गीता 2:38: Difference between revisions
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यहाँ तक भगवान् ने सांख्य योग के सिद्धान्त से तथा क्षत्रिय धर्म की दृष्टि से युद्ध का औचित्य सिद्ध करके <balloon link="अर्जुन" title="महाभारत के मुख्य पात्र है। पाण्डु एवं कुन्ती के वह तीसरे पुत्र थे । अर्जुन सबसे अच्छा धनुर्धर था। वो द्रोणाचार्य का शिष्य था। द्रौपदी को स्वयंवर | यहाँ तक भगवान् ने सांख्य योग के सिद्धान्त से तथा क्षत्रिय धर्म की दृष्टि से युद्ध का औचित्य सिद्ध करके <balloon link="अर्जुन" title="महाभारत के मुख्य पात्र है। पाण्डु एवं कुन्ती के वह तीसरे पुत्र थे । अर्जुन सबसे अच्छा धनुर्धर था। वो द्रोणाचार्य का शिष्य था। द्रौपदी को स्वयंवर में जीतने वाला वो ही था। | ||
¤¤¤ आगे पढ़ने के लिए लिंक पर ही क्लिक करें ¤¤¤">अर्जुन</balloon> को समतापूर्वक युद्ध करने के लिये आज्ञा दी। अब कर्मयोग के सिद्धान्त से युद्ध का औचित्य बतलाने के लिये कर्मयोग के वर्णन की प्रस्तावना करते हैं- | ¤¤¤ आगे पढ़ने के लिए लिंक पर ही क्लिक करें ¤¤¤">अर्जुन</balloon> को समतापूर्वक युद्ध करने के लिये आज्ञा दी। अब कर्मयोग के सिद्धान्त से युद्ध का औचित्य बतलाने के लिये कर्मयोग के वर्णन की प्रस्तावना करते हैं- | ||
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Revision as of 07:51, 20 February 2011
गीता अध्याय-2 श्लोक-38 / Gita Chapter-2 Verse-38
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