प्रश्नोपनिषद: Difference between revisions
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Revision as of 07:19, 25 March 2010
प्रश्नोपनिषद / Prashnopnishad
अथर्ववेद की पिप्पलाद शाखा के ब्राह्मण भाग से सम्बन्धित इस उपनिषद में जिज्ञासुओं द्वारा महर्षि पिप्पलाद से छह प्रश्न पूछे गये हैं।
पहला प्रश्न
कात्यायन कबन्धी-'भगवन! यह प्रजा किससे उत्पन्न होती है?'
महर्षि पिप्पलाद-'प्रजा-वृद्धि की इच्छा करने वाले प्रजापति ब्रह्मा ने 'रयि' और 'प्राण' नामक एक युगल से प्रजा की उत्पन्न कराई।'
वस्तुत: प्राण गति प्रदान करने वाला चेतन तत्त्व है। रयि उसे धारण करके विविध रूप देने में समर्थ प्रकृति है। इस प्रकार ब्रह्मा मिथुन-कर्म द्वारा सृष्टि को उत्पन्न करता है।
दूसरा प्रश्न
ऋषि भार्गव-'हे भगवन! प्रजा धारण करने वाले देवताओं की संख्या कितनी है और उनमें वरिष्ठ कौन है?'
महर्षि पिप्पलाद-'पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, प्राण, वाणी, नेत्र और श्रोत्र आदि सभी देव हैं। ये जीव के आश्रयदाता है। सभी देवताओं मे प्राण ही सर्वश्रेष्ठ है। सभी इन्द्रियां प्राण के आश्रय में ही रहती हैं।'
तीसरा प्रश्न
कौसल्य आश्वलायन—'हे महर्षि! इस 'प्राण' की उत्पत्ति कहां से होती है, यह शरीर में कैसे प्रवेश करता है और कैसे बाहर निकल जाता है तथा कैसे दोनों के मध्य रहता है?'
महर्षि पिप्पलाद—' इस प्राण की उत्पत्ति आत्मा से होती है। जैसे शरीर की छाया शरीर से उत्पन्न होती है और उसी में समा जाती है, उसी प्रकार प्राण आत्मा से प्रकट होता है और उसी में समा जाता है। वह प्राण मन के संकल्प से शरीर में प्रवेश करता है। मरणकाल में यह आत्मा के साथ ही बाहर निकलकर दूसरी योनियों में चला जाता है।'
चौथा प्रश्न
गार्ग्य ऋषि-' हे भगवन! इस पुरुष देह में कौन-सी इन्द्री शयन करती है और कौन-सी जाग्रत रहती है? कौन-सी इन्द्री स्वप्न देखती है और कौन-सी सुख अनुभव करती है? ये सब किसमें स्थित है?'
महर्षि पिप्पलाद—'हे गार्ग्य! जिस प्रकार सूर्य की रश्मियां सूर्य के अस्त होते ही सूर्य में सिमट जाती हैं और उसके उदित होते ही पुन: बिखर जाती हैं उसी प्रकार समस्त इन्द्रियां परमदेव मन में एकत्र हो जाती हैं। तब इस पुरुष का बोलना-चालना, देखना-सुनना, स्वाद-अस्वाद, सूंघना-स्पर्श करना आदि सभी कुछ रूक जाता है। उसकी स्थिति सोये हुए व्यक्ति-जैसी हो जाती है।'
'सोते समय प्राण-रूप अग्नि ही जाग्रत रहती है। उसी के द्वारा अन्य सोई हुई इन्द्रियां केवल अनुभव मात्र करती हैं, जबकि वे सोई हुई होती हैं।'
पांचवां प्रश्न
सत्यकाम—'हे भगवन! जो मनुष्य जीवन भर 'ॐ' का ध्यान करता है, वह किस लोक को प्राप्त करता है?'
महर्षि पिप्पलाद—'हे सत्यकाम! यह 'ॐकार' ही वास्तव में 'परब्रह्म' है। 'ॐ' का स्मरण करने वाला ब्रह्मलोक को ही प्राप्त करता है। यह तेजोमय सूर्यलोक ही ब्रह्मलोक है।'
छठा प्रश्न
सुकेशा भारद्वाज—'हे भगवन! कौसल देश के राजपुरुष हिरण्यनाभ ने सोलह कलाओं से युक्त पुरुष के बारे में मुझसे प्रश्न किया था, परन्तु मैं उसे नहीं बता सका। क्या आप किसी ऐसे पुरुष के विषय में जानकारी रखते हैं?'
महर्षि पिप्पलाद—'हे सौम्य! जिस पुरुष में सोलह कलाएं उत्पन्न होती हैं, वह इस शरीर में ही विराजमान है। उस पुरुष ने सर्वप्रथम 'प्राण' का सृजन किया। तदुपरान्त प्राण से 'श्रद्धा', 'आकाश', 'वायु', 'ज्योति', 'पृथ्वी', 'इन्द्रियां', 'मन' और 'अन्न' का सृजन किया। अन्न से 'वीर्य' , 'तप', 'मन्त्र', 'कर्म', 'लोक' एवं 'नाम' आदि सोलह कलाओं का सृजन किया।'