दूत काव्य

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दूत काव्य संस्कृत काव्य की एक विशिष्ट परंपरा है। इसका आरंभ भास तथा घटकर्पर के काव्यों और महाकवि कालिदास के 'मेघदूत' में मिलता है, तथापि, इसके बीज और अधिक पुराने प्रतीत होते हैं।

  • परिनिष्ठित काव्यों में वाल्मीकि द्वारा वर्णित वह प्रसंग, जिसें राम ने सीता के पास अपना विरह संदेश भेजा था, इस परंपरा की आदि कड़ी माना जाता है। स्वयं कालिदास ने भी अपने मेघदूत में इस बात का संकेत किया है कि उन्हें मेघ को दूत बनाने की प्रेरणा वाल्मीकि रामायण के हनुमान वाले प्रसंग से मिली है।
  • दूसरी और इस परंपरा के बीज लोक काव्यों में भी स्थित जान पड़ते हैं, जहाँ विरही और विरहिणियाँ अपने अपने प्रेमपात्रों के पति भ्रमर, शुक, चातक, काक आदि पक्षियों के द्वारा संदेश ले जाने का विनय करती मिलती हैं।
  • प्राकृत तथा अपभ्रंश साहित्य में कुछ फुटकर गाथाएँ और दोहे क्रमश: हाल और हेमचंद्र के मिल जाएँगे, जिनमें किसी माध्यम से विमुक्त प्रणयी ने अपने प्रिय के पास कुछ संदेश भिजवाने की चेष्टा की है। समग्र काव्यकृति के रूप में मध्य भारतीय आर्य भाषा के साहित्य में केवल एक कृति ऐसी है, जो मेघदूत की परंपरा में आती है और यह है अपभ्रंश कवि उद्दहमाण का 'संदेशरासक'।
  • हिंदी में 'ढोला मारू रा दूहा' में कुछ दोहे ऐसे हैं, जिनका स्वरूप दूतकाव्य शैली का है। इसके अतिरिक्त हिंदी प्रेमाख्यान काव्यों में ऐसे स्थल उपलब्ध हैं, जहाँ विरही प्रणयी ने अपने प्रिय के प्रति किसी माध्यम से संदेश पहुँचाने की चेष्टा की है। इस संबंध में जायसी के 'नागमतीविरह वर्णन' में उपलब्ध कुछ स्थलों का संकेत किया जा सकता है।
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