथा वहां बड़ी जागीर पा जाने से हसन ख़ाँ का दर्जा बढ़ गया था, तथापि फ़रीद और निज़ाम तथा इनकी माता के प्रति हसन के व्यवहार में अवनति ही होती गई। बार-बेटे का संबंध दिन पर दिन बिगड़ता ही गया। फ़रीद रुष्ट होकर जौनपुर चला गया और स्वयं जमाल ख़ाँ की सेवा में उपस्थित हो गया। जब हसन ख़ाँ को पता चला कि फ़रीद जौनपुर चला गया है तब उसे यह भय हुआ कि कहीं वह जमाल ख़ाँ से मेरी शिकायत न कर दे। अतः उसने जमाल ख़ाँ को पत्र लिखा कि फ़रीद मुझसे रुष्ट होकर आपके पास चला गया है। कृपया उसे मनाकर मेरे पास भेज देने का कष्ट करें। यदि वह आपके कहने पर भी घर वापस आने के लिए तैयार न हो तो आप उसे अपनी सेवा में रखकर उसके लिए धार्मिक आचार शास्त्र की शिक्षा का प्रबंध करने की अनुकंपा करें। <ref>(पुस्तक संदर्भ ''''शेरशाह सूरी' लेखक 'विद्या भास्कर'''')</ref>
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==पारिवारिक विवाद==
<blockquote>श्री कालिकारंजन क़ानूनगो ने लिखा है :- ‘‘बचपन में उसने साहित्य का जो अध्ययन किया उसने उस सैनिक जीवन के मार्ग से उसे पृथक कर दिया जिस पर [[शिवाजी]], [[हैदरअली]] और [[रणजीत सिंह]] जैसे निरक्षण वीर साधारण परिस्थिति से ऊँचे उठकर राजा की मर्यादा प्राप्त कर लेते हैं। [[भारत]] के इतिहास में हमें दूसरा कोई व्यक्ति नहीं मिलता जो अपने प्रारंभिक जीवन में सैनिक रहे बिना ही एक राज्य की नींव डालने में समर्थ हुआ हो।’’</blockquote>
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'''पिता और शेरशाह के आपसी''' सम्बन्ध कटु होते जा रहे थे। इस कारण कौटुंबिक विवाद खड़ा होने लगा। इस विवाद का एक अच्छा फल भी हुआ। पिता की उदासीनता, विमाता की निष्ठुरता माता की गंभीरता और परिवार में बढ़ते हुए विद्वेषमय वातावरण से बालक फ़रीद ख़ाँ (शेरशाह) शुरू से ही गंभीर, दृढ़निश्चयी और आत्मनिर्भर होने लगा। यद्यपि नारनौल से सहसराम और खवासपुर पहुँचकर तथा वहाँ बड़ी जागीर पा जाने से हसन ख़ाँ का दर्जा बढ़ गया था, तथापि फ़रीद और निज़ाम तथा इनकी माता के प्रति हसन के व्यवहार में अवनति ही होती गई। बाप-बेटे का सम्बन्ध दिन पर दिन बिगड़ता ही गया। फ़रीद रुष्ट होकर [[जौनपुर]] चला गया और स्वयं जमाल ख़ाँ की सेवा में उपस्थित हो गया। जब हसन ख़ाँ को पता चला कि फ़रीद जौनपुर चला गया है, तब उसे यह भय हुआ कि कहीं वह जमाल ख़ाँ से मेरी शिकायत न कर दे। अतः उसने जमाल ख़ाँ को पत्र लिखा कि, "फ़रीद मुझसे रुष्ट होकर आपके पास चला गया है। कृपया उसे मनाकर मेरे पास भेज देने का कष्ट करें। यदि वह आपके कहने पर भी घर वापस आने के लिए तैयार न हो तो, आप उसे अपनी सेवा में रखकर उसके लिए धार्मिक आचार शास्त्र की शिक्षा का प्रबंध करने की अनुकंपा करें"। <ref>(पुस्तक संदर्भ ''''शेरशाह सूरी' लेखक 'विद्या भास्कर'''')</ref>
  
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श्री कालिकारंजन क़ानूनगो ने लिखा है :- ‘‘बचपन में उसने [[साहित्य]] का जो अध्ययन किया, उसने उस सैनिक जीवन के मार्ग से उसे पृथक कर दिया, जिस पर [[शिवाजी]], [[हैदर अली]] और [[रणजीत सिंह]] जैसे निरक्षण वीर साधारण परिस्थिति से ऊँचे उठकर राजा की मर्यादा प्राप्त कर लेते हैं। [[भारत]] के इतिहास में हमें दूसरा कोई व्यक्ति नहीं मिलता, जो अपने प्रारंभिक जीवन में सैनिक रहे बिना ही एक राज्य की नींव डालने में समर्थ हुआ हो।’
 
