अफ़ीम

भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
Revision as of 07:33, 27 May 2018 by यशी चौधरी (talk | contribs)
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)
Jump to navigation Jump to search

अफ़ीम (अंग्रेज़ी: Opium ; वैज्ञानिक नाम : Papaver somniferum) एक पौधे से प्राप्त होती है। अफ़ीम के पौधे के 'दूध' (latex) को सुखाकर बनाया गया पदार्थ है जिसके सेवन से मादकता आती है। इसका सेवन करने वाले को अन्य बातों के अलावा तेज नीद आती है। अफ़ीम का दूध निकालने के लिये उसके कच्चे, अपक्व 'फल' में एक चीरा लगाया जाता है; इसका दूध निकलने लगता है जो निकलकर सूख जाता है। यह लसीला होता है। यह पौधा तीन से पाँच फुट तक ऊँचा होता है। इसकी ढोंढ़ी (फल) को पेड़ में ही कच्ची अवस्था में छिछला चीर दिया जाता है (नश्तर लगा दिया जाता है) और उससे जो रस निकलता है उसी को सुखाने और साफ करने से अफ़ीम बनती है।

उत्पादन

सबसे अधिक अफ़ीम भारत में उत्पन्न होती है। अन्य देश, जहाँ अफ़ीम उत्पन्न होती है, तुर्की (टर्की), ग्रीस, ईरान और चीन हैं। भारत में साधारणत: सफेद फलवाला पौधा बोया जाता है। बीज नवंबर में बोया जाता है, फूल लगभग जनवरी के अंत में लगता है और प्राय: एक महीने बाद ढोंढ़ी लगभग मुर्गी के अंडे के बराबर हो जाती है। तब इसको पाछा जाता है, अर्थात्‌ नश्तर लगाया जाता है। यह काम तीसरे पहर से लेकर अँधेरा होने तक किया जाता है और दूसरे दिन सबेरे निकले हुए दूधिया रस को काछ लिया जाता है। इस रस को हवा में तीन-चार सप्ताह तक सूखने दिया जाता है और तब कारखाने में शुद्ध करने के लिए भेज दिया जाता है। ग़ाज़ीपुर (उत्तर प्रदेश) में इसके लिए एक सरकारी बड़ा कारखाना है। कारखाने में बड़े बर्तनों में डालकर अफ़ीम को गूंथा जाता है और तब गोला या ईंट बनाकर बेचा जाता है। भारत की अफ़ीम अधिकतर विदेश ही जाती है, क्योंकि यहाँ के लोग अफ़ीम खाना या तंबाकू की तरह पीना बहुत बुरा समझते हैं। यूरोप में अफ़ीम से इसके रासायनिक पदार्थों को अलग करके मॉरफ़ीन, कोडीन इत्यादि औषधियाँ बनाते हैं।

रासायनिक गुण

अफ़ीम की संरचना बड़ी जटिल है। इसमें से लगभग 16 विभिन्न रासायनिक पदार्थ पृथक्‌ किए गए हैं जिनमें मॉरफ़ीन, कोडीन, नार्सीन और थीबेन मुख्य हैं। मनुष्य शरीर पर मॉरफ़ीन का प्रभाव लगभग वही होता है जो अशोधित अफ़ीम का। इसलिए मॉरफ़ीन को शोधित अफ़ीम समझा जा सकता है। 9 प्रतिशत से कम मॉरफ़ीन वाली अफ़ीम को अमरीका में दवा के लिए बेकार समझा जाता है। कोडीन का प्रभाव बहुत कुछ मॉरफ़ीन की तरह का ही होता है परंतु उतना तीव्र नहीं। थीबेन प्रबल बिष है। यह मेरुकेंद्रों को उत्तेजित तथा विषाक्त करता है तथा हाथ-पैर में ऐंठन और छटपटाहट उत्पन्न करता है।

अफ़ीम खाने का प्रभाव

अफ़ीम का स्वाद कड़वा होता है और खाने से मिचली आतीं है। इसकी गंध बड़ी लाक्षणिक होती है- मादक और भारी। चौथाई से तीन ग्रेन तक अफ़ीम औषध के रूप में एक मात्रा (खुराक) समझी जाती है। इसके खाने से पीड़ा का अनुभव मिट जाता है, गहरी नींद आती है और आँख की पुतलियाँ छोटी हो जाती हैं। नींद खुलने पर भूख मिट जाती है, कुछ मिचली आती है, कोष्ठबद्धता (कब्ज) होती है, सर भारी जान पड़ता या दुखता है। परंतु यदि बहुत कम मात्रा में अफ़ीम खाई जाए तो इसका प्रभाव उत्तेजक और कल्पनाशक्तिवर्धक होता है। बार-बार अफ़ीम खाने पर दिनों-दिन और अधिक की आवश्यकता पड़ती जाती है। फिर ऐसी लत लग जाती है कि अफ़ीम छोड़ना कठिन हो जाता है। ऐसे व्यक्ति भी देखे गए हैं जो एक छटाँक अफ़ीम रोज खाते थे।
अधिकतर लोग अफ़ीम की गोली खाते हैं या एसे घोलकर पीते हैं, परंतु विदेश में कुछ लोग मॉरफ़ीन (अफ़ीम से निकले रसायन) का इंजेक्शन लेते हैं। कुछ लोग तो अफ़ीम से उत्पन्न आह्लाद के लिए इसका सेवन करते हैं, परंतु अधिकतर लोग पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए, डाक्टर की राय से या स्वयं अपने से, इसका सेवन आरंभ करते हैं और महीने बीस दिन के पश्चात्‌ इसे छोड़ नहीं पाते। चिकित्सकों के अनुसार इसका सेवन करने वालों में से लगभग 50 प्रतिशत लोग शारीरिक पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए अफ़ीम खाते हैं, बीस-पच्चीस प्रतिशत मानसिक क्लेश या चिंता से छुटकारा पाने के लिए और केवल पंद्रह-बीस प्रतिशत शौक के लिए।

