भारत का विभाजन: Difference between revisions

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इस विभाजन का जो मुख्य कारण दिया जा रहा था वो था की हिंदू बहुसंख्यक है और आजादी के बाद यहाँ बहुसंख्यक लोग ही सरकार बनायेंगे तब मोहम्मद अली जिन्ना को यह ख्याल आया कि बहुसंख्यक के राज्य में रहने से अल्पसंख्यक के साथ नाइंसाफ़ी या उन्हें नज़रंदाज़ किया जा सकता तो उन्होंने अलग से मुस्लिम राष्ट्र की मांग शुरू की। भारत के विभाजन की मांग वर्ष डर वर्ष तेज होती गई। भारत से अलग मुस्लिम राष्ट्र के विभाजन की मांग सन [[1920]] में पहली बार उठाई और [[1947]] में उसे प्राप्त किया। 15 अगस्त 1947 के दिन भारत को हिंदू सिख बहुसंख्यक एवं मुस्लिम अल्पसंख्यक राष्ट्र घोषित कर दिया गया। 1920 से 1932 में भारत पाकिस्तान विभाजन की नींव रखी गई। प्रथम बार मुस्लिम राष्ट्र की मांग अलामा इकबाल ने 1930 में मुस्लिम लीग के अध्यक्षीय भाषण में किया था। 1930 में ही मोहम्मद अली जिन्ना ने सारे अखंड भारत के अल्पसंख्यक समुदाय को भरोसे में ले लिया और कहा की भारत के मुख्यधारा की पार्टी [[कांग्रेस]] मुस्लिम हितों की अनदेखी कर रही है। इसके बाद [[1932]] से [[1942]] तक में विभाजन की बात बहुत आगे तक निकल गई थी, हालाँकि हिंदूवादी संगठन [[हिंदू महासभा]] देश का विभाजन नही चाहते थे परन्तु वह हिंदू और मुस्लिम के बिच के फर्क को बनाये रखना चाहते थे। सन [[1937]] में हिंदू महासभा के 19वें अधिवेसन में [[वीर सावरकर]] ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा की भारत एक सजातीय एवं एकजुट राष्ट्र हो सकता है अपितु दो अलग-अलग हिंदू एवं मुस्लिम राष्ट्र के। इन सब कोशिशों के बावजूद भी 1940 में [[मुस्लिम लीग]] के लाहौर अधिवेशन में [[मोहम्मद अली जिन्ना]] ने स्पष्ट कर दिया की उन्हें मुस्लिम राष्ट्र चाहिए और इस मुद्दे पर लीग ने बिना किसी हिचकिचाहट के बोला कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग धर्म है, अलग रीती-रिवाज, अलग संस्कृति है और ऐसे में दो अलग राष्ट्रों को एकजुट रखना खासकर तब जब एक धर्म अल्पसंख्यक हो और दूसरा धर्म बहुसंख्यक, यह सब कारण अल्पसंख्यक समाज में असंतोष पैदा करेगा और राष्ट्र में और सरकारों के कार्य में अवरोध पैदा करेगा।<ref name="नवभारत टाइम्स">{{cite web |url=http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/Jankranti-Samachar/entry/%E0%A4%AD-%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%B5-%E0%A4%AD-%E0%A4%9C%E0%A4%A8-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%B9%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A4%A4 |title=भारत विभाजन और हकीकत |accessmonthday=15 फ़रवरी |accessyear=2013 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=नवभारत टाइम्स|language= हिंदी}}</ref>
इस विभाजन का जो मुख्य कारण दिया जा रहा था वो था की हिंदू बहुसंख्यक है और आजादी के बाद यहाँ बहुसंख्यक लोग ही सरकार बनायेंगे तब मोहम्मद अली जिन्ना को यह ख्याल आया कि बहुसंख्यक के राज्य में रहने से अल्पसंख्यक के साथ नाइंसाफ़ी या उन्हें नज़रंदाज़ किया जा सकता तो उन्होंने अलग से मुस्लिम राष्ट्र की मांग शुरू की। भारत के विभाजन की मांग वर्ष डर वर्ष तेज होती गई। भारत से अलग मुस्लिम राष्ट्र के विभाजन की मांग सन [[1920]] में पहली बार उठाई और [[1947]] में उसे प्राप्त किया। 15 अगस्त 1947 के दिन भारत को हिंदू सिख बहुसंख्यक एवं मुस्लिम अल्पसंख्यक राष्ट्र घोषित कर दिया गया। 1920 से 1932 में भारत पाकिस्तान विभाजन की नींव रखी गई। प्रथम बार मुस्लिम राष्ट्र की मांग अलामा इकबाल ने 1930 में मुस्लिम लीग के अध्यक्षीय भाषण में किया था। 