किसी सूरत नहीं भरता ज़रा पेट, यह कुछ रखता है अब हर्सो हक । अगर चोरी न करता चोर यारो, तो होता चाक कहो उसका भला पेट ।। चले हैं मार अशराफ़ों को धक्का, मियाँ जिस दम कमीने का भरा पेट । नहीं चैन उसको इस काफ़िर के हाथों, है छोटा जिसका अघसेरा बना पेट ।। ख़ुदा हाफ़िज़ उन लोगों का यारो, कि जिनकी है बड़ी तोंद और बड़ा पेट । सदा माशूक पेड़े माँगता है, मलाई-सा वह आशिक़ को दिखा पेट ।। और आशिक़ का भी इसके देखने से, कभी मुतलिक नहीं भरा पेट । ग़रीब आजिज तो है लाचार यारो ! कि उनसे हर घड़ी है माँगता पेट ।। तसल्ली ख़ूब उनको भी नहीं है कि घर दौलत से जिनके फट पड़ा पेट । किसी तरह यह मुहिब न यार न दोस्त फ़क़त रोटी का है इकआश्ना पेट ।। भरे तो इस ख़ुशी में फूल जावे कि गोया बाँझ के तई रह गया पेट । जो खाली हो तो दिन को यों करे सुस्त किसी का जैसे दस्तों से चला पेट ।। बड़ा कोई नहीं दुनिया में यारो मगर कहिए तो सबसे बड़ा पेट । हुए पूरे फक़ीरी में वही लोग जिन्होंने सब्र से अपना कसा पेट ।। लगा पूरब से लेकर ताबः पच्छिम लिए फिरता है सबको जा बजा पेट । कई मन किया गया मज़मून का आटा ’नज़ीर’ इस रेख्ते का है बड़ा पेट ।।