राष्ट्रभाषा आंदोलन से सम्बन्धित व्यक्तित्व: Difference between revisions
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हिंदी भारतीय गणराज की राजकीय और मध्य भारतीय- आर्य भाषा है। सन 2001 की जनगणना के अनुसार, लगभग 25.79 करोड़ भारतीय हिंदी का उपयोग मातृभाषा के रूप में करते हैं, जबकि लगभग 42.20 करोड़ लोग इसकी 50 से अधिक बोलियों में से एक इस्तेमाल करते हैं। सन 1998 के पूर्व, मातृभाषियों की संख्या की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं के जो आँकड़े मिलते थे, उनमें हिन्दी को तीसरा स्थान दिया जाता था।
बंगाल
हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती। चन्द्रबली पाण्डेय |
है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। |
जिस भाषा में तुलसीदास जैसे कवि ने कविता की हो वह अवश्य ही पवित्र है और उसके सामने कोई भाषा नहीं ठहर सकती। महात्मा गाँधी |
हिंदी भारतवर्ष के हृदय-देश स्थित करोड़ों नर-नारियों के हृदय और मस्तिष्क को खुराक देने वाली भाषा है। हज़ारीप्रसाद द्विवेदी |
हिंदी को गंगा नहीं बल्कि समुद्र बनना होगा। विनोबा भावे |
हिंदी के विरोध का कोई भी आन्दोलन राष्ट्र की प्रगति में बाधक है। सुभाष चन्द्र बसु |
हिंदी को संस्कृत से विच्छिन्न करके देखने वाले उसकी अधिकांश महिमा से अपरिचित हैं। हज़ारीप्रसाद द्विवेदी |
राजा राममोहन राय, केशवचंद्र सेन, नवीन चंद्र राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, तरुणी चरण मिश्र, राजेन्द्र लाल मित्र, राज नारायण बसु, भूदेव मुखर्जी, बंकिम चंद्र चैटर्जी ('हिंदी भाषा की सहायता से भारतवर्ष के विभिन्न प्रदेशों के मध्य में जो ऐक्यबंधन संस्थापन करने में समर्थ होंगे वही सच्चे भारतबंधु पुकारे जाने योग्य हैं।)', सुभाषचंद्र बोस ('अगर आज हिंदी भाषा मान ली गई है तो वह इसलिए नहीं कि वह किसी प्रान्त विशेष की भाषा है, बल्कि इसलिए कि वह अपनी सरलता, व्यापकता तथा क्षमता के कारण सारे देश की भाषा हो सकती है।') रवीन्द्रनाथ टैगोर ('यदि हम प्रत्येक भारतीय के नैसर्गिक अधिकारों के सिद्धांत को स्वीकार करते हैं, तो हमें राष्ट्रभाषा के रूप में इस भाषा को स्वीकार करना चाहिए जो देश के सबसे बड़े भू–भाग में बोली जाती है और जिसे स्वीकार करने की सिफ़ारिश महात्मा गाँधीजी ने हम लोगों से की है।') रामानंद चटर्जी, सरोजिनी नायडू, शारदा चरण मित्र, आचार्य क्षिति मोहन सेन ('हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने हेतु जो अनुष्ठान हुए हैं, उनको मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ।') आदि।
महाराष्ट्र
बाल गंगाधर तिलक ('यह आंदोलन उत्तर भारत में केवल एक सर्वमान्य लिपि के प्रचार के लिए नहीं है। यह तो उस आंदोलन का एक अंग है, जिसे मैं एक राष्ट्रीय आंदोलन कहूँगा और जिसका उद्देश्य समस्त भारतवर्ष के लिए एक राष्ट्रीय भाषा की स्थापना करना है, क्योंकि सबके लिए समान भाषा राष्ट्रीयता का महत्त्वपूर्ण अंग है। अतएव यदि आप किसी राष्ट्र के लोगों को एक–दूसरे के निकट लाना चाहें तो सबके लिए समान भाषा से बढ़कर सशक्त अन्य कोई बल नहीं है।'), एन. सी. केलकर, डॉ. भण्डारकर, वी. डी. सावरकर, गोपाल कृष्ण गोखले, गाडगिल, काका कालेलकर आदि।
पंजाब
लाला लाजपत राय, श्रद्धाराम फिल्लौरी आदि।
गुजरात
दयानंद सरस्वती, महात्मा गाँधी, वल्लभभाई पटेल, कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ('हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना नहीं है, वह तो है ही।') आदि।
दक्षिण भारत
- सी. राजगोपालाचारी, टी. विजयराघवाचार्य ('हिन्दुस्तान की सभी जीवित और प्रचलित भाषाओं में मुझे हिंदी ही राष्ट्रभाषा बनने के लिए सबसे अधिक योग्य दिखाई पड़ती है।'),