1930 में ही मोहम्मद अली जिन्ना ने सारे अखंड भारत के अल्पसंख्यक समुदाय को भरोसे में ले लिया और कहा की भारत के मुख्यधारा की पार्टी [[कांग्रेस]] मुस्लिम हितों की अनदेखी कर रही है। इसके बाद [[1932]] से [[1942]] तक में विभाजन की बात बहुत आगे तक निकल गई थी, हालाँकि हिंदूवादी संगठन [[हिंदू महासभा]] देश का विभाजन नही चाहते थे परन्तु वह हिंदू और मुस्लिम के बिच के फर्क को बनाये रखना चाहते थे। सन [[1937]] में हिंदू महासभा के 19वें अधिवेसन में [[वीर सावरकर]] ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा की भारत एक सजातीय एवं एकजुट राष्ट्र हो सकता है अपितु दो अलग-अलग हिंदू एवं मुस्लिम राष्ट्र के। इन सब कोशिशों के बावजूद भी 1940 में [[मुस्लिम लीग]] के लाहौर अधिवेशन में [[मोहम्मद अली जिन्ना]] ने स्पष्ट कर दिया की उन्हें मुस्लिम राष्ट्र चाहिए और इस मुद्दे पर लीग ने बिना किसी हिचकिचाहट के बोला कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग धर्म है, अलग रीती-रिवाज, अलग संस्कृति है और ऐसे में दो अलग राष्ट्रों को एकजुट रखना खासकर तब जब एक धर्म अल्पसंख्यक हो और दूसरा धर्म बहुसंख्यक, यह सब कारण अल्पसंख्यक समाज में असंतोष पैदा करेगा और राष्ट्र में और सरकारों के कार्य में अवरोध पैदा करेगा।<ref name="नवभारत टाइम्स">{{cite web |url=http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/Jankranti-Samachar/entry/%E0%A4%AD-%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%B5-%E0%A4%AD-%E0%A4%9C%E0%A4%A8-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%B9%E0%A4%95-%E0%A4%95%E0%A4%A4 |title=भारत विभाजन और हकीकत |accessmonthday=15 फ़रवरी |accessyear=2013 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher=नवभारत टाइम्स|language= हिंदी}}</ref>
==कांग्रेस के कैबिनेट का बहिष्कार==
==कांग्रेस के कैबिनेट का बहिष्कार==
[[1946]] में मुस्लिम लीग द्वारा 'डायरेक्ट एक्शन डे' (“Direct Action Day”) बुलाए जाने पर जो हुआ उस घटना से सारे राजनितिक एवं दोनों समुदाय के नेता घबरा गये थे। इस घटना के कारण [[उत्तर भारत]] और खास कर [[अखण्डित बंगाल|बंगाल]] में आक्रोश बढ़ गया और राजनीतिक पार्टियों पर दोनों राष्ट्र के विभाजन का खतरा बढ़ गया। [[16 अगस्त]] [[1946]] के 'डायरेक्ट एक्शन डे' (“Direct Action Day”) को “Great kolkata Riot” के नाम से भी जाना जाता है। 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग ने आम हड़ताल बुलाई थी जिसमें मुख्य मुददा था था 'कांग्रेस के कैबिनेट का बहिष्कार' और अपनी अलग राष्ट्र की मांग की दावेदारी को और मजबूत करना। 'डायरेक्ट एक्शन डे' के हड़ताल के दौरान [[कलकत्ता]] में दंगा भड़क गया जिसमें मुस्लिम लीग समर्थकों ने [[हिन्दु|हिन्दुओं]] एवं [[सिख|सिखों]] को निशाना बनाया जिसके प्रतिरोध में कांग्रेस समर्थकों ने भी मुस्लिम लीग कार्यकर्ताओं के ऊपर हमला बोल दिया। उसके बाद यह हिंसा बंगाल से बहार निकल [[बिहार]] तक में फैल गई। केवल कलकत्ता के अन्दर में 72 घंटे के अन्दर में 4000 लोग मारे गए ओर करीब 1 ,00 ,000 लोग बेघर हो गए। इन सब के बाद बहुत से कांग्रेसी नेता भी धर्म के नाम पर भारत विभाजन के विरोध में थे। [[महात्मा गाँधी]] ने विभाजन का विरोध करते हुए कहा मुझे विश्वास है कि दोनों धर्म के लोग ([[हिंदू]] और [[मुसलमान]]) शांति और सोहार्द बना कर एक साथ रह सकते हैं। मेरी आत्मा इस बात को अस्वीकार करती है कि [[हिंदू धर्म]] और [[इस्लाम धर्म]] दोनों अलग संस्कृति और सिधान्तों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुझे इस तरह के सिद्धांत अपनाने के लिए मेरा भगवान अनुमति नहीं देता पर अबतक [[अंग्रेज़]] अपने मकसद में कामयाब हो चुके थे।<ref name="नवभारत टाइम्स"/>
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==इंडियन इन्डिपेंडेंस एक्ट (Indian Independence Act)==
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'डायरेक्ट एक्शन डे' के हादसे के बाद सबको लगने लगा था कि अब अखंड भारत का विभाजन कर देना चाहिए। दो नए राज्यों/राष्ट्रों का विभाजन माउन्टबेटेन प्लान के अनुसार किया गया। [[18 जुलाई]], [[1947]] को ब्रिटिश संसद द्वारा “Indian Independence Act” पास किया गया जिसमें विभाजन की रूप रेखा तैयार की गई थी और अंत 1947 में इस ACT को ब्रिटिश संसद अधिकारिक तौर पर पारित किया गया और [[भारत]] एवं [[पाकिस्तान]] को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया गया।
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Revision as of 10:35, 14 May 2013