==हुमायुँ और शेरशाह==
 
==हुमायुँ और शेरशाह==
 
{{tocright}}
 
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आगरा से हुमायूँ की अनुपस्थिति के दौरान (फ़रवरी, 1535 से फ़रवरी, 1537 तक) शेरशाह ने अपनी स्थिति और मजबूत कर ली थी। वह बिहार का निर्विरोध स्वामी बन चुका था। नज़दीक और पास के अफ़ग़ान उसके नेतृत्व में इकट्ठे हो गये थे। हालाँकि वह अब भी मुग़लों के प्रति वफ़ादारी की बात करता था, लेकिन मुग़लों को [[भारत]] से निकालने के लिए उसने ख़ूबसूरती से योजना बनायी। बहादुरशाह से उसका गहरा सम्पर्क था। बहादुरशाह ने हथियार और धन आदि से उसकी बहुत सहायता भी की थी। इन स्रोतों के उपलब्ध हो जाने से उसने एक कुशल और बृहद सेना एकत्र कर ली थी। उसके पास 1200 हाथी भी थे। हुमायूँ के आगरा लौटने के कुछ ही दिन बाद शेरशाह ने अपनी सेना का उपयोग बंगाल के सुल्तान को हराने में किया था और उसे तुरन्त 1,300,000 [[दीनार]] ([[स्वर्ण मुद्रा]]) देने के लिए विवश किया था।
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'''आगरा में हुमायूँ की अनुपस्थिति''' के दौरान (फ़रवरी, 1535-1537 तक) शेरशाह ने अपनी स्थिति और मजबूत कर ली थी। वह बिहार का निर्विरोध स्वामी बन चुका था। नज़दीक और पास के अफ़ग़ान उसके नेतृत्व में इकट्ठे हो गये थे। हालाँकि वह अब भी [[मुग़ल|मुग़लों]] के प्रति वफ़ादारी की बात करता था, लेकिन मुग़लों को [[भारत]] से निकालने के लिए उसने ख़ूबसूरती से योजना बनायी। बहादुर शाह से उसका गहरा सम्पर्क था। बहादुर शाह ने हथियार और धन आदि से उसकी बहुत सहायता भी की थी। इन स्रोतों के उपलब्ध हो जाने से उसने एक कुशल और बृहद सेना एकत्र कर ली थी। उसके पास 1200 हाथी भी थे। [[हुमायूँ]] के [[आगरा]] लौटने के कुछ ही दिन बाद शेरशाह ने अपनी सेना का उपयोग [[बंगाल]] के सुल्तान को हराने में किया था और उसे तुरन्त 1,300,000 दीनार (स्वर्ण मुद्रा) देने के लिए विवश किया था।
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एक नयी सेना को लैस करके हुमायूँ ने वर्ष के अन्त में चुनार को घेर लिया। हुमायूँ ने सोचा था कि, ऐसे शक्तिशाली क़िले को पीछे छोड़ना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे उसकी रसद के मार्ग को ख़तरा हो सकता था। लेकिन अफ़ग़ानों ने दृढ़ता से क़िले की रक्षा की। कुशल तोपची [[रूमी ख़ाँ]] के प्रयत्नों के बावजूद हुमायूँ को [[चुनार का क़िला]] जीतने में छः महीने लग गये। इसी दौरान शेरशाह ने धोखे से रोहतास के शक्तिशाली क़िले पर अधिकार कर लिया। वहाँ वह अपने परिवार को सुरक्षित छोड़ सकता था। फिर उसने [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] पर दुबारा आक्रमण किया और उसकी राजधानी [[गौड़]] पर अधिकार कर लिया।
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==चौंसा एवं बिलग्राम के युद्ध==
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'''1539 ई. में चौंसा''' का एवं 1540 ई. में बिलग्राम या [[कन्नौज]] के युद्ध जीतने के बाद शेरशाह 1540 ई. में [[दिल्ली]] की गद्दी की पर बैठा। उत्तर [[भारत]] में द्वितीय अफ़ग़ान साम्राज्य के संस्थापक शेर ख़ाँ द्वारा [[बाबर]] के चदेरी अभियान के दौरान कहे गये ये शब्द अक्षरशः सत्य सिद्ध हुए, “ कि अगर भाग्य ने मेरी सहायता की और सौभाग्य मेरा मित्र रहा, तो मै मुग़लों को सरलता से भारत से बाहर निकाला दूँगा।” चौंसा युद्ध के पश्चात् शेर ख़ाँ ने ‘शेरशाह’ की उपाधि धारण कर अपना राज्याभिषेक करवाया। कालान्तर में इसी नाम से खुतबे (उपदेश या प्रशंसात्मक रचना) पढ़वाये एवं सिक्के ढलवाये।
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जिस समय शेरशाह दिल्ली के सिंहासन पर बैठा, उसके साम्राज्य की सीमायें पश्चिम में कन्नौज से लेकर पूरब में [[असम]] की पहाड़ियों एवं चटगाँव तथा उत्तर में [[हिमालय]] से लेकर दक्षिण में [[झारखण्ड]] की पहाड़ियों एवं [[बंगाल की खाड़ी]] तक फैली हुई थी।
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==गक्खरों से युद्ध==
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'''1541 ई. में शेरशाह सूरी''' ने गक्खरों को समाप्त करने के लिए एक अभियान किया। वह गक्खरों को इसलिए समाप्त करना चाहता था क्योंकि, यह जाति आये दिन [[मुग़ल|मुग़लों]] की सहायता किया करती थी। शेरशाह गक्खर जाति को समाप्त करने के अपने लक्ष्य को तो पूरा नहीं कर सका, लेकिन फिर भी वह गक्खरों की शक्ति को कम करने में अवश्य सफल रहा। शेरशाह ने अपनी उत्तरी-पश्चिमी सीमा को सुरक्षित करने के लिए एक शक्तिशाली ‘रोहतासगढ़’ नामक क़िले का निर्माण करवाया। हैबत ख़ाँ एवं खवास ख़ाँ के प्रतिनिधित्व में शेरशाह ने यहाँ पर एक [[अफ़ग़ान]] सैनिक टुकड़ी को नियुक्त कर दिया।
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==बंगाल का विद्रोह (1541 ई.)==
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'''बंगाल का सूबेदार''' [[खिज्र ख़ाँ]], जो एक स्वतन्त्र शासक की तरह व्यवहार कर रहा था, के विद्रोह को कुचलने के लिए शेरशाह बंगाल आया। उसने खिज्र ख़ाँ को बन्दी बना लिया। भविष्य में दोबारा बंगाल में विद्रोह को रोकने के लिए शेरशाह ने यहाँ एक नवीन प्रशासनिक व्यवस्था को प्रारम्भ किया, जिसके अन्तर्गत पूरे बंगाल को कई सरकारों (ज़िलों) में बाँट दिया गया और साथ ही प्रत्येक सरकार में एक छोटी सेना के साथ ‘शिक़दार’ (किसी श्रेत्र विशेष का अधिकारी) नियुक्त कर दिया गया। शिक़दारों को नियंत्रित करने के लिए एक ग़ैर सैनिक अधिकारी ‘अमीन-ए-बंगला’ की नियुक्ति की गई। सर्वप्रथम यह पद ‘क़ाज़ी फ़जीलात’ नाम के व्यक्ति को दिया गया।
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==मालवा (1542 ई.)==
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[[गुजरात]] के शासक बहादुर शाह के मरने के बाद [[मालवा]] के सूबेदार मल्लू ख़ाँ ने अपने को ‘कादिर शाह’ के नाम से मालवा का स्वतन्त्र शासक घोषित कर लिया। उसने अपने नाम से सिक्के ढलवाये एवं खुबते (उपदेश या प्रशंसात्मक रचना) पढ़वाये। शेरशाह मालवा को अपने अधीन करने के लिए कादिर शाह पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ा और अप्रैल, 1542 ई. में रास्ते में ही शेरशाह ने [[ग्वालियर]] के क़िले पर अधिकार कर वहाँ के शासक पूरनमल को अपने अधीन कर लिया। कादिर शाह ने शेरशाह से भयभीत होकर सारंगपुर में उसके समक्ष आत्म समर्पण कर दिया। उसके समर्पण के बाद मांडू, उज्जैन एवं सारंगपुर पर शेरशाह का कब्जा हो गया। शेरशाह ने भद्रता का परिचय देते हुएकादि शाह को लखनौती व काल्पी का गर्वनर नियुक्त किया परन्तु कादिरशाह शेरशाह से डर कर अपने परिवार के साथ गुजरात के शासक महमूद तृतीय की शरण में चला गया। शेरशाह ने सुजात खां को मालवा का गर्वनर नियुक्त कर वापस जाते समय ‘रणथम्भौर’ के शक्तिशाली किले को अपने अधीन कर पुत्र आदिल खां को वहां गर्वनर बनाया।
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रायसीन (1543 ई.) - यहां के शासक पूरनमल द्वारा 1542 ई. में अभियान के समय शेरशाह की अधीनता स्वीकार करने के बाद भी शेरशाह के लिए रायसीन पर आक्रमण करना इसलिए आवश्यक हो गया था क्योंकि वहां की मुस्लिम जनता को पूरनमल से बड़ी शिकायत थी। साथ ही रायसीन की सम्पन्नता भी आक्रमण एक कारण थी। 1543 ई. में रायसीन के किले पर घेरा डाला गया। कई महीने तक घेरा डाले रहने पर भी शेरशाह को सफलता नहीं मिली। अन्ततः शेरशाह ने चालाकी से पूरनमल को उसके आत्मसम्मान एवं जीवन की सुरक्षा का वायदा कर आत्मसमर्पण हेतु तैयार कर लिया, कुतुब खां और आदिल खां इस शर्त के गवाह बने। परन्तु रायसीन के मुसलमानों के पुनः दबाब के कारण राजपूतों को दण्ड देने के लिए शेरशाह ने एक रात राजपूतों के खेमों को चारों ओर से घेरा लिया। अपने को घिरा हुआ पाकर पूरनमल एवं उसके सिपाहियों ने बहादुरी से लड़ते हुए प्राणोत्सर्ग कर दिया तथा उनकी स्त्रियों ने ‘जौहर’ कर लिया। ‘श्ेारशाह द्वारा किया यह विश्वासघात उसके व्यक्तितत्व पर काला धब्बा है। इस विश्वासघात कुतुब खां इतना आहत हुआ कि उसने आत्महत्या कर ली।
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सिन्ध एवं मुल्तान (1543 ई.) - शेरशाह ने हैवत खां के नेतृत में सिंध तथा मुल्तान के विद्रोहियों बख्सू लंगाह एवं फतेह खां पर विजय प्राप्त की। शेरशाह ने मुल्तान में फतेह खां एवं सिंध में इस्लाम खां को सूबेदार नियुक्त किया।
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एक नयी सेना को लैस करके हुमायूँ ने वर्ष के अन्त में चुनार को घेर लिया। हुमायूँ ने सोचा था कि ऐसे शक्तिशाली क़िले को पीछे छोड़ना उचित नहीं होगा क्योंकि इससे उसकी रसद के मार्ग को ख़तरा हो सकता था। लेकिन अफ़ग़ानों ने दृढ़ता से क़िले की रक्षा की। कुशल तोपची रूमी ख़ाँ के प्रयत्नों के बावजूद हुमायूँ को [[चुनार का क़िला|चुनार का क़िला]] जीतने में छः महीने लग गये। इसी दौरान शेरशाह ने धोखे से [[रोहतास]] के शक्तिशाली क़िले पर अधिकार कर लिया। वहाँ वह अपने परिवार को सुरक्षित छोड़ सकता था। फिर उसने [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] पर दुबारा आक्रमण किया और उसकी राजधानी [[गौड़]] पर अधिकार कर लिया।
 
===बंगाल का सौदा===
 
इस प्रकार शेरशाह ने हूमायूँ को लुका-छिपी पूरी तरह से मात दे दी। हुमायूँ को यह अनुभव कर लेना चाहिए था कि अधिक सावधानी से तैयारी के बिना वह इस स्थिति में नहीं हो सकता कि शेरशाह को सैनिक-चुनौती दे सके। लेकिन वह अपने सामने सैनिक और राजनीतिक स्थिति को नहीं समझ सका। गौड़ पर अपनी विजय के बाद शेरशाह ने हुमायूँ के पास प्रस्ताव भेजा कि यदि उसके पास बंगाल रहने दिया जाए तो वह बिहार उसे दे देगा, और दस लाख सलाना कर देगा। यह स्पष्ट नहीं है कि इस प्रस्ताव में शेरशाह कितना ईमानदार था। लेकिन हुमायूँ बंगाल को शेरशाह के पास रहने देने के लिए तैयार नहीं था। बंगाल सोने का देश था, उद्योगों में उन्नत था और विदेशी व्यापार का केन्द्र था। साथ ही बंगाल का सुल्तान, जो घायल अवस्था में हुमायूँ की छावनी में पहुँच गया था, का कहना था कि शेरशाह का विरोध अब भी जारी है। इन सब कारणों से हुमायूँ ने शेरशाह का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया और बंगाल पर चढ़ाई करने का निर्णय लिया। बंगाल का सुल्तान अपने घावों के कारण जल्दी ही मर गया। अतः हुमायूँ को अकेले ही बंगाल पर चढ़ाई करनी पड़ी।
 
 
बंगाल की ओर हुमायूँ का कूच उद्देश्यहीन था और यह उस विनाश की पूर्वपीठिका थी, जो उसकी सेना में लगभग एक वर्ष बाद [[चौसा]] में हुआ। शेरशाह ने बंगाल छोड़ दिया था और दक्षिण बिहार पहुँच गया था। उसने बिना किसी प्रतिरोध के हुमायूँ को बंगाल की ओर बढ़ने दिया ताकि वह हुमायूँ की रसद-पंक्ति को तोड़ सके और उसे बंगाल में फँसा सके। गौड़ में पहुँच कर हुमायूँ ने तुरन्त क़ानून और व्यवस्था स्थापित करने का प्रयत्न किया। लेकिन इससे उसकी कोई समस्या हल नहीं हुई। उसके भाई हिंदाल द्वारा आगरा में स्वयं ताजपोशी के प्रयत्नों से उसकी स्थिति और बिगड़ गई। इस कारण से रसद और समाचारों से पूरी तरह कट गया।
 
