भोपाल रियासत: Difference between revisions

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==भारत में विलय==
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[[29 जनवरी]] [[1949]] को नवाब ने मंत्रिमंडल को बर्खास्त करते हुए सत्ता के सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए। तीन महीने जमकर आंदोलन हुए। जब नवाब हमीदुल्ला हर तरह से हार गया, तो उसने [[30 अप्रैल]] 1949 को विलीनीकरण के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। सरदार पटेल ने नवाब को लिखे पत्र में कहा- "मेरे लिए ये एक बड़ी निराशाजनक और दु:ख की बात थी कि आपके अविवादित हुनर तथा क्षमताओं को अपने देश के उपयोग में उस समय नहीं आने दिया, जब देश को उसकी जरूरत थी। अंतत: [[1 जून]] 1949 को भोपाल रियासत [[भारत]] का हिस्सा बन गई। केंद्र द्वारा नियुक्त चीफ कमिश्नर एनबी बैनर्जी ने कार्यभार संभाल लिया और नवाब को मिला 11 लाख सालाना का प्रिवीपर्स।
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==
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Revision as of 09:02, 4 September 2018

भारत में भोपाल रियासत का विलय सबसे आखिर में हुआ था। जून 1949 को इस रियासत का भारत गणराज्य में विलय हो गया और पहली बार इसी दिन भारत की शान तिरंगा यहां फहराया गया, तभी वर्तमान भारत की तस्वीर किसी देश के सबसे सुंदर नक्शे के रूप में सामने आई।

इतिहास

भोपाल का इतिहास, रियासतकालीन इतिहास के रूप में जाना जाता है। इस काल का प्रथम शासक सरदार दोस्त मोहम्मद ख़ान अफ़ग़ानिस्तान के नगर खैबर के क्षेत्र तीराह से सन् 1696-97 ई. में उत्तर प्रदेश के लाहोरी जलालाबाद के अफ़ग़ान अमीर जलालख़ान के पास आकर रहा था। उसने सन् 1715 ई. में जगदीशपुर पर अधिकार किया। उस समय जगदीशपुर का राजपूत शासक देवरा चौहान था। दोस्त मोहम्मद ने जगदीशपुर का नाम बदलकर इस्लाम नगर रखा। 1719 ई. तक उसने सम्पूर्ण भोपाल क्षेत्र अपने अधीन कर लिया। जब यह भू-भाग दोस्त मोहम्मद ख़ान के आधिपत्य में आ गया, तब वह कभी-कभी बड़े तालाब पर पक्षियों के शिकार के लिए यहां आया करता था। वह इस तालाब और यहां के प्राकृतिक सौंदर्य पर इतना मुग्ध था कि उसने क़िले (फतेहगढ़) का निर्माण कर यहां की बस्ती को आबाद किया। दोस्त मोहम्मद ख़ान के बाद नवाब यार मोहम्मद ख़ान, नवाब फैज मोहम्मद ख़ान, नवाब हयात मोहम्मद ख़ान, नवाब गौस मोहम्मद ख़ान, नवाब वजीर मोहम्मद ख़ान, नवाब नजर मोहम्मद ख़ान, नवाब कुदसिया बेगम, नवाब जहांगीर मोहम्मद ख़ान, नवाब सिकन्दर जहांबेगम, नवाब शाहजहां बेगम, नवाब सुल्तान जहां बेगम एवं नवाब हमीदुल्लाह ख़ान ने भोपाल पर क्रमबद्ध रूप से शासन किया।[1]

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की पहचान आज भी नवाबों के शहर के रूप में होती है। यहां नवाबों का राज रहा और इनकी सल्तनत अंग्रेजों की खासी वफादार हुआ करती थी। रियासत की स्थापना 1723-24 ई. में औरंगज़ेब की सेना के योद्धा दोस्त मोहम्मद ख़ान ने सीहोर, आष्टा, खिलचीपुर और गिन्नौर को जीत कर की थी। 1728 ई. में दोस्त मोहम्मद ख़ान की मौत के बाद उसके बेटे यार मोहम्मद ख़ान भोपाल रियासत का पहला नवाब बना। मार्च 1818 ई. में जब नजर मोहम्मद ख़ान नवाब थे तो एंग्लो भोपाल संधि के तहत भोपाल रियासत भारतीय ब्रिटिश साम्राज्य की 'प्रिंसली स्टेट' हो गई। 1926 में उसी रियासत के नवाब बने हमीदुल्लाह ख़ान।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षित नवाब हमीदुल्लाह दो बार 1931 और 1944 में चेम्बर ऑफ प्रिंसेस के चांसलर बने तथा भारत विभाजन के समय वे ही चांसलर थे। आजादी का मसौदा घोषित होने के साथ ही उन्होंने 1947 में चांसलर पद से इस्तीफा दे दिया। नवाब हमीदुल्लाह जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना दोनों के मित्र थे। 14 अगस्त 1947 तक वह कोई फैसला नहीं ले पाए। जिन्ना ने उन्हें पाकिस्तान में सेक्रेटरी जनरल का पद देकर वहां आने को कहा। उन्होंने अपनी बेटी आबिदा सुल्तान को भोपाल रियासत का शासक बन जाने को कहा। आबिदा ने इससे इनकार कर दिया।

विद्रोह

मार्च 1948 में नवाब हमीदुल्लाह ने भोपाल के स्वतंत्र रहने की घोषणा कर दी। मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का एक मंत्रिमंडल घोषित कर दिया। प्रधानमंत्री चतुरनारायण मालवीय बनाए गए। तब तक भोपाल रियासत में विलीनीकरण के लिए विद्रोह शुरू हो गया। अब तक नवाब के सबसे ख़ास रहे चतुर नारायण विलीनीकरण के पक्ष में हो गए। आज़ादी का आंदोलन शुरू हो गया। अक्टूबर 1948 में नवाब हज पर चले गए। दिसंबर 1948 में भोपाल में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन होने लगे। कई प्रदर्शनकारी गिरफ़्तार किए गए। 23 जनवरी 1949 को डॉ. शंकर दयाल शर्मा को आठ माह के लिए जेल भेज दिया गया। इस बीच सरदार पटेल ने सख़्त रवैया अपनाकर नवाब के पास संदेश भेजा कि भोपाल स्वतंत्र नहीं रह सकता। भोपाल को मध्य भारत का हिस्सा बनना ही होगा।

भारत में विलय

29 जनवरी 1949 को नवाब ने मंत्रिमंडल को बर्खास्त करते हुए सत्ता के सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए। तीन महीने जमकर आंदोलन हुए। जब नवाब हमीदुल्ला हर तरह से हार गया, तो उसने 30 अप्रैल 1949 को विलीनीकरण के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। सरदार पटेल ने नवाब को लिखे पत्र में कहा- "मेरे लिए ये एक बड़ी निराशाजनक और दु:ख की बात थी कि आपके अविवादित हुनर तथा क्षमताओं को अपने देश के उपयोग में उस समय नहीं आने दिया, जब देश को उसकी जरूरत थी। अंतत: 1 जून 1949 को भोपाल रियासत भारत का हिस्सा बन गई। केंद्र द्वारा नियुक्त चीफ कमिश्नर एनबी बैनर्जी ने कार्यभार संभाल लिया और नवाब को मिला 11 लाख सालाना का प्रिवीपर्स।

भोपाल राज्य के 9वें शासक नवाब जहांगीर मोहम्मद ने ब्रिटिश सेना तथा राज्य की सेना की छावनी के रूप में जहांगीराबाद मोहल्ले का निर्माण कराया था। उस समय भोपाल शहर से जहांगीराबाद तक पहुंच मार्ग बाणगंगा की पुलिया की ओर था। नवाब ने अपने वालिद के नाम पर छोटे तालाब के निकट नूर बाग के नाम से विशाल उद्यान स्थापित किया था। नवाब की पुत्री शाहजहां बेगम जब राज्य की शासिका बनीं, तब उन्होंने इस छावनी में कई इमारतेंं बनवाईं, जिनका उपयोग वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के कार्यालय व आवास हेतु किया गया। वर्तमान पुलिस मुख्यालय उन दिनों पोलिटिकल एजेन्ट का कार्यालय एवं लाल कोठी उसका निवास था। 1949 में रियासत विलीन होने पर यह कोठी चीफ कमिश्नर का निवास बनी। मध्य प्रदेश निर्माण के समय इसे राजभवन का रूप दिया गया। वर्तमान में यह राज्य के महामहिम राज्यपाल का निवास व कार्यालय है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. भोपाल की हिस्ट्री से जुड़े फेक्ट्स (हिंदी) patrika.com। अभिगमन तिथि: 1 सितम्बर, 2018।

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