भारतीय उप-महाद्वीप का विभाजन और दो नए राज्यों या राष्ट्रों का निर्माण सन 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान (मुस्लिम राष्ट्र) एवं सन 15 अगस्त 1947 को भारत (रिपब्लिक आफ इंडिया) में दोनों राज्यों/राष्ट्रों के विभाजन था जिसके अलग-अलग होने की घोषणा लॉर्ड माउन्ट बेटन ने की। इस विभाजन में न की भारतीय उप-महाद्वीप के दो टुकड़े किये गये बल्कि बंगाल का भी विभाजन किया गया और बंगाल के पूर्वी हिस्से को भारत से अलग कर पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) बना दिया गया। वहीं पंजाब का विभाजन कर पाकिस्तान का निर्माण हुआ इस विभाजन में रेलवे, आर्मी, ऐतिहासिक धरोहर, केंद्रीय राजस्व, सबका बराबरी से बंटवारा किया गया। भारतीय महाद्वीप के इस विभाजन में जिस संस्था ने मुख्य रूप से भाग लिया उसका नाम था मुस्लिम लीग एवं इंडियन नेशनल कांग्रेस तथा जिन मुख्य लोगों ने हिस्सा लिया वो थे मोहम्मद अली जिन्ना, लॉर्ड माउन्ट बेटन, क्रेयल रैडक्लिफ, जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गाँधी एवं दोनों संगठनों के कुछ मुख्य कार्यकर्तागण। इन सब में से सबसे अहम् व्यक्ति थे क्रेयल रैड्क्लिफ जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने भारत पाकिस्तान के विभाजन की जिम्मेदारी सौंपी थी।

मुस्लिम राष्ट्र की मांग

इस विभाजन का जो मुख्य कारण दिया जा रहा था वो था की हिंदू बहुसंख्यक है और आजादी के बाद यहाँ बहुसंख्यक लोग ही सरकार बनायेंगे तब मोहम्मद अली जिन्ना को यह ख्याल आया कि बहुसंख्यक के राज्य में रहने से अल्पसंख्यक के साथ नाइंसाफ़ी या उन्हें नज़रंदाज़ किया जा सकता तो उन्होंने अलग से मुस्लिम राष्ट्र की मांग शुरू की। भारत के विभाजन की मांग वर्ष डर वर्ष तेज होती गई। भारत से अलग मुस्लिम राष्ट्र के विभाजन की मांग सन 1920 में पहली बार उठाई और 1947 में उसे प्राप्त किया। 15 अगस्त 1947 के दिन भारत को हिंदू सिख बहुसंख्यक एवं मुस्लिम अल्पसंख्यक राष्ट्र घोषित कर दिया गया। 1920 से 1932 में भारत पाकिस्तान विभाजन की नींव रखी गई। प्रथम बार मुस्लिम राष्ट्र की मांग अलामा इकबाल ने 1930 में मुस्लिम लीग के अध्यक्षीय भाषण में किया था। 1930 में ही मोहम्मद अली जिन्ना ने सारे अखंड भारत के अल्पसंख्यक समुदाय को भरोसे में ले लिया और कहा की भारत के मुख्यधारा की पार्टी कांग्रेस मुस्लिम हितों की अनदेखी कर रही है। इसके बाद 1932 से 1942 तक में विभाजन की बात बहुत आगे तक निकल गई थी, हालाँकि हिंदूवादी संगठन हिंदू महासभा देश का विभाजन नही चाहते थे परन्तु वह हिंदू और मुस्लिम के बिच के फर्क को बनाये रखना चाहते थे। सन 1937 में हिंदू महासभा के 19वें अधिवेसन में वीर सावरकर ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा की भारत एक सजातीय एवं एकजुट राष्ट्र हो सकता है अपितु दो अलग-अलग हिंदू एवं मुस्लिम राष्ट्र के। इन सब कोशिशों के बावजूद भी 1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में मोहम्मद अली जिन्ना ने स्पष्ट कर दिया की उन्हें मुस्लिम राष्ट्र चाहिए और इस मुद्दे पर लीग ने बिना किसी हिचकिचाहट के बोला कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग धर्म है, अलग रीती-रिवाज, अलग संस्कृति है और ऐसे में दो अलग राष्ट्रों को एकजुट रखना खासकर तब जब एक धर्म अल्पसंख्यक हो और दूसरा धर्म बहुसंख्यक, यह सब कारण अल्पसंख्यक समाज में असंतोष पैदा करेगा और राष्ट्र में और सरकारों के कार्य में अवरोध पैदा करेगा।[1]

कांग्रेस के कैबिनेट का बहिष्कार

1946 में मुस्लिम लीग द्वारा 'डायरेक्ट एक्शन डे' (“Direct Action Day”) बुलाए जाने पर जो हुआ उस घटना से सारे राजनितिक एवं दोनों समुदाय के नेता घबरा गये थे। इस घटना के कारण उत्तर भारत और ख़ास कर बंगाल में आक्रोश बढ़ गया और राजनीतिक पार्टियों पर दोनों राष्ट्र के विभाजन का खतरा बढ़ गया। 16 अगस्त 1946 के 'डायरेक्ट एक्शन डे' (“Direct Action Day”) को “Great kolkata Riot” के नाम से भी जाना जाता है। 16 अगस्त 1946 को मुस्लिम लीग ने आम हड़ताल बुलाई थी जिसमें मुख्य मुददा था था 'कांग्रेस के कैबिनेट का बहिष्कार' और अपनी अलग राष्ट्र की मांग की दावेदारी को और मजबूत करना। 'डायरेक्ट एक्शन डे' के हड़ताल के दौरान कलकत्ता में दंगा भड़क गया जिसमें मुस्लिम लीग समर्थकों ने हिन्दुओं एवं सिखों को निशाना बनाया जिसके प्रतिरोध में कांग्रेस समर्थकों ने भी मुस्लिम लीग कार्यकर्ताओं के ऊपर हमला बोल दिया। उसके बाद यह हिंसा बंगाल से बहार निकल बिहार तक में फैल गई। केवल कलकत्ता के अन्दर में 72 घंटे के अन्दर में 4000 लोग मारे गए ओर करीब 1 ,00 ,000 लोग बेघर हो गए। इन सब के बाद बहुत से कांग्रेसी नेता भी धर्म के नाम पर भारत विभाजन के विरोध में थे। महात्मा गाँधी ने विभाजन का विरोध करते हुए कहा मुझे विश्वास है कि दोनों धर्म के लोग (हिंदू और मुसलमान) शांति और सोहार्द बना कर एक साथ रह सकते हैं। मेरी आत्मा इस बात को अस्वीकार करती है कि हिंदू धर्म और इस्लाम धर्म दोनों अलग संस्कृति और सिधान्तों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुझे इस तरह के सिद्धांत अपनाने के लिए मेरा भगवान अनुमति नहीं देता पर अबतक अंग्रेज़ अपने मकसद में कामयाब हो चुके थे।[1]

इंडियन इन्डिपेंडेंस एक्ट (Indian Independence Act)

'डायरेक्ट एक्शन डे' के हादसे के बाद सबको लगने लगा था कि अब अखंड भारत का विभाजन कर देना चाहिए। दो नए राज्यों/राष्ट्रों का विभाजन माउन्टबेटेन प्लान के अनुसार किया गया। 18 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद द्वारा “Indian Independence Act” पास किया गया जिसमें विभाजन की रूप रेखा तैयार की गई थी और अंत 1947 में इस ACT को ब्रिटिश संसद अधिकारिक तौर पर पारित किया गया और भारत एवं पाकिस्तान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया गया।

गांधी जी की हत्या

स्वाधीन भारत को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ा, वे सरल नहीं थीं। उसे सबसे पहले साम्प्रदायिक उन्माद को शान्त करना था। भारत ने जानबूझकर धर्म निरपेक्ष राज्य बनना पसंद किया। उसने आश्वासन दिया कि जिन मुसलमानों ने पाकिस्तान को निर्गमन करने के बजाय भारत में रहना पसंद किया है उनको नागरिकता के पूर्ण अधिकार प्रदान किये जायेंगे। हालाँकि पाकिस्तान जानबूझकर अपने यहाँ से हिन्दुओं को निकाल बाहर करने अथवा जिन हिन्दुओं ने वहाँ रहने का फैसला किया था, उनको एक प्रकार से द्वितीय श्रेणी का नागरिक बना देने की नीति पर चल रहा था। लॉर्ड माउंटबेटेन को स्वाधीन भारत का पहला गवर्नर जनरल बनाये रखा गया और पंडित जवाहर लाल नेहरू तथा अंतरिम सरकार में उनके कांग्रसी सहयोगियों ने थोड़े से हेरफेर के साथ पहले भारतीय मंत्रिमंडल का निर्माण किया। इस मंत्रिमंडल में सरदार पटेल तथा मौलाना अबुलकलाम आज़ाद को तो सम्मिलित कर लिया गया था, परन्तु नेताजी के बड़े भाई शरतचंद्र बोस को छोड़ दिया गया। 30 जनवरी 1948 ई. को नाथूराम गोडसे नामक हिन्दू ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या कर दी। सारा देश शोक के सागर में डूब गया। नौ महीने के बाद, पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल मुहम्मद अली जिन्ना की भी मृत्यु हो गयी। उसी वर्ष लॉर्ड माउंटबेटेन ने भी अवकाश ग्रहण कर लिया और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भारत के प्रथम और अंतरिम गवर्नर जनरल नियुक्त हुए।

