कइकाँण

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कइकाँण - (काव्य प्रयोग, पुरानी हिन्दी) संज्ञा पुल्लिंग (देशज)[1]

केकाण। घोड़ा

उदाहरण-

एही भली न करहला, करहलिया कइकाँणा। - ढोला मारू र दूहा[2]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिंदी शब्दसागर, द्वितीय भाग |लेखक: श्यामसुंदरदास बी. ए. |प्रकाशक: नागरी मुद्रण, वाराणसी |पृष्ठ संख्या: 732 |
  2. ढोला मारू र दूहा, 627, सम्पादक रामसिंह, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, द्वितीय संस्करण

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