मेवाड़ रियासत के सिक्के

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राजस्थान में स्वतंत्रता से पूर्व कई रियासतें थीं। इन रियासतों द्वारा अपने-अपने सिक्के प्रचलित किए गए थे। इन सिक्कों के द्वारा राजस्थान की रियासतो की आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक स्थिति का पता चलता है। इन सिक्कों के माध्यम से रियासत काल के इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है।

मेवाड़ रियासत के सिक्के

मेवाड़ रियासत में चलने वाले चांदी के सिक्के द्रव, रूपक और तांबे के सिक्के कर्षापण कहलाती हैं। इतिहासकार वेब के अनुसार प्रारंभ में ये इंडोसेसेनियन शैली के बने थे। जनपद की राजधानी नगरी (मध्यमिका) से चांदी और तांबे की मुद्रा मिली है जो आधुनिक ब ढींगला के अनुरूप थी। मेवाड़ क्षेत्रों से हूणों द्वारा प्रचलित चांदी और तांबे की गधियां मुद्रा भी प्राप्त हुई है। मेवाड़ के गुहिल के सिक्के जो लगभग 2000 है तथा चांदी के बने हुए हैं। आगरा के संग्रह से प्राप्त हुए हैं। महाराणा कुंभा के द्वारा चलाए गए चौकोर और गोल चांदी और तांबे के सिक्के मिले हैं। महाराजा संग्राम सिंह के द्वारा चलाए गए तांबे के सिक्कों पर स्वास्तिक और त्रिशूल अंकित मिले हैं। मेवाड़ में प्राचीन काल में सोने, चांदी, तांबे के सिक्के प्रचलित थे। इन सिक्कों पर मनुष्य, पशु पक्षी, सूर्य, चन्द्रमा, धनुष, वृक्ष का चित्र अंकित रहता था। इन सिक्कों का आकार चौकोर होता था, जिन्हें किनारों से कुछ गोल कर दिया जाता था। इन सिक्कों पर शिवि जनपद अंकित रहता था।

अकबर की चित्तौड़ विजय के उपरांत मेवाड़ में मुग़ल सिक्कों का प्रचलन रहा। इन सिक्कों को 'एलची' के नाम से जाना जाता था। इसके उपरांत मुग़ल सम्राट मुहम्मद शाह के काल में मेवाड़ में चित्तौड़, भीलवाड़ा और उदयपुर की टकसालों में स्थानीय सिक्के प्रचलित किए गए। यह स्थानिय सिक्के चित्तौड़ी, भिलाड़ी, उदयपुरी रुपए कहलाये। महाराणा स्वरूप सिंह ने स्वरूपशाही सिक्के चलाए थे, जिसके एक और चित्रकूट, उदयपुर और दूसरी ओर दोस्तीलंघना अंकित होता था। महाराणा स्वरूप सिंह के काल में चाँदौड़ी नामक स्वर्ण मुद्रा का प्रचलन था।

मेवाड़ में तांबे के सिक्कों को ढिंगला, भिलाड़ी, त्रिशुलिया, नाथद्वारिया आदि नामों से जाना जाता था। मेवाड़ के चित्तौड़गढ़ में शाहआलमी प्रकार का रुपया भी प्रचलन में था जो कि चांदी का था। महाराणा भीमसिंह ने अपनी बहन चंद्रकँवर की स्मृति में चाँदौड़ी रुपया, अठन्नी, चवन्नी इत्यादि सिक्के चलाए थे। मेवाड़ रियासत के सलूंबर ठिकाने की तांबे की मुद्रा को पदमशाही कहते थे। शाहपुरा में चलने वाली मुद्राएं जो सोने चांदी की होती थी, उन्हें ग्यारसन्द्रा और तांबे की मुद्राओं को माधोशाही कहा जाता था।


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