चंडू

कुछ लोग अफ़ीम को तंबाकू की तरह आँच पर तपाकर पीते हैं। इस काम के लिए बनाई गई अफ़ीम को चंडू कहते हैं। इसके लिए अफ़ीम पानी में उबालते हैं और ऊपर से मैल कांछकर फेंक देते हैं। फिर उसे सुखाकर रखते हैं। पीने के लिए लोहे की तीली पर जरा सा निकालकर उसे दीप शिखा में गरम करते हैं (भूनते हैं) और तब विशेष नली में रखकर तुरंत लेटे लेटे पीते हैं। एक फूंक में पीना समाप्त हो जाता है। नशा तुरंत होता है। अधिक आवश्यकता होती है तो फिर सब काम दोहराया जाता है।

वितरण

भारत में तो लोग इसे घृणा की दृष्टि से देखते ही हैं, इंग्लैंड में भी सन्‌ 1843 में एक प्रस्ताव पार्लियामेंट में उपस्थित किया गया था कि सरकार अफ़ीम के व्यापार का त्याग करे, क्योंकि "यह ईसाई सरकार के सम्मान और कर्तव्य के पूर्णतया विरुद्ध है।" परंतु यह प्रस्ताव स्वीकृत न हो सका। सन्‌ 1840 में चीन सरकार ने अफ़ीम के आयात पर रोक लगा दी और इस कारण चीन तथा ग्रेट-ब्रिटेन में युद्ध छिड़ गया। 15 वर्ष बाद इसी बात को लेकर फिर दोनों राज्यों में लड़ाई लगी और उसमें फ्रांस भी ग्रेट-ब्रिटेन की ओर से सम्मिलित हुआ। चीन वाले हार अवश्य गए, परंतु वह प्रश्न दब न सका। 1907 में भारत की ब्रिटिश सरकार और चीन की सरकार में समझौता हुआ कि दस वर्ष में अफ़ीम का भेजना भारत बंद कर देगा। इस समझौते के अनुसार कुछ वर्षों तक तो चीन में अफ़ीम जाना कम होता रहा; परंतु अंत तक समझौते का निर्वाह न हो सका। 1909 में अमरीका के प्रेसीडेंट रूजवेल्ट ने एक आयोग (कमिशन) बैठाया। फिर 1913, 1914, 1919, 1924, 1925, 1930 में कई राज्यों के प्रतिनिधियों की सभाएँ हुईं। परंतु यह समस्या कभी हल न हो पाई। अब तो चीन में साम्यवादी गणतंत्र राज्य होने के बाद इस विषय में बड़ी कड़ाई बरती जा रही है और अफ़ीमचियों की संख्या नगण्य हो गई है। भारत सरकार ने अपने देश में अफ़ीम की खपत कम करने के लिए यह आज्ञा निकाल दी है कि अफ़ीमची लोग डाक्टरी जाँच के बाद पंजीकृत किए जाएँगे (उनका नाम रिजस्टर में लिखा जाएगा)। उनको न्यूनतम आवश्यक मात्रा में अफ़ीम मिला करेगी और यह मात्रा धीरे-धीरे कम कर दी जाएगी।

अफ़ीम का उपचार

6 ग्रेन या अधिक अफ़ीम खाने से व्यक्ति मर जा सकता है। अफ़ीम खाने के आरंभिक लक्षण वे ही होते हैं जो अधिक मदिरा पीने के, मस्तिष्क में रक्तस्राव के अथवा कुछ अन्य रोगों के। परंतु इन सभी के लक्षणों में सूक्ष्म भेद होते हैं, जिन्हें चिकित्सक पहचान सकता है। अफ़ीम के कारण चेतनाहीन व्यक्ति की त्वचा ठंडी और पसीने से चिपचिपी हो जाती है। आँख की पुतलियाँ (तारे) सुई के छेद की तरह छोटी हो जाती हैं और होंठ नीले पड़ जाते हैं। साँस धीरे-धीरे चलती है और नाड़ी भी मंद तथा अनियमित हो जाती है। साँस रुकने से मृत्यु हो जाती है। उपचार के लिए पेट में आधे-आधे घंटे पर पानी चढ़ाकर धोया जाता है। दवा देकर उलटी (वमन) कराई जाती है। कहवा पिलाना लाभदायक है। चिकित्सक कहवा में पाए जाने वाले रासायनिक पदार्थ को गुदा मार्ग से भीतर चढ़ाते हैं। साँस को उत्तेजित करने के लिए ऐट्रोपीन सल्फेट के इंजेक्शन लगाए जाते हैं। रोगी को जाग्रत रखने के लिए सब उपाय करना चाहिए। उसे चलाना चाहिए, अमोनिया सुंघानी चाहिए या बिजली का हल्का झटका (शॉक) लगाना चाहिए। साँस के रुकते ही कृत्रिम श्वसन चालू करना चाहिए। जब तक हृदय धड़कता रहे निराश नहीं होना चाहिए और कृत्रिम श्वसन जारी रखना चाहिए।


पन्ने की प्रगति अवस्था
आधार
प्रारम्भिक
माध्यमिक
पूर्णता
शोध

टीका टिप्पणी और संदर्भ

अफ़ीम (हिंदी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 4 दिसम्बर, 2013।

बाहरी कड़ियाँ

संबंधित लेख


वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः