चंपा

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चंपा भागलपुर ज़िला, बिहार में स्थित है। यह नगरी महान् पराक्रमी और शूरवीर कर्ण की राजधानी मानी जाती है। यह बिहार के मैदानी क्षेत्र का आख़िरी सिरा और बिहार-झारखंड के कैमूर पहाड़ी का मिलन स्थल है। प्राचीन समय में यह नगरी हाथीदाँत, शीशे के शिल्प आदि सामान के लिए बहुत प्रसिद्ध थी। गंगा नदी के तट पर स्थित होने के कारण चंपा नगरी आर्थिक व्यापारिक केन्द्रों से जुड़ी हुई थी। महाजनपद युग में यह अंग महाजनपद की राजधानी हुआ करती थी।

इतिहास

मौर्य पूर्व काल में चंपा एक विकसित शिल्प-व्यापारिक नगरी थी। यहाँ का रेशमी वस्त्र व्यवसाय बहुत प्रसिद्ध था। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के प्रचार का यह प्रमुख केन्द्र थी। जैन तीर्थंकर वसुपूज्य की यह जन्मस्थली थी। चंपा से शुंगकालीन मूर्तियाँ भी मिली हैं। फ़ाह्यान ने चंपा की यात्रा की थी तथा इसके वैभव का उल्लेख किया है। ह्वेन त्सांग ने चंपा को 'चेनपो' नाम से वर्णित किया है। ईसा पूर्व 5वीं सदी में भागलपुर को 'चंपावती' के नाम से जाना जाता था। यह वह काल था, जब गंगा के मैदानी क्षेत्रों में भारतीय सम्राटों का वर्चस्‍व बढ़ता जा रहा था।

औपपातिक-सूत्र में इस नगरी का सुंदर वर्णन है और नगरी में पुष्यभद्र की विश्रामशाला, वहाँ के उद्यान में अशोक वृक्षों की विद्यमानता और कुणिक और उसकी महारानी धारिणी का चंपा से संबंध आदि बातों का उल्लेख है। इसी ग्रंथ में तीर्थंकर महावीर का चंपा में शमवशरण करने और कुणिक की चंपा की यात्रा का भी वर्णन है। चंपा के कुछ शासनाधिकारियों जैसे- 'गणनायक', 'दंडनायक' और 'तालबर' के नाम भी इस सूत्र में दिए गए हैं। जैन उत्तराध्ययन सूत्र में चंपा के धनी व्यापारी पालित की कथा है, जो महावीर स्वामी का शिष्य था। जैन ग्रंथ 'विविधतीर्थकल्प' में इस नगरी की जैन तीर्थों में गणना की गई है। इस ग्रंथ के अनुसार बारहवें तीर्थंकर वासुपूज्य का जन्म चंपा में हुआ था। इस नगरी के शासक करकंडु ने कुंड नामक सरोवर में पार्श्वनाथ की मूर्ति की प्रतिष्ठापना की थी। वीर स्वामी ने वर्षा काल में यहाँ तीन रातें बिताईं थीं। कुणिक (अजातशत्रु) ने अपने पिता बिंबिसार की मृत्यु के पश्चात् राजगृह छोड़कर यहाँ अपनी राजधानी बनाई थी। युवानच्वांग ने चंपा का वर्णन अपने यात्रावृत में किया है। 'दशकुमारचरित्र'[1]में भी चंपा का उल्लख है, जिससे ज्ञात होता है कि यह नगरी 7वीं शती ई. या उसके बाद तक भी प्रसिद्ध थी।

पौराणिक उल्लेख

अंग महाजनपद को पुराने समय में 'मलिनी', 'चम्‍पापुरी', 'चम्‍पा मलिनी', 'कला मलिनी' आदि के नाम से जाना जाता था। अथर्ववेद में अंग महाजनपद को अपवित्र माना गया है, जबकि कर्ण पर्व में अंग को एक ऐसे प्रदेश के रूप में जाना जाता था, जहाँ पत्‍नी और बच्‍चों को बेचा जाता था। वहीं दूसरी ओर महाभारत में अंग (चम्‍पा) को एक तीर्थ स्थल के रूप में पेश किया गया है। इस ग्रंथ के अनुसार अंग राजवंश के संस्‍थापक राजकुमार 'अंग' थे, जबकि रामायण के अनुसार यह वह स्‍थान है, जहाँ कामदेव ने अपने अंग को काटा था।

  • विष्णुपुराण[2] से इंगित होता है कि पृथुलाक्ष के पुत्र चंप ने इस नगरी को बसाया था-

'ततश्चंपोयश्चम्पा निवेशयामास।'

'प्रीत्या बदौ स कर्णाय मालिनी नगरमथ, श्रंगेषु नरशार्दल स राजऽऽसोत् सपत्नजित्। पालयामास चम्पा च कर्ण: परबलार्दन:।'

'चंपस्य तु पुरी चंपा या मालिन्यभवत् पुरा।'

नगर संरचना

इससे यह भी सूचित होता है कि चंपा का पहला नाम मालिनी था और चंप नामक राजा ने उसे चंपा नाम दिया था। प्राचीन कथाओं से सूचित होता है कि इस नगरी के चतुर्दिक चंपक वृक्षों की मालाकर पंक्तियां थीं। इस कारण इसे चंपामालिनी या केवमालिनी कहते थे। जातक कथाओं में इस नगरी का नाम कालचंपा भी मिलता है। महाजनक जातक के अनुसार चंपा मिथिला से 60 कोस दूर थी। इस जातक में चंपा के नगर द्वार तथा प्राचीर का वर्णन है, जिसकी जैन ग्रंथों से भी पुष्टि होती है। औपपातिक सूत्र में नगर के परकोटे, अनेक द्वारों, उद्यानों, प्रासादों आदि के बारे में निश्चित निर्देश मिलते हैं।

व्यवसाय

जातक कथाओं में चंपा की श्री समृद्धि तथा यहाँ के संपन्न व्यापारियों का अनेक स्थानों पर उल्लेख है। चंपा में कौशय या रेशम का सुंदर कपड़ा बुना जाता था, जिसका दूर-दूर तक भारत से बाहर दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक देशों तक व्यापार होता था।[7] चंपा के व्यापारियों ने हिन्द-चीन पहुँचकर वर्तमान अनाम के प्रदेश में चंपा नामक भारतीय उपनिवेश स्थापित किया था। साहित्य में चंपा का 'कुणिक' अजातशत्रु की राजधानी के रूप में वर्णन है।

चंपापुर के पास कर्णगढ़ की पहाड़ी भागलपुर के निकट है, जिससे महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा अंगराज कर्ण से चंपा का संबंध प्रकट होता है। यहाँ का समीपतम रेल स्टेशन नावनगर, भागलपुर से 2 मील (लगभग 3.2 कि.मी.) है। चंपा नगरी इसी नाम की नदी और गंगा के संगम पर स्थित थी।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. दशकुमारचरित्र 2, 2
  2. विष्णुपुराण 4, 18, 20
  3. शान्तिपर्व 5, 6-7
  4. वायुपुराण 99, 105-106
  5. हरिवंशपुराण 31, 49
  6. मत्स्यपुराण 48, 97
  7. रेशमी कपड़े की बुनाई की यह परंपरा वर्तमान भागलपुर में अभी तक चल रही है।

बाहरी कड़ियाँ

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