यहाँ यह बात कही गयी है कि भगवान् का स्मरण करते हुए मरने वाला भगवान् को ही प्राप्त होता है। इस पर यह जिज्ञासा होती है कि केवल भगवान् के स्मरण के संबंध में ही यह विशेष नियम हैं या सभी के संबंध में है ? इस पर कहते हैं –
हे कुन्ती[1] पुत्र अर्जुन[2] ! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग करता है, वह उस-उस को ही प्राप्त होता हैं; क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है ।।6।।
Arjuna,thinking of whatever entity one leaves the body at the time of death, that and that alone one attains, being over absorbed in its thought. (6)
कौन्तेय = हे कुन्तीपुत्र अर्जुन (यह मनुष्य) ; अन्ते = अन्तकाल में ; यम् = जिस ; यम् = जिस ; वा अपि = भी ; भावम् = भावको ; स्मरन् = स्मरण करता हुआ ; कलेवरम् = शरीर को ; त्याजति = त्यागता है; तम् = उस ; तम् = उसको ; एव = ही ; इति = प्राप्त होता है (परन्तु) ; सदा = सदा ; तभ्दावभावित: = उस ही भाव को चिन्तन करता हुआ
↑महाभारत के मुख्य पात्र है। वे पाण्डु एवं कुन्ती के तीसरे पुत्र थे। सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर के रूप में वे प्रसिद्ध थे। द्रोणाचार्य के सबसे प्रिय शिष्य भी वही थे। द्रौपदी को स्वयंवर में भी उन्होंने ही जीता था।