 
इन हताशाओं के बावजूद हुमायूँ को शेरशाह के विरुद्ध अपनी सफलता पर विश्वास था। वह इस बात को भूल गया कि उसका सामना उस अफ़ग़ान सेना से है, जो एक साल पहले की सेना से एकदम अलग थी। उसने सर्वश्रेष्ठ अफ़ग़ान सेनापति के नेतृत्व में लड़ाईयों का अनुभव और आत्म-विश्वास प्राप्त किया था। शेरशाह की ओर से शांति के एक प्रस्ताव से धोखा खाकर हुमायूँ [[कर्मनाशा नदी]] के पूर्वी किनारे पर आ गया और इस प्रकार उसने वहाँ उपस्थित अफ़ग़ान घुड़सवारों को पूरा मौक़ा दे दिया। हुमायूँ ने ने केवल निम्न कोटि की राजनीतिक समझ का परिचय दिया वरन् निम्न कोटि के सेनापतित्व का भी परिचय दिया। उसने ग़लत मैदान चुना और शेरशाह को अपनी असावधानी से मौक़ा दिया।
 
 
जल्दबाज़ी में आगरा में इकट्ठी की गई हुमायूँ की सेना शेरशाह के मुक़ाबले कमज़ोर थी। लेकिन कन्नौज की लड़ाई (मई 1540) भयंकर थी। हुमायूँ के दोनों छोटे भाई [[अस्करी]] और [[हिन्दाल]] वीरता पूर्वक लड़े, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।
 
कन्नौज की लड़ाई ने शेरशाह और मुग़लों के बीच निर्णय कर दिया।
 
  
==हुमायूँ की असफलता==
 
यह स्पष्ट है कि शेरशाह के विरुद्ध हुमायूँ की असफलता का सबसे बड़ा कारण उसके द्वारा अफ़ग़ान शक्ति को समझ पाने की असमर्थता थी। उत्तर-भारत में अनेकानेक अफ़ग़ान जातियों के फैले रहने के कारण वे कभी भी किसी योग्य नेता के नेतृत्व में एकत्र होकर चुनौती दे सकती थी। स्थानीय शासकों और ज़मींदारों को अपनी ओर मिलाये बिना मुग़ल संख्या में अफ़ग़ानों से कम ही रहते।
 
  
शेरशाह 5 वर्ष तक ही शासन कर सका। उस थोड़े काल में ही उसने अपनी योग्यता और प्रबंध−कुशलता का सिक्का जमा दिया था। 22 मई, सन् 1545 में कालिंजर के दुर्ग की घेराबंदी करते हुए बारूदख़ाने में आग लग जाने से उसकी अकाल मृत्यु हो गई थी।
 
  
 
==शेरशाह सूर के निर्माण कार्य==
 
==शेरशाह सूर के निर्माण कार्य==

Revision as of 12:32, 22 March 2011

sherashah soori
Shershah Suri|thumb|200px
(san 1540−san 1545)
sherashah soori ke bachapan ka nam 'farid khaan' tha. vah vaijava da (hoshiyarapur 1472 ee.) mean apane pita 'hasan khaan' ki afagan path‍ni se utpann tha. usaka pita hasan, bihar ke sasaram ka zamiandar tha. farid khaan ne apane adhikaroan ki raksha evan shakti ke vistar ke lie bihar ke sultan muhammad shah nuhani ke yahaan naukari kar li. ek bar shikar par gaye nuhani ke sath farid khaan ne ek sher ko talavar ke ek hi bar se mar diya. usaki is bahaduri se prasann hokar muhammad shah ne use ‘sher khaan’ ki upadhi pradan ki. 1529 ee. mean bangal ke shasak nusaratashah ko parast karake sherakhaan ne hajarat-e-ala ki upadhi dharan ki. 1530 ee. mean sherakhaan ne chunar ke kiledar taj khaan ki vidhava la damalika se vivah karake chunar ka kila tatha bahut sampatti prapt ki. humayooan ko harane vala sher khaan, 'soor' nam ke qabile ka pathan saradar tha. vah 'sherashah' ke nam se badashah hua. usane agara ko apani rajadhani banaya tha.

pita ka vyavahar

hasan khaan ke ath l dake the. farid khaan aur nizam khaan ek hi afagan mata se paida hue the. ali aur yoosuph ek mata se. khurram (kuchh granthoan mean yah nam mudahir hai) aur shakhi khaan ek any maan se aur suleman aur ahamad chauthi maan se utpann hue the. thumb|200px|left|sherashah soori ka maqabara, sasaram bihar farid ki maan b di sidhi-sadi, sahanashil aur buddhiman thi. farid ke pita ne is vivahita patni ke atirikt any tin dasiyoan ko haram mean rakh liya tha. bad mean inhean patni ka sthan prapt hua. farid aur nizam ke atirikt shesh chhah putr inhian ki santan the. kuchh samay bad hasan khaan, farid aur nizam ki maan se udasin aur dasiyoan ke prati asakt rahane laga. vah suleman aur ahamad khaan ki maan ke prati vishesh asakt tha. vah ise adhik chahane laga tha. hasan ki yah chaheti (suleman aur ahamad khaan ki maan) farid aur nizam ki maan se jalati thi, kyoanki sabase b da hone ke karan farid jagir ka hakadar tha. is paristhiti mean farid ka dukhi hona svabhavik hi tha. pita usaki or se udasin rahane laga.

