नामग्याल तिब्बत अध्ययन संस्थान: Difference between revisions
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'''नामग्याल तिब्बत अध्ययन संस्थान''' [[सिक्किम]] की राजधानी [[गंगटोक]] की पहाड़ियों में स्थित एक तिब्बती संग्रहालय है। यह [[वर्ष]] [[1958]] में अपनी स्थापना के बाद से [[तिब्बत]] की सभ्यता, [[धर्म]], [[भाषा]], [[कला]], [[संस्कृति]] और [[इतिहास]] से संबंधित शोध कार्यों को बढ़ावा देता है एवं प्रायोजन करता है। | '''नामग्याल तिब्बत अध्ययन संस्थान''' [[सिक्किम]] की राजधानी [[गंगटोक]] की पहाड़ियों में स्थित एक तिब्बती संग्रहालय है। यह [[वर्ष]] [[1958]] में अपनी स्थापना के बाद से [[तिब्बत]] की सभ्यता, [[धर्म]], [[भाषा]], [[कला]], [[संस्कृति]] और [[इतिहास]] से संबंधित शोध कार्यों को बढ़ावा देता है एवं प्रायोजन करता है। | ||
==स्थिति तथा इतिहास== | ==स्थिति तथा इतिहास== | ||
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इस संस्थान को 'तिब्बत अध्ययन शोध संस्थान, सिकिक्म' के नाम से भी जाना जाता है। पूरे विश्व मे मात्र तीन संस्थान ही इस प्रकार के हैं। मास्को में 'पीपल्स ऑफ एशिया संस्थान' और टोक्यो में 'तोयो बुंको' ऐसे दो अन्य संस्थान हैं। | इस संस्थान को 'तिब्बत अध्ययन शोध संस्थान, सिकिक्म' के नाम से भी जाना जाता है। पूरे विश्व मे मात्र तीन संस्थान ही इस प्रकार के हैं। मास्को में 'पीपल्स ऑफ एशिया संस्थान' और टोक्यो में 'तोयो बुंको' ऐसे दो अन्य संस्थान हैं। | ||
==दुर्लभ संग्रह== | ==दुर्लभ संग्रह== | ||
इस संस्थान में कई सारे दुर्लभ संग्रह है, जैसे- लेप्चा, तिब्बती और [[संस्कृत]] में पांडुलिपियां, कलात्मक टुकड़े, थंकस और मूर्तियां आदि। संस्थान [[बौद्ध दर्शन]] और [[बौद्ध धर्म]] का विश्व विख्यात केन्द्र है। यहां विभिन्न रूपों और आकारों की लगभग 200 प्रतिमाओं, पेंटिंगों, [[विज्ञान]], [[धर्म]], चिकित्सा, ज्योतिष आदि विषयों की पुस्तकों सहित बहुत-सी अमूल्य वस्तुएं मौजूद हैं। लेप्चा और संस्कृत की पांडुलिपियों सहित प्राचीन काल की अनोखी वस्तुओं की नामावलियों का यहां बहुत अच्छा संग्रह है। यह संस्थान एक परियोजना लाने की योजना भी बना रहा है, जिसके अंतर्गत सभी दुर्लभ और पुरानी तस्वीरों को प्रलेखित किया जाएगा। | इस संस्थान में कई सारे दुर्लभ संग्रह है, जैसे- लेप्चा, तिब्बती और [[संस्कृत]] में [[पांडुलिपि|पांडुलिपियां]], कलात्मक टुकड़े, थंकस और मूर्तियां आदि। संस्थान [[बौद्ध दर्शन]] और [[बौद्ध धर्म]] का विश्व विख्यात केन्द्र है। यहां विभिन्न रूपों और आकारों की लगभग 200 प्रतिमाओं, पेंटिंगों, [[विज्ञान]], [[धर्म]], चिकित्सा, ज्योतिष आदि विषयों की पुस्तकों सहित बहुत-सी अमूल्य वस्तुएं मौजूद हैं। लेप्चा और संस्कृत की पांडुलिपियों सहित प्राचीन काल की अनोखी वस्तुओं की नामावलियों का यहां बहुत अच्छा संग्रह है। यह संस्थान एक परियोजना लाने की योजना भी बना रहा है, जिसके अंतर्गत सभी दुर्लभ और पुरानी तस्वीरों को प्रलेखित किया जाएगा। | ||
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एक पारंपरिक तिब्बती बौद्ध शैली में निर्मित इस संस्थान की [[वास्तु कला|वास्तुकला]] अत्यंत सुंदर है और इसके भीतर दीवारों पर सुंदर चित्र सुसज्जित हैं। इसके अतिरिक्त संस्थान द्वारा स्थापित पास में ही एक उद्यान है, जिसे [[सिक्किम]] के अंतिम राजा की स्मृति में बनवाया गया था। उद्यान में राजा की एक सुंदर [[कांस्य]] प्रतिमा स्थापित है। | एक पारंपरिक तिब्बती बौद्ध शैली में निर्मित इस संस्थान की [[वास्तु कला|वास्तुकला]] अत्यंत सुंदर है और इसके भीतर दीवारों पर सुंदर चित्र सुसज्जित हैं। इसके अतिरिक्त संस्थान द्वारा स्थापित पास में ही एक उद्यान है, जिसे [[सिक्किम]] के अंतिम राजा की स्मृति में बनवाया गया था। उद्यान में राजा की एक सुंदर [[कांस्य]] प्रतिमा स्थापित है। |
