तुम क्षमा कर दो उन्हें भी -आदित्य चौधरी

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तुम क्षमा कर दो उन्हें भी -आदित्य चौधरी

तुम क्षमा कर दो उन्हें भी
जो तुम्हारे सत्य पथ पर
कंटकों का जाल चारों ओर से
बिखरा रहे थे
और तुमको
छद्म-जीवन राह भी दिखला रहे थे

और उनको भी क्षमा कर दो
कि जिनमें, ईर्ष्या ही ईर्ष्या
का भाव था
बस स्वार्थवश ही
था प्रदर्शन प्रेम का

स्वत: उनको, मुस्कुरा कर
दान देना परम करुणा से भरे मन
और अंतर हृदय से तुम
जिनका विरोधी स्वर बना कारण
तुम्हारे परम सुखमय आज का
अपने निजी आकाश का

स्मरण हो
लाओत्से ने क्या कहा था-
“हो सहज मन
और करुणा हो
सभी के प्रति तुम्हारी”

ध्यान मत देना
कनफ्य़ूशस के कथन पर-
"जो बिछाएँ शूल, राहों में निरंतर
उन्हें सम्मानित करो मत फूल देकर
क्योंकि इससे रूठ जाएँगे सभी वे
सेज फूलों से सजाते हैं तुम्हारी”

अरे तुम सुन रहे हो ना ?

तुम्हारे जो भी अपने हैं
वो तो हर हाल अपने हैं
यदि कोई ‘हाल’ ऐसा है
जहाँ होंगे विरोधी वे
तो फिर ये जान लो
भ्रम है तुम्हें ये आज भी

कि वे तो मेरे अपने हैं
रखोगे तुम क्षमा भीतर
तभी तो प्रेम भी होगा
नहीं तो प्रेम
सुख की लालसा का ही व्यसन होगा

मेरी मानो!
क्षमा कर दो !

क्योंकि तुम प्रेममय हो।


टीका टिप्पणी और संदर्भ


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