hindoo mitrata ki niti

dilli ke sultanoan ki hindoo virodhi niti ke khilaf usane hinduoan se mitrata ki niti apanayi. jisase use apani shasan vyavastha sridridh karane mean sahayata mili. usaka divan aur senapati ek hindoo saradar tha, jisaka nam hemoo (hemachandr) tha. usaki sena mean hindoo viroan ki sankhya bahut thi. usane apane rajy mean shaanti sthapit kar janata ko sukhi aur samriddh banane ke prayas kiye. usane yatriyoan aur vyapariyoan ki suraksha ka prabandh kiya. lagan aur malaguzari vasool karane ki santoshajanak vyavastha ki. sherashah soori ke faraman farasi bhasha ke sath nagari aksharoan mean bhi hote the. vah pahala badashah tha, jisane bangal ke sonagaanv se siandhu nadi tak do hazar mil lambi pakki s dak banavaee thi. us s dak par ghu dasavaroan dvara dak lane−le−jane ki vyavastha thi. yah marg us samay 's dak-e-azam' kahalata tha. bangal se peshavar tak ki yah s dak 500 kos (shuddh= krosh) ya 2500 kilo mitar lambi thi. sherashah ka bhatija adali tha, jo sherashah ke putr aur uttaradhikari islamashah ke bad 1554 ee. mean gaddi par baitha tha.

parivarik vivad

pita aur sherashah ke apasi sambandh katu hote ja rahe the. is karan kautuanbik vivad kh da hone laga. is vivad ka ek achchha phal bhi hua. pita ki udasinata, vimata ki nishthurata mata ki ganbhirata aur parivar mean badhate hue vidveshamay vatavaran se balak farid khaan (sherashah) shuroo se hi ganbhir, dridhanishchayi aur atmanirbhar hone laga. yadyapi naranaul se sahasaram aur khavasapur pahuanchakar tatha vahaan b di jagir pa jane se hasan khaan ka darja badh gaya tha, tathapi farid aur nizam tatha inaki mata ke prati hasan ke vyavahar mean avanati hi hoti gee. bap-bete ka sambandh din par din big data hi gaya. farid rusht hokar jaunapur chala gaya aur svayan jamal khaan ki seva mean upasthit ho gaya. jab hasan khaan ko pata chala ki farid jaunapur chala gaya hai, tab use yah bhay hua ki kahian vah jamal khaan se meri shikayat n kar de. atah usane jamal khaan ko patr likha ki, "farid mujhase rusht hokar apake pas chala gaya hai. kripaya use manakar mere pas bhej dene ka kasht karean. yadi vah apake kahane par bhi ghar vapas ane ke lie taiyar n ho to, ap use apani seva mean rakhakar usake lie dharmik achar shastr ki shiksha ka prabandh karane ki anukanpa karean". [1]

shri kalikaranjan qanoonago ne likha hai :- ‘‘bachapan mean usane sahity ka jo adhyayan kiya, usane us sainik jivan ke marg se use prithak kar diya, jis par shivaji, haidar ali aur ranajit sianh jaise nirakshan vir sadharan paristhiti se ooanche uthakar raja ki maryada prapt kar lete haian. bharat ke itihas mean hamean doosara koee vyakti nahian milata, jo apane praranbhik jivan mean sainik rahe bina hi ek rajy ki nianv dalane mean samarth hua ho.’

humayuan aur sherashah

agara mean humayooan ki anupasthiti ke dauran (faravari, 1535-1537 tak) sherashah ne apani sthiti aur majaboot kar li thi. vah bihar ka nirvirodh svami ban chuka tha. nazadik aur pas ke afagan usake netritv mean ikatthe ho gaye the. halaanki vah ab bhi mugaloan ke prati vafadari ki bat karata tha, lekin mugaloan ko bharat se nikalane ke lie usane khoobasoorati se yojana banayi. bahadur shah se usaka gahara sampark tha. bahadur shah ne hathiyar aur dhan adi se usaki bahut sahayata bhi ki thi. in srotoan ke upalabdh ho jane se usane ek kushal aur brihad sena ekatr kar li thi. usake pas 1200 hathi bhi the. humayooan ke agara lautane ke kuchh hi din bad sherashah ne apani sena ka upayog bangal ke sultan ko harane mean kiya tha aur use turant 1,300,000 dinar (svarn mudra) dene ke lie vivash kiya tha.

ek nayi sena ko lais karake humayooan ne varsh ke ant mean chunar ko gher liya. humayooan ne socha tha ki, aise shaktishali qile ko pichhe chho dana uchit nahian hoga, kyoanki isase usaki rasad ke marg ko khatara ho sakata tha. lekin afaganoan ne dridhata se qile ki raksha ki. kushal topachi roomi khaan ke prayatnoan ke bavajood humayooan ko chunar ka qila jitane mean chhah mahine lag gaye. isi dauran sherashah ne dhokhe se rohatas ke shaktishali qile par adhikar kar liya. vahaan vah apane parivar ko surakshit chho d sakata tha. phir usane bangal par dubara akraman kiya aur usaki rajadhani gau d par adhikar kar liya.