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नामग्याल तिब्बत अध्ययन संस्थान
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विवरण | 'नामग्याल तिब्बत अध्ययन संस्थान' गंगटोक स्थित एक तिब्बती संग्रहालय है। यह संस्थान तिब्बती साहित्य और शिल्प का अनूठा भंडार है। |
राज्य | सिक्किम |
शहर | गंगटोक |
स्थापना | 1 अक्टूबर, 1958 |
उद्घाटनकर्ता | जवाहर लाल नेहरू |
कार्य | संस्थान तिब्बत की सभ्यता, धर्म, भाषा, कला, संस्कृति और इतिहास से संबंधित शोध कार्यों को बढ़ावा देता है। |
अन्य जानकारी | इस संस्थान में कई सारे दुर्लभ संग्रह है, जैसे- लेप्चा, तिब्बती और संस्कृत में पांडुलिपियां, कलात्मक टुकड़े, थंकस और मूर्तियां आदि। संस्थान बौद्ध दर्शन और बौद्ध धर्म का विश्व विख्यात केन्द्र है। |
नामग्याल तिब्बत अध्ययन संस्थान सिक्किम की राजधानी गंगटोक की पहाड़ियों में स्थित एक तिब्बती संग्रहालय है। यह वर्ष 1958 में अपनी स्थापना के बाद से तिब्बत की सभ्यता, धर्म, भाषा, कला, संस्कृति और इतिहास से संबंधित शोध कार्यों को बढ़ावा देता है एवं प्रायोजन करता है।
स्थिति तथा इतिहास
यह संस्थान तिब्बती साहित्य और शिल्प का अनूठा भंडार है। भारत में इस प्रकार का यह एकमात्र संस्थान है। यह समुद्र तल से लगभग 5500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। सिक्किम के शासक 11वें चोगयाल, सर ताशी नामग्याल ने 1958 में इसकी स्थापना की थी। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1 अक्टूबर, 1958 को इस संस्थान का विधिवत उद्धाटन किया था।
इस संस्थान को 'तिब्बत अध्ययन शोध संस्थान, सिकिक्म' के नाम से भी जाना जाता है। पूरे विश्व मे मात्र तीन संस्थान ही इस प्रकार के हैं। मास्को में 'पीपल्स ऑफ एशिया संस्थान' और टोक्यो में 'तोयो बुंको' ऐसे दो अन्य संस्थान हैं।
दुर्लभ संग्रह
इस संस्थान में कई सारे दुर्लभ संग्रह है, जैसे- लेप्चा, तिब्बती और संस्कृत में पांडुलिपियां, कलात्मक टुकड़े, थंकस और मूर्तियां आदि। संस्थान बौद्ध दर्शन और बौद्ध धर्म का विश्व विख्यात केन्द्र है। यहां विभिन्न रूपों और आकारों की लगभग 200 प्रतिमाओं, पेंटिंगों, विज्ञान, धर्म, चिकित्सा, ज्योतिष आदि विषयों की पुस्तकों सहित बहुत-सी अमूल्य वस्तुएं मौजूद हैं। लेप्चा और संस्कृत की पांडुलिपियों सहित प्राचीन काल की अनोखी वस्तुओं की नामावलियों का यहां बहुत अच्छा संग्रह है। यह संस्थान एक परियोजना लाने की योजना भी बना रहा है, जिसके अंतर्गत सभी दुर्लभ और पुरानी तस्वीरों को प्रलेखित किया जाएगा।
वास्तुकला
एक पारंपरिक तिब्बती बौद्ध शैली में निर्मित इस संस्थान की वास्तुकला अत्यंत सुंदर है और इसके भीतर दीवारों पर सुंदर चित्र सुसज्जित हैं। इसके अतिरिक्त संस्थान द्वारा स्थापित पास में ही एक उद्यान है, जिसे सिक्किम के अंतिम राजा की स्मृति में बनवाया गया था। उद्यान में राजा की एक सुंदर कांस्य प्रतिमा स्थापित है।
समय तथा प्रवेश शुल्क
केंद्रीय गंगटोक दक्षिण की ओर स्थित देओराली में स्थित संस्थान आम जनता के लिये सोमवार से शनिवार तक सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक खुला रहता है। पुस्तकालय एवं संग्रहालय का प्रवेश शुल्क 10 रुपया है।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
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