पुनर्नवा -हज़ारी प्रसाद द्विवेदी: Difference between revisions

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'''पुनर्नवा''' [[हज़ारी प्रसाद द्विवेदी]] द्वारा रचित चौथी शताब्दी की घटनाओं पर आधारित ऐतिहासिक [[उपन्यास]] है। वह वस्तुस्थिति का प्रत्यक्षीकरण मात्र है। इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये कई भागों में बँटा है और सारे भाग धीरे धीरे आपस में जुड़ते हैं।<ref>{{cite web |url=http://pustak.org/index.php/books/bookdetails/7885/Punarnava |title= पुनर्नवा |accessmonthday= 27 जुलाई |accessyear= 2017|last= |first= |authorlink= |format= |publisher=pustak.org|language=हिंदी }}</ref>
 
==महत्त्वपूर्ण बिंदू==
==महत्त्वपूर्ण बिंदू==
लोग सत्य को जानते हैं, समझते नहीं। और इसीलिए सत्य कई बार बहुत कड़वा तो लगता ही है, वह भ्रामक भी होता है। फलतः जनसाधारण ही नहीं, समाज के शीर्ष व्यक्ति भी कई बार लोकापवाद और लोकस्तुति के झूठे प्रपंचों में फँसकर पथभ्रष्ट हो जाते हैं। पुनर्नवा ऐसे ही लोकापवादों से दिग्भ्रांत चरित्रों की कहानी है। वस्तुस्थिति की कारण-परंपरा को न समझकर वे समाज से ही नहीं, अपने-आपसे भी पलायन करते हैं और कर्तव्याकर्तव्य का बोध उन्हें नहीं रहता। सत्य की तह में जाकर जब वे उन अपवादों और स्तुतियों के भ्रमजाल से मुक्त होते हैं, तभी अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय उन्हें मिलता है और नवीन शक्ति प्राप्त कर वे नए सिरे से जीवन-संग्राम में प्रवृत्त होते हैं।
लोग सत्य को जानते हैं, समझते नहीं। और इसीलिए सत्य कई बार बहुत कड़वा तो लगता ही है, वह भ्रामक भी होता है। फलतः जनसाधारण ही नहीं, समाज के शीर्ष व्यक्ति भी कई बार लोकापवाद और लोकस्तुति के झूठे प्रपंचों में फँसकर पथभ्रष्ट हो जाते हैं। पुनर्नवा ऐसे ही लोकापवादों से दिग्भ्रांत चरित्रों की कहानी है। वस्तुस्थिति की कारण-परंपरा को न समझकर वे समाज से ही नहीं, अपने-आपसे भी पलायन करते हैं और कर्तव्याकर्तव्य का बोध उन्हें नहीं रहता। सत्य की तह में जाकर जब वे उन अपवादों और स्तुतियों के भ्रमजाल से मुक्त होते हैं, तभी अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय उन्हें मिलता है और नवीन शक्ति प्राप्त कर वे नए सिरे से जीवन-संग्राम में प्रवृत्त होते हैं।
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==टीका टिप्पणी और संदर्भ==
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Latest revision as of 11:29, 26 July 2017

पुनर्नवा -हज़ारी प्रसाद द्विवेदी
लेखक हज़ारी प्रसाद द्विवेदी
मूल शीर्षक पुनर्नवा
मुख्य पात्र देवरात, मंजुला, आर्यक, मृणालमंजरी, श्यामरूप, चंद्रा, देवक
देश भारत
प्रकार उपन्यास

पुनर्नवा हज़ारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित चौथी शताब्दी की घटनाओं पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यास है। वह वस्तुस्थिति का प्रत्यक्षीकरण मात्र है। इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये कई भागों में बँटा है और सारे भाग धीरे धीरे आपस में जुड़ते हैं।[1]

महत्त्वपूर्ण बिंदू

लोग सत्य को जानते हैं, समझते नहीं। और इसीलिए सत्य कई बार बहुत कड़वा तो लगता ही है, वह भ्रामक भी होता है। फलतः जनसाधारण ही नहीं, समाज के शीर्ष व्यक्ति भी कई बार लोकापवाद और लोकस्तुति के झूठे प्रपंचों में फँसकर पथभ्रष्ट हो जाते हैं। पुनर्नवा ऐसे ही लोकापवादों से दिग्भ्रांत चरित्रों की कहानी है। वस्तुस्थिति की कारण-परंपरा को न समझकर वे समाज से ही नहीं, अपने-आपसे भी पलायन करते हैं और कर्तव्याकर्तव्य का बोध उन्हें नहीं रहता। सत्य की तह में जाकर जब वे उन अपवादों और स्तुतियों के भ्रमजाल से मुक्त होते हैं, तभी अपने वास्तविक स्वरूप का परिचय उन्हें मिलता है और नवीन शक्ति प्राप्त कर वे नए सिरे से जीवन-संग्राम में प्रवृत्त होते हैं।

पुनर्नवा ऐसे हीन चरित्र व्यक्तियों की कहानी भी है, जो युग-युग से समाज की लांछना सहते आए हैं, किंतु शोभा और शालीनता की कोई किरण जिनके अंतर में छिपी रहती है और एक दिन यही किरण ज्योतिपुंज बनकर न केवल उनके अपने, बल्कि दूसरों के जीवन को भी आलोकिक कर देती है। पुनर्नवा चौथी शताब्दी की घटनाओं पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यास है, लेकिन जिन प्रश्नों को यहाँ उठाया गया है वे चिरंतन हैं और उनके प्रस्तुतीकरण तथा निर्वाह में आचार्य द्विवेदी ने अत्यन्त वैज्ञानिक एवं प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है।

मुख्य पात्र

इस कहानी के सारे मुख्य पात्र विशिष्ट हैं और सम्पूर्ण कहानी अपने आप में जैसे उनकी आत्मकथा है। देवरात, मंजुला, आर्यक, मृणालमंजरी, श्यामरूप, चंद्रा, देवक सभी हल्द्वीप से अपने अपने भाग की यात्रा करते हैं और द्विवेदी जी ने बड़ी सुन्दरता के साथ सभी को मथुरा में एक एक करके मिलवाया है।



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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पुनर्नवा (हिंदी) pustak.org। अभिगमन तिथि: 27 जुलाई, 2017।

बाहरी कड़ियाँ

स्वजनों के बिछड़ने और मिलने की कहानी - "पुनर्नवा"

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