chauansa evan bilagram ke yuddh

1539 ee. mean chauansa ka evan 1540 ee. mean bilagram ya kannauj ke yuddh jitane ke bad sherashah 1540 ee. mean dilli ki gaddi ki par baitha. uttar bharat mean dvitiy afagan samrajy ke sansthapak sher khaan dvara babar ke chaderi abhiyan ke dauran kahe gaye ye shabd aksharashah saty siddh hue, “ ki agar bhagy ne meri sahayata ki aur saubhagy mera mitr raha, to mai mugaloan ko saralata se bharat se bahar nikala dooanga.” chauansa yuddh ke pashchath sher khaan ne ‘sherashah’ ki upadhi dharan kar apana rajyabhishek karavaya. kalantar mean isi nam se khutabe (upadesh ya prashansatmak rachana) padhavaye evan sikke dhalavaye.

jis samay sherashah dilli ke sianhasan par baitha, usake samrajy ki simayean pashchim mean kannauj se lekar poorab mean asam ki paha diyoan evan chatagaanv tatha uttar mean himalay se lekar dakshin mean jharakhand ki paha diyoan evan bangal ki kha di tak phaili huee thi.

gakkharoan se yuddh

1541 ee. mean sherashah soori ne gakkharoan ko samapt karane ke lie ek abhiyan kiya. vah gakkharoan ko isalie samapt karana chahata tha kyoanki, yah jati aye din mugaloan ki sahayata kiya karati thi. sherashah gakkhar jati ko samapt karane ke apane lakshy ko to poora nahian kar saka, lekin phir bhi vah gakkharoan ki shakti ko kam karane mean avashy saphal raha. sherashah ne apani uttari-pashchimi sima ko surakshit karane ke lie ek shaktishali ‘rohatasagadh’ namak qile ka nirman karavaya. haibat khaan evan khavas khaan ke pratinidhitv mean sherashah ne yahaan par ek afagan sainik tuk di ko niyukt kar diya.

bangal ka vidroh (1541 ee.)

bangal ka soobedar khijr khaan, jo ek svatantr shasak ki tarah vyavahar kar raha tha, ke vidroh ko kuchalane ke lie sherashah bangal aya. usane khijr khaan ko bandi bana liya. bhavishy mean dobara bangal mean vidroh ko rokane ke lie sherashah ne yahaan ek navin prashasanik vyavastha ko prarambh kiya, jisake antargat poore bangal ko kee sarakaroan (ziloan) mean baant diya gaya aur sath hi pratyek sarakar mean ek chhoti sena ke sath ‘shiqadar’ (kisi shretr vishesh ka adhikari) niyukt kar diya gaya. shiqadaroan ko niyantrit karane ke lie ek gair sainik adhikari ‘amin-e-bangala’ ki niyukti ki gee. sarvapratham yah pad ‘qazi fajilat’ nam ke vyakti ko diya gaya.

malava (1542 ee.)

gujarat ke shasak bahadur shah ke marane ke bad malava ke soobedar malloo khaan ne apane ko ‘kadir shah’ ke nam se malava ka svatantr shasak ghoshit kar liya. usane apane nam se sikke dhalavaye evan khubate (upadesh ya prashansatmak rachana) padhavaye. sherashah malava ko apane adhin karane ke lie kadir shah par akraman karane ke lie age badha aur aprail, 1542 ee. mean raste mean hi sherashah ne gvaliyar ke qile par adhikar kar vahaan ke shasak pooranamal ko apane adhin kar liya. kadir shah ne sherashah se bhayabhit hokar sarangapur mean usake samaksh atm samarpan kar diya. usake samarpan ke bad maandoo, ujjain evan sarangapur par sherashah ka kabja ho gaya. sherashah ne bhadrata ka parichay dete huekadi shah ko lakhanauti v kalpi ka garvanar niyukt kiya parantu kadirashah sherashah se dar kar apane parivar ke sath gujarat ke shasak mahamood tritiy ki sharan mean chala gaya. sherashah ne sujat khaan ko malava ka garvanar niyukt kar vapas jate samay ‘ranathambhaur’ ke shaktishali kile ko apane adhin kar putr adil khaan ko vahaan garvanar banaya.