रियासतों का विलय

अधिकांश देशी रियासतों ने, जिनके सामने भारत अथवा पाकिस्तान में विलय का प्रस्ताव रखा गया था, भारत में विलय के पक्ष में निर्णय लिया, परन्तु, दो रियासतों—कश्मीर तथा हैदराबाद ने कोई निर्णय नहीं किया। पाकिस्तान ने बलपूर्वक कश्मीर की रियासत पर अधिकार करने का प्रयास किया, परन्तु अक्टूबर 1947 ई. में कश्मीर के महाराज ने भारत में विलय की घोषणा कर दी और भारतीय सेनाओं को वायुयानों से भेजकर श्रीनगर सहित कश्मीरी घाटी तक जम्मू की रक्षा कर ली गयी। पाकिस्तानी आक्रमणकारियों ने रियासत के उत्तरी भाग पर अपना क़ब्ज़ा बनाये रखा और इसके फलस्वरूप पाकिस्तान से युद्ध छिड़ गया। भारत ने यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाया और संयुक्त राष्ट्र संघ ने जिस क्षेत्र पर जिसका क़ब्ज़ा था, उसी के आधार पर युद्ध विराम कर दिया। वह आज तक इस सवाल का कोई निपटारा नहीं कर सका है। हैदराबाद के निज़ाम ने अपनी रियासत को स्वतंत्रता का दर्जा दिलाने का षड़यंत्र रचा, परन्तु भारत सरकार की पुलिस कार्रवाई के फलस्वरूप वह 1948 ई. में अपनी रियासत भारत में विलयन करने के लिए मजबूर हो गये। रियासतों के विलय में तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की मुख्य भूमिका रही।

  1. REDIRECTसाँचा:इन्हें भी देखें

संघ राज्यों का विलय

भारतीय संविधान सभा के द्वारा 26 नवम्बर 1949 में संविधान पास किया गया। भारत का संविधान अधिनियम 26 जनवरी 1950 को लागू कर दिया गया। इस संविधान में भारत को लौकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया था और संघात्मक शासन की व्यवस्था की गयी थी। डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद को पहला राष्ट्रपति चुना गया और बहुमत पार्टी के नेता के रूप में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने प्रधानमंत्री का पद ग्रहण किया। इस पद पर वे 27 मई 1964 ई. तक अपनी मृत्यु तक बने रहे। नवोदित भारतीय गणराज्य के लिए उनका दीर्घकालीन प्रधानमंत्रित्व बड़ा लाभदायी सिद्ध हुआ। उससे प्रशासन तथा घरेलू एवं विदेश नीतियों में निरंतरता बनी रही। पंडित नेहरू ने वैदेशिक मामलों में गुट-निरपेक्षता की नीति अपनायी और चीन से राजनयिक सम्बन्ध स्थापित किये। फ्राँस ने 1951 ई. में चंद्रनगर शान्तिपूर्ण रीति से भारत का हस्तांतरित कर दिया। 1956 ई. में उसने अन्य फ्रेंच बस्तियाँ (पांडिचेरी, कारीकल, माहे तथा युन्नान) भी भारत को सौंप दीं। पुर्तग़ाल ने फ्राँस का अनुसरण करने और शान्तिपूर्ण रीति से अपनी पुर्तग़ाली बस्तियाँ (गोवा, दमन और दीव) छोड़ने से इंकार कर दिया। फलस्वरूप 1961 ई. में भारत को बलपूर्वक इन बस्तियों को लेना पड़ा[2]। इस तरह भारत का एकीकरण पूरा हो गया।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 भारत विभाजन और हकीकत (हिंदी) नवभारत टाइम्स। अभिगमन तिथि: 15 फ़रवरी, 2013।
  2. 1975 ई. में पुर्तग़ाली शासन ने वास्तविकता को समझकर इसको वैधानिक मान्यता दे दी है।

बाहरी कड़ियाँ

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