कमर बांधे हुए चलने को याँ सब यार बैठे हैं । बहोत आगे गए, बाक़ी जो हैं तैयार बैठे हैं ।। न छेड़ ए निक़हत-ए-बाद-ए-बहारी, राह लग अपनी । तुझे अटखेलियाँ सूझी हैं, हम बेज़ार बैठे हैं ।। तसव्वुर अर्श पर है और सर है पा-ए-साक़ी पर । ग़र्ज़ कुछ और धुन में इस घड़ी मय-ख़्वार बैठे हैं ।। बसाने नक़्शपाए रहरवाँ कू-ए-तमन्ना में । नहीं उठने की ताक़त, क्या करें? लाचार बैठे हैं ।। यह अपनी चाल है उफ़तादगी से इन दिनों पहरों तक । नज़र आया जहां पर साया-ए-दीवार बैठे हैं ।। कहाँ सब्र-ओ-तहम्मुल? आह! नंगोंनाम क्या शै है । मियाँ! रो-पीटकर इन सबको हम यकबार बैठे हैं ।। नजीबों का अजब कुछ हाल है इस दौर में यारो । जहाँ पूछो यही कहते हैं, "हम बेकार बैठे हैं" ।। भला गर्दिश फ़लक की चैन देती है किसे इंशा ! ग़़नीमत है कि हम सूरत यहाँ दो-चार बैठे हैं ।।