rayasin (1543 ee.) - yahaan ke shasak pooranamal dvara 1542 ee. mean abhiyan ke samay sherashah ki adhinata svikar karane ke bad bhi sherashah ke lie rayasin par akraman karana isalie avashyak ho gaya tha kyoanki vahaan ki muslim janata ko pooranamal se b di shikayat thi. sath hi rayasin ki sampannata bhi akraman ek karan thi. 1543 ee. mean rayasin ke kile par ghera dala gaya. kee mahine tak ghera dale rahane par bhi sherashah ko saphalata nahian mili. antatah sherashah ne chalaki se pooranamal ko usake atmasamman evan jivan ki suraksha ka vayada kar atmasamarpan hetu taiyar kar liya, kutub khaan aur adil khaan is shart ke gavah bane. parantu rayasin ke musalamanoan ke punah dabab ke karan rajapootoan ko dand dene ke lie sherashah ne ek rat rajapootoan ke khemoan ko charoan or se ghera liya. apane ko ghira hua pakar pooranamal evan usake sipahiyoan ne bahaduri se l date hue pranotsarg kar diya tatha unaki striyoan ne ‘jauhar’ kar liya. ‘shhearashah dvara kiya yah vishvasaghat usake vyaktitatv par kala dhabba hai. is vishvasaghat kutub khaan itana ahat hua ki usane atmahatya kar li.

sindh evan multan (1543 ee.) - sherashah ne haivat khaan ke netrit mean siandh tatha multan ke vidrohiyoan bakhsoo langah evan phateh khaan par vijay prapt ki. sherashah ne multan mean phateh khaan evan siandh mean islam khaan ko soobedar niyukt kiya.






sherashah soor ke nirman kary

[[chitr:Shershah Tomb1.jpg|thumb|200px|sherashah soori ka maqabara, sasaram bihar]] sherashah soori humayooan ko parajit kar badashah bana. usake nirman karyoan mean s dakoan, sarayoan evan masjidoan adi ka banaya jana prasiddh hai. vah pahala muslim shasak tha, jisane yatayat ki uttam vyavastha ki aur yatriyoan evan vyapariyoan ki suraksha ka santoshajanak prabandh kiya. usane bangal ke sonagaanv se lekar panjab mean siandhu nadi tak, agara se rajasthan aur malava tak pakki s dakean banavaee thian. s dakoan ke kinare chhayadar evan phal vale vriksh lagaye gaye the, aur jagah-jagah par saray, masjid aur kuoan ka nirman karaya gaya tha. brajamandal ke chaumuhaan gaanv ki saray aur chhata gaanv ki saray ka bhitari bhag usi ke dvara nirmit haian. dilli mean usane shahar panah banavaya tha, jo aj vahaan ka 'lal daravaza' hai. dilli ka 'purana qila' bhi usi ke dvara banavaya mana jata hai.

sherashah ki upadhi

1539 ee. mean chausa ke yuddh mean humayooan ko hara, sher khaan ne sherashah ki upadhi li. 1540 ee. mean sherashah ne humayooan ko dobara harakar rajasianhasan par baitha. sherashah ka 10 joon, 1540 ko agara mean vidhivat rajyabhishek hua. usake bad 1540 ee. mean lahaur par adhikar kar liya. bad mean khvas khaan aur haibat khaan ne poore panjab par adhikar kar liya. phalatah sherashah ne bharat mean punah dvitiy afagan samrajy ki sthapana ki. itihas mean ise 'sooravansh' ke nam se jana jata hai. sianhasan par baithate samay sherashah 68 varsh ka ho chuka tha aur 5 varsh tak shasan sambhalane ke bad mee 1545 ee. mean usaki mrityu ho gee.

malikamuhammad jayasi, pharishta aur badaanyooni ne sherashah ke shasan ki b di prashansa ki hai. badaanyooni ne likha hai- bangal se panjab tak, tatha agara se malava tak, s dak par donoan or chhaya ke lie phal vale vriksh lagaye gaye the. kos−kos par ek saray, ek masjid aur kuane ka nirman kiya tha. masjid mean ek inam aur ajan dene vala ek mulla tha. nirdhan yatriyoan ka bhojan banane ke lie ek hindoo aur musalaman naukar tha. 'prabandh ki yah vyavastha thi ki bilkul ashakt buddha asharphiyoan ka thal hath par liye chala jay aur jahaan chahe vahaan p da rahe. chor ya lutere ki majal nahian ki aankh bhar kar usaki or dekh sake'.

das varsh ki chhoti-si avadhi mean hi sherashah ne lagabhag sare rajasthan ko jit liya. usaka aantim abhiyan kalianjar ke qile ke viruddh tha. yah qila bahut mazaboot aur bundelakhand ka dvar tha. ghere ke dauran ek top phat gee, jisase sherashah ganbhir roop se ghayal ho gaya. vah qile par fatah ka samachar sunane ke bad maut ki niand so gaya.

maqabara

banaras-kolakata rod par sasaram sherashah soori ka shahar tha. yahian usane apane jite ji apana maqabara banavana shuroo kar diya tha. maqabara pattharoan se bana hai. maqabare ke sabase oopari sire se poora sasaram saph dikhaee deta hai.


tika tippani aur sandarbh

  1. (pustak sandarbh 'sherashah soori' lekhak 'vidya bhaskar')