- सी. पी. रामास्वामी अय्यर ('देश के विभिन्न भागों के निवासियों के व्यवहार के लिए सर्वसुगम और व्यापक तथा एकता स्थापित करने के साधन के रूप में हिंदी का ज्ञान आवश्यक है।')
- अनन्त शयनम आयगर ('हिंदी ही उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाली समर्थ भाषा है।')
- एस. निजलिंगप्पा ('दक्षिण की भाषाओं ने संस्कृत से बहुत कुछ लेन–देन किया है, इसलिए उसी परम्परा में आई हुई हिंदी बड़ी सरलता से राष्ट्रभाषा होने के लायक़ है।')
- रंगनाथ रामचंद्र दिवाकर ('जो राष्ट्रप्रेमी है, उसे राष्ट्रभाषा प्रेमी होना चाहिए।')
- के. टी. भाष्यम, आर. वेंकटराम शास्त्री, एन. सुन्दरैया आदि।
अन्य—मदनमोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन ('हिंदी का प्रहरी'), राजेन्द्र प्रसाद, सेठ गोविन्द दास आदि।
महात्मा गाँधी के विचार
- 'करोड़ों लोगों को अंग्रेज़ी की शिक्षा देना उन्हें ग़ुलामी में डालने जैसा है। मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच ग़ुलामी की बुनियाद थी'।[1]
- "अंग्रेज़ी भाषा हमारे राष्ट्र के पाँव में बेड़ी बनकर पड़ी हुई है।" भारतीय विद्यार्थी को अंग्रेज़ी के मार्फ़त ज्ञान अर्जित करने पर कम से कम 6 वर्ष अधिक बर्बाद करने पड़ते हैं। यदि हमें एक विदेशी भाषा पर अधिकार पाने के लिए जीवन के अमूल्य वर्ष लगा देने पड़ें, तो फिर और क्या हो सकता है'। (1914)
- 'जिस भाषा में तुलसीदास जैसे कवि ने कविता की हो, वह अत्यन्त पवित्र है और उसके सामने कोई भाषा ठहर नहीं सकती'। (1916)
- 'हिंदी ही हिन्दुस्तान के शिक्षित समुदाय की सामान्य भाषा हो सकती है, यह बात निर्विवाद सिद्ध है। जिस स्थान को अंग्रेज़ी भाषा आजकल लेने का प्रयत्न कर रही है और जिसे लेना उसके लिए असम्भव है, वही स्थान हिंदी को मिलना चाहिए, क्योंकि हिंदी का उस पर पूर्ण अधिकार है। यह स्थान अंग्रेज़ी को नहीं मिल सकता, क्योंकि वह विदेशी भाषा है और हमारे लिए बड़ी कठिन है'। (1917)
- 'हिंदी भाषा वह भाषा है जिसको उत्तर में हिन्दू व मुसलमान बोलते हैं और जो नागरी और फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है। यह हिंदी एकदम संस्कृतमयी नहीं है और न ही वह एकदम फ़ारसी शब्दों से लदी है'। (1918)
- 'हिंदी और उर्दू नदियाँ हैं और हिन्दुस्तानी सागर है। हिंदी और उर्दू दोनों को आपस में झगड़ना नहीं चाहिए। दोनों का मुक़ाबला तो अंग्रेज़ी से है'।
- 'अंग्रेज़ों के व्यामोह से पिंड छुड़ाना स्वराज्य का एक अनिवार्य अंग है'।
- 'मैं यदि तानाशाह होता (मेरा बस चलता तो) आज ही विदेशी भाषा में शिक्षा देना बंद कर देता, सारे अध्यापकों को स्वदेशी भाषाएँ अपनाने पर मजबूर कर देता। जो आनाकानी करते, उन्हें बर्ख़ास्त कर देता। मैं पाठ्य–पुस्तकों की तैयारी का इंतज़ार नहीं करूँगा, वे तो माध्यम के परिवर्तन के पीछे-पीछे अपने आप ही चली आएगी। यह एक ऐसी बुराई है, जिसका तुरन्त ही इलाज होना चाहिए'।
- 'मेरी मातृभाषा में कितनी ही ख़ामियाँ क्यों न हों, मैं इससे इसी तरह से चिपटा रहूँगा, जिस तरह से बच्चा अपनी माँ की छाती से, जो मुझे जीवनदायी दूध दे सकती है। अगर अंग्रेज़ी उस जगह को हड़पना चाहती है, जिसकी वह हक़दार नहीं है, तो मैं उससे सख़्त नफ़रत करूँगा। वह कुछ लोगों के सीखने की वस्तु हो सकती है, लाखों–करोड़ों की नहीं'।
- 'लिपियों में सबसे अव्वल दरजे की लिपि नागरी को ही मानता हूँ। मैं मानता हूँ कि नागरी और उर्दू लिपि के बीच अंत में जीत नागरी लिपि की ही होगी'।
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टीका टिप्पणी और संदर्भ
- ↑ हिन्द स्वराज, 1909
बाहरी कड़ियाँ
- भारोपीय परिवार की भारतीय भाषाएँ
- हिन्दी भाषा के सम्बंध में कुछ विचार
- हिन्दी भाषा-क्षेत्र एवं हिन्दी के क्षेत्रगत रूप
- हिन्दी-उर्दू का अद्वैत
- हिन्दी की अन्तरराष्ट्रीय भूमिका
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