सब चलता है -आदित्य चौधरी: Difference between revisions

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कुछ लोग,
कुछ लोग,
मर तो कब के जाते हैं
मर तो कब के जाते हैं
दम है कि बहुत बाद में िनकलता है 
दम है कि बहुत बाद में निकलता है 


वस्त्रों की तरह 
वस्त्रों की तरह 

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सब चलता है -आदित्य चौधरी

इस दुनिया में बहुत कुछ बदलता है
बस एक ज़माना ही है
जो कभी नहीं बदलता है
और बदले भी कैसे ?
जब इंसान का 
नज़रिया ही नहीं बदलता है

चलो कोई बात नहीं
सब चलता है

बंदर से आदमी बनने की बात तो 
झूठी लगती है
वो तो गिरगिट है 
जो माहौल के साथ रंग बदलता है 

वैसे तो आग का काम ही जलाना है
वो बात अलग है कि
कोई मरने से पहले
तो कोई मरने के बाद जलता है

और दम निकलने से मरने की बात भी झूठी है
कुछ लोग,
मर तो कब के जाते हैं
दम है कि बहुत बाद में निकलता है 

वस्त्रों की तरह 
आत्मा का शरीर बदलना भी
ग़लत लगता है मुझको
हाँ कपड़ों की तरह इंसान
चेहरे ज़रूर बदलता है

चलो कोई बात नहीं
सब चलता है
सब चलता है